गुरुवार, 15 अगस्त 2013

आरती भारत माता की



आरती भारत माता की


आरती भारत माता की,
जगत की भाग्यविधाता की॥धृ॥

मुकुटसम हिमगिरिवर सोहे,
चरण को रत्नाकर धोए,
देवता कण-कण में छाये
वेद के छंद, ग्यान के कंद, करे आनंद,
सस्यश्यामल ऋषिजननीकी॥1॥ जगत की...........

जगत से यह लगती न्यारी,
बनी है इसकी छवि प्यारी,
कि दुनिया झूम उठे सारी,
देखकर झलक, झुकी है पलक, बढ़ी है ललक,
कृपा बरसे जहाँ दाता की॥2॥ जगत की...........

पले जहाँ रघुकुल भूषण राम,
बजाये बंसी जहाँ घनश्याम,
जहाँ पग-पग पर तीरथ धाम,
अनेको पंथ, सहस्त्रों संत, विविध सद्ग्रंथ
सगुण-साकार जगन्माँकी॥3॥ जगत की...........

गोद गंगा-जमुना लहरे,
भगवा फहर-फहर फहरे,
तिरंगा लहर-लहर लहरे,
लगे हैं घाव बहुत गहरे,
हुए हैं खण्ड, करेंगे अखण्ड, यत्न कर चण्ड
सर्वमंगल-वत्सल माँ की॥4।। जगत की...........

बढ़ाया संतों ने सम्मान,
किया वीरों ने जीवनदान,
हिंदुत्व में निहित है प्राण,
चलेंगे साथ, हाथ में हाथ, उठाकर माथ,
शपथ गीता - गौमाता की॥5॥ जगत की...........
भारत माता की जय.....
----------
भारत-माता
जिसका कंकर-कंकर शंकर है, और जिसकी बूँद-बूँद गंगा है;
कश्मीर जिसका मस्तक है और हिमालय जटाएँ हैं;

विंध्याचल जिसका कटिपट है और नर्मदा जिसकी करधनी है;
पूर्व-पश्चिम घाटियाँ जिसकी जंघाएँ हैं और कन्याकुमारी जिसके चरण हैं;

काले-काले बादल जिसके बाल हैं, और बसन्त जिसका श्रृंगार है;
जो ऋषिमुनियोंकी भूमि है और जिसमें गंगा बहती है;

वह हमारा देश भारत है।

भारत हमारी जननी है, जन्मभूमि है, मातृभूमि है, पितृभूमि है।
यह सन्तोंकी भूमि है, महन्तोंकी भूमि है।

यह अर्पणकी भूमि है, यह तर्पणकी भूमि है;
यह वन्दनकी भूमि है, अभिनन्दनकी भूमि है।

हम जियेंगे तो इसके लिये और मरेंगे तो इसके लिये।

यह गद्यकाव्य भूतपूर्व प्रधानमंत्री आदरणीय श्री अटलजी का है
----------
प्रार्थना
है प्रार्थना गुरुदेवसे, हो स्वर्गसम माँ भारती
संसार में उन्नत रहें, सब जन उतारें आरती |
हो आचरण से शुद्ध हम, इस विश्वसे मैत्री करें
हर दु:ख-दैन्य-दरिद्रता, निज-बोधसे सबकी हरें ||१||धन-धान्यसे समृद्ध हो, धरती यहाँ की सर्वदा
हो मुक्त आधि-व्याधिसे, आये न कोई आपदा |
विज्ञानमय मस्तक हमारा, स्नेह अंतरमें बहे
वेदांतकी हो दृष्टि हरपल, हाथ सेवामें रहें ||२||
परिवारमें सुख-शांति हो, कर्तव्यतत्पर व्यक्ति हो
आरोग्य-शिक्षा-धन उपार्जन, सर्वदा उपलब्ध हो |
ग्रामीण पिछड़े बंधुओंकी, शीघ्र होवे उन्नति
गिरिवासि-वनवासी-अपंगों को मिले सेवा तति ||३||स्वातंत्र्य-समता-बंधुता हो विविधतामें एकता
हो सर्व भेद विलीन समरस जागती राष्ट्रीयता |
सद्बुद्धि-बल-पुरुषार्थसे चारित्र्य और विवेकसे
संपन्न हो युववर्ग भी सर्वत्र दिग्विजयी रहें ||४||यह विश्व है हरीरूप इसकी, कर्मसे पूजा करें
हम दीपवत् जलकर स्वयं इस, संस्कृति का तम हरें |
कल्याण होवे विश्वका, निर्वैरता का भाव हो
मंगल समन्वय-मंत्र गूँजे धर्मकी यह राह हो ||५||

- स्वामी गोविंददेव गिरिजी महाराज

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें