रविवार, 7 जुलाई 2013

आतंकवाद पर कांग्रेस के दो चेहरे


इशरत जहाँ अकेली नहीं तीन और आतंकवादियों के साथ थी , जब मुठभेड़ हुई , कांग्रेस के नेता गृह मंत्री से यह क्यों नहीं पूछ रहे की इशरत के साथ जो थे वे कौन थे ? मुस्लिम आतंकवाद के खिलाफ कांग्रेस पिछले 9 0  सालों से  कायर और कमजोर ही नहीं डरपोक साबित हो रही है ....
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IB का CBI को खत : हेडली ने बताया था, इशरत जहां लश्कर की फिदायीन
NDTVIndia,

नई दिल्ली: आईबी ने फरवरी 2013 में सीबीआई को एक चिट्ठी लिखी थी। इस चिट्ठी में यह जानकारी दी गई थी कि लश्कर के आतंकी डेविड हेडली ने अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई को यह बात बताई थी कि अहमदाबाद में मुठभेड़ में मारी गई इशरत एक फिदायीन हमलावर थी।
यह चिट्ठी एनडीटीवी के हाथ लगी है। सीबीआई को लिखी इस चिट्ठी में लिखा गया था कि लश्कर-ए-तैयबा के एक कमांडर ने हेडली को इशरत के बारे में बताया था। चिट्ठी के मुताबिक, हेडली ने कहा था कि इशरत को लश्कर−ए−तैयबा ने भर्ती किया था। आईबी के मुताबिक, एफबीआई ने 25 मई 2010 को इशरत के बारे में जानकारी दी थी, लेकिन भारत में जांच एजेंसी एनआईए ने हेडली की बातों पर भरोसा नहीं किया।
एनआईए सूत्रों के मुताबिक, हेडली का इशरत से सीधे कोई संपर्क नहीं था। एनआईए ने इशरत पर तैयार अंतिम रिपोर्ट से इस बात को हटा दिया था। एनआईए सूत्रों के मुताबिक, इशरत के बारे में हेडली के बयान का कोई रिकॉर्ड नहीं है और यह सबूत के तौर पर मान्य भी नहीं है।
कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया है कि इशरत जहां के आतंकी रिश्तों को लेकर जो गैर−सरकारी सूचनाएं आ रही हैं, उससे लोगों में भ्रम फैल रहा है और यह देश की आंतरिक सुरक्षा के हित में नहीं है... गृह मंत्रालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या हेडली ने अमेरिका गई भारतीय जांच टीम से इशरत के आतंकी रिश्तों की बात कही थी।

आतंकवाद पर कांग्रेस के दो चेहरे
Wed 11 May ,2011 
http://swadesh.in
ओसामा बिन  लादेन जैसे खूंखार आतंकवादी के मारे जाने के बाद उत्तर  प्रदेश के वाराणसी शहर  में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह एक प्रेस कांफ्रेंस  में मारे गए इस खतरनाक  आतंकवादी को ‘ओसामा जी’ कहकर संबोधित करते हैं। इससे पहले अलकायदा के इस आतंकवादी को समुद्र में फेंके जाने पर दिग्विजय सिंह ने कहा था कि ‘कोई चाहे जितना बड़ा आतंकवादी हो लेकिन मरने के बाद उसका अंतिम संस्कार उसके धार्मिक रीति-रिवाज से ही करना चाहिए।’ ये कोई पहला वाकया नहीं है जब दिग्विजय सिंह ने इस तरह का बयान दिया हो, इसके पहले भी वह बटला हाउस मुठभेड़ पर सवाल खड़े कर चुके हैं। बटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादी आजमगढ़ के संजरपुर इलाके के थे। दिग्विजय सिंह को भले ही इस मुठभेड़ में मारे गए शहीद पुलिस निरीक्षक मोहन चंद शर्मा के परिवार से सहानुभूति न हो लेकिन उन्होंने आजमगढ़ के संजरपुर में इस मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों के परिजनों से मुलाकात जरूर की। इसके पहले भी दिग्विजय सिंह कभी भगवा आतंकवाद तो कभी मुंबई आतंकवादी हमले में शहीद हेमंत करकरे से टेलीफोन पर हुई बातचीत का हवाला देकर सुर्खियों में बने रहते हैं। दिग्विजय सिंह ही नहीं देश के गृहमंत्री को भी सीमा पार आतंकवाद से ज़्यादा ख़तरनाक भगवा आतंकवाद नजऱ आता है। ओसामा बिन लादेन को ‘ओसामा जी’ बोलना या फिर उसके दफनाए जाने पर सवाल खड़े करने वाले बयान से कांग्रेस भले ही किनारा करती नजर आ रही हो लेकिन ये दिग्विजय सिंह की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है और इस बात को कांग्रेस पार्टी भी बखूबी समझती है। दुनिया का सबसे दुर्दांत आतंकवादी, आतंकवाद का गढ़ बन चुके पड़ोसी मुल्क में मारा जाता है और देश की सबसे बड़ी पार्टी का एक महासचिव उसके दफनाए जाने पर सवाल खड़े करता है। दिग्विजय सिंह का ये बयान क्या आतंकवाद जैसी गंभीर समस्या पर भी ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ करने वाला नहीं है ? क्या ये अच्छा नहीं होता कि दिग्विजय सिंह ‘ओसामा जी’ बोलने या फिर उसे समुद्र में डुबोए जाने पर सवाल खड़े करने वाले बयान से कांग्रेस भले ही किनारा करती नजर आ रही हो लेकिन ये दिग्विजय सिंह या यूपीए सरकार ने इस पूरे मसले पर कड़े शब्दों में पाकिस्तान को साफ शब्दों में ये चेतावनी क्यों नहीं दी कि अब हम मुंबई हमले की साजिश में शामिल आतंकवादियों का ख़ात्मा चाहते हैं? अमेरिका में 11 सितंबर 2001 को वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमला होता है और अमेरिकी सरकार पाकिस्तान में घुसकर लादेन जैसे आतंकवादी को मारकर उसकी लाश को समुद्र में फेंक देती है। हमारे देश की सर्वोच्च अदालत संसद पर हमले के लिए अफजल गुरू को फांसी की सजा सुना देती है लेकिन सरकार इस आतंकवादी को फांसी दिए जाने की बजाय मामले को टालना ज़्यादा पसंद करती है। सरकार को ये लगता है कि अफजल गुरू को फांसी दिए जाने पर देश का मुस्लिम तबका उससे नाराज नहीं हो जाए। आतंकवाद के मसले पर कांग्रेस की तुष्टिकरण की ये नीति देश की मुस्लिम आबादी की निष्ठा पर सवाल खड़े करने वाली है। मुस्लिम समाज समेत देश का हर तबका आज ये मानता है कि आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता है और अगर कोई दोषी है तो उसे सजा ज़रूर मिलनी चाहिए। ओसामा बिन लादेन जैसा आतंकवादी जेहाद के नाम पर बेकसूर लोगों को मौत के घाट उतार रहा था और ऐसे ख़तरनाक आतंकवादी के मारे जाने पर तुष्टिकरण की राजनीति करना आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई को कमजोर करना है। इसमें कोई दो मत नहीं कि आजादी के बाद से अब तक देश की मुस्लिम आबादी एक बड़ा हिस्सा अभी भी पिछड़ेपन का शिकार है और खुद को विकास की मुख्य धारा से नहीं जोड़ सका है लेकिन सवाल ये उठता है कि इसके लिए कसूरवार कौन है? दरअसल कांग्रेस जैसी पार्टियों ने मुस्लिम आबादी को हमेशा एक वोट बैंक की तरह माना और यही वजह है कि आज भी उनकी स्थिति में कोई सुधार दिखाई नहीं देता। राष्ट्रीय विकास परिषद की कुछ बरस पहले हुई एक बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बयान दिया था कि देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला दावा होना चाहिए और उन्होंने ये माना था कि देश में मुसलमानों की स्थिति बहुत खराब है। सच्चर कमेटी और रंगनाथ आयोग की रिपोर्ट के बहाने कांग्रेस हमेशा ये जतलाने की कोशिश करती रही है कि मुस्लिम आबादी के एक बड़े हिस्से की दुर्दशा को लेकर वो चिंतित है लेकिन ये सारी चिंताए किसी चुनाव विशेष तक ही सीमित रहीं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या फिर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को ये समझने की ज़रूरत है कि देश की मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा भले ही अभी भी पिछड़ेपन का शिकार हो लेकिन आप अपने राजनीतिक फायदे के लिए उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते। यही वजह है कि अयोध्या पर अदालत के फैसले को लेकर जब मुलायम सिंह जैसे नेता ने कुछ भडक़ाऊ बयान दिए तो कई मुस्लिम उलेमाओं ने इसको लेकर उन्हें जमकर फटकार लगाई। भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी का कहना है कि अगर दिग्विजय सिंह को लादेन से इतना ही प्यार है तो वे अपने घर पर या कांग्रेस मुख्यालय पर उसकी कब्र बनवा लें और रोज़ ओसामा जी, ओसामा जी कहें। बात सिर्फ राजनीतिक बयानबाजिय़ों की ही नहीं है, दिग्विजय सिंह के ओसामा जी कहने या फिर उसके दफनाए जाने को लेकर कुछ अख़बारों के इंटरनेट संस्करणों में प्रकाशित खबरों में जिस तरह से आम जनता की प्रतिक्रियाएं आई हैं, उसे पढक़र लोगों की नाराजगी का अंदाजा लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर देश की मुस्लिम आबादी राजनीतिक तौर पर पूरी तरह जागरूक है और उसे ये समझ में आने लगा है कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी जैसे दलों ने उसका इस्तेमाल वोट बैंक के तौर पर ही किया है। वाराणसी की प्रेस कांफ्रेंस में ओसामा बिन लादेन जैसे ख़तरनाक आतंकवादी को ओसामा जी बोलकर या फिर आजमगढ़ में संदिग्ध आतंकवादियों के परिजनों से मिलकर दिग्विजय सिंह को शायद ये लग रहा होगा कि ऐसा करके वो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक को कांग्रेस पार्टी के खाते में लेकर आ जाएंगे। आज मुस्लिम समाज के लोगों की भावनाओं को समझने की जरूरत है, उन्हें पांच सौ रूपये के नोट की तरह असली या नकली की कसौटी पर नहीं देखा जाना चाहिए। कांग्रेस पार्टी अभी भी सत्तर और अस्सी के दशक के कलैंडर को ही वर्तमान मानकर चलने की भूल कर रही है जबकि हक़ीक़त में वक्त बदल चुका है। आज मुस्लिम आबादी अपना भला-बुरा समझने लगी है, यही वजह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में पिछले कुछ चुनावों के नतीजे कांग्रेस के लिए चौंकाने वाले ही रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मसलों पर अगर कांग्रेस पार्टी के नेता यूं ही राजनीति करते रहे तो न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि देश के बाकी हिस्सों में भी उसे लोगों की नाराजग़ी का सामना करना पड़ेगा। हमें अमेरिका का पिछलग्गू बनने की ज़रूरत नहीं है लेकिन इसमें कोई दो मत नहीं कि आतंकवाद के खिलाफ़ अमेरिकी नीति ज़्यादा सख्त है। अमेरिका को ये डर था कि ओसामा को दफनाए जाने के बाद वहां स्मारक बनाया जा सकता है और कट्टरपंथी ताक़तें इसका इस्तेमाल लोगों के भडक़ाने के लिए कर सकती हैं, इसीलिए ओसामा के शव को समुद्र में डाल दिया गया। आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई में हमारे नेता अमेरिका से कुछ सीख सकते हैं। आज ज़रूरत इस बात की है कि दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेसी नेता और समूची यूपीए सरकार आतंकवाद जैसे गंभीर मसलों पर राजनीति करने के बजाय एकजुट नजऱ आए ताकि आने वाले दिनों में कोई पड़ोसी मुल्क मुंबई या देश की संसद पर आतंकवादी हमला करने वालों को अपने मुल्क में पनाह देने की हिमाकत न कर सके।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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