रविवार, 5 मई 2013

हल्दीघाटी युद्ध : त्याग, बलिदान और शौर्य




हल्दीघाटी : -18 जून 1576 को महाराणा प्रताप और अकबर के बीच हुए ऐतिहासिक युद्ध की गवाह है हल्दीघाटी !

या माटी हल्दीघाटी री लागे केसर और चन्दन हे ,
माथा पर तिलक करो इणरो इण धरती ने नित वंदन है !

विश्व इतिहास में बहुत कम ही ऐसे युद्धस्थल हैं जो हल्दी घाटी की तरह प्रसिद्ध हुए हों। यूं देखा जाए तो हल्दी घाटी का युद्ध न तो बहुत लम्बा चला और न ही कोई विशेष प्रलयंकारी था।
भारतीय इतिहास में इससे पूर्व हुए तराईन, खानवा और पानीपत के युद्ध ऐतिहासिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण एवं समय को मोड़ देने वाले थे।
किन्तु जहां तक शौर्य, पराक्रम और श्रद्धा का प्रश्न है, हल्दी घाटी का युद्ध इन सबसे आगे है।
प्रश्न उठता है कि आखिर इस युद्ध में ऐसी क्या बात थी जिसके कारण यह चार सौ अट्ठाईस वर्ष के पश्चात् भी हम सभी के लिए प्रेरणा का प्रतीक बना हुआ है।
इस युद्ध के दिवस ( इस वर्ष 18 जून) पर उन बिन्दुओं का अध्ययन करना समीचीन होगा जिनके फलस्वरूप हल्दी घाटी की माटी हम सभी के लिए चंदन बन गई।
हल्दी घाटी का युद्ध मात्र पांच घण्टे का था। मगर इस अल्प समय में महाराणा प्रताप के स्वातन्त्र्य प्रेम, झाला माना की स्वामी- भक्ति, ग्वालियर नरेश राम सिंह तंवर की अटूट मित्रता, हकीम खां सूरी का प्राणोत्सर्ग, वनवासी पूंजा का पराक्रम, भामाशाह का अनुपम न्योछावर भाव, शक्ति सिंह का विलक्षण भ्रातृ-प्रेम व प्रताप के घोड़े चेतक के पावन बलिदान से हल्दी घाटी की माटी का कण-कण आज भी भीगा हुआ लगता है और यहां आने वाले प्रत्येक जन को श्रद्धावश नमन करने को प्रेरित करता है।
हल्दी घाटी का युद्ध इतिहास में इसलिए भी स्वर्णाक्षरों में अंकित है क्योंकि यह युद्ध उस समय के विश्व के सर्वशक्तिमान शासक अकबर के विरुद्ध लड़ा गया एक सफल संग्राम था।
अकबर को हल्दी घाटी के इस युद्ध से पूर्व कल्पना भी नहीं थी कि एक छोटा-सा मेवाड़ राज्य और उसका शासक राणा प्रताप इतना भंयकर संघर्ष कर सकेगा।
इतिहास साक्षी है कि प्रताप ने न केवल जमकर संघर्ष किया बल्कि मुगल सेनाओं की दुर्गति कर इस तरह भागने को मजबूर किया कि अकबर ने फिर कभी मेवाड़ की ओर मुंह नहीं किया।
प्रताप की इस सफलता के पीछे उनके प्रति प्रजा का प्यार और सहयोग प्रमुख कारण था।

उल्लेखनीय है कि हल्दी घाटी के युद्ध में केवल राजपूत ही नहीं लड़े बल्कि वनवासी, ब्राह्मण, वैश्य आदि सभी ने स्वतंत्रता के इस समर में तलवारें उठाईं और बलिदान दिए। यह आश्चर्य ही है कि एक मुस्लिम शक्ति को ललकार देने के लिए इस समरांगण में प्रताप ने हरावल दस्ते में हकीम खां सूरी को आगे रखा। यही नहीं, बहुत कम लोगों को पता होगा कि प्रताप की सेना के एक भाग का नेतृत्व जहां वैश्य भामाशाह के हाथों में था तो पहाड़ियों पर मुगलों को रोकने के लिए मेवाड़ के वनवासी और उनके मुखिया पूंजा ने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया।
प्रताप का यह युद्ध एक शासक का दूसरे शासक के विरुद्ध नहीं बल्कि मुगल साम्राज्यवाद एवं मेवाड़ की जन-स्वातन्त्र्य भावना के बीच था
और इसमें मेवाड़ की स्वातन्त्र्य भावना की विजय हुई, जिसका उल्लेख युद्ध में उपस्थित लेखक अल-बदायूंनी ने भी अप्रत्यक्ष रुप में किया है।

हल्दी घाटी युद्ध में कई स्थलों पर ऐसी घटनाएं भी घटित हुईं जिन्हें देखकर लगता है कि यह मात्र युद्ध भूमि ही नहीं बल्कि श्रेष्ठ जीवन मूल्यों का संदेश देती वह पावन स्थली है जिसे बार-बार नमन किया जाना चाहिए।
कौन भूल सकता है उस प्रसंग को जब प्रताप मुगल सेनापति मानसिंह को निहत्था पाकर जीवन-दान देकर छोड़ देते हैं।
यही वह भूमि है जहां झाला माना अपने स्वामी की रक्षा करने के लिए उनका राजमुकुट स्वयं धारण कर बलिदान दे देता है।
इसी युद्धस्थली की माटी साक्षी है जब प्रताप के सेनापति हकीम खां सूरी अपनी अन्तिम सांसों में खुदा से मेवाड़ की विजय की दुआ करते हैं।
यही वह स्थल है जहां मनमुटाव के बावजूद शक्ति सिंह अपने भाई के प्राणों की रक्षा के लिए आगे आए।
स्मरण रहे कि अपने इस भ्रातृ-प्रेम के लिए शक्ति सिंह को अकबर की नाराजगी भी झेलनी पड़ी थी।
रक्त तलाई में खड़े स्मारकों में एक स्मारक है ग्वालियर नरेश राम सिंह तंवर का, जो आज भी हम सभी को मित्रता एवं कृतज्ञता का आदर्श सन्देश दे रहा है।
युद्धभूमि से कुछ ही दूर खड़ा प्रताप के प्रिय घोड़े चेतक का स्मारक हमें झकझोर देता है। एक मूक पशु भी किस तरह स्वामीभक्ति का पाठ दे सकता है, यह बात इसी माटी की जुबान से हमें सुनने को मिलती है।
हल्दी घाटी की इस पावन युद्धस्थली की न केवल हिन्दू लेखकों ने वरन् अनेक मुस्लिम इतिहासकारों ने भी जमकर प्रशंसा की है।
युद्ध-भूमि पर उपस्थित अकबर के दरबारी लेखक अल बदायूंनी के वृतांत में भी प्रताप और उनके साहसी साथियों के त्याग, बलिदान और शौर्य का बखान ही मिलता है।
अत: आज जब हम इस युद्ध का पावन स्मरण करने जा रहे हैं तो क्यों न इसकी माटी से उठी स्वातंत्र्य की भावना को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयत्न करें
ताकि हमारी स्वतंत्रता चिरस्थायी बन सके और फिर कभी इस पर पराधीनता की काली बदली न आ पाए।

हल्दी घाटी का युद्ध मात्र पांच घण्टे का था। मगर इस अल्प समय में महाराणा प्रताप के स्वातन्त्र्य प्रेम, झाला माना की स्वामी- भक्ति, ग्वालियर नरेश राम सिंह तंवर की अटूट मित्रता, हकीम खां सूरी का प्राणोत्सर्ग, वनवासी पूंजा का पराक्रम, भामाशाह का अनुपम न्योछावर भाव, शक्ति सिंह का विलक्षण भ्रातृ-प्रेम व प्रताप के घोड़े चेतक के पावन बलिदान से हल्दी घाटी की माटी का कण-कण आज भी भीगा हुआ लगता है और यहां आने वाले प्रत्येक जन को श्रद्धावश नमन करने को प्रेरित करता है।
इस युद्ध में हाकिम खां जैसे लडाका ने महाराणा प्रताप की सेना की कमान संभालते हुये अपने प्राणों को न्यौछावर करके सांप्रदायिक एकता की अनूठी मिसाल कायम की थी.
इसमें झाला मान सिंह, भीलू राणा., शमशाह तंवर और दानवीर भामाशाह सहित अनगिनत योद्धाओं ने मेवाड की आन बान और शान की खातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था.
इसी हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप के जग प्रसिद्ध घोडे चेतक ने स्वामि भक्ति का अनूठा अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए महाराणा की प्राण. रक्षा के लिए अपने प्राण दे दिये थे !

जय हो उन शूरवीरो और दानवीरों की !!
जय महाराणा !!
जय चेतक !!
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महाराणा प्रताप सिंह जी को उनके जन्मदिवस पर शत शत नमन ...!!


धन्य हुआ रे राजस्थान,जो जन्म लिया यहां प्रताप ने।धन्य हुआ रे सारा मेवाड़, जहां कदम रखे थे प्रताप ने॥फीका पड़ा था तेज़ सुरज का, जब माथा उन्चा तु करता था।फीकी हुई बिजली की चमक, जब-जब आंख खोली प्रताप ने॥जब-जब तेरी तलवार उठी, तो दुश्मन टोली डोल गयी।फीकी पड़ी दहाड़ शेर की, जब-जब तुने हुंकार भरी॥था साथी तेरा घोड़ा चेतक, जिस पर तु सवारी करता था।थी तुझमे कोई खास बात, कि अकबर तुझसे डरता था॥हर मां कि ये ख्वाहिश है, कि एक प्रताप वो भी पैदा करे।देख के उसकी शक्ती को, हर दुशमन उससे डरा करे॥करता हुं नमन मै प्रताप को,जो वीरता का प्रतीक है।तु लोह-पुरुष तु मातॄ-भक्त,तु अखण्डता का प्रतीक है॥हे प्रताप मुझे तु शक्ती दे,दुश्मन को मै भी हराऊंगा।मै हु तेरा एक अनुयायी,दुश्मन को मार भगाऊंगा॥है धर्म हर हिन्दुस्तानी का,कि तेरे जैसा बनने का।चलना है अब तो उसी मार्ग,जो मार्ग दिखाया प्रताप ने॥


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