मंगलवार, 27 अगस्त 2013

श्रीकृष्ण : विष्णुजी के आठवें अवतार





कृष्ण जन्माष्टमी / Krishna Janmashtami



कृष्ण जन्मभूमि, मथुरा
कृष्णावतार
प्रत्येक भारतीय भागवत पुराण में लिखित 'श्रीकृष्णावतार की कथा' से परिचित हैं। श्रीकृष्ण की बाल्याकाल की शरारतें जैसे - माखन व दही चुराना, चरवाहों व ग्वालिनियों से उनकी नोंक–झोंक, तरह - तरह के खेल, इन्द्र के विरुद्ध उनका हठ (जिसमें वे गोवर्धन पर्वत अपनी अँगुली पर उठा लेते हैं, ताकि गोकुलवासी अति वर्षा से बच सकें), सर्वाधिक विषैले कालिया नाग से युद्ध व उसके हज़ार फनों पर नृत्य, उनकी लुभा लेने वाली बाँसुरी का स्वर, कंस द्वारा भेजे गए गुप्तचरों का विनाश - ये सभी प्रसंग भावना प्रधान व अत्यन्त रोचक हैं।

आस्था के केंद्र
श्रीकृष्ण युगों-युगों से हमारी आस्था के केंद्र रहे हैं। वे कभी यशोदा मैया के लाल होते हैं तो कभी ब्रज के नटखट कान्हा और कभी गोपियों का चैन चुराते छलिया तो कभी विदुर पत्नी का आतिथ्य स्वीकार करते हुए सामने आते हैं तो कभी अर्जुन को गीता का ज्ञान देते हुए। कृष्ण के रूप अनेक हैं और वह हर रूप में संपूर्ण हैं। अपने भक्त के लिए हँसते-हँसते गांधारी के शाप को शिरोधार्य कर लेते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का दिन बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। कृष्ण जन्मभूमि पर देश–विदेश से लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती हें और पूरे दिन व्रत रखकर नर-नारी तथा बच्चे रात्रि 12 बजे मन्दिरों में अभिषेक होने पर पंचामृत ग्रहण कर व्रत खोलते हैं। कृष्ण जन्म स्थान के अलावा द्वारकाधीश, बिहारीजी एवं अन्य सभी मन्दिरों में इसका भव्य आयोजन होता हैं , जिनमें भारी भीड़ होती है।

भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य उत्सव
भगवान श्रीकृष्ण ही थे, जिन्होंने अर्जुन को कायरता से वीरता, विषाद से प्रसाद की ओर जाने का दिव्य संदेश श्रीमदभगवदगीता के माध्यम से दिया।
कालिया नाग के फन पर नृत्य किया, विदुराणी का साग खाया और गोवर्धन पर्वत को उठाकर गिरिधारी कहलाये।
समय पड़ने पर उन्होंने दुर्योधन की जंघा पर भीम से प्रहार करवाया, शिशुपाल की गालियाँ सुनी, पर क्रोध आने पर सुदर्शन चक्र भी उठाया।
अर्जुन के सारथी बनकर उन्होंने पाण्डवों को महाभारत के संग्राम में जीत दिलवायी।
सोलह कलाओं से पूर्ण वह भगवान श्रीकृष्ण ही थे, जिन्होंने मित्र धर्म के निर्वाह के लिए गरीब सुदामा के पोटली के कच्चे चावलों को खाया और बदले में उन्हें राज्य दिया।
उन्हीं परमदयालु प्रभु के जन्म उत्सव को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है।

अवतार
भगवान श्रीकृष्ण विष्णुजी के आठवें अवतार माने जाते हैं। यह श्रीविष्णु का सोलह कलाओं से पूर्ण भव्यतम अवतार है। श्रीराम तो राजा दशरथ के यहाँ एक राजकुमार के रूप में अवतरित हुए थे, जबकि श्रीकृष्ण का प्राकट्य आततायी कंस के कारागार में हुआ था। श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी व श्रीवसुदेव के पुत्ररूप में हुआ था। कंस ने अपनी मृत्यु के भय से बहिन देवकी और वसुदेव को कारागार में क़ैद किया हुआ था।
कृष्ण जन्म के समय घनघोर वर्षा हो रही थी। चारों तरफ़ घना अंधकार छाया हुआ था। श्रीकृष्ण का अवतरण होते ही वसुदेव–देवकी की बेड़ियाँ खुल गईं, कारागार के द्वार स्वयं ही खुल गए, पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए। वसुदेव किसी तरह श्रीकृष्ण को उफनती यमुना के पार गोकुल में अपने मित्र नन्दगोप के घर ले गए। वहाँ पर नन्द की पत्नी यशोदा को भी एक कन्या उत्पन्न हुई थी। वसुदेव श्रीकृष्ण को यशोदा के पास सुलाकर उस कन्या को ले गए। कंस ने उस कन्या को पटककर मार डालना चाहा। किन्तु वह इस कार्य में असफल ही रहा। श्रीकृष्ण का लालन–पालन यशोदा व नन्द ने किया। बाल्यकाल में ही श्रीकृष्ण ने अपने मामा के द्वारा भेजे गए अनेक राक्षसों को मार डाला और उसके सभी कुप्रयासों को विफल कर दिया। अन्त में श्रीकृष्ण ने आतातायी कंस को ही मार दिया। श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का नाम ही जन्माष्टमी है। गोकुल में यह त्योहार 'गोकुलाष्टमी' के नाम से मनाया जाता है।

शास्त्रों के अनुसार
श्रावण (अमान्त) कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कृष्ण जन्माष्टमी या जन्माष्टमी व्रत एवं उत्सव प्रचलित है, जो भारत में सर्वत्र मनाया जाता है और सभी व्रतों एवं उत्सवों में श्रेष्ठ माना जाता है। कुछ पुराणों में ऐसा आया है कि यह भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। इसकी व्याख्या इस प्रकार है कि 'पौराणक वचनों में मास पूर्णिमान्त है तथा इन मासों में कृष्ण पक्ष प्रथम पक्ष है।' पद्म पुराण , मत्स्य पुराण  , अग्नि पुराण में कृष्ण जन्माष्टमी के माहात्म्य का विशिष्ट उल्लेख है।
छान्दोग्योपनिषद में आया है कि कृष्ण देवकी पुत्र ने घोर आंगिर से शिक्षाएँ ग्रहण कीं। कृष्ण नाम के एक वैदिक कवि थे, जिन्होंने अश्विनों से प्रार्थना की है ।
अनुक्रमणी ने ऋग्वेद को कृष्ण आंगिरस का माना है।
जैन परम्पराओं में कृष्ण 22वें तीर्थकर नेमिनाथ के समकालीन माने गये हैं और जैनों के प्राक्-इतिहास के 63 महापुरुषों के विवरण में लगभग एक तिहाई भाग कृष्ण के सम्बन्ध में ही है।
महाभारत में कृष्ण जीवन भरपूर हैं। महाभारत में वे यादव राजकुमार कहे गये हैं, वे पाण्डवों के सबसे गहरे मित्र थे, बड़े भारी योद्धा थे, राजनीतिज्ञ एवं दार्शनिक थे। कतिपय स्थानों पर वे परमात्मा माने गये हैं और स्वयं विष्णु कहे गये हैं। महाभारत शान्ति पर्व ; द्रोण पर्व ; कर्ण पर्व ; वन पर्व ; भीष्म पर्व । युधिष्ठिर , द्रौपदी एवं भीष्म  ने कृष्ण के विषय में प्रशंसा के गान किये हैं। हरिवंश, विष्णु, वायु, भागवत एवं ब्रह्मवैवर्त पुराण में कृष्ण लीलाओं का वर्णन है जो महाभारत में नहीं पाया जाता है।
पाणिनि  से प्रकट होता है कि इनके काल में कुछ लोग 'वासुदेवक' एवं 'अर्जुनक' भी थे, जिनका अर्थ है क्रम से वासुदेव एवं अर्जुन के भक्त।
पतंजलि के महाभाष्य के वार्तिकों में कृष्ण सम्बन्धी व्यक्तियों एवं घटनाओं की ओर संकेत है, यथा वार्तिक संहिता में कंस तथा बलि के नाम; वार्तिक संहिता में 'गोविन्द'; एवं पाणिनी के वार्तिक में वासुदेव एवं कृष्ण। पंतजलि में 'सत्यभामा' को 'भामा' भी कहा गया है। 'वासुदेववर्ग्य:' , ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च' में, उग्रसेन को अंधक कहा गया है एवं वासुदेव तथा बलदेव को विष्णु कहा गया है, आदि शब्द आये हैं।
अधिकांश विद्वानों ने पंतजलि को ई. पू. दूसरी शताब्दी का माना है। कृष्ण कथाएँ इसके बहुत पहले की हैं। आदि पर्व  एवं सभा पर्व में कृष्ण को वासुदेव एवं परमब्रह्म एवं विश्व का मूल कहा गया है।

ई. पू. दूसरी या पहली शताब्दी के घोसुण्डी अभिलेख  एवं इण्डियन ऐण्टीक्वेरी, में कृष्ण को 'भागवत एवं सर्वेश्वर' कहा गया है। यही बात नागाघाट अभिलेखों, ई. पू. 200 ई. में भी है। बेसनगर के 'गरुणध्वज' अभिलेख में वासुदेव को 'देव-देव' कहा गया है। ये प्रमाण सिद्ध करते हैं कि ई. पू. 500 के लगभग उत्तरी एवं मध्य भारत में वासुदेव की पूजा प्रचलित थी।
श्री आर. जी. भण्डारकर कृत 'वैष्णविज्म, शैविज्म' , जहाँ पर वैष्णव सम्प्रदाय एवं इसकी प्राचीनता के विषय में विवेचन उपस्थित किया गया है। यह आश्चर्यजनक है कि कृष्ण जन्माष्टमी पर लिखे गये मध्यकालीन ग्रन्थों में भविष्य, भविष्योत्तर, स्कन्द, विष्णुधर्मोत्तर, नारदीय एवं ब्रह्म वैवर्त पुराणों से उद्धरण तो लिये हैं, किन्तु उन्होंने उस भागवत पुराण को अछूता छोड़ रखा है जो पश्चात्कालीन मध्य एवं वर्तमानकालीन वैष्णवों का 'वेद' माना जाता है। भागवत में कृष्ण जन्म का विवरण संदिग्ध एवं साधारण है। वहाँ पर ऐसा आया है कि समय काल सर्वगुणसम्पन्न एवं शोभन था, दिशाएँ स्वच्छ एवं गगन निर्मल एवं उडुगण युक्त था, वायु सुखस्पर्शी एवं गंधवाही था और जब जनार्दन ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया तो अर्धरात्रि थी तथा अन्धकार ने सबको ढक लिया था।

भविष्योत्तर पुराण में कृष्ण द्वारा 'कृष्णजन्माष्टमी व्रत' के बारे में युधिष्ठिर से स्वयं कहलाया गया है–'मैं वासुदेव एवं देवकी से भाद्र कृष्ण अष्टमी को उत्पन्न हुआ था, जबकि सूर्य सिंह राशि में था, चन्द्र वृषभ राशि में था और नक्षत्र रोहिणी था'। जब श्रावण के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र होता है तो वह तिथि जयन्ती कहलाती है, उस दिन उपवास करने से सभी पाप जो बचपन, युवावस्था, वृद्धावस्था एवं बहुत से पूर्वजन्मों में हुए रहते हैं, कट जाते हैं। इसका फल यह है कि यदि श्रावण कृष्णपक्ष की अष्टमी को रोहिणी हो तो न यह केवल जन्माष्टमी होती है, किन्तु जब श्रावण की कृष्णाष्टमी से रोहिणी संयुक्त हो जाती है तो जयन्ती होती है।

जन्माष्टमी व्रत' एवं 'जयन्ती व्रत
'जन्माष्टमी व्रत' एवं 'जयन्ती व्रत' एक ही हैं या ये दो पृथक व्रत हैं। कालनिर्णय  ने दोनों को पृथक व्रत माना है, क्योंकि दो पृथक नाम आये हैं, दोनों के निमित्त (अवसर) पृथक हैं (प्रथम तो कृष्णपक्ष की अष्टमी है और दूसरी रोहिणी से संयुक्त कृष्णपक्ष की अष्टमी), दोनों की ही विशेषताएँ पृथक हैं, क्योंकि जन्माष्टमी व्रत में शास्त्र में उपवास की व्यवस्था दी है और जयन्ती व्रत में उपवास, दान आदि की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त जन्माष्टमी व्रत नित्य है (क्योंकि इसके न करने से केवल पाप लगने की बात कही गयी है) और जयन्ती व्रत नित्य एवं काम्य दोनों ही है, क्योंकि उसमें इसके न करने से न केवल पाप की व्यवस्था है प्रत्युत करने से फल की प्राप्ति की बात भी कही गयी है। एक ही श्लोक में दोनों के पृथक उल्लेख भी हैं। हेमाद्रि, मदनरत्न, निर्णयसिन्धु आदि ने दोनों को भिन्न माना है। निर्णयसिन्धु ने यह भी कहा है कि इस काल में लोग जन्माष्टमी व्रत करते हैं न कि जयन्ती व्रत। किन्तु जयन्तीनिर्णय  का कथन है कि लोग जयन्ती मनाते हैं न कि जन्माष्टमी। सम्भवत: यह भेद उत्तर एवं दक्षिण भारत का है। वराह पुराण एवं हरिवंश में दो विरोधी बातें हैं। प्रथम के अनुसार कृष्ण का जन्म आषाढ़ शुक्ल द्वादशी को हुआ था। हरिवंश के अनुसार कृष्ण जन्म के समय अभिजित नक्षत्र था और विजय मुहूर्त था। सम्भवत: इन उक्तियों में प्राचीन परम्पराओं की छाप है। मध्यकालिक निबन्धों में जन्माष्टमी व्रत के सम्पादन की तिथि एवं काल के विषय में भी कुछ विवेचन मिलता है ; कृत्यतत्व ; तिथितत्व। समयमयूख  एवं निर्णय सिंधु में इस विषय में निष्कर्ष दिये गये हैं।

जन्माष्टमी मनाने का समय निर्धारण
सभी पुराणों एवं जन्माष्टमी सम्बन्धी ग्रन्थों से स्पष्ट होता है कि कृष्णजन्म के सम्पादन का प्रमुख समय है 'श्रावण कृष्ण पक्ष की अष्टमी की अर्धरात्रि' (यदि पूर्णिमान्त होता है तो भाद्रपद मास में किया जाता है)। यह तिथि दो प्रकार की है–  बिना रोहिणी नक्षत्र की तथा रोहिणी नक्षत्र वाली।
निर्णयामृत में 18 प्रकार हैं, जिनमें 8 शुद्धा तिथियाँ, 8 विद्धा तथा अन्य 2 हैं (जिनमें एक अर्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्र वाली तथा दूसरी रोहिणी से युक्त नवमी, बुध या मंगल को)।
*तिथितत्व  से संक्षिप्त निर्णय इस प्रकार हैं– 'यदि 'जयन्ती' (रोहिणीयुक्त अष्टमी) एक दिन वाली है, तो उसी दिन उपवास करना चाहिए, यदि जयन्ती न हो तो रोहिणी युक्त अष्टमी को होना चाहिए, यदि रोहिणी से युक्त दो दिन हों तो उपवास दूसरे दिन ही किया जाता है, यदि रोहिणी नक्षत्र न हो तो उपवास अर्धरात्रि में अवस्थित अष्टमी को होना चाहिए या यदि अष्टमी अर्धरात्रि में दो दिन वाली हो या यदि वह अर्धरात्रि में न हो तो उपवास दूसरे दिन किया जाना चाहिए। यदि जयन्ती बुध या मंगल को हो तो उपवास महापुण्यकारी होता है और करोड़ों व्रतों से श्रेष्ठ माना जाता है जो व्यक्ति बुध या मंगल से युक्त जयन्ती पर उपवास करता है, वह जन्म-मरण से सदा के लिए छुटकारा पा लेता है।'

व्रत विधि
व्रत के दिन प्रात: व्रती को सूर्य, सोम (चन्द्र), यम, काल, दोनों सन्ध्याओं (प्रात: एवं सायं), पाँच भूतों, दिन, क्षपा (रात्रि), पवन, दिक्पालों, भूमि, आकाश, खचरों (वायु दिशाओं के निवासियों) एवं देवों का आह्वान करना चाहिए, जिससे वे उपस्थित हों | उसे अपने हाथ में जलपूर्ण ताम्र पात्र रखना चाहिए, जिसमें कुछ फल, पुष्प, अक्षत हों और मास आदि का नाम लेना चाहिए और संकल्प करना चाहिए– 'मैं कृष्णजन्माष्टमी व्रत कुछ विशिष्ट फल आदि तथा अपने पापों से छुटकारा पाने के लिए करूँगा।' तब वह वासुदेव को सम्बोधित कर चार मंत्रों का पाठ करता है, जिसके उपरान्त वह पात्र में जल डालता है। उसे देवकी के पुत्रजनन के लिए प्रसूति-गृह का निर्माण करना चाहिए, जिसमें जल से पूर्ण शुभ पात्र, आम्रदल, पुष्पमालाएँ आदि रखना चाहिए, अगरु जलाना चाहिए और शुभ वस्तुओं से अलंकरण करना चाहिए तथा षष्ठी देवी को रखना चाहिए। गृह या उसकी दीवारों के चतुर्दिक देवों एवं गन्धर्वों के चित्र बनवाने चाहिए (जिनके हाथ जुड़े हुए हों), वासुदेव (हाथ में तलवार से युक्त), देवकी, नन्द, यशोदा, गोपियों, कंस-रक्षकों, यमुना नदी, कालिया नाग तथा गोकुल की घटनाओं से सम्बन्धित चित्र आदि बनवाने चाहिए। प्रसूति गृह में परदों से युक्त बिस्तर तैयार करना चाहिए।

संकल्प और प्राणप्रतिष्ठा
व्रती को किसी नदी (या तालाब या कहीं भी) में तिल के साथ दोपहर में स्नान करके यह संकल्प करना चाहिए– 'मैं कृष्ण की पूजा उनके सहगामियों के साथ करूँगा।' उसे सोने या चाँदी आदि की कृष्ण प्रतिमा बनवानी चाहिए, प्रतिमा के गालों का स्पर्श करना चाहिए और मंत्रों के साथ उसकी प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए। उसे मंत्र के साथ देवकी व उनके शिशु श्री कृष्ण का ध्यान करना चाहिए तथा वसुदेव, देवकी, नन्द, यशोदा, बलदेव एवं चण्डिका की पूजा स्नान, धूप, गंध, नैवेद्य आदि के साथ एवं मंत्रों के साथ करनी चाहिए। तब उसे प्रतीकात्मक ढंक से जातकर्म, नाभि छेदन, षष्ठीपूजा एवं नामकरण संस्कार आदि करने चाहिए। तब चन्द्रोदय (या अर्धरात्रि के थोड़ी देर उपरान्त) के समय किसी वेदिका पर अर्ध्य देना चाहिए, यह अर्ध्य रोहिणी युक्त चन्द्र को भी दिया जा सकता है, अर्ध्य में शंख से जल अर्पण होता है, जिसमें पुष्प, कुश, चन्दन लेप डाले हुए रहते हैं। यह सब एक मंत्र के साथ में होता है। इसके उपरान्त व्रती को चन्द्र का नमन करना चाहिए और दण्डवत झुक जाना चाहिए तथा वासुदेव के विभिन्न नामों वाले श्लोकों का पाठ करना चाहिए और अन्त में प्रार्थनाएँ करनी चाहिए।



श्री कृष्णजन्माष्टमी , भगवान कृष्ण के जन्म का पर्व



मुरली मनोहर कृष्ण कन्हैया जमुना के तट पे विराजे हैं
मोर मुकुट पर कानों में कुण्डल कर में मुरलिया  साजे है

श्री कृष्णजन्माष्टमी : पर्व भगवान कृष्ण के जन्म का
भारतीय धर्म-शास्त्रों में एक बात कही गई है कि जब-जब धरती पर पाप बढ़ता है तब-तब भगवान किसी ना किसी रूप में जन्म लेते हैं और पापों से विश्व को मुक्त कराते हैं. इसी तरह द्वापर युग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लेकर धरती को कंस नामक पापी राक्षस से मुक्ति दिलाई थी. भगवान कृष्ण के जन्मदिवस को ही हिंदू धर्म में जन्माष्टमी के पर्व के तौर पर मनाया जाता है.
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म पर मनाया जाने वाला पावन पर्व जन्माष्टमी भारत भूमि पर मनाया जाने वाला ऐसा त्यौहार है जिसे अब सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में कई स्थानों पर बहुत धूमधाम से मनाया जाता है. भगवान कृष्ण के भगवद गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं. हिन्‍दुओं का यह त्‍यौहार श्रावण मास(अमूमन जुलाई या अगस्‍त) के कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी के दिन मनाया जाता है.
इस बार कृष्ण जन्माष्टमी 28 अगस्त, 2013 को है.
हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार कृष्‍ण का जन्‍म, मथुरा के राजा कंस का अंत करने के लिए हुआ था. कंस श्रीकृष्ण की माता देवकी का सगा भाई था. कृष्ण का जन्म श्रावण मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था और तभी से यह दिन कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है. सालों से चले आ रहे इस त्यौहार को आज भी भारतीय परंपरा में जीवित रखा गया है.

जन्‍माष्‍टमी के अवसर पर पुरूष व औरतें उपवास व प्रार्थना करते हैं. मन्दिरों व घरों को सुन्‍दर ढंग से सजाया जाता है. इस दिन जगह-जगह आपको झांकियां और कृष्ण-लीलाएं देखने को मिलेंगी.

देश के विभिन्न हिस्सों में यह पर्व अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है. मथुरा, वृदांवन और यूपी में आपको इस दिन कृष्ण-लीलाएं और रास-लीलाएं देखने को मिलेंगी तो वहीं महाराष्ट्र में मटकी-फोड़ने का विधान है. कृष्ण को लीलाओं का सरताज माना जाता है, उनका पूरा बचपन विभिन्न लीलाओं से भरा हुआ है. इसीलिए इस दिन झांकियों के द्वारा लोग उनके बाल जीवन को प्रदर्शित करने की कोशिश करते हैं.

कृष्ण जन्माष्टमी व्रत विधि
जन्माष्टमी का व्रत सभी इच्छाएं पूर्ण करने वाला माना जाता है. उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें. उपवास के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएं और उसके बाद सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्‌पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर मुख बैठें. इसके बाद जल, फल, कुश और गंध लेकर संकल्प करें-

ममखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥

अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकी जी के लिए ‘सूतिका गृह’ नियत करें. इसके बाद श्रीकृष्ण की मूर्ति को स्थापित करना चाहिए. इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें. पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमशः निर्दिष्ट करना चाहिए.

फिर निम्न मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें-

‘प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामन॥
वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः॥
सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तु ते॥’

अंत में जन्माष्टमी की रात को प्रसाद वितरण करना चाहिए. कहा जाता है जो व्यक्ति जन्माष्टमी के व्रत को करता है वह ऐश्वर्य और मुक्ति को प्राप्त करता है.

रविवार, 25 अगस्त 2013

84 कोसी परिक्रमा पर रोक से हिंदुओं को लगी ठेस : राजनाथ सिंह



धार्मिक यात्रा पर रोक लगना उचित नहीं : राजनाथ सिंह
संतों को 84 कोसी परिक्रमा करवाए सरकार  : राजनाथ सिंह
जो सरकार किसी भी धर्म या पंथ के आयोजन को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी न निभा पाए उसका सत्ता में बने रहने का औचित्य नहीं है। प्रदेश सरकार के फैसले से दुर्भाग्यपूर्ण स्थित पैदा हो गई है  : राजनाथ सिंह
84 कोसी यात्रा पर रोक लगाना प्रदेश सरकार की सोची समझी रणनीति है। यात्रा पर लगाई गई रोक राजनीति से प्रेरित है। सपा सरकार ने हिंदुओं को ठेस पहुचाने का काम किया है : राजनाथ सिंह
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84 कोसी परिक्रमा पर रोक से हिंदुओं को लगी ठेस: राजनाथ
लखनऊ/ब्यूरो/इंटरनेट डेस्क | अंतिम अपडेट 23 अगस्त 2013 
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने प्रदेश सरकार से अयोध्या की 84 कोसी परिक्रमा पर लगाए गए प्रतिबंध पर पुनर्विचार की अपील की है। उन्होंने कहा, यह पाबंदी हमारे लिए चुनौती है।

हर धर्म के व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था को अभिव्यक्त करने का अधिकार है। दो-ढाई सौ संत 84 कोसी परिक्रमा करना चाहते हैं तो सरकार को आपत्ति क्या है?

राजनाथ सिंह बृहस्पतिवार शाम अपने कालीदास मार्ग स्थित निवास पर डॉ. अनुभव अवस्थी के शोध गृंथ ‘ह्रदय नारायण दीक्षित और उनकी पत्रकारिता’ के लोकार्पण समारोह में बोल रहे थे।

उन्होंने कहा, अयोध्या में दो-ढाई सौ साधु 84 कोसी परिक्रमा करना चाहते थे। इस पर पाबंदी लगा दी गई। परिक्रमा से सरकार को आपत्ति क्यों है?

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई हर किसी को अपनी धार्मिक भावनाओं, आस्था और विश्वास के पोषण का अधिकार है। शासन की जिम्मेदारी है कि ऐसा करने वालों को सुरक्षा दे। शांति-असुरक्षा की बात आती है तो लाखों की संख्या में सुरक्षा बल किस लिए है।

भाजपा अध्यक्ष ने कहा, जो सरकार किसी भी धर्म या पंथ के आयोजन को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी न निभा पाए उसका सत्ता में बने रहने का औचित्य नहीं है। प्रदेश सरकार के फैसले से दुर्भाग्यपूर्ण स्थित पैदा हो गई है।

यह घटना हम सबके लिए चुनौती है। परिक्रमा जैसे मामलों को चुनाव से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

इससे पहले चौधरी चरण सिंह एयरपोर्ट और फिर अपने आवास पर खबरनवीसों से बातचीत में राजनाथ सिंह ने कहा कि 84 कोसी यात्रा पर रोक लगाना प्रदेश सरकार की सोची समझी रणनीति है। यात्रा पर लगाई गई रोक राजनीति से प्रेरित है। सपा सरकार ने हिंदुओं को ठेस पहुचाने का काम किया है।

देश में सांस्कृतिक असुरक्षा की भावना

राजनाथ सिंह ने कहा कि देश में सांस्कृतिक असुरक्षा बढ़ रही है। सरकार की जिम्मेदारी कि इस असुरक्षा को दूर करने के लिए प्रभावी पहल करे। भारतीय संस्कृति के संरक्षण, प्रोत्साहन के प्रति सजग रहे।

केंद्र सरकार की तरफ इशारा करते हुए कहा कि सत्ता में बैठे लोगों को सांस्कृतिक-आर्थिक असुरक्षा की कोई चिंता नहीं है। चिंता है तो बस कुर्सी और वोटों की।

पिछले महीने अमेरिका यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वहां के लोगों में भारतीय संस्कृति के प्रति बढ़ती आस्था बढ़ रही है। मन को यह बात सालती है कि भारत को क्या हो गया है।

क्यों हम विशिष्ट पहचान खोते जा रहे हैं। यहां भारतीय संस्कृति से प्रभावित होने को प्रतिगामी माना जा रहा है। कहा जाता है कि राष्ट्र, संस्कृति की बात करेंगे तो प्रगतिशील नहीं रहेंगे।

पाक को मुंहतोड़ नहीं दे पाई सरकार

राजनाथ सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार यदि दो सैनिकों के सिर काटे जाने के वक्त पाकिस्तान को मुंह तोड़ जवाब देती तो पांच सैनिकों की हत्या न होती।

मुंबई पर आतंकी हमले के समय भी सीमा पार चल रहे आतंकियों के ट्रेनिंग कैंपों को नष्ठ करने की बात रही गई लेकिन कुछ नहीं हुआ। केंद्र सरकार कूटनीतिक समेत सभी मुद्दों पर विफल है।

सरकार में साथ रहेंगे सहयोगी

राजनाथ सिंह ने दावा किया कि भाजपा 272 से अधिक सीट जीतेगी। जो सहयोगी मिलकर चुनाव लड़ेंगे वे बाद में भी साथ रहेंगे। उन्होंने केंद्र की कांग्रेस सरकार को आडे़ हाथ लिया।

कहा, इस सरकार में महंगाई चरम पर है। केंद्र व प्रदेश में अराजकता जैसी स्थिति है। अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर देश की पहचान धूमिल हो रही है। उन्होंने कहा, जनता भाजपा की तरफ देख रही है।

स्वागत से जाम रही कानपुर रोड

पिछले महीने अमेरिका यात्रा के बाद राजनाथ सिंह के पहली बार लखनऊ आने पर उनका गर्मजोशी से स्वागत हुआ। एयरपोर्ट पर प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही व रमापतिराम त्रिपाठी समेत तमाम नेताओं ने उनका स्वागत किया।

सरोजनीनगर में भाजपा राष्ट्रीय परिषद सदस्य वीरेन्द्र कुमार तिवारी ने 272 फूल मालाओं, आरती, आतिशबाजी और बैंड बाजे के साथ उनका स्वागत किया। उन्हें लड्डुओं से भी तौला गया। स्वागत की वजह से काफी देर के लिए कानपुर रोड पर जाम जैसी स्थिति रही।

सोमवार को देशभर में विहिप का विरोध प्रदर्शन





विहिप का सोमवार को देशभर में विरोध प्रदर्शन
Sunday, August 25, 2013,
लखनऊ/अयोध्या : शासन-प्रशासन की पावंदी तथा  सख्ती के चलते 84 कोसी परिक्रमा निकालने में लगभग आये गतिरोध  एवं संतों की गिरफ्तारी के विरोध में विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने अब सोमवार २६ अगस्त को देशभर में धरना-प्रदर्शन करने की घोषणा की है। रविवार को पुलिस ने कई बड़े संतों को गिरफ्तार कर लिया, जिसके खिलाफ विहिप ने एक बार फिर सरकार से दो-दो हाथ करने का मन बनाया है।

विहिप ने 25 अगस्त से लेकर 13 सितम्बर तक 84 कोसी परिक्रमा की घोषणा की थी, लेकिन राज्य सरकार ने परिक्रमा पर पाबंदी लगा दी। इस बीच विहिप ने घोषणा की है कि संतों की गिरफ्तारी के विरोध में सोमवार को पूरे देश में प्रदर्शन किया जाएगा। विहिप के मीडिया प्रभारी शरद शर्मा ने बताया कि संतों और धर्माचार्यों को जगह-जगह से गिरफ्तार किया जा रहा है। संतों की गिरफ्तारी के विरोध में विहिप सोमवार को पूरे देश में प्रदर्शन करेगी।
विहिप सूत्रों के अनुसार, विहिप अक्टूबर में अयोध्या कूच करने की बड़ी घोषणा भी कर सकती है। विहिप के नेता इस बात पर विचार कर रहे हैं कि 18 अक्टूबर को पूरे देश से अयोध्या कूच करने का कार्यक्रम बनाया जाए और इस दौरान राम मंदिर निर्माण का संकल्प लिया जाए।
सूत्रों ने बताया कि विहिप नेताओं के मुताबिक अक्टूबर का महीना हिन्दू धर्म के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण होता है। इसी महीने में दिवाली और दशहरा जैसे महत्वपूर्ण पर्व आते हैं और इसका लाभ विहिप को अयोध्या कूच कार्यक्रम में मिल सकता है। (एजेंसी)

84 कोसी परिक्रमा, अयोध्या : सिंघल, तोगड़िया गिरफ्तार


विहिप ने शुरू की यात्रा
84 कोसी परिक्रमा, अयोध्या : सिंघल, तोगड़िया गिरफ्तार, 
ज़ी मीडिया ब्यूरो/एजेंसी
अयोध्या/लखनऊ : विश्व हिन्दू परिषद ने आज अयोध्या से अपनी विवादास्पद यात्रा की प्रतीकात्मक शुरूआत की, जबकि प्रशासन ने जबर्दस्त धरपकड़ के बीच संगठन के शीर्ष नेताओं अशोक सिंघल, प्रवीण तोगड़िया और राम विलास वेदांती को गिरफ्तार कर लिया। तोगड़िया को जहां अयोध्या से गिरफ्तार किया गया, वहीं सिंघल को लखनऊ हवाई अड्डे से हिरासत में लिया गया।
अधिकारियों ने लखनऊ में बताया कि स्वामी राम भद्राचार्य के साथ नई दिल्ली से पहुंचे सिंघल को उस समय गिरफ्तार किया गया जब वह अयोध्या जाने की जिद पर अड़ गए। अयोध्या के गोलाघाट में अपनी गिरफ्तारी के तुरंत बाद तोगड़िया ने कहा कि चौरासी कोसी परिक्रमा पर उत्तर प्रदेश सरकार के प्रतिबंध के खिलाफ कल समूचे देश में प्रदर्शन किए जाएंगे।
उन्होंने कहा, ‘यह राजनीतिक नहीं, बल्कि धार्मिक यात्रा है और इस पर सरकार का प्रतिबंध तथा दमन किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।’ तोगड़िया ने कहा, ‘अब यह आंदोलन भारत के गांव-गांव में जायेगा और कल देश के सभी जिला मुख्यालयों में धरना प्रदर्शन किया जाएगा।’ इसके पूर्व उत्तर प्रदेश सरकार के साथ टकराव का मोर्चा खोलते हुए रामजन्भूमि न्यास समिति के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपालदास अपने मंदिर मणिराम छावनी से बाहर निकले और कुछ साधु संतों के साथ दस कदम चल कर यात्रा की प्रतीकात्मक शुरूआत की। इसके बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया।
गोपालदास ने कहा, ‘हमने यात्रा शुरू कर दी है। लेकिन इस यात्रा का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। यह यात्रा बारहों महीने चलती (यह कोई समयबद्ध नहीं) है।’ प्रशासन ने तोगड़िया और सिंघल के अतिरिक्त एक पूर्व भाजपा सांसद तथा एक वर्तमान विधायक सहित 500 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है। सिंघल को हवाई अड्डे से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गयी है। सिंघल ने कहा, ‘मुझे क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है। हमने कौन सा अपराध किया है हमें बताया जाए। उत्तर प्रदेश में मुगलिया सल्तनत चल रही है। साधु संतों को पूजा अर्चना से रोका जा रहा है।’ उन्होंने हवाई अड्डा छोड़ने से इनकार किया।
यह पूछे जाने पर कि क्या वह दिल्ली वापस जाएंगे, सिंघल ने कहा, ‘मैं दिल्ली वापस क्यों जाऊंगा। मैं तो अयोध्या जाने के लिए आया हूं।’ इस बीच, सिंघल को हिरासत में लिए जाने के विरोध में हवाई अड्डे के बाहर मौजूद बड़ी संख्या में भाजपा और विहिप कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया और सरकार विरोधी नारे लगाए।
यात्रा शुरू होने से पहले पूर्व भाजपा सांसद रामविलास वेदांती और वर्तमान विधायक रामचंद्र यादव को आज सुबह गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस सूत्रों ने बताया कि वेदांती को आज सुबह करीब सात बजे उस समय गिरफ्तार किया गया जब वह अपने घर से परिक्रमा के लिए रवाना हुए। उन्होंने बताया कि विधायक रामचंद्र यादव को भी यहां से गिरफ्तार कर लिया गया।

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परिक्रमा को लेकर विहिप ने बिछाई दोहरी बिसात
Sat, 24 Aug 2013
एटा [अनिल गुप्ता]। विश्व हिंदू परिषद की अयोध्या में 25 अगस्त से प्रस्तावित 84 कोसी परिक्रमा में राम भक्तों को पहुंचाने के लिए फ्रंट-बैक रणनीति बनाई है। इसे भेदना सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के लिए आसान नहीं होगा। साधु-संतों के जत्थे पीछे रहेंगे, जबकि संघ परिवार के कार्यकर्ताओं की टीमें संतों को कवर करते हुए फ्रंटलाइन पर रहेंगी।
गिरफ्तारी की नौबत आने पर कार्यकर्ता जेल चले जाएंगे और संतों को एक-एक, दो-दो करके यात्रियों के रूप में अयोध्या पहुंचा दिया जाएगा। अयोध्या परिक्रमा को लेकर सरकार और हिंदूवादी संगठनों में टकराव तय माना जा रहा है। विहिप की योजना है कि ज्यादा से ज्यादा साधु-संतों को अयोध्या पहुंचाया जाए। 25 अगस्त को जयपुर और कानपुर क्षेत्र के संतों का जत्था परिक्रमा की शुरुआत करेगा।
फ्रंटलाइन टीमें घोषित कार्यक्रम के तहत अयोध्या के लिए गाजे-बाजे के साथ कानपुर से कूच करेंगी। अगर गिरफ्तारी हो जाती है, तो संतों को ट्रेनों, बसों व अन्य वाहनों से टुकड़ों में रवाना कर दिया जाएगा। ब्रज के साधु-संत और संघ परिवार के सदस्य पांच सितंबर को अयोध्या पहुंचेंगे। फैजाबाद जनपद के गांवों में इनके रुकने की व्यवस्था की गई है। छह सितंबर की सुबह निर्देश मिलते ही वे अयोध्या पहुंचेंगे।
विहिप ने पहले निजी वाहनों से संतों को पंहुचाने की योजना बनाई थी, मगर सरकार के रुख को देखते हुए रणनीति में बदलाव किया है। दरअसल, विहिप की मंशा यह है कि एक तीर से दो निशाने साधे जाएं। मतलब कि चौरासी कोसी परिक्रमा भी सफल हो जाए और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी से 1990-92 जैसा माहौल भी बन सके। विहिप के ब्रज प्रांत अध्यक्ष प्रमोद जाजू का कहना है कि जैसे पहले राम मंदिर आंदोलन सफल हुआ था, वैसे ही यह भी रहेगा।
साधु-संतों को बड़ी संख्या में तैयार किया जा रहा है। प्रमुख पदाधिकारियों से कहा गया है कि वे शुरुआत में गिरफ्तारी से बचें और भूमिगत रहकर काम करें। विभाग संगठन मंत्री प्रदीप कुमार ने बताया कि अधिक संख्या में संतों को एकत्रित करने की जिम्मेदारी एटा-कासगंज, आगरा, मथुरा, अलीगढ़, मैनपुरी, फीरोजाबाद और हाथरस जिलों को सौंपी गई है। परिक्रमा को जाने वाले संतों और प्रमुख नेताओं को बता दिया गया है कि रास्ते में हर पड़ाव पर प्रमुख कार्यकर्ता मिलेंगे, जो उन्हें रहने के ठिकानों तक पहुचाएंगे।
अयोध्या के आसपास के जिलों में संतों को ठहराने के लिए हालांकि घरों में व्यवस्थाएं की गई हैं, मगर संगठन की ओर से प्रत्येक संत को अपने साथ कम से कम एक लोटा, चादर और सत्तू अवश्य रखने की सलाह दी गई है। अयोध्या जाने वाले संतों को रवाना होने से पहले यह जानकारी नहीं होगी कि उन्हें किस गांव में जाकर रुकना है।
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अयोध्या की सीमाएं सील, साधुओं की गिरफ्तारी शुरू
Sat, 24 Aug 2013 
लखनऊ [जागरण न्यूज नेटवर्क]। अयोध्या में चौरासी कोसी परिक्रमा पर प्रतिबंध के फैसले को अमल में लाने के लिए पुलिस व प्रशासन ने कमर कस ली है। अयोध्या की सीमाएं सील कर दी गई हैं और निषेधाज्ञा तोड़ने वालों को गिरफ्तार करने की हिदायत दी गई है। फैजाबाद जिला प्रशासन ने विश्व हिंदू परिषद के 70 नेताओं व सक्रिय कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी कर दिए हैं। जिनके खिलाफ वारंट जारी किए गए हैं उनमें संगठन के शीर्ष नेता अशोक सिंहल, प्रवीण तोगड़िया और रामविलास वेंदाती शामिल हैं। सूचना है कि इलाहाबाद से सरकारी इंतजामों को चकमा देकर सैकड़ों संत अयोध्या रवाना हो गए हैं। अयोध्या पहुंचने के लिए उन्होंने ग्रामीण पैदल रास्तों को पकड़ा है।
प्रदेश मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने शुक्रवार को प्रमुख सचिव गृह आरएम श्रीवास्तव, डीजीपी देवराज नागर, लखनऊ जोन के आइजी सुभाष चंद्र और अन्य अधिकारियों के साथ परिक्रमा की घोषणा से उपजी स्थितियों से निपटने के लिए अब तक उठाए गए कदमों की समीक्षा की। प्रभाव वाले इलाके को चार जोनों में बांटा गया है। जिसकी निगरानी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और मजिस्ट्रेटों को संयुक्त रूप से सौंपी गई है। अधिकारियों से कहा गया है कि अयोध्या की ओर से जाने वाली सभी रास्तों को सील कर दिया जाए। गहन छानबीन के बाद ही वाहनों को आगे की ओर रवाना किया जाए। जिलों के सीमावर्ती क्षेत्रों में पीएसी के साथ अर्धसैनिक बलों की टुकड़ियां तैनात की जाएं। पुलिस अधिकारियों ने मुख्य सचिव को बताया कि अयोध्या शहर में त्रिस्तरीय सुरक्षा के इंतजाम हैं। पीएसी की गोताखोर इकाई भी तैनात कर दी गई है। यह खासतौर पर सरयू तट पर सक्रिय रहेगी।

पड़ोसी राज्यों से मांगी खुफिया जानकारी
आइजी [कानून व्यवस्था] राजकुमार विश्वकर्मा के अनुसार स्थिति से निपटने के लिए सभी पड़ोसी राज्यों से खुफिया जानकारियों का सहयोग मांगा गया है। इससे उत्तर प्रदेश की ओर आने वाले लोगों की संख्या के बारे में सही जानकारी मिल सकेगी।

उत्तराखंड में अलर्ट
उत्तर प्रदेश में चौरासी कोसी परिक्रमा पर प्रतिबंध की घोषणा के मद्देनजर उत्तराखंड प्रशासन भी सक्रिय हो गया है। उप्र से लगने वाली सीमा पर खासतौर पर चौकसी बढ़ा दी गई है। सीमावर्ती जिलों में सूचनाओं में आदान-प्रदान हो रहा है।

अशोक सिंहल दिल्ली रवाना
विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक अशोक सिंहल को शुक्रवार इलाहाबाद में नजरबंद कर दिया गया। प्रशासन ने प्रात: करीब साढ़े दस बजे सिंहल के कमला नेहरू अस्पताल के सामने स्थित आवास को घेर लिया। दोपहर 12.30 तक उन्हें घर से बाहर नहीं निकलने दिया गया। दोपहर बाद सिंहल ने कहा कि वह पारिवारिक कार्यक्रम में शरीक होने इलाहाबाद आए थे और अब दिल्ली जा रहे हैं। इस पर उन्हें बमरौली एयरपोर्ट तक ले जाया गया। इलाहाबाद के एसएसपी उमेश श्रीवास्तव ने बताया कि शासन ने सिंहल को अयोध्या की ओर जाने की स्थिति में नजरबंद करने का आदेश दिया था। जबकि सिंहल ने खुद को नजरबंद किए जाने से इन्कार किया।
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संतों ने भरी हुंकार, परिक्रमा होकर रहेगी
Sat, 24 Aug 2013

लखनऊ, जागरण टीम। अयोध्या में चौरासी कोसी परिक्रमा को लेकर शासन-प्रशासन पूरी तरह अलर्ट है तो वहीं साधु-संतों ने एलान किया है कि यात्रा होकर रहेगी। विहिप के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक अशोक सिंहल ने इलाहाबाद में फिर कहा कि चाहे जितनी भी रोक लगा दी जाए, धर्मगुरुओं की अगुवाई में परिक्रमा होगी।

अशोक सिंहल ने यात्रा को प्रदेश की समाजवादी पार्टी द्वारा मुस्लिम मतों के लिए की जा रही कवायद करार दिया। सिंहल ने परिक्रमा पथ पर प्रदेश सरकार द्वारा 21 बैरियर बनाने का दावा करते हुए कहा कि अयोध्या ही नहीं, अब शासन के इन बैरियर से सटे क्षेत्रों में कोई मुस्लिम स्मारक भी नहीं बनने दिया जाएगा। विश्व हिंदू परिषद के प्रांत संगठन मंत्री मनोज श्रीवास्तव का कहना है कि संतों ने अयोध्या की परिक्रमा का जो प्रण लिया है। जिसे पूरा कराने के लिए विहिप हर कुर्बानी देने को तैयार है।

अयोध्या से महज साठ किमी के फासले पर स्थित सुलतानपुर परिक्रमा के लिहाज से महत्वपूर्ण बन पड़ा है। यहां विहिप के परिक्रमा प्रभारी फतेहपुर संगत के महंत धर्मप्रकाश ने कहा बीस जिलों से संत-महात्मा इसी रास्ते से होकर अयोध्या जाएंगे। वे हमारे अतिथि रहेंगे और प्रशासन ने यदि उन्हें रोकने की कोशिश की तो कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। अमेठी के बाबूगंज सगरा आश्रम के पीठाधीश्वर अभय चैतन्य बाल ब्रह्माचारी मौनी महाराज भी मुखर हो उठे हैं। कहा कि आस्था से खिलवाड़ किया गया तो हम किसी भी स्तर तक जा सकते हैं।

बनी सूची, कभी भी हो सकती है संतों की गिरफ्तारी
फैजाबाद में प्रशासन ने विहिप व भाजपा नेताओं पर शिकंजा कस दिया है। जिले के कई विहिप व भाजपा पदाधिकारियों की सूची तैयार कर इनकी घेराबंदी की गई है। सूची में कई विहिप समर्थक संत व महंत भी शामिल हैं। देर रात या शनिवार की भोर से इनकी गिरफ्तारी भी की जा सकती है। शनिवार को अयोध्या व फैजाबाद शहर को सील करने की योजना है। जिलाधिकारी विपिन कुमार द्विवेदी व वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक केबी सिंह के नेतृत्व में सुरक्षाबलों ने रूट मार्च निकाला। गिरफ्तारी के लिए ए, बी व सी श्रेणी के 300 लोगों सूची प्रशासन ने तैयार की है। इनमें 72 लोग ए श्रेणी के हैं, जिनकी घेराबंदी या निगरानी की जा रही है। गिरफ्तार लोगों को अस्थाई जेलों में निरुद्ध रखा जाएगा।

शांति व्यवस्था में खलल बर्दाश्त नहीं होगा: सपा
जाब्यू, लखनऊ। सपा प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने कहा है कि प्रदेश सरकार कानून व्यवस्था को बनाये रखने का संकल्प ले रखा है। इसमें खलल बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। उत्तार प्रदेश में अब विकास विरोधी, सांप्रदायिक तत्वों एवं भ्रष्टाचारियों के लिए जगह नहीं है। आरएसएस, भाजपा और विहिप जहां सांप्रदायिकता का उन्माद फैला रहे हैं, वहीं कांग्रेस अनर्गल और निराधार आरोपों के साथ बसपा-भाजपा के सुर में सुर मिला रही है।

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

राजनीतिक दलों का अनर्थतंत्र




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राजनीतिक दलों का अनर्थतंत्र 

पूर्व सदस्य, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और पूर्व महानिदेशक, आयकर विभाग (इन्वेस्टिगेशन)
कई राज्यों में विधानसभा चुनाव और केंद्र में लोकसभा चुनाव करीब हैं जिसे देखते हुए देश के राजनीतिक अर्थव्यवस्था की गंदगी साफ करने और राजनीतिक दलों की फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाने की मांग बढ़ गई है। राजनीतिक दलों का खजाना लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन उन्हें चंदा कौन दे रहा है, उनके द्वारा चुनाव में भारी खर्च के लिए इतना पैसा कहां से आ रहा है, इसका कोई हिसाब नहीं है। राजनीतिक दल खुद को मिली टैक्स छूट का दुरुपयोग करते हैं और उनके द्वारा मनी लांडरिंग करने तक के सबूत मिले हैं। सच तो यह है कि इस तरह के कई छूटों का फायदा उठाने के लिए ही कुकुरमुत्ते की तरह सैकड़ों की संख्या में राजनीतिक दल उग आए हैं। राजनीतिक दलों को २०,००० रुपए से कम के मिले चंदे का कोई हिसाब नहीं देना होता और इसी सहूलियत का फायदा उठाते हुए वे चंदे का स्रोत छिपाए रहते हैं। चुनाव आयोग के अधिकार सीमित होने की वजह से चुनावी खर्च पर भी प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा।

अचरज की बात यह है कि प्रत्याशी चुनाव आयोग को खर्च का जो हिसाब देते हैं वह आयोग द्वारा तय सीमा का औसतन ५० फीसदी ही होता है, जबकि उनका वास्तविक खर्च कई गुना होता है। लोक सभा के एक प्रत्याशी ने तो अपना खर्च महज १.३२ लाख रुपए ही दिखाया था। कर छूट का दुरुपयोग, मनी लांडरिंग, खर्चों का गलत हिसाब जैसे वर्तमान भारतीय राजनीति के पूरे 'अनर्थतंत्र� पर गहराई से रोशनी डाल रही है इस बार की यह कवर स्टोरी।

कई राज्यों की विधानसभाओं और संसद के लिए चुनाव नजदीक ही हैं और इसलिए अपने-अपने इलाके में इनकी तैयारियों के लिए और इन पर खर्च होने वाले धन को जुटाने के लिए जुनून जोरों पर है। चुनाव नतीजों को प्रभावित करने के लिए बड़े पैमाने पर धन की ताकत के इस्तेमाल पर चुनाव आयोग (ईसीआई) का ध्यान भी खींचा है, जैसा कि पिछले दो साल से नागरिक समाज के विभिन्न वर्गों में इसकी चर्चा होती रही है। चुनाव आयोग को किसी चुनाव के उम्मीदवार, उसके दोस्तों और उसकी राजनीतिक पार्टी द्वारा किए जाने वाले खर्च को नियंत्रित करने, उस पर निगरानी रखने और उसे रेगुलेट करने का अधिकार है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग चुनाव प्रक्रिया में काले धन के इस्तेमाल को वास्तव में रोक पाया है या उसे कुछ नियंत्रित करने में सक्षम हुआ है?

चुनावी प्रक्रिया में वित्तीय पारदर्शिता के एक-दूसरे से जुड़े तीन पहलू हैं- चुनाव अभियान के खर्च का ब्योरा देना, राजनीतिक पार्टियों के खर्च का बंदोबस्त और कुछ चुने हुए जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में भारी इजाफा। बिना हिसाब-किताब वाले या काले धन वाली चुनावी प्रक्रिया को साफ-सुथरा बनाने का कोई भी प्रयास समग्र रूप से इन तीनों मसलों का समाधान होना चाहिए। लेकिन चुनाव आयोग का प्रयास सिर्फ प्रचार अभियान के खर्चों को लेकर ही है, दूसरे अन्य पहलुओं पर नहीं।

प्रचार अभियान के खर्चे
पिछले कई वर्षों से चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों द्वारा चुनाव में होने वाले खर्चो पर अंकुश और उनकी निगरानी के लिए लगातार कई कठोर कदम उठाए हैं। इन कदमों में अधिकतम खर्च की एक सीमा तय करना, चुनाव प्रचार अभियान की अवधि को कम करना, उम्मीदवार के अभियान में होने वाले सभी खर्चों को उसका चुनाव खर्च मानना, चुनाव खर्च एक निश्चित बैंक एकाउंट से ही करना, ऐसे खर्चों का दिन-प्रतिदिन का हिसाब रखना, खर्चों का पूरा ब्योरा चुनाव आयोग के पास जमा कराना आदि शामिल हैं। हर चुनाव क्षेत्र में चुनाव खर्च निगरानी पर्यवेक्षकों की नियुक्ति जैसी मशीनरी को वीडियो निगरानी टीम, मीडिया निगरानी टीम, उडऩ दस्ता, खर्च कंट्रोल रूम आदि बनाकर और मजबूत किया गया है और इस मशीनरी द्वारा एक शैडो एक्सपेंडीचर रजिस्टर मेन्टेन किया जाता है, ताकि उम्मीदवार ने जो बही खाता दिखाया है उसकी सत्यता की जांच हो सके। इन सब उपायों से ही चुनाव आयोग को चुनाव खर्चों में निगरानी रखने में आसानी हुई है।

एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) और नेशनल इलेक्शन वाच (एनईडब्ल्यू) ने वर्ष २००९ के लोकसभा चुनावों में लडऩे वाले उम्मीदवारों द्वारा घोषित खर्चों का विश्लेषण किया। चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि उम्मीदवारों द्वारा बताया गया औसत खर्च आयोग द्वारा स्वीकार्य अधिकतम सीमा २५ लाख रुपए के ४५ से ५५ फीसदी तक ही था। औसतन देखें तो विभिन्न राजनीतिक दलों के विजयी उम्मीदवारों ने करीब १५ लाख रुपए का खर्च दिखाया। इसी तरह चुने गए सांसदों में सबसे कम खर्च एक सांसद द्वारा सिर्फ १.३१ लाख रुपए का बताया गया। यह इसलिए भी ज्यादा चौंकाने वाली बात है क्योंकि राजनीतिक दलों का आमतौर पर कहना था कि चुनावी खर्च की सीमा व्यावहारिक नहीं है।

सच तो यह है कि राजनीतिक दलों के इसी मत के आधार पर ही चुनाव आयोग ने लोक सभा चुनावों के लिए खर्च की ऊपरी सीमा वर्ष २०११ में बढ़ाकर ४० लाख रुपए कर दी। बहस का विषय यह है कि चुनाव खर्च की सीमा क्या रखी जाए ताकि कोई उम्मीदवार जो खर्च बताए, वह उसका बहीखाता ईमानदारी से पेश कर सके यानि ऐसे स्रोत से दिखाए जिसका कोई हिसाब-किताब हो, अन्यथा वह स्वीकार्य सीमा का भी एक हिस्सा बिना हिसाब-किताब वाले स्रोत से पूरा करेगा। इसके अलावा इस बात के भी मौखिक साक्ष्य पाए गए हैं कि प्रत्याशियों द्वारा होने वाला वास्तविक खर्च स्वीकार्य सीमा से ५ से १० गुना ज्यादा हो सकती है।

सार्वजनिक जीवन में तीन तरह के साक्ष्यों से यह पता चलता है कि ज्यादातर उम्मीदवारों द्वारा चुनाव आयोग के सामने घोषित चुनावी खर्च वास्तविकता से बहुत कम बताया जाता है:

-कई प्रतिष्ठित अकादमिक संस्थाओं की प्रकाशित रिपोर्ट (देखें: कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मिलन वैष्णव की ''दि मार्केट फॉर क्रिमिनाल्टी: मनी, मसल्स ऐंड इलेक्शंस इन इंडिया��, वर्ष २००९ में प्रकाशित ''पार्टी सिस्टम फ्रैगमेंटेशन, इंट्रा-डेमोक्रेसी एंड ओपेेक पॉलिटिकल फाइनेंस, पेनसिलवेनिया यूनिवर्सिटी के ई श्री.धरन की ''इंडिया इन ट्रांजिशन सिरीज) -इस क्षेत्र में कार्यरत स्वतंत्र और भरोसेमंद एनजीओ जैसे सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज, सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज आदि द्वारा किए गए फील्ड सर्वेक्षण - वर्ष २०१२ में राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान चुनाव अधिकारियों द्वारा जब्त की गई नकदी, शराब, नशीली दवाओं आदि की रिपोर्ट (नकदी ५२ करोड़ रुपए, शराब ७.५ लाख लीटर, हेरोइन ५६ किग्रा, अफीम १०२ किग्रा आदि)

चुनाव खर्च की निगरानी पर चुनाव आयोग के निर्देशों के हैंडबुक (सितंबर, २०११ में प्रकाशित) में ऐसे कई चालाक तरीके बताए गए हैं जो वोटरों को चुपके से नकदी बांटने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। वोटरों को प्रभावित करने के लिए बिना हिसाब-किताब के इस्तेमाल होने वाले कुछ तरीके इस तरह से हैं-स्वयं सहायता समूहों, एनजीओ, गांव के मुखिया, लाइसेंस वाले दलालों, अखबारों के हॉकर, दूधियों, सामुदायिक बैठकों, दावत, आरती आदि के द्वारा तथा सामूहिक विवाह, स्थानीय मैच, चिकित्सा शिविर, मनोरंजन शो आदि के आयोजनों के द्वारा।

इसके अलावा डमी प्रत्याशियों को लड़ाने, विरोधी पार्टियों के पोल एजेंटों को अपने पाले में करने, बेमतलब खड़े प्रत्याशियों की गाडिय़ों और अन्य सुविधाओं का इस्तेमाल आदि पर भी भारी रकम खर्च की जाती है। हाल में कर्नाटक विधानसभा के राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग द्वारा तय की गई खर्च की ऊपरी सीमा को धता बताने का एक और साधारण तरीका निकाल लिया। इन दलों ने चुनाव अभियान चुनाव आयोग द्वारा घोषित तिथि से काफी पहले ही प्रचार शुरू कर दिया गया था। असल में चुनाव खर्च की गणना तब से की जाती है, जिस दिन से चुनाव की घोषणा की जाती है। शायद लोकसभा चुनावों में भी ऐसा ही कुछ तरीका अपनाया जाएगा।

यह भी गौर करने की बात है कि चुनाव कानून के मुताबिक स्वीकार्य ऊपरी सीमा से ज्यादा खर्च करने को 'भ्रष्ट आचरण� माना जाता है और इसके लिए उम्मीदवार को अयोग्य घोषित किया जा सकता है, लेकिन अभी तक शायद ही किसी को इसके लिए अयोग्य ठहराया गया हो। इसलिए ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग जो कठोरता दिखाता है, उसका असर बस यही हो रहा है कि खर्चों को गुप्त तरीके से किया जाता है और इस तरह से खर्च सीमा का लगातार उल्लंघन किया जा रहा है। इसका नतीजा यह है कि वास्तविक खर्चों का बड़ा हिस्सा बिना हिसाब-किताब वाले स्रोत से पूरा किया जाता है।

चुनावी प्रक्रिया में काले धन के इस्तेमाल को रोकने के लिए अक्सर राजनीतिक दलों को सरकारी फंड से चुनाव लड़ाने की सलाह दी जाती है। यह कहा जाता है कि इसके लिए सभी दलों को समान तरीके से फंड वितरण की कोई कारगर व्यवस्था बनानी होगी। सरकारी फंडिंग से उन राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों को राहत मिलेगी जिनके पास चुनावी मैदान में उतरने के लिए संसाधन या हैसियत नहीं है, लेकिन जिनके पास खूब पैसा है उनके द्वारा काले धन के इस्तेमाल पर अंकुश लगने की संभावना कम ही है।

इसलिए चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए कई कदमों के बावजूद चुनावी प्रक्रिया में काले धन के प्रभाव पर अंकुश के लिए कुछ अतिरिक्त, वैकल्पिक रास्ते और साधन तलाशने होंगे। संभवत: राजनीतिक दलों को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों (टीवी, एफएम रेडियो, इंटरनेट, सोशल मीडिया आदि) और अखबारों में विज्ञापन आदि के माध्यम से अभियान चलाने को प्रोत्साहित करना और वोटरों से सीधे संपर्क (रैली, जुलूस आदि) कम से कम करना एक रास्ता हो सकता है। इस संबंध में जिन कदमों पर विचार किया जा सकता है, उनमें सभी उम्मीदवारों को सरकारी प्रसारण माध्यमों पर ज्यादा लंबा मुफ्त एयरटाइम देना और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर प्रचार में हुए खर्च को चुनाव आयोग की खर्च सीमा से बाहर रखने जैसे कदम हो सकते हैं।

राजनीतिक दलों की फंडिंग
यह सुनने में बहुत अजीब लगता है, लेकिन तथ्य यही है कि इस देश में करीब १४०० राजनीतिक दल हैं जो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, १९५२ (आरपी एक्ट) के तहत चुनाव आयोग के पास पंजीकृत हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे राजनीतिक दलों की है जिन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा है, संसद या विधानसभा में सीट जीतने की बात ही छोड़ दें।

चुनाव आयोग के पास कोई राजनीतिक दल पंजीकृत कराने का दो सीधा फायदा मिलता है- पहला कोई पंजीकृत पार्टी चंदा जुटाना शुरू कर सकती है और इस तरह से जुटी रकम पर किसी तरह का आयकर नहीं लगता, दूसरा, रजिस्टर्ड राजनीतिक दल को किसी दानदाता द्वारा दिया गए पूरे चंदे के बदले उन्हें कर कटौती का लाभ मिलता है और इस मामले में कोई ऊपरी सीमा नहीं होती। इसलिए कोई अचरज की बात नहीं कि हर साल १०० से ज्यादा नए राजनीतिक दल चुनाव आयोग के पास रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करते हैं।

इस तरह के रजिस्ट्रेशन हासिल करने की प्रक्रिया बहुत साधारण है। आवेदक दल को एक आवेदन फॉर्म के साथ अपने संविधान की प्रति, कम से कम १०० सदस्य होने का प्रमाण, १० हजार रुपए के बैंक ड्राफ्ट के साथ ही कुछ वचन देने होते हैं, जैसे वह भारत के संविधान के अनुरूप कार्य करेगा, वह अपना वार्षिक बहीखाता चुनाव आयोग के पास जमा करेगा, वह पांच साल के भीतर चुनाव लड़ेगा आदि। एक बार कागजी प्रक्रिया पूरी होने के बाद रजिस्टे्रशन बहुत हद तक अपने आप ही हो जाता है।

जन प्रतिनिधित्व एक्ट के तहत सभी पंजीकृत राजनीतिक दलों को किसी भी व्यक्ति से २०,००० रुपए से ज्यादा के हासिल सभी चंदे का विवरण उसे हासिल करने के अगले साल ३० सितंबर तक देना होता है। एनजीओ पब्लिक इंफॉर्मेशन फाउंडेशन द्वारा आरटीआई के तहत चुनाव आयोग से हासिल जानकारी के मुताबिक जून, २०१२ तक ११९६ राजनीतिक दलों में से (तब तक पंजीकृत) सिर्फ ९८ ने अपने हासिल चंदे का विवरण दिया था और वित्त वर्ष २०१०-११ के लिए सिर्फ १७४ पंजीकृत राजनीतिक दलों ने अपना वार्षिक बहीखाता जमा किया था। इसके अलावा एक और विचित्र बात यह है कि इस वैधानिक आवश्यकता या पंजीकरण के समय राजनीतिक दलों द्वारा दिए गए वचन के अलावा चुनाव आयोग के पास इन सबके अनुपालन को सुनिश्चित करने का और कोई अधिकार नहीं है। सच तो यह है कि उसे किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है, चाहे वजह कुछ भी हो। चुनाव आयोग के पास यह भी अधिकार होता है कि वह चुनाव चिह्न आदेश (आरक्षण और आवंटन)१९६८ के तहत किसी पंजीकृत राजनीतिक दल को राज्य स्तर की या राष्ट्रीय स्तर की पार्टी घोषित कर सके, जो इस बात पर निर्भर करता है कि पिछले विधान सभा या लोक सभा आम चुनाव में पार्टी ने कितने फीसदी मत हासिल किए थे। इस तरह की मान्यता किसी वाजिब राजनीतिक दल के लिए बहुत मायने रखती है क्योंकि इससे पार्टी को पूरे राज्य या देश में एक चुनाव चिह्न रखने का अधिकार मिल जाता है।

फिलहाल करीब १४०० रजिस्टर्ड पार्टियों में से सिर्फ ६ राष्ट्रीय दल के रूप में और ४१ राज्य स्तर के दल के रूप में पंजीकृत हंै। इस प्रकार १४०० में से बाकी बचे दलों की कोई पहचान नहीं है, इसका मतलब यह है कि या तो उन्होंने कोई चुनाव ही नहीं लड़ा है या उनके उम्मीदवार चुनाव चिह्न आदेश के तहत जरूरी वोटों या सीटों का न्यूनतम फीसदी भी हासिल नहीं कर पाए। लेकिन इन सभी को आयकर देने से छूट मिलती है और इनको चंदा देने वालों को कर छूट का फायदा मिलता है।

आयकर अधिनियम २००३ में सुधार के द्वारा यह प्रावधान किया गया कि सभी पंजीकृत राजनीतिक दलों के आय को पूरी तरह से कर छूट मिलेगी, यदि वह अपना बहीखाता मेंटेन करते हैं, अपने पसंद के चार्टर्ड एकाउंटेट के माध्यम से अपने एकाउंट का लेखा कराते हैं, २०,००० रुपए से ऊपर के मिले किसी भी चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को निर्धारित तिथि तक चंदा देने वाले के नाम और पते के साथ देते हैं। साथ ही, किसी राजनीतिक दल को चंदा देने वाले सभी व्यक्तियों या कंपनियों के लिए भी यह चंदा पूरी तरह से कर मुक्त होता है और इसकी कोई ऊपरी सीमा नहीं होती।

अन्य सभी संगठित इकाइयों जैसे कंपनियों, फर्मा, सोसाइटी, ट्रस्ट आदि के लिए बहीखाता और अन्य रिकॉर्ड मेंटेन करने, लेखा मानक का पालन करने, ऑडिट रिपोर्ट का प्रोफॉर्मा और आयकर रिटर्न दाखिल करने के लिए विस्तृत नियम एवं कायदे बने हुए हैं। लेकिन पंजीकृत राजनीतिक दलों के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है। ऐसी कोई बाध्यता भी नहीं होती कि राजनीतिक दल जो चंदा हासिल कर रहे हैं या उनके द्वारा जो कमाई हो रही है वह सिर्फ वास्तविक राजनीतिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाए, न कि अन्य जरूरतों के लिए (जैसे सदस्यों या पदाधिकारियों के व्यक्तिगत इस्तेमाल) ।

इसके अलावा अन्य संगठित एंटिटी के विपरीत राजनीतिक दलों को आयकर रिटर्न कागज पर ही दाखिल करने की ही इजाजत होती है और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दाखिल करने की बाध्यता नहीं होती, जिससे किसी भी तरह की पुष्टि कर पाना कठिन होता है। जांच के लिए मामलों को चुनने के लिए आयकर विभाग ने जो दिशा-निर्देश जारी किए हैं उनमें राजनीतिक दलों को शामिल नहीं किया गया है। इसकी वजह से राजनीतिक दलों द्वारा आयकर रिटर्न दाखिल करने के बाद इनकी किसी तरह की जांच नहीं होती और उन्हें संक्षेप में ही स्वीकार कर लिया जाता है।

आयकर विभाग पंजीकृत राजनीतिक दलों का अलग से कोई रिकॉर्ड नहीं रखता। एडीआर-एनईडब्ल्यू की एक रिपोर्ट के अनुसार कई मान्यता प्राप्त राज्य स्तरीय राजनीतिक दल (इनमें से कई अपने राज्य में सत्तारूढ़ हैं) और ज्यादातर पंजीकृत राजनीतिक दल आयकर विभाग के पास न तो आयकर रिटर्न दाखिल कर रहे हैं, न ही चुनाव आयोग के पास अपना चंदे का (२०,००० रुपए से ज्यादा) वार्षिक विवरण दे रहे हैं।

इसी रिपोर्ट में कई बड़े राजनीतिक दलों और राज्य स्तर के पंजीकृत दलों द्वारा चुनाव आयोग को दिए गए सालाना चंदे के विवरण की जांच की गई और फिर उसे वर्ष २००४-०५ से २०१०-११ के लिए उनके द्वारा आयकर विभाग के पास दाखिल रिटर्न से मिलाया गया। इस जांच में यह पाया गया कि एक मामले में एक राजनीतिक दल ने कई करोड़ का पूरा चंदा बीस-बीस हजार से कम रकम के रूप में हासिल दिखाया था, सात ऐसे मामले पाए गए जिनमें ऐसे छोटे चंदे का हिस्सा ८० फीसदी से ज्यादा और ज्यादातर पार्टियों में इस तरह के चंदों का हिस्सा ५० फीसदी से ज्यादा था।

इससे पता चलता है कि बड़ी मात्रा में हासिल चंदों को इन दलों ने अपने बहीखाते में अज्ञात स्रोतों से हासिल नकद चंदा या कूपन बिक्री से हासिल बताया। इस तरह २०,००० रुपए से कम का नकद चंदा और कूपन बिक्री के मद में पार्टी चाहे तो करोड़ों में हासिल चंदे को भी दिखा सकती है और इस राशि पर उसे कोई आयकर भी नहीं देना होगा और उससे कोई सवाल भी नहीं किया जाएगा। दूसरे शब्दों में कहें तो पार्टियों द्वारा स्वीकार्य स्रोत से हासिल चंदे का बड़ा हिस्सा भी अपारदर्शी होता है और उसकी किसी तरह की जांच भी नहीं होती। इससे भी ज्यादा घातक बात यह है कि निष्क्रिय या सुप्त राजनीतिक दलों का इस्तेमाल मनी लॉड्रिँग के लिए किया जा रहा है। एक अंग्रेजी अखबार में १४ जनवरी, २०११ को प्रकाशित एक खबर के अनुसार चुनाव आयोग ऐसा मानता है कि मनी लॉड्रिंग के लिए फर्जी दलों की स्थापना की जा रही है और इनके खाते में जमा पैसे का इस्तेमाल शेयर बाजार में निवेश या ज्वैलरी खरीदने के लिए भी किया जा रहा है। ऐसे फर्जी दल को हासिल चंदे का बहुत कम ही इस्तेमाल किसी चुनाव अभियान या अन्य राजनीतिक खर्चों के लिए होता है।

खबर में कहा गया है कि चुनाव आयोग के अनुमान के मुताबिक करीब १२०० पंजीकृत दलों में से सिर्फ १६ फीसदी या करीब २०० दल ही वास्तव में राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होते हैं, बाकी सभी दलों का गठन चंदे के रूप में अवैध धन जमा करने और इस तरह कर चोरी के लिए किया जाता है।

यह गौर करने वाली बात है कि वर्ष २००३ में आयकर अधिनियम में सुधार से पहले सिर्फ उन्हीं राजनीतिक दलों को कर छूट का लाभ मिलता था जिन्हें चुनाव चिह्न आवंटन आदेश के तहत मान्यता प्राप्त था। सुधार के बाद बने प्रावधानों के दुरुपयोग को देखते हुए इस बात की प्रबल वजह बनती है कि उन राजनीतिक दलों को आंख मंूदकर दिए जा रहे छूट को वापस लिया जाए जो पंजीकरण के पांच साल के भीतर चुनाव चिह्न आवंटन आदेश हासिल करने में विफल रहते हैं। इसकी जगह ऐसे राजनीतिक दलों को पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट को उपलब्ध कर छूट प्रावधानों के तहत छूट का दावा करना चाहिए।

राजनीतिक दलों के वित्तीय मामलों के लिए चाहिए खास कानून
इन सबको देखते हुए राजनीतिक दलों के वित्तीय मामलों की निगरानी और रेगुलेशन के लिए तत्काल एक वैधानिक तंत्र बनाने की जरूरत है। यह ध्यान देने की बात है कि सभी अन्य संगठित एंटिटी जो जनता से धन जुटाते हैं या पब्लिक फंड की डीलिंग करते हैं या जो कर छूट के हकदार होते हैं, उन्हें कुछ वैधानिक संस्थाओं या नियामक कानूनों जैसे कंपनी एक्ट, ट्रस्ट एक्ट, सोसाइटी रजिस्टे्रशन एक्ट आदि के द्वारा संचालित किया जाता है। इन कानून के द्वारा न केवल संबंधित एंटिटी के मामलों को रेगुलेट करने के लिए प्राधिकरण और तंत्र की स्थापना की जाती है, बल्कि डिस्क्लोजर संबंधी ऐसे निर्देश जारी किए जाते हैं जिसके तहत एंटिटी को अपने वित्तीय मामलों की कुछ बुनियादी जानकारी सार्वजनिक करनी पड़ती हैं। ऐसी कोई वजह नहीं दिखती कि आखिर क्यों न पंजीकृत राजनीतिक दलों को ऐसी बाध्यता के तहत लाया जाए।

जन प्रतिनिधियों की संपत्ति में भारी इजाफा
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामले में मार्च २००३ में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद चुनाव आयोग ने संसद और विधान सभाओं के लिए चुनाव लड़ रहे सभी उम्मीदवारों के लिए यह जरूरी कर दिया कि वे नामांकन दाखिल करने के समय अपने पास, अपने पति-पत्नी और परिवार के निर्भर सदस्यों के पास मौजूद सभी चल-अचल संपत्ति का खुलासा करें। इसके अलावा नवीनतम आयकर रिटर्न का भी विवरण देना होता है।

साथ ही, सभी चुने गए सांसदों को शपथ लेने के ९० दिन के भीतर संसद के अपने संबंधित सदन के पीठाधीश के पास अपने प्रॉपर्टी के बारे में एक बार विवरण देना होता है। एडीआर-एनईडब्ल्यू ने१४वीं लोकसभा (२००४) के उन ३०४ सांसदों के चुनावी हलफनामे का विश्लेषण किया जो २००९ में फिर से चुनाव लड़े। इसमें यह पाया गया कि इन सांसदों की औसत आय २००४ के १.९२ करोड़ रुपए से बढ़ कर वर्ष २००९ में ४.८ करोड़ रुपए तक पहुंच गया, यानि उनकी आय में २८० फीसदी की बढ़त हुई। इसी तरह, वर्ष २०१२ में हुए कई विधान सभा चुनावों में दुबारा लडऩे वाले विधायकों की संपत्ति में कई गुना इजाफा हुआ।

एडीआर-एनईडब्ल्यूकी रिपोर्ट में बताया गया है कि बड़ी संख्या में ऐसे उम्मीदवार या विधायक भी रहे हैं जिन्होंने यह स्वीकार किया है कि उन्होंने कभी भी आयकर रिटर्न दाखिल नहीं किया है। जिन उम्मीदवारों ने अपनी संपत्ति करोड़ों में बताई थी, उन्होंने भी चुनावी खर्च कुछ ही लाख दिखाया।

चुनाव आयोग उम्मीदवारों से हलफनामा हासिल करता है, लेकिन आय के ज्ञात स्रोत से जो संपत्ति का खुलासा किया गया है, यदि संपत्ति उससे बहुत ज्यादा रहती है तो भी चुनाव आयोग के पास किसी तरह की कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। इसलिए एक रूटीन की तरह चुनावी हलफनामों को जांच के लिए आयकर विभाग के पास भेज दिया जाता है। इन हलफनामों में जो जानकारी होती है वह बस संपदा के बारे में एक बयान जैसा ही होता है।

ज्यादातर मामलों में उम्मीदवार के संपत्ति का आकलन इनकम टैक्स के दायरे में नहीं, बल्कि सिर्फ वेल्थ टैक्स के दायरे में किया जाता है। जिन लोगों का आकलन आयकर के दायरे में किया भी गया है, उन्होंने भी सिर्फ रिटर्न ही दाखिल किया है।

पिछले कई वर्षों से आयकर रिटर्न का जो प्रोफॉर्मा इस्तेमाल किया जा रहा है (खासकर सरल, सहज और सुगम) उसमें संपदा के बारे में कोई घोषणा नहीं होती। इसका मतलब यह है कि उम्मीदवार चुनाव के लिए जो हलफनामा दायर करते हैं उसकी आयकर विभाग के पास रहने वाली जानकारी से पुष्टि नहीं की जा सकती। इसलिए कोई अचरज की बात नहीं है कि आयकर विभाग भी कुछ दुर्लभ मामलों के अलावा चुनावी हलफनामे में हासिल जानकारियों की कोई जांच नहीं करता।

इस प्रकार, एक तरफ इस बात के कई संकेत हैं कि देश के चुनावी तंत्र में काले धन का शिंकजा बहुत गहरा हो गया है। दूसरी तरफ, इसके प्रभाव को रोकने के लिए वास्तव में कोई भी प्रभावी तंत्र नहीं है। इसके अलावा यह कोई भी अनुमान लगा सकता है कि इसमें कितना 'गंदा धन� यानि अपराध और भ्रष्टाचार आदि से निकला धन लगा हुआ है।

एक ज्यादा मनहूस बात जो हमें परेशान कर सकती है, वह है काले धन के इस कैंसर का स्थानीय निकाय चुनावों में फैलना। एक अनुमान के अनुसार विकेंद्रित प्रशासन के त्रिस्तरीय ढांचे में जमीनी स्तर पर करीब २९ लाख नए चुनावी पद जुड़े हैं जिससे चुनावों के लिए पैसे मांग में कई गुना इजाफा हुआ है और काले धन के इस्तेमाल की संभावा भी कई गुना बढ़ी है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
Issue: 15July, 2013

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

श्रद्धालुओं की मौत : धमारा स्टेशन पर यदि ऊपरी पुल होता, तो नहीं होता हादसा



जानकारी के अनुसार, राजधानी एक्सप्रेस (गाड़ी संख्या 12567) सोमवार की सुबह सहरसा से पटना जा रही थी। मानसी रेलखंड पर धमारा रेलवे स्टेशन के पास मां कात्यायिनी का एक मंदिर है, जहां पूजा के लिए लोग जमा थे। सावन महीने के आखिरी सोमवार और सोमवारी मेले की वजह से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ थी। वे मंदिर में जल चढ़ाने आए थे। स्पीड में आ रही ट्रेन से बेखबर लोग ट्रैक पार कर दूसरी तरफ मंदिर की ओर जा रहे थे। इसी बीच अचानक राजधानी एक्सप्रेस आने से पटरी पर खड़े लोग इसकी चपेट में आ गए।इसमें करीब 50 लोग घायल हो गए। मृतकों में 22 महिलाएं और चार बच्चे हैं। 


बिहार के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) ए. के. भारद्वाज और खगडिया के सांसद दिनेश चंद्र यादव ने इस हादसे में 35 लोगों की मौत की पुष्टि की थी। हालांकि, बाद में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बताया कि मृतकों की संख्या बढ़कर 37 हो गई है। कई घायलों की हालत गंभीर है और मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

इस हादसे के बाद लोगों में भारी आक्रोश फैल गया। गुस्साए लोगों ने ट्रेन के दोनों ड्राइवरों को उतार लिया और उनकी जमकर पिटाई की। इसके अलावा भीड़ ने  राजधानी  एक्सप्रेस और यहां खड़ी एक और ट्रेन में आगजनी की। बताया जा रहा है कि राजधानी एक्सप्रेस के 4 डिब्बे जलकर खाक हो गए।

हादसे के बाद रेल राज्यमंत्री अधीर रंजन चैधरी ने स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि जब वहां मेले का आयोजन होता है, तो स्थानीय प्रशासन ने व्यवस्था क्यों नहीं संभाली थी। उन्होंने कहा कि मैं आम लोगों को इसके लिए जिम्मेदार नहीं मानता। जिस समय यह हादसा हुआ ट्रेन की रफ्तार 80 किलोमीटर प्रति घंटे थी।

एक अन्य व्यक्ति ने प्रतिक्रिया में बताया कि जब हादसे से पहले के स्टेशन के स्टेशन मास्टर को मालूम है (स्थानीय होने के कारण) कि श्रावण के सोमवार या शिव रात्रि के दिनों मे इस मंदिर मे आत्यधिक भीड़ होती है तो उसे वहन से गुजरने वाली सभी ट्रेन चालक को ओपिटी - 27 देना चाहिये था. यह वह कागज होता है जिसके मिलने पर चालक के लिये आदेश होता है कि ट्रेन को एकदम धीरे-धीरे चलाये और रास्ते मे कहीं भी खतरा देखने पर एकदम ट्रेन को रोके. इस तरह ट्रेन को 5-10 किलोमीटर की गति से ही चलाया जाता है. अगर ऐसा होता तो दूर से ही देख कर चालक आराम से रोकलेता और सारी जानें बच जाती. तो इसके लिये सही व्यवस्था नही करने के लिये बिहार प्रशासन के साथ-साथ पिछले स्टेशन का स्टेशन मास्टर भी ज्यादा जिम्मेदार है. 

क्या हैं रेलवे के नियम
- त्योहार के मद्देनजर एक कैलेंडर बनता है, इसमें हर स्टेशन पर भीड़ की सूचना अधिकारी और ड्राइवरों को दी जाती है।
- स्टेशनों पर पीछे से आने वाली ट्रेनों की उद्घोषणा होनी चाहिए।
- गैर प्लेटफार्म स्टेशनों पर ज्यादा यात्री उतरने की सूचना स्टेशन मास्टर को पड़ोसी दोनों स्टेशनों को देनी होती है। 

- बताना होता है कि सुपरफास्ट, मेल, एक्सप्रेस, राजधानी, शताब्दी आदि ट्रेनें ऐसे स्टेशनों से धीमी गति से गुजरें।

सरकार ओर स्थानीय प्रशासन की कमी ये है जब उन को पता है के यहाँ हमेशा लोग पूजा करने आते है तो उन को उस जगह पर लोहे का ओवर ब्रिड्ज बना देना चाहिये जिस से लोग सेफ्टी से आ जा सके अब सरकार करीब 80 लाख तो खर्च करेगी मगर 10 लाख लगा कर ब्रिज नही बना सकी ।

ऊपरी पुल होता, तो नहीं होता हादसा
Aug 20 2013 5:04AM ||
खगड़िया : धमारा स्टेशन पर यदि ऊपरी पुल होता तो शायद इतने लोगों की जान नहीं जाती. स्थानीय लोगों का कहना है कि आवागमन की सुविधा के लिए स्टेशन तो बना दिया गया. लेकिन यात्रियों के एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाने के लिए अतिरिक्त सुविधा नहीं दी गयी.

यहां तक यात्रियों के पांव पैदल चलने के लिए सड़क तक का निर्माण नहीं कराया गया. जिस वजह से जो भी यात्री ट्रेन से उतरते ट्रैक पर ही उतरते और उसी रास्ते से मंदिर या फिर अपने घरों तक पहुंचते हैं. लोगों ने बताया कि हादसे के समय सिग्नल ग्रीन था. लेकिन देहात के लोगों को कितना समझ में आता है.


लोगों ने बताया कि जो भी लोग सोमवार को मां कात्यायानी स्थान में वैरागन के पूजन में भाग लेने के लिए आते हैं. वे लोग गाजे बाजे के साथ आते हैं. मरने वाले सभी लोगों के पीछे ढोल, नगारा आदि लेकर बजाते हुए चल रहे थे. जिस वजह से भी उन लोगों को ट्रेन के आने का पता नहीं चल पाया और वे लोग हादसे का शिकार हो गये.

भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना




‘भइया मेरे राखी के बंधन को निभाना’
भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना
भैया मेरे, छोटी बहन को न भुलाना

देखो ये नाता निभाना , निभाना

भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना
भैया मेरे, छोटी बहन को न भुलाना

भैया मेरे............

ये दिन ये त्यौहार खुशी का
पावन जैसे नीर नदी का
भाई के उजले माथे पे
बहन लगाये मंगल टीका
झूमे ये सावन सुहाना
भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना
भैया मेरे, छोटी बहन को न भुलाना

भैया मेरे............

बाँध के हमने रेशम डोरी
तुमसे वो उम्मीद है जोड़ी
नाज़ुक है जो साँस के जैसी
पर जीवन भर जाए न तोडी

जाने ये सारा ज़माना
भैया मेरे , भैया मेरे
राखी के बंधन को निभाना ......

शायद वो सावन भी आए
जो पहला सा रंग न लाये
बहन पराये देश बसी हो
अगर वो तुम तक पहुँच न पाए

याद का दीपक जलाना

भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना
भैया मेरे, छोटी बहन को न भुलाना

भैया मेरे............

शनिवार, 17 अगस्त 2013

गुलामी की मानसिकता से आजादी ही स्वतंत्रता है - नरेन्द्र मोदी




६७वां आजादी पर्वः कच्छ जिला
कच्छ के लालन कॉलेज से राज्यस्तरीय स्वतंत्रता पर्व के अवसर पर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी  का प्रेरणादायी संबोधन

भारतमाता की आन-बान-शान के साथ राष्ट्र ध्वज को मुख्यमंत्री ने दी सलामी

देश को संकटों और समस्याओं में डुबाने के लिए वर्तमान शासक संपूर्ण जिम्मेदारः मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी

गुलामी की मानसिकता, स्थगित शासन और भ्रष्टाचार से आजादी ही जनता का फैसला है
देश के शासकों पर से उठा जनता का भरोसा
          गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने हिन्दुस्तान को वर्तमान संकटों और समस्याओं से मुक्त कराने का आह्वान करते हुए कहा कि - स्थगितता और विफलताओं के कारण देश की सवा सौ करोड़ जनता का भरोसा वर्तमान शासन पर से उठ गया है। स्वराज के बाद अब देश को गुलामी की मानसिकता में से आजाद कराने का समय आ गया है। ६७वें आजादी पर्व के राज्य स्तरीय समारोह के अवसर पर कच्छ की धरती पर भुज के लालन कॉलेज के पटांगण में भारत के तिरंगे का आन-बान-शान के साथ ध्वज वंदन कराने के बाद श्री नरेन्द्र मोदी ने देश की ताकत और सामर्थ्य की उपेक्षा कर संकटों में धकेल देने वाली कांग्रेस शासित यूपीए सरकार के खिलाफ जमकर प्रहार किया। आजादी की जंग के योद्धाओं, शहीदों और महापुरुषों का ऋण स्वीकार कर, कोटि-कोटि वंदन करते हुए श्री मोदी ने स्वतंत्रता संग्राम की दोनों विचारधाराओं- सशस्त्र क्रांति और अहिंसक आंदोलन में गुजरात के नेतृत्व की भूमिका पेश की। सरदार पटेल, महात्मा गांधी और श्यामजी कृष्ण वर्मा जैसे महापुरुषों के नेतृत्व में आजादी की जंग में अपना सब कुछ न्योछावर करने वालों को उन्होंने श्रद्धांजलि दी।
आजादी के बाद आई गुलामी की मानसिकता और सोच की स्थगितता में से बाहर निकलने का आह्वान करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रपति की यह चिंता जायज है कि लोकतंत्र में संसद और विधानसभा राजनीति का अखाड़ा बन गए हैं। विरोधी दल सरकार की कमजोरियों को लेकर आवाज उठाएं यह स्वाभाविक है लेकिन शासक पक्ष संसद की-विधानसभा की गरिमा को बरकरार न रखे यह लोकतंत्र के लिए शोभास्पद नहीं है। मुख्यमंत्री ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के सन्दर्भ में भी प्रधानमंत्री को देश की सेना के मनोबल को शक्ति मिले उसके लिए हौसला बढ़ाने की जरूरत थी। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि हमारी सहनशक्ति की एक सीमा होनी चाहिए, लेकिन सहनशीलता की सीमा की व्याख्या भी सुनिश्चित करना शासक दल का फर्ज है। आज देश की सुरक्षा पर संकट किसलिए है? यह प्रश्न उठाते हुए श्री मोदी ने कहा कि भारत के राष्ट्रपति की चिंता और भावना का आदर करने का प्रथम कर्तव्य प्रधानमंत्री का है। राजनैतिक भाषा नहीं बल्कि देश की मूलभूत समस्याओं देश की सुरक्षा, भ्रष्टाचार को लेकर प्रधानमंत्री को देश को विश्वास दिलाना चाहिए। भाई-भतीजावाद, सास-बहू और दामाद तक भ्रष्टाचार पहुंच गया है। भ्रष्टाचार से देश तबाही के कगार पर पहुंच गया है। शासनकर्ता दल उसमें लिप्त हो चुका है, डूब गया है। भ्रष्टाचार रोकने की शुरुआत सर्वोच्च स्तर से होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री के लाल किले पर से दिए गए स्वतंत्रता दिवस के संदेश का विश्लेषण करते हुए श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि इस भाषण से पूरा हिन्दुस्तान निराश हुआ है। इस भाषण में सरदार पटेल और लाल बहादुर शास्त्री का कहीं उल्लेख ही नहीं है। क्या पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का ही बतौर प्रधानमंत्री योगदान था? इस देश के विकास में परिवारवाद और राजनीति क्यों आड़े आती है?
नौसेना सबमरीन के जवानों की कल हुई मृत्यु को लेकर पूरा देश दुःख का अनुभव कर रहा है। उत्तराखंड के लिए सेना सहित हिन्दुस्तान की सभी सरकारों ने अपनी पूरी ताकत से सेवाधर्म का कर्तव्य निभाया है, उनकी शक्ति के लिए प्रशंसा का एक शब्द भी नहीं कहा? परिवारभक्ति में इस कदर डुबने की वजह क्या है? कच्छ की मरुभूमि और भारत-पाक सीमा पर से प्रधानमंत्री की मानसिकता और जिम्मेदारी को ललकारते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वैश्विक मंदी के कारण देश की अर्थव्यवस्था और रुपया कमजोर हुआ है, प्रधानमंत्री का यह बयान या बचाव गले नहीं उतरता। पंडित नेहरू के समय से लेकर आज तक के ६० वर्ष में शासनकर्ता के रूप में आपने किया क्या?
खाद्य सुरक्षा विधेयक की खामियों को गंभीर करार देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि अंत्योदय योजना के गरीब से गरीब लाभार्थी को खाद्य सुरक्षा कानून से कोई फायदा नहीं होने वाला। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों पर खाद्य सुरक्षा कानून के अमल के चलते प्रति माह ८० से ८५ रुपये का बोझ बढ़ेगा। यह खाद्य सुरक्षा विधेयक संविधान के समानता के सिद्धांत की अवगणना करता है। राज्यों के बीपीएल लाभार्थियों की संख्या केन्द्र तय करता है और वितरण के मापदंड राज्यों को सौंपता है। ऐसी अनेक खामियां हैं। आपने गरीब की थाली में से रोटी छिनकर उनके जख्म पर तेजाब छिड़कने का काम किया है। क्यों नहीं इस मुद्दे पर मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई जाती।
महंगाई के मुद्दे पर प्रधानमंत्री के मौन पर आक्रोश जताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि देश को गरीबी, भ्रष्टाचार और असुरक्षा की भावना में डुबो दिया है। अब देश के लिए नई सोच, नई आशा और नई मुक्ति अनिवार्य है। अंग्रजों से भारत को मुक्त कराया अब भ्रष्टाचार, असुरक्षितता, महंगाई, भाई-भतीजावाद, परिवारवाद, अशिक्षा-अंधश्रद्धा से मुक्ति चाहिए। देश की जनता नया फैसला करने को मजबूर हो गई है, क्योंकि संकटों और समस्याओं की फांस जनता के गले में है, उससे उसे मुक्ति चाहिए।

गुजरात के विकास का श्रेय मुख्यमंत्री को नहीं बल्कि जनशक्ति की विकास में भागीदारी को जाता है, यह कहते हुए श्री मोदी ने बताया कि रोजगार प्रदान करने में गुजरात सबसे आगे है। ऐसी क्या वजह है कि भाजपा शासित और गैर कांग्रेसी राज्य सरकारों को सबसे ज्यादा राष्ट्रीय अवार्ड मिले हैं? २० सूत्रीय गरीबलक्षी कार्यक्रमों के अमल में ऐसी राज्य सरकारें एक से पांच के क्रम में हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री का शासक दल प्रेम नहीं करता। आज देश की मांग यह है कि हम स्पर्धा करें विकास की, भारतमाता के तिरंगे के शान की। गुजरात और केन्द्र के बीच विकास की स्पर्धा करने का आह्वान उन्होंने प्रधानमंत्री से किया। सबसे बड़ी स्पर्धा विकास और सुशासन की होनी चाहिए।
सरकारी लालफीताशाही और सरकारी फाइलों की ३५ धाम की विकास यात्रा के बावजूद सरकार की गति पर देश को विश्वास नहीं रहा। अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी की सरकार में जनता को भरोसा था कि देश अब आगे जा रहा है। लेकिन २००४ के बाद दस वर्ष में अब भरोसा नहीं रहा। भारत के संघीय ढांचे का सम्मान और राज्यों की मजबूती, प्रत्येक गांव, तहसील और जिले की प्रगति होनी ही चाहिए। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान के राज्यों को कमजोर रखकर देश और लोकतंत्र मजबूत नहीं रहेगा। गुजरात के विकास मॉडल में कृषि, मैन्युफेक्चरिंग और सेवा क्षेत्र का संतुलन करके अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाया गया है।
विकास की नई ऊंचाइयों पर किस तरह पहुंचा जा सकता है, यह गुजरात ने कर दिखाया है। दस वर्ष में ही यूनिवर्सिटियों की संख्या ११ से बढ़ाकर ४२ की है। रोजगार के लाखों अवसर प्रदान किए हैं। पिछले दस वर्ष में ही राज्य सरकार की नौकरियों में नई जनरेशन की ढाई लाख से ज्यादा भर्ती की गई है। अब अगले पांच वर्ष में लगातार योग्यता के स्तर पर सरकारी भर्तियों की मैन पॉवर प्लानिंग बैंक बनाकर ८० हजार नौकरियों के अवसर उपलब्ध हों, ऐसी वैज्ञानिक पद्धति पर ध्यान केन्द्रित किया गया है।
उत्तम स्किल डेवलपमेंट के लिए प्रधानमंत्री ने स्वयं राष्ट्रीय अवार्ड गुजरात को प्रदान किया है। निजी क्षेत्र में कुशल युवाओं के लिए रोजगार के विशाल अवसर खुले हैं। उन्होंने कहा कि गुजरात में कृषि क्षेत्र में ग्लोबल एग्रो फेयर आयोजित होगा। वैज्ञानिक पशुपालन और सहकारी दूध उत्पादन क्षेत्र में गुजरात आगे रहा है। भारत के किसान परिश्रम से देश के अन्न भंडार भरकर दुनिया का पेट भरने में सक्षम हैं। लेकिन करंट डेफिसिट अकाउंट संकट और एक्सपोर्ट-इंपोर्ट के बीच असंतुलन से देश की अर्थव्यवस्था टूट रही है। हमें एक भारत-श्रेष्ठ भारत के मंत्र के साथ सबका साथ, सबका विकास और हिन्दुस्तान को हरा-भरा बनाने का संकल्प करना होगा।
६७वें स्वंत्रता पर्व के महोत्सव के सिलसिले में भुज के लालन कॉलेज प्रांगण में उमड़े जनसैलाब के बीच कच्छ की विभिन्न शालाओं के १२०० विद्यार्थियों के द्वारा महायोग और सूर्य नमस्कार, कच्छ की सांस्कृतिक विरासत उजागर करता रंगारंग देशभक्ति सांस्कृतिक कार्यक्रम लोगों ने उत्साहपूर्वक देखा। पुलिस जवानों द्वारा पेश डेयर डेविल शो, श्वान दल और हॉर्स शो सहित कई कार्यक्रम लोगों के आकर्षण का केन्द्र बनें।
मुख्यमंत्री ने स्वतंत्रता सेनानी डॉ. वी.बी. वाघेला, मोहनभाई सोलंकी, चंद्रकांत मांकड़ और हरेशचंद्र राणा से मुलाकात कर स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देने के साथ ही शॉल ओढ़ाकर उन्हें सम्मानित किया। इस मौके पर मुख्य सचिव वरेश सिन्हा, अतिरिक्त मुख्य सचिव, गृह एस.के. नंदा, सांसद पूनमबेन जाट, जिला पंचायत प्रमुख त्रिकमभाई छांगा, विधायक वासणभाई आहिर, मोहनभाई कुंडारिया, ताराचंद छेड़ा, रमेशभाई महेश्वरी, वाघजीभाई पटेल, नीमाबेन आचार्य, पुलिस महानिदेशक अमिताभ पाठक, युवक सेवा, सांस्कृतिक विभाग के सचिव भाग्येश झा, सचिव सामान्य प्रशासन विभाग श्रीनिवास, जिला प्रभारी सचिव जे.पी. गुप्ता, जिला कलक्टर हर्षद पटेल, भुज शहर भाजपा उप प्रमुख मामद सिद्दीक जुनेजा, कई अधिकारी, पदाधिकारी और नागरिक मौजूद थे।

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

सुभद्रा कुमारी चौहान : ' झाँसी की रानी'




**** " सुभद्रा कुमारी चौहान " ****

पूरा नाम सुभद्रा कुमारी चौहान
जन्म 16 अगस्त, 1904
जन्म भूमि निहालपुर, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 15 फरवरी, 1948
मृत्यु स्थान सड़क दुर्घटना (नागपुर - जबलपुर के मध्य)
अविभावक ठाकुर रामनाथ सिंह
पति/पत्नी ठाकुर लक्ष्मण सिंह
संतान सुधा चौहान, अजय चौहान, विजय चौहान, अशोक चौहान और ममता चौहान
कर्मक्षेत्र - लेखक
मुख्य रचनाएँ 'मुकुल', 'झाँसी की रानी', बिखरे मोती आदि
विषय सामाजिक, देशप्रेम
भाषा हिन्दी
पुरस्कार-उपाधि सेकसरिया पुरस्कार
प्रसिद्धि स्वतंत्रता सेनानी, कवयित्री, कहानीकार
विशेष योगदान राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाते हुए, उस आनन्द और जोश में सुभद्रा जी ने जो कविताएँ लिखीं, वे उस आन्दोलन में स्त्रियों में एक नयी प्रेरणा भर देती हैं।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी भारतीय तटरक्षक सेना ने 28 अप्रॅल, 2006 को सुभद्रा कुमारी चौहान को सम्मानित करते हुए नवीन नियुक्त तटरक्षक जहाज़ को उन का नाम दिया है।

सुभद्रा कुमारी चौहान (अंग्रेज़ी: Subhadra Kumari Chauhan, जन्म: 16 अगस्त 1904 - मृत्यु: 15 फरवरी, 1948) हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका थीं।

'चमक उठी सन् सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी
ख़ूब लड़ी मरदानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।

वीर रस से ओत प्रोत इन पंक्तियों की रचयिता सुभद्रा कुमारी चौहान को 'राष्ट्रीय वसंत की प्रथम कोकिला' का विरुद दिया गया था। यह वह कविता है जो जन-जन का कंठहार बनी। कविता में भाषा का ऐसा ऋजु प्रवाह मिलता है कि वह बालकों-किशोरों को सहज ही कंठस्थ हो जाती हैं। कथनी-करनी की समानता सुभद्रा जी के व्यक्तित्व का प्रमुख अंग है। इनकी रचनाएँ सुनकर मरणासन्न व्यक्ति भी ऊर्जा से भर सकता है। ऐसा नहीं कि कविता केवल सामान्य जन के लिए ग्राह्य है, यदि काव्य-रसिक उसमें काव्यत्व खोजना चाहें तो वह भी है -

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में।
लक्ष्मीबाई की वीरता का राजमहलों की समृद्धि में आना जैसा एक मणिकांचन योग था, कदाचित उसके लिए 'वीरता और वैभव की सगाई' से उपयुक्त प्रयोग दूसरा नहीं हो सकता था। स्वतंत्रता संग्राम के समय के जो अगणित कविताएँ लिखी गईं, उनमें इस कविता और माखनलाल चतुर्वेदी 'एक भारतीय आत्मा' की पुष्प की अभिलाषा का अनुपम स्थान है। सुभद्रा जी का नाम मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन की यशस्वी परम्परा में आदर के साथ लिया जाता है। वह बीसवीं शताब्दी की सर्वाधिक यशस्वी और प्रसिद्ध कवयित्रियों में अग्रणी हैं।

जीवन परिचय

सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म नागपंचमी के दिन 16 अगस्त 1904 को इलाहाबाद के पास निहालपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम 'ठाकुर रामनाथ सिंह' था। सुभद्रा कुमारी की काव्य प्रतिभा बचपन से ही सामने आ गई थी। आपका विद्यार्थी जीवन प्रयाग में ही बीता। 'क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज' में आपने शिक्षा प्राप्त की। 1913 में नौ वर्ष की आयु में सुभद्रा की पहली कविता प्रयाग से निकलने वाली पत्रिका 'मर्यादा' में प्रकाशित हुई थी। यह कविता 'सुभद्राकुँवरि' के नाम से छपी। यह कविता ‘नीम’ के पेड़ पर लिखी गई थी। सुभद्रा चंचल और कुशाग्र बुद्धि थी। पढ़ाई में प्रथम आने पर उसको इनाम मिलता था। सुभद्रा अत्यंत शीघ्र कविता लिख डालती थी, मानो उनको कोई प्रयास ही न करना पड़ता हो। स्कूल के काम की कविताएँ तो वह साधारणतया घर से आते-जाते तांगे में लिख लेती थी। इसी कविता की रचना करने के कारण से स्कूल में उसकी बड़ी प्रसिद्धि थी।

बचपन
सुभद्रा और महादेवी वर्मा दोनों बचपन की सहेलियाँ थीं। दोनों ने एक-दूसरे की कीर्ति से सुख पाया। सुभद्रा की पढ़ाई नवीं कक्षा के बाद छूट गई। शिक्षा समाप्त करने के बाद नवलपुर के सुप्रसिद्ध 'ठाकुर लक्ष्मण सिंह' के साथ आपका विवाह हो गया। बाल्यकाल से ही साहित्य में रुचि थी। प्रथम काव्य रचना आपने 15 वर्ष की आयु में ही लिखी थी। सुभद्रा कुमारी का स्वभाव बचपन से ही दबंग, बहादुर व विद्रोही था। वह बचपन से ही अशिक्षा, अंधविश्वास, जाति आदि रूढ़ियों के विरुद्ध लडीं।

विवाह

1919 ई. में उनका विवाह 'ठाकुर लक्ष्मण सिंह' से हुआ, विवाह के पश्चात वे जबलपुर में रहने लगीं। सुभद्राकुमारी चौहान अपने नाटककार पति लक्ष्मणसिंह के साथ शादी के डेढ़ वर्ष के होते ही सत्याग्रह में शामिल हो गईं और उन्होंने जेलों में ही जीवन के अनेक महत्त्वपूर्ण वर्ष गुज़ारे। गृहस्थी और नन्हे-नन्हे बच्चों का जीवन सँवारते हुए उन्होंने समाज और राजनीति की सेवा की। देश के लिए कर्तव्य और समाज की ज़िम्मेदारी सँभालते हुए उन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थ की बलि चढ़ा दी-

न होने दूँगी अत्याचार, चलो मैं हो जाऊँ बलिदान।
सुभद्रा जी ने बहुत पहले अपनी कविताओं में भारतीय संस्कृति के प्राणतत्वों, धर्मनिरपेक्ष समाज का निर्माण और सांप्रदायिक सद्भाव का वातावरण बनाने के प्रयत्नों को रेखांकित कर दिया था-

मेरा मंदिर, मेरी मस्जिद, काबा-काशी यह मेरी
पूजा-पाठ, ध्यान जप-तप है घट-घट वासी यह मेरी।
कृष्णचंद्र की क्रीड़ाओं को, अपने आँगन में देखो।
कौशल्या के मातृमोद को, अपने ही मन में लेखो।
प्रभु ईसा की क्षमाशीलता, नबी मुहम्मद का विश्वास
जीव दया जिन पर गौतम की, आओ देखो इसके पास।

जबलपुर से माखनलाल चतुर्वेदी 'कर्मवीर' पत्र निकालते थे। उसमें लक्ष्मण सिंह को नौकरी मिल गईं। सुभद्रा भी उनके साथ जबलपुर आ गईं। सुभद्रा जी सास के अनुशासन में रहकर सुघड़ गृहिणी बनकर संतुष्ट नहीं थीं। उनके भीतर जो तेज था, काम करने का उत्साह था, कुछ नया करने की जो लगन थी, उसके लिए घर की सीमा बहुत छोटी थी। सुभद्रा जी में लिखने की प्रतिभा थी और अब पति के रुप में उन्हें ऐसा व्यक्ति मिला था जिसने उनकी प्रतिभा को पनपने के लिए उचित वातावरण देने का प्रयत्न किया।

स्वतंत्रता में योगदान

1920 - 21 में सुभद्रा और लक्ष्मण सिंह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य थे। उन्होंने नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया और घर-घर में कांग्रेस का संदेश पहुँचाया। त्याग और सादगी में सुभद्रा जी सफ़ेद खादी की बिना किनारी धोती पहनती थीं। गहनों और कपड़ों का बहुत शौक़ होते हुए भी वह चूड़ी और बिंदी का प्रयोग नहीं करती थी। उन को सादा वेशभूषा में देख कर बापू ने सुभद्रा जी से पूछ ही लिया, 'बेन! तुम्हारा ब्याह हो गया है?' सुभद्रा ने कहा, 'हाँ!' और फिर उत्साह से बताया कि मेरे पति भी मेरे साथ आए हैं। इसको सुनकर बा और बापू जहाँ आश्वस्त हुए वहाँ कुछ नाराज़ भी हुए। बापू ने सुभद्रा को डाँटा, 'तुम्हारे माथे पर सिन्दूर क्यों नहीं है और तुमने चूड़ियाँ क्यों नहीं पहनीं? जाओ, कल किनारे वाली साड़ी पहनकर आना।' सुभद्रा जी के सहज स्नेही मन और निश्छल स्वभाव का जादू सभी पर चलता था। उनका जीवन प्रेम से युक्त था और निरंतर निर्मल प्यार बाँटकर भी ख़ाली नहीं होता था।
1922 का जबलपुर का 'झंडा सत्याग्रह' देश का पहला सत्याग्रह था और सुभद्रा जी की पहली महिला सत्याग्रही थीं। रोज़-रोज़ सभाएँ होती थीं और जिनमें सुभद्रा भी बोलती थीं। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के संवाददाता ने अपनी एक रिपोर्ट में उनका उल्लेख लोकल सरोजिनी कहकर किया था। सुभद्रा जी में बड़े सहज ढंग से गंभीरता और चंचलता का अद्भुत संयोग था। वे जिस सहजता से देश की पहली स्त्री सत्याग्रही बनकर जेल जा सकती थीं, उसी तरह अपने घर में, बाल-बच्चों में और गृहस्थी के छोटे-मोटे कामों में भी रमी रह सकती थीं।
लक्ष्मणसिंह चौहान जैसे जीवनसाथी और माखनलाल चतुर्वेदी जैसा पथ-प्रदर्शक पाकर वह स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आन्दोलन में बराबर सक्रिय भाग लेती रहीं। कई बार जेल भी गईं। काफ़ी दिनों तक मध्य प्रांत असेम्बली की कांग्रेस सदस्या रहीं और साहित्य एवं राजनीतिक जीवन में समान रूप से भाग लेकर अन्त तक देश की एक जागरूक नारी के रूप में अपना कर्तव्य निभाती रहीं। गांधी जी की असहयोग की पुकार को पूरा देश सुन रहा था। सुभद्रा ने भी स्कूल से बाहर आकर पूरे मन-प्राण से असहयोग आंदोलन में अपने को दो रूपों में झोंक दिया -

देश - सेविका के रूप में
देशभक्त कवि के रूप में।
‘जलियांवाला बाग,’ 1917 के नृशंस हत्याकांड से उनके मन पर गहरा आघात लगा। उन्होंने तीन आग्नेय कविताएँ लिखीं। ‘जलियाँवाले बाग़ में वसंत’ में उन्होंने लिखा-

परिमलहीन पराग दाग़-सा बना पड़ा है
हा! यह प्यारा बाग़ ख़ून से सना पड़ा है।
आओ प्रिय ऋतुराज! किंतु धीरे से आना
यह है शोक स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खाकर
कलियाँ उनके लिए गिराना थोड़ी लाकर।

सन 1920 में जब चारों ओर गांधी जी के नेतृत्व की धूम थी, तो उनके आह्वान पर दोनों पति-पत्नि स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने के लिए कटिबद्ध हो गए। उनकी कविताई इसीलिए आज़ादी की आग से ज्वालामयी बन गई है।

रचनाएँ

उन्होंने लगभग 88 कविताओं और 46 कहानियों की रचना की। किसी कवि की कोई कविता इतनी अधिक लोकप्रिय हो जाती है कि शेष कविताई प्रायः गौण होकर रह जाती है। बच्चन की 'मधुशाला' और सुभद्रा जी की इस कविता के समय यही हुआ। यदि केवल लोकप्रियता की दृष्टि से ही विस्तार करें तो उनकी कविता पुस्तक 'मुकुल' 1930 के छह संस्करण उनके जीवन काल में ही हो जाना कोई सामान्य बात नहीं है। इनका पहला काव्य-संग्रह 'मुकुल' 1930 में प्रकाशित हुआ। इनकी चुनी हुई कविताएँ 'त्रिधारा' में प्रकाशित हुई हैं। 'झाँसी की रानी' इनकी बहुचर्चित रचना है। राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और जेल यात्रा के बाद भी उनके तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हुए-

'बिखरे मोती (1932 )
उन्मादिनी (1934)
सीधे-सादे चित्र (1947 )।
इन कथा संग्रहों में कुल 38 कहानियाँ (क्रमशः पंद्रह, नौ और चौदह)। सुभद्रा जी की समकालीन स्त्री-कथाकारों की संख्या अधिक नहीं थीं।

स्त्रियों की प्रेरणा

राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाते हुए, उस आनन्द और जोश में सुभद्रा जी ने जो कविताएँ लिखीं, वे उस आन्दोलन में एक नयी प्रेरणा भर देती हैं। स्त्रियों को सम्बोधन करती यह कविता देखिए--

"सबल पुरुष यदि भीरु बनें, तो हमको दे वरदान सखी।
अबलाएँ उठ पड़ें देश में, करें युद्ध घमासान सखी।
पंद्रह कोटि असहयोगिनियाँ, दहला दें ब्रह्मांड सखी।
भारत लक्ष्मी लौटाने को , रच दें लंका काण्ड सखी।।"

असहयोग आन्दोलन के लिए यह आह्वान इस शैली में तब हुआ है, जब स्त्री सशक्तीकरण का ऐसा अधिक प्रभाव नहीं था।

1922 का जबलपुर का 'झंडा सत्याग्रह' देश का पहला सत्याग्रह था और सुभद्रा जी की पहली महिला सत्याग्रही थीं। रोज़-रोज़ सभाएँ होती थीं और जिनमें सुभद्रा भी बोलती थीं। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के संवाददाता ने अपनी एक रिपोर्ट में उनका उल्लेख लोकल सरोजिनी कहकर किया था।
देशप्रेम

वीरों का कैसा हो वसन्त' उनकी एक ओर प्रसिद्ध देश-प्रेम की कविता है, जिसकी शब्द-रचना, लय और भाव-गर्भिता अनोखी थी। स्वदेश के प्रति', 'विजयादशमी', 'विदाई', 'सेनानी का स्वागत', 'झाँसी की रानी की सधि मापर', 'जलियाँ वाले बाग़ में बसन्त' आदि श्रेष्ठ कवित्व से भरी उनकी अन्य सशक्त कविताएँ हैं।

राष्ट्रभाषा प्रेम

'राष्ट्रभाषा' के प्रति भी उनका गहरा सरोकार है, जिसकी सजग अभिव्यक्ति 'मातृ मन्दिर में', नामक कविता में हुई है, यह उनकी राष्ट्रभाषा के उत्कर्ष के लिए चिन्ता है -

'उस हिन्दू जन की गरविनी
हिन्दी प्यारी हिन्दी का
प्यारे भारतवर्ष कृष्ण की
उस प्यारी कालिन्दी का
है उसका ही समारोह यह
उसका ही उत्सव प्यारा
मैं आश्चर्य भरी आंखों से
देख रही हूँ यह सारा
जिस प्रकार कंगाल बालिका
अपनी माँ धनहीता को
टुकड़ों की मोहताज़ आज तक
दुखिनी की उस दीना को"

काव्य में प्रेमानुभुति

सुभद्राकुमारी चौहान नारी के रूप में ही रहकर साधारण नारियों की आकांक्षाओं और भावों को व्यक्त करती हैं। बहन, माता, पत्नी के साथ-साथ एक सच्ची देश सेविका के भाव उन्होंने व्यक्त किए हैं। उनकी शैली में वही सरलता है, वही अकृत्रिमता और स्पष्टता है जो उनके जीवन में है।

- गजानन माधव मुक्तिबोध
तरल जीवनानुभुतियों से उपजी सुभद्रा कुमारी चौहान कि कविता का प्रेम दूसरा आधार-स्तम्भ है। यह प्रेम द्विमुखी है। शैशव - बचपन से प्रेम और दूसरा दाम्पत्य प्रेम, 'तीसरे' की उपस्थिति का यहाँ पर सवाल ही नहीं है।

बचपन से प्रेम
शैशव से प्रेम पर जितनी सुन्दर कविताएँ उन्होंने लिखी हैं, भक्तिकाल के बाद वे अतुलनीय हैं। निर्दोष और अल्हड़ बचपन को जिस प्रकार स्मृति में बसाकर उन्होंने मधुरता से अभिव्यक्त किया है, वे कभी पुरानी न पड़ने वाली कविता है। उदाहरणार्थ -

"बार-बार आती है मुझको
मधुर याद बचपन तेरी",
"आ जा बचपन, एक बार फिर
 दे दो अपनी निर्मल शान्ति
व्याकुल व्यथा मिटाने वाली
वह अपनी प्राकृत विश्रांति।"

अपनी संतति में मनुष्य किस प्रकार 'मेरा नया बचपन कविता' कविता में मार्मिक अभिव्यक्ति पाता है-

"मैं बचपन को बुला रही थी
बोल उठी बिटिया मेरी
नंदन वन सी फूल उठी
यह छोटी-सी कुटिया मेरी।।"

शैशव सम्बन्धी इन कविताओं की एक और बहुत बड़ी विशेषता है, कि ये 'बिटिया प्रधान' कविताएँ हैं - कन्या भ्रूण-हत्या की बात तो हम आज ज़ोर-शोर से कर रहे हैं, किन्तु बहुत ही चुपचाप, बिना मुखरता के, सुभद्रा इस विचार को सहजता से व्यक्त करती हैं। यहाँ 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो' का भाव नहीं, अपितु संसार का समस्त सुख बेटी में देखा गया है। 'बालिका का परिचय' बिटिया के महत्व को इस प्रकार प्रस्थापित करती है-

"दीपशिखा है अंधकार की
घनी घटा की उजियाली
ऊषा है यह कमल-भृंग की
है पतझड़ की हरियाली।"

कहा जाता है कि उन्होंने अपनी पुत्री का कन्यादान करने से मना कर दिया कि 'कन्या कोई वस्तु नहीं कि उसका दान कर दिया जाए।' स्त्री-स्वतंत्र्य का कितना बड़ा पग था वह।

दाम्पत्य प्रेम
प्रेम की कविताओं में जीवन-साथी के प्रति अटूट प्रेम, निष्ठा एवं रागात्मकता के दर्शन होते हैं- 'प्रियतम से', 'चिन्ता', 'मनुहार राधे।', 'आहत की अभिलाषा', 'प्रेम श्रृखला', 'अपराधी है कौन', 'दण्ड का भागी बनता कौन', आदि उनकी बहुत सुन्दर प्रेम कविताएँ हैं। दाम्पत्य की रूठने और मनुहार करती 'प्रियतम से' कविता का यह अंश देखिए-

"ज़रा-ज़रा सी बातों पर
मत रूको मेरे अभिमानी
लो प्रसन्न हो जाओ
ग़लती मैंने अपनी सब मानी
मैं भूलों की भरी पिटारी
और दया के तुम आगार
सदा दिखाई दो तुम हँसते
चाहे मुझसे करो न प्यार।"
अपने और प्रिय और बीच किसी 'तीसरे' की उपस्थिति उनके लिए पूर्ण असहनीय है। 'मानिनि राध', कविता में व्यक्त यह आक्रोश पूरे साहित्य में विरल है-
"ख़ूनी भाव उठें उसके प्रति
जो हों प्रिय का प्यारा
उसके लिए हृदय यह मेरा
बन जाता हत्यारा।"
दाम्पत्य की विषम, विर्तुल और गोपन स्थितियों की जिस अकुंठ भाव से अभिव्यक्ति सुभद्रा कुमारी चौहान ने की है, वह बड़ी मार्मिक बन पड़ी है-
"यह मर्म-कथा अपनी ही है
औरों की नहीं सुनाऊँगी
तुम रूठो सौ-सौ बार तुम्हें
पैरों पड़ सदा मनाऊँगी
बस, बहुत हो चुका, क्षमा करो
अवसाद हटा दो अब मेरा
खो दिया जिसे मद जिसे मद में मैंने
लाओ, दे दो वह सब मेरा।"

भक्ति भावना

उनका भक्ति-भाव भी प्रबल है। पूर्ण मन से प्रभु के सम्मुख सर्वात्म समर्पण की इससे सुन्दर, सहज अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती-

"देव! तुम्हारे कई उपासक
कई ढंग से आते
में बहुमूल्य भेंट व
कई रंग की लाते हैं।"

प्रकृति प्रेम

प्रकृति से भी सुभद्रा कुमारी चौहान के कवि का गहन अनुराग रहा है--'नीम', 'फूल के प्रति', 'मुरझाया फूल' आदि में उन्होंने प्रकृति का चित्रण बड़े सहज भाव से किया है। इस प्रकार सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता का फ़लक अत्यन्त व्यापक है, किंतु फिर भी.........खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी, उनकी अक्षय कीर्ति का ऐसा स्तम्भ है जिस पर काल की बात अपना कोई प्रभाव नहीं छोड़ पायेगी, यह कविता जन-जन का ह्रदयहार बनी ही रहेगी।

बाल कविताएँ

सुभद्रा जी ने मातृत्व से प्रेरित होकर बहुत सुंदर बाल कविताएँ भी लिखी हैं। यह कविताएँ भी उनकी राष्ट्रीय भावनाओं से ओत प्रोत हैं। 'सभा का खेल' नामक कविता में, खेल-खेल में राष्ट्रीय भाव जगाने का प्रयास इस प्रकार किया है -

सभा-सभा का खेल आज हम खेलेंगे,
जीजी आओ मैं गांधी जी, छोटे नेहरु, तुम सरोजिनी बन जाओ।
मेरा तो सब काम लंगोटी गमछे से चल जाएगा,
छोटे भी खद्दर का कुर्ता पेटी से ले आएगा।
मोहन, लल्ली पुलिस बनेंगे,
हम भाषण करने वाले वे लाठियाँ चलाने वाले,
हम घायल मरने वाले।

इस कविता में बच्चों के खेल, गांधी जी का संदेश, नेहरु जी के मन में गांधी जी के प्रति भक्ति, सरोजिनी नायडू की सांप्रदायिक एकता संबंधी विचारधारा को बड़ी खूबी से व्यक्त किया गया है। असहयोग आंदोलन के वातावरण में पले-बढे़ बच्चों के लिए ऐसे खेल स्वाभाविक थे। प्रसिद्ध हिन्दी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने सुभद्रा जी के राष्ट्रीय काव्य को हिन्दी में बेजोड़ माना है- कुछ विशेष अर्थों में सुभद्रा जी का राष्ट्रीय काव्य हिन्दी में बेजोड़ है। क्योंकि उन्होंने उस राष्ट्रीय आदर्श को जीवन में समाया हुआ देखा है, उसकी प्रवृत्ति अपने अंतःकरण में पाई है, अतः वह अपने समस्त जीवन-संबंधों को उसी प्रवृत्ति की प्रधानता पर आश्रित कर देती हैं, उन जीवन संबंधों को उस प्रवृत्ति के प्रकाश में चमका देती हैं।… सुभद्राकुमारी चौहान नारी के रूप में ही रहकर साधारण नारियों की आकांक्षाओं और भावों को व्यक्त करती हैं। बहन, माता, पत्नी के साथ-साथ एक सच्ची देश सेविका के भाव उन्होंने व्यक्त किए हैं। उनकी शैली में वही सरलता है, वही अकृत्रिमता और स्पष्टता है जो उनके जीवन में है। उनमें एक ओर जहाँ नारी-सुलभ गुणों का उत्कर्ष है, वहाँ वह स्वदेश प्रेम और देशाभिमान भी है जो एक क्षत्रिय नारी में होना चाहिए।

नारी समाज का विश्वास

सुभद्रा जी की बेटी सुधा चौहान का विवाह प्रसिद्ध साहित्यकार प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय से हुआ था जो स्वयं अच्छे लेखक थे। सुधा ने उनकी जीवनी लिखी- मिला तेज से तेज। सुभद्रा जी का पूरा जीवन सक्रिय राजनीति में बीता। वह नगर की सबसे पुरानी कार्यकर्ती थीं। 1930 - 31 और 1941 - 42 में जबलपुर की आम सभाओं में स्त्रियाँ बहुत बड़ी संख्या में एकत्र होती थीं जो एक नया ही अनुभव था। स्त्रियों की इस जागृति के पीछे सुभद्रा जी थीं जो उनकी तैयार की गई टोली के अनवरत प्रयास का फल था। सन् 1920 से ही वे सभाओं में पर्दे का विरोध, रूढ़ियों के विरोध, छुआछूत हटाने के पक्ष में और स्त्री-शिक्षा के प्रचार के लिए बोलती रही थीं। उन सबसे बहुत-सी बातों में अलग होकर भी वह उन्हीं में से एक थीं। उनमें भारतीय नारी की सहज शील और मर्यादा थी, इस कारण उन्हें नारी समाज का पूरा विश्वास प्राप्त था। विचारों की दृढ़ता के साथ-साथ उनके स्वभाव और व्यवहार में एक लचीलापन था, जिससे भिन्न विचारों और रहन-सहन वालों के दिल में भी उन्होंने घर बना लिया था।

कहानी लेखन

सुभद्रा जी ने कहानी लिखना आरंभ किया क्योंकि उस समय संपादक कविताओं पर पारिश्रमिक नहीं देते थे। संपादक चाहते थे कि वह गद्य रचना करें और उसके लिए पारिश्रमिक भी देते थे। समाज की अनीतियों से जुड़ी जिस वेदना को वह अभिव्यक्त करना चाहती थीं, उसकी अभिव्यक्ति का एक मात्र माध्यम गद्य ही हो सकता था। अतः सुभद्रा जी ने कहानियाँ लिखीं। उनकी कहानियों में देश-प्रेम के साथ-साथ समाज की विद्रूपता, अपने को प्रतिष्ठित करने के लिए संघर्षरत नारी की पीड़ा और विद्रोह का स्वर देखने को मिलता है। एक ही वर्ष में उन्होंने एक कहानी संग्रह 'बिखरे मोती' बना डाला। 'बिखरे मोती' संग्रह को छपवाने के लिए वह इलाहाबाद गईं। इस बार भी सेकसरिया पुरस्कार उन्हें ही मिला- कहानी संग्रह 'बिखरे मोती' के लिए। उनकी अधिकांश कहानियाँ सत्य घटना पर आधारित हैं। देश-प्रेम के साथ-साथ उनमें गरीबों के लिए सच्ची सहानुभूति दिखती है।

अंतिम रचना

 उनकी मृत्यु पर माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा कि सुभद्रा जी का आज चल बसना प्रकृति के पृष्ठ पर ऐसा लगता है मानो नर्मदा की धारा के बिना तट के पुण्य तीर्थों के सारे घाट अपना अर्थ और उपयोग खो बैठे हों।
मैं अछूत हूँ, मंदिर में आने का मुझको अधिकार नहीं है।
किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥
प्यार असीम, अमिट है, फिर भी पास तुम्हारे आ न सकूँगी।
यह अपनी छोटी सी पूजा, चरणों तक पहुँचा न सकूँगी॥
इसीलिए इस अंधकार में, मैं छिपती-छिपती आई हूँ।
तेरे चरणों में खो जाऊँ, इतना व्याकुल मन लाई हूँ॥
तुम देखो पहिचान सको तो तुम मेरे मन को पहिचानो।
जग न भले ही समझे, मेरे प्रभु! मेमन की जानो॥

यह कविता कवियत्री की अंतिम रचना है।
दु:खद निधन

14 फरवरी को उन्हें नागपुर में शिक्षा विभाग की मीटिंग में भाग लेने जाना था। डॉक्टर ने उन्हें रेल से न जाकर कार से जाने की सलाह दी। 15 फरवरी 1948 को दोपहर के समय वे जबलपुर के लिए वापस लौट रहीं थीं। उनका पुत्र कार चला रहा था। सुभद्रा ने देखा कि बीच सड़क पर तीन-चार मुर्गी के बच्चे आ गये थे। उन्होंने अचकचाकर पुत्र से मुर्गी के बच्चों को बचाने के लिए कहा। एकदम तेज़ी से काटने के कारण कार सड़क किनारे के पेड़ से टकरा गई। सुभद्रा जी ने ‘बेटा’ कहा और वह बेहोश हो गई। अस्पताल के सिविल सर्जन ने उन्हें मृत घोषित किया। उनका चेहरा शांत और निर्विकार था मानों गहरी नींद सो गई हों। 16 अगस्त 1904 को जन्मी सुभद्रा कुमारी चौहान का देहांत 15 फरवरी 1948 को 44 वर्ष की आयु में ही हो गया। एक संभावनापूर्ण जीवन का अंत हो गया।

उनकी मृत्यु पर माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा कि सुभद्रा जी का आज चल बसना प्रकृति के पृष्ठ पर ऐसा लगता है मानो नर्मदा की धारा के बिना तट के पुण्य तीर्थों के सारे घाट अपना अर्थ और उपयोग खो बैठे हों। सुभद्रा जी का जाना ऐसा मालूम होता है मानो ‘झाँसी वाली रानी’ की गायिका, झाँसी की रानी से कहने गई हो कि लो, फिरंगी खदेड़ दिया गया और मातृभूमि आज़ाद हो गई। सुभद्रा जी का जाना ऐसा लगता है मानो अपने मातृत्व के दुग्ध, स्वर और आँसुओं से उन्होंने अपने नन्हे पुत्र को कठोर उत्तरदायित्व सौंपा हो। प्रभु करे, सुभद्रा जी को अपनी प्रेरणा से हमारे बीच अमर करके रखने का बल इस पीढ़ी में हो।

सम्मान और पुरस्कार

इन्हें 'मुकुल' तथा 'बिखरे मोती' पर अलग-अलग सेकसरिया पुरस्कार मिले।
भारतीय तटरक्षक सेना ने 28 अप्रॅल 2006 को सुभद्रा कुमारी चौहान को सम्मानित करते हुए नवीन नियुक्त तटरक्षक जहाज़ को उन का नाम दिया है।
भारतीय डाक तार विभाग ने 6 अगस्त 1976 को सुभद्रा कुमारी चौहान के सम्मान में 25 पैसे का एक डाक-टिकट जारी किया था।
जबलपुर के निवासियों ने चंदा इकट्ठा करके नगरपालिका प्रांगण में सुभद्रा जी की आदमकद प्रतिमा लगवाई जिसका अनावरण 27 नवंबर 1949 को कवयित्री और उनकी बचपन की सहेली महादेवी वर्मा ने किया। प्रतिमा अनावरण के समय भदंत आनंद कौसल्यायन, हरिवंशराय बच्चन जी, डॉ. रामकुमार वर्मा और इलाचंद्र जोशी भी उपस्थित थे। महादेवी जी ने इस अवसर पर कहा, नदियों का कोई स्मारक नहीं होता। दीपक की लौ को सोने से मढ़ दीजिए पर इससे क्या होगा? हम सुभद्रा के संदेश को दूर-दूर तर फैलाएँ और आचरण में उसके महत्व को मानें- यही असल स्मारक है।
**** " सुभद्रा कुमारी चौहान " ****

पूरा नाम सुभद्रा कुमारी चौहान
जन्म 16 अगस्त, 1904
जन्म भूमि निहालपुर, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 15 फरवरी, 1948
मृत्यु स्थान सड़क दुर्घटना (नागपुर - जबलपुर के मध्य)
अविभावक ठाकुर रामनाथ सिंह
पति/पत्नी ठाकुर लक्ष्मण सिंह
संतान सुधा चौहान, अजय चौहान, विजय चौहान, अशोक चौहानत और ममता चौहान
कर्म-क्षेत्र लेखक
मुख्य रचनाएँ 'मुकुल', 'झाँसी की रानी', बिखरे मोती आदि
विषय सामाजिक, देशप्रेम
भाषा हिन्दी
पुरस्कार-उपाधि सेकसरिया पुरस्कार
प्रसिद्धि स्वतंत्रता सेनानी, कवयित्री, कहानीकार
विशेष योगदान राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाते हुए, उस आनन्द और जोश में सुभद्रा जी ने जो कविताएँ लिखीं, वे उस आन्दोलन में स्त्रियों में एक नयी प्रेरणा भर देती हैं।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी भारतीय तटरक्षक सेना ने 28 अप्रॅल, 2006 को सुभद्रा कुमारी चौहान को सम्मानित करते हुए नवीन नियुक्त तटरक्षक जहाज़ को उन का नाम दिया है।

सुभद्रा कुमारी चौहान (अंग्रेज़ी: Subhadra Kumari Chauhan, जन्म: 16 अगस्त 1904 - मृत्यु: 15 फरवरी, 1948) हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका थीं।

'चमक उठी सन् सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी
ख़ूब लड़ी मरदानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।

वीर रस से ओत प्रोत इन पंक्तियों की रचयिता सुभद्रा कुमारी चौहान को 'राष्ट्रीय वसंत की प्रथम कोकिला' का विरुद दिया गया था। यह वह कविता है जो जन-जन का कंठहार बनी। कविता में भाषा का ऐसा ऋजु प्रवाह मिलता है कि वह बालकों-किशोरों को सहज ही कंठस्थ हो जाती हैं। कथनी-करनी की समानता सुभद्रा जी के व्यक्तित्व का प्रमुख अंग है। इनकी रचनाएँ सुनकर मरणासन्न व्यक्ति भी ऊर्जा से भर सकता है। ऐसा नहीं कि कविता केवल सामान्य जन के लिए ग्राह्य है, यदि काव्य-रसिक उसमें काव्यत्व खोजना चाहें तो वह भी है -

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में।
लक्ष्मीबाई की वीरता का राजमहलों की समृद्धि में आना जैसा एक मणिकांचन योग था, कदाचित उसके लिए 'वीरता और वैभव की सगाई' से उपयुक्त प्रयोग दूसरा नहीं हो सकता था। स्वतंत्रता संग्राम के समय के जो अगणित कविताएँ लिखी गईं, उनमें इस कविता और माखनलाल चतुर्वेदी 'एक भारतीय आत्मा' की पुष्प की अभिलाषा का अनुपम स्थान है। सुभद्रा जी का नाम मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन की यशस्वी परम्परा में आदर के साथ लिया जाता है। वह बीसवीं शताब्दी की सर्वाधिक यशस्वी और प्रसिद्ध कवयित्रियों में अग्रणी हैं।

जीवन परिचय

सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म नागपंचमी के दिन 16 अगस्त 1904 को इलाहाबाद के पास निहालपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम 'ठाकुर रामनाथ सिंह' था। सुभद्रा कुमारी की काव्य प्रतिभा बचपन से ही सामने आ गई थी। आपका विद्यार्थी जीवन प्रयाग में ही बीता। 'क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज' में आपने शिक्षा प्राप्त की। 1913 में नौ वर्ष की आयु में सुभद्रा की पहली कविता प्रयाग से निकलने वाली पत्रिका 'मर्यादा' में प्रकाशित हुई थी। यह कविता 'सुभद्राकुँवरि' के नाम से छपी। यह कविता ‘नीम’ के पेड़ पर लिखी गई थी। सुभद्रा चंचल और कुशाग्र बुद्धि थी। पढ़ाई में प्रथम आने पर उसको इनाम मिलता था। सुभद्रा अत्यंत शीघ्र कविता लिख डालती थी, मानो उनको कोई प्रयास ही न करना पड़ता हो। स्कूल के काम की कविताएँ तो वह साधारणतया घर से आते-जाते तांगे में लिख लेती थी। इसी कविता की रचना करने के कारण से स्कूल में उसकी बड़ी प्रसिद्धि थी।

बचपन
सुभद्रा और महादेवी वर्मा दोनों बचपन की सहेलियाँ थीं। दोनों ने एक-दूसरे की कीर्ति से सुख पाया। सुभद्रा की पढ़ाई नवीं कक्षा के बाद छूट गई। शिक्षा समाप्त करने के बाद नवलपुर के सुप्रसिद्ध 'ठाकुर लक्ष्मण सिंह' के साथ आपका विवाह हो गया। बाल्यकाल से ही साहित्य में रुचि थी। प्रथम काव्य रचना आपने 15 वर्ष की आयु में ही लिखी थी। सुभद्रा कुमारी का स्वभाव बचपन से ही दबंग, बहादुर व विद्रोही था। वह बचपन से ही अशिक्षा, अंधविश्वास, जाति आदि रूढ़ियों के विरुद्ध लडीं।

विवाह

1919 ई. में उनका विवाह 'ठाकुर लक्ष्मण सिंह' से हुआ, विवाह के पश्चात वे जबलपुर में रहने लगीं। सुभद्राकुमारी चौहान अपने नाटककार पति लक्ष्मणसिंह के साथ शादी के डेढ़ वर्ष के होते ही सत्याग्रह में शामिल हो गईं और उन्होंने जेलों में ही जीवन के अनेक महत्त्वपूर्ण वर्ष गुज़ारे। गृहस्थी और नन्हे-नन्हे बच्चों का जीवन सँवारते हुए उन्होंने समाज और राजनीति की सेवा की। देश के लिए कर्तव्य और समाज की ज़िम्मेदारी सँभालते हुए उन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थ की बलि चढ़ा दी-

न होने दूँगी अत्याचार, चलो मैं हो जाऊँ बलिदान।
सुभद्रा जी ने बहुत पहले अपनी कविताओं में भारतीय संस्कृति के प्राणतत्वों, धर्मनिरपेक्ष समाज का निर्माण और सांप्रदायिक सद्भाव का वातावरण बनाने के प्रयत्नों को रेखांकित कर दिया था-

मेरा मंदिर, मेरी मस्जिद, काबा-काशी यह मेरी
पूजा-पाठ, ध्यान जप-तप है घट-घट वासी यह मेरी।
कृष्णचंद्र की क्रीड़ाओं को, अपने आँगन में देखो।
कौशल्या के मातृमोद को, अपने ही मन में लेखो।
प्रभु ईसा की क्षमाशीलता, नबी मुहम्मद का विश्वास
जीव दया जिन पर गौतम की, आओ देखो इसके पास।

जबलपुर से माखनलाल चतुर्वेदी 'कर्मवीर' पत्र निकालते थे। उसमें लक्ष्मण सिंह को नौकरी मिल गईं। सुभद्रा भी उनके साथ जबलपुर आ गईं। सुभद्रा जी सास के अनुशासन में रहकर सुघड़ गृहिणी बनकर संतुष्ट नहीं थीं। उनके भीतर जो तेज था, काम करने का उत्साह था, कुछ नया करने की जो लगन थी, उसके लिए घर की सीमा बहुत छोटी थी। सुभद्रा जी में लिखने की प्रतिभा थी और अब पति के रुप में उन्हें ऐसा व्यक्ति मिला था जिसने उनकी प्रतिभा को पनपने के लिए उचित वातावरण देने का प्रयत्न किया।

स्वतंत्रता में योगदान

1920 - 21 में सुभद्रा और लक्ष्मण सिंह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य थे। उन्होंने नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया और घर-घर में कांग्रेस का संदेश पहुँचाया। त्याग और सादगी में सुभद्रा जी सफ़ेद खादी की बिना किनारी धोती पहनती थीं। गहनों और कपड़ों का बहुत शौक़ होते हुए भी वह चूड़ी और बिंदी का प्रयोग नहीं करती थी। उन को सादा वेशभूषा में देख कर बापू ने सुभद्रा जी से पूछ ही लिया, 'बेन! तुम्हारा ब्याह हो गया है?' सुभद्रा ने कहा, 'हाँ!' और फिर उत्साह से बताया कि मेरे पति भी मेरे साथ आए हैं। इसको सुनकर बा और बापू जहाँ आश्वस्त हुए वहाँ कुछ नाराज़ भी हुए। बापू ने सुभद्रा को डाँटा, 'तुम्हारे माथे पर सिन्दूर क्यों नहीं है और तुमने चूड़ियाँ क्यों नहीं पहनीं? जाओ, कल किनारे वाली साड़ी पहनकर आना।' सुभद्रा जी के सहज स्नेही मन और निश्छल स्वभाव का जादू सभी पर चलता था। उनका जीवन प्रेम से युक्त था और निरंतर निर्मल प्यार बाँटकर भी ख़ाली नहीं होता था।
1922 का जबलपुर का 'झंडा सत्याग्रह' देश का पहला सत्याग्रह था और सुभद्रा जी की पहली महिला सत्याग्रही थीं। रोज़-रोज़ सभाएँ होती थीं और जिनमें सुभद्रा भी बोलती थीं। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के संवाददाता ने अपनी एक रिपोर्ट में उनका उल्लेख लोकल सरोजिनी कहकर किया था। सुभद्रा जी में बड़े सहज ढंग से गंभीरता और चंचलता का अद्भुत संयोग था। वे जिस सहजता से देश की पहली स्त्री सत्याग्रही बनकर जेल जा सकती थीं, उसी तरह अपने घर में, बाल-बच्चों में और गृहस्थी के छोटे-मोटे कामों में भी रमी रह सकती थीं।
लक्ष्मणसिंह चौहान जैसे जीवनसाथी और माखनलाल चतुर्वेदी जैसा पथ-प्रदर्शक पाकर वह स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आन्दोलन में बराबर सक्रिय भाग लेती रहीं। कई बार जेल भी गईं। काफ़ी दिनों तक मध्य प्रांत असेम्बली की कांग्रेस सदस्या रहीं और साहित्य एवं राजनीतिक जीवन में समान रूप से भाग लेकर अन्त तक देश की एक जागरूक नारी के रूप में अपना कर्तव्य निभाती रहीं। गांधी जी की असहयोग की पुकार को पूरा देश सुन रहा था। सुभद्रा ने भी स्कूल से बाहर आकर पूरे मन-प्राण से असहयोग आंदोलन में अपने को दो रूपों में झोंक दिया -

देश - सेविका के रूप में
देशभक्त कवि के रूप में।
‘जलियांवाला बाग,’ 1917 के नृशंस हत्याकांड से उनके मन पर गहरा आघात लगा। उन्होंने तीन आग्नेय कविताएँ लिखीं। ‘जलियाँवाले बाग़ में वसंत’ में उन्होंने लिखा-

परिमलहीन पराग दाग़-सा बना पड़ा है
हा! यह प्यारा बाग़ ख़ून से सना पड़ा है।
आओ प्रिय ऋतुराज! किंतु धीरे से आना
यह है शोक स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खाकर
कलियाँ उनके लिए गिराना थोड़ी लाकर।

सन 1920 में जब चारों ओर गांधी जी के नेतृत्व की धूम थी, तो उनके आह्वान पर दोनों पति-पत्नि स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने के लिए कटिबद्ध हो गए। उनकी कविताई इसीलिए आज़ादी की आग से ज्वालामयी बन गई है।

रचनाएँ

उन्होंने लगभग 88 कविताओं और 46 कहानियों की रचना की। किसी कवि की कोई कविता इतनी अधिक लोकप्रिय हो जाती है कि शेष कविताई प्रायः गौण होकर रह जाती है। बच्चन की 'मधुशाला' और सुभद्रा जी की इस कविता के समय यही हुआ। यदि केवल लोकप्रियता की दृष्टि से ही विस्तार करें तो उनकी कविता पुस्तक 'मुकुल' 1930 के छह संस्करण उनके जीवन काल में ही हो जाना कोई सामान्य बात नहीं है। इनका पहला काव्य-संग्रह 'मुकुल' 1930 में प्रकाशित हुआ। इनकी चुनी हुई कविताएँ 'त्रिधारा' में प्रकाशित हुई हैं। 'झाँसी की रानी' इनकी बहुचर्चित रचना है। राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और जेल यात्रा के बाद भी उनके तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हुए-

'बिखरे मोती (1932 )
उन्मादिनी (1934)
सीधे-सादे चित्र (1947 )।
इन कथा संग्रहों में कुल 38 कहानियाँ (क्रमशः पंद्रह, नौ और चौदह)। सुभद्रा जी की समकालीन स्त्री-कथाकारों की संख्या अधिक नहीं थीं।

स्त्रियों की प्रेरणा

राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाते हुए, उस आनन्द और जोश में सुभद्रा जी ने जो कविताएँ लिखीं, वे उस आन्दोलन में एक नयी प्रेरणा भर देती हैं। स्त्रियों को सम्बोधन करती यह कविता देखिए--

"सबल पुरुष यदि भीरु बनें, तो हमको दे वरदान सखी।
अबलाएँ उठ पड़ें देश में, करें युद्ध घमासान सखी।
पंद्रह कोटि असहयोगिनियाँ, दहला दें ब्रह्मांड सखी।
भारत लक्ष्मी लौटाने को , रच दें लंका काण्ड सखी।।"

असहयोग आन्दोलन के लिए यह आह्वान इस शैली में तब हुआ है, जब स्त्री सशक्तीकरण का ऐसा अधिक प्रभाव नहीं था।

1922 का जबलपुर का 'झंडा सत्याग्रह' देश का पहला सत्याग्रह था और सुभद्रा जी की पहली महिला सत्याग्रही थीं। रोज़-रोज़ सभाएँ होती थीं और जिनमें सुभद्रा भी बोलती थीं। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के संवाददाता ने अपनी एक रिपोर्ट में उनका उल्लेख लोकल सरोजिनी कहकर किया था।
देशप्रेम

वीरों का कैसा हो वसन्त' उनकी एक ओर प्रसिद्ध देश-प्रेम की कविता है, जिसकी शब्द-रचना, लय और भाव-गर्भिता अनोखी थी। स्वदेश के प्रति', 'विजयादशमी', 'विदाई', 'सेनानी का स्वागत', 'झाँसी की रानी की सधि मापर', 'जलियाँ वाले बाग़ में बसन्त' आदि श्रेष्ठ कवित्व से भरी उनकी अन्य सशक्त कविताएँ हैं।

राष्ट्रभाषा प्रेम

'राष्ट्रभाषा' के प्रति भी उनका गहरा सरोकार है, जिसकी सजग अभिव्यक्ति 'मातृ मन्दिर में', नामक कविता में हुई है, यह उनकी राष्ट्रभाषा के उत्कर्ष के लिए चिन्ता है -

'उस हिन्दू जन की गरविनी
हिन्दी प्यारी हिन्दी का
प्यारे भारतवर्ष कृष्ण की
उस प्यारी कालिन्दी का
है उसका ही समारोह यह
उसका ही उत्सव प्यारा
मैं आश्चर्य भरी आंखों से
देख रही हूँ यह सारा
जिस प्रकार कंगाल बालिका
अपनी माँ धनहीता को
टुकड़ों की मोहताज़ आज तक
दुखिनी की उस दीना को"

काव्य में प्रेमानुभुति

सुभद्राकुमारी चौहान नारी के रूप में ही रहकर साधारण नारियों की आकांक्षाओं और भावों को व्यक्त करती हैं। बहन, माता, पत्नी के साथ-साथ एक सच्ची देश सेविका के भाव उन्होंने व्यक्त किए हैं। उनकी शैली में वही सरलता है, वही अकृत्रिमता और स्पष्टता है जो उनके जीवन में है।

- गजानन माधव मुक्तिबोध
तरल जीवनानुभुतियों से उपजी सुभद्रा कुमारी चौहान कि कविता का प्रेम दूसरा आधार-स्तम्भ है। यह प्रेम द्विमुखी है। शैशव - बचपन से प्रेम और दूसरा दाम्पत्य प्रेम, 'तीसरे' की उपस्थिति का यहाँ पर सवाल ही नहीं है।

बचपन से प्रेम
शैशव से प्रेम पर जितनी सुन्दर कविताएँ उन्होंने लिखी हैं, भक्तिकाल के बाद वे अतुलनीय हैं। निर्दोष और अल्हड़ बचपन को जिस प्रकार स्मृति में बसाकर उन्होंने मधुरता से अभिव्यक्त किया है, वे कभी पुरानी न पड़ने वाली कविता है। उदाहरणार्थ -

"बार-बार आती है मुझको
मधुर याद बचपन तेरी",
"आ जा बचपन, एक बार फिर
दे दो अपनी निर्मल शान्ति
व्याकुल व्यथा मिटाने वाली
वह अपनी प्राकृत विश्रांति।"

अपनी संतति में मनुष्य किस प्रकार 'मेरा नया बचपन कविता' कविता में मार्मिक अभिव्यक्ति पाता है-

"मैं बचपन को बुला रही थी
बोल उठी बिटिया मेरी
नंदन वन सी फूल उठी
यह छोटी-सी कुटिया मेरी।।"

शैशव सम्बन्धी इन कविताओं की एक और बहुत बड़ी विशेषता है, कि ये 'बिटिया प्रधान' कविताएँ हैं - कन्या भ्रूण-हत्या की बात तो हम आज ज़ोर-शोर से कर रहे हैं, किन्तु बहुत ही चुपचाप, बिना मुखरता के, सुभद्रा इस विचार को सहजता से व्यक्त करती हैं। यहाँ 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो' का भाव नहीं, अपितु संसार का समस्त सुख बेटी में देखा गया है। 'बालिका का परिचय' बिटिया के महत्व को इस प्रकार प्रस्थापित करती है-

"दीपशिखा है अंधकार की
घनी घटा की उजियाली
ऊषा है यह कमल-भृंग की
है पतझड़ की हरियाली।"

कहा जाता है कि उन्होंने अपनी पुत्री का कन्यादान करने से मना कर दिया कि 'कन्या कोई वस्तु नहीं कि उसका दान कर दिया जाए।' स्त्री-स्वतंत्र्य का कितना बड़ा पग था वह।

दाम्पत्य प्रेम
प्रेम की कविताओं में जीवन-साथी के प्रति अटूट प्रेम, निष्ठा एवं रागात्मकता के दर्शन होते हैं- 'प्रियतम से', 'चिन्ता', 'मनुहार राधे।', 'आहत की अभिलाषा', 'प्रेम श्रृखला', 'अपराधी है कौन', 'दण्ड का भागी बनता कौन', आदि उनकी बहुत सुन्दर प्रेम कविताएँ हैं। दाम्पत्य की रूठने और मनुहार करती 'प्रियतम से' कविता का यह अंश देखिए-

"ज़रा-ज़रा सी बातों पर
मत रूको मेरे अभिमानी
लो प्रसन्न हो जाओ
ग़लती मैंने अपनी सब मानी
मैं भूलों की भरी पिटारी
और दया के तुम आगार
सदा दिखाई दो तुम हँसते
चाहे मुझसे करो न प्यार।"
अपने और प्रिय और बीच किसी 'तीसरे' की उपस्थिति उनके लिए पूर्ण असहनीय है। 'मानिनि राध', कविता में व्यक्त यह आक्रोश पूरे साहित्य में विरल है-
"ख़ूनी भाव उठें उसके प्रति
जो हों प्रिय का प्यारा
उसके लिए हृदय यह मेरा
बन जाता हत्यारा।"
दाम्पत्य की विषम, विर्तुल और गोपन स्थितियों की जिस अकुंठ भाव से अभिव्यक्ति सुभद्रा कुमारी चौहान ने की है, वह बड़ी मार्मिक बन पड़ी है-
"यह मर्म-कथा अपनी ही है
औरों की नहीं सुनाऊँगी
तुम रूठो सौ-सौ बार तुम्हें
पैरों पड़ सदा मनाऊँगी
बस, बहुत हो चुका, क्षमा करो
अवसाद हटा दो अब मेरा
खो दिया जिसे मद जिसे मद में मैंने
लाओ, दे दो वह सब मेरा।"

भक्ति भावना

उनका भक्ति-भाव भी प्रबल है। पूर्ण मन से प्रभु के सम्मुख सर्वात्म समर्पण की इससे सुन्दर, सहज अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती-

"देव! तुम्हारे कई उपासक
कई ढंग से आते
में बहुमूल्य भेंट व
कई रंग की लाते हैं।"

प्रकृति प्रेम

प्रकृति से भी सुभद्रा कुमारी चौहान के कवि का गहन अनुराग रहा है--'नीम', 'फूल के प्रति', 'मुरझाया फूल' आदि में उन्होंने प्रकृति का चित्रण बड़े सहज भाव से किया है। इस प्रकार सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता का फ़लक अत्यन्त व्यापक है, किंतु फिर भी.........खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी, उनकी अक्षय कीर्ति का ऐसा स्तम्भ है जिस पर काल की बात अपना कोई प्रभाव नहीं छोड़ पायेगी, यह कविता जन-जन का ह्रदयहार बनी ही रहेगी।

बाल कविताएँ

सुभद्रा जी ने मातृत्व से प्रेरित होकर बहुत सुंदर बाल कविताएँ भी लिखी हैं। यह कविताएँ भी उनकी राष्ट्रीय भावनाओं से ओत प्रोत हैं। 'सभा का खेल' नामक कविता में, खेल-खेल में राष्ट्रीय भाव जगाने का प्रयास इस प्रकार किया है -

सभा-सभा का खेल आज हम खेलेंगे,
जीजी आओ मैं गांधी जी, छोटे नेहरु, तुम सरोजिनी बन जाओ।
मेरा तो सब काम लंगोटी गमछे से चल जाएगा,
छोटे भी खद्दर का कुर्ता पेटी से ले आएगा।
मोहन, लल्ली पुलिस बनेंगे,
हम भाषण करने वाले वे लाठियाँ चलाने वाले,
हम घायल मरने वाले।

इस कविता में बच्चों के खेल, गांधी जी का संदेश, नेहरु जी के मन में गांधी जी के प्रति भक्ति, सरोजिनी नायडू की सांप्रदायिक एकता संबंधी विचारधारा को बड़ी खूबी से व्यक्त किया गया है। असहयोग आंदोलन के वातावरण में पले-बढे़ बच्चों के लिए ऐसे खेल स्वाभाविक थे। प्रसिद्ध हिन्दी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने सुभद्रा जी के राष्ट्रीय काव्य को हिन्दी में बेजोड़ माना है- कुछ विशेष अर्थों में सुभद्रा जी का राष्ट्रीय काव्य हिन्दी में बेजोड़ है। क्योंकि उन्होंने उस राष्ट्रीय आदर्श को जीवन में समाया हुआ देखा है, उसकी प्रवृत्ति अपने अंतःकरण में पाई है, अतः वह अपने समस्त जीवन-संबंधों को उसी प्रवृत्ति की प्रधानता पर आश्रित कर देती हैं, उन जीवन संबंधों को उस प्रवृत्ति के प्रकाश में चमका देती हैं।… सुभद्राकुमारी चौहान नारी के रूप में ही रहकर साधारण नारियों की आकांक्षाओं और भावों को व्यक्त करती हैं। बहन, माता, पत्नी के साथ-साथ एक सच्ची देश सेविका के भाव उन्होंने व्यक्त किए हैं। उनकी शैली में वही सरलता है, वही अकृत्रिमता और स्पष्टता है जो उनके जीवन में है। उनमें एक ओर जहाँ नारी-सुलभ गुणों का उत्कर्ष है, वहाँ वह स्वदेश प्रेम और देशाभिमान भी है जो एक क्षत्रिय नारी में होना चाहिए।

नारी समाज का विश्वास

सुभद्रा जी की बेटी सुधा चौहान का विवाह प्रसिद्ध साहित्यकार प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय से हुआ था जो स्वयं अच्छे लेखक थे। सुधा ने उनकी जीवनी लिखी- मिला तेज से तेज। सुभद्रा जी का पूरा जीवन सक्रिय राजनीति में बीता। वह नगर की सबसे पुरानी कार्यकर्ती थीं। 1930 - 31 और 1941 - 42 में जबलपुर की आम सभाओं में स्त्रियाँ बहुत बड़ी संख्या में एकत्र होती थीं जो एक नया ही अनुभव था। स्त्रियों की इस जागृति के पीछे सुभद्रा जी थीं जो उनकी तैयार की गई टोली के अनवरत प्रयास का फल था। सन् 1920 से ही वे सभाओं में पर्दे का विरोध, रूढ़ियों के विरोध, छुआछूत हटाने के पक्ष में और स्त्री-शिक्षा के प्रचार के लिए बोलती रही थीं। उन सबसे बहुत-सी बातों में अलग होकर भी वह उन्हीं में से एक थीं। उनमें भारतीय नारी की सहज शील और मर्यादा थी, इस कारण उन्हें नारी समाज का पूरा विश्वास प्राप्त था। विचारों की दृढ़ता के साथ-साथ उनके स्वभाव और व्यवहार में एक लचीलापन था, जिससे भिन्न विचारों और रहन-सहन वालों के दिल में भी उन्होंने घर बना लिया था।

कहानी लेखन

सुभद्रा जी ने कहानी लिखना आरंभ किया क्योंकि उस समय संपादक कविताओं पर पारिश्रमिक नहीं देते थे। संपादक चाहते थे कि वह गद्य रचना करें और उसके लिए पारिश्रमिक भी देते थे। समाज की अनीतियों से जुड़ी जिस वेदना को वह अभिव्यक्त करना चाहती थीं, उसकी अभिव्यक्ति का एक मात्र माध्यम गद्य ही हो सकता था। अतः सुभद्रा जी ने कहानियाँ लिखीं। उनकी कहानियों में देश-प्रेम के साथ-साथ समाज की विद्रूपता, अपने को प्रतिष्ठित करने के लिए संघर्षरत नारी की पीड़ा और विद्रोह का स्वर देखने को मिलता है। एक ही वर्ष में उन्होंने एक कहानी संग्रह 'बिखरे मोती' बना डाला। 'बिखरे मोती' संग्रह को छपवाने के लिए वह इलाहाबाद गईं। इस बार भी सेकसरिया पुरस्कार उन्हें ही मिला- कहानी संग्रह 'बिखरे मोती' के लिए। उनकी अधिकांश कहानियाँ सत्य घटना पर आधारित हैं। देश-प्रेम के साथ-साथ उनमें गरीबों के लिए सच्ची सहानुभूति दिखती है।

अंतिम रचना

उनकी मृत्यु पर माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा कि सुभद्रा जी का आज चल बसना प्रकृति के पृष्ठ पर ऐसा लगता है मानो नर्मदा की धारा के बिना तट के पुण्य तीर्थों के सारे घाट अपना अर्थ और उपयोग खो बैठे हों।
मैं अछूत हूँ, मंदिर में आने का मुझको अधिकार नहीं है।
किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥
प्यार असीम, अमिट है, फिर भी पास तुम्हारे आ न सकूँगी।
यह अपनी छोटी सी पूजा, चरणों तक पहुँचा न सकूँगी॥
इसीलिए इस अंधकार में, मैं छिपती-छिपती आई हूँ।
तेरे चरणों में खो जाऊँ, इतना व्याकुल मन लाई हूँ॥
तुम देखो पहिचान सको तो तुम मेरे मन को पहिचानो।
जग न भले ही समझे, मेरे प्रभु! मेमन की जानो॥

यह कविता कवियत्री की अंतिम रचना है।

दु:खद निधन

14 फरवरी को उन्हें नागपुर में शिक्षा विभाग की मीटिंग में भाग लेने जाना था। डॉक्टर ने उन्हें रेल से न जाकर कार से जाने की सलाह दी। 15 फरवरी 1948 को दोपहर के समय वे जबलपुर के लिए वापस लौट रहीं थीं। उनका पुत्र कार चला रहा था। सुभद्रा ने देखा कि बीच सड़क पर तीन-चार मुर्गी के बच्चे आ गये थे। उन्होंने अचकचाकर पुत्र से मुर्गी के बच्चों को बचाने के लिए कहा। एकदम तेज़ी से काटने के कारण कार सड़क किनारे के पेड़ से टकरा गई। सुभद्रा जी ने ‘बेटा’ कहा और वह बेहोश हो गई। अस्पताल के सिविल सर्जन ने उन्हें मृत घोषित किया। उनका चेहरा शांत और निर्विकार था मानों गहरी नींद सो गई हों। 16 अगस्त 1904 को जन्मी सुभद्रा कुमारी चौहान का देहांत 15 फरवरी 1948 को 44 वर्ष की आयु में ही हो गया। एक संभावनापूर्ण जीवन का अंत हो गया।

उनकी मृत्यु पर माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा कि सुभद्रा जी का आज चल बसना प्रकृति के पृष्ठ पर ऐसा लगता है मानो नर्मदा की धारा के बिना तट के पुण्य तीर्थों के सारे घाट अपना अर्थ और उपयोग खो बैठे हों। सुभद्रा जी का जाना ऐसा मालूम होता है मानो ‘झाँसी वाली रानी’ की गायिका, झाँसी की रानी से कहने गई हो कि लो, फिरंगी खदेड़ दिया गया और मातृभूमि आज़ाद हो गई। सुभद्रा जी का जाना ऐसा लगता है मानो अपने मातृत्व के दुग्ध, स्वर और आँसुओं से उन्होंने अपने नन्हे पुत्र को कठोर उत्तरदायित्व सौंपा हो। प्रभु करे, सुभद्रा जी को अपनी प्रेरणा से हमारे बीच अमर करके रखने का बल इस पीढ़ी में हो।

सम्मान और पुरस्कार

इन्हें 'मुकुल' तथा 'बिखरे मोती' पर अलग-अलग सेकसरिया पुरस्कार मिले।
भारतीय तटरक्षक सेना ने 28 अप्रॅल 2006 को सुभद्रा कुमारी चौहान को सम्मानित करते हुए नवीन नियुक्त तटरक्षक जहाज़ को उन का नाम दिया है।
भारतीय डाक तार विभाग ने 6 अगस्त 1976 को सुभद्रा कुमारी चौहान के सम्मान में 25 पैसे का एक डाक-टिकट जारी किया था।
जबलपुर के निवासियों ने चंदा इकट्ठा करके नगरपालिका प्रांगण में सुभद्रा जी की आदमकद प्रतिमा लगवाई जिसका अनावरण 27 नवंबर 1949 को कवयित्री और उनकी बचपन की सहेली महादेवी वर्मा ने किया। प्रतिमा अनावरण के समय भदंत आनंद कौसल्यायन, हरिवंशराय बच्चन जी, डॉ. रामकुमार वर्मा और इलाचंद्र जोशी भी उपस्थित थे। महादेवी जी ने इस अवसर पर कहा, नदियों का कोई स्मारक नहीं होता। दीपक की लौ को सोने से मढ़ दीजिए पर इससे क्या होगा? हम सुभद्रा के संदेश को दूर-दूर तर फैलाएँ और आचरण में उसके महत्व को मानें- यही असल स्मारक है।