शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

देश की जनता कि जागरूकता से ही, देश का भाग्य सुनिश्चित - परमपूजनीय सरसंघचालक मोहनराव भागवत








देश की जनता कि जागरूकता से ही, देश का भाग्य सुनिश्चित 
- परम पूजनीय सरसंघचालक मोहनराव भागवत
http://vskjodhpur.blogspot.in/2014/01/blog-post_1282.html
सिरोही, राजस्थान  के अरविन्द पैवेलियन  से ।
परम पूजनीय सरसंघचालक  मोहनराव भागवत ने अरविंद पैवेलियन में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि जब तक देशवासी खुद को नहीं पहचानेंगे , तब तक हमारे चारों ओर विभिन्न समस्याएं बनी रहेंगी। उन्होंने कहा कि आज हम देश की उन्नति की बात छोड़कर बाकी सब करते हैं। देश की समस्याओं के लिए एक दूसरे पर दोषारोपण करते हैं, लेकिन इससे कुछ नहीं होने वाला। शराबी की, महाभारत की और शेर की कहानियां सुनाकर, उन्होंने आव्हान किया कि पहले हमें खुद को पहचानना होगा, तभी हम देश को आगे बढ़ा पाएंगे, तभी देश के भाग्य का उदय हो सकेगा।

उन्होंने कहा कि संघ के कार्यक्रम शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं बल्कि आत्म दर्शन के लिए होते हैं। यह कार्यक्रम आत्म साक्षात्कार  है ताकि वह अपनी क्षमताओं  को पहचाने और उसका उपयोग  राष्ट्र हित में करे। 
डॉ०    भागवत जी  ने अपने उद्बोधन में कहा कि सम्पूर्ण विश्व भारत कि और तक रहा है ताक  रहा है , भारत कहाँ  है जिससे विश्व कल्याण कि अपेक्षा हैं ? जिस दिन हमने आत्म साक्षात्कार करके अपना निस्वार्थ योगदान समाज हित में करना शुरू कर दिया , उस दिन से हम  विश्व को मार्गदर्शन देने कि योगयता पुनः हासिल  कर लेंगे।  देश राजनितिक आधार पर नहीं सामाजिक आधार पर खड़ा होता हैं और समाज को खड़ा करने के लिए निस्वार्थ  नायक कि आवश्यकता होती हैं। 

भागवत जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि देश को खड़ा करने का काम ठेके पर नहीं होता  हैं , जनता को अपनी क्षमता शक्ति को पहचान कर मालिक बन कर व्यवस्थाओ पर नजर रखनी होगी।  देश की  जनता को जागरूक होना होगा जनता कि जागरूकता से ही देश का भाग्य सुनिश्चित होगा।

राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ  द्वारा आयोजित हिन्दू शक्ति संगम का आयोजन अरविन्द पैवेलियन में किया गया जहां परम पूजनीय सरसंघचालक मोहन जी भागवत ने स्वयंसेवको तथा नागरिकगणों का मार्गदर्शन किया।  क्षैत्रिय  संघचालक पुरुषोत्तम परांजपे , प्रान्त संघचालक ललित शर्मा, विभाग संघचालक कमल किशोर गोयल तथा जिला संघचालक हंसराज जी जोशी के साथ मुख्य अतिथि डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी  मंच पर विराजमान थे।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ  चन्द्र प्रकाश द्विवेदी (चाणक्य सीरियल फेम) थे।  क्षेत्रीय प्रचारक दुर्गादास जी ,प्रांत प्रचारक मुरलीधर जी, वरिष्ट  प्रचारक नन्दलाल जी, क्षेत्रीय सह सम्पर्क  प्रमुख प्रकाश चन्द्र जी गुप्ता, सह प्रान्त प्रचारक राजा राम जी, सीमा जन कल्याण समिति के  मन्त्री निम्ब सिंह जी, पाथेय कण के मानक जी, विभाग प्रचारक राजेश कुमार जी, जिला प्रचारक स्वरूपदान जी,  सांसद देवजी पटेल, विधायक ओटाराम देवासी, रेवदर विधायक जगसीराम कोली  भी कार्यक्रम में  उपस्थित रहें। 
-------------------
भगवामय  देवनगरी में  भारत माता की  जय तथा वन्देमातरम के जयघोष से वातावरण  उत्साहित हो गया, जब सरजावाव चौराहा पर त्रिधारा संचलन  का अद्भुत संगम हुआ।  शहर के गणमान्य नागरिकगण, मातृ शक्ति और युवाओ ने पुष्प वर्षा कर पथ संचलन  का जोरदार उत्साह से स्वागत किया।
 पथ संचलन की तीन धाराओं शक्ति संचलन, भक्ति संचलन और समरसता संचलन की धाराओं का शहर के सरजावाव दरवाजा पर दोपहर ठीक 1.21 बजे त्रिवेणी संगम हुआ, जिसमें शक्ति संचलन राजमाता धर्मशाला रोड से, भक्ति संचलन सदर बाजार से और समरसता संचलन पुलिस थाना रोड से एक साथ मिला। इस दौरान वहां मौजूद शहरवासियों ने पुष्पवर्षा कर संचलन का जोरदार स्वागत किया। यहां से तीनों संचलन एक साथ बस स्टैंड, जेल चौराहा, अहिंसा सर्किल, गांधी पार्क होते हुए अरविंद पैवेलियन खेल मैदान पहुंचा।

घोष की मधुर धुनों के बीच कंधों से कंधे और कदम से कदम मिलाते चल रहे स्वयंसेवकों हर चौराहों और सड़कों पर शहरवासियों ने पुष्पवर्षा से स्वागत किया  शहर में जगह-जगह  रंगोली और सजावट से लग रहा था जैसे उत्सव का माहौल है ।  स्वयंसेवकों को देखने के लिए जो जहां था वहीं ठहर गया। सरजावाव चौराहे ठीक समय पर संगम हुआ और नीला गगन वन्देमातरम और भारत माता कि जय हो  उद्धघोष्  से गुंजायमान हो उठा।  दोपहर को शहर के चार अलग-अलग जगहों पथ संचलन शुरू हुआ, जो शहर के विभिन्न मार्गों से होते हुए अरविंद पैवेलियन पहुंचा 

 पथ संचलन कितना लंबा था इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसका एक छोर समापन स्थल अरविंद पैवेलियन में था तो दूसरा सरजावाव दरवाजे पर था।

बाल  स्वयंसेवको का पथ संचलन संपन्न हुआ।   पूर्ण गणवेश में बाल स्वयंसेवक हर किसी का मन मोह रहे थे। कम उम्र में भी इनमें अनुशासन और देशभक्ति का ज्वार   था । बड़े स्वयंसेवकों के साथ ही इन्होंने भी कदम से कदम बढ़ाए। सवेरे से लेकर शाम तक बाल  स्वयंसेवक भी  कार्यक्रम में पूरे समय उपस्थित रहे।

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

आम चुनाव - मंहगाई बनेगा मुद्दा - गुरचरन दास



भ्रष्टाचार नहीं , मंहगाई बनेगा मुद्दा !
आम चुनाव /  गुरचरन दास
प्रसिद्ध स्तंभकार और लेखक
दैनिक भास्कर , कोटा
आम आदमी महंगाई के दंश को भूलेगा नहीं, 'आप' भी पुराने वामपंथी विचारों में फंसी
हाल में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी महंगाई की ही शिकायत कर रहा था। टीवी पर लोग आलू, प्याज, घी और दाल की कीमतें बताते नजर आते थे। हालांकि चुनावी पंडित हमेशा का चुनाव राग ही गा रहे थे, लेकिन कांग्रेस की हार में भ्रष्टाचार से ज्यादा महंगाई का हाथ रहा। हाल में महंगाई कुछ कम हुई हैं, लेकिन सभी दलों के लिए यह चेतावनी है कि आम आदमी महंगाई के दंश को भूलने वाला नहीं है और यह आगामी आम चुनाव में नजर आएगा।
अर्थशास्त्रियों को भी यह समझ में नहीं आ रहा है कि जब दुनियाभर में कीमतें स्थिर हैं तो भारत में उपभोक्ता वस्तुओं के दाम पिछले पांच सालों से 10 फीसदी प्रतिवर्ष की दर से क्यों बढ़ रहे हैं। यहां तक कि गरीब, उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भी कीमतें भारत की तुलना में आधी दर से बढ़ रही हैं। मुद्रास्फीति एक जटिल अवधारणा है और इसके पीछे कई कारण होते हैं, लेकिन विशेषज्ञों को यह स्पष्ट हो गया है कि भारत में इसकी वजह वे ही खराब नीतियां हैं, जिनकी वजह से हमारी आर्थिक वृद्धि दर नीचे आई है। इन नीतियों ने उत्पादन बढ़ाए बिना भारी सरकारी खर्च को प्रोत्साहन दिया है। मतलब बाजार में चीजें कम हैं और पैसा बहुत उपलब्ध है। महंगाई की यही वजह है।
यूपीए-2 की इस सरकार ने ग्रामीणों की जेब में विशाल फंड रख दिए हैं। इस तरह पिछले पांच वर्ष में गांवों में मजदूरी 15 फीसदी प्रतिवर्ष की अप्रत्याशित दर से बढ़ी है। किसानों के लिए हर साल 'दिवाली धमाका' होता है। अनाज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य, उर्वरक और बिजली के लिए भारी सब्सिडी, कई राज्यों में पानी-बिजली लगभग मुफ्त। इसके अलावा कर्ज माफी!
किसी फलती-फूलती अर्थव्यवस्था में मजदूरी का बढऩा अच्छी बात होती है, जब वे बढ़ती हुई मांग प्रदर्शित करती हों। कुछ हद तक भारत के लिए यह सही है, जहां 2011 तक आर्थिक वृद्धि और समृद्धि का 'स्वर्ण युग' रहा। इस बढ़ती हुई आय ने लोगों की खान-पान की आदतों को भी बदल दिया। अब वे अनाज कम और प्रोटीन, फल तथा सब्जियां ज्यादा खाने लगे। किंतु ग्रामीण मजदूरी में बढ़ोतरी 'मनरेगा' में फर्जी कामों का भी नतीजा है। ऐसे काम जिनसे कोई उत्पादकता नहीं बढ़ती। यदि यही पैसा कारखानों, सड़कों और बिजली संयंत्रों में लगाया गया होता तो नतीजा उत्पादकता के साथ नौकरियों में बढ़ोतरी के रूप में नजर आता। इसी तरह डीकाल, उर्वरकों, बिजली और पानी पर सब्सिडी देने की बजाय यही पैसा उत्पादक चीजें निर्मित करने में लगाया जाता तो महंगाई पर लगाम लगती। लोगों को टिकाऊ रोजगार मिलता और उनका जीवनस्तर ऊंचा उठता।
महंगाई का समाधान है आर्थिक वृद्धि को लौटाना। सरकार को गलती का अहसास हो गया है, लेकिन बहुत देर हो चुकी है। अब यह हताशा में उन परियोजनाओं को हरी झंड़ी दिखाने की कोशिश कर रही है, जो बरसों से लाल और हरी फीताशाही में अटकी पड़ी है। किंतु निवेश को नौकरियों व आर्थिक वृद्धि में बदलने में वक्त लगेगा। मगर इस सरकार ने सैकड़ों परियोजनाएं रोककर क्यों रखीं? जवाब यह है कि पर्यावरण की रक्षा करने के लिए! अब हर सरकार को पर्यावरण की रक्षा करनी होती है, लेकिन इसके लिए कोई सरकार 780 बड़ी परियोजनाएं नहीं रोकती और वह भी कई-कई बरस। जब से पर्यावरण मंत्री को हटाया गया है, अखबार उनके घर में पाई गईं दर्जनों फाइलों की धक्कादायक खबरों से पटे पड़े हैं। इन फाइलों को पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी मिल चुकी थी। इन पर सिर्फ पर्यावरण मंत्री के दस्तखत होने थे। कई मामलों में तो ये फाइलें महीनों से दस्तखत का इंतजार कर रही थीं। यह स्तब्ध करने वाला तथ्य है कि कोई एक व्यक्ति पूरे राष्ट्र को कितना नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए अचरज नहीं कि भारत को बिकानेस करने के लिहाज से निकृष्टतम देशों में शामिल किया जाता है। सौभाग्य से खाद्य पदार्थों में महंगाई पर तेजी से काबू पाने के कुछ तरीके हैं। एक तरीका तो यही है कि भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में सड़ते अनाज में से कुछ लाख टन बाजार में जारी कर दिया जाए। इससे भारतीय खाद्य निगम पर से अनाज के भंडारण का बोझ तो कम होगा ही अनाज की कीमतें भी नीचे आएंगी। दूसरा काम सरकर कृषि उत्पाद बाजार समितियों (एपीएमसी) को खत्म करने का कर सकती है, जो छोटे किसानों को संरक्षण देने की बजाय मंडियों में थोक बाजार के कार्टेल की तरह काम करती हैं। कई अन्य खराब आर्थिक नीतियों की तरह एपीएमसी भी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समाजवादी दिनों का असर है।
थोक बाजार को मुक्त करने से व्यापारी और किसान आजादी से बिक्री और खरीदी कर सकेंगे, जिससे बाजार में स्पद्र्धा पैदा होगी। इससे किसानों को फायदा होने के साथ उपभोक्ता को भी सस्ता अनाज मिलेगा, क्योंकि सुपर मार्केट बिचौलियों को दरकिनार कर इसका फायदा ग्राहकों तक पहुंचाएंगे। अर्थशास्त्री बरसों से एपीएमसी को खत्म करने गुहार लगा रहे हैं। अब राहुल गांधी को इस तथ्य का पता चला है और उन्होंने इसमें खुद रुचि ली है। संभव है कांग्रेस शासित राज्यों में एपीएमसी खत्म हो जाए। हालांकि प्रभावशाली स्थानीय नेता एपीएमसी को नियंत्रित करते हैं। अब समय ही बताएगा कि राहुल गांधी इन ताकतवर निहित स्वार्थी तत्वों पर अंकुश लगा पाते हैं अथवा नहीं।
आम आदमी पार्टी को भी दिल्ली के पास आजादपुर मंडी में एपीएमसी को खत्म करने की पहली कार्रवाई करनी थी। यह फलों व सब्जियों की कीमतों पर लगाम लगाकर ग्राहकों को तत्काल राहत दे सकती थी, लेकिन इसने उलटा ही किया। इसने सुपर बाजारों में विदेशी निवेश को खत्म करने की कार्रवाई की, जिससे आम आदमी सस्ती चीजें मिलने की संभावनाओं से वंचित हो गया। उसे यह अहसास नहीं है कि दुनियाभर में आम आदमी ही सुपर बाजारों में खरीदी करता है, क्योंकि वहां उसे कम कीमत पर चीजें मिल जाती हैं। इसके अलावा 'आप' के समर्थक किसी गंदी सी किराना दुकान में काम करने की बजाय सुपर बाजारों में काम करना पसंद करेंगे।
हमारी तीन प्रमुख पार्टियों में से लगता है कि केवल कांग्रेस को यह समझ में आया है कि एपीएमसी सुधार और सुपर बाजारों में विदेशी निवेश से महंगाई को काबू में किया जा सकता है। भाजपा ने आम आदमी के खिलाफ और व्यापारी के पक्ष में भूमिका ली है। यह तो खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की भी विरोधी है। बड़ी अजीब बात है कि 'आप' का नेतृत्व अवसरों की तलाश कर रहे इसके महत्वाकांक्षी युवा समर्थकों की दृष्टि से नहीं सोच रहा है। यह तो पुराने वामपंथ के गरीबी वाले विचारों में फंसा हुआ है। वे विचार जिन्होंने भारत को अंडरअचीवर बनाए रखा। यह देखते हुए कि आगामी चुनाव में महंगाई का मुद्दा बड़ी भूमिका निभाएगा, क्या कांग्रेस अपनी अनुकूल स्थिति को वोटों में तब्दील कर पाएगी? अब यह तो वक्त ही बताएगा।

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

राष्ट्रपति के भाषण की राजनीति : प्रमोद जोशी





राष्ट्रपति के भाषण की राजनीति
Jan 28 2014  ।। प्रमोद जोशी ।।
वरिष्ठ पत्रकार
http://www.prabhatkhabar.
लालबत्ती संस्कृति और सामाजिक संपदा की अराजक लूट का आरोप भी इसी राजनीति पर है. ‘अराजकता और जन-अभियान’ की बहस अभी और तेज होगी. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के संदेश ने इस बहस का विषय प्रवर्तन मात्र किया है.

हमारे राष्ट्रपतियों के भाषण अकसर बौद्धिक जिज्ञासा के विषय होते हैं. माना जाता है कि भारत का राष्ट्रपति देश की ‘राजनीतिक सरकार’ के वक्तव्यों को पढ़ने का काम करता है. एक सीमा तक ऐसा है भी, पर ऐसे भी राष्ट्रपति हुए हैं जिन्होंने सामयिक हस्तक्षेप किये हैं और सरकार की राजनीति के बाहर जाकर भी कुछ कहा है.

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के राष्ट्र के नाम संबोधन को राजनीति मानें या राजनीति एवं संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर उनके मन में उठ रहे प्रश्नों की अभिव्यक्ति? यह सवाल इसलिए उठा, क्योंकि गणतंत्र दिवस के ठीक पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी का धरना चल रहा था.

देश भर में इस बात को लेकर चरचा थी कि क्या ऐसे मौके पर यह धरना उचित है? क्या अराजकता का नाम लोकतंत्र है? संवैधानिक मर्यादा की रक्षा करने की शपथ लेनेवाले मुख्यमंत्री को क्या निषेधाज्ञा का उल्लंघन करना चाहिए?

राष्ट्रपति के संबोधन से एक दूसरा विवाद शुरू हो गया. वह यह कि क्या राष्ट्रपति को सत्ता की राजनीति में हस्तक्षेप करना चाहिए? उन्हें पूरा देश संरक्षक मानता है. क्या उन्हें किसी खास राजनीतिक दल का समर्थन या भर्त्सना करनी चाहिए? पर ये सवाल तो तब उठेंगे जब हम मान लें कि राष्ट्रपति का संबोधन राजनीति से प्रेरित था. पहले यह देखें कि राष्ट्रपति ने कहा क्या था.

राष्ट्रपति ने कहा, ‘लोकलुभावन अराजकता’ शासन का विकल्प नहीं हो सकती. नेताओं को जनता से वही वादे करने चाहिए जो वे पूरे कर सकें. झूठे वादों की परिणति मोहभंग में होती हैं, जिससे गुस्सा पैदा होता है और इस गुस्से का लक्ष्य सिर्फ वे होते हैं, जो सत्ता में हैं.

जनता का गुस्सा तभी कम होगा जब सरकारें वह काम करेंगी, जो करने के लिए उन्हें चुना गया है- सामाजिक और आर्थिक तरक्की, घोंघे की रफ्तार से नहीं, बल्कि रेस के घोड़े की तरह.

क्या यह बात परोक्ष रूप से सिर्फ आम आदमी पार्टी की आलोचना के रूप में थी? या समूची राजनीति यानी कांग्रेस और भाजपा पर भी यही बात लागू होती है? आम आदमी पार्टी की ओर से राष्ट्रपति के भाषण के बाद तीन तरह की प्रतिक्रियाएं आयीं. उसके नेता आशुतोष ने कहा कि राष्ट्रपति ने जो कहा है, हम इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते क्योंकि वह देश के प्रथम नागरिक हैं.

अगर उन्होंने हमारे बारे में कुछ कहा है तो हम उन्हें सावधानी से सुनेंगे और उस पर विचार करेंगे. योगेंद्र यादव ने कहा कि राष्ट्रपति का भाषण ‘आप’ के बारे में नहीं है. मेरा पूरा विश्वास है कि राष्ट्रपति के दिमाग में कुछ बड़ी बातें रही होंगी. वे शायद उत्तर प्रदेश या गुजरात के बारे में बात कर रहे थे.

यादव ने ट्विटर पर लिखा, ‘वे जरूर यूपीए सरकार की आर्थिक नीतियों की अराजकता और लोकलुभावन होने की बात कर रहे होंगे. राष्ट्रपति की चेतावनी सही है. मंत्रियों को चुनाव में झूठे वादे नहीं करने चाहिए.’

उधर, भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इस बयान का स्वागत करके इसका रुख ‘आप’ की ओर मोड़ दिया. सिंह ने कहा, यों भी लगता है कि राष्ट्रपति ने जिस वाक्यांश ‘लोकलुभावन अराजकता’ का इस्तेमाल किया है, वह ‘आप’ पर ही लागू होता है.

उन्होंने बिना नाम लिये ‘आप’ नेता प्रशांत भूषण के कश्मीर पर दिये गये बयान की याद भी दिलाई. उन्होंने कहा, ‘ऐसे बड़बोले लोग, जो हमारी रक्षा सेवाओं की निष्ठा पर शक करते हैं, गैर जिम्मेदार हैं, उनका सार्वजनिक जीवन में कोई स्थान नहीं होना चाहिए.’

राष्ट्रपति ने यूपीए सरकार पर सीधे टिप्पणी नहीं की, पर इतना जरूर कहा कि अगर सरकारें इन खामियों को दूर नहीं करतीं तो मतदाता सरकारों को हटा देंगे. राष्ट्रपति ने चेताया कि यदि 2014 में विपरीत विचारधाराओं के बीच खंडित जनादेश की सरकार बनी, तो देश को उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी. यह भी एक प्रकार का राजनीतिक वक्तव्य है.

राष्ट्रपति ने देश की जनता से अपील की कि 2014 में होनेवाले चुनावों में हम भारत को निराश नहीं कर सकते. आनेवाले चुनाव में कौन जीतता है, यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी यह बात कि चाहे जो जीते, उसमें स्थायित्व, ईमानदारी और भारत के विकास के प्रति अटूट प्रतिबद्धता होनी चाहिए.

इन पंक्तियों को गौर से पढ़ें तो इनमें राजनीति खोजी जा सकती है, पर उनका जोर लोकतंत्र को मजबूत बनाने पर ही है. उनके अनुसार लोकतंत्र के अंदर खुद में सुधार करने की विलक्षण योग्यता है. यह ऐसा चिकित्सक है, जो स्वयं के घावों को भर सकता है.

राष्ट्रपति के संदेश की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि लोकतांत्रिक देश होने के नाते हम इन मसलों पर विचार करना शुरू करें. इस लिहाज से आशुतोष और योगेंद्र यादव के वक्तव्य से ज्यादा महत्वपूर्ण बात अरविंद केजरीवाल ने कही है.

उनके अनुसार यह विचार चाहे राष्ट्रपति का हो या केंद्र सरकार का, कम से कम इस बात चरचा तो शुरू हुई. राष्ट्रपति के संदेश के बाद उन्होंने फिल्म निर्देशक शेखर कपूर के ट्वीट को रिट्वीट किया, ‘राष्ट्रपति महोदय, एक्टिविज्म और अराजकता एक जैसे नहीं हैं. अराजकता तो 1984 में हुई थी, जब राज्य और पुलिस ने भीड़ को सिखों की हत्या के लिए उकसाया था.’

यहां शेखर ने जो नहीं लिखा उसे भी कहा जाना चाहिए. हाल के वर्षों में बाबरी मसजिद के ध्वंस से ज्यादा बड़ी अराजकता कौन सी हुई? इस लिहाज से विचार केवल ‘आप’ को ही नहीं, कांग्रेस और भाजपा को भी करना है.

सन् 2000 में हमारे गणतंत्र ने पचास साल पूरे किये थे. उस मौके पर तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन का राष्ट्र के नाम संदेश था कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने जन-गण के अधिनायक यानी देश की जनता का जो आह्वान किया था, वह पूरा होना चाहिए. ‘देश की जनता नाराज है, जिसकी अभिव्यक्ति अकसर हिंसा के रूप में होती है.

द्रौपदी के समय से ही हमारी स्त्रियां सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र होती रही हैं. स्त्रियों के बारे में ही नहीं, दलितों, जनजातियों और अन्य कमजोर तबकों की दशा पर भी विचार करना चाहिए.’ वह भाषण आज भी सार्थक लगता है.

प्रणब मुखर्जी ने जो नहीं कहा वह यह कि राजनीति को ऐसे मौकों पर हिसाब चुकता करने के बजाय सामने खड़े सवालों के जवाब देने चाहिए. राजनीति माने ‘आप’ समेत पूरी राजनीति. ‘आप’ इससे बाहर नहीं है. ‘लोकलुभावन अराजकता’ के मुकाबले ‘लोकलुभावन रेवड़ी वितरण’ की राजनीति भी है. लालबत्ती संस्कृति और सामाजिक संपदा की अराजक लूट का आरोप भी इसी राजनीति पर है. ‘अराजकता और जन-अभियान’ की बहस अभी और तेज होगी. राष्ट्रपति के संदेश ने इस बहस का विषय प्रवर्तन मात्र किया है.

सोमवार, 27 जनवरी 2014

'ऐ मेरे वतन...' न होता तो हम भूल जाते शहीदों को : नरेंद्र मोदी



'ऐ मेरे वतन...' न होता तो हम भूल जाते शहीदों को: मोदी
नवभारतटाइम्स.कॉम | Jan 27, 2014,
मुंबई
1962 में चीन से युद्ध में शहीद हुए भारतीय जवानों की याद में 1963 में गाए गए गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों...' का स्वर्ण जयंती समारोह मुंबई में मनाया गया। इस गाने को गाने वाली मशहूर गायिका लता मंगेशकर को बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी ने सम्मानित किया। समारोह में परमवीर चक्र, महावीर चक्र और अन्य वीरता पुरस्कार प्राप्त 100 से अधिक लोगों को भी सम्मानित किया गया। इस मौके पर बीजेपी के पीएम कैंडिडेड नरेंद्र मोदी ने कहा कि अगर कवि प्रदीप ने यह गीत नहीं लिखा होता तो शायद 1962 के शहीद हमें याद न होते।
लता ने 27 जनवरी 1963 को पहली बार यह गीत गाया था। लता के साथ वहां मौजूद 1,42,000 लोगों ने सुर मिलाए। लता ने कहा कि नरेंद्र मोदी मेरे भाई हैं। उनसे सम्मान पाकर मैं खुश हूं। उन्होंने बताया कि जब पहली बार मैंने यह गीत गाया था तो पंडित नेहरू बहुत खुश हुए थे। इंदिरा गांधी ने अपने दोनों बच्चों से मुझे मिलवाया था। अब तक देश के बाहर 101 शो में मैं यह गाना गा चुकी हूं।
इस मौके पर मोदी ने कहा कि आज से ठीक 50 साल पहले गाया गया यह गीत आज भी गूंजता है। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर प्रदीप जी ने यह गीत नहीं लिखा होता तो शायद 1962 के शहीद हमें याद न होते।

गौरतलब है कि लता मंगेशकर ने गुजरात के मुख्यमंत्री और बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हुए कहा था कि वह चाहती हैं कि मोदी देश के पीएम बनें। पुणे में एक हॉस्पिटल के उद्घाटन के दौरान मोदी की मौजूदगी में लता ने कहा था, 'आज दिवाली है...मैं भगवान से प्रार्थना करती हूं कि हम जो चाहते हैं, आप जो चाहते हैं। वह पूरा हो। मोदी देश के प्रधानमंत्री बनें।'
 ======


http://navbharattimes.indiatimes.com/Narendra-Modi-to-felicitate-Lata-Mangeshkar/liveblog/29452188.cms

नरेंद्र मोदी: ऐ मेरे वतन के लोगों..

09:46 PM'वंदे मातरम्' गाने के वक्त एक साथ खड़े नरेंद्र मोदी और लता मंगेशकर।
09:41 PMमशहूर देशभक्ति गीत, 'ऐ मेरे वतन के लोगो...' के स्वर्ण जयंती वर्ष पर आयोजित समारोह संपन्न। ' वंदे मातरम्' गीत के साथ संपन्न हुआ कार्यक्रम।
09:37 PM1,42,000 लोगों के साथ 'ऐ मेरे वतन के लोगो...' को गातीं लता मंगेशकर।
09:31 PMनरेंद्र मोदी और लता मंगेशकर के साथ मिलकर कुल 1,42,000 हजार लोग एक साथ 'ऐ मेरे वतन के लोगो...' गाना गा रहे हैं।
09:29 PMनरेंद्र मोदी ने कहा, सेना का काम सिर्फ युद्ध लड़ना नहीं होता, वह सेवा का भी काम करती है। गुजरात का भूकंप और उत्तराखंड में आई तबाही में मैंने सेना का सेवा कार्य देखा है। यह सब देखकर मेरा सिर गर्व से ऊंचा हो उठता है। मोदी बोलें, सैनिक दुश्मन के लिए काल और अपनों के लिए जान बन कर आते हैं।
09:24 PMवाजपेयी जी की सरकार में शहीदों के शव को उनके घर तक पहुंचाने का निर्णय लिया गया था। इसका समाज में व्यापक असर दिखा। पूरा समाज शहीदों के सम्मान में उमर जाता था: नरेंद्र मोदी
09:20 PMदेश के विश्वविद्यालयों में युद्ध इक्विपमेंट बनाने का सिलेबस भी शामिल किया जाना चाहिए: नरेंद्र मोदी
09:18 PMमोदी बोलें, युद्ध नया रूप ले रहा है। साइबर वॉर। एक भी गोली चलाए बिना देश की इकॉनमी को नष्ट किया जा सकता है। चाइना इस का प्रयोग कर रहा है। हमें भी इस क्षेत्र में तुरंत काम शुरू करना चाहिए।
09:16 PMमोदी बोलें, देश को सही नेतृत्व मिले। उचित नीतियां बने तो 10 साल के भीतर देश की तकदीर बदल जाएगी।
09:13 PMवॉर मेमोरियल पर चुटकी लेते हुए मोदी ने कहा, शायद कुछ अच्छे काम मेरे हाथों ही लिखा है।
09:12 PMमोदी ने कहा, शायद सिर्फ हमारे देश में ही वॉर मेमोरियल नहीं है। दुनिया के अधिकतर देशों में वॉर मेमोरियल है।
09:10 PMनरेंद्र मोदी ने कहा कि अगर देश के लिए जीने वाले नहीं मिलेंगे तो देश के लिए मरने वाले कहां मिलेंगे। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।
09:09 PMमोदी ने कहा, हमने युद्ध के अंदर जितने सेना के जवान गवाएं उससे ज्यादा आतंकवादी हमलों में गवाएं हैं।
09:07 PMमोदी बोलें, समाज वीरता की पूजा करता है। योद्धाओं की पूजा करता है। उनके पराक्रम का गान करता है।
09:06 PMमोदी ने कहा, अगर प्रदीप जी ने यह गीत नहीं लिखा होता तो शायद हमें 1962 के शहीद याद न होतें।
09:04 PMमोदी ने कहा, आजादी की लड़ाई में 'वंदे मातरम्' हमारा सबसे बड़ा हथियार था। आजादी के बाद 'ऐ मेरे वतन के लोगो...' ने 4 दशक तक हमें प्रेरणा दिया है।
09:02 PMनरेंद्र मोदी ने कहा, ठीक 50 साल पहले गाया गया यह गीत आज भी गूंजता है।
08:59 PMनरेंद्र मोदी ने मंच पर बैठे लोगों का स्वागत कर शहीदों को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। मोदी ने भाषण शुरू किया।
08:57 PMशहीद गौरव समिति के पदाधिकारियों ने नरेंद्र मोदी का सम्मान किया।
08:54 PMलता मंगेशकर के साथ लाखों लोग गा रहे हैं 'ऐ मेरे वतन के लोगो...'
08:53 PMलता मंगेशकर ने कहा, नरेंद्र मोदी मेरे भाई हैं, उनसे सम्मान पाकर मैं खुश हूं।
08:53 PMभारत के बाहर 101 शोज में मैंने यह गाना गाया है। हर जगह यह गाना गाने के लिए लोग मुझसे आग्रह करते थे।
08:51 PMलता मंगेशकर बोलीं, जब मैंने 'ऐ मेरे वतन के लोगो...' को गाया तो पंडित नेहरू बहुत खुश हुए। इंदिरा गांधी ने अपने दोनों बच्चों से मुझे मिलवाया।
08:50 PMशहीदों के नाम इस कार्यक्रम में बीजेपी के पीएम कैंडिडेट नरेंद्र मोदी ने लता मंगेशकर को सम्मानित किया।
08:46 PMनरेंद्र मोदी ने लता मंगेशकर को सम्मानित किया।
08:39 PMलता मंगेशकर और नरेंद्र मोदी ने सनी देओल और सुनील शेट्ठी को सम्मानित किया।
08:38 PMजनरल (रिटायर्ड) वी.पी. मलिक ने लता मंगेशकर से 'ऐ मेरे वतन के लोगों...' गाने को एक बार फिर गाने का आग्रह किया।
08:36 PM'ऐ मेरे वतन के लोगों...' गाने का इतना असर था कि हमने आज तक कभी भी किसी को अपना बॉर्डर छीनने नहीं दिया है। हमने हर दुश्मन को भगा दिया: जनरल (रिटायर्ड) वी.पी. मलिक
08:32 PMकार्यक्रम में लाखों की संख्या में लोग मौजूद। पूर्व सेनाध्याक्ष जनरल वी.पी. मलिक कार्यक्रम को संबोधित।
08:24 PMअभी नरेंद्र मोदी मुबई हमलों के दैरान शहीदों को सम्मानित कर रहे हैं। यह कार्यक्रम शहीद गौरव समिति द्वारा आयोजित किया गया है।
08:19 PMगौरतलब है कि आज के ही दिन 27 जनवरी 1963 को भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए भारतीय जवानों की याद में लता मंगेशकर ने 'ऐ मेरे वतन के लोगों...' को पहली बार गाया था।
08:18 PMपरमवीर चक्र, महावीर चक्र और अन्य वीरता पुरस्कार प्राप्त 100 से अधिक लोगों को इस समारोह में सम्मानित किया जाएगा
08:18 PMकार्यक्रम में देश के शहीद जवानों के परिवारों के सदस्य भी शामिल।
08:18 PMइस मौके पर नरेंद्र मोदी मोदी लता मंगेशकर को सम्मानित भी करेंगे।
08:18 PMमुंबई में बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और लता मंगेशकर एक मंच पर मौजूद।
08:14 PMमशहूर गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों...' का स्वर्ण जयंती समारोह मुंबई में मनाया जा रहा है।
--------------------------

‘ऐ मेरे वतन के लोगों...’ गीत से जुड़ी यादें
आईबीएन-7 | Jan 27, 2014
नई दिल्ली। 50 वर्षों से देशभक्ति का ज्वर जगाने वाले गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों' का सोमवार को मुंबई में स्वर्ण जयंति समारोह मनाया गया। 27 जनवरी 1963 को इसे पहली बार दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने गया था। तब से देशभक्ति के लोकप्रिय तरानों के बीच इसकी खास जगह है, जिसके पीछे है अनगिनत कहानियां। कहानियां-62 के जंग के वीर सपूतों कीं। कहानियां-देश के लिए कुछ गुजरने की आम नागरिकों के जज्बे की। 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गीत के 51 बरस के हो जाने पर पेश हैं, इसी गीत की अमर कहानी।

20 अक्टूबर 1962, पूर्वोत्तर सरहद पर सुबह करीब चार बजे का मंजर खौफनाक था। चीटियों की तरह चीनी हमारी जमीन पर घुस आए। जांबाजों ने उनके रास्ते पर लाशों की दीवार खड़ी कर दी। लेकिन कुर्बानी काम नहीं आई। चीनियों के हाथ मिली हार से सदियों की परंपरा, संस्कृति, इतिहास की बुनियाद पर खड़ा स्वाभिमान जख्मी हो गया। चीनियों के छल से मुल्क गहरे सदमे में चला गया।

उस दौर में इन शब्दों ने सचमुच हिंदुस्तान को एक शर्मनाक हार की टीस भुलाने की ताकत दी। भावनाओं का ऐसा ज्वार पैदा हुआ, जिसकी बदौलत हिंदुस्तान अपनी राख से जी उठने वाले गरुड़ पक्षी की तरह नई परवाज के लिए बेताब हो उठा। लेकिन जब पहली बार ये गीत गाया गया तो लगा कि चीन के धोखे से चोट खाया हिमालय भी रो पड़ा।

27 जनवरी 1963, आज से पचास साल पहले की यही वो तारीख है जब दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में करीब 50 हजार हिंदुस्तानियों के हुजूम के सामने पहली बार ये गीत गूंजा था। दिल्ली में हुए उस समारोह में कवि प्रदीप नहीं थे। लेकिन उनके लिखे गीत के एक-एक शब्द पंडित जवाहर लाल नेहरू को उद्वेलित कर रहे थे। दरअसल 62 की जंग में मिली हार से नेहरू व्यक्तिगत रूप से खुद को ठगा महसूस कर रहे थे। संसद में उन्होंने कहा था 'हम आधुनिक दुनिया की सच्चाईयों से दूर हो गए थे, हम एक बनावटी माहौल में जी रहे थे जिसे हमने खुद ही तैयार किया था।'

नेहरू हिंदी-चीनी भाई-भाई के बनावटी माहौल को भूल कर सच का सामना करना चाहते थे। जिस दिन लता मंगेशकर ने नेशनल स्टेडियम में ऐ मेरे वतन के लोगों गीत गया, उसके ठीक एक दिन पहले 14वां गणतंत्र दिवस मनाया गया था, ये इकलौती गणतंत्र दिवस परेड है जिसका नेतृत्व देश का प्रधानमंत्री खुद कर रहा था।

इसी माहौल में कवि प्रदीप के गीत ने करोड़ों भारतवासियों को एकता के सूत्र में पिरो दिया। नेहरू उस कवि से मिलना चाहते थे जिसके गीत ने एक झटके में हिंदुस्तान को उसकी खोई ताकत-इतिहास और क्षमताओं की याद दिला दी, जल्दी ही ये मौका भी आया। 21 मार्च 1963 को पंडित नेहरू मुंबई आए तब मुंबई के रॉबर्ट मोय हाई स्कूल में एक कार्यक्रम के दौरान कवि प्रदीप की उनसे मुलाकात हुई। नेहरू के कहने पर प्रदीप ने अपनी आवाज में ऐ मेरे वतन के लोगों गाकर सुनाया, उन्होंने नेहरू को इस गीत समेत अपने कई गीतों की अपनी हाथ से लिखी डायरी भेंट की। उन्होंने नेहरू को ये भी बताया कि इस गीत को लिखने की प्रेरणा उन्हें कैसे मिली।
रेजांगला दर्रे की जंग की याद : ‘ऐ मेरे वतन के लोगों...’
ये इत्तेफाक नहीं है कि ऐ मेरे वतन के लोगों गीत की एक-एक लाइन उत्तर के मोर्चे पर चूशलू के पास 17 हजार फुट की ऊंचाई पर लड़ी गई रेजांगला दर्रे की जंग की याद दिलाती है। इसी जंग में परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह शहीद हो गए थे।

18 नवंबर 1962 की को बर्फीले तूफान की आड़ में चीनियों ने रेजांगला दर्रे पर मौजूद हिंदुस्तानी चौकियों को घेर लिया था। कुमाऊं रेजीमेंट की 123 जांबाजों की छोटी सी कंपनी तीन पलाटून में बंट कर दर्रे की रक्षा कर रही थी। जांबाजों ने चीनियों के लगातार दो हमलों को सिर्फ बहादुरी की बदौलत पीछे धकेल दिया। तीसरा और सबसे बड़ा हमला पीछे से हुआ। आखिरकार एक प्लाटून अपने आखिरी जवान तक लड़ते हुए खत्म हो गई, दूसरी प्लाटून आखिरी गोली तक लड़ती रही, कुछ नहीं मिला तो संगीनों और पत्थरों तक से जवानों ने चीनियों का मुकाबला किया।

आखिरी हमले में ही मेजर शैतान सिंह बुरी तरह जख्मी हो गए थे। उनके जवान उन्हें एक चट्टान के पीछे छोड़ गए थे, जहां अपनी बंदूक मुट्ठी में भींचे हुए उन्होंने आखिरी सांस ली। युद्ध के अंत में सिर्फ 14 जांबाज बचे, 9 बुरी तरह से जख्मी थे। हमलावर चीनियों के मृतकों और जख्मियों की तादाद कई सौ में थी। कवि प्रदीप ने रेजांगला की इसी लड़ाई को गीत बना कर हमेशा के लिए अमर कर दिया।
 

नरेंद्र मोदी का असर बंगाल में : भाजपा, आरएसएस के सदस्यों में भारी इजाफा



नरेंद्र मोदी का असर बंगाल में : भाजपा, आरएसएस के सदस्यों में भारी इजाफा

नई दिल्ली: प्रतीत होता है कि नरेंद्र मोदी की लहर बंगाल तक पहुंच गई है क्योंकि भाजपा की राज्य इकाई की सदस्यता में दोगुना से अधिक बढ़ोतरी हुई है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा के एक नेता ने कहा कि वर्ष 2011 में राज्य में पार्टी की कुल सदस्यता करीब तीन लाख थी, जो वर्ष 2013 में सात लाख से अधिक हो गई।

पिछले छह माह में पार्टी के दो लाख नए सदस्य बने हैं। पार्टी के नेता इसका श्रेय अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को देते हैं।

भाजपा के प्रवक्ता और पार्टी की बंगाल इकाई के सह प्रभारी सिद्धांत सिंह ने बताया कि पार्टी की युवा शाखा एबीवीपी की सदस्यता में भी बढ़ोतरी हुई है और पिछले एक साल में ही उसमें 45 हजार नए कार्यकर्ता जुड़े हैं।

उन्होंने कहा कि भाजपा की अल्पसंख्यक एवं महिला शाखाओं की सदस्यता में भी 50 फीसदी की वृद्धि हुई है।

सिंह ने बताया, 'पश्चिम बंगाल में भाजपा की सदस्यता बढ़ने के पीछे दो मुख्य कारक हैं। पार्टी द्वारा मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना और राज्य में विपक्ष का एक तरह से अभाव।' भाजपा के वरिष्ठ नेता ने बताया कि ऐसा उत्साह पहले दो अवसरों पर देखा गया। एक तो 90 के दशक के शुरू में राम मंदिर आंदोलन के दौरान और दूसरा केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के शासन के दौरान।

सिंह ने बताया, 'मोदी का करिश्मा पूरे देश में है और बंगाल इससे अलग नहीं रहा। कोलकाता में 5 फरवरी को मोदी की रैली के दौरान हम इसे साबित कर देंगे।' सामान्यत: भाजपा और आरएसएस का पश्चिम बंगाल में गहरा प्रभाव नहीं रहा। हालांकि पार्टी के पूर्ववर्ती स्वरूप 'जनसंघ' की सह-स्थापना माटी पुत्र श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी।

राज्य में मुस्लिमों की आबादी 27 फीसदी है जो राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों में से कम से कम 140 में खासा प्रभाव रखती है। यह आबादी सत्ता के समीकरण तय करने में अहम भूमिका निभाती रही है। इस आबादी को अग्रणी राजनीतिक दल लुभाने के लिए प्रयासरत हैं।

वर्ष 2011 में वाम किले के ध्वस्त होने के बाद से पश्चिम बंगाल में वास्तविक विपक्ष लगभग नदारद सा है और भाजपा अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए धीरे-धीरे प्रयास कर रही है। खास कर दक्षिण बंगाल के इलाकों में वह मोदी के बढ़ते ग्राफ की मदद ले रही है।

यह बात वर्ष 2012 में मुर्शिदाबाद जिले की जंगीपुर लोकसभा सीट पर हुए उप चुनाव में जाहिर हुई जब भाजपा प्रत्याशी को 85,867 वोट मिले। यह संख्या डाले गए कुल मतों का करीब दस फीसदी थी और वर्ष 2009 में भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में डाले गए मतों की संख्या में 8 फीसदी की वृद्धि बताती थी।

भाजपा की राज्य इकाई के अध्यक्ष राहुल सिन्हा ने बताया 'वर्ष 1998-99 में भाजपा के तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बाद उसके वोटों में कमी आई। लेकिन 2011 में विधानसभा चुनावों में वाम दलों का सफाया होने के बाद मतदाताओं की नजर नए और ऐसे विपक्ष पर गई जो तृणमूल कांग्रेस पर अंकुश लगा सके।

वर्ष 2013 में संपन्न पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में भी भाजपा के मतों में वृद्धि हुई और भाजपा प्रत्याशियों की हार बहुत ही कम मतों के अंतर से हुई। हावड़ा में तो स्थानीय निकाय चुनाव में वाम उम्मीदवार और मेयर ममता जायसवाल को भाजपा की गीता राय ने हरा दिया।

भाजपा की लोकप्रियता इसी बात से समझी जा सकती है कि आगामी लोकसभा चुनावों में 42 लोकसभा सीटों में भाजपा प्रत्याशी के तौर पर लड़ने के लिए अलग-अलग वर्ग के 425 आवेदकों ने इच्छा जाहिर की है।

आरएसएस भी दक्षिण और उत्तर भारत में अपनी जगह बना रहा है और इसमें सत्तारूढ़ पार्टी की अल्पसंख्यकों के कथित तुष्टीकरण की नीतियों की भूमिका है। सिन्हा ने बताया कि राज्य के 30,000 इमामों को भत्ता दिया गया जिसे कलकत्ता उच्च न्यायालय ने असंवैधानिक करार दिया।

राज्य में 20 साल के अंतराल के बाद आरएसएस की तीन दिवसीय एक युवा कार्यशाला आयोजित की गई। संघ प्रमुख मोहन भागवत की अगुवाई में हुई इस कार्यशाला के बाद राज्य के हर हिस्से या हर शाखा में सदस्यों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई।

आरएसएस के एक अधिकारी ने बताया 'पिछले करीब ढाई साल में राज्य में आरएसएस का प्रभाव बढ़ा है। अब दक्षिण बंगाल में हमारी 280 शाखाएं और उत्तरी बंगाल में 700 से अधिक शाखाएं हैं।' भाजपा और आरएसएस के प्रभाव में हुई वृद्धि को सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और वाम दलों ने स्वीकार भी किया है।

माकपा नेता एबी बर्धन ने बताया 'हां, पश्चिम बंगाल में भाजपा और आरएसएस का प्रभाव बढ़ रहा है।' लेकिन इसके लिए तृणमूल कांग्रेस, भाजपा के प्रति उसके नर्म रवैये और सांप्रदायिक ताकतों के साथ 'गोपनीय' समझौते को उन्होंने जिम्मेदार बताया। उन्होंने इस बात को खारिज कर दिया कि वाम दलों की हार से उत्पन्न शून्य को भाजपा भरने की कोशिश कर रही है।

माकपा के केंद्रीय समिति के सदस्य बसुदेव अचार्य ने बताया 'हमारे पास खबरें हैं कि भाजपा और आरएसएस का समर्थन आधार पश्चिम बंगाल में बढ़ रहा है लेकिन मजबूत विपक्ष के अभाव की वजह से ऐसा नहीं हो रहा है।' उन्होंने भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के एक दूसरे के प्रति उदार रवैये का जिक्र करते हुए सवाल किया 'क्या आप एक भी ऐसा मुद्दा बता सकते हैं जब भाजपा ने तृणमूल के खिलाफ अभियान चलाया हो ?'

तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद ने हालांकि दावा किया 'माकपा समर्थक भाजपा से जुड़ रहे हैं क्योंकि उनकी मूल पार्टी अच्छी हालत में नहीं है। इसीलिए भाजपा और आरएसएस का प्रभाव बढ़ रहा है।' राज्य की कांग्रेस इकाई के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने बताया 'भाजपा के दावे से मैं सहमत नहीं हूं। आगामी लोकसभा चुनावों में यह साबित भी हो जाएगा।'

मुस्लिम उलेमा मौलाना बरकती ने इस तर्क से सहमति जताई कि पश्चिम बंगाल में मजबूत विपक्ष के अभाव के चलते भाजपा और आरएसएस का आधार बढ़ रहा है।
  

लता और मोदी के साथ लाखों लोग गायेंगे, ऐ मेरे वतन के लोगों.....!




मुबई : लता और मोदी के साथ लाखों लोग गायेंगे, ऐ मेरे वतन के लोगों.....! स्वर्ण जयंती वर्ष
Jan 27 2014

मुंबई : मशहूर देशभक्ति गीत  ऐ मेरे वतन के लोगों... के स्वर्ण जयंती वर्ष को यादगार बनाने के लिए आज मुंबई में समारोह का आयोजन किया गया है. इस मौके पर स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी एक मंच पर साथ-साथ दिखेंगे. उम्मीद की जा रही है कि इस बार लता मंगेशकर, मोदी की मौजूदगी में मशहूर देशभक्ति गीत ऐ मेरे वतन के लोगों... भी गायेंगी.

आज करीब एक लाख लोग एक साथ यह गीत गायेंगे. इस मौके पर लता मंगेशकर भी मौजूद रहेंगी. भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी इस मौके पर लता को सम्मानित करेंगे. मुंबई के महालक्ष्मी रेसकोर्स में आयोजित होनेवाले इस कार्यक्रम का आयोजन शहीद गौरव समिति (एसजीएस) कर रहा है.

इस मौके पर लता मंगेशकर के साथ जंग के नायकों और उनके परिवार के लोगों को सम्मानित किया जायेगा. लता ने 27 जनवरी, 1963 को पहली बार ऐ मेरे वतन के लोगों... गाया, तो देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू समेत कई लोगों की आंखें नम हो गयी थीं. गीत को मशहूर कवि प्रदीप ने लिखा था.
------------------
मुंबई। देशभक्ति का जज्बा भर देने वाले गीत ‘ए मेरे वतन के लोगों..’ का मुंबई में आज स्वर्ण जयंती समारोह है। 27 जनवरी 1963 को पहली बार इस गीत को लता मंगेशकर ने जवाहर लाल नेहरू के सामने गाया था। कवि प्रदीप के लिखे इस गीत के 50 साल पूरे होने के मौके पर मुंबई में एक खास कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। इस कार्यक्रम में ‘स्वर कोकिला’ लता मंगेशकर के साथ ही बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी, उद्धव ठाकरे सहित बॉलीवुड और राजनीति की कई हस्तियां शामिल होंगी। इस गीत को देशभक्ति के हर अवसर पर गाया जाता है।

भारत-चीन युद्ध के बाद इसी गीत ने देशभक्तों के मनोबल को फिर से उठाने का काम किया था। राष्ट्र गान और राष्ट्र गीत की तरह उतनी ही श्रद्धा के साथ इस गाने को आज भी गाया जाता है। 27 जनवरी 1963 की शाम राजधानी दिल्ली के राष्ट्रीय स्टेडियम में जब लता मंगेशकर ने इस गाने को गाया, तो वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें नम हो गई थीं। खुद प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की भी आंखें इस गाने को सुनने के बाद भर आई थीं। तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, सभी कैबिनेट मंत्रियों सहित पूरी फिल्म इंडस्ट्री, जिसमें दिलीप कुमार, देव आनंद, राज कपूर, राजेंद्र कुमार, गायक मोहम्मद रफी, हेमंत कुमार इस मौके पर मौजूद थे।

‘ए मेरे वतन के लोगों..’ गीत युद्ध के नायकों और शहीदों के लिए एक श्रद्धांजलि है। इस गीत ने हर उम्र के लोगों को 1962 की हार के बाद पैदा हुए गुस्से को नियंत्रण में करना सिखाया। आज 50 साल बाद भी इस गीत की लोकप्रियता बरकरार है और सभी प्रमुख राष्ट्रीय कार्यक्रमों के अवसर पर इस गाने को जरूर बजाया जाता है।
--------------
आधी सदी का अमर गीत...
-माहीमीत
ऐ मेरे वतन के लोगों, तुम खूब लगा लो नारा
ये शुभ दिन है हम सबका, लहरा लो तिरंगा प्यारा
पर मत भूलो सीमा पर, वीरों ने है प्राण गंवाए
कुछ याद उन्हें भी कर लो, कुछ याद उन्हें भी कर लो
जो लौट के घर न आए, जो लौट के घर न आए...
ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी

27 जनवरी को उज्जैन की आबोहवा में पले-बढ़े कवि प्रदीप का यह अमर गीत अपने जन्म 50 साल पूरे कर लेगा। पिछली आधी सदी से यह महान गीत आम भारतीयों के दिल को झकझोर रहा है। इस गीत को सुन आज भी देश की कई माताएं, बहनें, पत्नियां और बच्चे उन अपनों के लौटने का इंतजार कर रहे हैं, जो चीन की 1962 की सुर्ख आंधी में शहीद हो गए थे। हिन्दुस्तान के इतिहास का यह ऐसा इकलौता गीत है, जो इंसानी संवेदनाओं की तह को आधी सदी बीत जाने के बाद भी बार-बार उदासी के सागर में नई हिलोरे पैदा करने की कोशिश कर रहा है।

प्रदीप ने अपने इस गीत में भारतीय सैनिकों के साहस, वीरता और देशप्रेम के साथ-साथ उनकी दुर्दशा और दुखद अंत का ऐसा अविस्मरणीय चित्र खींचा था, जो आज भी हमारे मानस से ओझल नहीं हो पा रहा है। इसे दुर्भाग्य का गीत कहना कितना उचित होगा मुझे यह तो नहीं पता लेकिन यह चीन की क्रूरता का चित्रण एक अलहदा तरीके से करता है।

बर्फीले पहाड़ों पर मानवीयता के रक्तरंजित होने का इससे वीभत्स दृश्य कहीं नहीं दिखाई देगा। इस गीत की आत्मा उसके शब्द हैं और एक-एक शब्द को प्रदीप ने जिस तह में जाकर लिखा है वही इसे पिछले 50 सालों से हमारे दिलो दिमाग में बैठा हुआ है। अब इस अमर गीत की कुछ पंक्तियां गुनगुनाते हैं-

ये शुभ दिन है हम सबका, लहरा लो तिरंगा प्यारा
पर मत भूलो सीमा पर, वीरों ने है प्राण गंवाए
कुछ याद उन्हें भी कर लो, कुछ याद उन्हें भी कर लो
जो लौट के घर न आए, जो लौट के घर न आए...
ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी
ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी

इस अद्वितीय गीत की धुन महान संगीतकार सी. रामचन्द्र ने बनाई थी। सबसे पहले यह गीत स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने संवेदनशीलता के साथ 27 जनवरी 1963 को नेशनल स्टेडियम में संगीतकार सी. रामचन्द्र के लाईव आर्केस्ट्रा के साथ गाकर पूरे देश को रोने पर मजबूर कर दिया था।

इतना गुजर जाने के बावजूद आम भारतीयों की आंखों में इस गीत को सुनकर आंसुओं के सैलाब बहने लगते हैं। 27 जनवरी को एक बार से फिर इस गीत को लता मंगेशकर इसके 50 साल पूरे होने पर मुंबई में 1 लाख लोगों के साथ गाएंगीं। 27 जनवरी को यह दिवस पूरा देश श्रेष्ठ भारत दिवस समारोह के रूप में मनाएगा।

मुंबई में स्वर कोकिला लता मंगेशकर को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सम्मानित करेंगे। कार्यक्रम के दौरान 1 लाख लोग देश के लिए बलिदान देने वाले अमर शहीदों की याद में ये गीत गाएंगे और इस कार्यक्रम में देश के शहीद परिवारों, सैनिकों एवं भारत की जनता की ओर से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी इस अमर गीत हेतु लता मंगेशकर का सार्वजनिक अभिनंदन करेंगे।

सबसे पहले जब इस गीत को लता ने गाया था। उस समय देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू यह गीत सुन भाव-विभोर हो गए थे। एक बार फिर से वही ऐतिहासिक मौका आ रहा है। देश के अमर शहीदों को सलाम करते हुए इस गीत की कुछ पंक्तियां और गुनगुनाते हैं।

जब घायल हुआ हिमालय, खतरे में पड़ी आजादी
जब तक थी सांस लड़े वो... जब तक थी सांस लड़े वो...,
फिर अपनी लाश बिछा दी...
संगीन पे धरकर माथा, सो गए अमर बलिदानी...
जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी...

रविवार, 26 जनवरी 2014

भारत के राष्ट्रपति, श्री प्रणब मुखर्जी का राष्ट्र के नाम संदेश



http://presidentofindia.nic.in/ph/sp250114.html
गणतंत्र दिवस 2014 की पूर्व संध्या पर भारत के राष्ट्रपति, श्री प्रणब मुखर्जी का राष्ट्र के नाम संदेश
नई दिल्ली, 25 जनवरी, 2014

मेरे प्यारे देशवासियो,

पैंसठवें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर, मैं भारत और विदेशों में बसे आप सभी को हार्दिक बधाई देता हूं। मैं हमारी सशस्त्र सेनाओं, अर्ध-सैनिक बलों तथा आंतरिक सुरक्षा बलों के सदस्यों को अपनी विशेष बधाई देता हूं।

2. हर एक भारतीय गणतंत्र दिवस का सम्मान करता है। चौंसठ वर्ष पूर्व इसी दिन, हम भारत के लोगों ने, आदर्श तथा साहस का शानदार प्रदर्शन करते हुए, सभी नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता तथा समानता प्रदान करने के लिए, स्वयं को एक संप्रभुतासंपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य सौंपा था। हमने सभी नागरिकों के बीच भाईचारा, व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता को बढ़ावा देने का कार्य अपने हाथ में लिया था। ये आदर्श आधुनिक भारतीय राज्य के पथ-प्रदर्शक बने। शांति की ओर तथा दशकों के औपनिवेशिक शासन की गरीबी से निकालकर पुनरुत्थान की दिशा में ले जाने के लिए लोकतंत्र हमारा सबसे मूल्यवान मार्गदर्शक बन गया। हमारे संविधान के व्यापक प्रावधानों से भारत एक सुंदर, जीवंत तथा कभी-कभार शोरगुल युक्त लोकतंत्र के रूप में विकसित हो चुका है। हमारे लिए लोकतंत्र कोई उपहार नहीं है, बल्कि हर एक नागरिक का मौलिक अधिकार है; जो सत्ताधारी हैं उनके लिए लोकतंत्र एक पवित्र भरोसा है। जो इस भरोसे को तोड़ते हैं वह राष्ट्र का अनादर करते हैं।

3. भले ही कुछ निराशावादियों द्वारा लोकतंत्र के लिए हमारी प्रतिबद्धता का मखौल उड़ाया जाता हो परंतु जनता ने कभी भी हमारे लोकतंत्र से विश्वासघात नहीं किया है; यदि कहीं कोई खामियां नजर आती हैं तो यह उनके कारनामे हैं जिन्होंने सत्ता को लालच की पूर्ति का मार्ग बना लिया है। जब हम देखते हैं कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को आत्मतुष्टि तथा अयोग्यता द्वारा कमजोर किया जा रहा है, तब हमें गुस्सा आता है, और यह स्वाभाविक है। यदि हमें कभी सड़क से हताशा के स्वर सुनाई देते हैं तो इसका कारण है कि पवित्र भरोसे को तोड़ा जा रहा है।

प्यारे देशवासियो,

4. भ्रष्टाचार ऐसा कैंसर है जो लोकतंत्र को कमजोर करता है तथा हमारे राज्य की जड़ों को खोखला करता है। यदि भारत की जनता गुस्से में है, तो इसका कारण है कि उन्हें भ्रष्टाचार तथा राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी दिखाई दे रही है। यदि सरकारें इन खामियों को दूर नहीं करती तो मतदाता सरकारों को हटा देंगे।

5. इसी तरह, सार्वजनिक जीवन में पाखंड का बढ़ना भी खतरनाक है। चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं। जो लोग मतदाताओं का भरोसा चाहते हैं, उन्हें केवल वही वादा करना चाहिए जो संभव है। सरकार कोई परोपकारी निकाय नहीं है। लोकलुभावन अराजकता, शासन का विकल्प नहीं हो सकती। झूठे वायदों की परिणति मोहभंग में होती है, जिससे क्रोध भड़कता है तथा इस क्रोध का एक ही स्वाभाविक निशाना होता है : सत्ताधारी वर्ग।

6. यह क्रोध केवल तभी शांत होगा जब सरकारें वह परिणाम देंगी जिनके लिए उन्हें चुना गया था : अर्थात् सामाजिक और आर्थिक प्रगति, और कछुए की चाल से नहीं बल्कि घुड़दौड़ के घोड़े की गति से। महत्वाकांक्षी भारतीय युवा उसके भविष्य से विश्वासघात को क्षमा नहीं करेंगे। जो लोग सत्ता में हैं, उन्हें अपने और लोगों के बीच भरोसे में कमी को दूर करना होगा। जो लोग राजनीति में हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि हर एक चुनाव के साथ एक चेतावनी जुड़ी होती है : परिणाम दो अथवा बाहर हो जाओ।

7. मैं निराशावादी नहीं हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि लोकतंत्र में खुद में सुधार करने की विलक्षण योग्यता है। यह ऐसा चिकित्सक है जो खुद के घावों को भर सकता है और पिछले कुछ वर्षों की खण्डित तथा विवादास्पद राजनीति के बाद 2014 को घावों के भरने का वर्ष होना चाहिए।

मेरे प्यारे देशवासियो :

8. पिछले दशक में भारत, विश्व की एक सबसे तेज रफ्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा है। हमारी अर्थव्यवस्था में पिछले दो वर्षों में आई मंदी कुछ चिंता की बात हो सकती है परंतु निराशा की बिल्कुल नहीं। पुनरुत्थान की हरी कोंपलें दिखाई देने लगी हैं। इस वर्ष की पहली छमाही में कृषि विकास की दर बढ़कर 3.6 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था उत्साहजनक है।

9. वर्ष 2014 हमारे इतिहास में एक चुनौतीपूर्ण क्षण है। हमें राष्ट्रीय उद्देश्य तथा देशभक्ति के उस जज्बे का फिर से जगाने की जरूरत है जो देश को अवनति से ऊपर उठाकर उसे वापस समृद्धि के मार्ग पर ले जाए। युवाओं को रोजगार दें और वे गांवों और शहरों को 21वीं सदी के स्तर पर ले आएंगे। उन्हें एक मौका दें और आप उस भारत को देखकर दंग रह जाएंगे जिसका निर्माण करने में वे सक्षम हैं।

10. यदि भारत को स्थिर सरकार नहीं मिलती तो यह मौका नहीं आ पाएगा। इस वर्ष, हम अपनी लोक सभा के 16वें आम चुनावों को देखेंगे। ऐसी खंडित सरकार, जो मनमौजी अवसरवादियों पर निर्भर हो, सदैव एक अप्रिय घटना होती है। यदि 2014 में ऐसा हुआ तो यह अनर्थकारी हो सकता है। हममें से हर एक मतदाता है; हममें से हर एक पर भारी जिम्मेदारी है; हम भारत को निराश नहीं कर सकते। अब समय आ गया है कि हम आत्ममंथन करें और काम पर लगें।

11. भारत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र ही नहीं है : यह विचारों का, दर्शन का, प्रज्ञा का, औद्योगिक प्रतिभा का, शिल्प का, नवान्वेषण का, तथा अनुभव का भी इतिहास है। भारत के भाग्योदय को कभी आपदा ने धोखा दिया है; और कभी हमारी अपनी आत्मतुष्टि तथा कमजोरी ने। नियति ने हमें एक बार फिर से वह प्राप्त करने का अवसर दिया है जो हम गवां चुके हैं; यदि हम इसमें चूकते हैं तो इसके लिए हम ही दोषी होंगे और कोई नहीं।

प्यारे देशवासियो,

12. एक लोकतांत्रिक देश सदैव खुद से तर्क-वितर्क करता है। यह स्वागत योग्य है, क्योंकि हम विचार-विमर्श और सहमति से समस्याएं हल करते हैं, बल प्रयोग से नहीं। परंतु विचारों के ये स्वस्थ मतभेद, हमारी शासन व्यवस्था के अंदर अस्वस्थ टकराव मंय नहीं बदलने चाहिए। इस बात पर आक्रोश है कि क्या हमें राज्य के सभी हिस्सों तक समतापूर्ण विकास पहुंचाने के लिए छोटे-छोटे राज्य बनाने चाहिए। बहस वाजिब है, परंतु इसे लोकतांत्रिक मानदंडों के अनुरूप होना चाहिए। फूट डालो और राज करो की राजनीति हमारे उपमहाद्वीप से भारी कीमत वसूल चुकी है। यदि हम एकजुट होकर कार्य नहीं करेंगे तो कुछ नहीं हो पाएगा।

13. भारत को अपनी समस्याओं के समाधान खुद ढूंढ़ने होंगे। हमें हर तरह के ज्ञान का स्वागत करना चाहिए; यदि हम ऐसा नहीं करते तो यह अपने देश को गहरे दलदल के बीच भटकने के लिए छोड़ने के समान होगा। लेकिन हमें अविवेकपूर्ण नकल का आसान विकल्प नहीं अपनाना चाहिए क्योंकि यह हमें भटकाव में डाल सकता है। भारत के पास सुनहरे भविष्य का निर्माण करने के लिए बौद्धिक कौशल, मानव संसाधन तथा वित्तीय पूंजी है। हमारे पास नवान्वेषी मानसिकता संपन्न, ऊर्जस्वी सिविल समाज है। हमारी जनता, चाहे वह गांवों में हो अथवा शहरों में, एक जीवंत, अनूठी चेतना तथा संस्कृति से जुड़ी है। हमारी सबसे शानदार पूंजी है मनुष्य।

प्यारे देशवासियो :

14. शिक्षा, भारतीय अनुभव का अविभाज्य हिस्सा रही है। मैं केवल तक्षशिला अथवा नालंदा जैसी प्राचीन उत्कृष्ट संस्थाओं के बारे में ही नहीं, वरन् हाल ही की 17वीं और 18वीं सदी की बात कर रहा हूं। आज, हमारे उच्च शिक्षा के ढांचे में 650 से अधिक विश्वविद्यालय तथा 33000 से अधिक कॉलेज हैं। अब हमारा ध्यान शिक्षा की गुणवत्ता पर होना चाहिए। हम शिक्षा में विश्व की अगुआई कर सकते हैं, बस यदि हम उस उच्च शिखर तक हमें ले जाने वाले संकल्प तथा नेतृत्व को पहचान लें। शिक्षा अब केवल कुलीन वर्ग का विशेषाधिकार नहीं है वरन् सबका अधिकार है। यह देश की नियति का बीजारोपण है। हमें एक ऐसी शिक्षा क्रांति शुरू करनी होगी जो राष्ट्रीय पुनरुत्थान की शुरुआत का केंद्र बन सके।

15. मैं जब यह दावा करता हूं कि भारत विश्व के लिए एक मिसाल बन सकता है, तो मैं न तो अविनीत हो रहा हूं और न ही झूठी प्रशंसा कर रहा हूं। क्योंकि, जैसा कि महान ऋषि रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था, वास्तव में मानव मन तभी बेहतर ढंग से विकसित होता है, जब वह भय रहित हो; ज्ञान की खोज में अज्ञात क्षेत्रों में विचरण करने के लिए स्वतंत्र हो; और जब लोगों के पास प्रस्ताव देने का और विरोध करने का मौलिक अधिकार हो।

मेरे प्यारे देशवासियो :

16. इससे पहले कि मैं हमारे स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर आपको फिर से संबोधित करूं, नई सरकार बन चुकी होगी। आने वाले चुनाव को कौन जीतता है, यह इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना यह बात कि चाहे जो जीते उसमें स्थाईत्व, ईमानदारी, तथा भारत के विकास के प्रति अटूट प्रतिबद्धता होनी चाहिए। हमारी समस्याएं रातों-रात समाप्त नहीं होंगी। हम विश्व के एक ऐसे उथल-पुथल से प्रभावित हिस्से में रहते हैं, जहां पिछले कुछ समय के दौरान अस्थिरता पैदा करने वाले कारकों में बढ़ोतरी हुई है। सांप्रदायिक शक्तियां तथा आतंकवादी अब भी हमारी जनता के सौहार्द तथा हमारे राज्य की अखंडता को अस्थिर करना चाहेंगे परंतु वे कभी कामयाब नहीं होंगे। हमारे सुरक्षा तथा सशस्त्र बलों ने, मजबूत जन-समर्थन की ताकत से, यह साबित कर दिया है कि वह उसी कुशलता से आंतरिक दुश्मन को भी कुचल सकते हैं; जिससे वह हमारी सीमाओं की रक्षा करते हैं। ऐसे बड़बोले लोग जो हमारी रक्षा सेवाओं की निष्ठा पर शक करते हैं, गैर जिम्मेदार हैं तथा उनका सार्वजनिक जीवन में कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

17. भारत की असली ताकत उसके गणतंत्र में; उसकी प्रतिबद्धता के साहस में, उसके संविधान की दूरदर्शिता में, तथा उसकी जनता की देशभक्ति में निहित है। 1950 में हमारे गणतंत्र का उदय हुआ था। मुझे विश्वास है कि 2014 पुनरुत्थान का वर्ष होगा।

जय हिंद!

"जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है"।



"जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है"।
जननी-जन्मभूमि स्वर्ग से महान है ।
इसके वास्ते ये तन है मन है और प्राण है ॥
जननी-जन्मभूमि स्वर्ग से महान है ॥ध्रु॥

इसके कण-कण पे लिखा राम-कृष्ण नाम है ।
हुतात्माओं के रुधिर से भूमि शस्य-श्याम है ।
धर्म का ये धाम है, सदा इसे प्रणाम है ।
स्वतंत्र है यह धरा, स्वतंत्र आसमान है ॥१॥

इसके आन पे अगर जो बात कोई आ पड़े ।
इसके सामने जो ज़ुल्म के पहाड़ हों खड़े ।
शत्रु सब जहान हो, विरुद्ध आसमान हो ।
मुकाबला करेंगे जब तक जान में ये जान है ॥२॥

इसकी गोद में हज़ारों गंगा-यमुना झूमती ।
इसके पर्वतों की चोटियाँ गगन को चूमती ।
भूमि ये महान है, निराली इसकी शान है ।
इसके जय-पताके पे लिखा विजय-निशान ॥३॥

इसके वास्ते ये तन है, मन है और प्राण है ।
जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है ॥
!! भारत माता की जय !!

-----------
Sunday, August 14, 2011
जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है....भारत व्यास के शब्दों में मातृभूमि का जयगान


ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 721/2011/161

सनमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों का हार्दिक स्वागत है इस नए सप्ताह में। दोस्तों, कल है 15 अगस्त, इस देश का एक बेहद अहम दिन। 200 वर्ष की ग़ुलामी के बाद इसी दिन 1947 में हमें आज़ादी मिली थी। पर इस आज़ादी को प्राप्त करने के लिए न जाने कितने प्राण न्योछावर हुए, न जाने कितनी औरतें विधवा हुईं, न जाने कितने गोद उजड़ गए, और न जाने कितने बच्चे अनाथ हो गए। अपने देश की ख़ातिर प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीदों को समर्पित करते हुए प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'वतन के तराने'।

देशभक्ति गीतों की इस शृंखला को हम सजा रहे हैं दस अलग-अलग ऐसे गीतकारों की लिखी हुई देशभक्ति की रचनाओं से जिनमें स्तुति है जननी जन्मभूमि की, वंदनवार है इस शस्य श्यामला धरा की, राष्ट्रीय स्वाभिमान की, देश के गौरव की। ये वो अमर गानें हैं दोस्तों, जो गाथा सुनाते हैं उन अमर महर्षियों की जिन्होंने न्योछावर कर दिये अपने प्राण इस देश पर, अपनी मातृभूमि पर। "मातृभूमि के लिए जो करता अपने रक्त का दान, उसका जीवन देवतूल्य है उसका जन्म महान"। स्वर्ग से महान अपनी इस मातृभूमि को सलाम करते हुए इस शृंखला का पहला गाना हमने चुना है गीतकार भरत व्यास का लिखा हुआ। वीरों की धरती राजस्थान में जन्म हुआ था भरत व्यास का। लेकिन कर्मभूमि उन्होंने बनाया मुंबई को। भरत व्यास के फ़िल्मी गीत भी साहित्यिक रचनाओं की श्रेणी में स्थान पाने योग्य हैं। काव्य के शील और सौंदर्य से सम्पन्न जितने उत्कृष्ट उनके रूमानी गीत हैं,उतने ही उत्कृष्ट हैं उनके देशभक्ति की रचनाएँ। और इनमें से जिस रचना को आज हमनेचुना है वह है फ़िल्म 'सम्राट पृथ्वीराज चौहान' का, "जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है..."।मन्ना डे और साथियों के गाये इस गीत को स्वरबद्ध किया था, वसंत देसाई नें। भरत व्यास - वसंत देसाई की जोड़ी का एक और उत्कृष्ट देशभक्ति गीत है फ़िल्म 'लड़की सह्याद्रि की' में पंडित जसराज की आवाज़ में "वंदना करो, अर्चना करो"।

पृथ्वीराज (1149-1192), जो सम्राट पृथ्वीराज चौहान के नाम से जाने जाते हैं, हिन्दू चौहान साम्राज्य के राजा थे जिन्होंने 12वीं सदी के उत्तरार्द्ध में अजमेर और दिल्ली पर राज किया। पृथ्वीराज चौहान अंतिम हिन्दू राजा थे जो दिल्ली के सिंहासन में बैठे। अपने नाना बल्लाल सेन (बंगाल के सेन साम्राज्य) से 20 वर्ष की आयु में सन्‍ 1169 में पृथ्वीराज को अजमेर और दिल्ली का शासन मिला था। उन्होंने वर्तमान राजस्थान और हरियाणा मेंराजपूतों को एकत्रित कर विदेशी आक्रमणों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। पृथ्वीराज नें 1175 में कन्नौज के राजा जयचन्द्र राठौड़ की बेटी संयोगिता को भगाकर ले गए। पृथ्वीराज-संयोगिता की प्रेम कहानी भारत में मशहूर है, जिसे चौहान साम्राज्य के कवि और मित्र चन्द बरदाई नें अपनी कविता में क़ैद किया। तरैन की पहली लड़ाई में 1191 में पृथ्वीराजचौहान नें शहाबुद्दीन मोहम्मद गोरी को परास्त किया। गोरी नें अगले ही वर्ष दोबारा आक्रमण किया जिसमें पृथ्वीराज को हार स्वीकारनी पड़ी। उन्हें क़ैद कर लिया गया और गोरी उन्हें ग़ज़नी ले गए जहाँ उन्हें मृत्यु प्रदान की गई। और इस तरह से दिल्ली हिन्दू राजाओं के हाथ से निकल कर विदेशी मुस्लिम आक्रमणकर्ताओं के कब्ज़े में चला गया। पृथ्वीराज चौहान की देशभक्ति की गाथा अमर वीरगाथाओं में शोभा पाता है। आइए 'वतन के तराने' शृंखला की पहली कड़ी में इस वीर योद्धा को नमन करते हुए उन्हीं पर बनीफ़िल्म का गीत सुनें "जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है"। साथ ही स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर हम अपने सभी श्रोता-पाठकों का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं।

फिल्म – सम्राट पृथ्वीराज चौहान : ‘जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है’ : गीतकार –भरत व्यास

http://podcast.hindyugm.com/2011/08/blog-post_14.html
(समय के अभाव के चलते कुछ दिनों तक हम ऑडियो प्लेयर के स्थान पर यूट्यूब लिंक लगा रहे हैं, आपका सहयोग अपेक्षित है)

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी

शनिवार, 25 जनवरी 2014

आप की अराजकता, आप का धोखा - कल्पेश याग्निक




दैनिक भास्कर, कोटा से
Published on 25 Jan-2014


असंभव के विरुद्ध - कल्पेश याग्निक

आप की अराजकता, आप का धोखा; बहुत अच्छी शुरुआत
अनुशासन, अभ्यास, अनुभूति और अनुभव आधारित अलख

इस बार यह कॉलम हममें से उन लोगों को विचलित कर सकता है जिनमें एक उम्मीद जगी है।
'आप' के अनेक हंस अब बगुले सिद्ध हो रहे हैं। बहुत अच्छा हो रहा है। कि बहुत काल्दी ऐसा हो रहा है।
आप स्वयं अपने 'अराजक' होने पर गर्व कर रहे हैं। आपने आम आदमियों में एक बहुत बड़ा तूफान पैदा कर दिया था। फिर उस तूफान से मर्यादा के सारे किनारे तोड़ दिए।
'तूफान से तबाही ही तो आएगी' - ऐसा कह सकते हैं आप। राष्ट्र के पास सुनने के अलावा कोई चारा भी नहीं है। बेचारा।
यही भूल कर रहे हैं आप। राष्ट्र भला है। बेचारा नहीं।
आपने सबसे पहले, सफलता मिलते ही, एक नई भाषा गढ़ ली। आपने कहा - ''मैं कौन हूं? मेरी 'औकात' ही क्या है? यह मेरी सफलता नहीं। यह मेरे साथियों की सफलता नहीं। यह तो आम आदमी की सफलता है।''
फिर हर बात में दोहराना आरंभ कर दिया। 'मैं मुख्यमंत्री कैसे बनूंगा, क्यों बनूंगा। कभी भी नहीं बनूंगा। बनना चाहता ही नहीं। क्योंकि मेरी 'औकात' ही क्या है?' आम आदमी दंग रह गया। जो ६७ साल में नहीं हुआ - अब हो रहा है। हर बात में उसे पूछा जा रहा है। उसे यही पता था कि 'औकात' तो उसकी नहीं है। यहां तो पूछने वाला - राष्ट्रीय समाचार पटल पर अभूतपूर्व तरह से विचरण कर रहा नेतृत्व - अपने आप को ही कह रहा था कि वह तुच्छ है। कुछ है ही नहीं। जो कुछ है- वह आम आदमी ही है।
फिर अद्भुत 'त्याग' की गाथा सामने आई। सभी सत्ता देना चाहते हैं। ''हम सरकार बनाना नहीं चाहते, विपक्ष में बैठकर सेवा करना चाहते हैं।'' फिर दबाव बढ़ा। तो कहा- भाजपा, कांग्रेस दोनों बराबर की भ्रष्ट, अवसरवादी, सांप्रदायिक पार्टियां हैं। इनमें से किसी का भी समर्थन लेकर सरकार बनाने का प्रश्न ही नहीं। फिर कहा : 'कांग्रेस व्यर्थ, जबरदस्ती हमें समर्थन दे रही है। हमें फंसाना चाहती है!' - यही पहला धोखा।
फिर रहन-सहन, सुरक्षा, तामझाम, लाव-लश्कर पर जो कुछ कहा था, सब से पलटे। 'क्या करें, औकात ही नहीं है।' - यह दूसरा धोखा।
फिर ऐसे-ऐसे निर्णय - जो व्यापक जनहित यानी बड़े स्तर पर आम आदमी के भविष्य के लिए भयावह सिद्ध होंगे। आर्थिक अराजकता लिए हुए। राज-सहायता के पुरातन युग में ढकेलने वाले। कारोबार विरोधी। उपभोक्ता विरोधी। - यह तीसरा धोखा।
फिर सामने आया मंत्रियों का 'मैं आम आदमी हूं' के नाम पर चौंकाने वाला रूप। 'मुझे चाहिए पूर्ण स्वराज' वाली बात निश्चित ही समूचे आकार-प्रकार में लागू करने लगे आप के मंत्री। 'मुझे' पर विशेष जोर देकर। ले आए स्वराज। कानून मंत्री ने अपने आम आदमियों की रक्षा के लिए न जाने कौन-कौन सा रूप नहीं गढ़ा। वे पुलिस बन बैठे। वे ही हितैषी। वे ही रक्षक। वे ही कानून। वे ही जज।
महिलाओं की गरिमा के लिए उद्वेलित समूचे राष्ट्र को एक कानून मंत्री के दंभ और अहं के समक्ष तुच्छ बना देने का प्रयास शुरू हो गया। - यह चौथा धोखा।
किन्तु कौन कहे? कह तो कई रहे थे। सुने कौन? कांग्रेस - भाजपा सब को भ्रष्ट करार दिया था। इसलिए कोई भी कुछ कहेगा - तो वह 'आम आदमी' का विरोधी करार दिया जाएगा।
किन्तु आप के ही कुछ नामी लोगों ने कहना शुरू कर दिया। जब बात बढऩे लगी तो मीडिया में पहली बार आपके विरुद्ध कुछ आने लगा। तब जाकर आपने सोचा - अब अनदेखी नहीं कर सकते। कुछ करना पड़ेगा। क्योंकि आपका आधार मीडिया ही तो है। परंपरागत पार्टियों से चिढ़ है। परंपरागत मीडिया किन्तु अत्यधिक प्रिय है। फिर सोशलमीडिया तो है ही।
आम आदमी को ताकत मीडिया से ही तो मिलेगी। इसलिए मीडिया के लिए कुछ करना अनिवार्य। - पांचवा धोखा।
फिर राष्ट्रीय नाटक। विराट प्रहसन। 'मैंने तो पहले ही कहा था कि हम सिखाएंगे कांग्रेस-भाजपा और सभी परंपरागत पार्टियों को...।' सचमुच। बहुत सिखाया। संविधान की गरिमा ताक में। नियम कूड़ेदान में। मर्यादा को मसल कर रख डाला। आम आदमी त्रस्त होता रहा। उसके आवागमन के रास्ते, साधन, सुविधाएं। सब रुक गए। वह घबरा गया।
किन्तु, आप 'अराजक' कहलाने की प्रसिद्धि के लिए धरने-प्रदर्शन पर डटे रहे। आप सड़क पर लेट गए। रजाई सभी समस्याओं रूपी थपेड़ों का ढाल बना दी गई।जिम्मेदारी को वैगन आर के कोने में धकेल दिया गया।
क्यों?
क्योंकि आप को दिल्ली पुलिस अपने नियंत्रण में चाहिए। क्योंकि आपके मंत्रियों के साथ 'दुव्र्यवहार' हुआ। क्योंकि आपकी मनमर्जी नहीं चली।
आप तो कह रहे थे ना कि 'मेरी 'औकात' क्या है?' तो क्या वह पाखंड था? हैसियत दिखा देना चाहते थे? आपका अहं। आपका मान। आपकी मर्जी। आपकी ताकत। आपके मातहत।
सबकुछ आपका? तो हमारा क्या? हमारी भावनाओं का क्या? हमारी उम्मीदों का क्या? हमारे मन में जगाई गई इच्छाओं का क्या? कि भ्रष्टाचार मिटाने आ गया एक आम आदमी। कि झाड़ू फेर देगा सारी राजनीतिक बुराइयों पर एक आम आदमी।
आम आदमी ऐसे नहीं होते। आम आदमी, आम औरत को अपमानित नहीं करते। विदेशी महिलाओं को तो यूं भी नहीं।
आम आदमी केंद्रीय गृहमंत्री और राज्यसभा में विपक्ष के नेता व सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील के 'मुंह पर थूकने' की कायराना, अमानवीय और संस्कारहीन बात नहीं करते।
आम आदमी केरल से निकलकर समूचे देश में मरीजों की सेवा में सर्वस्व लगाकर खामोश जीवन और निर्धन स्थितियों में अंतिम दम तक अस्पताल में ही जुटे रहने वाली महिलाओं को 'काली-पीली' कहने की कलुषित हरकत नहीं करते। न ही आम आदमी मुहर्रम और ब्रह्मा-विष्णु-महेश पर किसी भी तरह की कविताएं, किसी भी स्थिति-देशकाल और वातावरण में लिखते हैं।
और आम आदमी न तो धर्म के नाम पर वोट मांगते हैं, न ही वोट ले लेने के बाद रातोरात $खास तरह की अराजकता फैलाते हैं।
सबसे बड़ी बात - आम आदमी धोखा नहीं देते। 'हिट-एंड-रन' की आदत हो - तो भी नहीं।
आम आदमी तो अपने परिवार, समूह और मित्र मंडली में कोई भी कुछ बुरा या $गलत कर दे - तो अपने रिश्तों की परवाह किए बग़ैर - उसे ठीक करने में लग जाते हैं। जिम्मेदारी का अहसास कराते हैं। सबकुछ खो देते हैं - किन्तु कर्तव्य से डिगते नहीं। इसीलिए तो आम आदमी है। बाकी सारे आप के गुण तो 'खास' के हैं। आपने डर अलग पैदा कर दिया है। एक वातावरण।
आप जैसे अति महत्वाकांक्षी, जो रातोरात बगैर किसी संघर्ष के मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, कुछ धैर्य रखकर अपनी अराजकता के बारे में सोचेंगे - यह असंभव है। किन्तु सोचना ही होगा। चूंकि आपने आम आदमी की जिम्मेदारी ली है - तो जवाबदेह भी होना होगा। रिस्पॉन्सिबल एंड रिस्पॉन्सिव।
अच्छा हुआ आपने यह रूप दिखा दिया। जल्दी। इससे भले-भोले भारतीय नागरिकों को सबकुछ पता चल गया। कुछ और नहीं तो सच्चाई सामने आ गई।
सच ही सबसे बड़ा राष्ट्रीय हित है।
(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)
इस कॉलम पर आपके विचार ९२००००११७४ पर एसएमएस करें।
हंस श्वेतो बक: श्वेतो को भेदो बकंहसयो:।

नीरक्षीर विवेके तु हंस ; हंसो बको बक: ।।

(यूं तो हंस और बगुले दोनों का रंग धवल - सफेद - होता है किन्तु पानी मिले दूध में से केवल दूध पीने की परीक्षा में हंस ही सफल हो सकता है। अर्थात् दिखने-कहने से नहीं, योग्यता से अंतर पता चलता है। - शास्त्रों से।

- कल्पेश याग्निक

असंभव के विरुद्ध 

यह 'आप' है या अनाड़ी पार्टी : वेदप्रताप वैदिक


Published on 25 Jan-2014
दैनिक भास्कर, कोटा से

मोहभंग
यह 'आप' है या अनाड़ी पार्टी
वेदप्रताप वैदिक

यह आम आदमी की नहीं दिल्ली के खाए-अघाए मध्य वर्ग की पार्टी है जो मीडिया को अपना गुरु मानता है


पिछले हफ्ते मैंने लिखा था कि आम आदमी पार्टी का ज्वार कहीं भाटा में नहीं बदल जाए! तब तक अफ्रीकी महिलाओं का मामला और धरना आदि के विवाद शुरू नहीं हुए थे, लेकिन अब क्या हुआ? एक ही हफ्ते में आम आदमी पार्टी की दुनिया बदल गई। जो पार्टी लोकसभा के चुनाव में दिल्ली की सातों सीटें जीतने और देश भर में 300 उम्मीदवार लड़ाने का इरादा कर रही थी, उसके बारे में देश भर में हो रहे जनमत-सर्वेक्षण अब क्या कह रहे हैं? विभिन्न सर्वेक्षणों की राय है कि अब यदि पूरे भारत में उसे आठ-दस सीटें भी मिल जाएं तो गनीमत है। मुंबई के वित्तशास्त्र के पंडित कह रहे हैं कि उनके दिल में आम आदमी पार्टी के उदय ने जो धड़कन बढ़ा दी थी, वह अब शांत होती दिखाई पड़ रही है। इतना ही नहीं, पिछले हफ्ते तक आम आदमी पार्टी को लेकर जैसी खबरें आ रही थीं, अब क्यों नहीं आ रही हैं? आम आदमी पार्टी की सदस्य-संख्या रोज लाखों में बढ़ रही थी। अब क्या हो गया? अब तक तो उसे करोड़ों तक पहुंच जाना चाहिए था? 'आप' की सदस्यता लेने के लिए किसी भी योग्यता की जरूरत नहीं थी, आप कंप्यूटर का खटका दबाइए और सदस्य बन जाइए। जैसे खटका दबाते ही लाखों सदस्य बन गए वैसे ही अब जरा सा खटका होते ही लाखों सदस्य खिसक लिए। 'आप' के खेत में अचानक उग आए जनसमर्थन के वटवृक्ष इस वक्त कहां अंतर्धान हो गए? इसके नेता कुछ बोल क्यों नहीं रहे? वे हतप्रभ क्यों हैं? देश का जो मोहभंग अगले तीन-चार माह में शुरू होना था, वह अभी से शुरू हो गया है। इसका कारण क्या है?

इसका कारण, जो लोग देख सकते हैं, उन्हें पहले से दिख रहा था। आम आदमी पार्टी कोई पार्टी ही नहीं है। भारत-जैसे विशाल देश में क्या कोई पार्टी साल-छह महीने में खड़ी की जा सकती है? जिसे तख्ता-पलट या खूनी क्रांति कहते हैं, वह भी अचानक नहीं होती। उसके लिए बरसों की तैयारी लगती है। क्या लेनिन ने 1917 की क्रांति की शुरुआत या तैयारी 1915 में की थी? माओ त्से तुंग ने 1948 में जो सत्ता-पलट किया, उसके लिए क्या उन्होंने तीस साल का लंबा युद्ध नहीं लड़ा था? महात्मा गांधी ने भारत में पूरे 32 साल लगाए, तब जाकर सिर्फ राजनीतिक आजादी मिल पाई। 'आप' पार्टी ने हथेली में सरसों उगाने की कोशिश की। भ्रष्टाचार के विरुद्ध फैली उत्कट जन-भावना को लोकपाल के नाम पर भुनाने के बाद सत्ता की भूख जागी और कुछ नौसिखिये लोगों ने आनन-फानन में एक पार्टी खड़ी कर दी। उसको नाम दे दिया - आम आदमी पार्टी! कहां है, आम आदमी, उसमें? भारत के भूखे-प्यासे, दलित-वंचित, गरीब-ग्रामीण लोग ही आम आदमी हैं। ऐसे लगभग 100 करोड़ लोगों की इस पार्टी में कौन-सी जगह है? दिल्ली के पढ़े-लिखे, खाए-धाए, तेज-तर्रार मध्यमवर्ग में यह पार्टी लोकप्रिय हो गई, लेकिन यह-वही मध्यमवर्ग है, जिसके टीवी चैनल और अखबार ही गुरु होते हैं। जिधर उनका इशारा होता है, यह प्रबुद्ध वर्ग उधर ही दौड़ पड़ता है। इशारा मिला और प्रबुद्ध वर्ग मजमा सुना करके चल दिया।

खिड़की मोहल्ले में अफ्रीकी महिलाओं के साथ हुए दुव्र्यवहार और पुलिस के दुरुपयोग ने इन प्रचार माध्यमों के कान खड़े कर दिए और रेल-भवन के धरने ने तो उनके कानों में गर्म तेल उड़ेल दिया। नतीजा क्या हुआ? धरने में पहले जनता को न आने के लिए कहा गया और जब मामला फीका पड़ता दिखा तो मजबूरी में आने का आह्वान करना पड़ा। पहले ही उम्मीद से कम लोग आए और फिर समय गुजरने के साथ भीड़ घटती गई। इस धरने का वही हाल हुआ, जो मुंबई में किए गए अन्ना के आखिरी अनशन का हुआ था। मीडिया ने भी कोड़े बरसाने शुरू कर दिए। जिससे जितना गहरा प्यार होता है, उससे उतनी ही घनघोर घृणा होती है। मीडिया ने 'आप' के लिए बहुत मोहब्बत दिखाई थी। इस नई-नवेली पार्टी को ताजा हवा के झोंके की तरह लिया था। अब उसने उसे हवा में उड़ाना शुरू कर दिया।

अखबारों और चैनलों में 'आप' और उसके नेता छाए जरूर रहे। देश की राजधानी में कोई अराजकता मचाए तो उसे प्रचार तो मिलना ही है। 'आप' के नेताओं के लिए यही परम उपलब्धि थी, लेकिन मीडिया ने उन्हें उल्टा टांग दिया। मीडिया क मार पडऩे लगी तो 'आप' के नेता भाग निकलने की गली ढूंढऩे लगे। दिल्ली के उपराज्यपाल ने एक संकरा रास्ता क्या खोला, 'आप' ने अपनी टोपी संभाली और भाग निकली। चार पुलिसवालों को मुअत्तल करें तो उस विधि मंत्री को भी मुअत्तल क्यों न किया जाए, जो पुलिसवालों को गैर-कानूनी काम के लिए मजबूर कर रहा था। वकील के तौर पर तो अदालत की फटकार वह पहले ही खा चुका था, अब उसके कारनामों की वजह से अफ्रीकी देशों में भारत की बदनामी हो रही है। एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक पार्टी की तरह अपने मंत्री से इस्तीफा मांगने की बजाय 'आप' सीनाजोरी पर उतारू हो गई। उसने अपने आंदोलनकारी रूप को भुनाने की कोशिश की। अपने आपको अराजकतावादी बताने लगे। जब मौका था तब आपने अपना यह अराजकतावादी रूप क्यों नहीं जाहिर किया। आज भी यदि 'आप' सत्तारूढ़ नहीं होती तो उसके इस रूप पर सारा देश लट्टू हो जाता, क्योंकि आज देश की सभी पार्टियां सिर्फ चुनाव-मशीनें बन गई हैं। वे न तो जनता को जगाती हैं और न ही जन-मुद्दों पर सड़क पर संघर्ष करती नजर आती हैं। चुनावों को देखते हुए राष्ट्रीय अधिवेशनों में भी सिर्फ संघर्ष की बात हो रही है, संघर्ष कहां है?

'आप' ने एक नई और जबर्दस्त राह पकड़ी थी। जन-आंदोलन की और वीआईपी संस्कृति के खिलाफ संघर्ष की, लेकिन उसने अपने आचरण से सिद्ध किया कि उसे न तो आंदोलन करना आता है और न ही सरकार चलाना। सिर्फ गांधी टोपी लगाने से कोई आंदोलनकारी नहीं बन जाता। मान लिया कि 'खिड़की' गांव में वेश्यावृत्ति होती है। तो फिर महात्मा गांधी क्या करते? वही करते, जो शराब की दुकानों पर वे करते थे। वहां पुलिस नहीं ले जाते, उन महिलाओं को गाली नहीं देते, उनके साथ झूमा-झटकी नहीं करते। वे उनसे हाथ जोड़कर कहते, मेरी बहनों, तुम्हें यह काम शोभा नहीं देता, लेकिन अब 'आप' ने नैतिक आंदोलन और पुलिस के डंडे, दोनों को गड्मड् कर दिया है। उसने अपने आपको दोनों शक्तियों से वंचित कर लिया है। सेंत-मेंत में कमाई हुई इज्जत उसी प्रकार से सेंत-मेंत में ही लुट गई।

ज्यादा अच्छा होता कि इस मुद्दे पर 'आप' डटी रहती और मामला तूल पकडऩे पर इस्तीफा दे देती। अगर ऐसा होता तो वह लोकसभा चुनावों तक जनता को कम से कम मुंह दिखाने लायक तो रहती। अब वह किस मुंह से जनता के सामने जाएगी? अब तो हाल यह है कि वह जितने दिन कुर्सी से चिपकी रहेगी, हर दिन उसका दामन भारी होता चला जाएगा। अनाड़ी हाथों में चले जाने पर सोना भी पीतल के भाव बिकने लगता है।

लेखक - भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं

'सपा-बसपा-काग्रेस, सबका मालिक एक' - नरेंद्र मोदी



भीड़ देखकर गद गद मोदी : यूपी ने कर लिया है विकास का रुख
Thu, 23 Jan 2014

लखनऊ। गोरखपुर में विजय शंखनाद रैली में उमड़ी भीड़ से गदगद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह संकेत है कि जनता ने कांग्रेस की विदाई तय कर ली है, कांग्रेस मुक्त भारत का संकल्प ले लिया है। सपा पर हमला बोलते हुए कहा कि नेता जी (मुलायम सिंह यादव) की हैसियत नहीं है कि वह उत्तर प्रदेश को गुजरात बना सकें। मोदी ने गुजरात मॉडल की जमकर तारीफ करते हुए पूर्वाचल के युवाओं को सपने दिखाए।

महानगर के मानबेला मैदान में कुल 46 मिनट के संबोधन में उन्होंने कहा कि भीड़ देख कर लग रहा है कि उत्तर प्रदेश ने हर क्षेत्र में एक दूसरे से आगे निकलने की स्पर्धा ठान ली है। यहां की हर रैली पिछली रैली का रिकार्ड तोड़ देती है। आज जनता की आवाज बनारस की गलियों में भी गूंज रही है। चुनाव बहुत देखे हैं, लेकिन यह ऐसा चुनाव है, जिसका फैसला देश के कोटि-कोटि जनों ने कर दिया है। कांग्रेस मुक्त भारत हो कर रहेगा नजारा साफ कह रहा है। वहीं सपा प्रमुख को जवाब देते हुए मोदी ने कहा कि मुलायम की हैसियत नहीं है कि वह यूपी को गुजरात बना सकें मोदी ने कहा कि बाप-बेटे मेरा पीछा नहीं छोड़ रहे। नेता जी ने कहा कि मोदी में हिम्मत नहीं कि वो यूपी को गुजरात नहीं बना सकते। गुजरात का मतलब है 24 घटे 365 दिन गांव - गांव बिजली। गली-गली में बिजली। यूपी को गुजरात बनाने के लिए 56 इंच का सीना लगता है। गुजरात बनाने का मतलब होता है लगातार 10 साल तक कृषि क्षेत्र में अव्वल। 3-4 फीसद पर लुढ़क जाना नहीं । गुजरात शाति, सदभाव लेकर आगे बढ़ रहा है। विकास का मंत्र लेकर आगे बढ़ रहा है। आप नहीं कर सकते हो नेताजी। आप को इतना समर्थन मिला है, क्या किया है आपने लोगों के लिए। न सुरक्षा, न रोजगार न सम्मान दे पा रहे हो। इतने बड़े प्रदेश को बर्बाद करके रख दिया है। मोदी ने स्थानीय सामाजिक समीकरणों को साधने और सरदार पटेल के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश भी दिखाई दी। उन्होंने कहा, मुझे उत्तर प्रदेश के नौजवानों का विशेष अभिनंदन करना है। 15 दिसंबर को सरदार पटेल की पुण्यतिथि थी और उस दिन पूरे देश में श्रद्धाजलि देने के लिए देश भर में एकता दौड़ का आयोजित कराई गई। यूपी के हर कोने में लाखों नौजवान एक साथ सरदार पटेल के लिए दौड़े और यह विश्व रिकॉर्ड बन गया। काग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि 60 सालों के बावजूद देश बुरी हालत में है, गरीब को गरीब बनाए रखने में ही काग्रेस की राजनीतिक सफलता है. मोदी ने कहा कि लोकसभा चुनाव का ट्रेलर दिसंबर में दिख चुका है. बीएसपी पर परोक्ष रूप से प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ लोग समझते हैं कि गरीब, दलित, आदिवासी और हाशिए के लोग उनकी जेब में हैं और वे उनका वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते हैं। कांग्रेस की मानसिकता की दलित विरोधी है।

कृषि विकास दर बढ़ाने के लिए त्रिस्तरीय खेती पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि एक तिहाई खेती, एक तिहाई पशुपालन और मेड़ों पर पेड़ लगाने की जरूरत है।

'सपा-बसपा-काग्रेस, सबका मालिक एक'

मोदी ने प्रदेश की पार्टियों पर वार करते हुए कहा कि सबका मालिक एक होता है. स माने सपा, ब माने बसपा, क माने काग्रेस, और तीनों का मालिक, सबको पता है कौन है मालिक। ये सबका मालिक एक। इन्होंने विकास को किनारे कर वोटबैंक पर ध्यान दिया।

पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि सपा पर हमला बोलते हुए कहा कि समाज को बांटने का काम सपा कर रही है। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उमड़ी भीड़ सेकुलरिज्म के नाम पर तमाचा है।

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

आज भी जीवित हैं चीन युद्ध में शहीद "जसवंत सिंह रावत "




आज भी जीवित हैं महावीर चक्र विजेता शहीद जसवंत सिंह रावत....._/\_....
उनको सुबह तड़के साढ़े चार बजे बेड टी दी जाती है. उन्हें नौ बजे नाश्ता और शाम सात बजे रात का खाना भी मिलता है.चौबीस घंटे उनकी सेवा में भारतीय सेना के पाँच जवान लगे रहते हैं. उनका बिस्तर लगाया जाता है, उनके जूतों की बाक़ायदा पॉलिश होती है और यूनिफ़ॉर्म भी प्रेस की जाती है,लोग जब सुबह उसे देखते थे तो ऐसा प्रतीत होता कि किसी व्यक्ति ने उन पोशाकों और जूतों का इस्तेमाल किया है।इतनी आरामतलब ज़िंदगी है बाबा जसवंत सिंह रावत की, लेकिन आपको ये जानकर अजीब लगेगा कि वे इस दुनिया में नहीं हैं. जसवंत सिंह लोहे की चादरों से बने जिन कमरों में रहा करते थे, वही स्मारक का मुख्य केंद्र बना.गुवाहाटी से तवांग जाने के रास्ते में लगभग 12,000 फीट की ऊंचाई पर बना जसवंत युद्ध स्मारक भारत और चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध में शहीद हुए महावीर चक्र विजेता सूबेदार जसवंत सिंह रावत के शौर्य व बलिदान की गाथा बयां करता है। उनकी शहादत की कहानी आज भी यहां पहुंचने वालों के रोंगटे खड़े करती है और उनसे जुड़ी किंवदंतियां हर राहगीर को रुकने और उन्हें नमन करने को मजबूर करती हैं। 1962 के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए जसवंत सिंह की शहादत से जुड़ी सच्चाई बहुत कम लोगों को पता हैं। उन्होंने अकेले 72 घंटे चीनी सैनिकों का मुकाबला किया और विभिन्न चौकियों से दुश्मनों पर लगातार हमले करते रहे। जब चीनी सैनिकों ने देखा कि एक अकेले सैनिक ने तीन दिनों तक उनकी नाक में दम कर रखा था तो इस खीझ में चीनियों ने जसवंत सिंह को बंधक बना लिया और जब कुछ न मिला तो टेलीफोन तार के सहारे उन्हें फांसी पर लटका दिया। फिर उनका सिर काटकर अपने साथ ले गए। जसवंत सिंह ने इस लड़ाई के दौरान कम से कम 300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतारा था। जसवंत सिंह की इस शहादत को संजोए रखने के लिए 19 गढ़वाल राइफल ने यह युद्ध स्मारक बनवाया। स्मारक के एक छोर पर एक जसवंत मंदिर भी बनाया गया है। जसवंत की शहादत के गवाह बने टेलीफोन के तार और वह पेड़ जिस पर उन्हें फांसी से लटकाया गया था, आज भी मौजूद है। यह जसवंत सिंह की वीरता ही थी कि भारत सरकार ने उनकी शहादत के बाद भी सेवानिवृत्ति की उम्र तक उन्हें उसी प्रकार से पदोन्नति दी, जैसा उन्हें जीवित होने पर दी जाती थी। भारतीय सेना में अपने आप में यह मिसाल है कि शहीद होने के बाद भी उन्हें समयवार पदोन्नति दी जाती रही। मतलब वह सिपाही के रूप में सेना से जुड़े और सूबेदार के पद पर रहते हुए शहीद हुए लेकिन सेवानिवृत्त लगभग 40 साल बाद हुए......नमन ऐसी पुण्यात्मा को..''वन्दे मातरम्''
00000000

1962 में शहीद भारतीय फौजी, जो आज भी दे रहा ड्यूटी

20 अक्‍टूबर 2012 hindi.in.com

1962 में चीन ने भारत को करारी शिकस्‍त दी थी, लेकिन उस युद्ध में हमारे देश कई जांबाजों ने अपने लहू से गौरवगाथा लिखी थी। आज 1962 वॉर की 50वीं बरसी है और हम एक ऐसे शहीद की बात करेंगे, जिसका नाम आने पर न केवल भारतवासी बल्कि चीनी भी सम्‍मान से सिर झुका देते हैं। वो मोर्चे पर लड़े और ऐसे लड़े कि दुनिया हैरान रह गई, इससे भी ज्‍यादा हैरानी आपको ये जानकर होगी कि 1962 वॉर में शहीद हुआ भारत माता का वो सपूत आज भी ड्यूटी पर तैनात है।

शहीद राइफलमैन को मिलता है हर बार प्रमोशन
उनकी सेना की वर्दी हर रोज प्रेस होती है, हर रोज जूते पॉलिश किए जाते हैं। उनका खाना भी हर रोज भेजा जाता है और वो देश की सीमा की सुरक्षा आज भी करते हैं। सेना के रजिस्‍टर में उनकी ड्यूटी की एंट्री आज भी होती है और उन्‍हें प्रमोश भी मिलते हैं। अब वो कैप्‍टन बन चुके हैं। इनका नाम है- कैप्‍टन जसवंत सिंह रावत। महावीर चक्र से सम्‍मानित फौजी जसवंत सिंह को आज बाबा जसवंत सिंह के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले के जिस इलाके में जसवंत ने जंग लड़ी थी उस जगह वो आज भी ड्यूटी करते हैं और भूत प्रेत में यकीन न रखने वाली सेना और सरकार भी उनकी मौजूदगी को चुनौती देने का दम नहीं रखते। बाबा जसवंत सिंह का ये रुतबा सिर्फ भारत में नहीं बल्कि सीमा के उस पार चीन में भी है।

पूरे तीन दिन तक चीनियों से अकेले लड़ा था वो जांबाज
अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में नूरांग में बाबा जसवंत सिंह ने वो ऐतिहासिक जंग लड़ी थी। वो 1962 की जंग का आखिरी दौर था। चीनी सेना हर मोर्चे पर हावी हो रही थी। लिहाजा भारतीय सेना ने नूरांग में तैनात गढ़वाल यूनिट की चौथी बटालियन को वापस बुलाने का आदेश दे दिया। पूरी बटालियन लौट गई, लेकिन जसवंत सिंह, लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी और गोपाल सिंह गुसाईं नहीं लौटे। बाबा जसवंत ने पहले त्रिलोक और गोपाल सिंह के साथ और फिर दो स्‍थानीय लड़कियों की मदद से चीनियों के साथ मोर्चा लेने की रणनीति तैयार की। बाबा जसवंत सिंह ने अलग अलग जगह पर राईफल तैनात कीं और इस अंदाज में फायरिंग करते गए मानो उनके साथ बहुत सारे सैनिक वहां तैनात हैं। उनके साथ केवल दो स्‍थानीय लड़कियां थीं, जिनके नाम थे, सेला और नूरा। चीनी परेशान हो गए और तीन यानी 72 घंटे तक वो ये नहीं समझ पाए कि उनके साथ अकेले जसवंत सिंह मोर्चा लड़ा रहे हैं। तीन दिन बाद जसवंत सिंह को रसद आपूर्ति करने वाली नूरा को चीनियों ने पकड़ लिया। इसके बाद उनकी मदद कर रही दूसरी लड़की सेला पर चीनियों ने ग्रेनेड से हमला किया और वह शहीद हो गई, लेकिन वो जसवंत तक फिर भी नहीं पहुंच पाए। बाबा जसवंत ने खुद को गोली मार ली। भारत माता का ये लाल नूरांग में शहीद हो गया।

चीनी सेना भी सम्मान करती है शहीद जसवंत का
चीनी सैनिकों को जब पता चला कि उनके साथ तीन दिन से अकेले जसवंत सिंह लड़ रहे थे तो वे हैरान रह गए। चीनी सैनिक उनका सिर काटकर अपने देश ले गए। 20 अक्‍टूबर 1962 को संघर्ष विराम की घोषणा हुई। चीनी कमांडर ने जसवंत की बहादुरी की लोहा माना और सम्‍मान स्‍वरूप न केवल उनका कटा हुआ सिर वापस लौटाया बल्कि कांसे की मूर्ति भी भेंट की।

उस शहीद के स्मारक पर भारतीय-चीनी झुकाते है सर
जिस जगह पर बाबा जसवंत ने चीनियों के दांत खट्टे किए थे उस जगह पर एक मंदिर बना दिया गया है। इस मंदिर में चीन की ओर से दी गई कांसे की वो मूर्ति भी लगी है। उधर से गुजरने वाला हर जनरल और जवान वहां सिर झुकाने के बाद ही आगे बढ़ता है। स्‍थानीय नागरिक और नूरांग फॉल जाने वाले पर्यटक भी बाबा से आर्शीवाद लेने के लिए जाते हैं। वो जानते हैं बाबा वहां हैं और देश की सीमा की सुरक्षा कर रहे हैं। वो जानते हैं बाबा शहीद हो चुके हैं, वो जानते हैं बाबा जिंदा हैं, बाबा अमर हैं। 
-------------------------------------------




शहीद होने के बाद भी जो गश्त करते हैं भारत-चीन सीमा पर!
शुक्रवार, 6 सितंबर 2013
अमर उजाला, नलिनी गुसाईं, देहरादून

Indian soldier patrols the border at night
मूलरूप से पौड़ी के रहने वाले वीर जवान जसवंत सिंह रावत की दास्तां अब दुनिया देखेगी। महावीर चक्र विजेता जसवंत सिंह ने वर्ष 1962 में हुए युद्ध में अकेले ही चीन की सेना को 72 घंटो तक रोके रखा था।  अरूणाचल में इस जवान को बाबा के नाम से पुकारा जाता है और वहां जसवंत बाबा का मंदिर भी है। अब जल्द ही राइफलमैन जसवंत सिंह की वीरता भरी कहानी सभी बड़े पर्दे पर देख पाएंगे। दून के थियेटर आर्टिस्ट मिलकर जसवंत सिंह पर फिल्म बना रहे हैं।

दून में परिवार
जवान जसवंत सिंह का परिवार दून के डोभालवाला क्षेत्र में ही रहता है। 91 वर्षीय मां लीला देवी को बेटे की वीरता पर बेहद फख्र महसूस होता है। मात्र एक साल फौज की नौकरी करने के बाद 19 साल की आयु में भारत-चीन युद्ध में जसवंत सिंह मारे गए। दुश्मनों ने उन पर पीछे से हमला किया और सिर काट कर ले गए।

मरने के बाद भी प्रमोशन
जसवंत देशभर में अकेले ऐसे सैनिक रहे जिन्हें मरने के बाद भी प्रमोशन और सालाना छुट्टियां मिलती रही। राइफलमैन से वो अब मेजर जनरल बन चुके हैं। भाई विजय सिंह रावत का कहना है कि सुनने में आया था भाई रिटायर हो चुके हैं पर अभी पक्का नहीं पता लग पाया है। विजय ने बताया कि वे लोग मूलरूप से पौड़ी बीरोखाल ब्लॉक के बाड़यू गांव के रहने वाले हैं।

बाबा का मंदिर
शहीद जसवंत ने अरूणाचल में जिस जगह पर चीन की सेना से युद्ध किया। उस जगह का नाम जसवंत गढ़ रख दिया गया है। वहां जसवंत सिंह को बाबा जी कहकर बुलाया जाता है। वहां बिना बाबा को याद किए सैनिक राइफल नहीं उठाते। बाबा की याद में वहां एक मंदिर बनाया गया है। लोगों का मानना है कि अब भी बाबा के लिए बनाए गए कमरे में आकर ठहरते हैं क्योंकि सुबह चादर में सिलवट होती है। कमरे में प्रेस कर रखी गई शर्ट भी मैली होती है।

अब बनेगी फिल्म
दून के शहीद पर अब फिल्म बनने जा रही है। एंफीगौरी फिल्म बनाने के बाद अब मुंबई से लौटे अविनाश इसी प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। अविनाश ध्यानी ने बताया कि वे अपने पिता के मुंह से हमेशा से जसवंत सिंह के बहादुरी के किस्से सुनता रहा हूं यही वजह है कि मैंने इस पर फि ल्म बनने की सोची।

फिल्म बनाने की योजना
थियेटर आर्टिस्ट अभिषेक मैंदोला ने बताया कि फिल्म बनाने से पहले अरूणाचल जाकर मंदिर सहित वे सभी जगह देखी जाएगी जहां जसवंत सिंह रहते थे।उसके बाद ही स्क्रिप्ट तैयार की जाएगी। इस फिल्म में सहयोग करने वालों में अनुज जोशी, लक्ष्मण सिंह रावत, पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी आदि हैं।

कई बार गश्त करते हुए देखा गया एक व्यक्ति
शहीद जसवंत सिंह के भाई रणवीर सिंह ने बताया कि कई बार चीन और भारत के बॉर्डर पर एक व्यक्ति रात में गश्त करता हुआ दिखाई दिया।

चीन की ओर से ऑब्जेक्शन
जिस पर चीन की ओर से ऑब्जेक्शन भी उठाया गया। जबकि भारत की सेना ने साफ कहा कि उनकी ओर से किसी को वहां नहीं भेजा गया। जबकि लोग मानते हैं कि वो और कोई नहीं मेरा भाई जसवंत ही है। वो आज भी अपनी मां का ख्याल रखता है और मां की रक्षा के लिए हमारे आसपास ही मौजूद रहता है।

नहीं जानते कौन है महावीर चक्र विजेता
देखकर आश्चर्य होता है लेकिन यही सच है। जसवंत सिंह के मोहल्ले में कोई उनके घर का पता नहीं बता पाता। उनके घर के पास ही महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रहती हैं।

उनका पता बच्चे-बच्चे को मालूम है। लेकिन महावीर चक्र विजेता जसवंत सिंह का पता पूछने पर लोग बगले झांकने लगते हैं। बड़े-बुजुर्ग तक कहते हैं कौन जसवंत सिंह? शहीद की भाभी मधु रावत ने बताया कि मेयर विनोद चमोली कितनी ही बार नजदीकी चौक का नाम शहीद जसवंत सिंह चौक रखने का आश्वासन दे चुके हैं लेकिन कार्रवाई अब तक नहीं हुई है। जसवंत को शहीद हुए पूरे पचास साल हो गए लेकिन दून में उनके नाम पर एक सड़क तक नहीं बनाई गई।


सर्वे: मोदी पहली पसंद, बीजेपी शिखर पर, सीटें 192-210 तक



सर्वे: मोदी पहली पसंद, बीजेपी शिखर पर, सीटें 192-210 तक
आईबीएन-7 | Jan 24, 2014
नई दिल्ली। अगर अभी चुनाव हों तो बीजेपी अबतक का अपना सबसे बेहतर प्रदर्शन कर सकती है जबकि कांग्रेस को तगड़ा झटका लगता नजर आ रहा है। आईबीएन7 के लिए सीएमडीएस के इस सर्वे में बीजेपी को अकेले 192 से लेकर 210 सीटें मिलने का अनुमान है जबकि कांग्रेस को 92 से 108 तक सीटें मिल सकती हैं। सर्वे में एनडीए को 211 से 231 और यूपीए को 107 से 127 सीटें मिलने का अनुमान है। ममता बनर्जी को 20 से 28 और जयललिता और लेफ्ट फ्रेंट को 15 से 23 सीटें मिल सकती हैं।

मोदी पहली पसंद

आईबीएन7 के लिए सीएसडीएस के 18 राज्यों में किए गए नेशनल ट्रैकर सर्वे में लोगों की पहली पसंद बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी हैं। सर्वे में नरेन्द्र मोदी 34 फीसदी लोगों को ने पसंद किया है जबकि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी महज 15 फीसी लोगों की पसंद हैं और सोनिया 5 फीसदी पर सिमट गई हैं। वहीं जब मोदी और राहुल के बारे में सीधे पूछा गया तो मोदी 42 फीसदी लोग प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं और राहुल को 25 फीसदी लोग प्रधानमंत्री देखना चाहेत हैं।

गौरतलब है कि IBN7 से पहले राज्यवार सर्वे की तस्वीरें पेश की। आइए आपको बताते हैं कि IBN7 के लिए 18 राज्यों में किए गए CSDS के इस सर्वे में किस राज्य में किसको कितनी सीटें मिल रही हैं।

पूरब के तीन राज्यों की तस्वीर

पश्चिम बंगाल में तृणमूल को 20 से 28 सीटें मिल रही हैं तो वाम खेमे को 7 से 13 सीटें जबकि कांग्रेस को 5-9 जबकि बीजेपी को अगर मिलीं तो 2 सीटें मिलेंगी।

ओडिशा में बीजू जनता देल को 10 से 16 तो कांग्रेस को 3 से 9 सीटें मिल रही हैं। बीजेपी को अगर मिलीं तो 4 तक सीटें मिल सकती हैं।

बिहार में बीजेपी को 16 से 24 सीटें मिल रही हैं तो जेडीयू को 7 से 13 सीटें जबकि लालू की आरजेडी को 6 से 10 सीटें मिल रही हैं और कांग्रेस को मिलीं तो 4 सीटें मिलेंगी।

पूरब के बाद अब रुख दक्षिण का

आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक फायदा वाइएसआर कांग्रेस को हो रहा है, उन्हें 11 से 19 सीटें मिल रही हैं तो तेलगू देशम को 9 से 15, कांग्रेस को 5 से 9 और तेलंगाना राष्ट्र समिति को 4 से 8 सीटें।

केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ को 12 से 18 सीटें मिल रही हैं तो लेफ्ट को मोर्चे को 2 से 8 सीटें।

वहीं तमिलनाडु में जयाललिता की अन्ना डीएमके को 15 से 23 सीटें मिल रही हैं तो करूणानिधी की डीएमके को 7 से 13 सीटें, तो कांग्रेस को 1 से 5 सीटें मिल रही हैं जबकि अन्य को 4 से 10 सीटें।

अब बारी पश्चिम और मध्य भारत की

सबसे पहले हमने रुख किया गुजरात का जहां बीजेपी को 26 में से 20 से 25 सीटें मिल रही हैं। तो कांग्रेस को 1 से 4 सीटें, जबकि अन्य के खाते में 2 सीटें जा सकती हैं।

जबकि मध्यप्रदेश में बीजेपी को 23 से 27 सीटें और कांग्रेस को 2 से 5 सीटें मिल रही हैं।

वहीं महाराष्ट्र में बीजेपी और उसके सहयोगियों को 25 से 33 सीटें मिल रही हैं तो कांग्रेस को 12 से 20 सीटें और अन्य को 1 से 5 सीटें मिल रही हैं।

सबसे चौंकाने वाले नतीजे उत्तर भारत के हैं दिल्ली में कांग्रेस लड़ाई से ही बाहर है। आम आदमी पार्टी को 4 से 6 सीटें मिलने का अनुमान है तो बीजेपी को 1 से 3 सीटें।

राजस्थान की 25 सीटों में बीजेपी को जहां 20 से 24 सीटें मिलने का अनुमान है तो कांग्रेस को मिलीं तो अधिक से अधिक 2 सीटें मिलेंगी।

यूपी में बीजेपी का सबसे बड़ा फायदा दिख रहा है उसे 41 से 49 सीटें मिलती दिख रही हैं। तो कांग्रेस को 4 से 10 सीटें मिल रही हैं। समाजवादी पार्टी को 8 से 14 सीटें तो बीएसपी को 10 से 16 सीटें मिलती दिख रही हैं।

मैं आपसे साठ महीने मांगता हूं - नरेंद्र मोदी




गोरखपुर. आज भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की गोरखपुर में रैली को संबोधित किया। इस रैली को ऐतिहासिक बनाने के लिए भाजपा ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। वहीं मोदी भी इस रैली को सफल बनाने के लिए गोरखनाथ मंदिर के दर्शन करने पहुंचे।

वहीं मोदी की सुरक्षा को देखते हुए पुलिस, एटीएस, खुफिया एजेंसियों, गुजरात सुरक्षा बल आदि ने तकरीबन 90 एकड़ रैली क्षेत्र पर नजर रखी। विजय शंखनाद रैली को लेकर बीजेपी के कार्यकर्ताओं में ही नहीं बल्कि लोगों में भी खासा उत्साह देखा गया।

हजारों की भीड़ में यहां लोग नजर आए। वहीं सुबह से ही यहां सड़कों पर जाम रहा। इस जाम के कारण कई लोगों को दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा।
गोरखपुर. यूपी के गोरखपुर में बीजेपी की विजय शंखनाद रैली को संबोधित करते हुए पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस और सपा पर जमकर निशाना साधा।

मोदी ने कहा 'आपने साठ साल तक शासक चुने हैं, मैं आपसे साठ महीने मांगता हूं। मैं आपके सपनों का हिंदुस्तान देने का वादा करता हूं। आज सुभाष चंद्र बोस का जन्मदिन है। उन्होंने कहा था कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, मैं आपसे कहता हूं कि आप मुझे साठ महीने दो, मैं आपको सुख-चैन की जिंदगी दूंगा।'

यूपी के हाल पर चिंता जताते हुए मोदी ने कहा कि यहां किसानों और नौजवानों का बूरा हाल है। किसान यहां ब्लैक में फर्टिलाइजर खरीदते हैं। कॉलेजों में समय से परीक्षाएं नहीं होती। यूपी पूरे देश की शक्ल बदल सकता है लेकिन इसके लिए सही सोच चाहिए, सही नेतृत्व चाहिए। मुलायम न प्रदेश में रोजगार दे रहे न ही सुरक्षा। अकेला यूपी पूरे देश का पेट भर सकता है।

मोदी ने कहा, 'क्या उत्तर प्रदेश में अमूल जैसी डेयरी नहीं बन सकती है। क्या यूपी के किसानों को उनकी फसलों का सही मूल्य नहीं मिल सकता है। यूपी की तस्वीर बदल सकती है। लेकिन मुलायम से यूपी के लिए कुछ नहीं किया।'

मोदी ने मुलायम सिंह यादव पर पलटवार करते हुए कहा 'आज नेता जी (मुलायम सिंह यादव) ने मुझे ललकारा। उन्होंने कहा वे यूपी को गुजरात नहीं बना सकते, सही कहा नेताजी आप यूपी को गुजरात नहीं बना सकते हैं। क्योंकि, गुजरात बनाने का मतलब है चौबीस घंटे बिजली, विकास, सुख चैन और शांति, जोकि आप नहीं कर सकते हैं। लिहाजा आप गुजरात नहीं बना सकते नेताजी।'

मोदी ने कहा कि यूपी का कोई ऐसा गांव नहीं जिसका नौजवान गुजरात में काम न करता हो, मोदी ने कहा कि कौन ऐसा नौजवान है जो अपने मां-बाप को छोड़कर दूर जाना चाहता है? यदि अपने ही प्रदेश में रोजी-रोटी मिलती तो उसे अपना घर छोड़ने की जरूरत ही नहीं होती।

मोदी ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि यह पार्टी चुनावों से पहले ही गरीबी की बात करती है। आजादी के बाद से लगातार कई बार कांग्रेस की सरकार रही लेकिन यह पार्टी केवल बाते ही करती रही। साठ साल में गरीबी क्यों खत्म नहीं हुई। इसका कारण यह है कि कांग्रेस का राजनीतिक भविष्य गरीब को गरीब रखने में ही छिपा हुआ है।

नरेंद्र मोदी ने कहा कि यूपी में बदलाव की लहर चल रही है। रैली में आए लोग इस हवा का रुख साफ बता रहे हैं।
मोदी से पहले रैली को संबोधित करते हुए बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि यूपी में संप्रदाय विशेष की राजनीति हो रही है। सपा के दो सालों के शासन काल में जनता के सभी सपने टूट गए हैं। सपा के आते ही सांप्रदायिक दंगे बढ़ जाते हैं। धर्म और राजनीति के आधार पर राजनीति शुरू हो जाती है।

इस प्रदेश में संप्रदाय के आधार पर स्कॉलरशिप दी जाती है। यही काम केंद्र की कांग्रेस सरकार भी करती रही है। सोनिया जी कहती हैं कि बीजेपी देश को बर्बाद करने की कोशिश कर रही है, लेकिन उनको समझना होगा कि यदि मोदी के पीएम बनने से देश बर्बाद होगा तो मनमोहन सिंह ने पिछले 10 वर्षों में देश का कौन सा भला किया है?

बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ ने कहा कि केंद्र सरकार के चलते फ़र्टिलाइज़र फैक्ट्री में रैली नही हो पाई। इस सेक्युलर सरकार को आइना दिखाते हुए मनबेला के अल्पसंख्यकों ने अपनी जमीन रैली के लिए उपलब्ध कराई।

जहां इन्सेफेलाइटिस के इलाज के लिए सीमित संसाधन हैं, वहां के डॉक्टरों को सपा सरकार ने सैफई में फ़िल्मी कलाकारों की सेवा में लगा दिया। मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर गोरखपुर का बंद फ़र्टिलाइज़र कारखाना चलेगा। योगी ने आरोप लगाया कि एसएसबी नेपाल के रास्ते आए पाकिस्तान परस्त आतंकियों के पुनर्वास में लगी है।

इससे पहले, गोरखनाथ मंदिर में दर्शन के बाद मोदी सड़क के रास्ते मनबेला स्थित रैली स्थल पहुंचे हैं। वहीं मंच पर इस दौरान विनय कटियार ने कहा कि बीजेपी की सरकार बनने के बाद कानून पास कर अयोध्या में राम मंदिर बनेगा। उन्होंने सपा सरकार के आजम खान को दंगाई मंत्री बताते हुए कहा कि मुजफ्फरनगर में दंगा उन्ही की वजह से हुआ।

रैली स्थल से पुलिस ने दो व्यक्तियों को चाकू के साथ गिरफ्तार किया गया है। रैली में आए लोगों की तलाशी के दौरान दो लोगों के पास चाकू बरामद हुए। पुलिस दोनों को गिरफ्तार कर पूछताछ कर रही है।

बीजेपी नेता शिवप्रताप शुक्ला ने मंच से आरोप लगाया है कि बीजेपी समर्थकों और नरेंद्र मोदी को सुनने आने वाली भीड़ को अनावश्यक रूप से परेशान किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पार्टी के नेताओं के पास फ़ोन आ रहे हैं कि बीजेपी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को नौसढ़ और खजांची चौराहे पर पुलिस प्रशासन जबरन रोक रहा है। वहीं लालजी टंडन ने कहा जेपी के आन्दोलन की शुरूआत पूर्वांचल से ही हुई थी और आज मोदी को भी पूर्वांचल से पूरा समर्थन मिलेगा।

कांग्रेस को,जब-जब चुनाव होते हैं तभी गरीबों की याद आती है - नरेंद्र मोदी



मुझे 60 महीने दो, मैं आपको सुख-चैन की जिंदगी दूंगा : मोदी
Thursday, January 23, 2014,
ज़ी मीडिया ब्यूरो

गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) : यूपी के गोरखपुर में गुरुवार को विजय शंखनाद रैली के दौरान बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने हुंकार भरी। मोदी ने विपक्षी पार्टियों को ललकारते हुए कहा कि चुनाव का फैसला जनता तय कर चुकी है। मोदी ने रैली के दौरान जमा भारी भीड़ से उत्साहित होकर कहा कि ये भीड़ बदलती हवा का रुख दिखा रही है। मोदी ने इस दौरान कांग्रेस पर जमकर प्रहार किया। उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि आपने 60 साल शासकों को दिए हैं, अब सेवकों को 60 महीने दीजिए। हम आपकी खुशी के लिए रात-दिन एक दिन कर देंगे। सुभाष चंद्र बोस के नारे को याद करते हुए मोदी ने कहा कि आप मुझे 60 महीने दीजिए मैं आपको सुख-चैन की जिंदगी दूंगा।


उन्होंने कांग्रेस को आड़े हाथों लिया और आरोप लगाया कि जब-जब चुनाव होते हैं तभी कांग्रेस को गरीबों की याद आती है। क्योंकि उन्हें गरीबों और दलितों को वोट चाहिए होता है। मोदी ने कहा कि कांग्रेस ने हमेशा अपने फायदे के लिए लोगों को गरीब रखा है। इसलिए 60 साल में भी हिंदुस्तान से गरीबी नहीं मिटी और गरीबों की जिंदगी भी नहीं बदली। मोदी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने हमेशा गरीबी और गरीबों को मजाक उड़ाया है। इसलिए कांग्रेस एक चायवाले को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है।

नरेंद्र मोदी ने कहा कि हाल ही में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए और उन राज्यों में जो नतीजे सामने आए वह 2014 आम चुनाव के ट्रेलर की तरह है। मोदी ने यह भी साफ किया कि जनता कांग्रेस को विदाई देने का मन बना चुकी है। गोरखपुर के मानबेला मैदान में आयोजित विजय शंखनाद रैली को सम्बोधित करते हुए मोदी ने यह बातें कही। मोदी ने इस दौरान कांग्रेस पर जमकर प्रहार किया।

मोदी ने कहा कि अभी हाल ही में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए और उसमें जो नतीजे चौंकाने वाले आए। पांच राज्यों में से चार राज्यों में भाजपा ने सबसे अधिक सीटें हासिल की है। मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह पिछड़ों, अतिपिछड़ों, गरीबों और शोषितों को हमेशा वोट बैंक के लिए इस्तेमाल करती है लेकिन विधानसभा चुनावों में इन वगरें ने भी कांग्रेस को नकार दिया है।

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी ने कहा कि राजस्थान में अनुसूचित जाति की 34 सीटें हैं लेकिन उसमें से कांग्रेस को एक भी सीट नही मिली जबकि भाजपा को 32 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल हुई। इसी तरह छत्तीसगढ़ की 10 अनुसूचित जाति की सीटों में से कांग्रेस को सिर्फ एक ही सीट मिली ।

उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति की 35 सीटें हैं, जिसमें भाजपा को 28 सीटें हासिल हुई। मोदी ने कहा, दलितों, पीड़ितों और शोषितों को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि जहां-जहां भाजपा को सेवा करने का अवसर मिला है, वहां-वहां हमारी प्राथमिकता गरीबों और शोषितों का कल्याण करने की रही है। मोदी ने कहा कि देश में बहुत चुनाव हुआ लेकिन इस बार का आम चुनाव सबसे अलग होगा। देश की जनता ने इस बार चुनाव के पहले ही अपना नतीजा सुना दिया है। उन्होंने कहा कि देश की जनता अब यह ठान चुकी है कि देश को कांग्रेस मुक्त बनाना है।

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने कहा कि देश की जनता कांग्रेस और उसके साथी दलों की विदाई तय कर चुकी है। इस बार कांग्रेस मुक्त भारत का सपना जरूर साकार होगा।

-----------

प्रधानमंत्री पद के लिए ' मोदी ' सबसे पोपुलर



प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी सबसे पोपुलर, रेस में मनमोहन और राहुल पीछे: सर्वे
January 21, 2014
ज़ी मीडिया ब्यूरो

नई दिल्ली : एक न्यूज चैनल द्वारा कराए गए सर्वे के मुताबिक प्रधानमंत्री पद के लिए देश में नरेंद्र मोदी की लहर है। इस सर्वे में प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी पहली पसंद है और इस रेस में सबसे आगे चल रहे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की फेहरिस्त में सर्वे के मुताबिक मोदी से पीछे हैं।

बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड और ओडिशा में आम लोगों पर हुए सर्वे में यह बात सामने आई है। इसके मुताबिक, बिहार, झारखंड में तो बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में उभरेगी, वहीं प. बंगाल में तृणमूल तो ओडिशा में सत्ताधारी बीजू जनता दल के ही आगे रहने के आसार हैं।

पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी 18 फीसदी लोगों की पसंद हैं, जबकि 11 फीसदी लोग ममता बनर्जी को पीएम के तौर पर देखना चाहते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार पश्चिम बंगाल में 60 फीसदी लोगों ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रदर्शन से संतोष जताया जबकि नरेंद्र मोदी को लोग प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वाधिक तरजीह दे रहे हैं। सर्वे के तहत बिहार में बीजेपी को जबर्दस्त फायदा होने का अनुमान है।

बिहार में 39 फीसदी लोग नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनता हुआ देखना चाहते हैं। बिहार में पीएम के तौर पर नीतीश कुमार 15 फीसदी लोगों की पसंद हैं, जबकि सिर्फ 9 फीसदी लोग राहुल गांधी को पीएम के तौर पर देखना चाहते हैं।

ओडिशा में बीजेपी को सबसे ज्यादा फायदा होने की तस्वीर सामने आ रही है। ओडिशा में प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी 33 फीसदी लोगों की पसंद हैं, जबकि राहुल गांधी को 19 फीसदी लोग पीएम के तौर पर देखना चाहते हैं।

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

गणतंत्र दिवस : जनतंत्र के आत्म निरिक्षण का संवैधानिक पर्व



26 tuojh 2014 @ 65os x.kra= fnol ij
tura= ds vkRe fufj{k.k dk laoS/kkfud ioZ x.kra= fnol
& vjfoUn fllksfn;k

ewyr% 26 tuojh 1950 dks gekjs lafo/kku ds ykxw gksus ds dkj.k] ;g rkjh[k x.kra= fnol ds :i esa ekuk;k tkrk gSA fdUrq ;g vge rkjh[k gh lafo/kku ykxw djus ds fy;s D;ksa r; dh xbZ] blds ihNs ewy dkj.k ;g gS fd Lora=rk laxzke ds nkSjku blh fnu rr~dkyhu dkaxzsl us 1930 ds ykgkSj vf/kos'ku esa igyh ckj frjaxs >aMs dks Qgjk;k  Fkk] vkSj lkFk gh ,d egRoiw.kZ QSlyk ysrs gq;s] ?kks’k.kk dh Fkh fd 26 tuojh dks izfro’kZ Þiw.kZ Lojkt fnolß ds :i esa eukuk tk,xk A bl fnu lHkh Lora=rk lsukuh iw.kZ Lojkt dk çpkj djsaxs] bl rjg dk ladYi fy;k x;k FkkA bl rjg ijra= Hkkjr esa 26 tuojh 1930 ls v?kksf"kr :i ls Hkkjr dk Lora=rk fnol cu x;k Fkk A

 15 vxLr 1947 dks ns”k Lora= gqvk] vaxzstksa us vius ik[k.M dks iwjk djrs gq;s v[k.MHkkjr dks [kf.Mr dj fn;kA Hkkjr dh Lora=rk ds i”pkr fdl rjg dk lafo/kku gksxk ] blds fy;s iwoZ esa gh lafo/kku lHkk dk xBu gks pqdk FkkA ikfdLrkuh {kS= ds lnL;ksa dks vyx djrs gq;s blh lafo/kku lHkk us] lafo/kku lHkk lnL;ksa vkSj fo'ks"kKksa ds }kjk nks lky X;kjg eghus vkSj 18 fnuksa esa Hkkjr dk lafo/kku cukdj rS;kj fd;k x;k FkkA tks fd  26 tuojh] 1950 ls ns'k ij lafo/kku ykxw gqvkA rc ls Hkkjr esa Hkkjrh; lafc/kku ds vUrZxr “kklu O;oLFkk py jgh gSA ;g fnu Hkkjr ds fy, fo'ks"k egRo j[krk gS rFkk Hkkjrh; “kklu O;oLFkk dks izfro’kZ vkRe fufj{k.k dk volj Hkh iznku djrk gSA Lkafo/kku lHkk dh izk:i desVh ds v/;{k Mk- Hkhejko vEcsMdj dh v/;{krk esa Hkkjrh; lafo/kku cuk;k x;k] ftlesa 395 vuqPNsnksa vkSj 8 vuqlwfp;ksa ds lkFk nqfu;k esa lcls cM+k fyf[kr lafo/kku gS tks vc vkSj Hkh foLr`r gks pqdk gS A

 26 tuojh] 1950 dks lafo/kku ds ykxw gksus ds lkFk lcls igys M‚- jktsUæ çlkn us xouZesaV gkml ds njckj gky esa Hkkjr ds çFke jk"Vªifr ds :i esa 'kiFk yh vkSj blds ckn jk"Vªifr dk jSyk] rr~dkyhu bfoZu LVsfM;e igqapk tgka mUgksaus jk"Vªh; /ot frjaxk Qgjk;k vkSj rc ls gh bl fnu dks jk"Vªh; ioZ dh rjg euk;k tkrk gSA

M‚- jktsUæ çlkn] Lora= Hkkjr ds çFke jk"Vªifr us Hkkjrh; x.kra= ds tUe ds volj ij ns'k ds ukxfjdksa dk vius fo'ks"k lans'k esa dgk ß gesa Lo;a dks vkt ds fnu ,d 'kkafriw.kZ fdarq ,d ,sls lius dks lkdkj djus ds çfr iqu: lefiZr djuk pkfg,] ftlus gekjs jk"Vª firk vkSj Lora=rk laxzke ds vusd usrkvksa vkSj lSfudksa dks vius ns'k esa ,d oxZghu] lgdkjh] eqDr vkSj çlUufpÙk lekt dh LFkkiuk ds lius dks lkdkj djus dh çsj.kk nhA gesa bl fnu ;g ;kn j[kuk pkfg, fd vkt dk fnu vkuUn eukus dh rqyuk esa leiZ.k dk fnu gS & Jfedksa vkSj dkexkjksa ifjJfe;ksa vkSj fopkjdksa dks iwjh rjg ls Lora=] çlUu vkSj lkaL—frd cukus ds HkO; dk;Z ds çfr leiZ.k djus dk fnu gSAÞ

x.kra= fnol dh ijsM vkt fo'o Hkj esa Hkkjr dh igpku cudj mHkjh gSA x.kra= fnol dks Hkkjr dh 'kfä dk vlyh ifjp; feyrk gSA lsuk] l'kL= cyksa vkSj lkaL—frd dk;ZØeksa ls lqlfTtr ;g ijsM vkt Hkkjr dk xkSjo gS A laçHkq jk"Vª dh mn~?kks"k.kk djrh gSA
vkxkeh x.kra= fnol ijsM 18 >kafd;ka çnf'kZr dh tk jgh gSa] ftlesa Hkkjr dh lSU; 'kfä] Hkkafr&Hkkafr dh lkaL—frd fofo/krk] foKku ,oa çkS|ksfxdh ds {ks= esa fodkl rFkk vkfFkZd le`f) dks çnf'kZr fd;k tk,xkA budks rS;kj djus dk dke rks dbZ eghuksa ls py jgk gSA bl o"kZ dh >kafd;ksa esa 13 jkT; ,oa 5 dsUæh; ea=ky; Hkkx Hkkx ys jgs gSaA çR;sd >kadh esa fojklr] laL—fr] dyk vkSj f'kYi] ck;ksVsDuksy‚th] lrr~ —f"k ,oa i;kZoj.k tSls fofHkUu mís';ksa dks çfrfcafcr djrh gqbZ viuh gh dgkuh dks çnf'kZr fd;k x;k gSA blesa dksbZ 'kd ugha gS fd ijsM ns[kus okys yksxksa dh >kafd;ksa dks ysdj [kkl fnypLih jgrh gSA blesa ns'k ds fodkl ls ysdj ijEijkvks dks lqanj rjhds ls fn[kk;k x;k gksrk gSA ckn esa loZJs"kB >kafd;ksa dks iqjL—r Hkh fd;k tkrk gSA

ubZ fnYyh vk;kstu
bl volj ds egRo dks n'kkZus ds fy, gj o"kZ x.kra= fnol iwjs ns'k esa cM+s mRlkg ds lkFk euk;k tkrk gS] vkSj jkt/kkuh] ubZ fnYyh esa jk"ifr Hkou ds lehi jk;lhuk igkM+h ls jktiFk ij xqtjrs gq, bafM;k xsV rd vkSj ckn esa ,sfrgkfld yky fdys rd 'kkunkj ijsM dk vk;kstu fd;k tkrk gSA

;g vk;kstu Hkkjr ds ç/kkuea=h }kjk bafM;k xsV ij vej toku T;ksfr ij iq"i vfiZr djus ds lkFk vkjaHk gksrk gS] tks mu lHkh lSfudksa dh Le`fr esa gS ftUgksaus ns'k ds fy, vius thou dqckZu dj fn,A bls 'kh?kz ckn 21 rksiksa dh lykeh nh tkrh gS] jk"Vªifr egksn; }kjk jk"Vªh; /ot Qgjk;k tkrk gS vkSj jk"Vªh; xku gksrk gSA bl çdkj ijsM vkjaHk gksrh gSA

egkefge jk"Vªifr ds lkFk ,d mYys[kuh; fons'kh jk"Vª çeq[k vkrs gSa] ftUgsa vk;kstu ds eq[; vfrfFk ds :i esa vkeaf=r fd;k tkrk gSA jk"Vªifr egksn; ds lkeus ls [kqyh thiksa esa ohj lSfud xqtjrs gSaA Hkkjr ds jk"Vªifr] tks Hkkjrh; l'kL= cy] ds eq[; dekaMj gSa] fo'kky ijsM dh lykeh ysrs gSaA Hkkjrh; lsuk }kjk blds uohure gfFk;kjksa vkSj cyksa dk çn'kZu fd;k tkrk gS tSls VSad] felkby] jkMkj vkfnA

blds 'kh?kz ckn jk"Vªifr }kjk l'kL= lsuk ds lSfudksa dks cgknqjh ds iqjLdkj vkSj esMy fn, tkrs gSa ftUgksaus vius {ks= esa vHkwriwoZ lkgl fn[kk;k vkSj ,sls ukxfjdksa dks Hkh lEekfur fd;k tkrk gS ftUgksaus fofHkUu ifjfLFkfr;ksa esa ohjrk ds vyx&vyx dkjukes fd,A blds ckn l'kL= lsuk ds gsfyd‚IVj n'kZdksa ij xqykc dh ia[kqfM;ksa dh ckfj'k djrs gq, ¶ykbZ ikLV djrs gSaA

lsuk dh ijsM ds ckn jaxkjax lkaL—frd ijsM gksrh gSA fofHkUu jkT;ksa ls vkbZ >kafd;ksa ds :i esa Hkkjr dh le`) lkaL—frd fojklr dks n'kkZ;k tkrk gSA çR;sd jkT; vius vuks[ks R;kSgkjksa] ,sfrgkfld LFkyksa vkSj dyk dk çn'kZu djrs gSA ;g çn'kZuh Hkkjr dh laL—fr dh fofo/krk vkSj le`f) dks ,d R;kSgkj dk jax nsrh gSA

fofHkUu ljdkjh foHkkxksa vkSj Hkkjr ljdkj ds ea=ky;ksa dh >kafd;ka Hkh jk"Vª dh çxfr esa vius ;ksxnku çLrqr djrh gSA bl ijsM dk lcls [kq'kuqek fgLlk rc vkrk gS tc cPps] ftUgsa jk"Vªh; ohjrk iqjLdkj gkfFk;ksa ij cSBdj lkeus vkrs gSaA iwjs ns'k ds Ldwyh cPps ijsM esa vyx&vyx yksd u`R; vkSj ns'k Hkfä dh /kquksa ij xhr çLrqr djrs gSaA
ijsM esa dq'ky eksVj lkbfdy lokj] tks l'kL= lsuk dkfeZd gksrs gSa] vius çn'kZu djrs gSaA ijsM dk lokZf/kd çrhf{kr Hkkx ¶ykbZ ikLV gS tks Hkkjrh; ok;q lsuk }kjk fd;k tkrk gSA ¶ykbZ ikLV ijsM dk vafre iM+ko gS] tc Hkkjrh; ok;q lsuk ds yM+kdw foeku jk"Vªifr dk vfHkoknu djrs gq, eap ij ls xqtjrs gSaA

jkT;ksa esa gksus okys vk;kstu vis{kk—r NksVs Lrj ij gksrs gSa vkSj ;s lHkh jkT;ksa dh jkt/kkfu;ksa esa vk;ksftr fd, tkrs gSaA ;gka jkT; ds jkT;iky frjaxk >aMk Qgjkrs gSaA leku çdkj ds vk;kstu ftyk eq[;ky;] mi laHkkx] rkyqdksa vkSj iapk;rksa esa Hkh fd, tkrs gSaA

ç/kkuea=h dh jSyh
x.kra= fnol dk vk;kstu dqy feykdj rhu fnuksa dk gksrk gS vkSj 27 tuojh dks bafM;k xsV ij bl vk;kstu ds ckn ç/kkuea=h dh jSyh esa ,ulhlh dsMsV~l }kjk fofHkUu pkSadk nsus okys çn'kZu vkSj fMªy fd, tkrs gSaA

yksd rjax
lkr {ks=h; lkaL—frd dsUæksa ds lkFk feydj laL—fr ea=ky;] Hkkjr ljdkj }kjk gj o"kZ 24 ls 29 tuojh ds chp ^*yksd rjax & jk"Vªh; yksd u`R; lekjksg** vk;ksftr fd;k tkrk gSA bl vk;kstu esa yksxksa dks ns'k ds fofHkUu Hkkxksa ls vk, jax fcjaxs vkSj pednkj vkSj okLrfod yksd u`R; ns[kus dk vuks[kk volj feyrk gSA

chfVax n fjVªhV
chfVax n fjVªhV x.kra= fnol vk;kstuksa dk vkf/kdkfjd :i ls lekiu ?kksf"kr djrk gSA lHkh egRoiw.kZ ljdkjh Hkouksa dks 26 tuojh ls 29 tuojh ds chp jks'kuh ls lqanjrk iwoZd ltk;k tkrk gSA gj o"kZ 29 tuojh dh 'kke dks vFkkZr x.kra= fnol ds ckn vFkkZr x.kra= dh rhljs fnu chfVax n fjVªhV vk;kstu fd;k tkrk gSA ;g vk;kstu rhu lsukvksa ds ,d lkFk feydj lkewfgd cSaM oknu ls vkjaHk gksrk gS tks yksdfç; ekfpaZx /kqusa ctkrs gSaA

Mªej Hkh ,dy çn'kZu ¼ftls MªelZ d‚y dgrs gSa½ djrs gSaA MªelZ }kjk ,ckbfMM fon eh ¼;g egkRek xka/kh dh fç; /kquksa esa ls ,d dgha tkrh gS½ ctkbZ tkrh gS vkSj Vîqcqyj ?kafV;ksa }kjk pkbEl ctkbZ tkrh gSa] tks dkQh nwjh ij j[kh gksrh gSa vkSj blls ,d eueksgd –'; curk gSA

blds ckn fjVªhV dk fcxqy oknu gksrk gS] tc cSaM ekLVj jk"Vªifr ds lehi tkrs gSa vkSj cSaM okfil ys tkus dh vuqefr ekaxrs gSaA rc lwfpr fd;k tkrk gS fd lekiu lekjksg iwjk gks x;k gSA cSaM ekpZ okil tkrs le; yksdfç; /kqu ^*lkjs tgka ls vPNk ctkrs gSaA


Bhd 'kke 6 cts cxylZ fjVªhV dh /kqu ctkrs gSa vkSj jk"Vªh; /ot dks mrkj fy;k tkrk gSa rFkk jk"Vªxku xk;k tkrk gS vkSj bl çdkj x.kra= fnol ds vk;kstu dk vkSipkfjd lekiu gksrk gSaA