गुरुवार, 13 मार्च 2014

भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ला एकम् आ रहा 31 मार्च को





भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ला एकम् आ रहा 31 मार्च को
इसदिन से प्रारम्भ होगा विक्रम संवत 2071 !!
आओ स्वागत में जुट जायें। मेरा अपना नववर्ष !
आपका अपना नववर्ष !!घर घर भगवा पतायें लगायें।
रंगोली सजायें। दीपक जलायें। उत्सव आनंद मनायें।
========================================
स्वागतम् विक्रम संवत्
बिखरी रंग—बिरंगी छटाएँ और आतिशी नजारे
चैती एकम री निकली सवारी

उदयपुर। विक्रम संवत् के स्वांगत में सुबह से शुरू हुए कार्यक्रमों के तहत स्कूली बच्चों  ने शहर के विभिन्न  चौराहों पर राहगीरों, नागरिकों को तिलक लगाकर नीम की कोंपल, काली मिर्च और मिश्री का प्रसाद खिलाकर शुभकामनाएं दीं वहीं चैत्र नवरात्रि स्था पना पर शहर के दैवी मंदिरों में सुबह से श्रद्धालुओं की भीड़ रही। आते-जाते हर राहगीर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वोयंसेवकों ने भी मां सरस्वती के छोटे-छोटे चित्र भेंटकर शुभकामनाएं दीं वहीं स्कूली बच्चों  के आग्रह को कोई नकार नहीं पाया।
शाम को पाला गणेशजी से चैती एकम की सवारी निकाली गई जो दूधतलाई पहुंची जहां आतिशबाजी के साथ संवत् 2069 का भव्यभ स्वागत किया गया। नगर परिषद की ओर से दूधतलाई झील पर आकर्षक रोशनी की गई। यहां का नजारा देखते ही बनता था।
मुख्य अतिथि विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष शांतिलाल चपलोत, पूर्व सांसद महावीर भगोरा, अखिल भारतीय नववर्ष समारोह समिति के अध्यक्ष श्यामलाल कुमावत, सचिव डॉ. प्रदीप कुमावत सहित नगर परिषद के कई पार्षद, अधिकारी मौजूद थे।
वन्दन—अभिनन्दन : नगर के विभिन्न चौराहों को प्रात:कालीन वेला में 11 पण्डितों द्वारा प्रथम सूर्य को अर्घ्य प्रदान किया गया तथा  प्रात:काल सभी चौराहों पर मंगल शहनाई वादन से चौराहों को गुंजायमान किया गया।
सुबह 9 बजे से 11 बजे तक आलोक के छात्र—छात्राएँ, अध्यापक, अध्यापिकाएँ व अन्य कर्मचारी विभिन्न चौराहों व प्रमुख मार्गों पर खड़े रहकर नागरिकों को मिश्री, काली मिर्च, नीम की कोंपले खिलाकर व तिलकर नववर्ष की शुभकामनाएँ दी। साथ ही नव वर्ष के उपलक्ष्य में प्रात: आलोक संस्थान के छात्रों द्वारा तैयार 25 हजार नववर्ष शुभकामना कार्ड विभिन्न चौराहों पर बाँटे गए।
स्वागत  व भव्य आतिशबाजी : शाम 6.30 बजे ‘चैती एकम् री सवारी’ निकाली गयी जो दूधतलाई पहुँची। मेले में विभिन्न स्टॉल लगाये गए। बच्चों के मनोरंजन के लिए विशेष प्रकार की तैयारियाँ की गई। मेले का मुख्य आकर्षण अशफाक मोहम्मद द्वारा भव्य आतिशबाजी का रहा।
नगर परिषद् सभापति रजनी डांगी ने नगरवासियों को नववर्ष- की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि कई वर्षों बाद ऐसा अवसर आया है कि उदयपुर शहर की झीलों में पर्याप्त पानी है जो नगरवासियों को उल्लासित करता है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष शांतिलाल चपलोत ने उदयपुरवासियों सहित सभी को नववर्ष की शुभकामनाएं दी। नववर्ष समारोह समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्यामलाल कुमावत ने कहा कि नव संवत्सर को भी हम त्यो्हार की तरह मनाएं। दूसरों त्यौहारों की तरह इसे भी त्यौहार के रूप में मनाने की आवश्य कता है।
उन्होंने कहा कि हमारे संस्कृति के सारे आधार पंचांग पर आधारित हैं और यह एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। और आज गांवों में तो लोग इसी परम्परा को कायम करे हुये है। आज देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमन्त्री सभी भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ला प्रतिपदा के दिन नागरिकों को शुभकामनाएँ देते हैं।

नीलिमा सुखाडिय़ा ने कहा कि आज नववर्ष समारोह समिति के साथ नगर परिषद बधाई के पात्र हैं जिन्होंने आज नवसंवत्सर को त्यौहार के रूप में मनाने के लिये उदयपुरवासियों सहित पूरे भारतवासियों को प्रेरित किया। साथ ही नववर्ष की शुभकामनाएं दी। कार्यक्रम का संचालन पारस सिंघवी, पायल कुमावत ने किया।
पतंजलि योग समिति एंव भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में नव संवत्सर पर समिति सदस्यों ने प्रात: 9 से 11 बजे तक देहलीगेट स्थित नगरवासियों के तिलक लगाकर नीम मिश्री देकर शुभकामनायें दी।
============

भारत का सर्वमान्य संवत विक्रम संवत है, जिसका प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ था और इसी दिन भारत वर्ष में काल गणना प्रारंभ हुई थी। कहा है कि :-

चैत्र मासे जगद्ब्रह्म समग्रे प्रथमेऽनि
शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति। - ब्रह्म पुराण
=========================
 गुड़ी पड़वा : सृष्टि का जन्मदिवस !
नवसृजन के उत्सव का पर्व


फाल्गुन के जाने के बाद उल्लासित रूप से चैत्र मास का आगमन होता है। चहुंओर प्रेम का रंग बिखरा होता है। प्रकृति अपने पूरे शबाब पर होती है। दिन हल्की तपिश के साथ अपने सुनहरे रूप में आता है तो रातें छोटी होने के साथ ठंडक का अहसास कराती हैं। मन भी बावरा होकर दुनिया के सौंदर्य में खो जाने को बेताब हो उठता है।

यह अवसर है नवसृजन के नवउत्साह का, जगत को प्रकृति के प्रेमपाश में बांधने का। पौराणिक मान्यताओं को समझने व धार्मिक उद्देश्यों को जानने का। यही है नवसंवत्सर, भारतीय संस्कृति का देदीप्यमान उत्सव। चैत्र नवरात्रि का आगमन, परम ब्रह्म द्वारा सृजित सृष्टि का जन्मदिवस, गुड़ी पड़वा का विशेष अवसर।

भारतीय संस्कृति में गुड़ी पड़वा को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को विक्रम संवत के नए साल के रूप में मनाया जाता है। इस तिथि से पौराणिक व ऐतिहासिक दोनों प्रकार की ही मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र प्रतिपदा से ही ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी तरह के उल्लेख अथर्ववेद और शतपथ ब्राह्मण में भी मिलते हैं। इसी दिन चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती हैं।

लोक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान राम का और फिर युधिष्ठिर का राज्यारोहण किया गया था। इतिहास बताता है कि इस दिन मालवा के नरेश विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर विक्रम संवत का प्रवर्तन किया।

नववर्ष की शुरुआत का महत्व :-

नववर्ष को भारत के प्रांतों में अलग-अलग तिथियों के अनुसार मनाया जाता है। ये सभी महत्वपूर्ण तिथियां मार्च और अप्रैल के महीनों में आती हैं। इस नववर्ष को प्रत्येक प्रांतों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। फिर भी पूरा देश चैत्र माह में ही नववर्ष मनाता है और इसे नवसंवत्सर के रूप में जाना जाता है।

गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी, नवरेह, चेटीचंड, उगाड़ी, चित्रेय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नवसंवत्सर के आसपास आती हैं। इसी दिन से सतयुग की शुरुआत मानी जाती है।

इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है।
============================
इतिहास के झरोखे में नवसंवत्सर
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

- पूजा मिश्रा
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा


भारत का सर्वमान्य संवत विक्रम संवत है, जिसका प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ था और इसी दिन भारत वर्ष में काल गणना प्रारंभ हुई थी। कहा है कि :-

चैत्र मासे जगद्ब्रह्म समग्रे प्रथमेऽनि
शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति। - ब्रह्म पुराण

चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा वसंत ऋतु में आती है। वसंत ऋतु में वृक्ष, लता फूलों से लदकर आह्लादित होते हैं जिसे मधुमास भी कहते हैं। इतना ही यह वसंत ऋतु समस्त चराचर को प्रेमाविष्ट करके समूची धरती को विभिन्न प्रकार के फूलों से अलंकृत कर जन मानस में नववर्ष की उल्लास, उमंग तथा मादकाता का संचार करती है।

इस नव संवत्सर का इतिहास बताता है कि इसका आरंभकर्ता शकरि महाराज विक्रमादित्य थे। कहा जाता है कि देश की अक्षुण्ण भारतीय संस्कृति और शांति को भंग करने के लिए उत्तर पश्चिम और उत्तर से विदेशी शासकों एवं जातियों ने इस देश पर आक्रमण किए और अनेक भूखंडों पर अपना अधिकार कर लिया और अत्याचार किए जिनमें एक क्रूर जाति के शक तथा हूण थे।

ये लोग पारस कुश से सिंध आए थे। सिंध से सौराष्ट्र, गुजरात एवं महाराष्ट्र में फैल गए और दक्षिण गुजरात से इन लोगों ने उज्जयिनी पर आक्रमण किया। शकों ने समूची उज्जयिनी को पूरी तरह विध्वंस कर दिया और इस तरह इनका साम्राज्य शक विदिशा और मथुरा तक फैल गया। इनके कू्र अत्याचारों से जनता में त्राहि-त्राहि मच गई तो मालवा के प्रमुख नायक विक्रमादित्य के नेतृत्व में देश की जनता और राजशक्तियां उठ खड़ी हुईं और इन विदेशियों को खदेड़ कर बाहर कर दिया।

इस पराक्रमी वीर महावीर का जन्म अवन्ति देश की प्राचीन नगर उज्जयिनी में हुआ था जिनके पिता महेन्द्रादित्य गणनायक थे और माता मलयवती थीं। इस दंपत्ति ने पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान भूतेश्वर से अनेक प्रार्थनाएं एवं व्रत उपवास किए। सारे देश शक के उन्मूलन और आतंक मुक्ति के लिए विक्रमादित्य को अनेक बार उलझना पड़ा जिसकी भयंकर लड़ाई सिंध नदी के आस-पास करूर नामक स्थान पर हुई जिसमें शकों ने अपनी पराजय स्वीकार की।


इस तरह महाराज विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर एक नए युग का सूत्रपात किया जिसे विक्रमी शक संवत्सर कहा जाता है।

राजा विक्रमादित्य की वीरता तथा युद्ध कौशल पर अनेक प्रशस्ति पत्र तथा शिलालेख लिखे गए जिसमें यह लिखा गया कि ईसा पूर्व 57 में शकों पर भीषण आक्रमण कर विजय प्राप्त की।

इतना ही नहीं शकों को उनके गढ़ अरब में भी करारी मात दी और अरब विजय के उपलक्ष्य में मक्का में महाकाल भगवान शिव का मंदिर बनवाया।

नवसंवत्सर का हर्षोल्लास

* आंध्रप्रदेश में युगदि या उगादि तिथि कहकर इस सत्य की उद्घोषणा की जाती है। वीर विक्रमादित्य की विजय गाथा का वर्णन अरबी कवि जरहाम किनतोई ने अपनी पुस्तक 'शायर उल ओकुल' में किया है।

उन्होंने लिखा है वे लोग धन्य हैं जिन्होंने सम्राट विक्रमादित्य के समय जन्म लिया। सम्राट पृथ्वीराज के शासन काल तक विक्रमादित्य के अनुसार शासन व्यवस्था संचालित रही जो बाद में मुगल काल के दौरान हिजरी सन् का प्रारंभ हुआ। किंतु यह सर्वमान्य नहीं हो सका, क्योंकि ज्योतिषियों के अनुसार सूर्य सिद्धांत का मान गणित और त्योहारों की परिकल्पना सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण का गणित इसी शक संवत्सर से ही होता है। जिसमें एक दिन का भी अंतर नहीं होता।

* सिंधु प्रांत में इसे नव संवत्सर को 'चेटी चंडो' चैत्र का चंद्र नाम से पुकारा जाता है जिसे सिंधी हर्षोल्लास से मनाते हैं।

* कश्मीर में यह पर्व 'नौरोज' के नाम से मनाया जाता है जिसका उल्लेख पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वर्ष प्रतिपदा 'नौरोज' यानी 'नवयूरोज' अर्थात्‌ नया शुभ प्रभात जिसमें लड़के-लड़कियां नए वस्त्र पहनकर बड़े धूमधाम से मनाते हैं।

* हिंदू संस्कृति के अनुसार नव संवत्सर पर कलश स्थापना कर नौ दिन का व्रत रखकर मां दुर्गा की पूजा प्रारंभ कर नवमीं के दिन हवन कर मां भगवती से सुख-शांति तथा कल्याण की प्रार्थना की जाती है। जिसमें सभी लोग सात्विक भोजन व्रत उपवास, फलाहार कर नए भगवा झंडे तोरण द्वार पर बांधकर हर्षोल्लास से मनाते हैं।

* इस तरह भारतीय संस्कृति और जीवन का विक्रमी संवत्सर से गहरा संबंध है लोग इन्हीं दिनों तामसी भोजन, मांस मदिरा का त्याग भी कर देते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें