शुक्रवार, 10 मई 2013

अनाज के सपने और भूख का कानून : एन के सिंह




अनाज के सपने और भूख का कानून


एन के सिंह, राज्यसभा सदस्य और पूर्व केंद्रीय सचिव

संसद का बजट सत्र अचानक ही खत्म हो गया। बाधाओं के कारण खासकर सत्र के उत्तरार्ध में कोई विधायी काम नहीं हो सका। लोकसभा में पेश किए गए खाद्य सुरक्षा विधेयक पर भी विचार नहीं हो सका। अगर राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ठ होते हैं कि इस काम को करना इतना जरूरी है कि इसके लिए अगले सत्र का इंतजार भी नहीं किया जा सकता तो खाद्य सुरक्षा के लिए सरकार अध्यादेश ला सकती है।
फिलहाल यह विधेयक जिस रूप में पेश हुआ है मैं उससे सहमत नहीं हूं। मुङो लगता है कि इससे न तो भुखमरी को रोका जा सकता है और न कुपोषण को खत्म किया जा सकता है। यहां इस विधेयक की मुख्य विशेषताओं का जिक्र जरूरी है। एक तो इस विधेयक से ग्रामीण क्षेत्र की 75 फीसदी आबादी और शहरी क्षेत्र की 50 फीसदी आबादी सस्ता खाद्यान्न प्राप्त करने की हकदार होगी। ग्रामीण क्षेत्र की 46 और शहरी क्षेत्र की 28 फीसदी आबादी को प्राथमिकता का दर्जा दिया जाएगा। बाकी का दर्जा सामान्य का होगा। विधेयक में गर्भवती औरतों, बच्चों को दूध पिलाने वाली माताएं और कुपोषित बच्चों के लिए विशेष प्रावधान किया गया है। दूसरे, केंद्र सरकार यह तय करेगी कि किस प्रदेश में कितनी फीसदी लोगों को प्राथमिक का दर्जा देना और कितनों को सामान्य का।
तीसरे, लक्षित वर्ग तक पहुंचने के लिए आधार जैसी तकनीक का सहारा लिया जाएगा और अनाज देने के बजाए नगद ट्रांस्फर व फूड कूपन जैसे तरीके अपनाए जाएंगे।
चौथे, शिकायत निवारण के लिए जिला, राज्य और केंद्रीय स्तर पर संगठन बनाए जाएंगे। केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर राष्ट्रीय व राजकीय खाद्य आयोग बनाएंगे।
पांचवा, केंद्र सरकार केंद्रीय पूल से अनाज लेकर राज्यों को उपलब्ध कराएगी, इसके अलावा अनाज के लदान, रख-रखाव और उनके लिए वैज्ञानिक भंडारण सुविधाएं बनाना भी केंद्र की ही जिम्मेदारी होगी। राज्य सरकार का काम अनाज को लोगों तक पहुंचाना होगा, उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि अनाज जिन लोगों के लिए है उन लोगों तक पहुंचे।
निसंदेह इस विधेयक में कईं अच्छी चीजे हैं। इस कोशिश में यह चिंता दिखाई देती है कि भारत का नाम विश्व भुखमरी सूचकांक और बाल कुपोषण के मानव सूचकांक में सबसे नीचे न दिखाई दे। यह सुप्रीम कोर्ट की उस चिंता का जवाब भी है जिसमें उसने कहा था कि लोग भूख से मर रहे हैं और अनाज गोदामों में सड़ रहा है।
इस कानून को चुनाव के समय लाया जा रहा है इसलिए इसमें राजनैतिक रंग तो देखा ही जा रहा है, साथ ही यह राज्य सरकारों और यहां तक कि गैर सरकारी संगठनों यानी एनजीओं की बहुत सारी आपत्तियों का समाधान नहीं देता। कुछ एनजीओ का तो यहां तक कहना है कि विधेयक में इतने प्रावधान नहीं है कि किसी स्वायत्त सरकार की इससे नैतिक जिम्मेदारी पूरी हो जाती हो। इसे लेकर बहुत सारी चिंताएं हैं-
एक, इसके वित्तीय नतीजे। सरकार को अपना अनुमान यह कहता है कि इससे खाद्य सबसिडी 85 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर 123 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगी। कृषि लागत व मूल्य आयोग का अनुमान है कि तीन साल में यह सबसिडी बढ़कर 512 हजार करोड़ रुपये तक जा पहुंचेगी। इसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर की लागत शामिल नहीं है। यह पैसा कहां से आएगा? वह भी उस समय जब वित्तीय घाटे को कम करने का दबाव है।
दूसरा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बहुत सारी खामियां हैं, इसमें लीकेज भी है और भ्रष्टाचार भी। इस वितरण प्रणाली के पुनर्गठन का काम अभी अधर में ही है। आधार अभी प्रयोगात्मक स्तर पर है और नगदी ट्रांस्फर का भी यही हाल है। खामियों वाली वितरण प्रणाली पर और काम लादने से खराब नतीजे ही मिलेंगे।
तीसरा, विधेयक लागू होने से सरकार की अनाज की जरूर 70 लाख टन से बढ़कर 620 लाख टन हो जाएगी। शुरुआत में तो सरकार अपने भंडार से इस जरूरत को पूरा कर लेगी लेकिन तीन साल के बाद या तो भारी मात्रा में आयात करना होगा या फिर कईं मोर्चो पर आपूर्ति की चुनौतियां झेलनी होंगी।
चौथा, विधेयक में वह पैमाना नहीं बताया गया जिसके आधार पर इस सुविधा को प्राप्त करने वाले की पहचान होगी। यह सुविधा ग्रामीण क्षेत्र में 75 और शहरी क्षेत्र में 50 फीसदी लोगों को मिलनी है, अगर यही अनुपात समान रूप से हर राज्य में अपनाया गया तो गरीब राज्यों के साथ अन्याय होगा।
अंत में इसे लागू का तरीका। अभी तक राष्ट्रीय खाद्य आयोग का गठन नहीं हुआ है इसलिए यह साफ नहीं है कि राज्यों के बीच लदान, नगद भत्ते, केंद्रीय पूल से वितरण जैसे काम कौन करेगा।
भारत एक नए तरह की अधिकार आधारित कल्याण अर्थव्यवस्था बना रहा है। रोजगार का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, खाद्यान्न का अधिकार सब इसी दिशा में बढ़ाए गए कदम हैं। इसके बाद शायद स्वास्थ्य का अधिकार और सर पर छत का अधिकार जैसी चीजें भी आ सकती हैं। इससे राज्य का दयित्व काफी ज्यादा बढ़ जाएगा। अधिकार आधारित सोच सरकार के नैतिक दायित्व पर ही ज्यादा ध्यान देती है। लेकिन ऐसे में अगर किसी कानून में खामियां हों तो कईं तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं। एक सोच यह भी हो सकती है कि आदर्श कानून तो एक सपने की तरह है और योजना को लागू करने की जो समस्याएं हैं उन्हें उसे लागू करने के दौरान दूर किया जा सकता है। लेकिन जब तक इन खामियों को दूर नहीं किया जाता गरीबों को भूखा ही रहना पड़ेगा। इस बड़ी जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए योजना को लागू करने का तरीका और लागू करने वाली संस्थाओं का पुनर्गठन करना होगा। लेकिन किसी कानून को जल्दबाजी में लागू करना समस्याओं को बढ़ाना ही है। झूठे सपने दिखाकर आप चुनाव में तो फायदा उठा सकते हैं लेकिन दीर्घकाल में इससे नुकसान ही होना है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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