शनिवार, 11 जनवरी 2014

एक और स्वामी विवेकानन्द चाहिए - डा. सतीशचन्द्र मित्तल



एक और स्वामी विवेकानन्द चाहिए
साप्ताहिक पांचजन्य के ताजा अंक से  / तारीख: 11 Jan 2014
न मैकालेवादी,न मार्क्सवादी, न छद्म सेकुलरवादी, हम हैं भारतवासी
-डा. सतीश चन्द्र मित्तल-
स्वतंत्रता मिलने वाले के बाद  भारतीयों की स्वाभाविक आकांक्षा रही कि ब्रिटिश साम्राज्य की समाप्ती के साथ भारत की सोच तथा प्रशासनिक ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन होंगे, लेकिन देश में राजनीतिक सत्ता हस्तांतरण के अलावा कोई भी क्रांतिकारी परिवर्तन  नहीं हुआ। पिछले 67 वर्षों से शिक्षा, भाषा, सामाजिक व आर्थिक संरचना, संस्कृति, धर्म तथा अध्यात्म के क्षेत्रों में एक पत्नोन्मुख भटकाव की स्थिति बनी हुई है। प्रश्न है आखिर भारतीयों की मूल सोच क्या है?
शिक्षा पर कुठाराघात
सामान्यत: भारत जीवन की रीढ़-शिक्षा व्यवस्था अनेकों विदेशी आक्रमण व  घुसपैठ होने पर भी मनु से महात्मा गांधी तक सबल, सुदृढ़ तथा अक्षुण्ण रही। पठान और मुगल शासकों ने भी इसमें व्यवधान न डाला। परन्तु 1835 ई. में धूर्त मैकाले तथा बगुले विलियम बैटिंक ने अपनी गुप्त शिक्षा टिप्पणी तथा प्रस्ताव से भारतीयों के लिए अंग्रेजी शिक्षा माध्यम तथा यूरोपीय साहित्य, दर्शन तथा इतिहास का अध्ययन अनिवार्य कर डाला। उल्लेखनीय है कि पराधीनता के युग में भी 10 हजार भारतीयों ने हस्ताक्षर कर इसके विरुद्ध एक ज्ञापन देकर भयंकर रोष प्रकट किया (एच.शार्प, सलैक्शन फार जुकेशनल रिकार्डस, भाग एक, पृ. 124)। मैकाले ने प्रचलित संस्कृत भाषा को बेहूदा व इसके लिए छात्रवृत्ति को रिश्वत बतलाया। अंग्रेजी भाषा को नौकरी से जोड़ दिया, देश में ईसाईकरण की प्रक्रिया तेजी से प्रारंभ हुई। भारतीयों में आत्मविस्मृति, हीनता व स्वाभिमान शून्यता के भाव जगाने के योजनापूर्वक प्रयत्न हुए। परिणामस्वरूप भारत में  अंग्रेजी पढ़े लिखे एक वर्ग का निर्माण हुआ जो अंग्रेजी को राष्ट्रभक्ति का घोतक तथा ब्रिटिश राज्य को वरदान समझने लगा। राष्ट्रीय आंदोलन के वर्षों में भारत के राष्ट्रीय नेता सतत इसका विरोध करते रहे। महात्मा गांधी ने अपने लेखों में मैकाले की शिक्षा नीति की कटु आलोचना की। (देखें, मैकाले ड्रिम्स, यंग इंडिया, 19 मार्च 1928, पृ. 103)
परन्तु किसी भी राष्ट्रभक्त को स्वप्न में भी यह कल्पना न थी कि मैकाले के मरने के 155 वर्ष बाद भी भारत में मैकालेवाद का नव जन्म होगा। पाश्चात्य रगों में रचे-पचे तत्कालीन राजनीतिज्ञों ने इसे बनाए रखने के भरपूर प्रयत्न किए। परिणाम सामने है कि दो प्रतिशत अंग्रेजी जानने वालों ने 98 प्रतिशत भारतीय जनता की उपेक्षा की। भारतीय नागरिक ठगा सा रह गया। क्या कोई भारतीय ऐसा स्वार्थी भी होगा जो अपनी अज्ञानतावश संस्कृत को मृतभाषा कहेगा या भारत के 46 प्रतिशत लोगों की हिन्दी भाषा को देश निकाला देना चाहेगा। भारत में ही हिन्दी दिवस मनाने को विवश होगा। यह तब है जबकि नासा में वैज्ञानिकों को संस्कृत से अवगत कराया जा रहा हो। जर्मनी में संस्कृत विश्वविद्यालय खोला जा रहा है। विश्व के 280 विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जाती है। अमरीका जैसे देश हिन्दी जानने के लिए उतावले हो रहे हैं, लेकिन भारत के कुछ गिने चुने अंग्रेज भक्त शिक्षाविद यह कह रहे हैं कि अंग्रेजी बिना जीवन चौपट हो जाएगा। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में मैकाले के जन्मदिवस (25 नवम्बर) पर इंगलिश देवी का मंदिर प्रतिष्ठित किया गया। वस्तुत: विश्व में भारतीय संसद एकमात्र देश की सर्वोच्च संस्था है जो विदेशी भाषा में अपना कार्य चलाती है। भाषाओं के इस मकड़जाल ने भारत की एकता और अखण्डता को बुरी तरह प्रभावित किया।
भारती जनभावना को प्रकट करते हुए महात्मा गांधी ने लिखा, विदेशी माध्यम ने मस्तिष्क को थका दिया है। हमारे बालकों के मन में अनावश्यक तनाव बढ़ गया है। इन्हें रटने वाला व नकलची बना दिया है। उन्हें मौलिक कार्य तथा विचार के लिए आयोग्य बना दिया है।
ढहा मार्क्सवाद
गत 75 वर्षों (1917-1991) में रूस, चीन, पूर्वर्ी यूरोप व अन्य साम्यवादी देशों में 10 करोड़ लोगों के भयंकर तथा कल्पनातीत नरसंहार से मार्क्सवाद विनष्ट हो गया (देखें, स्तेफानी कुर्त्व, द ब्लेक बुक आफ कम्युनिज्म : क्राइम, टेरर एण्ड रिप्रेशन, कैम्ब्रिज 1999 पृ. 4) यह सर्वविदित है विश्व में मार्क्सवाद व्यवहारिक दृष्टि से अतीत का संदर्भ बन गया है। अनेक विश्वविद्यालयों में ह्यपोस्ट-कम्युनिजम ह्ण पर अनेक शोध कार्य हो रहे हैं। पर भारत के कुछ गिनती के बुद्धिजीवी अभी भी इसकी शल्य चिकित्सा कर इसे पुन: जीवित करने का असफल प्रयास कर रहे हैं।
1920 में विदेशी भूमि ताशकन्द में जन्मी कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया मुख्यत: भारत के कट्टरपंथी मुसलमानों की देन है। यह सदैव रूस  और चीन को अपना मायका मानती रही है। इसकी भारतीय जीवन दर्शन तथा जीवन मूल्यों के प्रति कभी आस्था नहीं रही। उल्लेखनीय है मार्क्स के परम मित्र एंजेल्स ने परिवार व्यवस्था की कटु आलोचना की थी। परिवार में पति को पूंजीपति तथा पत्नी की स्थिति सर्वहारा की बतलाई है। एक विवाह व्यवस्था को नारी की खुली या छिपी हुई घरेलू दासता पर आधारित बतलाया है। वे वर्गभेद, तथा हिंसा के मार्ग के समर्थक है। भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में इनकी भूमि सर्वदा राष्ट्र विरोधी, उपेक्षा तथा आलोचना की रही। महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए सभी जन आन्दोलनों को असफल करने का इनका भरपूर प्रयास रहा। असहयोग आंदोलन को ह्यक्रांतिकारी शक्तियों के साथ विश्वासघातह्ण तथा 1942 के आन्दोलन में इन्होंने ब्रिटिश एजेन्ट की भूमिका निभाई। महायुद्ध में भारतीय श्रमिकों को अंग्रेजों का साथ  देते हुए नारा दिया ह्यरात दिन तुम करो काम, हड़ताल का न लो अब नाम ह्ण। पाकिस्तान के निर्माण में वे मोहम्मद अली जिन्ना से भी अधिक उत्सुक रहे। गांधी, सुभाष तथा उनकी आजाद हिन्द फौज  को गालियां देने में सबसे आगे रहे। आर्थिक सहायता के लिए ये सोवियत रूस की ओर सदैव ताकते रहे।
भारत के राष्ट्रीय नेताओं ने भारत की धरती पर कभी इसकी जड़ें जमने न दी। महात्मा गांधी ने भौतिकवादी दृष्टिकोण की बजाय अध्यात्मपरक भारतीय दृष्टिकोण का प्रतिपादन किया, धर्म रहित राजनीति को मौत का फंदा बतलाया जो आत्मा को समाप्त करता है। सुभाषचंद्र बोस ने असली समाजवाद, कार्ल मार्क्स के ग्रंथों की बजाय भारत को विचारों तथा संस्कृति से घिरा बताया। डा. बी.आर. अंबेडकर ने भारतीय वामपंथियों को अपना जानी दुश्मन बनाया। डा. राम मनोहर लोहिया ने भारतीय राजनीति को यहां की संस्कृति से जोड़ने को कहा। श्री दीनदयाल उपाध्याय ने धर्म को राष्ट्र का प्राण तथा संस्कृति को उसकी आत्मा बतलाया। उन्होंने भारत के लिए न समाजवाद, न पूंजीवाद बल्कि एक तीसरे विकल्प एमात्मा मानववाद का संदेश दिया।
भारत में मार्क्सवाद की सर्वाधिक आलोचना कुछ कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा ही हुई।  एस.एस. बाटलीवाला नामक प्रसिद्ध वामपंथी नेता को आश्चर्य है कि आखिर क्यों वामपंथियों ने राष्ट्रद्रोहिता तथा ब्रिटिश सरकार की चाटुकारिता के लिए बाध्य किया।
 छद्म सेकुलरवाद
अंग्रेजी शब्द सेकुलरिज्म भारत के संविधान में पहली बार 3 जनवरी 1977 को कांग्रेस प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी तथा कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया की मिली भगत से आया जब समूचे देश में आपातकाल था तथा देश के सभी नेता   एवं प्रमुख विचारक जेल में बंद थे, मात्र दस मिनट में संविधान में संशोधन कर पारित हो गया। वस्तुत: उपरोक्त विचार ब्रिटिश मानसिकता की उपज तथा यूरोप से आयातित किया गया है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग इंग्लैण्ड के जार्ज जैकब होलीयाक (1817-1906) में ने  तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की पांथिक नीति के विरोध में किया तथा उस नीति से अपने को अलग घोषित किया। (विस्तार के लिए देखें, जैकब की पुस्तक ह्यद ओरीजन एण्ड नेचर आफ सेकुलरिज्मह्ण(लन्दन 1896 पृ. 581)
इससे पूर्व, भारतीय संविधान सभा में भी सेकुलर राज्य की मामूली चर्चा हुई थी। परन्तु इसे अस्वीकार कर दिया गया था। कांग्रेस के श्री लोकनाथ मिश्र ने इसे फिसलनकारी व इसे भारत की प्राचीन संस्कृति के दमन का तरीका बताया था।
भारत के संदर्भ में भारतीय जीवन दर्शन तथा परंपरा में पहले से धर्म का व्यापक  कार्य अर्थात कर्तव्य माना है। उसका अर्थ किसी भी अर्थ में धर्मोपासक के रूप में नहीं लिया गया। विश्व में एकमात्र हिन्दू धर्म है जो विश्व के प्रत्येक व्यक्ति को पूरी धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है (मा.गो. वैध, हिन्दुत्व पुराना सन्दर्भ, नए अनुबंध (नागपुर, 1979, पृ. 23) भारत सदैव धार्मिक उदारता की स्थली रहा है। भारत के  सभी राजाओं ने धर्मोपासना पद्धति के आधार पर भेदभाव नहीं किया। भारत में धर्म का प्रयोग राज्य विस्तार के लिए नहीं हुआ। भारत के पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री गजेन्द्र गड़कर ने भारतीय परंपराओं एवं दर्शन का वर्णन करते हुए भारत की धार्मिक उदारता व सब पंथों के समाजरूप की बात की है (देखे, द कांस्टीट्यूशन आफ इंडिया, ईटस फिलोसोफिक्ल पोस्ट्रलेट्स) राजनीतिकों ने सेक्युलरिज्म के अर्थ भी अपने अपने हितों को ध्यान में रखकर गढ़े है। पर निश्चय ही इसका अर्थ धर्मनिरपेक्ष असंवैधानिक है जिसका दुरुपयोग अनेक राजनीतिज्ञ करते हैं।
ह्यस्वह्ण का ज्ञान
विचारणीय गंभीर विषय है कि भारतीय संकट की इस बेला में जब भारत आतंकवाद, नक्सलवाद, माओवाद से आतंकित है। देश की आंतरिक तथा बाहरी सीमाएं असुरक्षित है। देश महंगाई, घोटालों,  कालेधन तथा भ्रष्टाचार से व्याप्त है। विघटनकारी, अलगाववादी तथा देश को जोड़ने वाली कडि़यां कमजोर हो गई है। भारतीयों की दिशा क्या हो?
संभवत: हम ऋषियों-मनीषियों, गुरुओं तथा विद्वानों द्वारा दिए गये मार्गदर्शन को ओझल कर रहे हैं। आत्मविस्मृति से ग्रसित और संगठित सांस्कृतिक शक्ति का स्मरण नहीं कर रहे हैं। स्वामी विवेकानन्द ने पराधीन भारत के काल में भी हिन्दुत्व (भारतीयता) को राष्ट्रीय पहचान के रूप में प्रतिष्ठित किया था। उन्होंने संदेश दिया था कि गौरव से कहो, मैं हिन्दू (भारतीय) हूं। भारत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा अनुभूति के आधार पर, भारतीयों को आत्मविस्मृति समाप्त कर, जागरूक हो, अपने बलबूते पर खड़े होने का आह्वान किया था। उन्होंने गौरवपूर्ण भावना से ओतप्रोत संस्कृत को सब भाषाओं की जननी तथा पंथनिरपेक्षता को हिन्दू धर्म का स्वाभाविक अंग बताया था। उन्होंने भारत की गरीबी, छुआछुत की समस्या, महिलाओं की दशा तथा जाति प्रथा की जटिलता पर समाधान प्रस्तुत किए थे, उन्हें पश्चिम के अंधानुकरण के विरुद्ध कड़ी चेतावनी देते हुए कहा था, क्या भारत कभी यूरोप बन सकता है। स्वयं ही उसका उत्तर दिया भारत सदा भारत रहना चाहिए। उन्होंने  देश की नवयुवकों को आगे बढ़कर राष्ट्रहित के कार्य करने को कहा था। राष्ट्र की उन्नति के लिए व्यक्ति निर्माण तथा राष्ट्र निर्माण में समन्वय सहयोग की बात की थी। उन्होंने भारतीयों को धर्म, संस्कृति, अध्यात्म के मार्ग से न केवल भारत, बल्कि विश्व कल्याण की बात रखी। उनको प्रत्येक भारतवासी के लिए घोषित किया था।
गर्व से कहा मैं भारतवासी हंू। प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है। भारतवासी मेरा प्राण है। भारत के देवी-देवता मेरे ईश्वर और वृद्धावस्था की काशी है। भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग है। भारत के कल्याण में ही मेरा कल्याण है (विवेकानन्द साहित्य भाग तीन पृ. 228)उपरोक्त युगदृष्टा स्वामी विवेकानन्द के भावों तथा विचारों से भारतीयों की दिशा स्पष्ट है। सच्चाई यह है कि हम न मैकालेवादी, न मार्क्सवादी, न छद्म सेकुलरवादी हैं हम हैं भारतवासी। भारतीय होना हमारा अतीत था, यह हमारा वर्तमान है और यही हमारा भविष्य होगा। 

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