शनिवार, 28 दिसंबर 2013

गुजरात दंगा : नरेंद्र मोदी ने किया दर्द बयां




आईबीएन-7 | Dec 27, 2013

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2002 दंगों पर 11 साल बाद सफाई दी है। बीते गुरुवार को उन्हें गुलबर्ग सोसायटी दंगा मामले में कोर्ट से राहत मिली है। कोर्ट ने मोदी को मिली एसआईटी की क्लीन चिट बरकरार रखी है। मोदी ने कोर्ट के फैसले को सत्य की जीत बताया, और आज उन्होंने दंगों पर विस्तार से सफाई दी है।
उन दिनों को याद करते हुए मोदी ने कहा कि 2002 दंगों के बाद वे बेहद व्यथित और आहत थे। मोदी के मुताबिक दंगों ने उन्हें भीतर तक हिला दिया था, उस दुख को वो कभी साझा नहीं कर पाए। मोदी ने ब्लॉग पर लिखा है कि वो पहली बार गुजरात दंगों की व्यथा बयां कर रहे हैं।
मोदी के मुताबिक उन्होंने दंगों के दौर की पीड़ा अकेले ही झेली। मोदी कहते हैं कि गुजरात दंगों जैसे क्रूर दिन किसी को देखने नहीं पड़े, और ईश्वर उन्हें ताकत दें इसकी वो कामना करते हैं। मोदी का दावा है कि गुजरात के दंगों के दौरान वो शांति और संयम बनाए रखने की अपील करते रहे। उन्होंने माना कि शांति बनाए रखना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी थी।

मोदी का दावा है कि उनकी सरकार ने दंगाइयों से कड़ाई से निपटने की कोशिश की। उसी वक्त उन्हें अंदेशा हो गया था कि उन पर आरोप लगते रहेंगे। मोदी ने लोगों से गुजरात को बदनाम नहीं करने की अपील की है और कहा है कि गुजरात की 12 साल की अग्निपरीक्षा अब खत्म हो गई है।

प्रकृति का ये नियम है कि हमेशा सत्य की जीत होती है- सत्यमेव जयते। अदालत ने कह दिया है, मुझे महसूस हुआ कि अपने विचार और भावनाएं देश के साथ बांटने चाहिए। ये जो अंत हुआ है उसने मुझे शुरुआत की याद दिला दी। 2001 में गुजरात भयानक भूकंप से तबाही और मौत से असहाय पड़ा हुआ था। हजारों लोगों ने जान गवाई। लाखों बेघर हो गए थ। लोगों की रोजी-रोटी खत्म हो गई थी। दुख और सदमे के ऐसे समय में मुझे फिर से पुनिर्निर्माण की जिम्मेदारी दी गई और हमनें हाथ में आई चुनौती को दिल से स्वीकार किया।
मगर 5 महीनों के अंदर 2002 की अंधी हिंसा के रूप में हम पर आफत बनकर टूटी। निर्दोष मारे गए। परिवार बेसहारा हो गए। सालों की मेहनत से बनाई गई संपत्ति बरबाद कर दी गई। जो गुजरात अभी प्राकृतिक आपदा से जूझते हुए अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था उस पर एक और आफत टूटी।

मोदी ने लिखा ‘मैं भीतर तक हिल गया था। गम, दुख, पीड़ा, क्षोभ, यातना ये सारे शब्द उनके लिए कम हैं जिन्होंने इस अमानवीयता को झेला। एक तरफ भूकंप पीड़ितों का दर्द था तो दूसरी तरफ दंगा पीड़ितों का। इस बड़ी मुसीबत से निपटने के लिए मैंने जो कुछ भी हो सकता था मैंने किया। मुझे ईश्वर ने जो भी ताकत दी थी वो मैंने शांति, न्याय और पुनर्वास में लगाई, अपने दर्द और दुख को छुपाते हुए।

उस चुनौतीपूर्ण वक्त में मैं अक्सर अपने पौराणिक ज्ञान को याद करता था जो ये कहते हैं कि ताकतवर लोगों को अपना दुख और दर्द नहीं व्यक्त करना चाहिए, उन्हें वो अकेले झेलना पड़ेगा। मैं भी उसी गहरे दर्द और दुख के अनुभव से गुजरा हूं। दरअसल, जब भी मैं उन दुख भरे दिनों को याद करता हूं तो ईश्वर से केवल एक प्रार्थना करता हूं कि किसी भी व्यक्ति, समाज, राज्य और देश को ऐसे क्रूर दुर्भाग्यपूर्ण दिन न देखने पड़ें।

हालांकि जिस दिन गोधरा में ट्रेन जली उसी दिन मैंने गुजरात के लोगों से अपील की कि वो शांति बनाए रखे और संयम बरतें ताकि मासूमों का जीवन खतरे में न पड़े। 2002 के फरवरी-मार्च में जब भी मीडिया के सामने आया मैंने बार-बार यही बात दोहराई। कहा कि ये सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति और नैतिक जिम्मेदारी है कि वो शांति बनाए, न्याय दे और हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दे। हाल के सदभावना उपवास के दौरान भी मैंने कई बार अपनी इन गहरी भावनाओं को व्यक्त किया। मैंने बताया कि इस तरह की निंदनीय घटनाएं सभ्य समाज को शोभा नहीं देती।’

वहीं कांग्रेस का कहना है कि मोदी सिर्फ छवि बदलने के ऐसा कर रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि जब मोदी मुख्यमंत्री थे तब तो कुछ किया नहीं, लेकिन अब जब उनकी नजर पीएम की कुर्सी पर है तो सफाई दे रहे हैं। जबकि समाजवादी पार्टी के नेता कमाल फारुकी ने मोदी के बयान को उनकी चुनावी रणनीति करार दिया है और कहा है कि मोदी अच्छी तरह जानते हैं कि खुद का प्रमोशन कैसे किया जाता है।

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