बुधवार, 31 जुलाई 2013

करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है.



मेरा आपकी कृपा से
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है.
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है.
करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है.
करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है.
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है.
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है.
पतवार के बिना ही, मेरी नाव चल रही है.
पतवार के बिना ही, मेरी नाओ चल रही है.
हैरान है जमाना, मंजिल भी मिल गयी है.
हैरान है जमाना, मंजिल भी मिल गयी है.
करता नहीं मैं कुछ भी,सब काम हो रहा है.
करता नहीं मैं कुछ भी, सब काम हो रहा है.
करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है.
करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है.
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो राहा है.
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है.
तुम साथ हो जो मेरे, किस चीज की कमी है.
तुम साथ हो जो मेरे, किस चीज की कमी है.
किसी और चीज की अब, दरकार ही नहीं है.
तेरे साथ से गुलाम अब, गुलफाम हो रहा है.
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है.
मेरा आपकी दया से, सब काम हो रहा है.
मैं तो नही हूँ काबिल तेरा प्यार कैसे पाऊं.
टूटी हुई वाणी से गुणगान कैसे गाऊं.
मैं तो नही हूँ काबिल तेरा प्यार कैसे पाऊं
टूटी हुई वाणी से गुणगान कैसे गाऊं
तेरी प्रेरणा से ही सब ये तमाम हो रहा है.
मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है….
तूफ़ान आँधियों से तुमने दिया सहारा
तुम कृष्ण बनके आये मैं जब बना मैं सुदामा
तूफ़ान आँधियों से तुमने दिया सहारा
तुम कृष्ण बनके आये मैं जब बना मैं सुदामा
तेरा कर्म ये मुझी पे सरेआम हो रहा है.
मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है.
मुझे हर कदम ड़गर पर तुमने दिया सहारा
मेरी जिन्दगी बदल दी तूने करके एक ईशारा
मुझे हर कदम ड़गर पर तुमने दिया सहारा
मेरी जिन्दगी बदल दी तूने करके एक ईशारा
एहसान है तेरा ये, एहसान हो रहा है.
मेरा आपकी कृपा से सब काम हो रहा है….

सोमवार, 29 जुलाई 2013

सस्पेंड अखिलेश यादव होना चाहिए :असली साम्प्रदायिक अखिलेश

सत्ता-माफिया गठजोड़ के खिलाफ मोर्चा मुश्किल

 सस्पेंड अखिलेश यादव होना चाहिए
असली साम्प्रदायिक अखिलेश
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आई ए एस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल  को गलत सस्पेंड किया है, उन्होने अपनी शक्तियों का अपाराधिक दुरउपयोग किया है। असल में साम्प्रदायिकता तो मुख्यमंत्री ने की है। जो कि मूल साम्प्रदायिकता अवैध निर्माण कर्ता पर कार्यवाही के बजाये कानून की रक्षा करने वाले को सस्पेंड किया । 
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क्या धर्म की राजनीति कर रहे हैं अखिलेश यादव?
एबीपी न्यूज़ ब्यूरो
Thursday, 01 August 2013
नोएडा / लखनऊ: यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि दुर्गा शक्ति नागपाल का निलंबन सही फैसला है. अखिलेश के मुताबिक लोकल इंटेलीजेंस यूनिट की रिपोर्ट पर कार्रवाई हुई.
अखिलेश ने डीएम की उस रिपोर्ट पर कुछ नहीं कहा जिसमें कहा गया है कि मस्जिद की दीवार गांव वालों ने गिराई. केंद्र सरकार ने निलंबन पर रिपोर्ट मांगी है. बड़ा सवाल ये है कि क्या अखिलेश अफसर के तलाबदले को धर्म का रंग देकर राजनीति कर रहे हैं?
दुर्गा नागपाल के निलंबन को लेकर भले ही लखनऊ से लेकर दिल्ली तक बवाल मचा है, लेकिन यूपी की सरकार को लगता है कि दुर्गा को हटाकर कोई गलती नहीं हुई है. अखिलेश यादव ने आईएएस दुर्गा को हटाने की कार्रवाई जिस रिपोर्ट पर की है वो रिपोर्ट एलआईयू यानी लोकल इंटेलीजेंस यूनिट ने दी थी. इस यूनिट के मुखिया इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी होते हैं जो जिले के एसएसपी को अपनी रिपोर्ट देते हैं, जबकि जिले के मुखिया यानी कलेक्टर की रिपोर्ट दुर्गा को क्लीन चिट दे रही है.
डीएम की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रेटर नोएडा के कादलपुर गांव में मस्जिद की दीवार दुर्गा नागपाल ने नहीं गिरवाई. डीएम के मुताबिक अवैध निर्माण को लेकर दुर्गा ने गांववालों से बातचीत कर विवाद को सुलझा लिया था, जिसके बाद दीवार गांव के लोगों ने ही गिराई थी. इस काम में न तो जेसीबी का और ना ही किसी बड़ी मशीन का इस्तेमाल हुआ.
विवाद के दिल्ली तक पहुंचने के बाद अब केंद्र सरकार भी हरकत में आई है. केंद्र  यूपी सरकार से रिपोर्ट मांगी है. यूपी सरकार भले ही धार्मिक स्थल की दीवार को मुद्दा बताकर निलंबन को सही बता रही है लेकिन विपक्षी पार्टियों का साफ कहना है कि खनन माफिया को बचाने के लिए ईमानदार आईएस को सस्पेंड किया गया है.
आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता तो ग्रेटर नोएडा में धरने पर बैठे हुए हैं. आईएएस एसोसिएशन ने कोर्ट जाने तक की धमकी दी है. एक आईएएस के पक्ष में ऐसी गोलबंदी इसलिए दिख रही है क्योंकि 2009 बैच की आईएएस 28 साल की दुर्गा की गिनती ईमानदार अफसरों में होती है.
ये बात किसी से छिपी नहीं है कि नोएडा में दुर्गा के खौफ से खनन माफिया खार खाये हुए थे. इसलिए ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या रेत माफिया को बचाने के लिए ही निलंबन को धार्मिक रंग दिया जा रहा है ?
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Bjp Itcell Tonk
नई दिल्ली. दुर्गा शक्ति नागपाल। 2009 बैच की पंजाब कैडर की आईएएस अफसर। पिछले साल अगस्त में पंजाब से उत्तर प्रदेश कैडर में तबादले के बाद पिछले दिनों वे गौतम बुद्ध नगर में एसडीएम के पद पर तैनात थीं। लेकिन दुर्गा को उत्तर प्रदेश सरकार ने बिना कसूर ही सस्पेंड कर उनकी 'शक्ति' छीन ली। इस मामले में चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ है कि दुर्गा शक्ति नागपाल ने रबूपुरा थाने के तहत आने वाले एक गांव में धार्मिक स्थल की दीवार गिराने का आदेश दिया ही नहीं था। दरअसल, गौतम बुद्ध नगर के डीएम कुमार रविकांत ने शासन को भेजी रिपोर्ट में कहा है कि दुर्गा शक्ति ने गांव में जाकर लोगों को अवैध निर्माण न करने को लेकर समझाया था। इसके बाद गांव वालों ने खुद ही दीवार को गिरा दिया था। जबकि इस मामले में विवाद बढ़ने के बाद अखिलेश यादव की सरकार ने सफाई दी थी कि दुर्गा को एक धार्मिक स्थल की दीवार गिरवाने की वजह से गौतम बुद्ध नगर के एसडीएम (सदर) की कुर्सी से हटा दिया था। इस खुलासे के बाद समाजवादी सरकार की पोल खुल गई है।
दुर्गा का निलंबन खत्म करने को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार किसी तरह की हड़बड़ी नहीं दिखाना चाहती है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कर्नाटक की दो दिनी यात्रा के बाद मंगलवार को लखनऊ लौट आए। उन्होंने उच्च अधिकारियों से निलंबन प्रकरण से उपजी स्थिति पर पूरी जानकारी ली। इस बीच दुर्गा शक्ति नागपाल को राजस्व परिषद (रेवेन्यू बोर्ड) से अटैच (संबंद्ध) कर दिया गया है।
मंगलवार की दोपहर तीन बजे के करीब दुर्गा शक्ति नागपाल राजस्व परिषद पहुंची। उन्होंने राजस्व परिषद के अध्यक्ष जगन मैथ्यूज व सचिव अनिल कुमार से मुलाकात कर संबद्धता के सम्बंध में रिपोर्ट किया। नागपाल लगभग 10 मिनट राजस्व परिषद में रहीं और फिर चली गईं। उनके बैठने के लिए एक कमरा भी तैयार कर दिया गया है।
इस बीच, आईएएस एसोसिएशन ने इस मामले में केंद्र सरकार से दखल देने की अपील की है। कहा जा रहा है कि दुर्गा को निलंबित किए जाने की असली वजह उनकी ईमानदार कार्यशैली है। दुर्गा जिले के खनन माफियाओं पर कहर बनकर टूट रही थीं। उनके आदेश पर दो दर्जन से ज्यादा खनन माफियाओं पर मुकदमे दर्ज किए गए और लाखों रुपये का जुर्माना वसूला गया। बस, काम करने का यही अंदाज माफियाओं को खल गया और पूरी खनन माफिया लॉबी उन्हें चूना लगाने वाली अफसर के खिलाफ लग गई। कहा जा रहा है कि अंत में माफिया दुर्गा शक्ति को सस्पेंड कराने में कामयाब हो गए।
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http://navbharattimes.indiatimes.com
 मस्जिद {अवैध }बनाने से रोका इसलिए IAS दुर्गा शक्ति सस्पेंड: अखिलेश यादव
लखनऊ।। आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल की पहली पोस्टिंग ग्रेटर नोएडा में हुई। वह सब-डिविजनल मैजिस्ट्रेट (एसडीएम) बनकर आई थीं। इनकी पोस्टिंग के मुश्किल से 6 महीने हुए थे कि अखिलेश यादव सरकार ने उन्हें सस्पेंड कर दिया। शनिवार को नागपाल ने ग्रेटर नोएडा में अवैध रूप से सरकारी जमीन पर बनाई जा रही मस्जिद की दीवार को तोड़ने का आदेश दिया था। उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार का कहना है कि नागपाल ने रमजान के पवित्र महीने में समस्या खड़ा करने वाला फरमान जारी किया था। अखिलेश यादव ने कहा कि सांप्रदायिक तनाव से बचने के लिए हमें यह फैसला लेना पड़ा। मुख्यमंत्री के इस फैसले पर यूपी आईएएस असोसिएशन ने नाराजगी जताई है।
यूपी आईएएस असोसिएशन के सचिव पार्थसारथी सेन शर्मा के साथ दुर्गा नागपाल ने यूपी के ऐक्टिंग मुख्य सचिव आलोक रंजन से मुलाकात की। असोसिएशन ने आलोक रंजन से निलंबन वापस लेने की मांग की है। इस बीच यूपी सरकार ने इस निलंबन पर सफाई दी है कि दुर्गा सांप्रदायिक सौहार्द्र कायम रखने में नाकाम रही हैं।
अखिलेश यादव सरकार के इस तर्क को लोग बहाने के रूप में देख रहे हैं। लोगों का मानना है कि दुर्गा शक्ति नागपाल जिस तरीके से काम कर रही थीं, उसका नतीजा अखिलेश सरकार में यही होना था। नागपाल रेत खनन माफियाओं पर लगातार शिकंजा कसती जा रही थीं। ऐसे में अखिलेश सरकार पर खनन माफियाओं का भारी दबाव था कि नागपाल को हटाया जाए।
नागपाल 2009 बैच की आईएएस ऑफिसर हैं। कुछ हफ्तों से ग्रेटर नोएडा में अवैध खनन पर लगाम कसने के लिए नागपाल युद्धस्तर पर काम कर रही थीं। उन्होंने यमुना नदी से रेत से भरी 300 ट्रॉलियों को अपने कब्जे में किया था। नागपाल ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यमुना और हिंडन नदियों में खनन माफियाओं पर नजर रखने के लिए विशेष उड़न दस्तों का गठन किया था। नागपाल ने सस्पेंड होने से पहले ही कहा कि था इन माफियाओं पर कार्रवाई की वजह से धमकियां मिलती हैं।
नागपाल पर सरकार के फैसले के बाद विपक्ष हमलावर तेवर में आ गया है। विपक्ष ने एक सुर में कहा कि अखिलेश सरकार को माफिया चला रहे हैं, इसलिए ईमानदार आईएएस को सजा दी गई। बीजेपी से सीनियर नेता कलराज मिश्रा ने कहा कि अब यह साबित हो गया है कि सरकार उन ऑफिसरों को बर्दाश्त नहीं करेगी जो माफियाओं के खिलाफ हैं। आखिर दुर्गा शक्ति नागपाल की गलती क्या थी कि उन्हें सस्पेंड कर दिया गया? पहले से ही उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को लेकर चिंता कायम है। वहीं अखिलेश सरकार के इस फैसले की चौतरफा आलोचना हो रही है।
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सत्ता-माफिया गठजोड़ के खिलाफ मोर्चा मुश्किल
बिजनेस भास्कर | Aug 02, 2013
विरोध जारी - सत्ता और माफिया के गठजोड़ के खिलाफ खैरनार से खेमका जैसे अफसरों के अभियान की एक लंबी परंपरा रही है। इस कड़ी में हालिया नाम दुर्गा शक्ति नागपाल का जुड़ा है। लेकिन सरकारें ऐसी ताकतों को दबाने में जी-जान से जुट जाती हैं।
एसोसिएशन की मांग - आईएएस एसोसिएशन दुर्गा शक्ति के निलंबन का खात्मा चाहता है। साथ ही एसोसिएशन की मांग यह है कि बदली परिस्थितियों में अफसरों के निलंबन के नियम-कायदों में संशोधन भी किया जाना जरूरी हो गया है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने साफ कह दिया है कि वह एसडीएम दुर्गा शक्ति नागपाल का निलंबन वापस नहीं लेगी। यूपी सरकार का कहना है कि दुर्गा को एक धार्मिक स्थल की दीवार ध्वस्त करने के आरोप में निलंबित किया गया है। लेकिन माना जा रहा है कि उन्हें रेत माफिया के खिलाफ कदम उठाने का खमियाजा भुगतना पड़ा है।
इससे एक बार फिर राजनीति बनाम नौकशाही का बहस तेज हुई है। सिविल सर्विस या ऐसी ही उच्च स्तर की प्रतियोगिताओं के बाद कार्यक्षेत्र में आने वाले अधिकारियों को जब सत्ता और उसके नापाक गठजोड़ों का पता चलता है तो वे इसे तोडऩे का उत्साह दिखाते हैं।
नए अधिकारियंों में यह आदर्शवाद ज्यादा होता है। हालांकि कई पुराने अफसरों ने भी भ्रष्टाचार और माफिया को खत्म करने और अपराधियों और राजनीतिक नेताओं की सांठगांठ को खत्म करने के कदम उठाए हैं। लेकिन दुर्गाशक्ति की तरह ही उन्हें भी सत्ता के गुस्से का शिकार होना पड़ा है।
हर पार्टी की सरकार बदनाम
दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन के खिलाफ आम लोगों में गुस्सा है और उन्हें समर्थन मिल रहा है। विरोधी पार्टियां यूपी में सरकार चला रही सरकार और मुख्यमंत्री को घेरने में लगी है।
मुख्य विरोधी दल बीएसपी ने दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन की वापसी की मांग की है। हालांकि बीएसपी के शासनकाल में भी ईमानदार अफ सरों को टिकने नहीं दिया गया था। मायावती के शासनकाल में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी प्रोमिला शंकर को सिर्फ इसलिए निलंबित कर दिया था कि उन्होंने यमुना एक्सप्रेस-वे अथॉरिटी के मास्टर प्लान पर एतराज जताते हुए उसे मंजूर करने से इनकार कर दिया था।
हालांकि उन्हें भी बहाने से निलंबित किया गया था लेकिन उस समय आईएएस एसोसिएशन इसका विरोध करने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाई थी। दुर्गा शक्ति के मामले में केंद्र भी दिलचस्पी ले रहा है और उसने कहा है कि वह उसके निलंबन के मामले पर नजदीकी निगाह बनाए हुए है।
कई अफसरों के हैं उदाहरण
बहरहाल, सरकार से किसी ईमानदार अफसर का टकराने का यह पहला मामला नहीं है। हाल में हरियाणा काडर के चर्चित आईएएस अधिकारी अशोक खेमका का हुड्डा सरकार से टकराव हो चुका है। खेमका ने निबंधन महानिरीक्षक के तौर पर मनेश-शिकोहपुर स्थि 3.53 एकड़ के प्लॉट का दाखिल-ख्रारिज रद्द कर दिया था।
इसे रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी स्काई लाइट हॉस्पेटिलिटी प्राइवेट लिमिटेड ने 58 करोड़ रुपये में रियल एस्टेट की दिग्गज कंपनी डीएलएफ को भेजा था। इस जमीन का सौदा रद्द होने की वजह से खेमका का तबादला कर दिया गया था। इस साल सराहनीय सेवा के लिए राष्ट्रपति मेडल से नवाजे गए गोवा के पुलिस अधिकारी आत्माराम देशपांडे का नवंबर, 2011 में मिजोरम तबादला कर दिया गया।

लेकिन देशपांडे निजी समस्याओं का हवाला देते हुए राज्य सरकार से यह आग्रह किया कि उन्हें एक साल तक राज्य में रखा जाए। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसे नामंजूर कर दिया। बाद में गृह मंत्रालय की ओर से उन्हें नोटिस जारी कर कहा गया कि उन्होंने आदेश का पालन क्यों नहीं किया और इसके लिए उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए।
पिछले महीने भारतीय आर्थिक सेवा की 1981 बैच की अधिकारी रुग्मिणी परमार ने आत्महत्या करने की कोशिश की। उन्हें संयुक्त सचिव स्तर की एक महिला अधिकारी ने प्रताडि़त किया था। परमार ने बिहार के एक गैर सरकारी संगठन सेवा संकल्प एवं विकास समिति को अनुदान जारी करने के लिए परमार की खिंचाई की थी।
खैरनार से खेमका तक
बहरहाल, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार से मुकाबला करने वाले अफसरों की एक लंबी परंपरा रही है। इसमें मुंबई नगरपालिका के डिप्टी कमिश्नर जी.आर. खैरनार, किरण बेदी , सीबीआई की पूर्व चीफ जोगिंदर सिंह से लेकर अशोक खेमका और अब दुर्गा शक्ति नागपाल शामिल हो चुकी हैं।
इनके अलावा राजस्थान के विकास कुमार हरियाणा के संजीव चतुर्वेदी, राजस्थान की मुग्धा सिन्हा, पश्चिम बंगाल में दमयंती सेन, राजस्थान के समित शर्मा और तमिलनाडु में उमाशंकर जैसे अफसर माफिया और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं और एक्शन भी ले चुके हैं ।
राजस्थान में आईपीएस अफसर विकास कुमार ने पिछले साल भरतपुर में अवैध खनन माफिया का भंडाफोड़ किया था। पुलिस जांच होने वाली थी लेकिन उनका ट्रांसफर कर दिया गया। इस तरह 2002 के हरियाणा कैडर के भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने सात साल की सर्विस के दौरान कई घोटालों को उजागर किया। इसके बदले उनके खिलाफ ही पांच आपराधिक मामले दर्ज कराए गए।
उन्होंने सितंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर उजागर किए गए घोटोलों की सीबीआई जांच की मांग की थी। सितंबर, 2010 में झुंझनूत की पहली महिला कलक्टर का स्थानीय माफिया से टक्कर लेने के कारण तबादला करा दिया गया। कोलकाता पुलिस की क्राइमर बांच की पहली महिला चीफ ने पार्क स्ट्रीट गैंग रेप केस की जांच की।
उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के दावे को गलत साबित किया। दो महीने के बाद उनका ट्रांसफर कर दिया गया। 1990 बैच के आईएएस अधिकारी उमाशंकर ने ज्वाइंट विजिलेंस कमिश्नर रहते हुए मारन बंधुओं के खिलाफ कार्रवाई की। इसके चलते इन्हें निलंबित कर दिया गया था।


राज्यसभा : यहां सब करोड़पति हैं, जीतने वाले भी और हारने वाले भी



यहां सब करोड़पति हैं, जीतने वाले भी और हारने वाले भी
शमशेर सिंह/ [Edited By: संदीप कुमार सिन्हा] | नई दिल्ली, 29 जुलाई 2013
http://aajtak.intoday.in/story
कांग्रेस के पूर्व महासचिव और राज्यसभा सांसद चौधरी बीरेंद्र सिंह ने खुलासा किया है कि 100 करोड़ में राज्यसभा की सीट बिकती है.  ऐसे में सभी की भौहें तन गईं कि क्या वाकई में संसद पहुंचने के लिए करोड़ों का चढ़ावा चढ़ता है. बवाल खड़ा हुआ तो बीरेंद्र सिंह अपने बयान से पलट गए. नया बयान दे डाला कि सिर्फ करोड़पतियों को राज्यसभा नहीं जाना चाहिए.
सवाल यह उठता है कि राज्यसभा ही क्यों, लोकसभा या विधानसभा में जो हुक्मरान बैठते हैं, क्या उन पर मां लक्ष्मी की कृपा नहीं है?  जवाब हैं हां. यह हम नहीं, आंकड़ें बयान कर रहे हैं. ऐसे आंकड़ें जो बताते हैं कि चाहे कोई सांसद बने या फिर ना बने, चाहे कोई विधायक बने या फिर ना बने. सियासत के अखाड़े में जो भी कूदा, औसतन हर पहलवान करोड़पति तो है ही.
2004 से लेकर अब तक जितने भी नेताओं ने विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में अपनी किस्मत अजमाई है, करीबन सभी पर मां लक्ष्मी की अपार कृपा है.
हमारे नेताओं की संपत्ति का औसतन ब्यौरा
1. चुनाव में खड़े होने वाले सभी उम्मीदवारों की औसतन संपत्ति- 1.37 करोड़
2. सांसदों और विधायकों की औसतन संपत्ति-3.83 करोड़
3. दागी सांसदों और विधायकों की औसत संपत्ति-4.30 करोड़
4. गंभीर मामलों में फंसे सांसदों और विधायकों की औसत संपत्ति-4.38 करोड़
5. चुनाव में किस्मत आजमाने वाले सबसे अमीर पार्टी (अकाली दल-6.02 करोड़, टीडीपी-5.61 करोड़, जेडीएस-4.72 करोड़, कांग्रेस-4.32 करोड़ और बीजेपी-1.79 करोड़)
6. सबसे अमीर सांसदों और विधायकों की पार्टी (टीडीपी-8.72 करोड़, जेडीएस-7.72 करोड़, अकाली दल-6.27 करोड़, निर्दलीय-7.23 करोड़, कांग्रेस-5.81 करोड़ और बीजेपी 2.88 करोड़)

कई करोड़ों में है राजनीतिक पार्टियों की कमाई
गौरतलब है कि देश के राजनीतिक दलों ने 2004 के बाद से चंदा और अन्य स्रोतों से 4,662 करोड़ रुपये की कमाई की है. सितंबर 2012 में दो एनजीओ ने दावा किया कि 2,008 करोड़ रुपये की कमाई के साथ सत्तारूढ कांगेस सूची में शीर्ष पर है, जबकि मुख्य विपक्षी दल बीजेपी 994 करोड़ रुपये की कमाई के साथ दूसरे पायदान पर है.
आयकर रिटर्न और 2004 -2011 के दौरान चुनाव आयोग को दानकर्ताओं की दी गई सूची के आधार पर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच ने 23 बड़ी पार्टियों के आय की रिपोर्ट जारी की था.
आश्चर्यजनक तौर पर, माकपा की कमाई 2004-2011 के बीच 417 करोड़ रुपये रही जिनमें ज्यादातर योगदान 20,000 रुपये से कम का योगदान देने वाले व्यक्तियों का रहा.
माकपा, बीएसपी की 484 करोड़ रुपये की कमाई के थोड़ा ही पीछे रही जबकि अन्य बड़े वाम दल भाकपा ने केवल 6.7 करोड़ रुपये कमाए. एनजीओ के मुताबिक समाजवादी  पार्टी ने 278 करोड़ रुपये की कमाई की.

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

सफेद झूठ से भी बड़ा झूठ : गरीबी के आंकड़ों



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गरीबी सिर्फ गरीबी नहीं है

बेशक, गरीबी एक गंभीर मामला है। गंभीर मामलों की दिक्कत यह होती है कि इन्हें लेकर या तो हम बहुत भावुक और जज्बाती हो जाते हैं, या शास्त्रीय किस्म के तर्कवादी बन जाते हैं, या फिर किसी इस या उस विचार के चलते समस्या से ही आंख मूंदने लगते हैं। गरीबी की दूसरी दिक्कत यह है कि इसके आकलन का सारा जिम्मा अर्थशास्त्रियों के हवाले होता है, उन्हें इसका आकलन अपने विषय की सीमा में उपलब्ध पैमानों से ही करना होता है। अर्थिक गणित के समीकरण गरीबी को आंकड़ों में बदल देते हैं और फिर आंकड़ों की तो फितरत ही अलग होती है। पहली समस्या यह आती है कि आंकड़ें चाहे जैसे भी हों, उनका आकार प्रकार चाहे कैसा भी हो वे अक्सर हमारी भावुकता और विचारधारा से मेल नहीं खाते। इसके अलावा खुद सांख्यिकीय के विद्वान ही यह कहते हैं कि अगर आपको सफेद झूठ से भी बड़ा झूठ बोलना है तो आंकड़ों का सहारा लीजिए।

आंकड़ों के प्रस्तुतिकरण और उनकी व्याख्या से कईं तरह के खेल कर लेने की परंपरा भी पुरानी है। गरीबी के कम होने या न होने के आंकड़ों पर इन दिनों जो बहस चल रही है, वह कुछ इसी तरह का खेल भी है। वैसे आंकड़ों से अलग अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री एक बात पर सहमत दिखते हैं कि गरीब होने का अर्थ होता है वंचित होना। वे मानते हैं कि गरीबी सापेक्ष होती है। कहीं पर वह गरीब होता है जिसे पर्याप्त भोजन नहीं मिलता और कहीं पर वह गरीब होता है जिसके पास रहने को ठीक ठाक जगह नहीं होती। दूसरे शब्दों में गरीबी गैरबराबरी वाले समाज में सबसे निचली पायदान पर रहने वालों की आर्थिक स्थिति होती है। लेकिन किसी कल्याकारी राज्य में जब हम आर्थिक नीतियों से गरीबों के लिए कुछ करने की सोचते हैं तो हमें आंकड़े ही चाहिए होते हैं। कितने लोग? कितने गरीब? कितनों को कितनी मदद दी जाए? वगैरह। इसी कोशिश में बनती है गरीबी की रेखा। यानी वह न्यूनतम आर्थिक स्थिति जिसके नीचे रहने वालों को तुरंत मदद की जरूरत है। इसका यह अर्थ कतई नहीं होता कि इसे रेखा के ऊपर रहने वाले अमीर हैं। गरीब तो वे भी हैं, लेकिन यह मान लिया जाता है कि उन्हें मदद की तत्काल उतनी जरूरत नहीं जितनी कि उससे निचली पायदान वालों को है।

इस गरीबी की रेखा को किस तरह तय किया जाए इसे लेकर अर्थशास्त्रियों में हमेशा मतभेद रहे हैं। पहले गरीबी को इससे नापा जाता था कि व्यक्ति को एक दिन में कितने कैलोरी भोजन मिलता है। लेकिन इसके खिलाफ तर्क यह था कि भोजन और कैलोरी को भुखमरी का पैमाना तो बनाया जा सकता है लेकिन आर्थिक गरीबी का पैमाना नहीं हो सकता। गरीब को भोजन ही नहीं दवा जैसी जरूरी चीजों पर भी पैसे खर्च करने होते हैं। इसी सोच के साथ यह तय किया गया कि कोई व्यक्ति एक दिन में कितना खर्च करता है इससे उसकी गरीबी नापी जाए। निसंदेह इस पैमाने में हेर फेर की पूरी गुंजाइश है। आप गरीबी के लिए तय दैनिक खर्च में दो चार रुपये घटा बढ़ाकर गरीबों की संख्या भी घटा बढ़ा सकते हैं। गरीबों की संख्या कम होने का ताजा विवाद भी इसी से जुड़ा है।

इस पैमाने की दिक्कत यह भी है कि मंहगाई जितनी तेजी से हर रोज बढ़ती है, उतनी तेजी से हम अपना खर्च सीमा वाला पैमाना नहीं बदल पाते। लेकिन सच तो यह है कि गरीबी के उन्मूलन में गरीबों की संख्या का सही आकलन बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि उसके लिए क्या नीतियां अपनाई जा रही हैं। गरीबी के आंकड़ों को लेकर जितने मतभेद हैं, गरीबी उन्मूलन की नीतियों को लेकर उससे कईं गुना ज्यादा मतभेद हैं। सबसे बड़ा मतभेद वह है जो इन दिनों प्रोफेसर अमृत्य सेन और प्रोफेसर जगदीश भगवती की बहस के रूप में हमारे सामने है। अमृत्य सेन का मानना है कि गरीबी से लड़ने का सबसे अच्छा हथियार सरकार की कल्याणकारी नीतियां ही हो सकती हैं। यानी वैसी ही नीतियां जो इन दिनों रोजगार गारंटी और भोजन के अधिकार के रूप में चलाई जा रही हैं।

कल्याकारी नीतियों के कुछ समर्थक मानते हैं कि सीधे रोजगार और भोजन देने से ज्यादा जरूरी है कि सरकार उनमें क्षमता और दक्षता पैदा करे। शिक्षा का अधिकार इसी सोच का परिणाम है। दूसरी तरफ प्रोफेसर जगदीश भगवती और अरविंद पणिग्रियह जैसे अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सबसे ज्यादा जरूरी है तेज आर्थिक विकास। उनकी राय है कि विकास बढ़ेगा तो रोजगार के अवसर और आर्थिक खुशहाली धीरे धीरे सब तक पहुंचेगी। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे ट्रिकल डाउन इफेक्ट कहते हैं। एक तीसरी सोच यह है कि तेज विकास और कल्याकारी नीतियां, दोनों ही चीजें एक साथ जरूरी हैं। अगर तेजी विकास होगा तो सरकार के पास कल्याणकारी नीतियों में लगाने के लिए ज्यादा संसाधन होंगे। मोटे तौर पर पिछले दो दशक से देश एक साथ इन दोनों को ही अपनाने की ओर बढ़ रहा है।

हालांकि वास्तविक हालात में गरीबी को सचमुच कम करना इस पूरी बहस से कहीं ज्यादा जटिल मामला है। कल्याणकारी नीतियों के बारे में अनुभव यह रहा है कि उन पर धन तो खर्च होता है लेकिन उसका वास्तविक लाभ उन लोगों तक नहीं पहुंचता। बीच में ही कईं स्तरों का भ्रष्टाचार उस धन को सोख लेता है। यह व्यवस्था किसी की गरीबी नहीं हटाती, कुछ लोगों की अमीरी जरूर बढ़ा देती है। यह भी कहा जाता है कि अगर इन नीतियों को ईमानदारी से लागू कर दिया जाता तो शायद देश की गरीबी अभी तक खत्म हो चुकी होती। पिछले कुछ साल के तेज आर्थिक विकास में हम ट्रिकल डॉउन थ्योरी का हश्र भी देख चुके हैं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जब वित्तमंत्री थे तो उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि भारत में ट्रिकल डॉउन इफेक्ट नाकाम साबित हुआ है।

गरीबी को लेकर इस समय भारत की जो समस्या है वह न तो गरीबी की रेखा का गलत आकलन है और न ही इसके लिए बनाई गई नीतियां हैं। समस्या का असली कारण गरीबी हटाने की राजनैतिक प्रतिबद्धता का न होना है। योजनाओं को लागू करने की जो प्रशासनिक व्यवस्था हमने बनाई है वही उसके लागू होने में सबसे बड़ी बाधा बनती है। केंद्र और राज्यों में हम तकरीबन सभी दलों की सरकारें देख चुके हैं और किसी ने भी इस प्रशासनिक व्यवस्था को बदलने या दुरुस्त करने में दिलचस्पी कभी नहीं दिखाई। ऐसे में आंकड़ें भी निर्थक हैं और उनकी कमी-बेशी पर होने वाली बहस भी।

आय से अधिक संपत्ति : सोनिया गांधी के सहयोगी विंसेंट जार्ज को समन : सीबीआई फिर बनी सोनिया जी की बाई



http://www.rediff.com/news/2001/mar/27spec.htm
आय से अधिक संपत्ति : सोनिया गांधी के सहयोगी विंसेंट जार्ज को समन : सीबीआई फिर बनी सोनिया जी की बाई
http://aajtak.intoday.in
भाषा [Edited By: महुआ बोस] | नई दिल्‍ली, 25 जुलाई 2013 |
दिल्ली की एक अदालत ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के करीबी सहयोगी विंसेंट जार्ज को एक आरोपी के रूप में समन जारी किया है. अदालत ने जार्ज के खिलाफ आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति मामले को बंद करने की सीबीआई की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि उनके खिलाफ कार्यवाही के लिए पर्याप्त दस्तावेज हैं.
अदालत ने कहा कि सीबीआई द्वारा दाखिल अंतिम रिपोर्ट स्वीकार्य नहीं है. किसी लोक सेवक द्वारा आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति के संबंध में भ्रष्टाचार निवारण कानून की धारा 13 (1)(ई) के तहत दंडनीय अपराध के लिए विंसेंट जार्ज (संदिग्ध) के खिलाफ कार्यवाही के पर्याप्त दस्तावेज रिकार्ड में है. सीबीआई के विशेष न्यायाधीश जेपीएस मलिक ने कहा, 'उन्हें भ्रष्टाचार निवारण कानून, 1988 की धारा 13 (1)(ई) के तहत दंडनीय अपराध के लिए आरोपी के रूप में 30 अगस्त को समन किया जाए.'

जार्ज के खिलाफ 2000 में प्राथमिकी दर्ज करायी गयी थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि नवंबर 1984 से दिसंबर 1990 के बीच उनकी संपत्ति आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक थी. उनके खिलाफ आरोप है कि पूर्व प्रधानमंत्री और उसके बाद तत्कालीन विपक्ष के नेता राजीव गांधी के निजी सहायक के रूप में बतौर लोक सेवक उन्होंने अपनी पत्नी, बच्चे और करीबी संबंधियों के नाम से 'बेनामी' संपत्ति हासिल की। आरोप के अनुसार वह संपत्ति उनकी आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक थी.

सीबीआई ने आरोप लगाया कि जार्ज ने 1990 के बाद काफी संपत्ति हासिल की जिनमें वाणिज्यिक और रिहायशी संपत्ति भी शामिल हैं. सीबीआई के अनुसार यह संपत्ति दक्षिण दिल्ली के महंगे इलाके के अलावा बेंगलूर, चेन्नई, केरल में थी. इसके साथ सीबीआई ने दिल्ली की सीमा पर कृषि भूमि और बैंक खातों में करीब डेढ़ करोड़ रूपये होने की भी बात की थी. सीबीआई ने इसी साल मई में मामले को बंद करने के संबंध में एक लंबी रिपोर्ट दाखिल की औ कहा कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी.

सीबीआई ने मामले को बंद करने के अनुरोध वाली रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) को स्वीकार करने तथा जांच के दौरान एकत्र और जब्त दस्तावेजों को संबंधित लोगों को लौटाने की अपील भी की. क्लोजर रिपोर्ट में जार्ज के 1975 से विभिन्न पदों पर रहने का भी जिक्र किया गया है. इसमें कहा गया है कि जांच में दिखाया गया है कि विदेश से आयी राशि को जार्ज तथा परिवार के सदस्यों की आय श्रेणी में रखा गया था। वह राशि अमेरिका से परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा वित्तीय मदद के तौर पर भेजी गयी थी.

बुधवार, 24 जुलाई 2013

घोर घ्रणित हिंषक और अमानवीय अमरीका , मानवता का ठेकदार कैसे ?




मेरी समझ में आज तक नहीं आ रहा कि अमरीका की नजर में मोदी अमानवीय कैसे हो गए ? सबसे ज्यादा हिंषक , देश के देश और हजारों लाखों  निर्दोषों को निर्मम मौत के घाट उतरने वाला अमरीका,,मानवता की बात का भी हक़ कैसे रखता हे … हिरोशिमा , नगशाकी , इराक और अफगानिस्तान …., अमरीका के मूल लोगों को किसने साफ़ कर दिया ……  हमेशा  अमरीका ने मानवता को मारा---- उसकी कोई और मिशाल हे …?

घोर घ्रणित हिंषक और अमानवीय अमरीका , मानवता का ठेकदार कैसे ?
मानवता पर सबसे बड़ा कलंक है परमाणु हमला
http://www.vigyanpedia.com/2012/08/blog-post_9.html
शशांक द्विवेदी / बृहस्पतिवार, 9 अगस्त 2012
आज से ठीक 67 वर्ष पूर्व अमेरिकी परमाणु हमले में जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी पूरी तरह से तहस नहस हो गए थे । उस परमाणु हमले की विभीषिका आज भी रोंगटे खड़े कर देने वाली है ,ऐसा लगता है कि अब अगर परमाणु युद्ध हुए तो पूरी दुनियाँ ही तबाह हो सकती है । हिरोशिमा दुनिया का पहला ऎसा शहर है जहां अमेरिका ने  6 अगस्त 1945 में यूरेनियम बम गिराया था और इसके तीन दिन बाद यानी 9 अगस्त को नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गया। इस बमबारी के बाद  हिरोशिमा में 1 लाख 40 हजार और नागासाकी में 74 हजार  लोग मारे गए थे। जापान परमाणु हमले की त्रसदी झेलने वाला दुनिया का अकेला देश है। यह परमाणु हमला मानवता के नाम पर सबसे बड़ा कलंक है । 6 अगस्त, 1945 की सुबह अमरीकी वायु सेना ने जापान के हिरोशिमा पर परमाणु बम लिटिल बॉय गिराया था। तीन दिनों बाद 9 अगस्त को अमरीका ने नागासाकी शहर पर फैट मैन परमाणु बम गिराया।
अमेरिका द्वारा किये गए परमाणु हमले के बाद अमरीका के राष्ट्रपति हैरी ट्रूमन ने कहा कि हिरोशिमा पर गिराया गया बम अब तक इस्तेमाल में लाए गए बम से दो हजार गुना शक्तिशाली है। इससे हुई क्षति का आज तक अनुमान नहीं लगाया जा सका है। बम को अमरीकी जहाज बी-29 से गिराया गया था जिसे इनोला गे के नाम से जाना जाता था। जहाज के चालक दल ने कहा कि धुंए का बड़ा सा गुबार और आग के जबरदस्त गोले ऊपर की तरफ उठे थे। हिरोशिमा पर गिराए गए इस बम ने दूसरे विश्व युद्ध का नक्शा ही बदल दिया था। बम गिराए जाने से पहले जापान को बिना शर्त हथियार डालने को कहा गया था। ब्रितानी प्रधानमंत्री क्लिमेंट एटली ने कहा कि इस परमाणु प्रोजेक्ट में इतनी संभावनाए थीं कि ब्रिटेन ने अमरीकी वैज्ञानिकों के साथ मिलकर काम किया था। हिरोशिमा बम जिसे लिटिल बम का नाम दिया गया था के गिराए जाने के बाद 13 वर्ग किलोमीटर के दायरे में पूरी तरह उजड़ गया था ओर शहर में मौजूद 60 प्रतिशत भवन तबाह हो गए थे। शहर की साढ़े तीन लाख आबादी में से एक लाख चालीस हजार लोग मारे गए थे। बहुत सारे लोग बाद में विकिरण के कारण मौत का शिकार हुए। तीन दिनों के बाद अमरीका ने जापान के दूसरे शहर नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिराया जिसमें 74 हजार लोग मारे गए थे। जापान ने 14 अगस्त, 1945 को हथियार डाल दिए थे। इस परमाणु हमलें ने इंसानी बर्बरता के सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे , बच्चों और औरतों की हजारों लाशें, शहरों की बर्बादी ने मानवता को शर्मशार कर दिया था । वास्तव में इस बर्बरता को कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है। यहाँ तक कि  किसी युद्ध में भी ऐसी बर्बरता को सही नहीं ठहराया जा सकता है।

कई देशों द्वारा अमेरिका की इस हरकत पर कड़े शब्दों में उसकी निंदा की गयी थी। आज इस हमलें  को 67 वर्ष हो गए हैं लेकिन जापान का ये हिस्सा आज भी उस हमले से प्रभावित है। आज भी यहाँ पर उत्पन्न हो रही संतानों पर इस हमले का असर साफ देखा जा सकता है।
वास्तव में अमेरिका ने परमाणु बम का  इस्तेमाल वैश्विक राजनीति में अपना दबदबा कायम करने के लिए किया था। इस परमाणु हमले से छह महीने पहले तक अमेरिका ने जापान के 67 शहरों पर भारी भीषण बमबारी की थी । इस दौरान जापान की हार निश्चित हो गयी थी लेकिन फिर भी अमेरिका ने जानबूझकर परमाणु बम का  इस्तेमाल किया ।
जहाँ 67 साल पहले 1945 की गर्मियों के अंतिम महीने में पॉट्सडैम शांति सम्मेलन के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने इस बात का ऐलान किया कि अमरीका के पास एक नया सुपर हथियार है। कहा जा रहा था कि हैरी ट्रूमन इस जुमले को कहकर सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन की आँखों में डर और खौफ को देखना चाहते थे। लेकिन उनकी बातों से  स्टालिन में कोई खौफ पैदा नहीं हुआ और इसके कुछ ही दिनों के बाद हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। जबकि इस परमाणु बमबारी का कोई सैन्य महत्व नहीं था। इन शहरों में हथियार बनाने वाले कारखाने मौजूद नहीं थे। न ही वहाँ कोई बड़ा सैन्य जमाव था। दरअसल अमरीका रूस को यह दिखाना चाहता था कि युद्ध के बाद दुनिया के भाग्य का फैसला कौन करेगा। और इसके लिए उसने लाखों जापानी नागरिकों के जीवन बलिदान कर दिए।
जापान पर परमाणु हमला इंसानी इतिहास में परमाणु हथियारों का सबसे पहला प्रयोग था। अफसोस की बात यह है कि ये परमाणु बम  सैन्य ठिकानों और और उनके सेंटर्स पर नहीं बल्कि मासूम लोगों और कस्बों पर गिराए गए थे। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए  प्रसिद्ध  पीडियाट्रिक और सर्जन लियोनिद रॉशाल ने कहा था - “हर इंसान को अपने जिन्दगी में कम से कम एक बार हिरोशिमा और नागासाकी की यात्रा करनी चाहिए ताकि इस त्रासदी की भयानकता को महसूस किया जा सके.”
आधुनिक विश्व में शक्तिशाली देशों के लिए किसी अन्य देश पर परमाणु हमला करना संभव नहीं लगता क्योंकि औद्योगिकीकरण के इस दौर में एक देश दूसरे पर आर्थिक एवं व्यापारिक हित को लेकर काफी निर्भरता है। परमाणु हमला होने पर ये हित प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन फिर भी किसी परिस्थिति में परमाणु हमला होने पर उससे होने वाला नुकसान हिरोशिमा या नागासाकी पर परमाणु हमले से हुए नुकसान से कई गुना अधिक हो सकता है। अमेरिका की ओर से हिरोशिमा या नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम का वजन 12 से 15 किलोटन था जबकि वर्तमान में परमाणु बम का वजन सामान्य तौर पर 50 से 100 किलोटन तक होता है। और परमाणु तकनीक भी पहले से काफी उन्नत हो गई है।
इस घटना के 67  साल बीत जाने के बाद जापान ने आज आश्चर्यजनक रूप से प्रगति की है। जापान ने अपने आप को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में खड़ा किया है ।उसने पूरे विश्व के सामने विकास का एक उदाहरण सेट किया है । परमाणु हमले के बाद जापान ने जान लिया है कि शान्ति का रास्ता ही सबसे अच्छा और मानवीय है। लेकिन इस परमाणु हमले की विभीषिका को जानने के बाद भी अमेरिका सहित विश्व के अधिकांश देश परमाणु हथियारों की होड में शामिल है । हमें अब यह समझना होगा की अगर फिर से तीसरा विश्व युद्ध हुआ  तो उसमे स्वाभाविक तौर पर परमाणु बम से हमलें होंगे जिससे सम्पूर्ण मानवता को खतरा है । इसलिए विश्व के सभी देशों को सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में परमाणु हमलें न होने पायें क्योंकि मानवता के लिए शांति ही एकमात्र और सर्वमान्य रास्ता हो सकता है ।

रविवार, 21 जुलाई 2013

The BJP future of this country - Narayana Murthy




http://www.comboupdates.com

BJP or Congress, who is secular, 
Narayana Murthy says neither, I ask what is Secularism
- Vijay Prabhu
Infosys founder N.R. Narayana Murthy says that neither the Congress or the BJP is truly secular.  Everybody has his own opinion about secularism.  My question to Mr.Murthy et al, what is secularism.  Secularism is a very shallow word in Indian context.  The dictionary says secularism means a Philosophy or a doctrine that rejects religion and the attitude that religion should have no place in civil affairs.  But Mr.Murthy should leave apart the political parties, the religion is deep rooted in our day to day affairs right from our homes to our offices  Every year, every government and most private offices host a Pooja if it majority hindu and a Urs if it is majority muslim office.  Taking the religion out of an Indian will mean taking the soul out of him.  We are not so developed as the United States that we can proudly say that the religion is not a part of the state.  Rather, it will be beneficial if we agree that the religion is a part and parcel of our Indianness.  Secularism is the single most and oft abused word in India.  People just say it without knowing the meaning or the wholeness of the world.

So being secular essentially means to take out the religion out of the state.   This is not possible in India, however the religious leanings of all political parties are evident from the way they conduct themselves.  In this scenario I think that BJP is a better alternative because at least its Hindutva agenda is open.  The Congress has over the years used its power to pander masses be it in Punjab, North East, Jammu & Kashmir or in Sri Lanka.  

India has had to fight the evil of terrorism because the Congress government at the centre supported all the above at one or another point of time to suit its own political needs.  Everybody knows that the J & K elections of 1989 were rigged to make G.M.Shah the Chief Minister of the state against all the public opinion.  It is this mistake that turned the tide of most pro India Kashmiris into anti India.  It is this wound that is not healing but causing pain to us in many different ways.  Be it a Jawan losing his life at the border or a Kashmiri youth losing his life to a army bullet or the gory massacre  by the terrorists.

In Punjab too, they supported and propped up Mr.Bhindranwale against the Akali Dal.  Ultimately thousands lost lives for this mistake done by the Congress including Mrs.Indira Gandhi.  Supporting the LTTE with arms and money by the Congress is known to all but ultimately it took a life a young and dynamic leader of India in the form of Rajiv Gandhi.

There is a old adage which says what you sow so shall you reap.  We have reaped enough hatred due to the ill implemented secularism (called the pseudo-secularism by intellectuals) by the Congress during its years in power.  Now let us now make amends and choose one of the lesser evils of the two.

It is a simple fact that India needs a single party Government at the centre to implement the reforms and usher in double digit growth.  The alliances are a failed idea and only work in the breaking up of the nation.  The regional parties come to the table with their own partisan regional agenda.  This agenda has no place in Lok Sabha.  The Lok Sabha is and will forever be for the India as a whole.  To achieve this, we need a strong and dominant party in power and a equally strong opposition.  This may seem odd but the I think Indians should give up on the third, fourth or the fifth front which often rises when the elections are due.  Madam Jayalalitha and Mamata should know that Mulayam has never been a grateful and reliant partner.  He is known to ditch even his best allies in the quest for power.  

We are in entering the decade of Asian powers and let us not waste our precious time discussing the merits of secularism.  The BJP with its known agenda is always a better bet for the future of this country.  However the BJP must also guarantee that no muslims or other minorities are harmed in any way and the Godhra was and will just be a aberation in the history of India.  India can't bear for another Godhra to happen, to much was lost in the riots including lives, money and the mutual trust between the two communities.  BJP should guarantee that this shall not be repeated in any form.   The logic of Savarkar's Hindutva doesn't rely of imposing Hinduism on all but rather providing the Rajya Dharma or the rule of righteousness to all irrespective of their religion.  If BJP can guarantee such a Rajya Dharma, then all the communities will benefit from the progress, as we were benefiting before the arrival of the Britishers and we attain our goal of being the 3rd biggest economy in the world.



हिंदुओं की बात सांप्रदायिक तो मुसलमानों की बात धर्मनिरपेक्ष कैसे? -नारायण मूर्ति



साम्प्रदायिकता या सेकुलरिज्म की आड़ में सिर्फ हिन्दुओ और हिंदूवादीयो को ही क्यों निशाना बनाया जाता - इंफोसिस के चेयरमैन नारायण मूर्ति
गर्व है इंफोसिस के पूर्व चेयरमैन नारायण मूर्ति पर.....जिन्होंने तथाकथित सेकुलरों को करारा जबाब दिया ...उन्होंने कहा की यदि बीजेपी हिन्दुओ के हित की बात करने से साम्प्रदायिक हो जाती है तो फिर मुसलमानों के हित की बात करने वाली कांग्रेस या दूसरी पार्टियां धर्मनिरपेक्ष कैसे हुई ? उन्होंने मीडिया को भी लताड़ा और कहा की भारत की मीडिया नरेंद्र मोदी के खिलाफ किसी साजिश के तहत अभियान चलती है .. क्या भारत में २००२ में पहले और २००२ के बाद दंगे नही भडके ? फिर मीडिया फिर २००२ को ही बार - बार क्यों उछालती रहती है ?
उन्होंने कहा की आसाम दंगो पर कांग्रेस ने अपने मुख्यमंत्री के खिलाफ क्या करवाई की ? कुछ नही ..फिर क्या आसाम के मुख्यमंत्री ने माफी मांगी ? क्या आसाम के मुख्यमंत्री ने दंगो की जिम्मेदारी ली ? नही ंतो फिर वही कांग्रेस और वही मीडिया नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगो के लिए जिम्मेदार क्यों ठहरती है ? और उनसे बार - बार माफी की मांग क्यों की जाती है ?
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मीडिया की मोदी के खिलाफ साजिश-नारायण मूर्ति
हिंदुओं की बात सांप्रदायिक तो मुसलमानों की बात धर्मनिरपेक्ष कैसे?
स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम Sunday 21 April 2013
http://www.swatantraawaz.com/headline/1248.htm
नई ‌‌दिल्‍ली। इंफोसिस के पूर्व चेयरमैन नारायण मूर्ति ने एक लेख में देश के सेक्‍यूलरों से जानना चाहा है कि यदि बीजेपी हिंदुओ के हित की बात करने से सांप्रदायिक हो जाती है तो फिर मुसलमानों के हित की बात करने वाली कांग्रेस या दूसरी पार्टियां धर्मनिरपेक्ष कैसे हुईं? भारत में सांप्रदायिकता या सेक्‍यूलरिज्म की आड़ में सिर्फ हिंदुओं और हिंदूवादियों को ही क्यों निशाना बनाया जाता है?
उन्होंने मीडिया को भी कहा कि भारत की मीडिया नरेंद्र मोदी के खिलाफ किसी साजिश के तहत अभियान चलाती है और सवाल किया कि क्या भारत में 2002 के पहले और 2002 के बाद दंगे नहीं भड़के? फिर मीडिया 2002 को ही बार बार क्यों उछालती रहती है?
उन्होंने कहा कि आसाम दंगों पर कांग्रेस ने अपने मुख्यमंत्री के खिलाफ क्या कार्रवाई की? कुछ नहीं की, फिर क्या आसाम के मुख्यमंत्री ने माफ़ी मांगी? क्या आसाम के मुख्यमंत्री ने दंगो की जिम्मेदारी ली? नहीं, फिर वही कांग्रेस और वही मीडिया नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगो के लिए जिम्मेदार क्यों ठहराती है? और उनसे बार-बार माफ़ी की मांग क्यों की जाती है?
लेकिन, भारत की मीडिया के दोगलेपन की हद देखिए कि किसी मीडिया ने उनके इस लेख का जिक्र नही किया, लेकिन अगर यही नारायण मूर्ति, मोदी या हिंदुत्व के खिलाफ लिखे होते, तो अब तक मीडिया उस उस लेख का दुनियाभर में प्रचार कर देता।
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नारों से गरीबी नहीं मिटती: नारायण मूर्ति
 Sat, 29 Jun 2013
बेंगलूर। देश से गरीबी मिटाने के नारे तमाम राजनीतिक दल सालों से देते आ रहे हैं। मगर खुद सरकार के आंकड़े कहते हैं कि गरीबों की संख्या में बहुत ज्यादा कमी नहीं आई है। कथनी और करनी के इसी फर्क पर तंज कसते हुए इंडिया इंक के दिग्गज और आइटी कंपनी इंफोसिस के एक्जीक्यूटिव चेयरमैन एनआर नारायण मूर्ति ने कहा है कि सिर्फ नारों से गरीबी नहीं मिटती है। गरीबी दूर करने के लिए देश में उद्योगों और उद्यमिता को बढ़ावा देना होगा।
बेंगलूर चैंबर ऑफ इंडस्ट्री एंड कॉमर्स की बैठक को शुक्रवार रात संबोधित करते हुए मूर्ति ने कहा, 'पिछले 40 सालों में मैंने अपने अनुभवों से सीखा है कि कोई नारा गरीबी दूर नहीं कर सकता। गरीबी की समस्या को केवल उद्योगों को बढ़ावा देकर ही दूर किया जा सकता है। इससे न सिर्फ लोगों को रोजगार के मौके मिलते हैं बल्कि विकास में भी तेजी आती है।' ऑटोमोबाइल और भारी उद्योग से आइटी उद्योग की तुलना करते हुए मूर्ति ने कहा कि इन सेक्टरों को सौ से एक हजार एकड़ जमीन की जरूरत होती है। इन उद्योगों में औसत मासिक वेतन 25 हजार रुपये होती है और केवल 10 हजार लोगों को रोजगार मिल पाता है। वहीं, आइटी उद्योग इतनी ही जगह में पांच गुना लोगों को नौकरियां देता है। यह क्षेत्र छह लाख के निवेश से 30 लाख बना सकता है।
उन्होंने कहा कि विकसित देशों और चीन ने इस बात को समझा और उद्योगपतियों के लिए राहें आसान की हैं। बेंगलूर के आइटी उद्योग ने पांच लाख ऐसी नौकरियां पैदा की हैं, जिनमें औसत मासिक वेतन 50 हजार रुपये है। इसके अलावा अपरोक्ष नौकरियों की संख्या 15 लाख है। बेंगलूर स्थित इलेक्ट्रॉनिक सिटी में बेहतर सुविधाओं की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि आइटी इंडस्ट्री के सबसे बड़े हब में एक छोटा एयरपोर्ट, अच्छी सड़कें, बिजली, पानी, साफ हवा और अच्छे अंग्रेजी स्कूलों का इंतजाम होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आइटी उद्योग ने कर्नाटक की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में विशेष योगदान दिया है। सरकार को भी हमारे लिए बेहतर परिस्थितियां बनानी चाहिए। राज्य की कुल जीडीपी में आइटी सेक्टर का 25 फीसद हिस्सा है।
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गुरुवार, 18 जुलाई 2013

चित्तोड़ के जौहर




ये चित्र 'जौहरकुण्ड' का है....॥ 'जौहर' एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनकर हमारी 'रुह कांप' जाती है, परन्तु उसके साथ ही साथ यह शब्द राजस्थानी क्षत्राणियोँ के अभूतपूर्व 'बलिदान' का स्मरण कराता हैँ! जो जौहर शब्द के अर्थ से अनभिज्ञ हैँ! उन्हेँ मेँ बताना चाहुँगा....॥ जब किसी राजस्थानी राजा के राज्य पर मुस्लिम आक्रमणकारीयोँ का आक्रमण होता तो युध्द मेँ जीत की कोई संम्भावना ना देखकर राजस्थानी क्षत्रिय और क्षत्राणी आत्म समर्पण करने के बजाय लड़कर मरना अपना धर्म समझते थे! क्योकिँ कहा जाता है ना "वीर अपनी मृत्यु स्वयं चुनते है!" इसिलिए राजस्थानी वीर और वीरांगनाए भी आत्मसमर्पण के बजाय साका (साका= केसरिया+जौहर) का मार्ग अपनाते थे! पुरुष (क्षत्रिय) 'केसरिया' वस्त्र धारणा कर प्राणोँ का उत्सर्ग करने हेतु 'रण भूमि' मेँ उतर जाते थे! और राजमहल की महिलाएँ (क्षत्रणियाँ) अपनी 'सतीत्व की रक्षा' हेतु अपनी जीवन लीला समाप्त करने हेतु जौहर कर लेती थी! महिलाँए एसा इसलिए करती थी क्योँकि मुस्लिम आक्रमणकारी युध्द मेँ विजय के पश्चात महिलाओँ के साथ बलात्कार करते थे! अत: क्षत्राणी विरांगनाएँ अपनी अस्मिता व गौरव की रक्षा हेतु जौहर का मार्ग अपनाती थी! जिसमेँ वे जौहर कुण्ड मेँ अग्नि प्रज्जवलित कर धधकती अग्नि कुण्ड मेँ कुद कर अपने प्रणोँ की आहुती दे देती थी!! जौहर के मार्ग को एक क्षत्राणी अपना गौरव व अपना अधिकार मानती थी! और यह मार्ग उनके लिए स्वाधिनता व आत्मसम्मान का प्रतिक था! ये जौहर कुण्ड एसी ही हजारोँ वीरांगनाओ के बलिदान का साक्ष्य हैँ! नमन हे एसी क्षत्राणी विरांगनाओँ को...और गर्व है हमेँ हमारे गौरवपूर्ण इतिहास पर......गर्व से कहो हम हिन्दु है...॥ जय जय राजस्थान...॥ जय माँ भारती!!

चित्तोड़ के जौहर और शाके
1/07/2009 आलेख RATAN SINGH SHEKHAWAT
http://www.gyandarpan.com/2009/01/blog-post_07.html
दुर्ग शिरोमणि चित्तोडगढ का नाम इतिहास में स्वर्णिम प्रष्टों पर अंकित केवल इसी कारण है कि वहां पग-पग पर स्वतंत्रता के लिए जीवन की आहुति देने वाले बलिदानी वीरों की आत्मोसर्ग की कहानी कहने वाले रज-कण विद्यमान है | राजस्थान में अपनी आन बान और मातृभूमि के लिए मर मिटने की वीरतापूर्ण गौरवमयी परम्परा रही है और इसी परम्परा को निभाने के लिए राजस्थान की युद्ध परम्परा में जौहर और शाको का अपना विशिष्ठ स्थान रहा है ! चित्तोड़ के दुर्ग में इतिहास प्रसिद्ध तीन जौहर और शाके हुए है |
पहला जौहर और शाका -
दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तोड़ की महारानी पद्मिनी के रूप और सोंदर्य के बारे में सुन उसे पाने की चाहत में विक्रमी संवत १३५९ में चितोड़ पर चढाई की | चित्तोड़ के महाराणा रतन सिंह को जब दिल्ली से खिलजी की सेना के कूच होने की जानकारी मिली तो उन्होंने अपने भाई-बेटों को दुर्ग की रक्षार्थ इकट्ठा किया समस्त मेवाड़ और आप-पास के क्षत्रों में रतन सिंह ने खिलजी का मुकाबला करने की तैयारी की | किले की सुद्रढ़ता और राजपूत सैनिको की वीरता और तत्परता से छह माह तक अलाउद्दीन अपने उदेश्य में सफल नही हो सका और उसके हजारों सैनिक मरे गए अतः उसने युक्ति सोच महाराणा रतन सिंह के पास संधि प्रस्ताव भेजा कि मै मित्रता का इच्छुक हूँ ,महारानी पद्मिनी के रूप की बड़ी तारीफ सुनी है, सो मै तो केवल उनके दर्शन करना चाहता हूँ | कुछ गिने चुने सिपाहियों के साथ एक मित्र के नाते चित्तोड़ के दुर्ग में आना चाहता हूँ इससे मेरी बात भी रह जायेगी और आपकी भी | भोले भाले महाराणा उसकी चाल के झांसे में आ गए | २०० सैनिको के साथ खिलजी दुर्ग में आ गया महाराणा ने अतिथि के नाते खिलजी का स्वागत सत्कार किया और जाते समय खिलजी को किले के प्रथम द्वार तक पहुँचाने आ गए |
धूर्त खिलजी मीठी-मीठी प्रेम भरी बाते करता- करता महारणा को अपने पड़ाव तक ले आया और मौका देख बंदी बना लिया | राजपूत सैनिको ने महाराणा रतन सिंह को छुड़ाने के लिए बड़े प्रयत्न किए लेकिन वे असफल रहे और अलाउद्दीन ने बार-बार यही कहलवाया कि रानी पद्मिनी हमारे पड़ाव में आएगी तभी हम महाराणा रतन सिंह को मुक्त करेंगे अन्यथा नही |अतः रानी पद्मिनी के काका गोरा ने एक युक्ति सोच बादशाह खिलजी को कहलाया कि रानी पद्मिनी इसी शर्त पर आपके पड़ाव में आ सकती है जब पहले उसे महाराणा से मिलने दिया जाए और उसके साथ उसकी दासियों का पुरा काफिला भी आने दिया जाए | जिसे खिलजी ने स्वीकार कर लिया | योजनानुसार रानी पद्मिनी की पालकी में उसकी जगह स्वयम गोरा बैठा और दासियों की जगह पालकियों में सशत्र राजपूत सैनिक बैठे | उन पालकियों को उठाने वाले कहारों की जगह भी वस्त्रों में शस्त्र छुपाये राजपूत योधा ही थे | बादशाह के आदेशानुसार पालकियों को राणा रतन सिंह के शिविर तक बेरोकटोक जाने दिया गया और पालकियां सीधी रतन सिंह के तम्बू के पास पहुँच गई वहां इसी हलचल के बीच राणा रतन सिंह को अश्वारूढ़ कर किले की और रवाना कर दिया गया और बनावटी कहार और पालकियों में बैठे योद्धा पालकियां फैंक खिलजी की सेना पर भूखे शेरों की तरह टूट पड़े अचानक अप्रत्याशित हमले से खिलजी की सेना में भगदड़ मच गई और गोरा अपने प्रमुख साथियों सहित किले में वापस आने में सफल रहा महाराणा रतन सिंह भी किले में पहुच गए | छह माह के लगातार घेरे के चलते दुर्ग में खाद्य सामग्री की भी कमी हो गई थी इससे घिरे हुए राजपूत तंग आ चुके थे अतः जौहर और शाका करने का निर्णय लिया गया | गोमुख के उतर वाले मैदान में एक विशाल चिता का निर्माण किया गया | पद्मिनी के नेतृत्व में १६००० राजपूत रमणियों ने गोमुख में स्नान कर अपने सम्बन्धियों को अन्तिम प्रणाम कर जौहर चिता में प्रवेश किया | थोडी ही देर में देवदुर्लभ सोंदर्य अग्नि की लपटों में स्वाहा होकर कीर्ति कुंदन बन गया | जौहर की ज्वाला की लपटों को देखकर अलाउद्दीन खिलजी भी हतप्रभ हो गया | महाराणा रतन सिंह के नेतृत्व केसरिया बाना धारण कर ३०००० राजपूत सैनिक किले के द्वार खोल भूखे सिंहों की भांति खिलजी की सेना पर टूट पड़े भयंकर युद्ध हुआ गोरा और उसके भतीजे बादल ने अद्भुत पराक्रम दिखाया बादल की आयु उस वक्त सिर्फ़ बारह वर्ष की ही थी उसकी वीरता का एक गीतकार ने इस तरह वर्णन किया -
बादल बारह बरस रो,लड़ियों लाखां साथ |
सारी दुनिया पेखियो,वो खांडा वै हाथ ||
इस प्रकार छह माह और सात दिन के खुनी संघर्ष के बाद १८ अप्रेल १३०३ को विजय के बाद असीम उत्सुकता के साथ खिलजी ने चित्तोड़ दुर्ग में प्रवेश किया लेकिन उसे एक भी पुरूष,स्त्री या बालक जीवित नही मिला जो यह बता सके कि आख़िर विजय किसकी हुई और उसकी अधीनता स्वीकार कर सके | उसके स्वागत के लिए बची तो सिर्फ़ जौहर की प्रज्वलित ज्वाला और क्षत-विक्षत लाशे और उन पर मंडराते गिद्ध और कौवे | 
दूसरा जौहर और शाका 
गुजरात के बादशाह बहादुर शाह ने जनवरी १५३५ में चित्तोड़ पहुंचकर दुर्ग को घेर लिया इससे पहले हमले की ख़बर सुनकर चित्तोड़ की राजमाता कर्मवती ने अपने सभी राजपूत सामंतों को संदेश भिजवा दिया कि- यह तुम्हारी मातृभूमि है इसे मै तुम्हे सौपती हूँ चाहो तो इसे रखो या दुश्मन को सौप दो | इस संदेश से पुरे मेवाड़ में सनसनी फ़ैल गई और सभी राजपूत सामंत मेवाड़ की रक्षार्थ चित्तोड़ दुर्ग में जमा हो गए | रावत बाघ सिंह ने किले की रक्षात्मक मोर्चेबंदी करते हुए स्वयम प्रथम द्वार पर पाडल पोल पर युद्ध के लिए तैनात हुए | मार्च १५३५ में बहादुरशाह के पुर्तगाली तोपचियों ने अंधाधुन गोले दाग कर किले की दीवारों को काफी नुकसान पहुचाया तथा किले निचे सुरंग बना उसमे विस्फोट कर किले की दीवारे उड़ा दी राजपूत सैनिक अपने शोर्यपूर्ण युद्ध के बावजूद तोपखाने के आगे टिक नही पाए और ऐसी स्थिति में जौहर और शाका का निर्णय लिया गया | राजमाता कर्मवती के नेतृत्व में १३००० वीरांगनाओं ने विजय स्तम्भ के सामने लकड़ी के अभाव बारूद के ढेर पर बैठ कर जौहर व्रत का अनुष्ठान किया | जौहर व्रत संपन्न होने के बाद उसकी प्रज्वलित लपटों की छाया में राजपूतों ने केसरिया वस्त्र धारण कर शाका किया किले के द्वार खोल वे शत्रु सेना पर टूट पड़े इस युद्ध में इतना भयंकर रक्तपात हुआ की रक्त नाला बरसाती नाले की भांति बहने लगा | योद्धाओं की लाशों को पाटकर बहादुर शाह किले में पहुँचा और भयंकर मारकाट और लूटपाट मचाई | चित्तोड़ विजय के बाद बहादुर शाह हुमायूँ से लड़ने रवाना हुआ और मंदसोर के पास मुग़ल सेना से हुए युद्ध में हार गया जिसकी ख़बर मिलते ही ७००० राजपूत सैनिकों ने आक्रमण कर पुनः चित्तोड़ दुर्ग पर कब्जा कर विक्रमादित्य को पुनः गद्दी पर बैठा दिया | 
तीसरा जौहर और शाका 
अक्टूबर १५६७ में अकबर अपनी विशाल सेना के साथ चित्तोड़ दुर्ग पर हमला किया | शक्ति सिंह द्वारा चित्तोड़ के महाराणा उदय सिंह को हमले की पूर्व सुचना मिल चुकी थी सो युद्ध परिषद् व अन्य सामन्तो की सलाह के बाद महाराणा उदय सिंह ने किले की रक्षा का भार वीर शिरोमणि जयमल मेडतिया को सौप ख़ुद परिवार सहित चित्तोड़ दुर्ग छोड़ कर दुर्गम पहाडों में चले गए | कई महीनों के युद्ध के बाद किले में गोला बारूद और अन्न की कमी हो चली थी और एक रात किले की दीवार का मरम्मत का कार्य देखते वक्त राव जयमल अकबर की बन्दूक से निकली गोली का शिकार हो घायल हो गए और पैर में गोली लगने के कारण उनका चलना फिरना दूभर हो गया अतः दुर्ग में भावी अनिष्ट की आशंका देख जौहर व शाका का निश्चय किया गया दुर्ग में चार स्थानों पर जौहर हुआ |
ये चित्र 'जौहरकुण्ड' का है....
जौहर क्रिया संपन्न होने के बाद सभी राजपूत योद्धाओं ने गो मुख में स्नान कर मंदिरों में दर्शन कर केसरिया बाना धारण कर किले के द्वार खोल दिए और चल पड़े रणचंडी का आव्हान करने | भयंकर युद्ध और मारकाट के बाद १५ फरवरी १५६८ को दोपहर बाद बादशाह अकबर इन सभी वीरों के वीर गति प्राप्त होने के बाद किले पर कब्जा कर पाया |

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

2 लाख वेश्‍याओं को बढ़ावा देगा महाराष्‍ट्र में बार डांस पर हटा बैन


2 लाख वेश्‍याओं को बढ़ावा देगा महाराष्‍ट्र में बार डांस पर हटा बैन

2 लाख वेश्‍याओं को बढ़ावा देगा महाराष्‍ट्र में बार डांस पर हटा बैन
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मुंबई। 8 साल बाद मुंबई के बारों में अब बार बालाएं ठुमके लगाती देखी जा सकेंगी। सीधे शब्‍दों में कहें तो 8 साल के सन्‍नाटे के बाद मुंबई के बार अब गुलजार हो जायेंगे क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट ने डांस बार को फिर से खोलने की अनुमति दे दी है। बॉम्‍बे हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश दिया है और कहा कि डांस बार पर पाबंदी गलत है। मालूम हो कि वर्ष 2005 में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री आरआर पाटिल ने मुंबई समेत महाराष्ट्र के सभी डांस बारों पर पाबंदी लगा दी थी। अपने इस फैसले पर पाटिल ने दलील दी थी कि डांस बार के लिए लड़कियों की तस्करी की जाती है। डांस बार के मालिक लड़कियों का आर्थिक और शारीरिक शोषण करते हैं और इससे देह व्यापार को बढ़ावा मिलता है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने इस इंडस्‍ट्री से जुड़े लोगों को तो राहत दी है मगर कहीं ऐसा ना हो कि ये फैसला देश के भविष्‍य के साथ खिलवाड़ कर बैठे। जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला देह व्‍यापार को बढ़ावा देगा। आप शायद सुनकर दंग रह जायेंगे कि मुंबई देश की सबसे बड़ी सेक्‍स इंडस्‍ट्री है। ये बात हम नहीं बल्कि राष्‍ट्रीय एड्स कंट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट कह रही है। मुंबई में 2 लाख से ज्‍यादा वेश्‍याएं हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि यहां 50 फीसदी से अधिक वेश्‍याएं एचआईवी से ग्रसित हैं। वर्ष 2000 में मुंबई में वेश्‍याओं की संख्‍या 1 लाख थी। यह संख्‍या हर साल 10 फीसदी की दर से बढ़ रही है। देह व्‍यापार के मामले में कोलकाता दूसरे नंबर पर है। ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार मुंबई एशिया की सबसे बड़ी सेक्‍स इंडस्‍ट्री है। जानकारों का कहना है कि डांस बार के बाद ये महिलाएं देह व्‍यापार के धंधे में सक्रिय हो जायेंगी और एड्स जैसे खतरनाक बीमारी के फैलने का खतरा रहेगा।
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महाराष्ट्र में फिर खुलेंगे डांस बार, सुप्रीम कोर्ट ने हटाई पाबंदी
Updated on: Tue, 16 Jul 2013
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिए एक अहम फैसले में महाराष्ट्र सरकार को झटका देते हुए राज्य में बंद किए गए डांस बार को खोलने का आदेश दिया है। इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी राज्य में डांस बार पर लगाई गई रोक को गलत बताते हुए इन्हें खोलने का आदेश दिया था। इस आदेश को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

पढ़ें : लाडली को नशे में देख डैड हुए बेहोश

गौरतलब है कि राज्य सरकार ने वर्ष 2005 में राज्य के सभी डांस बार को बंद करने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्य के सभी डांस बार दोबारा से खुल सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश अल्तमस कबीर और न्यायधीश एसएस निज्जर की खंडपीठ ने इस मामले पर फैसला सुनाते राज्य सरकार के आदेश को असंवैधानिक बताया।

महाराष्ट्र सरकार द्वारा वर्ष 2005 में बंद किए गए डांस बार के खिलाफ रेस्टोरेंट और होटल एसोसिएशन ने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील की थी। वर्ष 2006 में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को झटका देते हुए इस मामले में रेस्टोरेंट एसोसिएशन के हक में अपना फैसला सुनाया था। कोर्ट ने राज्य में बंद किए गए सभी डांस बार को खोलने का भी आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार ने दलील दी थी कि डांस बार की आड़ में राज्य के अंदर जिस्मफरोशी का धंधा चलाया जा रहा है। सरकार के मुताबिक राज्य में करीब 345 डांस बार को लाइसेंस मिला हुआ है जबकि करीब 2500 डांस बार बिना लाइसेंस के ही चल रहे हैं। एसोसिएशन का तर्क था कि राज्य सरकार के फैसले के बाद करीब सत्तर हजार बार ग‌र्ल्स बेरोजगार हो गई हैं और कुछ ने तंगी के हालातों में आत्महत्या तक कर ली है।
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आसानी से हार नहीं मानेगी महाराष्ट्र सरकार
Updated on: Tue, 16 Jul 2013
मुंबई [ओमप्रकाश तिवारी]। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही डांस बार फिर से शुरू किए जाने के पक्ष में फैसला सुना दिया है, लेकिन महाराष्ट्र सरकार आसानी से हार मानने वाली नहीं है। वह कानूनी विशेषज्ञों के पैनल से सलाह लेकर फैसले के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर करेगी। यदि उसमें सफलता नहीं मिली तो ऐसा सख्त कानून बनाएगी कि पुन: लाइसेंस लेकर डांस बार चलाना आसान नहीं होगा। सरकार के हौसले बुलंद हैं क्योंकि ज्यादातर राजनीतिक दल उनके साथ खड़े हैं।

डांस बार पर कोर्ट का फैसला महाराष्ट्र सरकार ही नहीं राकांपा नेता व गृहमंत्री आरआर पाटिल के लिए बड़ा झटका है। डांस बार पर पाबंदी का फैसला अगस्त 2005 में पाटिल ने किया था, तब भी वह गृहमंत्री ही थे। सुप्रीम कोर्ट में हार के बावजूद पाटिल के हौसले पस्त नहीं पड़े हैं। उन्होंने मंगलवार को विधान परिषद में कहा, अभी हमें कोर्ट के फैसले की प्रति प्राप्त नहीं हुई है। प्रति मिलने के बाद कानूनविदों, वकीलों और विधायकों का एक पैनल उसका अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपेगा। उसीआधार पर सरकार फैसला करेगी कि वह इस मुद्दे पर पुनरीक्षण याचिका दायर करे, सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ के समक्ष जाए या सख्त कानून बनाकर डांस बार लाइसेंस पुन: देने की शुरुआत करे।

पाटिल के हौसले बुलंद हैं क्योंकि राकांपा और कांग्रेस ही नहीं भाजपा व शिवसेना जैसे दल भी नैतिकता के बहाने इस मुद्दे पर उनके साथ खड़े दिख रहे हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र फडणवीस ने जहां कोर्ट के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है,वहीं शिवसेना की नेता नीलम गोरे का कहना है कि डांस बार की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि वहां महिलाओं का शोषण किया जाता है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे डांस बार पर पाबंदी के लिए सख्त कानून के पक्ष में हैं तो राकांपा अध्यक्ष भास्कर जाधव का मानना है कि महाराष्ट्र की जनता डांस बार पर पाबंदी का समर्थन करेगी।
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सोमवार, 15 जुलाई 2013

चुनाव आते ही सेक्युलरिजम का बुर्का पहन लेती है कांग्रेसः नरेंद्र मोदी


चुनाव आते ही सेक्युलरिजम का बुर्का पहन लेती है कांग्रेसः नरेंद्र मोदी
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नवभारतटाइम्स.कॉम | Jul 15, 2013,
पुणे।। गुजरात के मुख्यमंत्री और बीजेपी की कैंपेन कमिटी के प्रमुख नरेंद्र मोदी ने रविवार को पुणे में बीजेपी वर्कर्स की बैठक से कांग्रेस और केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला। मोदी ने कांग्रेस पर एक तरह से मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए कहा कि जब-जब संकट आता है वह सेक्युलरिजम का बुर्का पहनकर बंकर में घुस जाती है। मोदी ने अपने भाषण में पीएम मनमोहन सिंह पर तीखे हमले किए। उन्होंने पीएम को 'अनर्थशास्त्री' कहा तो, रुपये की गिरती कीमत पर वित्तमंत्री पर ताना कसते हुए कहा कि रुपया उनकी उम्र तक पहुंच रहा है। मोदी ने कांग्रेस को खुली चुनौती देते हुए कहा कि वह यूपीए के 10 साल और एनडीए सरकार के 6 साल के कामकाज की तुलना करके देख ले कि किसने बेहतर काम किया है। उधर, कांग्रेस नेता और संसदीय कार्य राज्य मंत्री राजीव शुक्ला ने मोदी के बयान को संविधान के खिलाफ बताया है। उन्होंने कहा कि मोदी एक ऐसे नेता हैं जो ऐसे हथकंडे अपनाते रहते हैं।

बुर्का पहन लेती है कांग्रेसः मोदी ने कांग्रेस पर सेक्युलरिजम के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाने का आरोप लगाया। मोदी ने कहा, 'केंद्र सरकार पर जब भी कोई संकट आता है वह सेक्युलरिजम का बुर्का पहन लेते हैं और बंकर में छिप जाते हैं। कांग्रेस की पिछले 50 साल से बुर्का पहनकर बंकर में छिपने की चाल अब नहीं चलेगी। उसे बढ़ती बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई का जवाब देना होगा।'

वित्त मंत्री की उम्र तक पहुंचेगा रुपयाः मोदी ने रुपये की गिरती कीमत के लिए केंद्र सरकार के करप्शन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि आजादी के समय रुपये और डॉलर की कीमत बराबर थी। 1 रुपया एक डॉलर के बराबर था। आज रुपये की कीमत दिनोंदिन टूटती चली जा रही है। ऐसा लग रहा है कि रुपया बहुत तेजी से भारतीय वित्त मंत्री के उम्र तक पहुंच जाएगा।
पीएम अर्थशास्त्री नहीं अनर्थशास्त्रीः मोदी ने पीएम मनमोहन सिंह पर तीखे हमले किए। उन्होंने कहा, 'रुपया आज डॉलर के मुकाबले 60 पर है। यह तब है जब देश के प्रधानमंत्री अर्थशास्त्र के विद्धान हैं। यह कौन सा अर्थशास्त्र है? यह कांग्रेस एक ऐसी धारा है जिसमें अच्छे से अच्छा शास्त्री भी 'अनर्थशास्त्री' बन जाता है। कांग्रेस में कोई भी गया, तबाही के रास्ते पर चल पड़ता है।'

यूपीए की विदेश नीति फेलः मोदी ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर भी वार किया और कहा कि पाकिस्तान सैनिकों के सिर काटकर ले जाता है और उनके पीएम को बिरयानी खिलाई जाती है। सरबजीत को मार दिया गया और दिल्ली की सरकार ने चूं तक नहीं की। इटली के लोग केरल में मछुआरों की मार देते हैं और वह भारत के कानून को स्वीकार करने से मना कर देते हैं।

शराब कंपनियों को बेचा अनाजः मोदी ने फूड सिक्यूरिटी स्कीम पर केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल उठाए। मोदी ने कहा, 'सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा कि अन्न सड़ रहा है तो उसे गरीबों तक क्यों नहीं बांटा गया? केंद्र सरकार ने तब अन्न बांटने से इनकार कर दिया था। शराब बनाने वालों को 65 पैसे में यह अन्न बेच दिया गया। मोदी ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने शराब कंपनियों को बेचने के लिए अन्न को जानबूझकर सड़ने दिया।

ब्लैक मनी की रक्षक सरकारः मोदी ने अपने भाषण में केंद्र सरकार पर विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के लिए गंभीरता न दिखाने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि सरकार किसी खास कारण से ऐसा नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार काला धन जमा करने वाले लोगों को बचा रही है। मोदी ने कहा कि यूपीए के राज में जल, थल, नभ में भी करप्शन हुआ है।

आज शिक्षा 'मनी मेकिंग मशीन' बन गई: नरेंद्र मोदी ने इससे पहले पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज में भाषण दिया तो वह बहुत ही सावधान दिखाई दिए। उन्होंने कोशिश की कि कोई राजनीतिक बात न करें, लेकिन इशारों-इशारों में कई बार अपने विरोधियों और विपक्ष पर तीर चलाए। मोदी ने कहा, 'लोग पावर चाहते हैं जबकि मैं इम्पावरमेंट चाहता हूं।'

नरेंद्र मोदी ने सीधे-सीधे कांग्रेस सरकार के खिलाफ कुछ नहीं कहा, लेकिन उसकी नीतियों की आलोचना पूरे भाषण में करते रहे। मोदी ने कहा कि यह भारत का दुर्भाग्य है कि एक भी पड़ोसी उसका दोस्त नहीं है। सरकार की शिक्षा नीति पर निशाना साधते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाने की कोशिश नहीं की जा रही है, जो युवाओं की ताकत का इस्तेमाल कर सके। स्पोर्ट्स का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ओलिंपिक गेम्स के बाद हम हर बार निराश होते हैं कि सवा अरब लोगों का देश चंद गोल्ड मेडल नहीं ला सकता, लेकिन शिक्षा को खेलों से जोड़ने की कोई कोशिश नहीं हो रही। मोदी ने कहा, 'अगर सैनिकों को अच्छे से ट्रेनिंग दी जाए तो पांच सात मेडल तो वे ही जी लाएं।'
बीजेपी कैंपेन कमिटी के अध्यक्ष और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज के युवाओं को सियासी पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा कि देश में निराशा का माहौल है, देश का युवा कुछ करना चाहता है, लेकिन उन्हें मार्गदर्शन नहीं मिल रहा है। मोदी ने कहा, "ये युवा न सिर्फ भारत को बल्कि पूरी दुनिया को निराशा के माहौल से बाहर निकालेंगे। भारत में गजब की ताकत है। यह देश 1,200 साल की गुलामी के बाद भी जिंदा है। सीना तानकर खड़ा है। विश्वविद्यालयी शिक्षा के 2,600 साल के इतिहास में भारत 1,800 साल तक दुनिया का सरताज रहा। सिर्फ गुलामी के 800 सालों में इसका नाश हुआ। पूरी दुनिया से लोग यहां पढ़ने आते थे।" नरेंद्र मोदी ने यहां 'युवा, समाज, आर्थिक स्थिति व वर्तमान राजनीति' विषय पर लेक्चर दिया। गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में मोदी के भाषण को लेकर खूब चर्चा हुई थी।
अपने भाषण की शुरुआत में मोदी ने कहा कि इस जगह से (पुणे से) महान नेताओं को संदेश मिला है। उन्होंने कहा, 'यह सावरकर की धरती है, तिलक की धरती है। फर्ग्युसन कॉलेज में लेक्चर देने की तिथि तय हुई तो मैंने एक प्रयोग किया। मैंने सोशल मीडिया पर नौजवानों से पूछा कि मुझे फर्ग्युसन कॉलेज में क्या कहना चाहिए। करीब 2,500 नौजवानों ने मुझे सलाह दी। मैं बस उन्हीं की सलाह को आपको सामने रख रहा हूं। मैं सिर्फ माध्यम हूं, ये विचार कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के 2,500 नौजवानों के हैं।'

उन्होंने कहा कि जो लोग यह सोचते हैं कि नौजवान सिर्फ जीन्स पहनते हैं और बाल बढ़ाते हैं, वे भ्रम में हैं। नौजवान सोचते हैं। देश के बारे में सोचते हैं। कुछ करना चाहते हैं। उनमें उमंग है। सामर्थ्य है। यह सब देख कर लगता है कि देश का भविष्य कभी भी अंधकारमय नहीं हो सकता है।

मोदी ने वहां मौजूद 5,000 छात्रों से कहा कि विश्व की समस्याओं के समाधान के लिए भी यह युवा शक्ति काम आ सकती है, बस कोई काम करवाने वाला शख्स चाहिए। मोदी ने कहा कि पूरे देश में निराशा का भाव है लेकिन मैं निराशा की बात नहीं करता। मुझे उम्मीदें दिखती हैं। नौजवानों का उमंग देखकर मैं उत्साहित हूं। मैं व्यवस्था बदलने में विश्वास रखता हूं।
भारत में पहले गुरुकुल शिक्षा की व्यवस्था थी। मोदी ने कहा कि हमारी गुरुकुल की शिक्षा परंपरा और अमेरिका की आधुनिक शिक्षा पद्धति की तुलना की जाए तो हमें पता चलेगा कि दोनों कुछ हद तक समान हैं। दोनों में लोगों को दिशा देने का काम होता है। हमें उस गुरुकुल व्यवस्था को आधुनिक पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था से तुलना करने की जरूरत है। हमें गुरुकुल से विश्वकुल तक का सफर पूरा करना है। हमने उपनिषद से उपग्रह की यात्रा की है। दुनिया में पहला दीक्षांत समारोह भारत में हुआ था। तैतरीय उपनिषद में इसका विवरण मिलता है।

नरेंद्र मोदी ने पश्चिमीकरण पर भी अफसोस जाहिर किया। उन्होंने कहा, 'दुर्भाग्य की बात है कि हम अपनी व्यवस्था को छोड़कर पश्चिमी व्यवस्था की नकल करने लगे हैं। पहले शिक्षा 'मैन मेकिंग मशीन' थी, लेकिन अब यह 'मनी मेकिंग मशीन' बन गई है। यह सब पश्चिम की नकल का परिणाम है। लेकिन, स्थितियां बदली जा सकती है। बस विजन की जरूरत है। मुझे उम्मीद है कि यह स्थिति जरूर बदली जाएगी।'

गुजरात के मुख्यमंत्री ने कहा कि अब पश्चिम का वक्त चला गया है, पूर्व का वक्त आया है और बस बहस इस बात की है कि अगला नेतृत्व चीन करेगा या भारत। मोदी ने कहा कि चीन बहुत आगे बढ़ गया है और हमें उससे सबक लेने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि आज भी जब हम बेहतरीन शिक्षण संस्थानों की चर्चा करते हैं तो उनमें फर्ग्युसन कॉलेज, शांति निकेतन, बीएचयू जैसे संस्थान की चर्चा होती है। इनकी स्थापना में समाज का योगदान था, किसी सरकार का नहीं। शिक्षा हमेशा से समाज का काम रहा है। वह अपनी जरूरत के हिसाब से शिक्षा की व्यवस्था करता था। मोदी ने केरल और श्री नारायण गुरु की तारीफ की। उन्होंने कहा, 'आज केरल में शिक्षा के क्षेत्र में सबसे आगे है। वहां गांव-गांव तक शिक्षा फैल चुकी है। यह सरकार के बल पर नहीं। इसमें श्री नारायण गुरु का बड़ा योगदान रहा है। वह पिछड़ी जाति में पैदा हुए थे, लेकिन उन्होंने हर किसी को शिक्षित करने का प्रण लिया था। आज परिणाम आपके सामने है।'

गरीबी हटाने में कांग्रेस विफल - नरेंद्र मोदी



भारत अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपना सम्मान खो दिया
14, Jul, 2013, Sunday

गरीबी हटाने में कांग्रेस विफल
  पुणे !   गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कांग्रेस पर गरीबी दूर करने का वादा पूरा नहीं कर देश के लोगों को धोखा देने का आरोप लगाया। 1970 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था।
इंदिरा गांधी के 1971 के चुनाव में दिए गए नारे 'गरीबी हटाओ' और बाद में उनके बेटे व पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा इसका इस्तेमाल किए जाने की ओर इशारा करते हुए मोदी ने कहा, "35 वर्ष पहले उन्होंने गरीबी उन्मूलन का वादा किया था। कोई उनसे पूछे कि उस वादे का क्या हुआ?"
भाजपा कार्यकर्ताओं को यहां संबोधित करते हुए मोदी ने कहा, "क्या यह धोखा नहीं है? भारत के गरीब उनकी मत पेटियां भरते रहे, और अब उन्होंने खुले तौर पर मान लिया है कि वे गरीबी नहीं हटा सकते।"
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की चुनाव प्रचार समिति के मुखिया मोदी ने केंद्र की कांग्रेस नीत सरकार के खाद्य सुरक्षा अध्यादेश पर भी निशाना साधा।
इससे पहले फग्र्यूसन कॉलेज में मोदी ने पुणे के सांसद सुरेश कलमाड़ी को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जिस तरह से राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हुआ, उससे भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपना सम्मान खो दिया है।
उन्होंने कहा, "दक्षिण कोरिया जैसा छोटा-सा देश ओलंपिक का आयोजन करता है और अंतर्राष्ट्रीय सराहना का पात्र बनता है। लेकिन हम राष्ट्रमंडल खेलों के जैसा छोटा-सा आयोजन कर खुद को मजाक का पात्र बना लेते हैं।"
मोदी ने शिक्षा के महत्व पर भी जोर दिया, लेकिन कहा कि भारत को आधुनिकीकरण की जरूरत है, पश्चिमीकरण की नहीं।
उन्होंने कहा, "हमें अपनी शिक्षण पद्धति में आधुनिकीकरण की दरकार है, पश्चिमीकरण की नहीं। मैं आधुनिक शिक्षा का समर्थन करता हूं, लेकिन पश्चिम के अंधानुकरण का नहीं।"
मोदी ने कहा कि सरकार को उच्च शिक्षा पर और खर्च करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा, "चीन ने अपने जीडीपी का 20 प्रतिशत शिक्षा को आवंटित किया है और इसके मुकाबले भारत ने महज चार प्रतिशत आवंटित किया है। हमें आज जीडीपी का 25 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की जरूरत है।"
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नरेंद्र मोदी के भाषण में अटल-कलाम की झलक 
Written by: Naveen Nigam / Monday, July 15, 2013,
[नवीन निगम] आप से यदि पूछा जाए कि एनडीए के शासनकाल में दो ऐसे लोगों का नाम लीजिए जो अपने पद से भी आगे निकल गए हो तो आपका एक ही जवाब होगा। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम। इसे इत्‍तेफाक कहें या कुछ और। गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में इन्‍हीं दोनों की झलक दिखाई देती है। नरेंद्र मोदी जब आज पुणे के फार्ग्‍युसन कॉलेज के छात्र-छात्राओं को संबोधित कर रहे थे तो आपने उनके अंदाज में कलाम वाली छवि और विचार नहीं देखे। भाषण में मोदी, अटल को और बातों में कलाम को फॉलो करते दिखाई पड़े। युवा शक्ति में देश को आगे बढऩे की ताकत हैं, खोज की बातें, विकसित देश बनाने का सपना। भाषण में अटल की तरह लोगों को मंत्रमुग्ध करना जैसे कोई राजनेता नहीं, कोई संत बोल रहा हो। ज्ञात हो कि कलाम और अटल ने 2002 के दंगों के समय मोदी को मुख्यमंत्री पद से हटाने का विचार तक किया था और आज उन्ही दो महापुरुषों के गुणों को मोदी अपने अंदर समेट रहे हैं। मोदी को मालूम है कि देश का युवा निराश है और वह आगे बढऩा चाहता है। बातों का असर कितना होता है यह मैं एक उदाहरण से देना चाहता हूं। मेरे एक मित्र हैं। मुसलमान हैं इसलिए मोदी को पसंद नहीं करते। एक दिन बातों ही बातों में मुझसे बोले ...निगम, सत्य तो यह है कि हमको सभी राजनीतिक दलों ने ठगा है। हम भाजपा के खिलाफ जीतने वाले को वोट देते रहते हैं, तुम लोग अच्छे हो किसी से डरकर तो वोट नहीं देते हो। मैंने उन्हें समझाने के अंदाज से कहा यह तो ठीक है लेकिन इसमें आपकी क्या गलती है। उन्होंने कहा ...तुम कुछ भी सोचो, लेकिन मोदी में कोई बात तो है, जो गुजरात इतना आगे निकल गया। मैं आश्चर्य में था, वह कहने लगे, अभी थोड़े दिनों पहले भाई के पास बडौदा गया था, वहां की सड़के देखी, दिल खुश हो गया। युसुफ से बात की तो पता चला कि उसकी फैक्टरी में उत्पादन तीन गुना हो गया है। अभी नई गाड़ी खरीदी है और दूसरी फैक्टरी भी डाल रहा है। इस उदाहरण को लोग मोदी की तारीफ में न ले, यह केवल एक वाक्या था, हो सकता है कि युसुफ दिमागदार हों और अपनी मेहनत से आगे आए हों, लेकिन मित्र की बात सुनकर मैं हैरत में तो था कि मोदी के बारे में कोई मुसलमानों की मानसिकता अब बदल रही है|
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धर्मनिरपेक्षता के बुर्के में छिप जाती है कांग्रेस: मोदी
नई दिल्ली, लाइव हिन्दुस्तान 15-07-13
दो दिन पहले ही पिल्ले और हिंदू राष्ट्रवादी के बयान को लेकर कांग्रेस के निशाने पर आए नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर यूपीए सरकार पर पलटवार करते हुए कहा कि मैं दिल्ली की सल्तनत का आह्वान करता हूं कि वह मेरा मुकाबला करे।पुणे के फर्गुसन कॉलेज में छात्रों को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि यूपीए सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक लाई है और ऐसे दावा कर रही है, मानो पहले से ही हर किसी की थाली में भोजन पहुंच गया हो। उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स पर कहा कि इससे दुनियाभर में देश की प्रतिष्ठा को तगड़ा झटका लगा है।
राजीव गांधी का नाम लिए बगैर मोदी ने कहा कि हमारे कान भारत को 21वीं सदी में ले जाने की बात सुन-सुनकर पक गए हैं, लेकिन क्या किसी के पास इसकी कोई रुपरेखा है? यूपीए की विदेश नीति पर मोदी ने कहा कि आज हालात ऐसे हैं कि कोई भी पड़ोसी देश भारत का मित्र नहीं है। हालांकि मोदी ने भाषण शुरू करते ही कहा था कि वे राजनीति पर कोई बात नहीं करेंगे। उन्होंने पिल्ले व हिंदू राष्ट्रवादी के बयान पर टिप्पणी से भी मना कर दिया।
मोदी ने बताया कि मैंने सोशल मीडिया पर पूछा था कि कॉलेज में मुझे किस मुद्दे पर बात करनी चाहिए। करीब 2,500 नौजवानों ने अपने सुझाव भेजे। जो लोग यह सोचते हैं कि युवा सिर्फ जींस पहनते हैं और बाल बढ़ाते हैं, वे भ्रम में हैं। हमारे युवा भी देश के बारे में सोचते हैं और कुछ करना चाहते हैं।
भाजपा में अपनी प्रोन्नति के बाद चुनावी मूड़ में आते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अर्थव्यवस्था में गिरावट, रुपये के अवमूल्यन को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर रविवार को करारा प्रहार किया और कांग्रेस पर अपनी विफलताओं पर पर्दा डालने के लिए धर्मनिरपेक्षता के बुर्के के पीछे छिपने का आरोप लगाया।
गुजरात के मुख्यमंत्री ने गरीबी हटाने के अपने वादे पर विफल रहने पर एवं (गरीबों को) खाद्य सुरक्षा कानून वाला महज एक कागज का टुकड़ा सौंपने को लेकर कांग्रेस की कड़ी आलोचना की। मोदी ने यह कहते हुए प्रधानमंत्री पर निशाना साधा कि सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्रियों में शुमार होने के बाद भी वह विनाश के मार्ग पर चल रहे हैं।
उन्होंने कहा कि रुपए का अवमूल्यन हो रहा है, क्योंकि जो लोग दिल्ली में बैठे हैं वे रुपए लूटने और खाने में व्यस्त हैं। कांग्रेस एक ऐसी धारा है जहां श्रेष्ठ अर्थशास्त्री भी विनाश के पथ पर चलने लगता है।
कांग्रेस में राहुल गांधी को अहम स्थान देने पर पार्टी पर निशाना साधते हुए मोदी ने कहा कि कांग्रेस की वंशवादी राजनीति देश के समक्ष खड़ी समस्याओं की जड़ है। वंशवाद ने जनाकांक्षाओं को कुचला है। कांग्रेस ने लोगों को हल्के में लिया है। राहुल का नाम लिए बगैर उन्होंने उन पर कटाक्ष किया, कांग्रेस साहबजादे गरीब लोगों के घर जाते हैं और जो कभी महल थे, उनके भग्नावशेष को दिखाने के लिए मीडिया को बुलाते हैं और कहते हैं देखिए यह हमारे पूर्वजों ने क्या कर रखा है।
गुजरात दंगे को लेकर अपनी सरकार पर बचाव करने पर विरोधियों के निशाने पर आए मोदी ने कहा कि जरा गौर से देखिए। जब भी कांग्रेस चुनौतियों से घिरी होती है, चाहे वह भ्रष्टाचार हो, महंगाई हो, उच्चतम न्यायालय के निर्देश हों, किसी मंत्री का जेल जाना हो, लड़कियों से बलात्कार हो या असुरक्षा का माहौल हो, वह लोगों के सवालों का जवाब नहीं देती। उन्होंने कहा कि जब भी संकट पैदा होता है, वे धर्मनिरपेक्षता का बुर्का पहन लेते हैं और बंकर में छुप जाते हैं। भाजपा ने अक्सर कांग्रेस पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण एवं वोटबैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया है।
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कांग्रेस छिप जाती है धर्मनिरपेक्षता के ‘बुर्के’ में: नरेन्द्र मोदी
Monday, 15 July 2013
पुणे। भाजपा में अपनी प्रोन्नति के बाद चुनावी मूड में आते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अर्थव्यवस्था में गिरावट, रुपए के अवमूल्यन को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर रविवार को करारा हमला किया। कांग्रेस पर अपनी विफलताओं पर पर्दा डालने के लिए धर्मनिरपेक्षता के बुर्के के पीछे छिपने का आरोप लगाया। गुजरात के मुख्यमंत्री ने गरीबी हटाने के अपने वादे पर नाकाम रहने पर व गरीबों को खाद्य सुरक्षा कानून वाला महज एक कागज का टुकड़ा सौंपने को लेकर कांग्रेस की कड़ी आलोचना की। यहां एक जनसभा में मोदी ने यह कहते हुए प्रधानमंत्री पर निशाना साधा कि सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्रियों में शुमार होने के बाद भी वे विनाश के मार्ग पर चल रहे हैं।
उन्होंने कहा-रुपए का अवमूल्यन हो रहा है क्योंकि जो लोग दिल्ली में बैठे हैं वे रुपए लूटने और खाने में व्यस्त हैं। कांग्रेस एक ऐसी धारा है जहां श्रेष्ठ अर्थशास्त्री भी विनाश के पथ पर चलने लगता है। मोदी ने कहा कि कांग्रेस इस बात पर जोर देकर अपना यह नाटक कर रही है कि इस समय लोग गरीबी या भ्रष्टाचार या महंगाई की बात नहीं करें क्योंकि धर्मनिरपेक्षता खतरे में है। कांग्रेस ने ऐसा दशकों तक किया है। सरकार ने सौ दिनों के अंदर महंगाई नीचे लाने का वादा किया था लेकिन दाम बढ़ते ही गए।
उन्होंने कहा-लेकिन एक बार भी किसी कांग्रेस नेता या कांग्रेस अध्यक्ष या प्रधानंत्री ने यह नहीं कहा कि हम महंगाई नीचे लाने का प्रयास कर रहे हैं, कि हम सफल नहीं हुए लेकिन इस दिशा में काम कर रहे हैं? वर्तमान शासन नीतिगत पंगुता का शिकार है जिससे सभी मोर्चों पर उसकी विफलता परिलक्षित होती है। देश में बिजली संयंत्र बंद कर दिए गए क्योंकि कोयले की आपूर्ति नहीं है। प्रधानमंत्री फाइल लेकर बैठे हैं और कोई फैसला नहीं किया जा रहा। देश अंधेरे में है। मोदी ने कहा कि विदेशों में छिपाकर रखे गए काले धन को वापस लाने में सरकार की निष्क्रियता से यह संदेह पैदा होता है कि वह कुछ लोग और उनके धन को बचाने की कोशिश में है।
मोदी ने 80 साल के सिंह का जिक्र करते हुए कहा-जब देश आजाद हुआ था तब रुपए डालर के बराबर था। अब रुपए का अवमूल्यन हो रहा है और ऐसा लगता है कि मानो यह प्रधानमंत्री की उम्र तक पहुंच जाएगा। हाल के दिनों में रुपया अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया और एक डालर 61 रुपए के बराबर हो गया। उन्होंने कहा कि जब तक हम कांग्रेस मुक्त भारत का निर्माण नहीं करते, देश समस्याओं से मुक्त नहीं होगा। वैश्विक मंदी के बाद भी पाकिस्तान व बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों की मुद्राओं का अवमूल्यन नहीं हुआ।
खाद्य सुरक्षा अध्यादेश लाने की हड़बड़ी पर सरकार पर हमला करते हुए मोदी ने कहा-लोगों को दो जून की रोटी भी नहीं मिलती है। ऐसे में उसने एक कानून लाया और लोगों के हाथों में एक कागज का टुकड़ा थमा दिया कि उन्हें भोजन अधिकार के रूप में मिलेगा जबकि उन्होंने इस बात पर तनिक भी विचार नहीं किया कि गरीबों को भोजन देना संभव है या नहीं। कांग्रेस खाद्य विधेयक पर ऐसे दावा कर रही मानो भोजन लोगों की थालियों में पहले ही पहुंच गया हो। बेशर्म कांग्रेस पार्टी पिछले 35 साल में किए गरीबी हटाओ वादे से मुकर गई। उन्होंने नारा दिया और गरीबों ने इस आस में उसके पक्ष में मतदान किया कि उनके दिन भी बहुरेंगे। कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के नाम पर लोगों की आकांक्षाओं को कुचल नहीं सकती।
मोदी ने रुपए के अवमूल्यन, महंगाई और बुनियादी ढांचा विकास जैसे मुद्दों पर कांग्रेस को अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली राजग सरकार की उपलब्धियों और यूपीए की उपलब्धियों पर बहस की चुनौती दी। उन्होंने कहा-यह सरकार इतनी अहंकारी है कि यह लोगों के समक्ष सिर झुकाकर नहीं कह सकती कि वह मुद्रास्फीति पर काबू नहीं पा सकती। निर्वाचित सरकार लोगों के प्रति जवाबदेह क्यों नहीं है?
मोदी ने केंद्र पर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को घेरने के लिए सीबीआइ के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया। मोदी ने कहा-यह पुणे ही था जहां से लोकमान्य तिलक ने ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी थी। उन्होंने ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ का मंत्र दिया था। अब आजादी के 60 साल बाद भी सुराज (सुशासन) मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, का नारा पुणे से दिया जाना चाहिए। उन्होंने यहां फर्गुसन कॉलेज में छात्रों व शिक्षकों से कहा-दो देशों ने दो खेलों की मेजबानी की। दक्षिण कोरिया ने ओलंपिक की मेजबानी की जबकि भारत ने राष्ट्रमंडल खेल की मेजबानी की। कोरिया ने ओलंपिक के माध्यम से अपने लिए सम्मान लाया जबकि 120 करोड़ जनता वाले हमारे देश ने दुनिया की नजर में अपना सम्मान खो दिया। एक देश वैश्विक बिरादरी में अपने लिए प्रतिष्ठा पाने के लिए खेल का इस्तेमाल करता है जबकि दूसरा अपने लिए बदनामी लाता है।
गुजरात के मुख्यमंत्री ने 2002 के गुजरात दंगे से निबटने के तौर-तरीकों का बचाव करने व अपने ‘कुत्ते के बच्चे’ व ‘मैं हिंदू राष्ट्रवादी हूं’ संबंधी बयानों को लेकर विरोधियों की आलोचना का जवाब नहीं दिया। बढ़ते साइबर अपराधों का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा कि उनकी सरकार ने गुजरात में दुनिया के पहले अपराध विज्ञान विश्वविद्यालय की स्थापना की।
उन्होंने कहा-अब कांग्रेस कहेगी कि इसमें नया क्या है? आप जरा विचार कीजिए, मैं महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में अपराध विज्ञान में चल रहे पाठ्यक्रम की बात नहीं कर रहा। मैं अपराध विज्ञान विश्वविद्यालय की बात कर रहा हूं जो दुनिया में अपनी तरह का पहला विश्वविद्यालय है। राजीव गांधी का नाम लिए बगैर मोदी ने 21वीं सदी में नए भारत का निर्माण करने संबंधी दिवंगत कांग्रेस प्रधानमंत्री का हवाला दिया। उन्होंने कहा-हमारे कान 21वीं सदी के बारे में सुन-सुनकर पक गए हैं। क्या किसी के पास इस बात का विजन है कि कैसे भारत को 21वीं सदी में ले जाया जाए। उन्होंने यूपीए सरकार में चल रही कूटनीति पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा-मैं चकित हूं कि पड़ोस में भी हमारा कोई दोस्त नहीं बचा। रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ाने की चर्चा करते हुए मोदी ने कहा-देश पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर जितना खर्च करता है, उससे कहीं ज्यादा वह रक्षा उपकरणों व हथियारों के आयात पर खर्च करता है। क्या हमारे पास ऐसे इंजीनियर नहीं है जो ऐसे उपकरण तैयार करें। मैं आपको बताता हूं हमारे इंजीनियंरिंग कॉलेजों में रक्षा इंजीनियरिंग नामक विषय ही नहीं है। मोदी ने पश्चिमीकरण किए बगैर भारत को आधुनिक बनाने का आह्वान किया।
अपने भाषण में शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में गुजरात सरकार की उपलब्धियों का बखान करते हुए मोदी ने कहा-राष्ट्र निर्माण के लिए मेधा को सींचने की जरूरत है। शिक्षा राष्ट्र के विकास में अहम भूमिका निभाती है। अगर हम एक अच्छी शिक्षा व्यवस्था चाहते हैं तो हमें अच्छे शिक्षक बनाने होंगे लेकिन अच्छे शिक्षकों का निर्माण अभी प्राथमिकता नहीं है।

रविवार, 14 जुलाई 2013

देश को चीन से सीख लेनी चाहिए - नरेंद्र मोदी



देश में निराशा का माहौल,

चीन से लेना होगा सबक: मोदी

आईबीएन-7 | Jul 14, 2013
क्या कहा मोदी ने?
पुणे में  मोदी फर्ग्युसन कॉलेज के छात्र-छात्राओं को संबोधित किया।
मोदी ने अपने भाषण में कहा कि हम देश के सबसे युवा देश हैं। इस देश का भविष्य उज्जवल है। मोदी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि देश में निराशा का माहौल है। लेकिन युवा देश के लिए काम कर सकते हैं। देश में युवाशक्ति के इस्तेमाल की जरूरत है। अगर हम अपनी पद्धति अपनाते तो आगे होते। हमारी परंपरा और शिक्षा महान है।
मोदी ने कहा कि आजादी की आकांक्षाएं पूरी नहीं हुई है। देश को चीन से सीख लेनी चाहिए। आज भी काफी कुछ बदला जा सकता है। देश में ताकत है सिर्फ दिशा चाहिए। युवाओं को दिशा देने वाला चाहिए। हमें आधुनिकता चाहिए, पश्चिमीकरण नहीं। हमारे देश में रिसर्च डेटा का सही इस्मेमाल नहीं हो रहा है। शोध पर ध्यान देने की जरुरत है।
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आज शिक्षा मनी मेकिंग मशीन बन गई: मोदी

नवभारतटाइम्स.कॉम | Jul 14, 2013
पुणे।। बीजेपी कैंपेन कमिटी के अध्यक्ष और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को पुणे के फर्ग्युशन कॉलेज के युवाओं को सियासी पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा कि देश में निराशा का माहौल है। देश का युवा कुछ करना चाहता है, लेकिन उन्हें मार्गदर्शन नहीं मिल रहा है। ये युवा न सिर्फ भारत को बल्कि पूरी दुनिया को निराशा के माहौल से बाहर निकालेंगे। मोदी ने कहा कि भारत में जगब की ताकत है। यह देश 1,200 साल की गुलामी के बाद भी जिंदा है। सीना तानकर खड़ा है। विश्वविद्यालयी शिक्षा के 2,600 साल के इतिहास में भारत 1,800 साल तक दुनिया का सरताज रहा। सिर्फ गुलामी के 800 सालों में इसका नाश हुआ। पूरी दुनिया से लोग यहां पढ़ने आते थे। नरेंद्र मोदी ने यहां 'युवा, समाज, आर्थिक स्थिति व वर्तमान राजनीति विषय' पर लेक्चर दिया। गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में मोदी के भाषण को लेकर खूब चर्चा हुई थी।

अपने भाषण के शुरुआत में मोदी ने कहा कि इस जगह से (पुणे से) महान नेताओं को संदेश मिला है। यह सावरकर की धरती है, तिलक की धरती है। मोदी ने कहा कि जैसे ही फर्ग्युशन कॉलेज में लेक्चर देने की तिथि तय हुई, मैंने एक प्रयोग किया। मैंने सोशल मीडिया पर नौजवानों से पूछा कि मुझे फर्ग्युशन कॉलेज में क्या कहना चाहिए? करीब 2,500 नौजवानों ने मुझे सलाह दी। मैं बस उन्हीं की सलाह को आपको सामने रख रहा हूं। मैं सिर्फ माध्यम हूं, ये विचार कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के 2,500 नौजवानों के हैं। मैं उन नौजवानों का आभार व्यक्त करता हूं। उन्होंने कहा कि जो लोग यह सोचते हैं कि नौजवान सिर्फ जिन्स पहनते हैं, तो वे भ्रम हैं। नौजवान सोचते हैं। देश के बारे में सोचते हैं। कुछ करना चाहते हैं। उनमें उमंग है। सामर्थ्य है। कुछ करने का सामर्थ्य है। यह सब देख कर लगता है कि देश का भविष्य कभी भी अंधकारमय नहीं हो सकता है।
मोदी ने वहां मौजूद 5,000 छात्रों से कहा कि विश्व की समस्याओं के समाधान के लिए भी यह युवा शक्ति काम आ सकती है। बशर्ते कोई काम करवाने वाला शख्स चाहिए। पूरे देश में निराशा का भाव है। मैं निराशा की बात नहीं करता। मुझे उम्मीदें दिखती हैं। नौजवानों का उमंग देखकर मैं उत्साहित हूं। मैं व्यवस्था बदलने में विश्वास रखता हूं।
नरेंद्र मोदी ने कहा कि हमारे देश में शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। पूरी दुनिया में विश्वविद्यालयी शिक्षा का 2,600 साल का इतिहास है। इसमें से 1,800 साल तक शिक्षा के क्षेत्र में हमने राज किया है। सिर्फ गुलामी के 800 साल में यह व्यवस्था कमजोर हुई।

भारत में पहले गुरुकुल शिक्षा की व्यवस्था थी। हमें उस गुरुकुल व्यवस्था को आधुनिक पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था से तुलना करने की जरूरत है। गुरुकुल की व्यवस्था बेहतर थी। हमें गुरुकुल से विश्वकुल तक का सफर पूरा करना है। हमने उपनिषद से उपग्रह की यात्रा की है। दुनिया में पहला दीक्षांत समारोह भारत में हुआ था। तैतरीय उपनिषद में इसका विवरण मिलता है।

लेकिन, दुर्भाग्य की बात है कि हम अपनी व्यवस्था को छोड़कर पश्चिमी व्यवस्था का नकल करने लगे हैं। पहले शिक्षा 'मैन मेकिंग मशीन' थी, लेकिन अब यह 'मनी मेकिंग मशीन' बन गई है। यह सब पश्चिम के नकल का परिणाम है। लेकिन, स्थितियां बदली जा सकती है। बस विजन की जरूरत है। मुझे उम्मीद है कि यह स्थिति जरूर बदली जाएगी। अब पश्चिम का वक्त चला गया है। पूर्व का वक्त आया है। बस बहस इस बात की है कि अगला नेतृत्व चीन करेगा या भारत।
उन्होंने कहा कि आज भी जब हम बेहतरीन शिक्षण संस्थान की चर्चा करते हैं तो उनमें फर्ग्युशन कॉलेज, शांति निकेतन, बीएचयू जैसे संस्थान की चर्चा होती है। इनकी स्थापना में समजा योगदान का था, किसी सरकार का नहीं। शिक्षा हमेशा से समाज का काम रहा है। वह अपनी जरूरत के हिसाब से शिक्षा की व्यवस्था करता था। आज केरल में शिक्षा के क्षेत्र में सबसे आगे है। वहां गांव-गांव तक शिक्षा फैल चुका है। यह सरकार के बल पर नहीं। इसमें श्री नारायण गुरु का बड़ा योगदान रहा है। वह पिछड़ी जाति में पैदा हुए थे, लेकिन उन्होंने हर किसी को शिक्षित करने का प्रण लिया था। आज परिणाम आज आपके सामने है।
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मोदी ने कहा, देश को युवाओं की जरूरत,आधुनिकता चाहिए पर पश्चिमीकरण नहीं

आज तक ब्‍यूरो [Edited By: कुलदीप मिश्र] | पुणे, 14 जुलाई 2013 |
पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज में अपने संबोधन के दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने मौजूदा शिक्षा प्रणाली पर सवाल खड़े किए. उन्होंने 'आधुनिकता चाहिए, पश्चिमीकरण नहीं' का मंत्र दिया और कहा कि अगर हम अपनी शिक्षा पद्धति अपनाते तो आज कहीं आगे होते.
नरेंद्र मोदी ने कहा कि सावरकर और सीवी रमन के कॉलेज की रज को माथे से लगाने की तमन्ना उन्हें पहले से थी. सावरकर के कमरे में उन्होंने देश के लिए कुछ करने की ताकत महसूस की. यहां बोलना उनके लिए सौभाग्य की बात है.

गुजरात के मुख्यमंत्री ने मौजूदा शिक्षा व्यवस्था पर जमकर कटाक्ष किए. उन्होंने कहा कि शिक्षा पहले 'मैन मेकिंग मशीन' थी, अब 'मनी मेकिंग मशीन' हो गई है. मोदी ने कहा कि वह सावरकर की 'पवित्र भूमि' से कोई सियासी टिप्पणी नहीं करना चाहते, लेकिन टिप्पणियां तो उन्होंने खूब कीं, हालांकि किसी पार्टी का नाम नहीं लिया. उन्होंने कहा कि देश के शीर्ष संस्थानों की स्थापना में हमारे महापुरुषों का योगदान है, शासन-व्यवस्था का नहीं. 1835 के एक गजेट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि उस समय बंगाल में 100 फीसदी साक्षरता थी. लेकिन खराब नीतियों की वजह से साक्षरता घटती गई.

लगे हाथ वह केरल की साक्षरता का श्रेय कांग्रेस से छीनने से भी नहीं चूके. उन्होंने कहा कि केरल देश में सबसे ज्यादा साक्षरता वाला राज्य है तो इसमें शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि शिवगिरि मठ के नारायण गुरु स्वामी का योगदान है. जिन्होंने सौ साल से भी पहले राज्य में शिक्षा की बुनियादी व्यवस्था की थी.मोदी ने बताया कि सोशल साइट्स पर उन्होंने सुझाव आमंत्रित किए थे. जिसके बाद देश भर से उन्हें 2500 युवाओं के संदेश मिले हैं. उन्होंने सोशल साइट पर सक्रिय रहने वाले युवाओं और परोक्ष रूप से अपने समर्थकों का भी शुक्रिया अदा किया. उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी सिर्फ जींस पैंट पहनने और लंबे बाल रखने वाली नहीं है, वह मुद्दों पर सोचती है और बात करना चाहती है.

मोदी ने कहा कि हम विश्व के सबसे युवा देश हैं. हमारा भविष्य अंधकारमय नहीं हो सकता. हमें निराशा के माहौल से निकलना होगा. लोकमान्य तिलक का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा कि गुलामी के दौर में अंग्रेजों का ललकारने का साहस तिलक ने दिखाया था. उन्होंने कहा कि स्थिति बदली जा सकती है, पर इसके लिए विजन की जरूरत है.

शनिवार, 13 जुलाई 2013

राजनीति से अपराधियों का सफाया



आलेख दैनिक भास्कर में १ ३ जुलाई २ ० १ ३ के अंक में प्रकाशित हुआ है ...............
अभी तो हाल यह है कि सांसद व विधायक जेल में रहते हुए वोट देने जाते हैं और उम्मीदवारी का पर्चा भरकर चुनाव भी जीत जाते हैं 
राजनीति से अपराधियों का सफाया
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
http://epaper.bhaskar.com/jaipur/14/13072013/0/1/
राजनीति से अपराधियों की सफाई करने में सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला काफी मददगार सिद्ध होगा। अब तक कानून इतना अधिक ढीला-ढाला था कि अदालतों में अपराध सिद्ध हो जाने और सजा की घोषणा हो जाने के बावजूद हमारे सांसदों और विधायकों का बाल भी बांका नहीं होता था। न तो वे जेल जाते थे और न ही उनकी सदस्यता छिनती थी, क्योंकि वे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुसार तीन माह के अंदर उस फैसले के विरुद्ध ऊंची अदालत में अपील कर देते थे। अपील तो अपील होती है। द्रौपदी के चीर से भी लंबी! उस पर फैसला आए, उसके पहले ही अगला चुनाव आ जाता है। यानी आप रिंद के रिंद रहे और हाथ से जन्नत भी न गई।

सर्वोच्च न्यायालय ने अब जो फैसला दिया है, उसके अनुसार ज्यों ही किसी सांसद या विधायक के विरुद्ध दो साल से अधिक की सजा का फैसला आया नहीं कि उसकी सदस्यता तत्काल समाप्त हो जाएगी। वह चुनाव लडऩे लायक भी नहीं रहेगा और जब तक सजा भुगतेगा, वोट देने लायक भी नहीं रहेगा। अभी तो हाल यह है कि सांसद और विधायक महोदय जेल में रहते हुए ही वोट देने भी जाते हैं और अपनी उम्मीदवारी का पर्चा भी भरते हैं। अनेक स्वनामधन्य नेताओं ने जेल में रहते हुए ही चुनाव भी जीते हैं।

चुनाव आयोग ने कोशिश की थी कि वह अपराधी पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को जरा चिह्नित करे। उसने यह प्रावधान कर दिया था कि हर उम्मीदवार पर्चा भरते समय स्पष्ट करे कि उस पर कौन-कौन से मुकदमे चल रहे हैं और उसे किन-किन मामलों में सजा हुई है। इस तरह की जानकारी सार्वजनिक करना कुछ लाभदायक जरूर सिद्ध हुआ, लेकिन हमारी राजनीति में अपराधियों का बोलबाला बना रहा। कुल 4807 सांसदों और विधायकों में से 1460 ने अपने शपथ-पत्रों में कहा है कि उन पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। उनमें से भी 688 पर गंभीर अपराधों के आरोप हैं, जिनकी सजा कम से कम पांच साल से लेकर फांसी तक है। 543 सांसदों में से 162 और 4302 विधायकों में से 1258 पर मुकदमे चल रहे हैं। इन सांसदों और विधायकों में सभी पार्टियों के नेता हैं। अनेक मंत्री भी हैं, मुख्यमंत्री भी हैं। झारखंड, बिहार और उत्तरप्रदेश आगे-आगे हैं और देश के लगभग सभी प्रदेश उनके पीछे-पीछे हैं। सिर्फ मणिपुर ही ऐसा है, जिसके किसी भी विधायक पर कोई मुकदमा नहीं चल रहा है।

यह अनुसंधान का विषय है कि मणिपुर को यह बीमारी क्यों नहीं लगी? बाकी सब राज्यों में यह बीमारी क्यों फैलती जा रही है, यह सबको पता है। सभी राजनीतिक दल जान-बूझकर मक्खियां निगलते हैं। वे अपने अपराधी नेताओं की नस-नस से वाकिफ होते हैं लेकिन उन्हें फिर भी टिकट दे देते हैं। क्यों? सिर्फ इसलिए कि उनमें चुनाव जीतने की क्षमता है। आज के उम्मीदवारों की एकमात्र योग्यता यही है। शेष सारी योग्यताएं गौण हैं। सिद्धांत, विचारधारा, चरित्र, जनसेवा ये सब भूतकाल के गुण रह गए हैं। पार्टियों की अपनी छवि जनता में पतली पड़ गई है। पार्टियों का केंद्रीय नेतृत्व भी मतदाताओं को पहले की तरह अपने साथ बहाकर नहीं ले जा पाता है, इसलिए स्थानीय उम्मीदवारों के भरोसे पार्टियां चुनाव लड़ती हैं। पार्टियों को मजबूरी में अपराधियों को उम्मीदवार बनाना पड़ता है। ये बाहुबली लोग अन्य उम्मीदवारों के लिए पैसा और कार्यकर्ता भी जुटाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय अब देश की समस्त पार्टियों की मदद करेगा। इस निर्णय की वजह से अपराधी सांसदों और विधायकों की काफी हद तक तुरंत छंटाई हो जाएगी। पार्टी नेताओं को किसी बदमगजी का शिकार नहीं होना पड़ेगा। पार्टियां ऐसे लोगों को उम्मीदवार बनाने में भी सावधानी बरतेंगी जिन्हें जीतने के बाद किसी भी समय इस्तीफा देना पड़े।

लेकिन यहां यह प्रश्न किया जा सकता है कि यदि किसी सांसद को अपराधी सिद्ध होने पर सीट खाली करनी पड़े और उसके बाद वहां उपचुनाव में कोई अन्य व्यक्ति चुना जाए। और फिर यदि अपील में वही सांसद निर्दोष घोषित हो जाए तो क्या वह सीट उसे वापस मिल जाएगी या वहां तीसरी बार चुनाव करवाया जाएगा? या कोई ऐसा ्रावधान किया जाए कि जब तक उसकी अपील पर फैसला न हो जाए, वह सीट खाली ही रहे? लेकिन हमारी अदालतों की हालत देखते हुए यह फैसला भी कैसे ठीक कहा जा सकता है? अपील पर फैसला आने में चार-पांच साल भी लग सकते हैं। तो क्या वह सीट खाली ही पड़ी रहेगी? इसके अलावा आजकल केंद्र और प्रांतों की सरकारें बहुत ही अल्प बहुमत पर टिकी होती हैं। दो-चार सदस्य इधर से उधर हुए नहीं कि सरकार गई। ऐसी हालत में यह फैसला कहीं हमारे वर्तमान लोकतांत्रिक ढांचे को ही ढीला न कर दे? डर यह भी है कि अपने विरोधियों को धराशायी करने के लिए नेतागण जनता की बजाय जजों को अपना आधार न बना लें? जनाधार की बजाय कहीं जजाधार की राजनीति न चल पड़े? सत्तारूढ़ दल जजों को दबाने की पुरजोर कोशिश करें। इस फैसले के खिलाफ यह तर्क भी दिया जा रहा है कि आम नागरिक के मुकाबले नेताओं के मूलभूत अधिकार में कटौती की जा रही है। यानी उसकी अपील के पहले ही उसे अपराधी मान लिया जाएगा। इसका जवाब यही हो सकता है कि जिसकी उपलब्धि बड़ी होती है, उसका त्याग भी बड़ा होना चाहिए। नेता का आचरण अनुकरणीय होना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को उन वर्तमान सांसदों और विधायकों पर लागू नहीं किया है, जिन्होंने अभी अपीलें लगा रखी हैं। कुछ चमत्कारी परिणाम जरूर सामने आएंगे, लेकिन हम यह न भूलें कि सिर्फ अदालतों और कानून के दम पर हम राजनीति से अपराध और भ्रष्टाचार को खत्म नहीं कर सकते। हमारी अदालतों में तीन करोड़ मुकदमे पहले ही लटके हुए हैं और वे स्वयं भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हैं। अदालतों और संपूर्ण शासन व्यवस्था को स्वच्छ बनाए रखने के लिए जिस राष्ट्रीय चरित्र-निर्माण की आवश्यकता है, उसका आह्वान करने वाली शक्ति का उदय होना अभी शेष है।
राजनीतिक दल अपने अपराधी नेताओं की नस-नस से वाकिफ होते हैं, लेकिन उन्हें फिर भी टिकट दे देते हैं। सिर्फ इसलिए कि उनमें चुनाव जीतने की क्षमता है। आज के उम्मीदवार की एकमात्र योग्यता यही है।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष
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संपादकीय
न्यायिक निर्णय और सुधार
जेल या हिरासत में रहते चुनाव नहीं लड़ा जा सकेगा, पटना हाईकोर्ट के इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी है। उधर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य में जाति आधारित राजनीतिक सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया है और ऐसी रैलियों केआयोजन के आरोपी प्रमुख दलों को नोटिस जारी किया है। यह निर्विवाद है कि इन दोनों फैसलों के पीछे मंशा राजनीति को स्वच्छ बनाना है। इस लिहाज से इन्हें सुधारवादी न्यायिक हस्तक्षेप कहा जा सकता है। इसके बावजूद इन निर्णयों ने राजनीतिक समुदाय के साथ-साथ लोकतांत्रिक जनमानस में कुछ आशंकाओं को जन्म दिया है तो उसके कारणों को अवश्य समझा जाना चाहिए। सिर्फ हिरासत में रहना अगर चुनाव लडऩे में अयोग्यता बन जाता है, तो इस प्रावधान केदुरुपयोग के सचमुच गहरे अंदेशे बने रहेंगे। विचारणीय है कि इससे राजनीति अपराधियों से मुक्त होगी या इससे नामांकन के दौरान अपने विरोधियों को जेल भिजवा देने के लिए राजनीतिक षड्यंत्रों को बढ़ावा मिलेगा? इसी तरह किसी जाति या समुदाय को अपनी बैठक या सभा करने के अधिकार से कैसे वंचित किया जा सकता है, अगर इस बात के प्रमाण न हों कि उससे सामाजिक वैमनस्य या हिंसा फैलाई जा रही है? जाति-मुक्त समाज बनाना भारतीय संविधान का लक्ष्य है। इस उद्देश्य से कोई असहमति नहीं हो सकती, लेकिन क्या ऐसा न्यायिक आदेशों से संभव है? सामाजिक या राजनीतिक सुधारों में कानून और अदालतों- दोनों की भूमिका है, लेकिन उसका सीमित संदर्भ है। जिन प्रथाओं या बुराइयों की जड़ें सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं या मानसिकता में हैं, उनमें समाधान का कोई शॉर्टकट नहीं हो सकता। बल्कि कई मौकों पर तुरंत नतीजा पाने की बेसब्री या सुधार का अति-उत्साह विपरीत परिणाम देने वाले होते हैं। भारत में आधुनिक लोकतंत्र का प्रयोग छह दशक पहले गणतांत्रिक संविधान के लागू होने के साथ शुरू हुआ। इसमें अभी बहुत-सी खामियां हैं, लेकिन इसकी अपनी उपलब्धियां हैं। खामियों को दूर करने की इच्छा प्रासंगिक है। मगर इसमें यह ध्यान में रखना जरूरी है कि सुधार की प्रक्रिया जमीनी स्तर और जनता के बीच से ही शुरू हो सकती है, इसीलिए उपरोक्त दोनों फैसले स्वागतयोग्य होने के बावजूद कई आशंकाओं के जनक भी बने हैं।
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