रविवार, 5 मई 2013

नाथद्वारा : पुष्टि मार्ग के प्रवर्तक महाप्रभु वल्लभाचार्य


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पुष्टि मार्ग के प्रवर्तक महाप्रभु वल्लभाचार्य


- पं. बाबूलाल जोशी

॥जब तुलसी के मानस, मीरा की भक्ति, कबीर के पद व सूर के गीतों द्वारा भक्ति आंदोलन मुखर हो उठा था। तब महाप्रभु वल्लभाचार्य ने पुष्टि मार्ग को प्रशस्त किया। जानते हैं उनकी महिमा को।


चौरासी शिष्यगणों को किया मनोनीत

ऐसे विश्व विख्यात हुआ नाथद्वारा 

बाल मनोहारी सिद्धांतों में ब्रह्म, जीव, जगत, माया, आविर्भाव-तीरोर्भाव तथा ब्रह्म संबंधों की जानकारियां प्रदान कराने वाला वल्लभाचार्य अरावली की श्रेणियों के बीच उदयपुर राजस्थान से 50 किलोमीटर दूर विक्रम संवत् 1564 में श्रीनाथ मुख्य पीठ के रूप में स्थापित किया। श्री वल्लभाचार्य ने श्रीनाथ मंदिर की स्थापना से पहले संपूर्ण पृथ्वी की न केवल परिक्रमा की अपितु भारतभर में चौरासी बैठकों द्वारा चौरासी शिष्यगणों को मनोनीत किया। वर्षभर में सृष्टि आरंभ दिवस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत्सर उत्सव, गणगौर, वैशाख कृष्ण एकादशी, अक्षय तृतीया, नरसिंह जयंती, स्नान यात्रा, वृत यात्रा, श्रावण शुक्ल एकादशी, पवित्रा एकादशी, जन्माष्टमी, नंद महोत्सव, दशहरा, शरद पूर्णिमा, दीपमालिका, अन्नकूट, यम द्वितीया, गोपाष्टमी, प्रबोधिनी एकादशी, डोलोत्सव के अलावा हवेली संगीत, फागुन के रास-रंग उत्सव, दुनियाभर में ख्याति लिए हैं।

आचार्यश्री ने श्री गोवर्धननाथ की बाल सेवा की परिपाटी को महत्व दिया और श्रीनाथ के नाम से उसे प्रसिद्ध किया। उस समय देश में आक्रांताओं के उत्पाद चरम की ओर बढ़ रहे थे। ब्रज मंडल उत्तर प्रदेश न केवल घिर गया था, अपितु श्री विग्रह का मंदिर भी ध्वस्त कर दिया गया था। ऐसे में प्रभु वल्लभाचार्य ने श्री विग्रह को सुरक्षित स्थान पर ले जाना उपयुक्त समझा।
         विक्रम संवत् 1726 आश्विन पूर्णिमा की रात के पिछले प्रहर में श्री वल्लभाचार्य ने एकमात्र अपने आराधक श्रीनाथजी को लेकर रथ में सवार होकर ब्रज में प्रस्थान किया। वे लक्ष्य विहीन यात्रा पर चल पड़े। ब्रज से आगरा पहुंचे, वहां से ग्वालियर, कोटा, पुष्कर, कृष्णगढ़, पीतांबरजी, जोधपुर चौपासनी में मेवाड़ राज्य के सिंहाड़ पहुंचकर स्थाई रूप से उन्हें प्रतिष्ठित किया गया। उस समय मेवाड़ के महाराणा राजसिंह सर्वाधिक शक्तिशाली शासकों में थे। संवत् 1728 फाल्गुन कृष्ण सप्तमी शनिवार को सिंहाड़ में ही उनका पाटोत्सव किया गया। वह सिंघाड़ ग्राम नाथद्वारा के नाम से दुनियाभर में विख्यात हो गया।

भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में आचार्य वल्लभ का स्थान व योगदान कालजयी है। उन्होंने पुष्टिमार्ग का प्रवर्तन कर जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास किया। उन्होंने जिस कृष्ण भक्ति को प्रतिपादित किया, आज उसका प्रचार समूचे भारत में है। विशेषकर पूरे उत्तर भारत में उनके लाखों अनुयायी हैं। यही कारण है कि उन्हें श्रद्धा के साथ महाप्रभु वल्लभ भी कहा जाता है। वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उनका प्राकट्य दिवस मनाया जाता है। यह इस बार 5 मई को है।

पुष्टि पोषण को प्राथमिकता दी 
उस समय तुलसी के मानस, मीरा की भक्ति, कबीर के पद व सूर के गीतों द्वारा भक्ति आंदोलन मुखर हो उठा था। 'एक तुणीर में चारों तीर-तुलसी, मीरा, सूर, कबीर' की धारा अपनी-अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे थे। तब प्रभु वल्लभाचार्य ने पुष्टि मार्ग के सिद्धांत के तहत श्रीमद् भागवत के द्वितीय स्कंध के दशम अध्याय के चौथे श्लोक में पुष्टि पोषण को प्राथमिकता दी। 'पोषण तद्नुग्रह' भगवान के अनुग्रह से जीव का पोषण बनाया गया है। उसमें पूजा-कर्मकांड का स्थान नहीं होकर मात्र सेवा ही सर्वोपरि स्वीकार की गई है। इससे ग्रहों की दुषितता ग्रहों के बुरे असर स्वयमेव समाप्त हो जाते हैं। भक्ति रस के सामने ग्रहों की विपरीत रश्मियां भी नतमस्तक हो जाती हैं और जातक का कुछ नहीं बिगाड़ पाती। क्योंकि यह भी एक ऐसी आलौकिक साधना है, जिसके बल पर व्यक्ति विपरीत स्थिति में भी सूर्य द्वारा आत्म बल व चंद्रमा द्वारा शांत मनोहारी धैर्यवान बन जाता है। मंगल द्वारा बलशाली, बुद्ध से ज्ञानवान, बृहस्पति से दर्शन योग, शुक्रद्वारा रास, रंग एवं शनि द्वारा सेवा भाव की ओर तत्पर हो उठता है।

भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में आचार्य वल्लभ का स्थान व योगदान कालजयी है। उन्होंने पुष्टिमार्ग का प्रवर्तन कर जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास किया। उन्होंने जिस कृष्ण भक्ति को प्रतिपादित किया, आज उसका प्रचार समूचे भारत में है। विशेषकर पूरे उत्तर भारत में उनके लाखों अनुयायी हैं। यही कारण है कि उन्हें श्रद्धा के साथ महाप्रभु वल्लभ भी कहा जाता है। वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उनका प्राकट्य दिवस मनाया जाता है। यह इस बार 5 मई 2 0 1 3  को है।

भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक रहे 
भक्ति परंपरा में आचार्य वल्लभ के किए कार्यों को समझने से पहले तत्कालीन परिदृश्य को जानना जरूरी है। 12वीं-13वीं शताब्दी ई. में दक्षिण भारत में भक्ति की लहर शुरू हो चुकी थी। इसके 200 वर्ष बाद श्रीमद् वल्लभ, रामानंद और चैतन्य महाप्रभु के नेतृत्व में एक प्रबल भक्ति, संकीर्तनों की धारा उत्तर भारत में भी फैल गई। इन तीनों में आचार्य श्री वल्लभ भक्ति आंदोलन और भारतीय दर्शन के भी महास्तंभ रहे। श्री वल्लभ दक्षिण के एक ब्राह्मण कुल से थे। उनके पिता लक्ष्मणभट्ट पत्नी इलम्मा गुरु के साथ काशी में आ बसे थे। मगर, वहां आक्रांताओं के चलते उन्हें निर्वासित जीवन जीना पड़ा। उस समय चंपारण्य नामक घने वन में वरुथिनी एकादशी वैशाख कृष्ण एकादशी विक्रम संवत् 1535 में ई. सन् 1473 में श्रीवल्लभ का जन्म हुआ। माता-पिता श्री वल्लभ को लेकर वापस बनारस आ गए। श्री वल्लभ को पं. नारायण भट्ट व माधवेंद्रपुरी के सान्निध्य में शिक्षा-दीक्षा दी गई। वह ११ वर्ष की आयु तक वेद शास्त्रों में पारंगत हो गए थे। वेश्वानर अवतार (अग्नि का अवतार भी) कहा जाता है।

बाल लीला में समर्पित भक्ति 
भक्तिकालीन सगुण धारा की श्रीकृष्ण भक्ति शाखा के आधार स्तंभ वल्लभाचार्य को तात्कालीन श्री रूद्र संप्रदाय के बिल्व मंगल आचार्यजी द्वारा दशाक्षर गोपाल मंत्र की दीक्षा दी गई। उन्हें त्रिदंड संन्यास की दीक्षा स्वामी नारायणेंद्र तीर्थ ने दी। उनका विवाह पं. देवभट्ट की पुत्री महालक्ष्मी से हुआ। श्रीमद् वल्लभाचार्य ने अपने आराध्य श्रीकृष्ण को बालस्वरूप की छवि में (आत्मा, लक्ष्मी, कीर्ति, संपन्नता, समृद्धता) भक्ति समर्पण के अंतर्गत आठों प्रहर सेवा विधान आरंभ किया। विष्णु के अवतारी श्रीकृष्ण की अनेक लीलाओं में बाल लीला उनके शिशु अवस्था के लालन-पालन में प्रात: जगाने से लेकर सुलाने तक के दिनचर्या स्थापित करते हुए जनसामान्य को ऐसा मोड़ दिया कि परम तत्व दर्शन की एकात्मता लिए यह भाव मां और उसके पुत्र के वात्सल्य प्रेम दूसरा कोई नहीं दिखाई देता । वह संसार के प्रपंच और मायाजाल  से विमुख रह कर अपने शिशु के लालन पालन और देख रेख में ही अपने आप को न्योछावर और धन्य अनुभव करती हैं । ठीक उसी भांति भक्त भी उस छवि के प्रति परम तत्व दर्शन की एकात्मता में  कृत कृत्य अनुभव करता है ।

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