रविवार, 18 मई 2014

नरेंद्र मोदी : एक अद्भूत अपूर्व जीत




एक अद्भूत अपूर्व जीत

निर्मल पाठक, राजनीतिक संपादक, हिन्दुस्तान
http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/article1-story-57-62-425048.html?google_editors_picks=true

संकल्प कैसे जीतते हैं, यह हमें नरेंद्र मोदी से सीखना होगा। आज से दो साल पहले अगर कोई कहता कि भारतीय जनता पार्टी सिर्फ अपने बूते पर संसद में पूर्ण बहुमत हासिल कर सकती है, तो कोई भी इस पर विश्वास नहीं करता। एक ऐसी पार्टी, जिसके कई राज्यों में नामलेवा भी बहुत कम मिलते हों, वह सवा सौ साल पुरानी एक अखिल भारतीय पार्टी को उंगलियों पर गिनी जाने वाली संख्या के आसपास ला देगी, इसकी कल्पना भी कुछ समय पहले तक नहीं की जा सकती थी। अब हालत यह है कि भाजपा ने अकेले उत्तर प्रदेश में उससे कहीं ज्यादा सीटें हासिल कर ली हैं, जितनी कि कांग्रेस ने पूरे देश में नहीं हासिल कीं। यह ठीक है कि भाजपा की चुनावी लफ्फाजी में जिस ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ की बात की जाती थी, वह लक्ष्य नहीं हासिल हो सका, लेकिन कांग्रेस के साथ जो हुआ, वह तकरीबन उतना ही बुरा है। अक्सर यह कहा जाता है कि भाजपा की जीत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक बड़ी भूमिका निभाता है, लेकिन नरेंद्र मोदी इस बार भाजपा की जीत को वहां तक ले गए, जहां तक पहुंचने की संघ सोच भी नहीं सकता है।

निस्संदेह, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने पिछले वर्ष सितंबर में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किए जाते समय पार्टी के भीतर से उठी आशंकाओं को खारिज कर जो दांव खेला था, उसका उसे बंपर फायदा हुआ है। ऐसा फायदा, जिसकी कल्पना भाजपा के भी ज्यादातर नेताओं को नहीं थी। इसके पहले 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर में राजीव गांधी को देश ने इसी तरह हाथोंहाथ लिया था। भारतीय जनता पार्टी को इस बार 400 सीटें भले न मिली हों, लेकिन पिछले दो दशकों से जारी गठबंधन की राजनीति के दौर में यह जनादेश उससे कम महत्वपूर्ण नहीं है। साथ ही इस जनादेश में सरकार के प्रति वही नाराजगी और असंतोष छिपा हुआ है, जिसके चलते 1977 में इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर होना पड़ा था।

भारतीय मतदाता के बारे में माना जाता है कि वह धार्मिक, भावनात्मक और कभी-कभी अंधविश्वासी भी होता है। लेकिन वह उतना ही यथार्थवादी भी है। इन चुनावों में वोट देते हुए उसने देश के ताजा हालात को ध्यान में रख अपने विवेक का इस्तेमाल किया है। पिछले करीब पांच वर्ष से केंद्र में चल रही लुंज-पुंज सरकार, उस पर घपले-घोटाले के आरोप, बेतहाशा बढ़ रही महंगाई आधार कार्ड, भारत निर्माण, खाद्य सुरक्षा जैसी उसकी योजनाओं पर टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोयला घोटाला तथा सौ रुपये किलो दाल और 60 रुपये किलो टमाटर भारी पड़ रहे थे। इन सबके ऊपर उसके नेताओं का अहंकार। इससे उपजी निराशा के बीच नरेंद्र मोदी ने अपने आप को एक मजबूत, दृढ़ इरादे वाला, भाई-भतीजावाद से अलग, अपनों (संघ परिवार) को भी जगह दिखा सकने की क्षमता और कठोर फैसले कर सकने वाले नेता के तौर पर पेश किया।

यूपीए सरकार की छवि के कारण उसका नेतृत्व कर रही कांग्रेस पहले ही रक्षात्मक थी। पिछले वर्ष दिसंबर में हुए विधानसभा चुनावों में मिली हार से उबरने की कोशिश कर रही कांग्रेस आखिरी समय तक यह ही तय नहीं कर पाई कि मोदी को चुनौती देने के लिए उसे अपने उपाध्यक्ष राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना चाहिए या नहीं। पिछले डेढ़ दशक में राजनीतिक बिरादरी में अपनी एक विश्वसनीयता बना चुकी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी परदे के पीछे की भूमिका में थीं और भावी नेता के तौर पर सामने लाए गए राहुल गांधी कार्यकर्ताओं और नेताओं की एक पूरी पीढ़ी से तारतम्य बैठाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे थे। चुनाव सिर पर आते-आते कांग्रेस की हालत बीच समुद्र में खड़े उस जहाज की तरह थी, जिसके कैप्टन को पता नहीं था कि उसे जहाज को किस दिशा में ले जाना है।

कांग्रेस के नेता मान रहे थे कि मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने से संभावित सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होगा, जिसका उसे फायदा मिलेगा। कांग्रेस को 2009 के चुनाव में 206 सीटें मिली थीं और उसके रणनीतिकारों का तर्क था कि एंटी इनकम्बेंसी के कारण उसकी 60-70 सीटें यदि कम हुईं, तब भी वह भाजपा से बड़ी पार्टी होगी, जिसे पिछले चुनाव में केवल 117 सीटें मिली थीं। मतलब उसे ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है। इसी हारी हुई मानसिकता के साथ मैदान में उतरी कांग्रेस के नेता आधा चुनाव समाप्त होते-होते मानने लगे थे कि पार्टी चुनाव लड़ने की महज औपचारिकता निभा रही है।

कांग्रेस के विपरीत भाजपा इस चुनाव को जीतने के लिए नहीं, बल्कि कांग्रेस से सत्ता छीनने के लिए प्रतिबद्धता के साथ लड़ रही थी। उसके नेताओं ने असाधारण एकता और सामंजस्य के साथ योजनाबद्ध तरीके से न केवल चुनाव अभियान का संचालन किया, बल्कि पहली बार उसे अखिल भारतीय स्वरूप देने के लिए जहां भी संभव हुआ, जातिगत आधार से लेकर क्षेत्रीय पहचान वाले दलों से गठबंधन तय करने में बिल्कुल देर नहीं की। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से लेकर जातिगत समीकरण और विरोधियों के खिलाफ व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक जितने भी तीर भाजपा के तरकश में थे, उसने सबका इस्तेमाल किया। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद पूरे देश को रैलियों और आक्रामक भाषणों के जरिये जिस तरह मथने का काम किया, वह अपने आप में अलग से अध्ययन का विषय है।

मोदी के नाम पर भाजपा को मिले इस जनादेश के अपने फायदे और नुकसान भी हैं। मोदी की छवि एक अथक मेहनती और तुरत-फुरत फैसले करने वाले नेता की है। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र पर फैसले लेने में जड़ता से न उबर पाने के आरोप लगे हैं। मोदी इस जड़ता को तोड़ सकते हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए वह राज्यों के साथ भेदभाव का आरोप केंद्र पर लगाते रहे हैं। उनके प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद राज्यों के साथ केंद्र के संबंध बेहतर होने की अपेक्षा भी की जानी चाहिए। आमतौर पर बड़े दल अपनी विफलताओं के लिए गठबंधन के छोटे सहयोगियों के सिर ठीकरा फोड़ते रहे हैं। जिस तरह का जनादेश मिला है, उसमें भाजपा के पास इस तरह का बहाना बनाने की गुंजाइश नहीं होगी। मोदी को मिले इस जनादेश से यदि सबसे ज्यादा किसी को आशंकित होने की जरूरत है, तो वह भाजपा के केंद्रीय नेताओं को।

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