गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

राष्ट्रगान का सच ??

राष्ट्रगान का सच ??  - Nirupama Varma

स्वजनों, हम स्वतन्त्र देश भारत के नागरिक हैं परन्तु आज भी परतंत्रता, गुलामी की मानसिकता से भरे हैं, तभी तो हम आज भी अपने राष्ट्रीय पर्वों पर ब्रिटिश शासन के गुणगान करने वाले गीत “जन गण मन” को बड़ी शान से गाते हैं ।   कुछ तत्थ्य आपके सामने रख रहा हूँ.........   भारतीय जनमानस ब्रिटिश शासन के खिलाफ था । देश की आजादी के लिये क्रांतिवीर कदम-कदम पर ब्रिटिश शासन को चुनौती दे रहे थे । ब्रिटिश शासन हिल चुका था, घबडा गया था । सन 1905 में बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन में पूरे देश का जनामानस अंग्रेजों के विरोध में उठ खडा हुआ । उस वक्त तक भारत की राजधानी बंगाल का प्रसिद्ध नगर कलकत्ता थी । अंग्रेजों ने अपनी जान बचाने के लिए 1911 में कलकत्ता को राजधानी न रखकर दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया । पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे । अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि भारत के लोगों का ध्यान बाटे और विद्रोह शांत हो जाये ।   इंग्लैंड में उस समय शासन कर रहे किंग जार्ज पंचम ने 1911 में भारत का दौरा किया । अंग्रेजो ने अपने किंग जार्ज को खुश करने के लिये एक स्वागत गीत लिखने के लिये रवीन्द्र नाथ टैगोर पर दबाव डाला । रवीन्द्र नाथ टैगोर का परिवार अंग्रेजों के प्रगाढ़ मित्रों में गिना जाता था । रवीन्द्र नाथ टैगोर के परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे । उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे । रवीन्द्र नाथ टैगोर के परिवारिक सदस्यों ने अपना बहुत सा पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा रखा था । रवीन्द्र नाथ टैगोर भी अंग्रेजो के प्रति बहुत सहानुभूति रखते थे ।   रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अंग्रेजों के बहुत दबाव और अपनी अंग्रेजों के प्रति सहानुभूति के कारण एक गीत “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता" लिखा । इस गीत की सभी पंक्तियों और शब्दों में किंग जार्ज का ही गुणगान है । इस गीत के भावार्थ को निष्पक्ष हो कर समझने पर ही पता लगेगा कि यह गीत वास्तव में अंग्रेजो और किंग जार्ज पंचम के गुणगान करने के लिये लिखा गया था । इस गीत के भावार्थ को समझने पर ही हम जान सकेगे कि यह गीत अंग्रेजों की चाटुकारिता के लिये था |   जन गण मन अधिनायक जय हे , भारत भाग्य विधाता , पंजाब, सिन्धु , गुजरात , मराठा , द्राविड , उत्कल बंग , विन्ध्य हिमाँचल यमुना गंगा उच्छल जलधि तरंग तव शुभ नामे जागे तव शुभ आशिष मांगे गाए सब जय गाथा जन गन मंगल दायक जय हे , भारत भाग्य विधाता , जय हे जय हे जय हे , जय जय जय जय हे .   रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा रचित इस गीत का अर्थ कुछ इस प्रकार से है ......   "भारत के नागरिक, भारत की जनता आपको ह्रदय से भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है । हे अधिनायक (Superhero) तुम ही भारत के भाग्य विधाता हो । तुम्हारी जय हो! जय हो! जय हो! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त, पंजाब, सिंध, गुजरात, महाराष्ट्र (मराठा), दक्षिण भारत (द्रविड़), उड़ीसा (उत्कल), बंगाल (बंग) आदि तथा भारत के पर्वत विन्ध्याचल और हिमालय एवं भारत की नदियाँ यमुना और गंगा सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है । प्रातःकाल जागने पर हम तुम्हारा ही ध्यान करते है और तुम्हारा ही आशीष चाहते है । तुम्हारी ही यश गाथा हम हमेशा गाते है । हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो-किंग जार्ज ) तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो । "   किंग जार्ज पंचम जब भारत आये तब ये गीत उनके स्वागत में गाया गया । किंग जार्ज जब इंग्लैंड वापस गये तब उन्होंने इस गीत “जन गण मन” का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया । अंग्रेजी अनुवाद जब किंग जार्ज ने सुना तो कहा कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की । किंग जार्ज बहुत खुश हुआ । उसने आदेश दिया कि जिस व्यक्ति ने ये गीत उनके सम्मान में लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये । रवीन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए । किंग जार्ज उस समय नोबल पुरस्कार समिति के अध्यक्ष भी थे । उन्होंने रवीन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया । जब रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार के विषय में पता चला तो उन्होंने इसे लेने से इन्कार कर दिया । ( इस इन्कार का कारण था भारत में इस गीत के लिखे जाने पर भारत की जनता द्वारा रवीन्द्र नाथ टैगोर की भर्त्सना और गाँधी जी के द्वारा रवीन्द्र नाथ टैगोर को मिली फटकार ) । रवीन्द्र नाथ टैगोर ने किंग जार्ज से कहा की आप यदि मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मेरे द्वारा रचित पुस्तक गीतांजलि पर दें लेकिन इस गीत के नाम पर न दें और साथ ही  यही प्रचारित भी करें क़ि मुझे नोबेल पुरस्कार मेरी  गीतांजलि नामक पुस्तक पर मिला है । किंग जार्ज ने रवीन्द्र नाथ टैगोर की बात मान कर उन्हें सन 1913 में उनकी गीतांजलि नामक पुस्तक पर नोबल पुरस्कार दे दिया ।   रवीन्द्र नाथ टैगोर की अंग्रेजों से मित्रता और सहानुभूति सन 1919 तक कायम रही पर जब जलिया वाला हत्या कांड हुआ तब गाँधी जी ने रवीन्द्र नाथ टैगोर को फटकारते हुए एक पत्र लिखा, उसमे गाँधी जी ने कहा क़ि इतने जघन्य नरसंहार के बाद भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरा, कब खुलेगी तुम्हारी आँखे, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? बाद में गाँधी जी स्वयं रवीन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और उनको बहुत फटकारा उन्होंने कहा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अन्ध भक्ति में डूबे हुए हो ? कब तक ऐसे ही डूबे रहोगे, कब तक ऐसे ही चाटुकारिता करते रहोगे ? तब जाकर रवीन्द्र नाथ टैगोर की आँखे खुली और उन्होंने इस हत्या काण्ड का विरोध किया और अपना नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया ।   यहाँ एक बात और महत्वपूर्ण है कि सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वह सब अंग्रेजी सरकार के पक्ष में लिखा और 1919 के बाद उनके लेख कुछ-कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे । रवीन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे । अपने बहनोई को उन्होंने 1919 में एक पत्र लिखा, इसमें उन्होंने लिखा कि ये 'जन गण मन' नामक गीत अंग्रेजो ने मुझ पर दबाव डाल कर जबरदस्ती लिखवाया है । इसके शब्दों का अर्थ भारतीय जनमानस को ठेस पहुंचाने वाला है । भविष्य में इस गीत को न गाया जाये वही अच्छा है । लेकिन अंत में उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि इस पत्र को अभी किसी को न दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ परन्तु मेरी मृत्यु के उपरांत इस पत्र को अवश्य सार्वजनिक कर दें ।   7 अगस्त 1941 को रवीन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि इस जन गन मन गीत को न गाया जाये ।   1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी । लेकिन वह दो खेमो में बंटी हुई थी । जिसमे एक खेमे के नेता थे बाल गंगाधर तिलक थे और दूसरे खेमे के मोती लाल नेहरु । मतभेद था सरकार बनाने को लेकर । मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ मिलकर संयुक्त सरकार (Coalition Government) बनायें । जबकि बाल गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है । इस मतभेद के कारण लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और मोती लाल नेहरु अलग-अलग हो गये और कांग्रेस दो खेमों में बंट गई, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक गरम दल के नेता कहलाने लगे उनके साथ सभी क्रांतिकारी विचारधारा के लोग थे तथा मोती लाल नेहरु नरम दल के नेता कहलाने लगे, उनके साथ वही लोग थे जो अंग्रेजो की दया-कृपा पर निर्भर थे । यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि गांधी जी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो सामाजिक परिदृश्य में किसी तरफ नहीं थे, परन्तु मानसिक और हृदयात्मक लगाव मोती लाल नेहरु से था, यह बात अलग है कि गाँधी जी का दोनों पक्ष बहुत सम्मान करते थे ।   कांग्रेस के नरम दल के समर्थक अंग्रेजो के साथ रहते थे । उनके साथ रहना, उनकी खुशामद करना, उनकी बैठकों में शामिल होना, वे हर समय अंग्रेजो के दबाव में रहते थे । अंग्रेजों को वन्देमातरम से बहुत चिढ होती थी । नरम दल के समर्थक अंग्रेजों को खुश करने के लिये रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा रचित "जन गण मन" गाया करते थे और गरम दल वाले अंग्रेजों और नरम दल के समर्थकों को मुंहतोड जवाब देने के लिये बकिंम चन्द्र चैटर्जी द्वारा रचित "वन्दे मातरम" गाया करते थे ।   नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को वन्देमातरम गीत पसंद नहीं था । अंग्रेजों के कहने पर नरम दल के समर्थकों ने कहना शुरू कर दिया कि मुसलमानों को वन्देमातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें मूर्ति पूजा करने को कहा गया है । उस समय तक मुस्लिम लीग भी अस्तित्व में आ चुकी थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे । मोहम्मद अली जिन्ना ने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया । मोहम्मद अली जिन्ना अंग्रेजों के इशारों पर चलने वालो में गिने जाते थे, उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया ।   सन 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान सभा में राष्ट्र गान के मुद्दे पर लम्बी बहस हुई । संविधान सभा के 319 सांसदों (इसमे मुस्लिम सांसद भी थे) में से 318 सांसदों ने बंकिम चन्द्र चैटर्जी द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर अपनी सहमति जताई । बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना जिनका नाम पंडित जवाहर लाल नेहरु था । जवाहर लाल नेहरु का तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए । जब कि वास्तविकता यह थी कि वन्देमातरम गीत से मुसलमानों को कोई आपत्ति नहीं थी बल्कि मुसलमानों ने तो इसे राष्ट्र गान बनाने के पक्ष में संविधान सभा में मतदान किया था । वंदे मातरम गीत से अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी । अंग्रेजों का जवाहर लाल नेहरू पर इस गीत को राष्ट्र गान न रखने का दबाव बढता जा रहा था । अंग्रेजों की सलाह पर जवाहर लाल नेहरू इस मसले को गाँधी जी के पास ले गये क्योंकि जवाहर लाल नेहरू ये जानते थे कि गाँधी जी उनकी बात का विरोध नहीं करेगे और यदि करेगे भी तो अंतिम फैसला उन्ही (जवाहर लाल नेहरू) के हक में ही देगे ।   गाँधी जी भी जन गन मन राष्ट्र गान बनाने के पक्ष में नहीं थे । पर जवाहर लाला नेहरू पर अगाध प्रेम के कारण उन्होंने नेहरू से कहा कि मै जन गण मन को राष्ट्र गान नहीं बनाना चाहत और तुम वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये । गाँधी जी ने तीसरे विकल्प में झंडा गान "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा" (रचइता श्याम लाल गुप्त “पार्षद”) को रखा । लेकिन नेहरु उस पर भी तैयार नहीं हुए । नेहरु का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है ।   गाँधी जी के राजी न होने के कारण नेहरु ने इस मुद्दे को टाल दिया परन्तु गाँधी जी की मृत्यु के बाद नेहरु ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया । भारत का जनमानस नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया वह भी वन्देमातरम गीत के पहले छंद को पूरे गीत को नहीं । लेकिन कभी इसे किसी भी राष्ट्रीय पर्व पर गया नहीं गया । नेहरु कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि उनके आका अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे । जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था ।   बीबीसी ने उस वक्त एक सर्वे किया, उसने पूरे संसार में जितने भी भारतीय मूल के लोग रहते थे, उनसे पूछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत भारतीय राष्ट्रगान के रूप में ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों का कथन था कि मुझे वन्देमातरम गीत भारतीय राष्ट्रगान के रूप में ज्यादा पसंद है । बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ होती है कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम था । कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है ।   यह है इतिहास वन्दे मातरम का और जन गण मन को राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान बनाए जाने का । अब ये हम भारतीयों को तय करना है कि हमको क्या गाना चाहिये, और किसे अपनाना चाहिये ।   वन्देमातरम....................​.............   भारत माता की जय........................    

http://paajeb.blogspot.com/  By: Gopal Krishna Shukla



महाशिवरात्रि - रजनी भारद्वाज







महाशिवरात्रि
- रजनी भारद्वाज , जयपुर
महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है ---शिवरात्रि।
प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है
लेकिन फाल्गुन माह की कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि कही गई है।
इस दिन शिवोपासना भक्ति एवं मुक्ति दोनों देने वाली मानी गई है,
क्योंकि इसी दिन अर्धरात्रि के समय भगवान शिव लिंगरूप में प्रकट हुए थे

ईशान संहिता के अनुसार
इस दिन ज्योतिर्लिग का प्रादुर्भाव हुआ
जिससे शक्तिस्वरूपा पार्वती ने मानवी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया।

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कारण है कि
इस दिन क्षीण चंद्रमा के माध्यम से पृथ्वी पर अलौकिक लयात्मक शक्तियां आती हैं
जो जीवनीशक्ति में वृद्धि करती हैं।
यद्यपि चतुर्दशी का चंद्रमा क्षीण रहता है,
लेकिन शिवस्वरूप महामृत्युंजय दिव्यपुंज महाकाल आसुरी शक्तियों का नाश कर देते हैं।

यह काल वसंत ऋतु के वैभव के प्रकाशन का काल है।
ऋतु परिवर्तन के साथ मन भी उल्लास व उमंगों से भरा होता है।
यही काल कामदेव के विकास का है
और कामजनित भावनाओं पर अंकुश भगवद् आराधना से ही संभव हो सकता है।
भगवान शिव तो स्वयं काम निहंता हैं,
अत: इस समय उनकी आराधना ही सर्वश्रेष्ठ है।

शिवरात्रि व्रत की पारणा चतुर्दशी में ही करनी चाहिए।
शिव को बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प, भांग अति प्रिय हैं।
एवम इनकी पूजा के लिये दूध,दही,घी,शकर,शहद (पन्चामृत) को काम में लिया जाता है ....

नरेन्द्र मोदी : प्रधानमंत्री बनकर हर हफ्ते एक कानून हटाएंगे



प्रधानमंत्री बनकर हर हफ्ते एक कानून हटाएंगे मोदी
भाषा | Feb 27, 2014,

नई दिल्ली बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि देश में कानून बहुत ज्यादा हैं और ऐसा लगता है कि सरकार व्यापारियों को चोर समझती है। उन्होंने व्यापारी समुदाय से कहा कि वे वैश्विक चुनौतियों से भागने की बजाय उनका सामना करें। साथ ही ऐसे अनावश्यक कानूनों को हटाने का वादा किया जो आभास देते हैं कि सभी चोर हैं। नरेंद्र मोदी ने व्यापारियों की इस चिंता को सही बताया कि देश में बहुत अधिक और बहुत पेचीदा कानून हैं। उन्होंने कहा, 'कानूनों का एक जाल है। आप हमें शक्ति दीजिए कि (सत्ता में आने पर) हम हर हफ्ते एक कानून को निरस्त कर सकें।'
नरेंद्र मोदी ने शासन के तरीकों में बड़े बदलाव का पक्ष लेते हुए कहा कि दिल्ली से देश के मामलों को चलाने के चलन को बंद किया जाना चाहिए और राज्यों पर शासन चला सकने का भरोसा करना चाहिए।
मोदी ने कहा, 'मैं नहीं जानता कि इसका मुझे राजनीतिक रूप से लाभ मिलेगा या नहीं लेकिन व्यापारी समुदाय को वैश्विक चुनौतियों से भागना नहीं चाहिए। उन्हें यह नहीं मानना चाहिए कि व्यापार के ऑनलाइन होने से वे बर्बाद हो जाएंगे। आपको सरकार से मांग करनी चाहिए कि वह इससे मिलने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए आपकी क्षमता बढ़ाए।'

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने कहा कि देश इस तरह नहीं चल सकता और चाहे सरकार हो या समाज, दोनों का एक-दूसरे में विश्वास होना चाहिए और कानून को बीच में तभी आना चाहिए जब यह विश्वास टूटे। उनके अनुसार, 'व्यवस्था कानूनों पर नहीं बल्कि विश्वास पर चलती है। कानून की जरूरत तभी पड़ती है जब व्यवस्था टूटती है। इसी मूल अवधारणा से शासन का कायापलट किया जाएगा, जिसकी मैं बात करता हूं।'

अमेरिका में हुआ सर्वे, बीजेपी के पक्ष में हैं 63 फीसदी भारतीय




अमेरिका में हुआ सर्वे, BJP के पक्ष में हैं 63 फीसदी भारतीय
भाषा [Edited By: अभिजीत श्रीवास्तव] | वाशिंगटन, 27 फरवरी 2014
अमेरिका में किए गए एक प्रमुख सर्वेक्षण में बताया गया है कि आगामी लोकसभा चुनाव में करीब 63 फीसदी भारतीय मतदाता विपक्षी दल बीजेपी के पक्ष में हैं जबकि 20 फीसदी से भी कम लोग सत्तारूढ़ कांग्रेस के पक्ष में हैं. पीईडब्ल्यू रिसर्च ने कहा है, भारतीय संसदीय चुनाव कुछ ही सप्ताह दूर बचे हैं. कांग्रेस के खिलाफ करीब 63 फीसदी वोटर हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी को अगली सरकार को कमान थमाना चाहते हैं.

हालांकि इस सर्वे में यह कहा गया है कि 63 फीसदी मतदाता बीजेपी के पक्ष में और 19 फीसदी कांग्रेस के पक्ष में हैं लेकिन दोनों पार्टियों को मिलने वाली सीटों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है. लेकिन इसमें इतना जरूर कहा गया है कि प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी कांग्रेस के उम्मीदवार राहुल गांधी से कहीं अधिक लोकप्रिय हैं.

यह सर्वे 7 दिसंबर 2013 से 12 जनवरी 2014 के बीच किया गया है और इसमें विभिन्न राज्यों में जाकर 2,464 वयस्क लोगों से आमने सामने साक्षात्कार किया गया.

सर्वे के अनुसार, केवल 29 फीसदी भारतीय देश के आज के हालात के बारे में संतुष्ट हैं जबकि 70 फीसदी लोगों में असंतोष है. इसमें बताया गया है कि 63 फीसदी लोग चाहते हैं कि बीजेपी अगली सरकार की अगुवाई करे जबकि केवल 19 फीसदी ने कांग्रेस को अपनी पसंद बताया. अन्य दलों को केवल 12 फीसदी जनता का समर्थन हासिल है. बीजेपी को ग्रामीण इलाकों में 64 फीसदी और शहरी इलाकों में 60 फीसदी समर्थन हासिल है.

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

हिंदू हमारी राष्ट्रीयता की पहचान:सरसंघचालक परम पूज्य डा. मोहन भागवत



हिंदू हमारी राष्ट्रीयता की पहचान: राष्ट्रीय स्वयंसेवक  संघ के सरसंघचालक परम पूज्य डा. मोहन राव भागवत
    
          नई दिल्ली, 24 फरवरी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक  संघ के सरसंघचालक डा. मोहन राव भागवत ने हिंदू शब्द को संकुचित मानने के लिये हिंदुओं को समान रूप से दोषी मानते हुए कहा है कि यह स्थिति आत्मविस्मृति के कारण पैदा हुई है. उन्होंने कहा कि हिंदुत्व हमारा राष्ट्र-तत्व और हिंदू हमारी राष्ट्रीयता की पहचान है.
विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में पूर्व राजनयिक ओपी गुप्ता की पुस्तक ‘डिफाइनिंग हिंदुत्व’  का विमोचन करने के बाद अपने उद्बोधन में परमपूज्य सरसंघचालक ने कहा कि वस्तुत: हिंदू शब्द अपरिभाष्य है, क्योंकि यह वह जीवन पद्धति है, जो परम सत्य के अन्वेषण के लिये सतत तपशील रहती है. इसकी विशेषता यह है कि यह सबको अपना मानता है. साथ ही, उन्होंने कहा कि शास्त्र विस्मरण के बाद हिंदू समाज रूढ़ि से चलने लगा, अतएव अब हिंदू शब्द के सर्वार्थ से समाज को परिचित कराना आवश्यक है. उन्होंने हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार पं. हजारी प्रसाद व्दिवेदी को उद्धृत करते हुए कहा कि हिंदू शब्द यहीं से संसार के कोने-कोने में प्रचारित-प्रसारित हुआ, क्योंकि हम परोपकार की दृष्टि रखकर सत्य को पूरी दुनिया तक पहुंचाने का काम करते रहे हैं.     
डा. भागवत ने कहा कि समूचा विश्व हमें हिंदू के रूप में पहचानता है. हमें भी विविधता में एकता के सूत्रों की फिर से पहचान करनी चाहिये. यह भी एक वास्तविकता है कि पिछले 40 हजार वर्ष से काबुल से लेकर तिब्बत और चीन से श्रीलंका तक  यानी इंडो-ईरानी प्लेट के लोगों का डीएनए एकसमान है. उन्होंने स्वामी राम कृष्ण परमहंस का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे ऋषियों ने अन्य उपासना पद्धतियों के अनुसार भी सत्य के अनुभूत प्रयोग किये. उन्होंने पाया कि उसमें कोई अंतर नहीं है.
एक मुस्लिम राजनीतिज्ञ से हुई एक चर्चा का दृष्टांत सुनाते हुए उन्होंने कहा कि यदि अन्य उपासना पद्धतियों को मानने वाले लोग ‘हिंदू’ को अपनी राष्ट्रीय पहचान मान लें, तो सारे विरोध समाप्त हो सकते हैं. “वे मुस्लिम राजनीतिज्ञ स्वयं को हिंदू मानते थे, इसलिये उन्होंने इस आधार पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिये बने 2006 में बने सच्चर आयोग की सिफारिशों के विरोध पर सवाल उठाया. मैंने उनसे कहा कि यदि सम्पूर्ण मुस्लिम समाज जो आप मानते हैं, मान ले तो हम अपना विरोध वापस ले लेंगे”.
पुस्तक विमोचन समारोह में फाउंडेशन के निदेशक श्री अजित डोवाल, पुस्तक के लेखक श्री ओपी गुप्ता और संकल्प के श्री संतोष तनेजा ने पुस्तक के विषय में अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया.

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

मोदी पीएम बने तो सेना की स्थिति में सुधार संभव - पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह



यह सच हे कि एक राष्ट्रवादी सरकार जब अटलजी के नेतृत्व में बनी थी तो देश ने परमाणु बम की शक्ती प्राप्त की ! नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनाते ही सेना और सीमायें मजबूत होंगी !
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मोदी पीएम बने तो सेना की स्थिति में सुधार संभव
Mon, 24 Feb 2014
http://www.jagran.com
भोपाल, नई दुनिया। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह का कहना है कि अगर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनते हैं तो सेना की स्थिति में सुधार संभव है। संप्रग सरकार सेना को उस प्रकार की तवज्जो नहीं दे रही है जैसी उसे देनी चाहिए। वे सोमवार को बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में अपनी पीएचडी का वाइबा (मौखिक परीक्षा) देने के बाद पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। वे प्रो. कैलाश त्यागी के गाइडेंस में सैन्य विज्ञान में 'जियोस्ट्रेटजी ऑफ वखान' विषय पर पीएचडी कर रहे हैं। वखान अफगानिस्तान का एक इलाका है जिस पर चीन और पाकिस्तान दोनों अपना अधिकार जताते हैं।

वीके सिंह ने खुलकर तो किसी राजनीतिक पार्टी का समर्थन नहीं किया लेकिन इशारों-इशारों में मोदी को प्रधानमंत्री पद का सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार बताते रहे। उन्होंने आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल खड़े किए। कहा कि केजरीवाल के शासन से देश में एक ही संदेश गया है कि यदि कोई मांग पूरी न हो तो धरने पर बैठ जाओ। अपने कार्यकाल के दौरान सेना के दिल्ली कूच के मुद्दे पर पूर्व सेनाध्यक्ष ने एक बार फिर कहा कि वह एक रूटीन प्रक्रिया थी। इस बात का जिक्र रक्षा मंत्री लोकसभा में दिए भाषण में भी कर चुके हैं। इस मामले को और ज्यादा तूल देना गलत है। उनके मुताबिक, मानसिक रूप से बीमार किसी नौकरशाह ने यह फर्जी कहानी गढ़ी है।

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

चीन ने नरेंद्र मोदी के बयान को खारिज किया



असल मे भारत का चीन के साथ  कोई सीमा ही नही मिलती है , भारत की सीमा पर तो तिब्बत हे नेपाल हे भूटान हे ! चीन ने अनधिकृत रूप से तिब्बत को हथिया लिया है । जिस सीमा को चीन अपनी बता रहा है वह उसकी कभी भी थी ही नही न वह आधिकारिक टूर से है । वह तो उसका विस्तारवाद है जो तिब्बत को निंगल कर प्राप्त किया है ।
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चीन ने नरेंद्र मोदी के बयान को खारिज किया

पीटीआई | Feb 24, 2014
चीन ने नरेंद्र मोदी के 'विस्तारवादी मानसिकता' वाले बयान को खारिज कर दिया है। चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि उसने कभी किसी की एक इंच जमीन हड़पने के लिए भी हमला नहीं किया।

बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अरुणाचल में अपनी रैली में चीन को चेतावनी देते हुए कहा था कि वह अपनी विस्तारवादी मानसिकता से बाज आए। मोदी ने कहा था कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है और चीन विस्तारवादी रवैये से दूर रहे।

इसके जवाब में चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चिनयुंग ने कहा, 'आप चीन के विस्तारवाद की बात कर रहे हैं। आप देख सकते हैं कि चीन ने कभी किसी मुल्क की एक इंच जमीन हड़पने के लिए भी हमला नहीं किया।'
हुआ ने कहा कि इतने सालों में सीमा पर कभी कोई हिंसक विवाद नहीं हुआ, जो इस बात का पुख्ता सबूत है कि हम वहां शांति बनाए रखने की काबिलियत रखते हैं। हुआ ने कहा, 'हम हमेशा कहते हैं कि हम असली कामों के जरिए शांतिपूर्ण विकास के रास्ते पर बढ़ना चाहते हैं। हम अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्तों के लिए प्रतिबद्ध हैं।'

चीन और भारत के बीच 4000 किलोमीटर लंबी सीमा है। तिब्बत की तरह ही चीन अरुणाचल को भी अपना हिस्सा बताता है और दोनों देशों के बीच इसे लेकर विवाद चल रहा है।

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

पगड़ी की इज्जत, मुझे बढ़ाना है - नरेंद्र मोदी






लुधियाना के जगराव में रैली के लिए पहुंचे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया।

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चौकीदार बनकर पंजे से तिजोरी को बचाऊंगा: मोदी
आईबीएन-7 | Feb 23, 2014
लुधियाना। बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी आज पंजाब के लुधियाना में रैली की। रैली के दौरान मोदी कांग्रेस पर जमकर बरसे। कांग्रेस पर निशाना साधते हुए मोदी ने कहा कि कांग्रेस की पहचान बन गया है भष्टाचार। ये पार्टी सिर्फ एक आदमी की पार्टी रह गई है। खुद के प्रधानमंत्री बनने पर मोदी ने कहा कि मैं प्रधानमंत्री नहीं चौकीदार बनकर बैठूंगा और देश की तिजोरी पर पंजा नहीं पड़ने दूंगा।

मोदी ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी की दोस्ती से कांग्रेस परेशान है। यहां उसकी बांटों और राज करो की नीति फल रही है। मोदी ने कहा, कि पूरी एबीसीडी, कांग्रेस के भ्रष्टाचार की पहचान बन गई है। ए से आदर्श घोटाला, बी से बोफोर्स घोटाला, सी से कोयला घोटाला। कांग्रेस के प्रधानमंत्री रहे राजीव गांधी ने कहा था कि दिल्ली, से एक रुपया निकलता है तो गांव पहुंचते पहुंचते 15 पैसे हो जाता है। मैं पूछता हूं कि वो कौन सा पंजा था जो रुपये को घिसता था और रुपया 15 पैसे में बदल जाता था।

मोदी की इस रैली को 'फतह रैली' का नाम दिया गया है। मोदी मंच पर पंजाबी लुक में नजर आ गए। उन्होंने परंपरागत पंजाबी पगड़ी पहन रखी थी। अपने सरदार वाले लुक पर मोदी ने कहा, कि यह पगड़ी बादल साहब ने पहनाई है, इस पगड़ी की इज्जत बढ़ाना मेरा दायित्व बन गया है। पीएम मनमोहन सिंह का नाम लिए बिना उनपर निशाना साधते हुए मोदी ने कहा कि किसी और ने इस पगड़ी की इज्जत बढ़ाई हो या नहीं, मुझे बढ़ाना है।

मोदी ने कहा कि आर्थिक विकास में मदद के लिए कृषि, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों को प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है। भारत को आगे ले जाने के लिए हमें उद्योग की जरूरत है। हमें कृषि की जरूरत है ताकि कोई भूखा नहीं रहे। सेवा क्षेत्र को भी निवेश की जरूरत है। हमने इस क्षेत्र पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। जमीन बढ़ने नहीं जा रही और जोत छोटी होती जा रही है। हमें नई प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिए कृषि उत्पादन बढ़ाना होगा।

नेता और जनता दोनों के मन में निस्वार्थ भाव से, देश का भाग्य बदल सकता है -प.पू. सरसंघचालक श्री मोहन जी भागवत





भोपाल, दिनांक 23 फरवरी 2014
प.पू. सरसंघचालक श्री मोहन जी भागवत द्वारा मॉडल स्कूल भोपाल में दिए उद्बोधन के अंश -
आज का समता व शारीरिक कार्यक्रम बहुत अच्छा हुआ | किन्तु यदि संतोष हो जाए तो उसका अर्थ होता है विकास पर विराम और अच्छा होने की कोई सीमा रेखा नहीं होती | किसी व्यक्ति, संस्था अथवा देश की सफलता के लिए भी यही द्रष्टि आवश्यक है | नेता के अनुसार चलने वाले अनुयाई भी आवश्यक हैं | रणभूमि में ताना जी मौलसिरे की मृत्यु के बाद यदि अनुयाईयों में शौर्य नहीं होता तो क्या कोंडाना का युद्ध जीता जा सकता था ? नेता और जनता दोनों के मन में निस्वार्थ भाव से बिना किसी भेदभाव के देश को उठाने का भाव हो तो ही देश का भाग्य बदल सकता है | संघ ने शाखा के माध्यम से घर घर, गाँव गाँव में शुद्ध चरित्र वाले, सबको साथ लेकर चलने वाले निस्वार्थ लोग खड़े करने का कार्य हाथ में लिया है | समाज का चरित्र बदले तो ही देश का भाग्य बदलेगा |
शारीरिक कार्यक्रम कोई शक्ति प्रदर्शन नहीं है, हिन्दू समाज को शक्ति संपन्न बनाने के लिए हैं | आवश्यक गुण संपदा इन्हीं कार्यक्रमों से प्राप्त होती है | राष्ट्र उन्नति हो, दुनिया सुखी हो इसके लिए हर घर, गाँव शहर में यह मनुष्य बनाने का कार्य सतत, निरंतर, प्रखर, उत्कट होना चाहिए | जैसे लोटा रोज मांजा जाता है, उसी प्रकार स्वयं को भी रोज मांजना | यह नहीं मानना चाहिए कि मैं कभी मैला नहीं हो सकता | यह सब कार्यक्रम केवल कार्य के लिए | यंत्रवत नहीं श्रद्धा व भावना के साथ | कृष्ण की पत्नियों में रुक्मिणी पटरानी थीं | सत्यभामा को इर्ष्या हुई | नारद जी ने सुझाव दिया कि कृष्ण का तुलादान करो | न केवल सत्यभामा बल्कि सातों रानियों के सारे अलंकरण भी कृष्ण का पलड़ा नहीं उठा पाए | अंत में रुक्मिणी ने जब तुलसीदल डाला तब कृष्ण का पलड़ा उठा | वजन भाव का होता है | नेता सरकार सब बदलकर देख लिया, किन्तु परिश्रम और प्रामाणिकता नहीं इसलिए फल नहीं | भाव को उत्कट बनायेंगे तो परिश्रम अधिक होगा तथा पूर्णता की मर्यादा को हाथ लगा सकेंगे |


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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मध्य क्षेत्र बैठक भोपाल
भोपाल. 20 फरवरी | समाज की दृष्टि में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवर्तन का संवाहक है | समाज की यह दृष्टि संघ की साधना एवं तपस्या के कारण बनी है | आवश्यकता इस बात की है कि तदनुरूप अपने आचरण एवं व्यवहार से हम निर्णायक बल प्राप्त करें | यह आव्हान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प.पू. सर संघचालक श्री मोहनराव भागवत ने एलएनसीटी परिसर में आयोजित संघ के मध्यक्षेत्र की तीन दिवसीय क्षेत्रीय बैठक में विविध क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवकों से किया | इस अवसर पर क्षेत्र संघचालक श्री कृष्ण माहेश्वरी एवं क्षेत्र कार्यवाह श्री माधव विद्वांश भी उनके साथ मंचासीन थे | बैठक में 48 संगठनों के 410 स्वयंसेवक उपस्थित थे |
श्री भागवत ने कहा कि क्रान्ति के माध्यम से कुछ समय के लिए आंशिक उथल पुथल तो आ सकती है, किन्तु साथ ही उसके दुष्परिणाम भी सामने आते हैं | उन्होंने कहा कि देश को क्रान्ति की नहीं संक्रांति की आवश्यकता है जिसके लिए समाज को प्रवोधन करना होगा, जागरण करना होगा | देश के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को स्पर्श करते हुए श्री भागवत ने कहा कि इस देश की पहचान हिन्दू पहचान है और यही राष्ट्रीय पहचान है | जो इस पहचान से दूर होगा, वह मतांतरण का शिकार होगा | हिन्दू समाज का एक ही रोग है, वह है “हम” का विस्मरण | इस समाज को एक सूत्र में पिरोना ही युग धर्म है और संघ यही कार्य कर रहा है |
श्री भागवत ने कहा कि आज देश को मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता है परन्तु यह तभी संभव है, जब हम सब व्यक्तिगत आग्रह दुराग्रह को दूर रखते हुए समाज में एक सकारात्मक वातावरण निर्माण करें | तीन सत्रों में चली इस बैठक में स्वयंसेवकों ने अपनी जिज्ञासाएं भी रखीं जिनका समाधान सरसंघचालक जी ने किया | पूर्व सरसंघ चालक श्री सुदर्शन जी की स्मृति में 600 पृष्ठीय “सुदर्शन स्मृति” ग्रन्थ सहित दो पुस्तकों का लोकार्पण भी इस अवसर पर सरसंघचालक जी ने किया |

भारत की आजादी का अश्वमेध - रामबहादुर राय



अंग्रेजों के तीसरे मोर्चे को नाकाम किया था पटेल ने
- रामबहादुर राय

अंग्रेज भारत को आजाद करने से पहले एक कुटिल नीति पर चल रहे थे। उनकी योजना थी कि आजाद करने से पहले भारत को तीन हिस्से में बांट दें। हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और प्रिंसतान। रजवाड़े और रियासतों को वे प्रिंसतान बनाना चाहते थे।उस समय 565 ऐसे अलग-अलग देशभर में फैले रजवाड़े थे। उनका आकार विभि था। कोई तो यूरोप के देशों के बराबर थे। तो किसी का आकार पहाड़ी पर किसान की जो जोत होती है, उतना ही था। 1935 के भारत सरकार अधिनियम में इन रजवाड़ों को सीधे वायसराय के अधीन कर दिया गया था। उन राजे-महाराजों को ब्रिटिश सम्राज्य के प्रतिनिधि की उपाधि दी गई थी। उनके मामले को देखने के लिये वायसराय के अधीन एक राजनीतिक विभाग बनाया गया था। उन्हें संवैधानिक संरक्षण प्राप्त था। अनेक रियासतों की अपनी फौज थी, जिन्हें ब्रिटिश सेना ने प्रशिक्षित कर रखा था।

असंभव को संभव
ये रियासतें भारत को विखंडित करने के खतरों से भरी हुई थी। उन्हें अंग्रेजों का संरक्षण प्राप्त था। इस कारण आजाद भारत में पहले दिन से ही गृह युद्ध का खतरा मंडरा रहा था। उसे देख-समझ कर,परवाह न कर, सरदार पटेल ने जो काम कर दिखाया, उससे उन्हें भारत जहॉं "लौहपुरुष' मानता है, वहीं दुनिया में वे "भारत के बिस्मार्क' के रूप में जाने-माने जाते हैं। बिस्मार्क ने जर्मन राज्यों के एकीकरण के लिये जो किया, वह बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन सरदार पटेेल ने रियासतों के भारत में विलीनीकरण के लिये जो किया वह असंभव सा काम था। उन्हें सबसे पहले लार्ड माउंटबेटन से जूझना पड़ा। वे जीते। विलय के लिए एक दस्तावेज बना। जिस पर राजाओं को दस्तखत करना था। 565 रियासतों में 40 ऐसे राज्य थे, जिनके साथ संधियॉं थी। दूसरों के साथ सनदें थी।
सरदार ने अंग्रेजों की चाल समझ ली। उसे विफल करने के लिये पंडित नेहरू और मौलाना आजाद को समझाया। महात्मा गॉंधी को तैयार किया। अपनी योजना में वी.पी.मेनन को प्रमुख भूमिका दी।
2 सितंबर 1946 को जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। जिसमें सरदार पटेल गृहमंत्री और सूचना प्रसारण मंत्री बने, लेकिन रियासतों का राजनीतिक विभाग लार्ड माउंटबेटन संभाल रहे थे। चुनौतियां कम नहीं थीं, क्योंकि कुछ रियासतों के सीधे सम्पर्क में जिा थे। उन्हें उकसा रहे थे। वे साजिश भी रच रहे थे। उनको ब्रिटिश सरकार मदद भी कर रही थी। इस मकड़जाल को सरदार ने बड़ी आसानी से हटाया।

राजनैतिक अश्वमेध
अंग्रेज रियासतों के जरिए आजादी के समय" तीसरा मोर्चा' बनवाना चाहते थे। संसदीय राजनीति के गठबंधन दौर से फिर से वह कल्पना नए रूप में जन्म ले रही है । "तीसरे मोर्चे' की मानसिकता पुरानी है। उसे अनेक तरह के आडंबर दिए जाते हैं। जिस तरह रियासतों को निजी जायदाद चाहिए थी और कुछ अधिकार भी, उसी तरह आज के "तीसरे मोर्चे' को सत्ता और संपत्ति चाहिए। अंग्रेजों की "तीसरे मोर्चे' की कल्पना ने अब भारतीय राजनीति में जातिवाद, परिवारवाद और भ्रष्टाचार के तीन रोग का रूप ले लिया है। उसे ही दूर करने के लिए 15 दिसंबर को सरदार पटेल की पुण्यतिथि पर 565 स्थानों से एकता की दौड़ हुई। नरेन्द्र मोदी की इसमें प्रेरणा थी।
सरदार पटेल ने देश को किस तरह एक किया, यह जानने और समझने का यह सही वक्त है। क्योंकि तब जो खतरा था, वह इस समय भी मंडरा रहा है। सरदार पटेल रियासतों को मिलाने के लिए तब राजनीतिक अश्वमेध यज्ञ पर निकले थे। उन्होंने एक नीति अपनाई। जहॉं जरूरत पड़ी वहॉं समझाया। जहां बल प्रयोग जरूरी था, वहॉं बेहिचक वह अस्त्र चलाया। खुशामद नहीं की। दबाव बनाने का दिखावा नहीं किया। उनकी आवाज ही यह काम कर देती थी। उनके आदेश स्पष्ट होते थे। नेतृत्व का यही गुण आज दुर्लभ हो गया है।
उन्होंने उड़ीसा से शुरुआत की। वहां के छोटे राजाओं की सभा बुलाई। उन्हें समझाया। उनको आश्वस्त किया कि उनके अधिकार और गौरव सुरक्षित रहेंगे। परिणाम यह हुआ कि "मयूरभंज' के अलावा सभी रजवाड़े तैयार हो गए। उस समय उड़ीसा में ही 28 रियासतें थीं। उनका अगला कदम नागपुर में था। वहां 18 राजा थे। उन्हें सलामी रियासतें कहा जाता था। उनकी जब सभा हुई तो सरदार ने उन्हें सबसे पहले सलाम कहा। इतना ही काफी था। नागपुर के आसपास के सारे राजा समझदार निकले। वे बिना देर किए दस्तखत करने को तैयार हो गए।
हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर के अलावा सभी राज्यों के राजाओं ने 15 अगस्त 1947 से पहले भारत में मिलना स्वीकार कर लिया। जूनागढ़ में भी उनको बल प्रयोग करना पड़ा। उस राज्य के मुस्लिम नवाब को जिा ने फुसला लिया था। वहां सरदार को सेना भेजनी पड़ी। जूनागढ़ के तब दीवान शाहनवाज भुट्‌टो होते थे। उनके ही बेटे जुल्फिकार अली भुट्‌टो थे। जो बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने। राजपूताने में जोधपुर ने थोड़ी समस्या पैदा की। उसे सरदार ने अपनी व्यवहार कुशलता से हल कर लिया। भोपाल के नवाब के जरिए जिा जोधपुर रियासत को पाकिस्तान में मिलाने के लिए षड़यंत्र कर रहे थे। उसे सरदार ने कैसे सुलझाया, यह एक रोचक इतिहास है। जोधपुर के नरेश बाद में सरदार पटेल के इतने भक्त हो गए कि वे उनके साथ राजाओं से बातचीत में भी रहने लगे।

कश्मीर समस्या भी नहीं होती
यह सिलसिला बढ़ता गया। सरदार जहॉं जाते वहॉं राजे-रजवाड़े बिछे हुए पाए जाते थे। सौराष्ट्र में 200 से ज्यादा तरह-तरह की रियासतें थीं। उनके नाम अलग थे। उनका दर्जा आकार-प्रकार से तय होता था। कुछ रजवाड़े कहलाते थे तो कुछ तालुकदार थे। वहॉं समस्या तुलना में ज्यादा थी। सरदार ने उन सबको संयुक्त सौराष्ट्र में मिलवाया। 15 जनवरी 1948 को उसका विधिवत गठन करवाया। उसमें वे उपस्थित रहे। इसी तरह कोल्हापुर राज्य को मुंबई प्रांत के साथ मिलवाया। तभी बड़ौदा रियासत ने स्वतंत्र बने रहने की चाल चली। सरदार ने उसे नाकाम किया। बड़ौदा नरेश को गद्‌दी से उतारा और उनके बेटे को राजा बनवा दिया। ऐसे अनेक संस्मरण बिखरे पड़ेे हैं, जिनमें सरदार पटेल के संकल्प और उनके व्यक्तित्व की करुणा झलकती है। उन्होंने रियासतों की सत्ता का विलय करवाया। साथ ही साथ राजाओं को देश प्रेम का पाठ भी पढ़ाया।
हैदराबाद देश की सबसे बड़ी रियासत थी। अंग्रेजों की उसे शह थी। जब अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान को हरा दिया तो निजाम की सीमाओं का विस्तार हो गया। अंग्रेजों ने इसमें मदद की। आजादी के समय निजाम का गरूर कम नहीं हुआ था। उसके पास 50 हजार सैनिकों की फौज थी। निजाम की ताकत इस बात में भी थी कि उसे जिा और अंगे्रजों की मदद मिल रही थी। सरदार ने सब्र से काम लिया। जब देखा कि निजाम को सद्‌बुद्धि नहीं आ रही है तो जनरल राजेन्द्र सिंह के नेतृत्व में सेना भेजी। सेना की तीन टुकड़ियों ने तीन तरफ से प्रवेश किया। निजाम की सारी शेखी निकल गई। लेकिन सरदार पटले ने निजाम के साथ मानवीय व्यवहार किया। अगर जवाहर लाल नेहरू हस्तक्षेप न करते तो सरदार तभी कश्मीर के मसले को भी हल कर लेते।


कम्बोदिया में भी हैं शंकराचार्य




कौंडिन्य ने बसाया था कम्बोदिया को
कम्बोदिया में भी हैं शंकराचार्य
- पाथेयकण से
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भारत में आदि शंकराचार्य ने भारत के चारों कोनों में मठ स्थापित कर उनमें अपने प्रतिनिधि नियुक्त किये थे। उनके अतिरिक्त कांची मठ के पूज्य शंकराचार्य भी हिन्दू समाज के सर्वाधिक प्रतिष्ठित धर्माचार्यों में से हैं। भारत ही की तरह कम्बोदिया में भी शंकराचार्य हैं और उनका भी पूरे देश में वही सम्मान और प्रतिष्ठा है, जो भारत में पूज्य शंकराचार्यों का है।
गत दिनों कम्बोदिया और थाईलैण्ड की यात्रा पर गये वनवासी कल्याण आश्रम के प्रतिनिधिमण्डल में शामिल मेजर एस.एन.माथुर ने उक्त जानकारी दी। मेजर माथुर कल्याण आश्रम के विदेश विभाग के प्रभारी हैं। उन्होंने बताया कि कम्बोदिया में शंकराचार्य को "शंकराज' कहा जाता है और उनकी भारत-भूमि का दर्शन करने की बड़ी तीव्र इच्छा है। उनका शिष्य समुदाय भी हैजिसकी शिक्षा संस्कृत में हुई है। देश के सभी राज्याधिकारी उनका सम्मान करते हैं तथा उनसे परामर्श लेते हैं। कम्बोदिया में सैकड़ों मन्दिर हैं। विश्व का सबसे बड़ा मन्दिर अंगकोरवाट भी इसी देश में है। सभी मन्दिरों में प्रवेश द्वार के दोनों ओर शेषनाग की मूर्तियॉं हैं। शेषनाग की वहॉं विशेष पूजा की जाती है। प्रत्येक मन्दिर में गणेश जी की मूर्ति एवं शिवलिंग भी मिलते हैं।
इसी प्रकार थाईलैण्ड में राजगुरू हैं जो ब्राह्मण हैं। देश का राजा और प्रधानमंत्री भी पैर छू कर उन्हें आदर देते हैं। मेजर माथुर ने बताया कि राजगुरु के शिष्यों की शिक्षा भारत में "कांची-मठ' में हुई है। पिछले दिनों उनके तीन शिष्य कांची में दीक्षित हो थाईलैण्ड लौटे हैं। भारतीयों के प्रति उनमें इतना आदर है कि कल्याण-आश्रम के शिष्ट-मण्डल के चरण स्पर्श कर उन्होंने अगवानी की। दक्षिण-एशिया के सभी देशों में कुछ सौ वर्षों पहले तक हिन्दू नरेशों का ही शासन रहा है। अधिकांश शासक ब्राह्मण थे। आज भी ये देश अपने पुरखों और परम्पराओं को भूले नहीं हैं।
हंगरी पूर्वी यूरोप का एक देश है। पहले यह भी सोवियत संघ के प्रभाव में था। सोवियत संघ के विघटन के बाद इसे भी साम्यवादी तानाशाही से छुटकारा मिला। यहॉं की खुफिया पुलिस रूसी के.जी.बी. से भी अधिक बदनाम थी। मेजर माथुर ने बताया कि यहॉं के लोग अपने को राजपूत चौहानों का वंशज मानते हैं। कामरेडों के मकड़-जाल से निकलने के बाद वे अब "चर्च' से परेशान हैं। पादरियों को वे समस्याओं की जड़ मानते हैं।
इतिहास

कम्बोदिया जिसे आज कम्पूचिया के नाम से जाना जाता है, आज से दो हजार वर्ष पहले काफी विस्तृत भू-प्रदेश था। उस पूरे भू-प्रदेश पर नागवंशी शासन करते थे। जिस समय उज्जैन में प्रतापी सम्राट विक्रमादित्य का शासन था, दक्षिण के पल्लव राज्य से एक पराक्रमी ब्राह्मण युवक "कौण्डिन्य' विशान नौका पर सवार हो सागर पार करता हुआ नाग-राज्य जा पहुँचा। उसने वहॉं की रानी सोमा से विवाह कर एक नये और उत राजवंश की स्थापना की। कौण्डिन्य के साथ भारतीय हिन्दू संस्कृति भी कम्बोदिया पहुँच गई। यहॉं अनेक शिलालेख मिले हैं जिनमें संस्कृत में उक्त प्रसंग का वर्णन है। अंगकोरवाट में मिले एक शिलालेख में लिखा है-
कुलासीद्‌भुजगेन्द्रकन्या सोमेति सा वंशकरी पृथिव्याम्‌।
कौण्डिन्यनाम्ना द्विजपुंगवेन कार्य्यार्थपत्नीत्वमनायियापि।।
अर्थात्‌ कौण्डिन्य नाम के ब्राह्मणवीर ने नागकन्या सोमा से विवाह कर इस भूमि पर नये राजवंश की स्थापना की।
चीनी इतिहास में कौण्डिन्य के राजवंश के बारे में "फूनान साम्राज्य' के रूप में विस्तार से लिखा गया है। यह साम्राज्य छह सौ वर्षांे तक बना रहा। इस कालखण्ड में एक और कौण्डिन्य हुआ जो जयवर्मन नाम से सम्राट बना। जयवर्मन के समय इस साम्राज्य की सीमाएं सागर-तट से चीन तक विस्तृत हो गईं तथा यह एक वैभवशाली राज्य बन गया। आज के लाओस, वियेतनाम,थाईलैण्ड, मलयेशिया आदि सभी देश इस फूनान-साम्राज्य में शामिल थे। उस समय इसकी राजधानी का नाम व्याधपुर था।
कम्बु से कम्बोदिया-
छह सौ वर्ष के बाद फूनान में अराजकता उत्प हुई तो कम्बु नाम के भारतवंशी ने शासन की बागडोर अपने हाथ में ली। वह बहुत लोकप्रिय हुआ और इसीलिये उस देश का नाम कम्बुज हो गया। कालांतर में यह कम्बोदिया हो गया। कम्बु के वंशज भववर्मन और महेन्द्रवर्मन ने साम्राज्य को वैभव की नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। कहते हैं कि उस काल में कम्बुज के लोग चॉंदी के बर्तनों का प्रयोग करते थे। रामायण, महाभारत, पुराण व उपनिषद उस समय घर-घर पढ़े जाते थे। शिलालेखों के अनुसार महेन्द्रवर्मन के पुत्र ईशानवर्मन ने ईशानपुर को अपनी नई राजधानी बनाया। इसके अवशेष आज भी "कौमपोंगथाम' नगर के पास मिलते हैं।

नवीं शताब्दी में जयवर्मन द्वितीय ने खमेर साम्राज्य की स्थापना की। उसके पौत्र यशवर्मन ने यशोधरपुर नाम से नई राजधानी बनाई। अनेक मन्दिर और बौद्ध विहार उसके शासन में बनाये गये। युगाब्द 4215(सन्‌ 1113) में इसी वंश के प्रतापी सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय ने भगवान विष्णु का प्रसिद्ध मन्दिर अंगकोरवाट बनवाया। आज यह भी विश्व का सबसे बड़ा मन्दिर है। एक हजार फीट लम्बे और 750 फीट चौड़े इस भव्य मन्दिर में रामायण और महाभारत के प्रसंग उकेरे हुए हैं।
श्यामदेश (थाईलैण्ड)-

यह प्रदेश कई शताब्दियों तक कम्बुज-साम्राज्य के अन्तर्गत ही रहा। इसलिये यहॉं भी वैदिक-हिन्दू संस्कृति का व्यापक प्रभाव रहा। दक्षिण चीन के "विदेह' राज्य से कुबलई खान द्वारा निकाले गये भारतीय थाईलैण्ड में बस गये। छाओ-छक्री नाम के एक पराक्रमी युवक ने श्यामदेश में स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। "इन्द्रादित्य' के नाम से वह थाईलैण्ड का राजा बना। यह चवालीसवें युगाब्द (तेरहवीं सदी) के अंत की घटना है। इसी के एक वंशज ने अपना नाम "रामाधिपति' रखा। अपनी राजधानी द्वारावती का नाम भी बदल कर उसने "अयोध्या कर दिया। हिन्दू धर्म ग्रन्थों के अध्ययन को उसने बढ़ावा दिया और "मनुस्मृति' के आधार पर राज्य के कानून बनवाये।
सन्‌ 1782 में वर्तमान राजवंश के पहले राजा "राम-प्रथम' के नाम से सिंहासन पर बैठे। सुरक्षा के दृष्टि से वे राजधानी को अयोध्या से "बंगकोक' ले आये। इस समय "राम-नवम' थाईलैण्ड के नरेश हैं। रामायण यहॉं राष्ट्रीय ग्रंथ की तरह मान्य है। थाई भाषा में जगज्जननी सीता को "सीदा' दशरथ को "तसरथ' रावण को "तसकंध' और लक्ष्मण को "लक' कहा जाता है। सुग्रीव' "सुक्रीव' और किष्किन्धा नगरी "खिदखि' हो गये। राम-कथा का स्वरूप वही है जो वाल्मीकि रामायण में है।

शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

'मोदी मैजिक' से एनडीए को 10 सीटों का फायदा एक महीने में ही ,,,,


जैसे - जैसे लोकसभा के चुनाव पास आयेंगे , बीजेपी की सीटों में निरंतर बढ़ोतरी होती जाएंगी , चुनाव के बाद परिणाम आश्चर्यजनक होंगे ३०० पल्स का आंकड़ा पार होगा !
एक महीने में ही 'मोदी मैजिक' से एनडीए को 10 सीटों के फायदा का 
मोदी तोड़ेंगे अटल का रिकॉर्ड, ममता की टीएमसी होगी तीसरे नंबर पर
agency | Feb 22, 2014,
http://www.bhaskar.com/article

नई दिल्ली. आगामी लोकसभा चुनावों के परिणाम में नरेंद्र मोदी का जलवा साफ नजर आएगा। मोदी बीजेपी को बहुमत तो नहीं दिला पाएगे लेकिन वह अटल बिहारी वाजपेयी का रिकॉर्ड तोड़ देंगे। बीजेपी अकेले 217 सीटें जीतेगी जबकि वाजपेयी के नेतृत्व में पार्टी को 186 सीटें मिली थीं। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस 29 सीटों के साथ सपा और बसपा को पछाड़ते हुए तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। तेलंगाना बिल को भी कांग्रेस को फायदा होता हुआ नहीं दिख रहा है और आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी को  22 सीटे मिल सकती हैं। एबीपी-नील्सन के चुनाव पूर्व सर्वे में यह बात सामने आई है।

एनडीए को मिलेगी  236 सीटें
सर्वे के मुताबिक, बीजेपी अकेले 217 सीटें जीत सकती है, जो कि एक रिकार्ड होगा। अब तक के लोकसभा चुनावों में बीजेपी 200 सीटों का आंकड़ा पार नहीं कर सकी है।  बीजेपी का सबसे बढ़िया रिकार्ड वाजपेयी के नेतृत्व में 186 सीटें जीतने का है।  मोदी के नेतृत्व में उनकी सहयोगी पार्टियां भी अच्छा प्रदर्शन करेंगी। सर्वे के मुताबिक एनडीए को 236 सीटें मिलने का अनुमान है। इससे पहले जनवरी में कराए गए एबीपी न्यूज के सर्वे में एनडीए को 226 सीटें ही मिल रही थीं। यानी,  बीते एक महीने में ही 'मोदी मैजिक' से एनडीए को 10 सीटों के फायदा का अनुमान है।

आप का हाल बुरा
दिल्ली विधानसभा चुनावों में धमाकेदार प्रदर्शन करने वाली आम आदमी पार्टी दिल्ली के बाहर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाएगा।  दिल्ली की सात में से छह सीटें 'आप' को मिलने का अनुमान है। लेकिन, देशभर में पार्टी केवल 10 सीटें जीत पाएगी।

ये हो सकते हैं 10 बड़े दल
बीजेपी - 217 सीटें
कांग्रेस- 73 सीटें
ममता बनर्जी की टीएमसी - 29 सीटें
आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस - 22 सीटें
जयललिता की एआईडीएमके- 19 सीटें
सीपीएम -18 सीटें
नवीन पटनायक की बीजेडी-  16 सीटें ,
समाजवादी पार्टी-  14
बसपा-  13 सीटें
करुणानीधि की डीएमकी- 13 सीटें

बतौर पीएम मोदी हैं पहली पसंद
जनता के बीच मोदी पीएम के सबसे प्रबल दावेदार हैं
मोदी-  57 फीसदी जनता की पसंद
राहुल गांधी - 18 फीसदी जनता की पसंद
अरविंद केजरीवाल - 3 फीसदी जनता की पसंद
यह सर्वे देश के कुल 29066 लोगों के बीच किया गया जिनमें से 18222 पुरूष और 10884 महिला मतदाता हैं। इन मतदाताओं में से 9849 शहरी और 19278 मतदाता ग्रामीण हैं।

एनडीए मजबूत
पश्चिमी भारत की 116 सीटों में से 88 सीटें जीतती दिख रही है।
उत्तर भारत की 151 में 88 सीटें जीत सकती है।
पूर्वी भारत की 142 में 39 सीटें एनडीए को मिल सकती है।
दक्षिणी भारत की 134 में 21 सीटें उनकी झोली में जा सकती है।



भाजपा को मिलेगी ऐतिहासिक सफलता : आडवाणी



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लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिलेगी ऐतिहासिक सफलता : आडवाणी

 February 22, 2014


http://www.newsview.in/national/14664
नई दिल्ली। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को पक्का भरोसा है कि इस वर्ष अप्रैल/मई में होने जा रहे आम चुनावों में उनकी पार्टी को अपार सफलता मिलने जा रही है। उनका कहना है कि चुनावों के बाद त्रिशंकु संसद बनने का सवाल ही नहीं उठता। बकौल आडवाणी, ‘भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरेगी। वह अब तक के अपने इतिहास में सर्वाधिक सीटें जीतेगी।’ उन्होंने कहा कि चुनावों में कांग्रेस की दुर्गति होने जा रही है। देश पर सर्वाधिक समय तक राज करने वाली पार्टी सबसे कम सीटें पाने जा रही है।

आडवाणी शनिवार को पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। उनके अनुसार, ‘मौजूदा समय में भाजपा को अपार समर्थन मिल रहा है। ऐसा माहौल मैंने कभी नहीं देखा। इस बार पार्टी रिकार्ड बनाएगी। भाजपा अपने इतिहास में सर्वाधिक सीटें हासिल करने जा रही है।’ भ्रष्टाचार और कुशासन के लिए उन्होंने कांग्रेस की जमकर आलोचना की। आडवाणी का कहना था, ‘आजादी के बाद से देश पर सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाली कांग्रेस इस चुनाव के बाद एक कमजोर पार्टी के रूप में उभरेगी। वह अब तक के अपने इतिहास में सबसे कम सीटें पाने जा रही है।’ भाजपा नेता के मुताबिक, भ्रष्टाचार, कुशासन और नीतिगत अपंगता ने कांग्रेस की जड़ों को खोखला कर दिया है। इस पार्टी को रसातल में जाने से कोई नहीं रोक सकता।

अगर हिंदुओं पर जुल्म होगा तो वो आखिर कहां जाएगा :नरेंद्र मोदी



अगर हिंदुओं पर जुल्म होगा तो वो आखिर कहां जाएगा: मोदी
ibnkhabar.com | Feb 22, 2014

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी अपने मिशन के तहत उत्तर पूर्व के दौरे पर ताबड़तोड़ रैलियां कीं। नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले अरुणाचल में रैली को संबोधित किया और फिर असम के सिलचर पहुंचे। अरुणाचल में मोदी ने विकास के मुद्दे को ही तरजीह दी, लेकिन सिलचर में केंद्र सरकार और कांग्रेस पर जमकर हमला बोला।

नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस के अंतकाल का आरंभ हो गया है। चुनाव बाद कांग्रेस मुक्त भारत की शुरुआत होगी। कांग्रेस किसी कोने में नजर नहीं आगही। मोदी ने कहा कि वोटबैंक की राजनीति में डूबी असम की सरकार ने डिटेंशन कैंप के नाम पर मानवाधिकारों का हनन किया।

यहां कांग्रेस ने साजिश के तहत लोगों पर डी-वोटर का ठप्पा लगाया है। चुनाव आयोग इन्हें वोट का अधिकार दे। मोदी ने भीड़ से पूछा बांग्लादेश से जो घुसपैठिए आए हैं, उन्हें बार भेजना चाहिए या नहीं। बांग्लादेश से दो तरह के लोग आए हैं। एक तरह लोग राजनीतिक साजिश के तहत आए हैं। दूसरे ऐसे लोग हैं जिनका बांग्लादेश में जीना मुश्किल कर दिया गया है। उनकी बहन-बेटियों की इज्जत सुरक्षा नहीं है। क्या दोष है बांग्लादेश में रहने वाले उन लोगों का जिनका सब कुछ लूट लिया जाता है, उसे खदेड़ दिया जाता है। वो हिंदू जाएगा तो जाएगा कहां।
अगर फिजी के हिंदू पर जुल्म होता है तो वो कहां जाएगा। मारीशस-अमेरिका में हिंदुओं पर जुल्म होगा तो वो कहां जाएगा। दुनिया में किसी हिंदू को खदेड़ दिया जाएगा तो उसके लिए एक ही जगह बची है। क्या हमारी सरकार उन पर ऐसे ही जुल्म करेगी जैसा विदेशों और बांग्लादेश में हो रहा है।

अटल वाजपेयी ने पाकिस्तान से आए हिंदुओं के लिए योजना बनाई थी। अकेले किसी राज्य पर बोझ नहीं आया था। हम नहीं चाहते कि बांग्लादेश से आए हिंदुओं का बोझ सिर्फ असम उठाए। ये लोग देश के सभी राज्यों में जाएं। उन्हें रोजगार मिले, बच्चों को पढ़ाई मिले। इससे असम की समस्या भी कम होगी। जो घुसपैठिए राजनीतिक मकसद से आए हैं उन्हें तो वहीं वापस भेजना होगा। असम का नौजवान बेरोजगार है और बाहर से आए लोगों को रोजगार मिल रहा है।

पूर्वोत्तर में कमल जरूर खिलेगा- मोदी
आज मोदी सबसे पहले अरुणाचल पहुंचे और कहा कि इस बार पूर्वोत्तर में कमल जरूर खिलेगा। तय कार्यक्रम के अनुसार मोदी सबसे पहले अरुणाचल प्रदेश में पूर्वी सियांग के जिला मुख्यालय पासीघाट पहुंचे। यहां मोदी ने कहा कि इस बार पूर्वोत्तर के राज्यों में कमल जरूर खिलेगा। साथ ही कहा कि विकास ही यहां की समस्याओं का समाधान है। इस बार विकास का सूर्योदय अरुणाचल से ही होगा।

उन्होंने चीन से लोहा लेने के लिए भी अरुणाचल के लोगों की जमकर तारीफ की। मोदी ने कहा कि अरुणाचल के पास देने को बहुत कुछ है, यहां पानी बहुत मात्रा में है इसका शानदार इस्तेमाल किया जा सकता है। ये वाजपेयी जी ने कर दिखाया था, हम इसे आगे बढ़ाएंगे।

मोदी ने कहा कि नॉर्थ ईस्ट में सोलर एनर्जी, विंड एनर्जी की अपार संभावनाएं हैं। टूरिज्म की भी जबरदस्त संभावनाएं हैं। ये जमीन स्विट्जरलैंड से कम नहीं है। हम पूरी दुनिया से यहां पर्यटक ला सकते हैं। बुद्धिस्ट टूरिज्म की भी यहां अपार संभावनाए हैं।

सिलचर-अगरतला में भी रैली
इसके बाद मोदी असम के सिलचर में रैली करेंगे। इससे पहले मोदी असम में एक बड़ी रैली कर चुके हैं। त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में स्वामी विवेकानंद स्टेडियम में मोदी की तीसरी रैली होगी। बीजेपी को रैली में भारी भीड़ उमड़ने की उम्मीद है।

इससे पहले भी मोदी अरुणाचल प्रदेश में विजय संकल्प रैली को संबोधित कर चुके हैं। उस वक्त मोदी ने दिल्ली में छात्र नीडो की मौत का मुद्दा जोर शोर से उठाया था। खास बात ये भी आज की रैली में अरुणाचल के पूर्व सीएम गेगांग अपांग विधिवत रूप से बीजेपी में शामिल होंगे।
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चीन के विरोध के बावजूद दलाई लामा से मिले, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा



चीन न जानें क्यों भूल जाता है कि तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र है,
सदियों से यह देश स्वतंत्र था और ब्रिटिश शासन में भी यह स्वतंत्र था, कुछ शर्तों के अन्तगर्त । भारत के पंडित जबाहरलाल नेहरू के चीन प्रेम के कारण तिब्बत चीन के सिकंजे में फंस गया । चीन ने उस पर नाजायज कब्जा कर लिया है। तिब्बतियों के सर्वोच्च धर्म गुरु दलाई लामा वहां की निर्वासित सरकार के सर्वेसर्वा थे। भारत सरकार ने उन्हे सही सम्मान दे रखा है। अमरीका ने भी सही सममान दिया है। चीन को अपनी भूभाग हडपनीति छोडनी चाहिये।
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चीन के विरोध के बावजूद दलाई लामा से मिले ओबामा
22-02-2014
http://hindi.cri.cn/1153/2014/02/22/1s148599.htm
चीन के जबरदस्त विरोध की अनदेखी करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 21 फरवरी को ह्वाइट हाउस में दलाई लामा से मुलाकात की। राष्ट्रपति बनने के बाद ओबामा ने तीसरी बार दलाई लामा से भेंट की।

वहीं चीनी उप विदेश मंत्री चांग येश्वे ने चीन स्थित अमेरिकी दूतावास के कार्यवाहक राजदूत डैनियल क्रिटेंब्रिंक को बुलाकर गंभीर रूप से मामला उठाते हुए कहा कि अमेरिका के इस कदम से चीन के अंदरूनी मामलों में व्यापक हस्तक्षेप किया गया है। साथ ही अमेरिका द्वारा दिए गए "तिब्बत की स्वतंत्रता" का समर्थन न करने के वादे का भी उल्लंघन हुआ है। इसके साथ ही अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी मापदंडों का भी उल्लंघन किया और चीन-अमेरिका संबंधों को भारी नुक्सान पहुंचाया। चीन ने अमेरिका के इस कदम पर व्यापक रोष व्यक्त किया है। चांग येश्वे ने कहा कि अमेरिका एक तरफ़ मानता है कि तिब्बत चीन का एक हिस्सा है, और तिब्बत की स्वतंत्रता का सर्मथन नहीं करता। लेकिन दूसरी ओर वह अपने नेता और दलाई लामा, जो तिब्बत की स्वतंत्रता के सबसे बड़े सरगना का रूप में माना जाता है, के बीच भेंटवार्ता का बंदोबस्त करता है। अगर अमेरिका ऐसा करता रहा तो चीन-अमेरिका सहयोग और द्विपक्षीय संबंधों को गंभीर क्षति पहुंचेगी, साथ ही अमेरिका के अपने हितों को भी नुकसान पहुंचेगा। चीन ने अमेरिका से चीनी रुख पर संजीदगी के साथ व्यवहार करते हुए अपने वचन का पालन करने की मांग की है। साथ ही वास्तविक कार्रवाई करते हुए दलाई लामा से हुई भेंट से पड़े प्रभाव को जल्द ही दूर करने का आग्रह किया।

अमेरिका स्थित चीनी राजदूत छ्वे थ्यानखाई ने ज़ोर देते हुए कहा कि एक दूसरे के मूल हितों और अहम चिंताओं का सम्मान करना चीन-अमेरिका संबंधों के स्वस्थ और स्थिर विकास की कड़ी है। चीन सरकार और चीनी जनता का देश की प्रभुसत्ता और एकता को बनाए रखने का संकल्प अविचल है। चीनी राष्ट्र के महान पुनरुत्थान को रोका नहीं जा सकता। अमेरिका खुद के लिए मुसीबत खड़ी कर रहा है, अंत में उसे ही नुकसान पहुंचेगा।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता छिन कांग ने 21 फरवरी को कहा कि चीन व अमेरिका से आग्रह किया कि वह चीन की चिंता पर संजीदगी के साथ व्यवहार करते हुए तिब्बत की स्वतंत्रता वाली चीन विरोधी ताकतों को समर्थन देना बंद करे। साथ ही अंदरूनी मामलों पर हस्तक्षेप बंद करे और कुप्रभाव को दूर करने के लिए जल्द ही कम उठाए। ताकि चीन-अमेरिका संबंधों को प्रभावित होने से बचाया जा सके।

वहीं ह्वाइट हाउस ने एक वक्तव्य जारी कर कहा कि ओबामा ने तिब्बत में विशेष धर्म, संस्कृति, भाषा परंपरा और मानवाधिकारों का संरक्षण करने, चीन सरकार और दलाई लामा के बीच प्रत्यक्ष वार्ता करने का समर्थन किया है। ह्वाइट हाउस ने कहा कि ओबामा ने भेंट वार्ता में दोहराया कि तिब्बत चीन का एक अंग है, अमेरिका तिब्बत की स्वतंत्रता का समर्थन नहीं करता।

भेंट वार्ता के कुछ घंटे बाद अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने उप विदेश मंत्री सराह सेवॉल को तिब्बत मसले के विशेष समन्वयक के रूप में नियुक्त किया। बयान में कहा गया कि विशेष समन्वयक चीन सरकार और दलाई लामा या उनके प्रतिनिधि के साथ वास्तविक बातचीत करने को बढ़ावा देंगी। साथ ही वे अमेरिकी कांग्रेस तथा अन्य गैर सरकारी संगठनों व संघों के साथ घनिष्ट संपर्क कायम रखेंगे, जिन्हें तिब्बत की विशेष संस्कृति, धर्म और भाषा को बनाए रखने और तिब्बत के कमजोर पर्यावरण को बचाने में रुचि है।
(श्याओ थांग)
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चीन को छोड़नी होगी विस्तारवादी नीति : नरेंद्र मोदी



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क्या देश में है कोई दूसरा दबंग राजनेता
जो चीन से इस सीधी भाषा में बात कर सके।
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चीन को छोड़नी होगी विस्तारवादी नीति : नरेंद्र मोदी
ज़ी मीडिया ब्यूरो February 22, 2014,

पासीघाट (अरुणाचल प्रदेश) : भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने आज कहा कि इस बार देश में विकास का सूर्योदय अरुणाचल प्रदेश से होगा। मोदी ने कहा कि गुजरात का अरुणाचल प्रदेश से गहरा रिश्ता है। अपने भाषण के दौरान मोदी ने नीडो तानिया की मौत का भी जिक्र किया।

अरुणाचल के पासीघाट में हुई रैली को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा कि विकास ही पूर्वोत्तर की समस्याओं का समाधान है। मोदी ने कहा, 'पूर्वोत्तर के 8 राज्यों में इस बार कमल जरूर खिलेगा। मोदी ने कहा कि अरुणाचल वीरों की भूमि है। यहां के लोग अकेले दम पर चीन की दादागिरी का डजटकर मुकाबला करते हैं और शान से जयहिंद बोलते हैं। '

अरुणाचल प्रदेश में नरेन्द्र मोदी इससे पहले विजय संकल्प रैली को संबोधित कर चुके हैं। आज तय कार्यक्रम के अनुसार मोदी सबसे पहले अरुणाचल प्रदेश में पूर्वी सियांग के जिला मुख्यालय पासीघाट पहुंचे।

विदेश नीति के मुद्दे पर पहली बार अपना रूख पेश करते हुए मोदी ने चीन से अपनी ‘विस्तारवादी मानसिकता’ को छोड़ने को कहा, साथ ही यह स्पष्ट किया कि दुनिया की कोई ताकत भारत से अरूणाचल प्रदेश को नहीं छीन सकती।

मोदी ने कहा, ‘चीन को अपनी विस्तारवादी नीति को छोड़ देना चाहिए और दोनों देशों की शांति, प्रगति और समृद्धि के लिए द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा देना चाहिए।’ उन्होंने कहा, ‘अरूणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है और हमेशा बना रहेगा। कोई भी शक्ति इसे हमसे नहीं छीन सकती है। अरूणाचल प्रदेश के लोगों को चीन के दबाव या भय में नहीं आना चाहिए।’

सियांग नदी के पास आयोजित रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा, ‘मैं इस मिट्टी की शपथ लेता हूं कि मैं राज्य को न तो समाप्त होने दूंगा और न ही टूटने या झुकने दूंगा।’ (एजेंसी इनपुट के साथ)


शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

मायावती , सीबीआई , मोदी : वाह राजनीती


अंतरिम बजट पर कांग्रेस की आलोचना  करने  वाली मायावती पर , कांग्रेस ने फिर से सीबीआई का इस्तेमाल अपने हित साधने के लिये किया है, सीबीआई का नाम सुनते ही अकूत दौलत बटोरने वाली मायावती थर - थर कांपने लगती हें । उन्होने कांग्रेस को खुश करने के लिये तुरंत नरेन्द्र मोदी पर हमला बोल दिया है। क्यों कि बे जानती हैं कि उनके पास अकूत दौलत  राजनीती से ही आई है ----!
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मायावती ने अंतरिम बजट को जमकर कोसा
Monday, February 17, 2014
नई दिल्ली : संप्रग सरकार के अंतिम बजट को खारिज करते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि इसमें कुछ भी नया नहीं है और केवल संप्रग सरकार की पिछली 10 वर्ष की उपलब्धियों को गिनाने का काम किया गया है।
मायावती ने संसद भवन परिसर में संवाददाताओं से कहा कि उन्होंने (चिदंबरम) हालांकि इसे चुनावी बजट बनाने का प्रयास किया लेकिन इससे उनको कोई फायदा होने वाला नहीं है।
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मायावती घिरीं: मनरेगा घपलों की होगी सीबीआई जांच
 20/02/2014
 नई दिल्ली। आम चुनाव से पहले बसपा के लिए नयी परेशानी ख़डी करते हुए सीबीआई उत्तर प्रदेश के सात जिलों में मायावती के शासनकाल के दौरान मनरेगा के तहत प्रदान धन की कथित दुरूपयोग की शीघ्र जांच शुरू करेगी। सीबीआई सूत्रों ने बताया कि कथित वित्तीय अनियमितताओं और राज्य में साल 2007-10 के दौरान केंद्र प्रायोजित योजना के कार्यान्वयन में सत्ता के दुरूपयोग की जांच शुरू करने का एजेंसी ने फैसला किया है।

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मोदी झूठे और फरेबी, कभी नहीं बनने दूंगी पीएम : मायावती
21/02/2014
 नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती की नजर यूपी के मुसलमान वोट बैंक पर है, इस वर्ग का सीधा संदेश देने के लिए उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को निशाने पर लिया है। उन्होने शुक्रवार को कहा कि उनकी पार्टी मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए हरमुमकिन प्रयास करेगी।

मायावती ने तीसरे मोर्चे को भी "कमजोर मोर्चा" करार देते हुए कहा कि इससे देश को फायदा नहीं होगा। उन्होंने संसद भवन परिसर में संवाददाताओं से कहा, "हम नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए पूरी ताकत लगा देंगे। भाजपा को सत्ता में आने से रोकना देशहित में होगा।

मायावती के मुताबिक, नरेंद्र मोदी के नाम से ही देश का मुसलमान घबरा जाता है, ऎसे में बसपा ही पूरे देश में उनसे लोहा लेगी। उन्होंने कहा कि यदि मोदी जीतते हैं तो इससे देश में सांप्रदायिक ताकतों को बल मिलेगा। भाजपा विश्वसनीय नहीं है, क्योंकि वह कहती कुछ है और करती कुछ। भ्रष्टाचार रोधी छह लंबित विधेयकों के बारे में मायावती ने कहा कि हम विधेयकों का समर्थन करते हैं। ये विधेयक काफी पहले ही आ जाने चाहिए थे। अब सरकार, जो खुद भ्रष्टाचार के दलदल में धंसी हुई है, विधेयकों के जरिए अपनी छवि बदलने की कोशिश कर रही है।

तीसरे मोर्चे पर बोली, चार दिन में चार दल खिसक जाते हैं जब संप्रग-1 से लेफ्ट दलों ने समर्थन लिया, तो भाकपा महासचिव प्रकाश करात ने दलित चेहरे के नाम पर बसपा सुप्रीमो मायावती को आगे किया, मगर आज वही मायावती प्रकाश की नई राजनीतिक कवायद तीसरे मोर्चे को सिरे से खारिज कर रही है। मायावती ने कहा कि आप थर्ड या जिस भी मोर्चे के बारे में पूछ रहे हैं, वह बेहद कमजोर है। आज बनते हैं और तीन-चार दिन बाद इसमें से कुछ दल खिसक जाते हैं।

मायावती ने साफ कहा कि इन सबके कोई मायने नहीं हैं। नरेंद्र मोदी से जुडे सवाल पर कभी भाजपा के समर्थन से सरकार बनानिे वाली मायावती ने तल्ख लहजे में कहा, देखो नरेंद्र मोदी जो कुछ कहता है, तो उसमें सच्चााई बहुत कम होती है, उसमें झूठ ज्यादा होता है, फरेब ज्यादा होता है। जनता को गुमराह किया जाता है इसलिए जो भाजपा के बारे में शुरू से कहा जा रहा है कि यह कहती कुछ है और करती कुछ है, वही आज भी सच है। सांप्रदायकिता रोकने पर बसपा नेत्री ने कहा कि हम संप्रग की नीतियों से सहमत नहीं हैं, लेकिन सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए संप्रग-1 और संप्रग-2 को समर्थन दिया।

उन्होंने गोधरा कांड का जिक्र करते हुए कहा कि जहां तक मोदी का सवाल है, मोदी मतलब सांप्रदायिक ताकतों को बढावा देने का प्रतीक। हम पूरी ताकत लगाएंगे पूरे देश के अंदर कि इनको सत्ता में आने से रोका जाए और नरेंद्र मोदी को पीएम बनने से रोका जाए। मोदी के स्टेट में गोधरा कांड किसी से छिपा नहीं है। बडे पैमाने पर बेकसूर लोगों का कत्लेआम हुआ और पूरे देश के अंदर नरेंद्र मोदी के नाम से अल्पसंख्यकों में मुस्लिम समाज के लोग घबराए हुए हैं। उन्हें मालूम है कि यह आदमी सत्ता में बैठ गया, तो पूरे देश का मुसलमान सुरक्षित नहीं है।


कांग्रेस के हमले, देश सेवा से नहीं रोकते : नरेंद्र मोदी




कांग्रेस के हमले मुझे देश सेवा से नहीं रोकते: मोदी
अहमदाबाद, एजेंसी

प्रधानमंत्री पद के भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी के नेता कीचड़ उछाल सकते हैं और उनके पीछे सीबीआई को लगा देते हैं लेकिन इससे उन्हें देश की सेवा करने से नहीं रोका जा सकता।

युवाओं तक पहुंच बनाने के लिए भावनात्मक लहजे में गुजरात के मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने किसी पद या प्रसिद्धि के लिए अपना घर नहीं छोड़ा था। शहर में एक विशाल युवा रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि अगर मैं सच बोलता हूं तो संप्रग सरकार के सभी मंत्री नाखुश हो जाते हैं, उन्हें बुरा लगता है और उदास हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि इसकी एक वजह है। पिछले 60 साल से किसी ने उन्हें चुनौती नहीं दी है। उन्हें लग रहा है कि एक चाय बेचने वाला इतनी बड़ी सल्तनत को चुनौती कैसे दे सकता है जिसने लगातार कई साल तक निर्बाध देश में शासन किया।

मोदी ने कहा कि कांग्रेस उन पर निशाना साधने के अवसर तलाशती रहती है। उन्होंने कहा कि मैं हर जन्म में देश की सेवा करने के लिए यहां आया हूं। अगर इस जन्म में मुझे यह अवसर नहीं मिला तो मैं अगले जन्म में फिर देश की जनता की सेवा के लिए यहां आऊंगा।

देश में युवाओं के लिए संप्रग सरकार की नीति पर मोदी ने कहा कि सत्ता में बैठे लोगों की जिम्मेदारी है कि नौजवानों के बारे में सोचें, उन्हें कौशल विकास प्रशिक्षण दिया जाए, रोजगार दिया जाए। उन्होंने कहा कि पिछले साल के बजट में केंद्र सरकार ने दावा किया था कि वह 10 लाख युवकों को कौशल का प्रशिक्षण देगी और 1,000 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया था। लेकिन हकीकत में उन्होंने पिछले साल केवल 18,352 युवकों को प्रशिक्षण दिया है।

मोदी ने कहा कि यह पांच प्रतिशत काम ही हुआ है। इस दर से तो कांग्रेस की सरकार अगले 20 साल में लक्ष्य को हासिल कर पाएगी।

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

जहां की संस्कृति में है आशावाद - वी मिशेल {अमरीका }





भारत पर एक अमेरिकी का लेख हुआ इंटरनेट पर वायरल
आज तक वेब ब्यूरो [Edited By: कुलदीप मिश्र] | नई दिल्ली, 19 फरवरी 2014
http://aajtak.intoday.in/story/this-is-india-a-positive-comment-by-an-american-goes-viral-on---internet-1-755265.html
2009 में जब भारत में चुनाव होने वाले थे, न्यूयॉर्क टाइम्स की पत्रकार सोमिनी सेनगुप्ता ने एक लेख लिखा था. शीर्षक था, 'एज इलेक्शन्स नियर, टाइटरोप अवेट्स इन इंडिया'. इस पर न्यूयॉर्क के वी मिशेल ने एक कमेंट किया था. इस बात को 5 साल बीत चुके हैं, लेकिन हाल ही में यह कमेंट इंटरनेट पर वायरल हो गया. हम इस टिप्पणी का अनुवाद आपके लिए यहां रख रहे हैं. चूंकि यह पुरानी टिप्पमी है, इसलिए इसमें कुछ संदर्भ और आंकड़े पुराने हो सकते हैं.

'यह सच में दुनिया का सबसे बड़ा शो है. लोकतांत्रिक और विविधता की अनूठी मिसाल. जहां 70 करोड़ से ज्यादा लोग वोट करते हैं और इस तरह इस प्राचीन सभ्यता को भविष्य की ओर ले जाने में अपनी छोटी भूमिका अदा करते हैं. पाकिस्तान, चीन और बर्मा (म्यांमार) जैसे अस्थिर और हिंसक पड़ोसियों के होते हुए यह कम प्रभावशाली नहीं है.

इसकी चुनौतियां अपार हैं. खास तौर से विकास और आतंकवाद से निपटने के संबंध में. लेकिन इन चुनौतियों, सैकड़ों भाषाओं, कई धर्मों और पड़ोसी देशों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह आश्चर्यजनक रूप से प्रभावशाली है.

सभी धर्म बसते हैं यहां
देश जहां हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्मों का जन्म हुआ. जो मुसलमानों की संख्या के मामले में दूसरे नंबर पर है. जहां बीते 2000 साल से ईसाई धर्म का अस्तित्व है, जहां प्राचीन यहूदी सभास्थल हैं. जहां यहूदी समुदाय तब से रह रहे हैं जब रोमन्स ने अपना दूसरा मंदिर जलाया था. वह देश जहां दलाई लामा और उनकी निर्वासित तिब्बती सरकार रहती है.

सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हमारी थी
यह वही देश है जहां अपने मूल जगह से बाहर निकाले जाने के बाद से पारसी गर्व से रह रहे हैं. जहां अर्मेनियाई, सीरियाई और न जाने कहां कहां से लोग रहने आए. जो पिछले 2000 साल की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था, ऐसा पेरिस की संस्था ओईसीडी (OECD) कहती है. सिर्फ 200 साल पहले वह दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी. जहां तीन मुस्लिम राष्ट्रपति चुने गए. जहां एक सिख प्रधानमंत्री है और सत्तारूढ़ पार्टी की मुखिया एक कैथोलिक इटैलियन महिला है.

जहां की संस्कृति में है आशावाद
जहां राष्ट्रपति भी एक महिला है, जिसने एक मुस्लिम राष्ट्रपति की जगह ली. वह मुस्लिम राष्ट्रपति एक रॉकेट वैज्ञानिक के रूप में देश का हीरो था. जहां उभार लेती अर्थव्यवस्था हर साल 4 करोड़ लोगों को गरीबी के ग्रास से निकाल रही है. जहां के मध्य वर्ग की तादाद अमेरिका की पूरी जनसंख्या के बराबर है और 2025 तक जहां मध्य वर्ग की जनसंख्या सबसे ज्यादा होगी.

जिसका आशावाद और उमंग उसकी फिल्मों, कलाओं, आर्थिक तरक्की और वोटिंग में दिखता है. ऐसे माहौल में जहां अद्वितीय चुनौतियां और मुश्किलें हैं और जहां महान ताकतें हर वक्त आपको प्रभावित करने में लगी हैं, इसने दुनिया में अपनी अहम जगह बनाई है.

जहां यह सब कुछ हो रहा है, वह भारत है. और जहां 10 फीसदी से ज्यादा लोग वोट करने को तैयार हैं, यह पूरी दुनिया के लिए एक प्रेरणा है.'

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

नरेंद्र मोदी विरोधी प्रस्ताव से, अमेरिकी सांसद ने हाथ खींचे





नरेंद्र मोदी विरोधी प्रस्ताव से अमेरिकी सांसद ने हाथ खींचा
Bhasha, फ़रवरी 19, 2014
http://khabar.ndtv.com/news/world/us-parliamentarian-withdrew-support-to-anti-narendra-modi-proposal-381097
वाशिंगटन: भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को वीजा जारी नहीं करने की नीति को बरकरार रखने की मांग को लेकर अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों द्वारा लाए जा रहे नए प्रस्ताव का समर्थन कर रहे एक सांसद ने इससे खुद को अलग कर लिया है। इससे पहले भी एक सांसद प्रस्ताव से दूर हुआ था।

हिंदू अमेरिकी फांउडेशन (एचएएफ) के अनुसार पेंसिलवेनिया से रिपब्लिकन सांसद स्कॉट पेरी ने प्रतिनिधि सभा के प्रस्ताव 417 से अपना सह प्रायोजन वापस ले लिया है। अब तक इस प्रस्ताव पर 42 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं।इस प्रस्ताव से हाथ खींचने वाले दोनों सांसद पेरी और स्टीव कैबट प्रतिनिधि सभा विदेश मामलों की समिति के सदस्य भी हैं। ऐसे उनके फैसले की खासी अहमियत है।

कैबट कई सप्ताह पहले ही इस प्रस्ताव से अलग हुए थे, वहीं पेरी ने पिछले सप्ताह भारत में अमेरिकी राजदूत नैंसी पावेल की मोदी के साथ हुई मुलाकात के बाद फैसला किया। एचएएफ ने इस प्रस्ताव के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू किया है। संगठन ने पेरी के इस फैसले का स्वागत किया है।

केजरीवाल ने मेरी चिट्ठी का जवाब नहीं दिया : अन्‍ना




अरविंद केजरीवाल ने मेरी चिट्ठी का जवाब नहीं दिया : अन्‍ना
http://aajtak.intoday.in/story/anna-hazare
आज तक वेब ब्‍यूरो [Edited By: सौरभ द्विवेदी] | नई दिल्‍ली, 19 फरवरी 2014
अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक गुरु अन्‍ना हजारे ने आखिरकार आम आदमी को बड़ा झटका दे दिया. अन्‍ना ने बुधवार को ममता बनर्जी के साथ एक साझा प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में ममता को राजनीतिक समर्थन की घोषणा कर दी. हालांकि उन्‍होंने यह भी स्‍पष्‍ट किया कि उनका समर्थन किसी पार्टी को नहीं बल्कि ममता के विचारों को है, वहीं सीपीएम ने इसे महज एक तमाशा बताया है.

नई दिल्‍ली में समर्थन की घोषणा करते हुए अन्‍ना ने कहा, 'मैंने 17 मांगों की चिट्ठी हर पार्टी को भेजी थी. अरविंद केजरीवाल ने मेरी चिट्ठी का जवाब नहीं दिया. ममता ने दिया. मैं जो दीदी को सपोर्ट किया. वो व्यक्ति या पार्टी समझकर नहीं किया है. समाज और देश के प्रति जो उनके विचार हैं, उस विचार को मैं सपोर्ट कर रहा हूं.'

ममता सच नहीं झूठ का प्रतीक
दूसरी ओर अन्‍ना के समर्थन को सीपीएम की सांसद ऋताब्रत बनर्जी ने महज तमाशा करार दिया है. उन्‍होंने कहा, 'मुझे इस पर कोई टिप्‍पणी नहीं करनी है. ममता बनर्जी का नाम खुद शारदा चिटफंड स्‍कैम में शामिल है. सच तो यह है कि वह सच का प्रतीक नहीं बल्कि झूठ का प्रतीक हैं. यह एक ऐसी सरकार है जो लोकतांत्रिक मानकों और सिद्धांतों के खिलाफ चलती है.'

पढ़िए और क्या कहा अन्ना हजारे ने, उन्हीं के शब्दों में ज्यों का त्यों...
'मैंने अपना पूरा जीवन समाज और देश की सेवा में लगा दिया है. हमेशा देश और समाज की सोच दी है. पहली बार समाज और देश की सोच करने वाली व्यक्ति मुझे जब दिखाई दिया. वो दीदी है. इसीलिए मैं उसको सपोर्ट कर रहा हूं. पहली बार मुझे जो उनके विचार मैंने सुने हैं. और उनका जीवन को मैंने समझा है. इसके कारण मैं उनको सपोर्ट कर रहा हूं. एक मुख्यमंत्री के नाते, वो अपना जीवन आलीशान ढंग से बिता सकती थीं. जो आज कई मंत्री बिता रहे हैं. लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री होते भी सरकार की गाड़ी, बंगला और तनख्वाह नहीं ली. ये जो त्याग की भावना है. भारत की भूमि हजारों साल से कहती आई है कि समाज और देश के लिए किसी न किसी को त्याग करना पड़ता है. त्याग के बिना समाज और देश की भलाई नहीं होती. वो विचार मुझे दीदी के जीवन में जो दिखाई दे. इसके कारण मैं इनको सपोर्ट किया.

मैंने समाज और देश के उज्जवल भविष्य के लिए, हर पक्ष और हर पार्टी के लिए ये 17 मुद्दे जो लिखे थे. उन 17 मुद्दों में हम देश का भविष्य बदल सकते हैं. ये महत्वपूर्ण मुद्दे हैं. चार महीना पहले मैंने हर पक्ष और पार्टी को ये पत्र लिखा था. लेकिन उसमें से सिर्फ ममता जी ने उसका जवाब दिया. उन्होंने कहा कि आपके जो 17 मुद्दे हैं, अगर मैं सत्ता में आती हूं तो उन्हें अपनाउंगी. उन्होंने ये भी कहा कि आप 17 मुद्दों की बात करते हैं, उसमें कई मुद्दे हम पहले ही अपने राज्य में अपना चुके हैं. मैं जरूर इसको अपनाने के लिए तैयार हैं. ऐसे उन्होंने पत्र में मुझे मैसेज भेजा. ये मुद्दे ऐसे हैं.

- भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए, लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन अविलंब किया जाएगा.
- कामकाज में पारदर्शिता, व्हिसलब्लोअर के लिए कानून पास, सिटीजन चार्टर.
- देश की सुरक्षा के मामले छोड़कर सरकार के हर फैसले की फाइल दो साल के बाद सार्वजनिक की जाए. कोई भी देख सकता है. आज फाइल छुपाकर रखते हैं, इसलिए करप्शन बढ़ता है.
- गांव को इकाई मानकर देश की प्लानिंग किया जाएगा. कोई भी पक्ष और पार्टी गांव का नाम नहीं लेती. बड़ी कंपनियों और बाजारीकरण के बारे में सोचती है. बाजार इस देश को भविष्य नहीं दे पाएगा. महात्मा गांधी कहते थे कि देश को बदलना है, तो गांव को बदलना होगा.
- गांव को मुख्य प्रशासनिक इकाई बनाया जाएगा. ग्राम सभा को अधिकार दिया जाएगा. संसद की तरह यहां भी गांव की पंचायत ग्राम सभा को जवाबदेह होगी.
- गांव को इकाई मानकर कृषि का नियोजन किया जाएगा. इस देश को बदलने के लिए कृषि यह बहुत महत्वपूर्ण कदम है. आज हम देख रहे हैं कि बडी़-बड़ी कंपनी आ रही है और किसानों की जमीन जबरदस्ती छीनने का प्रयास हो रहा है. अगर किसी किसान ने जमीन नहीं दी, तो डंडे चला रहे हैं. डंडे से काम नहीं हुआ, तो गोली चला रहे हैं. क्या यही हमारी आजादी है. तो फिर अंग्रेजों में और हमारे में क्या फर्क रह जाएगा.
- भूमि अधिग्रहण अधिनियम में किसानों के हित के लिए कानून लाया जाएगा.
- ऊर्जा क्षेत्र में स्वावलंबी होने का लक्ष्य रखा जाएगा. हर गांव में उसका अपना बिजली घर होगा. ये कई लोगों को ऐसे महसूस होता होगा कि दीदी सत्ता में आने की छटपटाहट में हैं. उनके हाथ क्या जादू की छड़ी होगी. मुझे विश्वास है कि हम सही प्लानिंग किया और ये 17 मुद्दे अमल में आ गए, तो देश बदल जाएगा. ये भाषण नहीं है, जमीन पर प्रयोग किए हैं. देश की अर्थ नीति कैसे बदलती है ये प्रयोग कर दिखा दिए.
- बुनियादी ढांचे का निर्माण प्राथमिकता पर किया जाएगा.
- चुनाव प्रक्रिया में व्यापक सुधार का कानून लाया जाएगा.

वोट ठगने के लालसा से तेलंगाना निर्माण गलत.....



वोट ठगने के लालसा से तेलंगाना निर्माण गलत.....
हमारे देश में बडे राज्यों से कहीं बेहतर जन सेवा छोटे राज्यों ने साबित की है। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र बडे राज्य हैं, यहां असमानता और अव्यवस्था चरम पर है। जेलंगाना का विरोध अनुचित है। कांग्रेस ने इस पर सियात की है, इस कारण मामला और ज्यादा गडबडा गया । छोटे प्रदेश जनेसवा की आवश्यकता है। इसे वोट ठगने के लालच से नहीं किया जाना चाहिये था।

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तेलंगाना बिल लोकसभा में पास
प्रकाशित Wed, फ़रवरी 19, 2014 पर 09:02  |  स्रोत : CNBC-Awaaz
http://hindi.moneycontrol.com/mccode/news/article.php?id=95813
वॉकऑउट और ब्लैकआउट के बीच आखिरकार मंगलवार को लोकसभा से तेलंगाना बिल पास हो गया लेकिन लोकसभा टीवी का प्रसारण रुकवाने और बिल पास करने के तरीके पर सियासी बवाल खड़ा हो गया है। लोकसभा की मंजूरी के बाद आंध्र प्रदेश का बंटवारा हो जाएगा।

तेलंगाना को आंध्र प्रदेश से अलग एक राज्य का दर्जा देने वाला बिलआज राज्यसभा में पेश हो सकता है। सरकार ने बीजेपी को बिल पास करने के लिए आखिरी वक्त में मना लिया। दरअसल सरकार ने बीजेपी की सीमांध्र के लिए विशेष पैकेज की मांग स्वीकार कर ली। बिल पास होने से पहले इस पर चर्चा जबरदस्त सुरक्षा के बीच हुई। लोकसभा के सारे दरवाजे बंद कर दिए गए और उन पर मार्शल तैनात कर दिए गए क्योंकि निलंबित सांसदों के सदन में घुस आने की आशंका थी। वोटिंग शुरू होने के बाद टीएमसी और जेडीयू सांसद सदन से वॉक आउट कर गए।

तेलंगाना बिल को पास करवाने में बीजेपी ने बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन साथ ही उसने ये साफ कर दिया है कि तेलंगाना मुद्दे पर कांग्रेस का गेम प्लान कुछ और था लेकिन उसने ऐन वक्त पर अपनी रणनीति बदलकर सरकार के इस बिल को पास करवा दिया।

बिल पास करने के तरीके को लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव ने सरकार की जमकर आलोचना की है। दिनेश त्रिवेदी ने लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार पर जमकर भड़ास निकाली और कहा कि आज लोकतंत्र की हत्या हुई है।

तेलंगाना बिल पास होने से अलग राज्य के समर्थकों में जश्न का माहौल है लेकिन इस विरोध में वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगन मोहन रेड्डी ने आज आंध्र प्रदेश बंद का आह्वान किया है। वहीं आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी भी आज इस्तीफा देने वाले हैं। इस्तीफे के औपचारिक ऐलान से पहले उन्होंने विधायकों और कांग्रेस नेताओं की बैठक बुलाई है।

बिल को पास कराने के सरकार के तरीके पर सवाल उठने खड़े हो गए हैं। वाईएसआर कांग्रेस ने नेता जगनमोहन रेड्डी ने इसे लोकतंत्र के लिए काला दिन करार दिया है। वहीं तेलंगाना मामले में वित्त मंत्री ने साफ कहा कि सिर्फ कांग्रेस ही नहीं सभी पार्टियों में तेलंगाना को लेकर मतभेद हैं, और इसे सुलझाने की पूरी कोशिश की जा रही है।

अलग राज्य का रास्ता साफ होने के बाद तेलंगाना समर्थकों ने लोकसभा में बिल पास होते ही जश्न मनाना शुरू कर दिया। हैदराबाद में तेलंगाना राष्ट्र समिति के दफ्तर के बाहर समर्थकों ने नाच गाकर खुशियां मनाई। उनका कहना है कि लंबे वक्त से की जा रही उमकी मांग आखिरकार पूरी हो गई है। उधर तेलंगाना विरोधियों की शिकायत है कि उनके साथ भेदभाव हुआ है। बता दें कि बिल पेश करने से पहले सरकार ने बीजेपी की सीमांध्र के लिए विशेष पैकेज की मांग स्वीकार कर ली थी।
 

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

नकली गांधी चला रहे हैं कांग्रेस - नरेंद्र मोदी




मोदी ने कहा-नकली गांधी चला रहे हैं कांग्रेस

एबीपी न्यूज/एजेंसी / मंगलवार, १८ फ़रवरी २०१४

दावंगेरे. नरेंद्र मोदी आज कर्नाटक के दावणगेरे में हुई रैली के दौरान कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए जमकर बरसे. लेकिन बीजेपी के इसी मंच पर भ्रष्टाचार के आरोपी बी एस येदुरप्पा मोदी के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे.

मोदी और येदुरप्पा का ये साथ विरोधियों को जवाबी हमले का बड़ा मौका दे सकता है. मोदी के साथ खड़े ये वही येदुरप्पा हैं जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं. यहां तक कि भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह  से इन्हें कर्नाटक के सीएम की कुर्सी गंवानी पड़ी और बीजेपी का साथ भी. येदुरप्पा के जाने के बाद बीजेपी कर्नाटक में बुरी तरह हारी औऱ अब जीत के जुगाड़ में इन्हें बीजेपी ने फिर अपने साथ खड़ा कर लिया. मोदी ने अपने भाषण में येदुरप्पा की जमकर तारीफ भी की.

गुजरात के मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को कहा कि कांग्रेस पर एक परिवार का नियंत्रण है और पार्टी में कोई लोकतंत्र नहीं है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की दो दिवसीय गुजरात यात्रा (15-16 फरवरी) का उल्लेख करते हुए मोदी ने कहा कि वह राहुल के उस दावे से अचंभित हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि कांग्रेस में कोई हाईकमान नहीं है.

उन्होंने कहा, "क्या आप राहुल की इस बात पर विश्वास करते हैं कि कांग्रेस में कोई हाईकमान नहीं है? हाईकमान के बगैर कांग्रेस का कोई मतलब है? एक परिवार इसे चलाता है. कांग्रेस में कोई लोकतंत्र नहीं है." नरेंद्र मोदी ने नेहरू-गांधी परिवार पर निशाना साधा है. मोदी ने कहा है कि अब नकली गांधी देश चला रहे हैं.

दावनगेरे में रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने लोगों से कांग्रेस के एक दशक के शासन की समाप्ति की अपील की.

मोदी ने कहा, "अगर आप देश बचाना चाहते हैं, तो एक ही मंत्र है कि देश को अगले चुनाव में कांग्रेस मुक्त कराएं."

कांग्रेस को अहंकारी करार देते हुए उन्होंने कहा कि पार्टी ने एक परिवार की सत्ता को बरकरार रखते हुए देश को बर्बाद कर दिया और पार्टी को अपने वंशवादी नेतृत्व और अन्य कारणों की वजह से मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

45 मिनट के अपने भाषण में मोदी ने कहा, "महात्मा गांधी के समय में कांग्रेस के पास एक उत्कृष्ट विचार था. लेकिन नकली गांधियों के पार्टी पर नियंत्रण करने के बाद से यह विचार नाटकीय रूप से बदल गया. इसके नेता सोचते हैं कि सिर्फ इन्ही के पास बुद्धि है और अन्य बुद्धिहीन हैं."

उन्होंने लोकसभा में भाजपा को वोट देने की अपील की.

कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं और 2009 में भाजपा ने 19 सीटों पर कब्जा किया था, जबकि कांग्रेस छह और जनता दल (सेक्युलर) तीन सीटों पर जीत हासिल कर पाई थी.
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दावणगेरे। गुजरात के मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी मंगलवार को कर्नाटक के दावणगेरे में हुई रैली के दौरान कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए जमकर बरसे। बीजेपी के इसी मंच पर भ्रष्टाचार के आरोपी बीएस येदुरप्पा मोदी के संग खडे थे। और तो और मोदी ने अपने भाषण में येदुरप्पा की जमकर तारीफ भी की। बता दें,येदुरप्पा पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। यहां तक कि भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से इन्हें कर्नाटक के सीएम की कुर्सी छोडनी पडी और बीजेपी का साथ भी।
येदुरप्पा के जाने के बाद बीजेपी कर्नाटक में बुरी तरह हारी और अब जीत के जुगाड में इन्हें बीजेपी ने फिर अपने साथ खडा कर लिया। मोदी ने कहा कि कांग्रेस पर एक परिवार का नियंत्रण है और पार्टी में कोई लोकतंत्र नहीं है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की दो दिवसीय गुजरात यात्रा (15-16 फरवरी) का उल्लेख करते हुए मोदी ने कहा कि वह राहुल के उस दावे से अचंभित हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि कांग्रेस में कोई हाईकमान नहीं है। उन्होंने कहा, क्या आप राहुल की इस बात पर विश्वास करते हैं। मोदी ने कहा,एक परिवार इसे चलाता है। कांग्रेस में कोई लोकतंत्र नहीं है। मोदी ने कहा है कि अब नकली गांधी देश चला रहे हैं। मोदी ने लोगों से कांग्रेस के एक दशक के शासन की समाçप्त की अपील की।
मोदी ने कहा, अगर आप देश बचाना चाहते हैं, तो एक ही मंत्र है कि देश को अगले चुनाव में कांग्रेस मुक्त कराएं। कांग्रेस को अहंकारी करार देते हुए उन्होंने कहा कि पार्टी ने एक परिवार की सत्ता को बरकरार रखते हुए देश को बर्बाद कर दिया और पार्टी को अपने वंशवादी नेतृत्व की वजह से मुश्किलों का सामना करना पडा। मोदी ने कहा, महात्मा गांधी के समय में कांग्रेस के पास एक उत्कृष्ट विचार था. लेकिन नकली गांधियों के पार्टी पर नियंत्रण करने के बाद से यह विचार नाटकीय रूप से बदल गया। इसके नेता सोचते हैं कि सिर्फ इन्ही के पास बुद्धि है और अन्य बुद्धिहीन हैं। याद रहे,कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं और 2009 में भाजपा ने 19 सीटों पर कब्जा किया था, जबकि कांग्रेस छह और जनता दल (सेक्युलर) तीन सीटों पर जीत हासिल कर पाई थी।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

केजरीवाल को केवल सत्ता की फिक्र : अन्ना हजारे




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केजरीवाल को केवल सत्ता की फिक्र : अन्ना  हजारे 

17 Feb 2014
http://www.prabhatkhabar.com/news/90609-Anna--Kejriwal-country-and-society-concerned-about-power.html
        नयी दिल्ली:अन्ना हजारे ने दिल्ली के पूर्व मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधा है. उन्होंने कहा है कि अब उन्हें देश और समाज की चिंता नहीं है. उन्हें केवल अब सत्ता की फ्रिक्र है. वे जनलोकपाल को लेकर गंभीर नहीं हैं. यदि ऐसा रहता तो जनलोकपाल पर वे भाजपा और कांग्रेस से बात कर सकते थे. लेकिन ऐसा उन्होंने करना उचित नहीं समझा. उन्हें केवल सत्ता प्राप्त करने की फिक्र है.

अन्ना हजारे ने कहा कि केजरीवाल ने जनता के सामने सबूत रखना चाहिए, जनता को जानकारी देने चाहिए कि कोई नेता भ्रष्टाचारी क्यों है. आम आदमी पार्टी द्वारा जारी की गई भ्रष्ट अधिकारियों की लिस्ट पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में अन्ना ने यह कहा. अन्ना ने कहा कि आप पार्टी द्वारा जारी लिस्ट से सहमत नहीं है. उन्होंने कहा कि हवा में आरोप लगाने से कुछ होने वाला नहीं है.

वहीं, हाल ही में आप पार्टी द्वारा अन्ना हजारे से आशीर्वाद मिलने की बात पर अन्ना हजारे ने साफ कर दिया कि उन्होंने अरविंद केजरीवाल और आप पार्टी को कोई आशीर्वाद नहीं दिया है. अन्ना का कहना है कि मेरा आशीर्वाद देश की भलाई करने वालों के साथ है. उन्होंने दिल्ली की पूर्व अरविंद केजरीवाल सरकार पर आरोप लगाया कि कुछ काट छांटकर जनलोकपाल बिल पास कराया जा सकता था, लेकिन आप पार्टी के दिल में देश नहीं, सत्ता है.

सोनिया से अपमानित होते थे पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव?

**सोच समझी चाल**
लोकसभा चुनाव के ठीक पूर्व यह छपवाया जाना कि राजीव गांधी की हत्या की जांच के प्रति  असंतुष्टता से तत्कालीन प्रधान मंत्री नरसिंह राव को सोनिया  गांधी ने डांटा था । यह बात गले उतरती नही है । क्यों की इस हत्याकांड में सब कुछ साफ़ तो था , मगर जो छुपा था वह सामने आता तो बहुत गड़बड़ होती। हत्याकांड की जांच में कुछ खोजना होता तो अभी भी दस साल से सरकार सोनिया गांधी के हाथा में ही है । यह सही है कि राव से सोनिया जी नाराज थीं , उन कारणों की पड़ताल बहुत दूर तक जायेगी । अभी तो यह विषय मात्र चुनावी दौर में वोटो का लाभ उठाने के लिए बहार निकला गया है । सोनिया जी ने उस समय करुणा निधि की पार्टी को भी दोषी मानता और फिर उसके साथ सरकार भी बनाई ? ये खबर बहार निकल बाना एक सोच समझी चाल  है !


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सोनिया से अपमानित होते थे पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव?
एजेंसियां | Feb 16, 2014
नई दिल्ली
क्या पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों अपमानित होते थे? पिछले दिनों पूर्व केंद्रीय मंत्री नटवर सिंह के एक अखबार में लिखे लेख में किए गए इस दावे के बाद अब एक केंद्रीय मंत्री की किताब में भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के बीच तनावपूर्ण रिश्तों का जिक्र किया गया है। किताब के मुताबिक सोनिया राजीव गांधी हत्याकांड मामले की जांच में धीमी प्रगति के कारण राव से नाखुश थीं। केंद्रीय खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री केवी थॉमस की किताब सोनिया, 'द बिलवेड ऑफ द मासेज़' में कहा गया है कि अगस्त 1995 में जब सोनिया ने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर की तो एक तरह से यह दो साल बाद सक्रिय राजनीति में उनके प्रवेश की पृष्ठभूमि थी।

गौरतलब है कि पिछले दिनों एक अखबार के लेख में पूर्व केंद्रीय मंत्री नटवर सिंह भी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि सोनिया और राव के रिश्ते सामान्य नहीं थे। उन्होंने बताया था कि मई 1995 में एक रात राव ने उन्हें फोन कर बताया था कि उन्होंने (सोनिया ने) किस तरह उनका (राव का) अपमान किया था। इस लेख में नटवर सिंह ने अपनी डायरी की 13 मई 1995 की नोटिंग का जिक्र किया है जब नरसिंह राव रात में उन्हें अपने रेसकोर्स रोड स्थित आवास में बुलाया। सिंह ने लिखा है, 'रात करीब 9 बजे पी.वी. दाखिल हुए, लेकिन वह बैठे नहीं। आमतौर पर अविचलित रहने वाले पी.वी. परेशान और विचलित नजर आ रहे थे। उन्होंने कहा 'मुझे अभी-अभी उनका (सोनिया का) पत्र मिला।' मैंने कहा, 'मैंने उसे नहीं देखा है। प्रतीत हो रहा था मानो दोनों के बीच राजीव गांधी की हत्या के मामले की सुनवाई को लेकर पत्रों के माध्यम से युद्ध चल रहा हो।'

पूर्व विदेश मंत्री के मुताबिक, राव ने जो कुछ कहा वह इतना अप्रत्याशित था कि उनके मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने कहा था, 'मैं उनसे नहीं निबट सकता। मैं उनसे निबट सकता हूं। मैं ऐसा नहीं करना चाहता। आखिर वह मुझसे क्या अपेक्षा करती हैं?' उन दिनों नटवर सिंह राव के मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री थे। बाद में उनके बीच मतभेद हो गए थे। सिंह ने राव को सोनिया गांधी से मिलने का सुझाव दिया था। तब राव ने कहा, 'मैं कितनी बार उनसे मिलूं? यह मेरे आत्मसम्मान का सवाल है। उनके व्यवहार मेरे स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। कितनी बार मेरा अपमान किया जाएगा?'
सिंह ने तब राव से कहा कि उन्होंने सोनिया से कभी राव के बारे में बात नहीं की लेकिन उन्हें (सोनिया को) ऐसा लगता है कि उनके पति की हत्या के मामले की जांच अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ रही है। अखबार में सिंह ने लिखा कि राव ने उन्हें सरकार के सभी कदमों के बारे में बताया। उसमें पी. चिदंबरम को मामले की जांच का प्रभारी बनाने की भी बात शामिल थी।

थॉमस ने भी अपनी किताब में राव और सोनिया के तनावपूर्ण रिश्तों का विवरण दिया है। अपनी किताब में 20 अगस्त 1995 को राजीव गांधी के जन्मदिन पर सोनिया द्वारा दिए गए भाषण का संदर्भ देते हुए कहा है कि उनके (सोनिया के) शब्दों से पूरे देश को पीड़ा हुई थी। किताब में थॉमस ने लिखा है, 'सोनिया ने सरकार पर उंगुली उठाई थी। वह राव की करीबी नहीं थीं। राजीव की हत्या के मामले की जांच में देरी पर सोनिया ने सवाल किया कि अगर पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या के मामले की जांच में इतना अधिक समय लग रहा है, तो आम आदमी का क्या होगा, जो न्याय की खातिर लड़ता है।'

थॉमस ने अपनी किताब में कहा है कि इसे सरलीकृत रूप से यह नहीं समझा जाना चाहिए कि यह न्याय दिलाने की प्रक्रिया की सुस्त रफ्तार के विरोध में कोई बयान था। जब कांग्रेस सत्ता में थी, तो सोनिया की ओर से नरसिम्हा राव की यह कटु आलोचना वास्तव में उनकी निंदा थी। किताब के अनुसार, सोनिया को लगता था कि जब तक राव सत्ता में रहेंगे, राजीव की हत्या की जांच आगे नहीं बढ़ेगी।

उन्होंने कहा, 'उनका (सोनिया का) दृढ़ विश्वास था कि शायद किसी दूसरी एजेंसी ने राजीव की हत्या की साजिश रची और उसे लिट्टे के जरिए अंजाम दिया। यही वे हालात थे, जिसने सोनिया को राजनीति में लाया। जब पार्टी की इमारत ढह रही हो, तो वह खामोश कैसे रह सकती थीं।'
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सोनिया गांधी ने रात में घर पर बुलाकर
पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव का किया था अपमान

Posted by: Ankur Kumar
 Sunday, February 16, 2014,
http://hindi.oneindia.in/news/india/sonia-gandhi-pv-narasimha-rao-had-strained-relations-286684.html
नयी दिल्‍ली (ब्‍यूरो)। केन्द्रीय मंत्री केवी थॉमस ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी और तत्‍कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के रिश्‍ते बेहद तनावपूर्ण थे क्‍योंकि राजीव गांधी की हत्‍या की जांच में हो रही देरी से सोनिया गांधी नाखुश थीं। केंद्रीय खाद्य व नागरिक आपूर्ति मंत्री केवी थॉमस की किताब ‘सोनिया- द बीलव्ड ऑफ द मासेज'में खुलासा हुआ है कि अगस्त, 1995 में जब सोनिया ने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर की, तो एक तरह से यह 2 साल बाद सक्रिय राजनीति में उनके प्रवेश की पृष्ठभूमि थी। गौरतलब है कि पिछले दिनों एक अखबार के लेख में पूर्व केंद्रीय मंत्री नटवर सिंह भी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि सोनिया और राव के रिश्ते सामान्य नहीं थे। उन्होंने बताया था कि मई 1995 में एक रात राव ने उन्हें फोन कर बताया था कि उन्होंने (सोनिया ने) किस तरह उनका (राव का) अपमान किया था। इस लेख में नटवर सिंह ने अपनी डायरी की 13 मई 1995 की नोटिंग का जिक्र किया है जब नरसिंह राव रात में उन्हें अपने रेसकोर्स रोड स्थित आवास में बुलाया। सिंह ने लिखा है, 'रात करीब 9 बजे पीवी दाखिल हुए, लेकिन वह बैठे नहीं। आमतौर पर अविचलित रहने वाले पीवी परेशान और विचलित नजर आ रहे थे। उन्होंने कहा 'मुझे अभी-अभी उनका (सोनिया का) पत्र मिला।' मैंने कहा, 'मैंने उसे नहीं देखा है। प्रतीत हो रहा था मानो दोनों के बीच राजीव गांधी की हत्या के मामले की सुनवाई को लेकर पत्रों के माध्यम से युद्ध चल रहा हो।' थॉमस ने अपनी किताब में 20 अगस्त, 1995 को राजीव गांधी के जन्मदिन पर सोनिया द्वारा दिए गए भाषण का संदर्भ देते हुए कहा है कि सोनिया के शब्दों से पूरे देश को पीड़ा हुई थी। किताब में थॉमस ने लिखा है, इसीलिए सोनिया ने सरकार पर अंगुली उठाई थी। वह राव की करीबी नहीं थीं। राजीव की हत्या के मामले की जांच में हो रहे अत्यधिक विलंब से व्यथित सोनिया ने सवाल किया कि अगर पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या के मामले की जांच में इतना अधिक समय लग रहा है, तो आम आदमी का क्या होगा, जो न्याय की खातिर लड़ता है। थॉमस की किताब के अनुसार, इसे सरलीकृत रूप से यह नहीं समझा जाना चाहिए कि यह न्याय दिलाने की प्रक्रिया की सुस्त रफ्तार के विरोध में कोई बयान था। जब कांग्रेस सत्ता में थी, तो सोनिया की ओर से नरसिंह राव की यह कटु आलोचना वास्तव में उनकी निंदा थी। किताब के अनुसार, सोनिया को लगता था कि जब तक राव सत्ता में रहेंगे, राजीव की हत्या की जांच आगे नहीं बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि सोनिया का दृढ़ विश्वास था कि शायद किसी दूसरी एजेंसी ने राजीव की हत्या की साजिश रची और उसे लिट्टे के जरिये अंजाम दिया। यही वे हालात थे, जिसने सोनिया को राजनीति में लाया। जब पार्टी की इमारत ढह रही हो, तो वह खामोश कैसे रह सकती थीं।

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

मनमोहन ने सबसे भ्रष्ट सरकार का नेतृत्व किया: आडवाणी



 बिना लोक सभा चुनाव जीते, दो बार प्रधान मंत्री बनाने की यह क़ाबलियत है।
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मनमोहन ने सबसे भ्रष्ट सरकार का नेतृत्व किया: आडवाणी
नवभारत टाइम्स | Feb 16, 2014,
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/30527131.cms
नई दिल्ली बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रविवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर करारा हमला बोला। ब्लॉग में आडवाणी ने लिखा कि मनमोहन सिंह का एक दशक का कार्यकाल खत्म होने को है और उन्होंने स्वतंत्र भारत की सबसे भ्रष्ट सरकार का नेतृत्व किया। आडवाणी ने लिखा, मनमोहन ने अपने कार्यकाल की शुरुआत साफ निजी छवि के साथ की।

लेकिन अब जब उनका एक दशक लंबा कार्यकाल खत्म होने के करीब है, वह अपने पीछे स्वतंत्र भारत की सबसे भ्रष्ट सरकार का नेतृत्व करने का रेकॉर्ड छोड़ जाएंगे। आडवाणी ने यूपीए सरकार पर आरोप लगाया कि उसने संसद की गरिमा को सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया है। बीजेपी नेता ने इसके लिए लोकसभा में 13 फरवरी को घटी उस घटना का जिक्र किया जिसमे तेलंगाना के विरोध में एक सांसद ने लोकसभा में मिर्च स्प्रे कर दिया था।

इस वाकये को कैश फॉर वोट से जोड़ते हुए आडवाणी ने लिखा कि मिर्च स्प्रे करने की घटना उतनी ही शर्मनाक है जितनी कि कैश फॉर वोट थी। आडवाणी ने कहा, मैं मानता हूं कि यूपीए-1 के दौरान सामने आया कैश फॉर वोट कांड सबसे शर्मनाक घोटाला था। भारतीय संसद की गरिमा के लिए यूपीए-2 के दौरान हाल में संसद में जो स्थिति पैदा हुई वह कम शर्मनाक नहीं है। इस दिन अधिकांश सदस्य यह देख कर हैरान थे कि आधे दर्जन मंत्री सदन में प्रधानमंत्री और सोनिया जी की मौजूदगी को नजरअंदाज कर रहे थे और स्पीकर के आसन के पास जाकर हंगामे में शामिल हुए।