शनिवार, 30 नवंबर 2013

लिव इन रिलेशनशिप : जनहित के विरुद्ध विरूद्ध




फैसला है या शोषण की मान्यता ?

- स्मृति जोशी
अदालत ने पिछले दिनों एक फैसला दिया और सारे देश में ऐसा हल्ला मचा जैसे इस एक फैसले मात्र से हम सब असभ्य हो जाएँगे। 'हम' सब जो नहीं सोचते लिव इन रिलेशन जैसी बातों के बारे में, 'हम' जो डरते हैं परंपरा और मर्यादा के नाम पर खुलेआम मिलने से। शोर देख-सुन कर लगा जैसे हम अपने आप पर ही नियंत्रण खो देगें और चल पड़ेंगे अपनी पसंद का 'बिना विवाह करने वाला साथी' ढूँढने।

बात बेहद साधारण स‍ी है कि एक पुरुष या स्त्री, स्वतंत्र रूप से जन्म लेता है। परिवार में उसे जीवन के मूल्यों और संस्कारों की शिक्षा मिलती है। घर के सदस्यों के आचरण को देखकर वह अपनी समझ में विस्तार लाता है। जरूरत पड़ने पर आवश्यक संशोधन करता है। अच्छे और बुरे की तमीज उसे इसी परिवार से मिलती है। फिर बारी आती है विद्यालयों की। जहाँ उसे शिक्षक नैतिकता और अनैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं।

यहीं उसे दोस्त मिलते हैं जो भिन्न परिवेश से आए होते हैं। उम्र के कच्चेपन में बिगड़ने-बहकने का यही दौर होता है। लेकिन इन सबके बीच एक आम इंसान की तरह उसका परिस्थिति को देखने-समझने का अपना एक नजरिया विकसित होता है। उसका अपने आप पर एक नियंत्रण स्थापित होता है। विवेक जाग्रत होता है। ऐसे में जमाने के आँधी-तूफान से निपटने का हौंसला भी खुद उसमें जन्म लेता है। यहीं जरूरत होती है परिवार के लोगों में एक सहज-संतुलित सोच और विश्वास की। अगर परिवार में उसे सही और सुंदर संस्कार मिलें हैं तो अदालतों के ऐसे फैसले उसे चाह कर भी बहका-भटका नहीं सकते।

फैसला क्या है
मंगलवार को प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति केजी बालकृष्णन, न्यायमूर्ति दीपक वर्मा और न्यायमूर्ति बीएस चौहान की पीठ ने कहा कि दो बालिग लोगों का एक साथ रहना कोई अपराध नहीं है? कोई गुनाह नहीं है। यह अपराध नहीं हो सकता अगर दो लोग अपनी मर्जी से साथ रहते हैं।

विरोध के स्वर
इस फैसले के साथ ही उठा एक बवंडर। पारंपरिक सोच वालों के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जन्मदिन पर इस तरह का फैसला आना दुर्भाग्यजनक है। हमारा सनातन धर्म इस बात की अनुमति कतई नहीं दे सकता कि दो लोग विवाह नामक पवित्र संस्कार की अवहेलना कर इस तरह साथ रहें और जब जी चाहे अलग हो जाए। इससे पतन की राह पर आगे बढ़ने का युवाओं में दुस्साहस पैदा होगा। अब तक जो युवा परिवार की मर्यादा या कानून के डर से रिश्ते को खुला रूप देने में हिचकिचाते थे उनमें भी इस गलत बात के लिए हिम्मत पैदा होगी। यानी कहीं कोई एक दबाव की जो परत है वह इस फैसले से चटक जाएगी। यूँ भी आज का युवा अब किसी के बस का नहीं रहा। इस फैसले से उसमें आत्मविश्वास की अति का जन्म होगा। जो समय गुजरने पर गर्भपात, हिंसा और बेशर्मी का भी जनक होगा।

लड़के फायदा उठाएँगे
कल तक जो युवा व्यक्तिगत रिश्तों में एक सीमा के बाद आगे नहीं बढ़ते थे अब उन्हें किसी बात का कोई खौफ नहीं रहेगा। भोली-भाली लड़कियों की भावनाओं से खेलना पहले ही जिनका शगल था वे अब देह तक पहुँचने में देर नहीं करेंगे। इस हद तक जो पहले ही पहुँच चुके हैं वे अब मानवीयता के बचे-खुचे धरातल को भी खो देंगे क्योंकि कानूनन उन पर कोई बंधन नहीं होगा।

छली जाएँगी लड़कियाँ
वे लड़कियाँ जो कल तक इस तरह के सहजीवन से अपनी शादी, करियर, भविष्य, कानूनी उलझन और बदनामी के डर से बचती रही वे इस फैसले का गलत शिकार होगी। वे यह सोचकर कि इस तरह साथ जीवन गुजारना कोई गुनाह नहीं है, अपने आपको खुद भी छलेंगी और लड़कों से भी छली जाएँगी। यूँ भ‍ी हम आज बढ़ती तकनीक की कृपा से खुलेपन के ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ कभी भी, किसी भी वक्त कोई भी वाँछित चीज सरलता से पाई जा सकती है। ऐसे में शारीरिक , मानसिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मर्यादा व मूल्य बचाए रखने का दायित्व आखिर कौन निभाएगा?

देह को लेकर चाहे हम सामाजिक परिधियों और वर्जनाओं का उल्लंघन कर लें मगर नैसर्गिक रूप से भुगतना तो लड़की को ही है। इस मामले में तो सर्वशक्तिमान ईश्वर ने भी भेदभाव ही किया है उसके साथ। कानून के नाम पर नैतिकता को ताक पर रख भी दिया, तो क्या अनुशासनहीन जीवन के नुकसान कम हो जाएँगे? यौन रोगों की बढ़ती संख्या को देखते हुए जरूरी है कि हम पर हमारा ही नियंत्रण, नियम और शासन रहे। कानूनन चाहे हमें किसी भी रूप में रहने की आजादी मिल जाए लेकिन लड़कियों को कैसा जीवन जीना है यह उनका विवेक ही तय करें बेहतर है।

विवाह का महत्व हमेशा रहेगा
वैदिक ऋचाओं में गुँथे मंत्रों के उच्च स्वर के बीच जब दो मन का मिलन होता है तब वातावरण में पवित्र और सकारात्मक तरंगे लहराती है। ये तरंगे ही एक-दूजे को हमेशा साथ रहने की प्रेरणा और ऊर्जा देती है। माता-पिता और स्नेहीजनों के आशीर्वाद में इतनी शक्ति होती है कि दाम्पत्य जीवन की हर बाधा को निर्विघ्न पार किया जा सकता है। सम्मान, सुरक्षा और प्रतिष्ठा की जो चमक विवाह करने के उपरांत चेहरे पर आती है वह यूँ ही साथ रहने से मलीनता में बदल जाती है।

तय हमें करना है कि हम अपने जीवन में गरिमा और गौरव को वरीयता देते हैं या मात्र कानून के दम पर बनाए अस्तित्वहीन रिश्ते को? एक ऐसा रिश्ता जिसका कोई आधार नहीं, कोई मूल्य नहीं, कोई समर्पण नहीं, कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं। जो रिश्ता इनमें से किसी भी प्रकार की गारंटी नहीं लेता वह समाज की नजर में तो दूर खुद की ही नजरों में कितना सम्मानजनक होगा?

यह शोषण है स्वतंत्रता नहीं
इस रिश्ते में छल, कपट, शोषण और एक दूजे को इस्तेमाल करने की भावना अधिक होगी जो बिना किसी सामाजिक बंधनों के बना है। एक दूजे के प्रति सम्मान की भावना भी नदारद होगी। कहीं यह महिलाओं के शोषण की नई राह तो नहीं खोलेगा? तथाकथित स्वतंत्र युवतियों को भी अपने मानस में स्वतंत्रता की इस नई और छद्म परिभाषा को बसाने से पहले सोचना चाहिए कि यह शोषण का ही आधुनिक रूप है। बलात्कार का ही नया और 'सभ्य' तरीका है, जहाँ सिवाय बर्बादी और बदनामी के हासिल कुछ नहीं होगा।

संस्कृति से खेल
हमारी संस्कृति हमारी शान है। हमें अपनी मर्यादा और मूल्यों पर नाज है। लेकिन इस तरह के फैसले हमारी संस्कृति का हनन करते हैं। संस्कृति किसी की संपत्ति नहीं है जो जब चाहे समय के अनुसार और आने वाली पीढि़यों की इच्छानुसार बदली जा सकें। इस खेल में हार मानवता और उसके अनुशासन की है। हार संयम और सभ्यता की है फिर इसे खेला ही क्यों जाए?

डरना मना है
हमारे संस्कारों, अनुशासन, मूल्य और शालीनता की नींव इतनी कमजोर कभी नहीं रही कि एक फैसला होगा और हर युवा लिव इन रिलेशन के सपने देखने लगेगा। व्यावहारिक तौर पर यह संभव ही नहीं है। हर युवा इसके परिणाम-दुष्परिणाम से अवगत है। और फिर भी ना सुने तो फूटने दीजिए सिर और टूटने दीजिए दिल। गिरने दीजिए और संभलने दीजिए। नैतिकता के जो अर्थ हमारे पुराणों में वर्णित है वही अर्थ और वही परिभाषा युवा खुद रचने लगेंगे, जब एक बिखरी हुई जिंदगी उनके सामने होगी।
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स्वच्छंदता का विरोध या पुरुषवादी मानसिकता   

-वेबदुनिया डेस्क
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि महिला और पुरुष बिना शादी के भी एक साथ रह सकते हैं और यौन संबंध बना सकते हैं। इसे आप नैतिक दृष्टि से तो गलत मान सकते हैं और सामाजिक तौर पर भी स्वस्थ परम्परा नहीं कहा जा सकता है, लेकिन इसे अपराध नहीं कहा जा सकता है। यदि कोई समाज के बनाए नियम कायदों को मानने की बजाय स्वच्छंद जीवन जीना चाहता है तो आप उसकी यह आजादी छीन भी नहीं सकते हैं।

ऐसे फैसलों का विरोध मात्र इसलिए ज्यादा होता है कि महिलाओं को अपनी मनमर्जी से किसी के भी साथ रहने को बुरा माना जाता है। देश में करोड़ों महिलाएँ विवाह के बावजूद ऐसे बहुत से तथाकथित सामाजिक और नैतिक बंधनों का शिकार बनी रहती हैं, जिन्हें अनैतिक और असामाजिक कहा जा सकता है, लेकिन इनका विरोध इसलिए नहीं होता है क्योंकि इनसे पुरुष के अहंकार या उसकी श्रेष्ठता को चुनौती नहीं दी जाती है।

दरअसल हम समाज में पाखंड पालने के आदी हो गए हैं। पुरुषों के लिए वेश्यालय तो बन सकते हैं या ऐसी ही अन्य तरह की व्यवस्था हो सकती हैं, लेकिन हम महिलाओं को वेश्यावृत्त‍ि करने का अधिकार भी नहीं देना चाहते हैं? सामा‍ज‍िक और नैतिक मूल्यों की बराबरी का देश में यह आलम है कि पुरुष को तो किसी भी आयु में किसी भी महिला से पत्नी के अतिरिक्त यौन संबंध बनाने की छूट मिलती है और वह चाहे तो वेश्यालय भी जा सकता है, लेकिन जब बात औरतों की आती है तो हमारे सारे संस्कार, धार्मिक विश्वास और संस्कृति‍ चीखने-चिल्लाने लगती है कि महिलाओं को ये अधिकार नहीं मिलने चाहिए? हम यह मानकर चलते हैं कि केवल महिलाओं की नै‍तिकता रक्षा करना जरूरी है पुरुष की नैतिक रक्षा करने की जरूरत ही नहीं है।

आज के समय में महिलाओं ने भी अपनी क्षमताएँ जाहिर की हैं और सिद्ध किया है कि वह किसी भी दृष्टि से पुरुषों से कम नहीं है, लेकिन वे आज भी वे कदम-कदम पर प्रताड़ित होती हैं, अपमानित होती हैं और यदि हम नैतिकता की बात करते हैं तो घरों के अंदर भी लड़कियाँ सुरक्षित नहीं हैं। लड़कियों, महिलाओं के परिजन, संबंधी घरों में ही उनसे बलात्कार तक कर डालते हैं तब उन्हें किसी नैतिकता या सामाजिक मूल्यों की याद नहीं रहती है, लेकिन अगर कोई औरत कह दे कि वह विवाह पूर्व यौन संबंध बनाने में कोई बुराई नहीं देखती है तो इस पर बवाल मच जाता है। हमें लगने लगता है कि एक औरत की ऐसी बातों से हमारी पूरी सभ्यता और संस्कृति नष्ट हो जाएगी। मर्यादाओं का पतन होगा और नैतिक मूल्य रसातल में समा जाएँगे।

इसका कारण यह है कि हम यह मानने को तैयार ही नहीं है कि लड़कियों और महिलाओं में आज किसी तरह की कमी नहीं है। वे भी सही समय पर सही ‍‍‍न‍िर्णय ले सकती हैं और उनमें भी अपना अच्छा भला पहचानने की क्षमता है। इसके बावजूद 3.3 फीसदी महिलाएँ अपने पेशेवर करियर के शीर्ष पर पहुँच ही जाती हैं। 17.8 प्रतिशत महिलाएँ मध्यम दर्जे तक सीमित रहती हैं और 78.9 फीसदी महिलाएँ सुविधाओं के अभाव में निम्न स्तर का ही जीवन गुजारती हैं।

आज भी पुरुषों को अधिकार जहाँ अपने आप मिल जाते हैं वहीं महिलाओं को अपने हकों के लिए लड़ना पड़ना है। कभी समाज, कभी धार्मिक मान्यताओं, कभी सभ्यता-संस्कृति और कभी अन्यान्य कारणों से महिलाओं को पुरुषों से नीचे रखने की संस्थाबद्ध तरीके से कोशिश की जाती रही है। महिला अगर कम कपड़े पहने तो अश्लीलता और पुरुष अगर नंगा घूमे तो फैशन। लड़कों की चार-चार गर्लफ्रेंड हों तो गर्व करने लायक बात होती है, लेकिन लड़की का एक भी बॉयफ्रेंड होना शर्म की बात है।

यदि गे समाज कानूनी मान्यता के लिए लड़ रहा है, तो ऐसे में लिव इन रिलेशन में क्या बुराई है? हमें यह बात भी देखना चाहिए कि अगर पश्चिमी देशों के समाजों में इस तरह की छूट है तो वहाँ परिवार का भी पूरी तरह से अस्तित्व समाप्त नहीं हो गया है। इस बात को समझा जाना चाहिए कि जिस समाज और काल में जिस तरह के विचारों की उपयोगिता रहेगी उसे आप नकार नहीं सकते हैं भले ही आप उसे पसंद करते हों या नहीं।

भारतीय समाज का एक विरोधाभास यह भी है कि वह औरत को देवी का दर्जा देता है लेकिन जब उन्हें अधिकार और सुविधाएँ देने की बात आती है तो हमें लगता है कि वे पुरुषों से आगे निकल जाएँगी और वह सब करने लगेंगी जोकि पुरुष करते रहे हैं। पुरुषवादी मानसिकता की यही समस्या है और इसलिए कोर्ट को भी ऐसे निर्णय देकर हमें बताना पड़ता है कि पुरुष और महिला बराबरी की हद तक स्वतंत्र हैं।

जो कोई बात महिलाओं के लिए गलत है वह जरूरी नहीं है कि वह पुरुष के लिए ठीक हो लेकिन हम तो हम मान बैठे हैं कि महिलाओं को संभालना या काबू में रखना पुरुष का विशेषाधिकार है और उसे यह अधिकार किसी भी सूरत में महिलाओं को नहीं सौंपना है क्योंकि महिलाओं में समाज, देश, काल, सभ्यता, संस्कति और नैतिकता की समझ कम होती है।

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