शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

चीन के विरोध के बावजूद दलाई लामा से मिले, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा



चीन न जानें क्यों भूल जाता है कि तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र है,
सदियों से यह देश स्वतंत्र था और ब्रिटिश शासन में भी यह स्वतंत्र था, कुछ शर्तों के अन्तगर्त । भारत के पंडित जबाहरलाल नेहरू के चीन प्रेम के कारण तिब्बत चीन के सिकंजे में फंस गया । चीन ने उस पर नाजायज कब्जा कर लिया है। तिब्बतियों के सर्वोच्च धर्म गुरु दलाई लामा वहां की निर्वासित सरकार के सर्वेसर्वा थे। भारत सरकार ने उन्हे सही सम्मान दे रखा है। अमरीका ने भी सही सममान दिया है। चीन को अपनी भूभाग हडपनीति छोडनी चाहिये।
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चीन के विरोध के बावजूद दलाई लामा से मिले ओबामा
22-02-2014
http://hindi.cri.cn/1153/2014/02/22/1s148599.htm
चीन के जबरदस्त विरोध की अनदेखी करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 21 फरवरी को ह्वाइट हाउस में दलाई लामा से मुलाकात की। राष्ट्रपति बनने के बाद ओबामा ने तीसरी बार दलाई लामा से भेंट की।

वहीं चीनी उप विदेश मंत्री चांग येश्वे ने चीन स्थित अमेरिकी दूतावास के कार्यवाहक राजदूत डैनियल क्रिटेंब्रिंक को बुलाकर गंभीर रूप से मामला उठाते हुए कहा कि अमेरिका के इस कदम से चीन के अंदरूनी मामलों में व्यापक हस्तक्षेप किया गया है। साथ ही अमेरिका द्वारा दिए गए "तिब्बत की स्वतंत्रता" का समर्थन न करने के वादे का भी उल्लंघन हुआ है। इसके साथ ही अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी मापदंडों का भी उल्लंघन किया और चीन-अमेरिका संबंधों को भारी नुक्सान पहुंचाया। चीन ने अमेरिका के इस कदम पर व्यापक रोष व्यक्त किया है। चांग येश्वे ने कहा कि अमेरिका एक तरफ़ मानता है कि तिब्बत चीन का एक हिस्सा है, और तिब्बत की स्वतंत्रता का सर्मथन नहीं करता। लेकिन दूसरी ओर वह अपने नेता और दलाई लामा, जो तिब्बत की स्वतंत्रता के सबसे बड़े सरगना का रूप में माना जाता है, के बीच भेंटवार्ता का बंदोबस्त करता है। अगर अमेरिका ऐसा करता रहा तो चीन-अमेरिका सहयोग और द्विपक्षीय संबंधों को गंभीर क्षति पहुंचेगी, साथ ही अमेरिका के अपने हितों को भी नुकसान पहुंचेगा। चीन ने अमेरिका से चीनी रुख पर संजीदगी के साथ व्यवहार करते हुए अपने वचन का पालन करने की मांग की है। साथ ही वास्तविक कार्रवाई करते हुए दलाई लामा से हुई भेंट से पड़े प्रभाव को जल्द ही दूर करने का आग्रह किया।

अमेरिका स्थित चीनी राजदूत छ्वे थ्यानखाई ने ज़ोर देते हुए कहा कि एक दूसरे के मूल हितों और अहम चिंताओं का सम्मान करना चीन-अमेरिका संबंधों के स्वस्थ और स्थिर विकास की कड़ी है। चीन सरकार और चीनी जनता का देश की प्रभुसत्ता और एकता को बनाए रखने का संकल्प अविचल है। चीनी राष्ट्र के महान पुनरुत्थान को रोका नहीं जा सकता। अमेरिका खुद के लिए मुसीबत खड़ी कर रहा है, अंत में उसे ही नुकसान पहुंचेगा।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता छिन कांग ने 21 फरवरी को कहा कि चीन व अमेरिका से आग्रह किया कि वह चीन की चिंता पर संजीदगी के साथ व्यवहार करते हुए तिब्बत की स्वतंत्रता वाली चीन विरोधी ताकतों को समर्थन देना बंद करे। साथ ही अंदरूनी मामलों पर हस्तक्षेप बंद करे और कुप्रभाव को दूर करने के लिए जल्द ही कम उठाए। ताकि चीन-अमेरिका संबंधों को प्रभावित होने से बचाया जा सके।

वहीं ह्वाइट हाउस ने एक वक्तव्य जारी कर कहा कि ओबामा ने तिब्बत में विशेष धर्म, संस्कृति, भाषा परंपरा और मानवाधिकारों का संरक्षण करने, चीन सरकार और दलाई लामा के बीच प्रत्यक्ष वार्ता करने का समर्थन किया है। ह्वाइट हाउस ने कहा कि ओबामा ने भेंट वार्ता में दोहराया कि तिब्बत चीन का एक अंग है, अमेरिका तिब्बत की स्वतंत्रता का समर्थन नहीं करता।

भेंट वार्ता के कुछ घंटे बाद अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने उप विदेश मंत्री सराह सेवॉल को तिब्बत मसले के विशेष समन्वयक के रूप में नियुक्त किया। बयान में कहा गया कि विशेष समन्वयक चीन सरकार और दलाई लामा या उनके प्रतिनिधि के साथ वास्तविक बातचीत करने को बढ़ावा देंगी। साथ ही वे अमेरिकी कांग्रेस तथा अन्य गैर सरकारी संगठनों व संघों के साथ घनिष्ट संपर्क कायम रखेंगे, जिन्हें तिब्बत की विशेष संस्कृति, धर्म और भाषा को बनाए रखने और तिब्बत के कमजोर पर्यावरण को बचाने में रुचि है।
(श्याओ थांग)
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