सोमवार, 30 जून 2014

प्याज की जमाखोरी पर शिकंजा कसें राज्य सरकारें : केंद्र सरकार



प्याज की खुदरा जमाखोरी पर शिकंजा कसें राज्य : केंद्र
Monday,Jun 30,2014
नई दिल्ली। प्याज के थोक व खुदरा मूल्यों में भारी अंतर से हैरान केंद्र सरकार ने राज्यों से खुदरा व्यापारियों की जमाखोरी के खिलाफ अभियान चलाकर सख्त कार्रंवाई करने को कहा है। केंद्रीय उपभोक्ता मामले मंत्रालय ने महंगाई के खिलाफ राज्यों के उठाए कदमों को नाकाफी व असंतोषजनक बताया है। इसके लिए राज्यों को एक और पत्र लिखकर प्याज की जमाखोरी व कालाबाजारी करने वाले थोक व खुदरा व्यापारियों के विरुद्ध कार्रवाई करने को कहा जाएगा।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की थोक मंडियों में प्याज के थोक मूल्य 18 रुपये किलो हैं तो खुदरा में यही प्याज 25 से 30 रुपये किलो बिक रहा है। थोक व खुदरा मूल्यों के अंतर को लेकर केंद्र सरकार बेहद गंभीर है। उपभोक्ता मामले मंत्रालय के सचिव केशव देसीराजू ने कहा, पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद कीमतों में होने वाली वृद्धि की कोई वजह नहीं है। प्याज की दैनिक आपूर्ति कहीं भी बाधित नहीं है। मंडियों में प्याज की कीमतों पर सरकार की कड़ी नजर है।
देसीराजू के मुताबिक, इसीलिए राज्य सरकारों से महंगाई बढ़ाने वाले कारकों पर लगातार नजर रखने और ऐसे लोगों पर सख्ती बरतने का अनुरोध किया जाता रहा है। छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और दिल्ली ने केंद्र सरकार से प्याज की स्टॉक सीमा बढ़ाने की अनुमति मांगी है, ताकि जमाखोरों पर शिकंजा कसा सके। उनके प्रस्तावों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। जल्दी ही उन्हें अनुमति दे दी जाएगी। गुजरात व तमिलनाडु में छापेमारी की सबसे अधिक कार्रवाई की गई है। यहां के जमाखोरों व कालाबाजारी करने वालों पर मुकदमे भी ठोके गए हैं। कमजोर मानसून को देखते हुए महंगाई बढ़ाने वाली ताकतें सक्रिय हो गई हैं, जबकि प्याज की आपूर्ति पिछले साल के इन्हीं महीनों के मुकाबले कहीं अधिक है।
महाराष्ट्र की मंडियों में 40
फीसद बढ़े प्याज के दाम
नई दिल्ली। महाराष्ट्र में देश की सबसे बड़ी प्याज मंडी लासलगांव में प्याज के दाम पिछले दो हफ्ते में 40 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 18.50 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। प्याज उत्पादक क्षेत्र से जुड़ी इस मंडी के भावों का असर देश के अन्य शहरों पर साफ दिखाई देने लगा है, जिसने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। दामों पर अंकुश रखने के लिए प्याज का न्यूनतम निर्यात मूल्य 300 डॉलर प्रति टन तय किए जाने का भी असर नहीं दिखाई पड़ रहा है।
नेशनल हॉर्टिकल्चरल रिसर्च एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन के निदेशक आरपी गुप्ता के मुताबिक, कमजोर मानसून की आशंका के कारण खरीफ में प्याज की फसल प्रभावित होने के अनुमान और सट्टाखोरी ने दाम बढ़ाए हैं। नाशिक में लासलगांव में दाम बढ़ने का असर दिल्ली की आजादपुर मंडी में भी दिखाई दिया। यहां दाम 25 रुपये प्रति किलो तक जा पहुंचे हैं। इसके अलावा चंडीगढ़ और मुंबई जैसे शहरों में भी दाम बढ़े हैं।
गुप्ता का कहना है कि एक माह में लसलगांव में प्याज के दाम 90 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं। प्याज सिर्फ सूखे की आशंका के कारण ही महंगा हुआ है, जबकि इसकी आपूर्ति में कहीं कोई कमी नहीं है। देश में रबी का करीब 39 लाख टन प्याज स्टॉक है।

राज्यपाल एम के नारायणन ने दिया इस्तीफा



पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एमके नारायणन ने दिया इस्तीफा
Monday, 30 June 2014
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एम. के. नारायणन ने आज इस्तीफा दे दिया। राजग सरकार के गठन के बाद संप्रग सरकार के समय नियुक्त कुछ राज्यपालों को हटाए जाने का दबाव बनने के पश्चात वह इस्तीफा देने वाले चौथे राज्यपाल हैं। गृह मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि नारायणन ने राज्यपाल पद से इस्तीफा दे दिया है।
सीबीआई ने हाल ही में नारायणन से बतौर ‘गवाह’ के रूप में अगस्तावेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर सौदे के बारे में पूछताछ की है।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नयी राजग सरकार बनने के बाद केंद्रीय गृह सचिव अनिल गोस्वामी ने कुछ सप्ताह पहले ऐसे कुछ राज्यपालों को फोन करके इस्तीफा देने को कहा था, जिनकी नियुक्तियां संप्रग शासन में हुई थीं।
पिछले कुछ दिनों में नगालैंड के राज्यपाल अश्विनी कुमार, उत्तर प्रदेश के बी. एल.जोशी और छत्तीसगढ़ के शेखर दत्त इस्तीफा दे चुके हैं।
पूर्व आईपीएस अधिकारी नारायणन खुफिया ब्यूरो के निदेशक और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रह चुके हैं। उन्हें जनवरी 2010 में पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया था।
राजग सरकार बनने के बाद जिन राज्यपालों ने अभी तक इस्तीफा दिया है वे आईपीएस या आईएएस अधिकारी रह चुके हैं। नारायणन, जोशी और कुमार पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं तो दत्त पूर्व आईएएस अधिकारी हैं।
सूत्रों ने बताया कि सरकार लगभग 10 राज्यों में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को राज्यपाल के तौर पर नियुक्त करने पर विचार कर रही है।
(भाषा)

'डिजिटल इंडिया विजन एक-दूसरे से जुड़े 125 करोड़ भारतीयों की शक्ति है - मोदी




 फिल्म 'ग्रैविटी' से भी सस्ता है भारत का मंगल मिशन: मोदी
एजेंसियां | Jun 30, 2014, श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश)

पीएसएलवी सी-23 के जरिए चार देशों के पांच सैटलाइटों के अंतरिक्ष में सफल प्रक्षेपण पर इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह हर भारतीय के लिए आनंदित और गौरवान्वित होने का क्षण है। प्रक्षेपण के दौरान श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में मौजूद पीएम ने कहा कि विदेशी सैटलाइटों के प्रक्षेपण से अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारतीय क्षमता की वैश्विक पुष्टि हुई है। उन्होंने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों से एक सार्क सैटलाइट विकसित करने की अपील की।

अमूमन हिन्दी में बोलने वाले मोदी ने यहां अंग्रेजी में भाषण देते हुए भारतीय स्पेस टेक्नॉलजी के सस्ता और विश्वसनीय होने का उल्लेख विशेष तौर पर किया। उन्होंने कहा कि हमारा मंगल मिशन हॉलिवुड की फिल्म 'ग्रैविटी' से सस्ता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि हमें गर्व है कि हमारा कार्यक्रम स्वदेशी है। वैज्ञानिकों की पीढ़ियों ने भारत को आत्मनिर्भर अंतरिक्ष शक्ति बनाने के लिए बहु
त काम किया है।

3 डी फिल्म 'ग्रैविटी' हादसे की वजह से अंतरिक्ष में फंसे दो अंतरिक्ष यात्रियों की कहानी है। बताया जाता है कि इस फिल्म को बनाने में 10 करोड़ डॉलर खर्च हुए थे। पिछले साल 13 नवंबर को मंगलायन के प्रक्षेपण के बाद 'न्यू यॉर्क टाइम्स' ने लिखा था कि भारत का मंगल मिशन 7.5 करोड़ डॉलर का है, जो फिल्म 'ग्रैविटी' के बजट का तीन-चौथाई है। 18 नवंबर को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने मेवन नामक अंतरिक्ष यान मंगल के मिशन पर भेजा था। इसकी लागत 67.1 करोड़ डॉलर बताई गई थी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि डिजिटल भारत के लक्ष्य को पूरा करने में टेक्नॉलजी की महत्वपूर्ण भूमिका है। मोदी ने कहा, 'डिजिटल इंडिया विजन एक-दूसरे से जुड़े 125 करोड़ भारतीयों की शक्ति है। इस तरह की तकनीक मूल रूप से आम आदमी से जुड़ी हुई है। बदवाव के एजेंट के रूप में यह सशक्त और कनेक्ट कर सकती है। आपने लैब में जो साधना की है, उसमें करोड़ों लोगों की जिंदगी बदलने की शक्ति है। हमारे पूर्वजों ने अन्य से पहले ही शून्य की कल्पना कर ली थी।'

मोदी ने कहा, 'हमारा अंतरिक्ष कार्यक्रम शक्तिशाली होने की इच्छा के बजाय मानवता की सेवा से प्रेरित है।' उन्होंने कहा कि स्पेस टेक्नॉलजी त्रासदी के समय काफी मददगार होती है और इससे अनगिनत लोगों की जिंदगी बचाई गई है। इससे जमीनों के प्रबंधन में भी सुधार हो रहा है और बंजर भूमि की पहचान करके उत्पादक बनाने में मदद मिल रही है।

मोदी सरकार ने, काला धन वापस लाने की मुहिम तेज की



http://www.amarujala.com

मोदी सरकार की , काला धन वापस लाने की मुहिम तेज

स्विट्जरलैंड के बैंकों में जमा काले धन की वापसी के लिए केंद्र सरकार एक बार फिर से सक्रिय हो गई है।
काले धन के खिलाफ अपने अभियान को तेज करते हुए केंद्र सरकार ने स्विट्जरलैंड की सरकार से वहां के बैंकों में भारतीयों के जमा धन के बारे में जानकारी मांगी है। ताजा अनुरोध वित्त मंत्रालय की ओर से किया गया है।
ऐसा स्विट्जरलैंड सरकार की ओर से काले धन के मामले में भारत सरकार के साथ हर तरह के सहयोग की बात दोहराने के बाद किया गया।
--------------
केंद्र ने लिखी चिट्ठी
वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, "इस संबंध में स्विट्जरलैंड की सरकार को चिट्ठी लिखकर जानकारी मांगी गई है।"
पत्र में द्विपक्षीय समझौतों और अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए भारत सरकार ने स्विस सरकार से वहां के बैंकों में काला धन जमा करने वाले अपने नागरिकों के नाम और अन्य जानकारियां उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।

इस मामले में खुद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था, "विदेश में जमा काले धन को भारत लाने के लिए सरकार गंभीर है। इस पत्र में दोनों देशों के बीच हुए समझौतों और अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल का हवाला देकर स्विट्जरलैंड के बैंकों, उनमें भारतीय नागरिकों व कंपनियों की ओर से टैक्स चोरी कर जमा किए गए काले धन के बारे में जानकारी मांगी गई है।"
----------
स्विट्जरलैंड का सकारात्मक रुख
स्विट्जरलैंड के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मामलों के सचिवालय, एसआईएफ के प्रवक्ता के मुताबिक काले धन से जुड़ी जानकारी साझा करने के मामले में स्विस अधिकारी भारतीय अधिकारियों से संपर्क बनाए हुए हैं।
स्विस अधिकारियों ने बीते दिनों खाताधारकों का नाम और अन्य जानकारियां साझा करने के प्रति सकारात्मक रुख अपनाने का संकेत दिया था। इसलिए नई सरकार इस अवसर का लाभ उठाना चाहती है।
---------
काले धन को सफेद बनाने की कवायद तेज
स्विस बैंकों में रखे काले धन को छिपाने की कवायद भी शुरू हो गई है। अब सोने से लेकर हीरे और शेयरों के कारोबार के अलावा बिटकॉयन के रूप में भी काले धन को छिपाने की कोशिश चल रही है। यही वजह है कि हाल के दिनों में भारत स्विस सोने के निर्यात का सबसे बड़ा बाजार बन कर उभरा है।
जटिल फंडों को जरिये शेयर बाजार में कारोबार को अंजाम देकर और बिटकॉयन जैसी वर्चुअल करंसी का इस्तेमाल फंड ट्रांसफर में किया जा रहा है। इस तरह काले धन को छिपाने या इसे इधर-उधर करने की कोशिश हो रही है।
----
स्विस बैंकों से काला धन निकाल यहां छिपा रहे लोग!
एसआईटी ने जांच एजेंसियों से ब्योरा मांगा
काले धन पर बने विशेष जांच दल (एसआईटी) ने जांच एजेंसियों से टैक्स चोरी और वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ा ब्योरा मंगाया है।
इसके साथ ही उन्होंने जांच की स्थिति के बारे में भी जानकारी मांगी है। उनसे यह भी पूछा गया है कि क्या जांच करने के दौरान उन्हें मामले को आगे बढ़ा कर मुकदमे और जुर्माने तक ले जाने में कोई कठिनाई हो रही है। ये विभाग जल्द ही काले धन से जुड़े अपने आंकड़े एसआईटी को मुहैया कराएंगे।

रविवार, 29 जून 2014

पीएम मोदी के फरमान से अफसरों में मची खलबली






पीएम मोदी के फरमान से अफसरों में मची खलबली


सुजय मेहदूदिया
रविवार, 29 जून 2014
अमर उजाला, दिल्‍ली

पीएम मोदी का नया फरमान

मोदी सरकार ने यूपीए सरकार के दौरान सुस्त और गैर जवाबदेह हो चुकी नौकरशाही को झकझोर कर रख दिया है। सत्ता में परिवर्तन और नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यभार संभालते ही ऊंघ रही नौकरशाही को जिम्मेदार और जवाबदेह बनाने की कवायद शुरू हो गई है।

नौकरशाहों को उनके काम के प्रति जिम्मेदार बनाने के लिए मोदी सरकार ने आला सचिवों के लिए फाइलों को निपटाने के साथ ही कैबिनेट से जुड़े नोट और अंतर मंत्रालय विचार-विमर्श के लिए डेडलाइन तय करने का फैसला किया है।

इतना ही नहीं प्रधानमंत्री कार्यालय ने खुद इस दिशा में मिसाल पेश करने की ठानी है। उसने कैबिनेट सचिव अजित सेठ के जरिये यह संदेश दिया है कि उसने अंतर मंत्रालय नोट और कैबिनेट से जुड़े मुद्दों पर फैसला करने के लिए 15 दिन की मियाद तय की है।

इस अवधि के दौरान अगर उसकी अनुमति नहीं मिलती है तो संबंधित मंत्रालय या विभाग आगे की कार्यवाही के लिए स्वतंत्र है। इसे एक तरह से पीएमओ की अनुमति ही मानी जाएगी।

शनिवार, 28 जून 2014

भाई-भतीजावाद से बचकर रहें - नरेंद्र मोदी



बीजेपी के नए सांसदों को नसीहत, 
भाई-भतीजावाद से बचकर रहें - नरेंद्र मोदी
Akhilesh Sharma जून 28, 2014

सूरजकुंड: लोकसभा में पहली बार चुनकर आए बीजेपी के डेढ़ सौ से भी ज्यादा सांसदों को दिल्ली−हरियाणा के पर्यटन स्थल सूरजकुंड के एक होटल में आज से दो दिनों की ट्रेनिंग दी जा रही है। इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण से हुई, जो खुद पहली बार चुनकर लोकसभा पहुंचे हैं।
सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कहा कि सभी सांसदों को एक−दूसरे के संपर्क में रहना चाहिए और सभी के पास एक-दूसरे के मोबाइल नंबर जरूर होने चाहिए। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि सांसद अपने आचार, विचार और व्यवहार का ध्यान रखें।

सूत्रों के मुताबिक पीएम ने कहा कि सांसदों और पार्टी नेताओं को बयानों से दूर होकर अपने काम पर फोकस करना होगा। पीएम ने कहा, मैं भी पहली बार जीता हूं, मैं भी नया हूं, मुझे भी अपने सीनियर्स से सीखना है...आप भी उनके अनुभव का लाभ लें, भाई−भतीजावाद और करप्शन सबसे गंभीर समस्या है, इससे सबको दूर रहना होगा...

बीजेपी ने अपने नए सांसदों को दी जा रही ट्रेनिंग के दौरान एक प्रेस नोट जारी किया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातों का जिक्र किया गया है।

इसमें कहा गया कि प्रधानमंत्री ने सांसदों से कहा कि संसद सदस्य के तौर पर हम सबको अपने काम को गंभीरता से करना चाहिए। याद रखें, लोग आपके काम को सदन के अंदर ही नहीं, बल्कि बाहर भी देख रहे हैं। हमारा विपक्ष से सत्ता की तरफ जाना महज कुछ कदम चलना नहीं है, यह बहुत महत्वपूर्ण बदलाव है और हमलोगों को विपक्ष की मानसिकता से बाहर निकलना चाहिए। हम एक परिवार की तरह हैं और हम सभी एक लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं। नए दोस्त बनाने की कोशिश करें, एक−दूसरे से सीखें और आपसी सहयोग की भावना से काम करें।

आज के सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह के अलावा केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज और अरुण जेटली का संबोधन भी है। इस सत्र का समापन कल यानी रविवार को लालकृष्ण आडवाणी के भाषण से होगा।

इस दौरान बीजेपी के 161 नए सांसदों को कई गुर सिखाए जाएंगे। उन्हें संसद में और उसके बाहर किस तरह से व्यवहार करना है, इसकी खास तौर पर ट्रेनिंग दी जाएगी। अपने निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की उम्मीदों पर खरा उतरना, उनके अपने क्या अधिकार और जिम्मेदारियां हैं, ऐसे तमाम विषय हैं, जिन पर पार्टी के वरिष्ठ नेता अपने नए सांसदों को समझाएंगे।

परंपरागत और सोशल मीडिया से किस तरह का संबंध रखना है, इसकी जानकारी केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और प्रकाश जावड़ेकर देंगे, जबकि पार्टी के विचारक विनय सहस्त्रबुद्धे सरकार और संगठन के बीच तालमेल बनाने के बारे में सांसदों को विस्तार से जानकारी देंगे।

इससे पहले संसद भवन के सेंट्रल हॉल में पार्टी के संसदीय दल की पहली बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसदों से कहा था कि वे उनके पैर न छुएं। मोदी ने सांसदों को हर विषय की विस्तार से तैयारी करने और उसके बाद ही उस पर बोलने की नसीहत भी दी थी।

प्रधानमंत्री मोदी ने ये भी कहा था कि सांसदों को 'राष्ट्र के नाम संदेश' देने से बचना चाहिए। माना गया कि उनका इशारा ये था कि सांसद हर विषय पर मीडिया में बोलने से बचें और सिर्फ उन्हीं विषयों पर अपनी बात रखें जिनकी उन्हें समझ है। पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने सांसदों से कहा था कि किसी भी कागज पर दस्तखत करने से पहले उसे ठीक से पढ़ें। सर्वेंट क्वार्टर को किराए पर न दें और अनजाने व्यक्तियों से मुलाकात में सावधानी रखें। रविवार शाम चार बजे पार्टी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी के मार्गदर्शन के साथ यह पाठशाला समाप्त हो जाएगी।

राहुल गांधी में शासन का मिजाज नहीं : दिग्विजय सिंह



कांग्रेस को पूरी तरह से डुबोने वाले ,  दिग्विजय सिंह कभी कभी सही बात भी कर जाते हैं ! राहुल  गांधी को परोक्ष अपरोक्ष उन्होंने कटघरे में खड़ा कर ही दिया !!

सत्ता की भूख में विचारधारा भूली कांग्रेस, 
राहुल गांधी में शासन का मिजाज नहीं : दिग्विजय सिंह

aajtak.in [Edited By: संदीप कुमार सिन्हा] | नई दिल्‍ली, 28 जून 2014

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने अपनी ही पार्टी पर निशाना साधा है. लोकसभा चुनाव में मिली हार के लिए दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस में सत्ता की भूख को जिम्मेदार बताया है. उन्होंने कहा है कि पार्टी ने अपनी विचारधारा से समझौता किया जिस वजह से हार हुई.

दिग्विजय यहीं नहीं रुके. उन्होंने ये भी कह दिया कि राहुल गांधी का मिजाज सत्ताधारी नहीं है. वो इंसाफ की लड़ाई लड़ना चाहते हैं. दिग्विजय ने कहा कि राहुल को लोकसभा में नेता विपक्ष बनना चाहिए था.

दिग्विजय सिंह का कहना है कि मोदी ने जहां अपनी बात का ढिंढोरा पीटा, तो वहीं कांग्रेस अपने काम का दस में पांच भी नहीं बता पाई. दिग्विजय का ये बयान उस वक्त आया है, जब कांग्रेस की हार के लिए पहले ही राहुल गांधी निशाने पर आ रहे हैं.

दिग्विजय सिंह के इंटरव्यू के मुख्य अंश

सवाल- क्यों हार हुई?
दिग्विजय सिंह- इस देश में कांग्रेस ने हमेशा ही विचारधारा की लड़ाई लड़ी है. लेकिन कभी-कभी हो क्या जाता है कि सत्ता की भूख में हम लोग विचारधारा छोड़कर सुविधा की राजनीति कर लेते हैं. उससे कांग्रेस को नुकसान हुआ है.

सवाल-अगर आपके पास अधिकार होता तो आप राहुल गांधी को लोकसभा में पार्टी का नेता चुनते?
दिग्विजय सिंह- देखिए, हमने तो सुझाव ये दिया था कि राहुल को खुद ये जिम्मेदारी लेनी चाहिए.

सवाल- क्या लगता है आपको कि वो जो पीछे हट जाते हैं. उनकी जिम्मेदारी से दूर भागने वाली छवि का नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ा?
दिग्विजय सिंह- मैं ये तो नहीं कह सकता लेकिन इतना कहूंगा कि लोकतंत्र में विपक्ष की जो जगह होती है, वह सफल जनतंत्र के लिए जरूरी है. चूंकि कांग्रेस विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है ऐसे में हमारे उपाध्यक्ष राहुल गांधी जी को यह जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी.

सवाल- आपकी उनसे बात होती रहती है. ऐसा कौन सा मुद्दा है..ऐसा कौन सा कारण है कि वो ये जिम्मेदारी नहीं लेते. वो पीछे हट जाते हैं हर बार व किसी और को आगे कर देते हैं?
दिग्विजय सिंह- मिजाज से राहुल गांधी सत्ताधारी व्यक्ति नहीं है. वो अन्याय के खिलाफ लड़ना चाहते हैं.

गुरुवार, 26 जून 2014

लव भारत और लीव भारत : इंद्रेशजी



लव भारत और लीव भारत : इंद्रेशजी
June 23, 2014
कुरुक्षेत्र. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की केन्द्रीय कार्यसमिति के सदस्य एवं वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार जी ने कहा कि ऐसे लोगों के लिये हिंदुस्थान में कोई जगह नहीं है, जो देश के विभाजन की बात करते हों. ऐसे लोगों को केवल एक ही विकल्प है कि या तो वे भारत भूमि से प्रेम करें अन्यथा इसे छोड़ कर चले जायें.
21 जून को संघ के 20 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर के समापन अवसर पर इंद्रेश जी ने कहा कि कोई उन्हें संविधान के अनुच्छेद 370 के दस लाभ गिनवा दे, तो भारतीय इसके समर्थन को तैयार हैं, लेकिन इसका कोई लाभ नहीं, बल्कि बहुत हानि हुई है. जो अनुच्छेद देश में दो ध्वज, दो संविधान व दोहरी नागरिकता का पक्षधर हो, वह किसी भी प्रकार से जोडऩे वाला प्रावधान नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि कश्मीर में तिरंगे के अपमान, संविधान के अपमान पर कार्रवाई का प्रावधान नहीं है. कश्मीर का संविधान भारत के संविधान का अपमान करता है. इसके कारण कश्मीर में भारत के ही नागरिकों व महिलाओं में भेद किया जाता है, ऐसे विध्वंसक संवैधानिक प्रावधान का समाप्त होना आज देश की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि अब देश न तो एक इंच भूमि किसी को देगा और न ही कोई जान आतंकवाद की भेंट चढ़ेगी.
उन्होंने कहा कि 1947 में भारत को जो आजादी मिली, वह अधूरी थी. ऐसी सरकारें सत्ता में आईं, जिन्होंने सरदार भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, सरदार बल्लभ भाई पटेल, राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई को भुलाकर ऐसे लोगों के नाम से विकास योजनायें चलाईं, जिनका देश की आजादी व विकास में रत्ती भर भी योगदान नहीं रहा. इन्हीं गलत योजनाओं के परिणामस्वरूप देश में दुराचार, नशा, गोहत्या, भ्रूण हत्या, गरीबी व अनेकानेक कुरीतियां पैदा हुईं.
उन्होंने कहा कि 2014 का आम चुनाव भारत की आजादी की दूसरी लड़ाई के रूप में जाना जायेगा. अब पूरे भारत के 125 करोड़ नागरिकों को सशक्त भारत के निर्माण की आशा बंधी है, जिसमें आतंकवाद, अपराध, महिला, भ्रूण हत्या, दुराचार, नशा जैसी प्रवृत्तियों के लिये कोई स्थान नहीं है. उन्होंने कहा कि ऐसे भारत के निर्माण का दायित्व केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है. इसलिये हर व्यक्ति को इस दिशा में अपना योगदान करना चाहिये.
इंद्रेशजी ने बताया कि 1925 में संस्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज विश्व का सबसे बड़ा संगठन है, जिसकी प्रतिदिन 60 हजार शाखायें लगती हैं. विश्व के 137  देशों में हिंदू स्वयंसेवक संघ के नाम से 750 शाखायें चल रही हैं तथा महिलाओं के लिये 4500  स्थानों पर राष्ट्र सेविका समिति की शाखायें हैं. 30 हजार विद्यालयों के माध्यम से लाखों-करोड़ों युवाओं को सुसंस्कृत किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि आज चीन, अमेरिका तथा पूरा पश्चिमी जगत परिवार के पारस्परिक रिश्तों में आई गिरावट के दुष्परिणाम भुगत रहा है, जिसके कुप्रभाव भारत में भी दिखाई देते हैं. हमें ऐसा भारत बनाना है, जिसमें महिला को मां, बहन की दृष्टि से देखा जाता है.
सेवानिवृत्त परमविशिष्ट सेवा मेडल ले. जरनल पीएन हून ने कहा कि देश को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों की अवश्यकता है, जो भारत को सबल व सभ्य नागरिक देता है. उन्होंने कहा कि आज ईरान, इराक सहित पूरा विश्व जब आपसी फूट व टकराव की स्थिति में है, तो संघ जैसे संगठन की वजह से ही भारत एकजुट है.

नहीं बढ़ेंगे गैस के दाम - मोदी सरकार



मोदी सरकार का रिलायंस को झटका, 3 महीने नहीं बढ़ेंगे गैस के दाम
इकनॉमिक टाइम्स | Jun 26, 2014

नई दिल्ली
रेल किराए में बढ़ोतरी के झटके बाद मोदी सरकार फिलहाल तीन महीने तक गैस कीमतें बढ़ाने का कड़वा डोज नहीं देगी। रिलायंस को झटका देते हुए कैबिनेट ने गैस के दाम बढ़ाने का फैसला 3 महीने के लिए टाल दिया है। वह इस मामले को अच्छी तरह समझना चाहती है और उसके बाद आम लोगों के हित को ध्यान में रखकर कोई फैसला करना चाहती है। यह रिलायंस इंडस्ट्रीज और ओएनजीसी जैसी तेल और गैस कंपनियों के लिए झटका है। इससे उन एक्सपर्ट्स की उम्मीदें भी टूटी हैं, जो मोदी सरकार से जल्द बिजनेस-फ्रेंडली फैसले की उम्मीद कर रहे थे।

3 महीने में दूसरी बार सरकार ने गैस प्राइस बढ़ाने का मामला टाला है, जो रिलायंस और ओएनजीसी के कई अरब डॉलर के इनवेस्टमेंट के लिहाज से काफी अहमियत रखता है। यूपीए सरकार की कैबिनेट ने रंगराजन फॉर्म्युले के हिसाब से गैस की कीमत तय करने को मंजूरी दी थी। इससे गैस का दाम 1 अप्रैल से 8.4 डॉलर प्रति यूनिट हो जाता। हालांकि, चुनाव आयोग ने आचार संहिता की वजह से इसे रोक दिया था, जिसकी इंडस्ट्री ने आलोचना की थी। इंडस्ट्री का कहना था कि गैस का दाम डबल करना पॉपुलिस्ट और वोट हासिल करने वाला कदम नहीं है।

पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बुधवार को बताया कि आर्थिक और उपभोक्ता मामलों की कैबिनेट कमिटी ने गैस की कीमत में बढ़ोतरी को टालने का फैसला किया है। सितंबर तक गैस 4.2 डॉलर के भाव पर मिलती रहेगी। इस प्राइस को 5 साल के लिए मंजूरी दी गई थी, जिसकी मियाद इस साल 31 मार्च को खत्म हो गई। प्रधान ने कहा कि रंगराजन फॉर्म्युले सहित पूरे मामले की समीक्षा की जाएगी। जानकारों का कहना है कि इस फैसले से सरकारी खजाने पर दबाव भी नहीं बढ़ेगा और महंगाई बढ़ने की आशंका भी कम होगी। इससे बिजली और फर्टिलाइजर कंपनियों को भी राहत मिलेगी। हालांकि इससे ऑयल और गैस फील्ड्स में इनवेस्टमेंट पर नेगेटिव असर हो सकता है। कंपनियों का कहना है कि वे गैस की मौजूदा कीमत पर ये इनवेस्टमेंट नहीं कर सकतीं।

सत्ताधारी बीजेपी ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि सत्ता में आने पर वह गैस के दाम के मुद्दे का समाधान निकालेगी। इस फॉर्म्युले का कई तरफ से विरोध हुआ है, क्योंकि इससे बिजली महंगी हो जाएगी और यूरिया का खर्च, सीएनजी की दर और पाइप से आपूर्ति होने वाली रसोई गैस के दाम बढ़ जाएंगे। लेकिन उद्योग जगत के संगठन सीआईआई ने सरकार को गैस के दाम पर लिए गए फैसले को लागू करने की मांग करते हुए कहा है कि इससे पीछे हटने पर तेल एवं गैस क्षेत्र में निवेश पर बुरा असर पड़ेगा।

इन्दिरा गांधी की हिटलर शाही के कारण लगा था आपातकाल


इन्दिरा गांधी की हिटलर शाही के कारण लगा था आपातकाल

आज के ही दिन लागू हुआ था आपातकाल,मौलिक अधिकार थे सीज
Jun 26 2014
-इंटरनेट डेस्‍क-

नयी दिल्‍ली : भारतीय इतिहास में काला दिन के रूप में दर्ज हो चुके आपातकाल को भला कौन याद करना चाहेगा. भारतीय लोकतंत्र ने इमरजेंसी को युवाकाल में झेला . आज के ही दिन यानी 26 जून 1975 को देश में पहली बार आपातकाल लगाये जाने की घोषणा की गयी थी.

इमरजेंसी के 39 साल बाद

यही वो तारीख है जब तात्‍कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने खिलाफ उठ रही विरोध के आवाज को दबाने के लिए इमरजेंसी जैसी कानून का सहारा लिया. 1971 में बांग्लादेश बनवाकर शोहरत के शिखर पर पहुंचीं इंदिरा को अब अपने खिलाफ उठी हर आवाज एक साजिश लग रही थी. उन्‍होंने लाखों लोगों को जेल में डाल दिया. लिखने-बोलने पर पाबंदी लग गई.

देश में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार और महंगाई से त्रस्‍त जनता ने सरकार का विरोध करना शुरू कर दिया. इस मुद्दे को लेकर देशव्‍यापी आंदोलन होने लगे. गुजरात कर्फ्यू इसका प्रबल उदाहरण था. इस मामले को लेकर गुजरात के चिमनभाई को इस्‍तीफा भी देना पड़ा. देश में छा रही अशांति को लेकर विपक्ष ने इंदिरा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

इधर 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली से इंदिरा का चुनाव अवैध घोषित कर दिया. विपक्ष उनसे इस्‍तीफा देने की मांग करने लगी. लेकिन सत्ता के मद में चूर इंदिरा ने 25 जून को इमरजेंसी की घोषणा कर दी. विपक्ष के तमाम नेता को गिरफ्तार कर लिया गया. देश में उनके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठा सकता था, आवाज बुलंद करने वालों को जेल की हवा खानी पड़ी.

बहरहाल जनता की आवाज को इमरजेंसी भी कुछ नहीं बिगाड़ पायी. देश में इंदिरा और कांग्रेस विरोधी नारे लगने लगे. प्रधानमंत्री इंदिरा पर लगातार दबाव बढ़ने लगा था. अंतत: उन्‍हें इंमरजेंसी खत्‍म करने का फैसला लेना पड़ा. इंदिरा ने मार्च 1977 को अचानक आपातकाल हटाने की घोषणा कर दी. अब बारी जनता की थी. 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी. तात्‍कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गईं.
------------

आपातकाल बंदियों को माना जाएगा स्वतंत्रता सेनानी - नरेन्द्र मोदी







http://dainiktribuneonline.com
आपातकाल बंदियों को माना जाएगा स्वतंत्रता सेनानी
Posted On June - 25 - 2014
नयी दिल्ली, 25 जून (भाषा)
सरकार आपातकाल के दौरान बंदी बनाए गये लोगों को स्वतंत्रता सेनानियों के समकक्ष मान्यता देकर उचित सम्मान दिलाने तथा भत्ता या पेंशन देने की मांग पर विचार कर रही है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस संबंध में राज्यसभा सांसद केसी त्यागी के पत्र का जवाब देते हुए कहा, ‘आपका पत्र प्राप्त हुआ जो आपात काल के दौरान बंदी बनाए गये लोगों को स्वतंत्रता सेनानियों के समकक्ष मान्यता देकर उचित सम्मान दिलाने एवं भत्ता या पेंशन देने के संबंध में है। मैं इस मामले पर गौर करवा रहा हूं।’
त्यागी ने आपातकाल में मीसा के तहत बंद शिव कुमार मिश्र के पत्र का हवाला देते हुए कहा कि मिश्र ने केन्द्र सरकार से आपातकालीन बंदियों को स्वतंत्रता सेनानियों के समकक्ष मान्यता देकर उनको सम्मानित करने और उनको स्वाधीनता सेनानियों के बराबर भत्ता या पेंशन देने का निवेदन किया है।
आज आपातकाल की 39 वीं वर्षगांठ है। उन्होंने कहा कि स्वाधीन भारत में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में यह जन आंदोलन चला था, जिससे देश में लगे आपातकाल को हटाया गया था एवं प्रेस तथा देश की आजादी को पुन: स्थापित किया गया था।
इस आंदोलन में देश के राजनेता एवं आम जनता ने पूरी ताकत के साथ भाग लिया था।
त्यागी ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया था कि वह मिश्र द्वारा उठाये गये मुद्दे पर संज्ञान लेकर आपातकाल के कैदियों को उचित सम्मान दिलाने के लिए निर्देशित करें।
मिश्र ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में जिक्र किया है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात सरकारों ने आपातकालीन बंदियों को मानदेय देना शुरू किया है। बिहार में जयप्रकाश सम्मान निधि के नाम से आपातकालीन बंदियों को मानदेय की व्यवस्था है। उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र रक्षक सेनानियों को तीन हजार रुपए मानदेय प्रति माह देना शुरू किया गया है। तमिलनाडु और पंजाब में मानदेय दिया जा रहा है।

मंगलवार, 24 जून 2014

अमेरिकी संसद में गूंजा गायत्री मंत्र...



अमेरिकी संसद में गूंजा गायत्री मंत्र...

आपने मंदिरों और घरों में होते हवन यज्ञ आदि में गायत्री मंत्र की गूंज सुनी होगी लेकिन जब आपको ये पता लगे कि किसी संसद में गायत्री मंत्र बोला गया तो आप शायद यहीं कहेंगे कि भारतीय संसद में ही ऐसा हो सकता है लेकिन आपके चेहरे का रिएक्शन क्या होगा जब आपको यह पता चले कि गायत्री मंत्र भारत संसद में नहीं अमेरिकी संसद में बोला गया।

जी हां इस मंत्र का जाप कपूरथला के सपूत व यूनिवर्सल सोसायटी ऑफ हिंदुइज्म के प्रधान राजन जैड ने किया। इस दौरान उन्होंने ऋग्वेद, उपनिषद व भगवत गीता की पंक्तियों का उच्चारण किया। राजन ने बताया कि उन्होंने भगवा वस्त्र धारण कर दोपहर बारह बजे हाऊस में गायत्री मंत्र का जाप आरंभ किया और इसके बाद हिंदू ग्रंथ ऋग्वेद, उपनिषद् और भगवत गीता के उच्चारण से पूरा हाऊस हिंदू धर्म में रंगा हुआ दिखाई दिया।

उन्होंने भगवत गीता की एक कापी कांग्रेसमैन माइकल होडा को दी, जिन्होंने उनका हाऊस से परिचय करवाया और उनका धन्यवाद किया। राजन ने बताया कि उन्हें हाऊस के चैपलेन पैट्रिक जे. कॉर्नराय का निमंत्रण मिला था, जिसमें उन्हें हाऊस का शुभारंभ हिंदू प्रार्थना से करने के लिए कहा गया था।
--------------
नई दिल्ली: आपने मंदिरों और घरों में होते हवन यज्ञ आदि में गायत्री मंत्र की गूंज सुनी होगी लेकिन जब आपको ये पता लगे कि किसी संसद में गायत्री मंत्र बोला गया तो आप शायद यहीं कहेंगे कि भारतीय संसद में ही ऐसा हो सकता है लेकिन आपके चेहरे का रिएक्शन क्या होगा जब आपको यह पता चले कि गायत्री मंत्र भारत संसद में नहीं अमेरिकी संसद में बोला गया।

जी हां इस मंत्र का जाप कपूरथला के सपूत व यूनिवर्सल सोसायटी ऑफ हिंदुइज्म के प्रधान राजन जैड किया। इस दौरान उन्होंने ऋग्वेद, उपनिषद व भगवत गीता की पंक्तियों का उच्चारण किया। राजन ने बताया कि उन्होंने भगवा वस्त्र धारण कर दोपहर बारह बजे हाऊस में गायत्री मंत्र का जाप आरंभ किया और इसके बाद हिंदू ग्रंथ ऋग्वेद, उपनिषद् और भगवत गीता के उच्चारण से पूरा हाऊस हिंदू धर्म में रंगा हुआ दिखाई दिया।

उन्होंने भगवत गीता की एक कापी कांग्रेसमैन माइकल होडा को दी, जिन्होंने उनका हाऊस से परिचय करवाया और उनका धन्यवाद किया। राजन ने बताया कि उन्हें हाऊस के चैपलेन पैट्रिक जे. कॉर्नराय का निमंत्रण मिला था, जिसमें उन्हें हाऊस का शुभारंभ हिंदू प्रार्थना से करने के लिए कहा गया था।

राजन इससे पहले 2007 में भी यूनाइटेड स्टेट्स सीनेट वाशिंगटन में हिंदू प्रार्थना कर चुके हैं। यह सारा कार्यक्रम सी-स्पैन चैनल पर लाइव दिखाया गया। इसके बाद माइकल होडा, स्पीकर जॉन बोहनर, रघु शर्मा, अनीता शर्मा, जनक दुलारी व जे. कॉर्नराय ने जैड को सर्टिफिकेट देकर सम्मानित किया।

शनिवार, 21 जून 2014

रेल्वे और देश को डुबानें वालों से सावधान


रेल्वे और देश को डुबानें वालों से सावधान 
देश बचाने वालों के साथ चलो ।
कांग्रसे ने देश के 200 से ज्यादा सार्वजनिक उपक्रम डुबा दिये, राज्यों में बिजली बोर्ड डूब गये, रोडबेजों के निगम डूब गये । अब पिछले दस साल से रेल्वे डूब रही है। रेल लाईनें डल नहीं पा रहीं, नये रेल रूट बन नहीं पा रहे, यात्री रेलगाडियां पर्याप्त हैं नहीं । आखिर इसे बचाना और फिर से खडा करना तो पडेगा ही ! लालू प्रसाद ने पहले बिहार निंबटाया, फिर रेल्वे को निंवटाया और इसके बाद कांग्रेस को निबंटा दिया !

रेल्वे को भी न्याय मिले !
लालू प्रसाद यादव, नितिष कुमार और ममता बनर्जी ने रेल्वे इस तरह नुकसान पहुचाया कि मानों इनकी मिल्कियत का माल हो। आज रेल्वे की हजारो योजनाओं को पूरा करने के लिये धन नहीं है। क्यों कि सस्ती लोकप्रियता के लिये लगातार किराया नहीं बढ़ाया गया , जबकि हर चीज दिन दूनी रात चैगुनी मंहगी होती चली गई । रेल्वे टी बी का मरीज बन कर रह गई। इसे यदि बचाना है तो वाजिव किराया दिया जाना चाहिये। बस में हम 200 रूपये देने तैयार हैं और रेल्वे को 100 रूपये भी न देना नाइंसाफी नहीं जो क्या है।
--------------
जानि‍ए वो 7 कारण जि‍न्‍होंने मोदी को किया रेल कि‍राया बढ़ाने पर मजबूर
moneybhaskar.com|  Jun 21, 2014,

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने रेल यातायात का किराया और माल भाड़ा बढ़ा दिया। यूपीए सरकार ने चुनाव से पहले रेल यात्री कि‍राये और माल भाड़े में बढ़ोत्‍तरी का फैसला लि‍या था लेकि‍न इसका फैसला नई सरकार पर छोड़ दि‍या गया है। रेलवे को यात्री परि‍चालन से भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह मोदी और रेल मंत्री की मजबूरी भी हो सकती है। आइए जानते हैं कि‍ मोदी सरकार की ऐसी क्‍या मजबूरी हो सकती है और क्‍या है रेलवे का हाल:

1-हर माह 900 करोड़ का नुकसान
अंतरि‍म रेल बजट 2014-15 में कहा गया कि‍ रेलवे को हर माह यात्री भाड़े पर 900 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। पि‍छली सरकार ने 16 मई को यात्री कि‍राए और माल भाड़े में क्रमश: 14.2 फीसदी और 6.5 फीसदी का इजाफा करने की घोषणा की थी, लेकि‍न बाद में इसे नए रेलवे मंत्री पर छोड़ दि‍या गया।

2-ईंधन पर बढ़ता खर्च
बीते अंतरि‍म रेल बजट में संशोधि‍त अनुमान के मुताबि‍क, रेलवे ईंधन पर सालाना करीब 30 हजार करोड़ रुपए ईंधन पर खर्च करता है, जिसमें आधे से ज्यादा खर्च डीजल पर होता है। चूंकि इराक हिंसा के बाद से कच्चे तेल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेजी से बढ़ गए हैं, लिहाजा इसका प्रभाव रेलवे पर भी पड़ा है। अगर कमाई की बात करें तो किराये से रेलवे को साल भर में 1,65,770 करोड़ रुपए की कमाई ही होती है।

3-कर्मचारि‍यों को वेतन भी देना है
पि‍छले रेल बजट में कहा गया था कि ईंधन का खर्च निकालने के बाद स्टेशनों, ट्रेनों का रख-रखाव, कर्मचारियों की सैलरी और तमाम खर्च करने के बाद रेलवे घाटे में चला जाता है। इस किराये में बढ़ोत्तरी से रेलवे का 6500 करोड़ रुपए का घाटा कम होगा। बेहतर सुविधाओं और सेवा के लिए यह बढ़ोत्तरी जरूरी थी। वहीं, रेलवे पर कर्मचारी पेंशन खर्च 1,500 करोड़ रुपए बढ़ गया है।

4-नि‍वेश है बढ़ाना, पैसा है नहीं
साल 2001 में आई राकेश्‍ा मोहन समि‍ति‍ की रि‍पोर्ट में कहा गया है कि‍ सालाना निवेश रेलवे की जरूरत है। रेलवे के आधुनिकीकरण पर राकेश मोहन समिति ने 2001 साल पहले आकलन किया था कि  2002 से 2006 तक 14,000 से 15,000 करोड़ रुपए सालाना का निवेश करना होगा। इसके बाद 2007 से 2011 तक सालाना तकरीबन 12,500 करोड़ रुपए का निवेश होगा। 2012 से 2016 तक सालाना तकरीबन 13,500 करोड़ रुपए का निवेश अनिवार्य है। पिछले कुछ वर्षों में रेलवे में निवेश का सूखा पड़ा है।

5-कि‍राये से ज्‍यादा है लागत
रेल यात्री किराए में पिछले कुछ सालों से सालाना 9 फीसदी की वृद्धि की जा रही है, जबकि इस दौरान लागत में 15 फीसदी की वृद्धि हुई है। रेलवे का पैसेंजर ऑपरेशन सब्‍सि‍डी 26,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। रेलवे अगर 100 रुपए कमाती है तो इसमें इसे 70 रुपए वह खर्च भी कर देती है। ऐसे में रेलवे के पास वि‍कास और अन्‍य चीजों पर खर्च करने के लि‍ए पैसे ही नहीं है। यह भी रेल कि‍राए और माल भाड़े में इजाफा करने के पीछे बढ़ा कारण रहा है।

6-प्रोजेक्ट पूरा करने की चुनौती
कुछ आंकड़ों पर नजर डालें तो रेलवे की दि‍क्कत साफ हो जाती है। रेल मंत्री सदानंद गौडा ने कहा है कि‍ पि‍छली सरकार के दौरान करीब 5 लाख करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट्स की घोषणा की गई थी, लेकि‍न मंत्रालय को केवल 25,000 करोड़ रुपए से 30,000 करोड़ रुपए ही शुद्ध राजस्व मि‍ल रहा है। ज्यादातर नए प्रोजेक्ट्स पैसे की कमी के कारण फंसे हुए हैं। अब रेलवे के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है कि‍ वह प्रोजेक्ट‍ लागत से 20 गुना कम रिटर्न पर कैसे काम करेगी। इसके अलावा, मोदी सरकार ने हाई स्पीड ट्रेन चलाने का सपना दिखााया है।इसके लि‍ए भी रेल मंत्रालय को भारी निवेश की जरूरत है।

7-सेफ्टी में भी है पीछे
भारतीय रेलवे सेफ्टी के मामले में भी बहुत कमजोर है। सेफ्टी से जुड़े मामलों में काकोदकर कमेटी की रिपोर्ट लागू करने के लिए भी रेलवे को मोटी रकम चाहिए। ऐसे में वित्त मंत्रालय से अगर रेलवे को मदद के रूप में पैसा बढ़ाया भी जाता है तो भी रेलवे के लिए किराया बढ़ाना मजबूरी होगी। रेलवे के सूत्रों के मुताबिक इस वक्त रेलवे को न सिर्फ ट्रैक मजबूत करने हैं, बल्कि नई सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं के लिए भी उसे पैसे की जरूरत होगी।

गुरुवार, 19 जून 2014

हिंदी में करें पूरा काम : गृह मंत्रालय का निर्देश





अपने विभागों को गृह मंत्रालय का निर्देश, अब हिंदी में करें पूरा काम
आज तक वेब ब्यूरो [Edited By: पीयूष शर्मा] | नई दिल्‍ली, 19 जून 2014

गृह मंत्रालय में अब सभी कामकाज हिंदी में होंगे. इस संबंध में बुधवार को गृह मंत्रालय ने निर्देंश जारी कर दिए.
बताया जाता है कि सबसे अधिक हिंदी का इस्‍तेमाल करने वाले नौकरशाहों को पुरस्‍कृत भी किया जाएगा. सभी पीएसयू और केंद्रीय मंत्रालयों के लिए सोशल मीडिया और इंटरनेट पर हिंदी को अनिवार्य किया गया. गौरतलब है कि केंद्र सरकार चाहती है कि उसके अफसर हिंदी में ट्वीट करें और साथ ही फेसबुक, गूगल, ब्लॉग्स वगैरह में भी इसका इस्तेमाल करें. ऐसा निर्देश गृह मंत्रालय ने दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पसंद के कारण ऐसा किया जा रहा है.

मालूम हो कि गृह मंत्रालय ने 27 मई को एक पत्र लिखा था, जिसमें सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों (सरकार तथा सरकारी अधिकारियों) के लिए हिंदी भाषा का इस्‍तेमाल अनिवार्य माना गया है. पत्र में कहा गया था कि सरकारी अधिकारियों को अपने कमेंट अंग्रेजी के अलावा हिंदी में भी पोस्ट करने होंगे. कुल मिलाकर उनसे हिंदी को वरीयता देने का कहा गया है. गृह मंत्रालय के पत्र में कहा गया है कि इस निर्देश को सभी विभागों के संज्ञान में लाया जाए.

कई सरकारी अधिकारी ट्वीट तो करते हैं लेकिन अंग्रेजी में. इनमें विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरूद्दीन भी हैं. वह विदेश मंत्रालय की ओर से ट्वीट करते हैं. लेकिन पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर हिंदी और इंग्लिश दोनों में ट्वीट करते हैं. निर्मला सीतारमण इंग्लिश, हिंदी और तमिल में ट्वीट करती हैं. बीजेपी के मुख्यमंत्री रमन सिंह, शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे अक्सर हिंदी में ट्वीट करते हैं.

हिंदी की बजाय विकास पर ध्‍यान दें मोदी: करुणा‍निधि
हिंदी पर हर काम करने को लेकर फैसले की चारों तरफ आलोचना होने लगी है. डीएमके प्रमुख करुणनिधि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सोशल नेटवर्क पर हिंदी के इस्‍तेमाल और गृह मंत्रालय के बुधवार को जारी निर्देश पर आपत्ति जताई है. करुणानिधि ने कहा है कि मोदी को हिंदी की बजाय विकास पर ध्‍यान देना चाहिए. उन्‍होंने कहा कि यह गैर हिंदीभाषियों को दोयम दर्जे की तरह समझने जैसा है.

दिवंगत प्रचारक - स्व. श्री सुन्दर सिंह जी भण्डारी



दिवंगत प्रचारक - स्व. श्री सुन्दर सिंह जी भण्डारी

स्वर्गीय सुन्दर सिंह जी भण्डारी
जन्म -  12 अप्रैल, 1921   स्वर्गवास - 22 जून, 2005

Posted by Manohar
SATURDAY, 21 MAY 2011
BHARTI BHAWAN, JAIPUR

      प्रारम्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक तथा बाद में जनसंघ व भाजपा के नेता तथा बिहार एवं गुजरात के राज्यपाल रहे मा.सुन्दरसिंह जी भण्डारी का जन्म 12 अप्रैल, 1921 को उदयपुर में हुआ । उनके पिता डा.सुजानसिंह जी उदयपुर के ख्याति प्राप्त चिकित्सक थे तथा माता श्रीमति फूल कँवर धार्मिक गृहिणी थी । भण्डारी जी की प्रारम्भिक शिक्षा उदयपुर एवं सिरोही में हुई । एन.बी.कालेज, उदयपुर से इन्टरमीजिएट करने के पश्चात 1937 में सनातन धर्म कालेज, कानपुर में बी.ए.प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया तथा वहाँ से बी.ए. व एल.एल.बी. करने के पश्चात एम.ए.की परीक्षा डी.ए.वी.कालेज, कानपुर से उतीर्ण की । जब ये बी.ए. में अध्ययनरत् थे तो पण्डित दीनदयाल उपाध्याय इनके सहपाठी थे । दोनो ने ही कानपुर की नवाबगंज शाखा में जाना प्रारम्भ किया और उन्हीं दिनो रा.स्व.संघ के प्रति उनका समपर्ण व घनिष्ठता हुई ।

      1940-1941 में लगातार भण्डारी जी ने नागपुर से संघ का प्रथम वर्ष व द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त किया तथा संघ संस्थापक प.पू.डा.हेडगेवार जी के सम्पर्क में आये । उनकी प्रेरणा से लखनऊ तथा मेरठ के संघ शिक्षा वर्ग में 1941 से 1945 तक प्रबंधक व शिक्षक के रूप में रहे । 1946 में संघ का तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण पूर्ण कर भण्डारी जी ने जोधपुर के विभाग प्रचारक का दायित्व सम्हाला । 1948 में संघ पर प्रतिबंध के समय भण्डारी जी ने भूमिगत रहकर अत्यन्त परिश्रम, निष्ठा व कौशल के साथ जोधपुर से संघ की गतिविधियां चलाई ।

      1951 में जनसंघ के निर्माण पर राजस्थान प्रान्त के महामंत्री का दायित्व सम्हाला व केन्द्रीय कार्य समिति में भी रहे । 1952 के राजस्थान में प्रथम चुनाव श्री भण्डारी जी के नेतृत्व में ही हुए । तथा 8 विधायक राजस्थान विधान सभा में चुने गए । 1954 में श्री भण्डारी जी जनसंघ के अखिल भारतीय मंत्री बनें तथा राजस्थान, गुजरात, हिमाचल तथा उत्तर प्रदेश आदि प्रान्तों का कार्य विशेष रूप से सम्हाला । 1962 में श्री भण्डारी जी जनसंघ के अखिल भारतीय संगठन प्रभारी बनें । 1963 में पण्डित दीनदयाल जी उपाध्याय के विदेश प्रवास की अवधि में महामंत्री का दायित्व भी सफलता पूर्वक संभाला । 1967 में पण्डित दीनदयाल जी उपाध्याय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और श्री भण्डारी जी ने महामंत्री का दायित्व सम्हाला । 1968 से 1972 तक राज्यसभा के सदस्य रहे तथा विभिन्न समितियों में सदस्य के रूप में अपने कौशल का परिचय दिया । 1975 के आपातकाल में श्री भण्डारी जी भूमिगत हुए किन्तु 1976 में दिल्ली स्टेशन पर मीसा के अन्तर्गत गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिये गये जहाँ से भी ये राज्यसभा सदस्य चुने गए । 1977 में आम चुनाव की घोषणा के बाद श्री भण्डारी जी भी अन्य नेताओं के साथ जेल से मुक्त हुए । अन्य दलो के साथ जनसंघ भी नवगठित जनता पार्टी का सदस्य बना तथा श्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी केन्द्र सरकार बनी । दोहरी सदस्यता के प्रश्न पर जनसंघ जनता पार्टी  से पृथक हो गया तथा श्री भण्डारी ने पूर्वानुमान बनाकर युवा मोर्चा व जनता विद्यार्थी मोर्चा का गठन कर लिया था । 8 अप्रैल, 1980 में भारतीय जनता पार्टी का मुम्बई में गठन हुआ तथा पार्टी के संविधान का निर्माण भी श्री भण्डारी के नेतृत्व में हुआ । भण्डारी जी का स्वयं का कोई परिवार नही था, कार्यकर्ता ही  उनके परिवारजन थे । सबसे मधुर सम्बन्ध उनकी विशेषता थी । श्री भण्डारी जी जनसंघ व भाजपा के नीति निर्धारक थे, वे बाद में बिहार व गुजरात के माननीय राज्यपाल भी रहे तथा बाद में मानवाधिकार आयोग के अ.भा.अध्यक्ष रहे । श्री भण्डारी जी के जीवन का कण कण राष्ट्र को समर्पित रहा । 22 जून, 2005 को उस तेजस्वी विभूति का अवसान हो गया । श्री भण्डारी जी सादगी एवं उच्च विचारों की प्रति मूर्ति थे । उन्होने संघ, जनसंघ और भाजपा संगठन को बढ़ाने में अति परिश्रम किया ।



मंगलवार, 17 जून 2014

किसके पंजे में पाकिस्तान - पाञ्चजन्य



आवरण कथा - 

किसके पंजे में पाकिस्तान

तारीख: 14 Jun 2014

 - प्रशान्त वाजपेयी - 


9 जून को कराची स्थित पाकिस्तान के सबसे बड़े, जिन्ना अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने रात एक बजे भीषण आतंकी हमला किया। आग की लपटें बुझने से पहले ही टीटीपी ने 10 जून को पास की एक सैनिक छावनी पर बड़ा आत्मघाती हमला किया। हमले की जिम्मेदारी लेते हुए टीटीपी ने इसे अपने नेता की मृत्यु का बदला बताया। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के पीछे कौन है? यदि कहा जाए आई.एस.आई.और पाक फौज? तो शायद आपको झटका लगेगा,परन्तु सच यही है। पाकिस्तान में आतंकी संगठनों की दो धाराएं चलती हैं। एक अफगान केंद्रित- जिसमें टीटीपी, मुल्ला उमर की क्वेट शूरा ऑफ तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, गुलबुद्दीन हिकमतयार का हिज्ब-ए-इस्लामी,अलकायदा अफगानिस्तान वगैरह हैं। दूसरी धारा भारत केंद्रित है। इसमें लश्करे तैयवा,जमात-उद-दावा, जैश-ए-मुहम्मद, हरकत-उल-मुजाहिद्दीन जैसी जिहादी तंजीमें हैं। फिर शियाओं-अहमदियों की हत्या करने वाले सिपह-ए-सहाबा उर्फ लश्कर-ए-झांगवी जैसे सुन्नी आतंकी संगठन हैं। इनके अपने उद्देश्य और इलाके हैं और अपने वाद और नस्ल आधारित उद्गम, कार्यपद्घति है। आपसी प्रतिद्वंद्विताए हैं। परन्तु एक चीज समान है। सारे के सारे आईएसआई के माध्यम से फौज द्वारा संचालित होते हैं। 

फौज के लिए इन सबके अपने-अपने रणनीतिक उपयोग हैं।

कोई अफगानिस्तान में उपयोगी है, तो कोई कराची में। पख्तूनों का जिहादी संगठन कराची में एमक्यूएम के खिलाफ काम आता है, तो तहरीक-ए-तालिबान बलूचिस्तान में हजारा-शियाओं की हत्या के काम आता है। बलूच नेता कहते हैं कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान बिना वर्दी के पाक फौज ही है, जो बताए गए काम से ज्यादा आगे जाता है, वो दंडित किया जाता है। ये संगठन शतरंज की उस बिसात के मोहरे हैं, जिसमें काली और सफेद दोनों गोटियां पाक सेना ही चलाती हंै। स्वात घाटी में पाक फौज के आतंक विरोधी अभियान को भी अनुशासन लागू करने की कार्यवाही के रूप में देखना चाहिए। इसीलिए अमरीका का पाक-अफगान में चल रहे अपने आतंकरोधी अभियान के लिए पाक कमांडरों से ज्यादा अपने ड्रोन्स पर भरोसा करता है और जब पाक के एबटाबाद में छिपे बैठे ओसामा बिन लादेन का शिकार करने जाता है, तो रात के अंधेरे में जाता है, पाक फौज को भनक भी नहीं लगने देता। नस्ल और वाद में बंटा पाकिस्तान उसकी पंजाबी मुस्लिम फौज के खेल का मैदान है। पाकिस्तान की ये 'फॉल्ट लाइंस' पाकिस्तानी समाज की कमजोरी हैं, पर पाक सेना संस्थान की ताकत हैं।
हाल ही की एक अन्य घटना है । पाकिस्तान के प्रसिद्घ चैनल जिओ टीवी की मुश्कें कस दी गईं और उसके पत्रकार हामिद मीर पर घातक हमला हुआ,क्योंकि उन्हांेने आई़एस़आई की शान में गुस्ताखी की थी और सर्वाधिक प्रसिद्घ घटना, जब पाक के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भारत आने के लिए फौज की सहमति की प्रतीक्षा कर रहे थे। किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि पाक फौज पाकिस्तान की किस्मत के फैसले करती है।
जब-जब भारत में कोई आतंकी घटना होती है, पाकिस्तान का नाम चर्चा में आता है, मीडिया से लेकर राजनैतिक गलियारों तक हलचल होने लगती है। पाकिस्तान की सरकार से जवाब मागा जाता है, कड़ी कार्यवाही की मांग होती है। परंतु कभी होता कुछ नहीं है। हमारे कुछ चैनल पाकिस्तान के किसी पत्रकार या विश्लेषक या छोटी मोटी राजनैतिक हस्ती वाले किसी पाकिस्तानी नेता को अपने कार्यक्रम में बुलाकर उन पर भड़ास निकाल लेते हैं। इन बहसों में चैनल की नजर टी़आऱपी़ पर होती है और बहस में भाग लेने वालों की नजर अपने-अपने देश के दर्शकों पर होती है। पाकिस्तान सरकार आश्वासन-नकार-स्वीकार का खेल खेलती रहती है।
9/11 के आतंकी हमले के बाद से अमरीका पाकिस्तान के साथ (और स्थान विशेष पर पाकिस्तान के खिलाफ) काम कर रहा है। अमरीका को जब भी अफगानिस्तान या पाकिस्तान की अफगान सीमा संबंधी मामलों में बात करनी होती है,तो वो केवल पाकिस्तान सरकार से ही बात नहीं करते,वो पाकिस्तान की सेना से भी अलग से बात करते हैं। क्योंकि पाक सेना पाकिस्तान की असली आका है। पाकिस्तान में इसे दबी आवाज में 'इस्टैब्लिशमेंट' कहा जाता है।
असीमित शक्ति, निर्मम रखवाले
इस जटिल तंत्र ने पाकिस्तान को अपनी अजगर जैसी कुंडली में जकड़ रखा है। इसकी इच्छा के खिलाफ जाने वाले व्यक्ति गायब हो जाते हैं, या बरबाद हो जाते हैं। इसके रास्ते में आने वाली सरकारें उलट दी जाती हैं। पाकिस्तान में तीन बार लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकारों को सेना ने उखाड़ फेंका है। 1958 से 1971, 1977 से 1988 और 1999 से 2008 तक पाकिस्तान सेना की सत्ता के नीचे रहा है। जनरल जिया-उल-हक ने तो पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री और पाकिस्तान में जिन्ना के बाद सर्वाधिक लोकप्रिय नेता जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर लटकाकर पाकिस्तान समेत सारी दुनिया को दिखा दिया कि पाकिस्तान में सेना के सामने सरकार और प्रधानमंत्री की क्या हस्ती है।
पाकिस्तान में पर्दे के पीछे से काम करने वाले इस सूत्रधार का भय सर्वत्र देखा जा सकता है। सरकारी कार्यालयों से लेकर मीडिया कार्यालयों तक। 1992 से 2010 तक पाकिस्तान में 39 पत्रकारों की हत्याएं हुईं। मीडिया कर्मियों का खुफिया एजेंसियों द्वारा अपहरण, प्रताड़ना आम बात है। बलूचिस्तान में तो अखबारों के दफ्तरों को पुलिस तथा अर्धसैनिक बल घेरे रहते हैं। 2009 में उर्दू दैनिक 'असाप' ने घोषणा की थी, कि सुरक्षाबलों द्वारा की जा रही प्रताड़ना के कारण वह अखबार बंद कर रहा है। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग द्वारा पत्रकारों पर किए जा रहे हमलों का विवरण दिया गया है,जो अकल्पनीय लगता है।
उद्योगपति, सरकारी कर्मचारी यहां तक कि भारतीय राजनयिक भी इनके कहर से अछूते नहीं रहे हैं। 26 अगस्त 2011 को पंजाब प्रांत के राज्यपाल रहे सलमान तासीर (जिनकी पाकिस्तान के कुख्यात ईशनिंदा कानून 'रिसालत ए रसूल' पर सवाल उठाने के कारण हत्या कर दी गई) के पुत्र और उद्योगपति शाहबाज तासीर का अपहरण हो गया और कोई सुराग नहीं मिला। बाद में एक पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर मीडिया को बताया कि शाहबाज का अपहरण गुप्तचर एजेंसियों ने किया है, क्योंकि उन्हंे शाहबाज की देश के प्रति वफादारी पर शक था। मार्च 2014 में तालिबान स्रोत ने दावा किया कि शाहबाज की हत्या की जा चुकी है। पाक के गैर सरकारी संगठन डिफेंस ऑफ ह्यूमन राइट्स की अध्यक्षा आमना जंजुआ के शिक्षाविद् पति मसूद जंजुआ मई 2005 से लापता हैं। आमना का दावा है कि उनका अपहरण सुरक्षा बलों ने किया है। मसूद कभी वापस नहीं लौटे। आमना आज भी सेना के उस ब्रिगेडियर के खिलाफ अदालतों का दरवाजा खटखटा रहींं हैं, जिसने उनके पति को अगवा करवाया था।
आंतरिक राजनीति और 'इस्टैब्लिशमेंट' दुनिया में देशों के पास सेनाएं हैं। पाकिस्तान में सेना के पास एक देश है। सेना दो प्रकार से पाकिस्तान पर शासन करती आई है। पहला, सीधे सत्ता को हाथ में लेकर, दूसरा 'लोकतांत्रिक' सरकार को सामने रखकर।
तानाशाही के ये बीज स्वयं जिन्ना ने ही डाले थे। उन्होंने पाकिस्तान का राष्ट्रपति बनने से मना कर दिया । उसके स्थान पर पाक का गवर्नर जनरल बनना पसंद किया और लियाकत अली खां को पिट्ठू प्रधानमंत्री बनाकर सत्ता के सारे सूत्रों का संचालन करते रहे। कैबिनेट की बैठकें भी खुद ही लेते थे। सिंध और सरहद की सरकारें बर्खास्त कीं। बलूचिस्तान और पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर पर कब्जा (घुसपैठ करवाकर) किया। पूर्वी पाकिस्तान में बंगालियों पर उर्दू थोपने का असफल प्रयास किया, जिसकी अंतिम परिणती पाक के विखंडन और बंगलादेश निर्माण के रूप में हुई। आज पाकिस्तान में जो भूमिका 'इस्टैब्लिशमेंट' निभा रहा है, जिन्ना के समय और उसके बाद भी ये भूमिका सरकारी बाबू निभा रहे थे।
1958 में सत्ता में आने के बाद तानाशाह अयूब खां ने विद्रोहों को दबाने और बाद में चुनावों को प्रभावित करने के लिए आई.एस. आई का भरपूर उपयोग किया। पाक सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में बंगालियों का दमन किया, जो पाक में लोकतांत्रिक सरकार के आने के बाद 1971 के बंगालियों के भीषण नरसंहार तक पहुंचा। 1971 में भारत के हाथों शर्मनाक हार के कारण पाकिस्तानी सेना गर्त में पहुंच गई। जुल्फिकार अली भुट्टो ने अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए पाक सेना को फिर से उबारा। भारत से हजार साल तक जंग लड़ने की कसमें खाईं और अखिल इस्लामावाद का नारा बुलंद किया। सेना के हाथों बलूचिस्तान में बर्बर दमन चक्र चलाया, पर शेर की सवारी भुट्टो को भारी पड़ी। जल्दी ही ये शेर भुट्टो को खा गया। पाकिस्तान में फिर मार्शल लॉ लगा। जिया उल हक सत्ता में आए। जिया ने सत्ता पर अपनी वैधता सिद्घ करने और लोकतंत्र की आवाज को दबाने के लिए इस्लाम की आड़ ली और पाकिस्तान का इस्लामीकरण शुरू किया। पाकिस्तान एक इस्लामिक गणराज्य बना। मध्ययुगीन अरब के कानून अस्तित्व में आए और मुल्ला तथा सेना का औपचारिक रूप से गठजोड़ बना। पड़ोसी अफगानिस्तान में शीत युद्घ का एक बर्बर प्रयोग जारी था। पाकिस्तान खुशी-खुशी अमरीका बिसात का मोहरा बनने को तैयार हो गया। पाकिस्तान वैश्विक आतंकवाद की धुरी बनने की दिशा में आगे बढ़ा। यही वो समय था, जब जिया ने भारत से सीधे युद्घ में उलझने के स्थान पर छद्म युद्घ द्वारा हजार घाव देकर मारने की नयी योजना पर काम शुरू किया, जो आज तक पाकिस्तानी फौज का एजेंडा बना हुआ है।
अफगानिस्तान में जिहादी लड़ाके तैयार करने के लिए आई.एस.आई के भीतर कट्टरपंथी इस्लामी तत्वों को शामिल किया गया। पूरे पाकिस्तान में मदरसों और जिहादी तत्वों का जाल बिछाया गया। अमरीका से हथियार आए और सऊदी अरब से पैसा और कट्टरपंथी वहाबी विचार। तत्कालीन पाकिस्तानी इस्टैब्लिशमेंट ने पाकिस्तान को इस खेल में खपा दिया। इस प्रकार पाकिस्तान वैश्विक जिहादी आतंकवाद का कारखाना बन गया।
पाकिस्तानी सेना की ये नीति आज भी जारी है। तालिबान, लश्करे तैयबा, लश्करे झांगवी और दूसरे सारे आतंकी संगठन आज पाक सेना के महत्वपूर्ण रणनीतिक मोहरे हैं। भारत में भी जो पाक प्रायोजित आतंकवाद है, उसका संचालन पाक सेना ही करती है। पाक सरकार की भूमिका इसमें मात्र मूकदर्शक की है,जो सरकार पाक सेना का रास्ता काटने की कोशिश करती है, उलट दी जाती है। बेनजीर भुट्टो और नवाज शरीफ दोनों ने अपनी सत्ता इसी कारण गवाई थी। आई.एस.आई पाकिस्तान का गुप्त परंतु सबसे शक्तिशाली राजनैतिक दल बनकर काम कर रहा है।
पाकिस्तान का 'पंजाबी इस्टैब्लिशमेंट'
पाकिस्तान की जनसंख्या पंजाबी मुसलमान, सिंधी मुसलमान, मोहाजिर, बलूच मुसलमान, पख्तून-पठान आदि से लेकर बनी है,परंतु प्रभुत्वशाली शासक वर्ग, प्रशासक और सर्वशक्तिमान इस्टैब्लिशमेंट पर पूरा-पूरा दबदबा पंजाबी सुन्नी मुसलमानों का है। सेना में, पुलिस मंे, प्रशासन में 90 प्रतिशत भर्तियां अकेले पंजाब से होती हैं। उस पर भी, 39 जिलों वाले पंजाब के तीन जिलों में से ही पाकिस्तानी सेना की 75 प्रतिशत भर्तियां होती हैं। ऐसे घोर नस्लवादी चरित्र की पाक सेना शेष पाकिस्तानियों के साथ क्या व्यवहार करती होगी, समझा जा सकता है। इसी पंजाबी सेना ने बंगलादेश मुक्ति के पहले पूर्वी पाकिस्तान में लाखों बंगालियों की हत्या तथा बलात्कार किए थे। यही पंजाबी सेना पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर और वजीरिस्तान में बेधड़क खूंरेंजी करती आ रही है और इसी पंजाबी सेना ने बलूचिस्तान को कत्लगाह बना रखा है। पाकिस्तान में पाक सेना पर एक चुटकुला चलता है, कि पाकिस्तानी फौज ने सबसे बड़ा काम ये किया है, कि उसने पाकिस्तान को जीत लिया है।
'इस्लाम का किला' बना पंजाब की छावनी
भारत का विभाजन कर पाकिस्तान निर्माण का आंदोलन, मुस्लिम लीग ने चलाया। मुस्लिम लीग का जन्म अविभाजित बंगाल में हुआ था। बाद में इसका नेतृत्व प्राय: उत्तरी भारत के मुसलमानों ने किया। अनेक कारणों से पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों और मुस्लिम लीगियों ने पश्चिमी पाकिस्तान की ओर रुख किया। पंजाबी मुसलमानों ने इन मोहाजिरों को स्वीकार नहीं किया। ये सारे सिंध में आए। जहां सिंधी मुसलमानों और मोहाजिरों के बीच का वैमनस्य आज तक जारी है।
पाकिस्तान का सपना मुख्यत: दिल्ली और उत्तर प्रदेश के संभ्रांत मुसलमानों को दिग्भ्रमित करने का था। पाकिस्तान की मांग का नेतृत्व करने वाले सभी नेता जिन्ना, सुहरावर्दी, लियाकत अली खां और फजलुल हक सब के सब पाकिस्तान मंे मोहाजिर थे। लेकिन 3 प्रतिशत मोहाजिरों की सत्ता शेष 97 प्रतिशत पंजाबी, सिंधी, पठान आदि कैसे स्वीकार कर सकते थे? 21 प्रतिशत उच्च सरकारी पदों और उद्योग-धंधों पर मोहाजिर आसीन थे। अत: स्वाभाविक तौर पर स्थानीय जनों के रोष के चलते राजनैतिक उथल-पुथल मची रही। अगले चुनाव में अपनी कुर्सी जाती देख राष्ट्रपति सिकंदर मिर्जा ने 1958 में पाकिस्तान में मार्शल लॉ लगा दिया और सेना प्रमुख जनरल मोहम्मद अयूब खां को साथ लेकर उसे चीफ मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर बना दिया। अयूब खां ने 20 दिन बाद सिकंदर मिर्जा की भी कुर्सी उलट दी और खुद राष्ट्रपति भी बन गए। अगले 13 सालों तक पाकिस्तान सेना के हवाले रहा।
1947 से 1958 तक पाकिस्तान में चली मोहाजिरों की सत्ता को समाप्त करने के लिए अयूब खां पाकिस्तान की राजधानी को कराची से हटाकर पंजाब के इस्लामाबाद में ले गए। यहां यह बात ध्यान देने योग्य है, कि ब्रिटिश राज के अंतर्गत रही भारतीय सेना के विभाजन से ही पाकिस्तानी सेना बनी, जिसमें पंजाबी मुसलमानों का वर्चस्व था। जब अयूब खां पंजाबी एजेंडे के साथ पाकिस्तान के तानाशाह बन गए तब पाकिस्तान के शासन प्रशासन और संचालन सूत्रों के पंजाबीकरण में कोई बाधा नही रह गई। यहीं से पाकिस्तान का आज का 'इस्टैब्लिशमेंट' अस्तित्व में आया।
पाकिस्तान के समाज पर पकड़
संसार के किसी भी 'इस्टैब्लिशमेंट' को शक्ति के सूत्र अपने हाथों में बनाए रखने के लिए जनमत को अपनी मनचाही दिशाओं में मोड़ना पड़ता है। पाकिस्तानी इस्टैब्लिशमेंट इस काम को पाकिस्तान में विविध क्षेत्रों और आयामों में काम कर रहे अपने भेदियों या मोहरों की मदद से करता है। इस काम के लिए वो शैक्षिक पाठ्यक्रमों का भी उपयोग करता है, और मीडिया चर्चाओं का भी। मदरसों और मुल्लाओं का भी उपयोग करता है, और पाकिस्तान फिल्म उद्योग का भी। पूर्व आई़एस़आई़ प्रमुख हामिद गुल जैसे लोग भी हैं, जो 'दिफा ए पाकिस्तान' जैसा समूह बनाकर पाकिस्तान के सामाजिक जीवन में सक्रिय कट्टरतम् इस्लामिक संगठनों को साधने का काम कर रहे हैं।
पाकिस्तान के अधिकांश समाज पर मुस्लिम कट्टरपंथियों की मजबूत पकड़ है और मुस्लिम कट्टरपंथियों और उनके संगठनों पर आई़एस़आई की मजबूत पकड़ है,जिसका समय-समय पर उपयोग किया जाता है। इसके लिए समय-समय पर 'इस्लाम खतरे में है' से लेकर 'भारत-अमरीका और यहूदी साजिशों से पाकिस्तान की रक्षा' तक के नारे उपयोग किए जाते हैं। यहां तक कि जब भी पाकिस्तानी सेना को अमरीका से और पैसे ऐंठने होते हंै, पाकिस्तान के मुस्लिम संगठनों द्वारा पाकिस्तान की सड़कों पर अमरीका विरोधी प्रदर्शन शुरू कर दिए जाते हैं।
कोई दूध का धुला नहीं
पाकिस्तान के राजनैतिक दल हैसियत में फौज से बहुत छोटे हैं, पर समय-समय पर खाकी और चाँद-सितारे के इस गठजोड़ से तालमेल बिठाने की कोशिश करते आए हैं। सर्वप्रथम पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के जुल्फिकार अली भुट्टो ने फौज और इस्लामी उन्माद को अपनी महत्वाकांक्षाओं का औजार बनाने का प्रयास किया। आज भी सिंध में पाकिस्तानी हिंदुआंे समेत अन्य गैर मुसलमानों पर अत्याचार कर रहे कट्टरपंथी तत्वों को पापीपा (पी.पी.पी) के स्थानीय नेतृत्व का संरक्षण प्राप्त है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग के नवाज शरीफ सेना के आदमी कहे जाते रहे हैं। विगत आम चुनाव में पंजाब आधारित मुस्लिम अतिवादी संगठनों ने नवाज शरीफ का साथ दिया था। शरीफ भी प्रारंभ से ही ऐसे तत्वों के साथ सहज रहते आए हैं।
इमरान खान को लेकर भारतीय मीडिया में बहुत उत्साह देखा जाता है, परंतु पाकिस्तान में उन्हे सूट-बूट वाला तालिबान कहा जाता है। पाकिस्तान के छोटे राज्य खैबर-पख्तूनख्वा में सत्ता में आने के बाद इमरान की पार्टी ने शासन के तालिबानीकरण की राह पकड़ी है। इमरान खान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को मान्यता देने की वकालत करते रहे हैं। 2013 के आम चुनाव में पाकिस्तान की सेना ने इमरान खान को सत्ता में लाने के लिए अपनी पूरी मुल्ला फौज को झोंक दिया था। पाकिस्तान के एकमात्र पंथनिरपेक्ष दल 'अवामी नेशनल पार्टी' का कोई खैरख्वाह नहीं है। इसके नेता आई़एस़आई की हिट लिस्ट में हंै। पिछले एक दशक में 700 से अधिक सक्रिय कार्यकर्ता आतंकियों के हाथों मारे जा चुके हैं।
पाकिस्तान बिखराव के कगार पर
सेना प्रतिष्ठान की करतूतों के कारण 1971 में पूर्वी पाकिस्तान टूट कर अलग हुआ। पाकिस्तान की 50 प्रतिशत धरती और 55 प्रतिशत आबादी अलग हो गए। अब वजीरिस्तान में धरती हिल रही है। बलूचिस्तान साथ रहने को तैयार नहीं। पाक फौज वहां खून की होली खेल रही है। हर महीने 15-20 बलूचों की लाशें मिल रही हैं। बलूच आबादी पर तोपखानों और हैलीकॉप्टरों से बमबारी की जा रही है। पाक अधिकृत कश्मीर में आई़एस़आई़ लक्षित हत्याएं (टारगेट किलिंग्स) करके बगावत को दबाने में लगी है। पेशावर से कराची तक आतंकी आत्मघाती हमले हो रहे हैं। पाक फौज समर्थित लश्कर-ए-झांगवी जैसे सुन्नी आतंकी गुट बड़े पैमाने पर शियाओं की हत्या कर रहे हैं। बदले में शिया भी यदा कदा आत्मघाती हमले कर रहे हैं। सत्ता के समीकरण साधने के लिए पाक सेना प्रतिष्ठान अपने ही लोगों के विरुद्घ छाया युद्घ में संलग्न है।
प्रथम शत्रु भारत
पाकिस्तानी इस्टैब्लिशमेंट का सिद्घांत है कि पाकिस्तान का और उनका स्वयं का अस्तित्व भारत से शत्रुता पर टिका है। वे अंतिम सांस तक इस पर डटे रहना चाहते हैं। अंतरराष्ट्रीय बिरादरियों से मिलने वाली सहायता उसकी जीवन रेखा है। अंदरूनी दबाव पाकिस्तान को बिखराव की ओर ले जा रहे हैं। भविष्य में पाकिस्तान के टुकड़े हो सकते हैं, परंतु इस बात की गंभीर आशंका है कि इस बिखराव के पहले पाक सेना एक बार फिर रक्त स्नान करेगी। पाकिस्तान के इस आका से निपटने के लिए भारत को बहुमुखी नीति पर काम करना पड़ेगा। जानकार इस बात पर सहमत हैं कि पाकिस्तान की सेना तीन चीजों पर अपना एकाधिकार कभी नहीं छोड़ेगी, पहला - नाभिकीय हथियार, दूसरा - पाकिस्तान की भारत नीति और तीसरा - पाकिस्तान की कमान। भारत को सब प्रकार से सक्षम बनने और भू-सामरिक तथा क्षेत्रीय परिस्थितियों के मद्देनजर दूरदर्शी विदेश नीति एवं कूटनीति की आवश्यक्ता है। रास्ता छोटा तो कतई नहीं है।

रविवार, 15 जून 2014

तुझे सूरज कहूं या चंदा - 'एक फूल दो माली'



 फिल्म 'एक फूल दो माली' का यह गीत ' प्रेम धवन ' की कलम से निकला और गीत के अनुकूल गंभीरतापूर्ण आवाज 'मन्नाडे' की रही । इसे असल में अविस्मरणीय बलराज साहनी के अभिनय ने बना दिया ।

कुछ जल्लाद किस्म के पिताओं को छोड़ दिया जाये तो सामान्यतः , हर पिता की अभिलाषा होती हे की उसकी संतान उससे भी बहुत आगे बढे !

तुझे सूरज कहूं या चंदा, तुझे दीप कहूं या तारा,
मेरा नाम करेगा रौशन, जग में मेरा राज दुलारा !
==1==
मेरा घर था खाली खाली,छाई थी अजब उदासी
जीवन था सूना सूना,हर आस थी प्यासी प्यासी
तेरे आते ही खुशियों से,भार गया है जीवन सारा
मेरा नाम करेगा रौशन ...
==2 ==
मैं कब से तरस रहा था,मेरे आँगन में कोई खेले
नन्ही सी हँसी के बदले,मेरी सारी दुनिया ले ले
तेरे संग झूल रहा है,मेरी बाहों में जग सारा
मेरा नाम करेगा रौशन ...
==3 ==
आज उँगली थाम के तेरी,तुझे मैं चलना सिखलाऊँ
कल हाथ पकड़ना मेरा,जब मैं बूढ़ा हो जाऊँ
तू मिला तो मैं ने पाया,जीने का नया सहारा
मेरा नाम करेगा रौशन ...
==4  ==
मेरे बाद भी इस दुनिया में,ज़िंदा मेरा नाम रहेगा
जो भी तुझ को देखेगा,तुझे मेरा लाल कहेगा
तेरे रूप में मिल जायेगा,मुझ को जीवन दोबारा
मेरा नाम करेगा रौशन ...
==5  ==






शनिवार, 14 जून 2014

केशव की जय - जय : माधव की जय - जय



आलेख
केशव की जय - जय
माधव की जय - जय

- अरविन्द सिसोदिया ( कोटा , राजस्थान )

संघ का एक स्वंयसेवक, नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गये हैं , उनकी सरकार ने काम संभाल लिया है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री सुरेश (भय्याजी) जोशी ने विश्वास व्यक्त किया है कि ” परिवर्तन की आकांक्षा व्यक्त करने वाले करोड़ों देशवासियों की भावनाओं एवं अपेक्षाओं की पूर्ति करने में नव निर्वाचित सरकार सफल सिद्ध होगी।“ निश्चित रूप से संघ को नरेन्द्र मोदी सरकार बनने की प्रशन्नता है और इसके पीछे उनको घोर परिश्रम भी है। कांग्रेस नेतृत्व में देश रसातल में पंहुच चुका था राष्ट्र को अद्योपतन से बाहर निकाने के लिये तो संघ हमेशा ही संकल्पबद्ध रहा है। येशी स्थिति में संघ ही क्या जो भी देश भक्त था वह कांग्रेस नेतृत्व को सिंहासन से उतारने में सक्रीय था , संघ के सरसंघचालक परमपूज्य मोहनजी भागवत ने शतप्रतिशत मतदान का जो आव्हान किया था, उसके कारण मतदान प्रतिशत में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई और इसने भाजपा की विजय को ऐतिहासिक बना दिया। यह संघ ने इसलिये किया कि देश हित हो , समाज हित हो और स्वाभिमान से जीने की स्थितीयां पुनः देश में स्थापित हों।

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की शाखाओं पर एक उद्घोष निरंतर होता चला आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा ” केशव की जय - जय, माधव की जय - जय“ । इस उद्घोष को पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने भी खूब लगाया और उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवानी, मुरलीमनोहर जोशी, हालिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह, मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चैहान, मुख्यमंत्री रमनसिंह, नितिन गडकरी और अरूण जेटली सहित एक बहुत बडी फेहरिस्त है, लाखों स्वंयसेवक हैं जो इस उद्घोष को बडे गर्व से लगाते हैं। इस उद्घोष में केशव का अर्थ संघ के संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक परम पूज्य डाॅ0 केशवबलीराम हेडगेवार से है तथा माधव से संघ के द्वितीय सरसंघचालक परमपूज्य माधव सदाशिवराव गोलवलकर अर्थात गुरूजी से है, जिनकी प्रेरणाा से जनसंघ जो अब भाजपा है सहित अनेकानेक राष्ट्रवादी संगठनों का जन्म हुआ।

संघ की शाखाओं में सबसे पहले भारत के अनादी काल से चले आ रहे संस्कृतिक एवं सभ्यता के उद्घोषक ध्वज, भगवाध्वज को ध्वज प्रणाम होता है, भारतमाता की वंदना प्रार्थना से होती है, भारतीय संस्कृति के युगो - युगों से ध्वज वाहक रहे महापुरूषों को प्रातः स्मरण से याद किया जाता है। देश के एकात्म का चिन्तन होता है, भारतीय सभ्यता के संरक्षण, उत्थान और चुनौतियों पर विमर्श होता हे। शारीरिक और मानसिक व्यायाम होता है। कुल मिला कर ” भला हो देश का वह काम तुम किये चलो “ के ध्येय पथ पर चलते रहने की संकल्पना होती है, शिक्षण होता है।

संघ कार्य राजनैतिक नहीं है बल्कि उससे भी बहुत बड़ा और व्यापक , बहुआयामी है जो निरंतर भारतीय संस्कृति के हितों की चिन्ता करता है, उसके स्वर्णिम अध्यायों का पुर्नस्मरण करवाता है। स्वदेशी, स्वाभिमानी और समुन्नत भारत बनाने के लिये सक्रीयता को क्रियान्वित करता है। भारत को पुनः विश्व के सिंहासन पर आरूढ़ करने के लिये निरंतर प्रयत्नशील है। लाखों - लाखों स्वंयसेवक समाज के विविधक्षैत्रों में सक्रीय रहते हुये ” तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें “ की भावना से अपना जीवन दिये हुये हैं।

भारत के पुर्नजागरण में लगा यह संगठन व्यक्तिवादी न होकर, ध्येयवाद के आधार पर निरंतर अग्रसर रहते हुये विश्व का सबसे बडा सामाजिक संगठन है। इस संगठन के संस्थापक सरसंघचालक परमपूज्य डा0 केशवबलीराम हेडगेवार के स्वप्न को पूरा करने में अनेकों पीढि़यों से लाखांे - लाखों तपस्वी स्वंयसेवक प्रचारक या गृहस्थ के रूप में जुटे हुये है।

स्वामी विवेकानंद के स्वाभिमान से ओतप्रोत इस संगठन ने एक से बढ़ कर एक व्यक्तित्वों को भारतीय समाज को दिये हैं। चार नाम लेना ही बहुत होगा जनसंघ के संस्थापक महामंत्री पं0 दीनदयाल उपाध्याय और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक दतोपंत थेगेडी विश्व हिन्दू परिषद के अन्र्तराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंहल , जो समाज-जीवन के विविधक्षैत्रों में राष्ट्रवादी विचारों से ओतप्रोत संगठनों और विचारों के वाहक रहे हैं।

संघ स्वंय राजनीति नहीं करता मगर वह देशहित से आंख भी नहीं मूंदता है। जब राष्ट्रचिन्तन होगा तो उसमें समाज जीवन भी होगा और राजनैतिक चर्चायें भी होंगी, कमजोरियों और आवश्यकताओं पर विचार भी होगा, सुझाव भी होगा। उनका विमर्श सावचेतना है मार्गदर्शन हे। चीन युद्ध के संकट काल में संघ के स्वंयसेवकों ने पंण्डित जवाहरलाल नेहरू की सरकार को कंधे से कंधा मिला कर सहयोग किया और जवाहरलाल नेहरू ने गणतंत्र दिवस 1963 की परेड में संघ के स्वंयसेवको को राष्ट्रीय परेड में सम्मिलित होने आमंत्रित किया और वे सम्मिलित भी हुये।

आजादी के साथ ही पाकिस्तानी सेना ने कबाईली वेष में कश्मीर पर आक्रमण कर दिया स्वंयसेवकों के रातदिन मेहनत कर भारतीय सेना के लिये हवाई पट्टि बनाई । कोई भी विपदा हो , कोई भी संकट हो सबसे पहले संघ का स्वंयसेवक सहायता को खडा हुआ मिलता है।

हम देखते हैं कि कश्मीर के विलय को पूर्ण बनाने के लिये भारतीय जनसंघ के संस्थापक डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी अपना बलिदान दे देते हैं। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार हो, भाषण हो वाद विवाद संभाषण हो, कविताये हों, राष्ट्रवाद की सरिता निरंतर बहती रही हे। लालकृष्ण आडवाणी श्रीराम जन्म भूमि की स्वतंत्रता के लिये रथ लेकर निकल पड़ते हैं। मुरलीमनोहर जोशी श्रीनगर में भारतीय स्वाभिमान का ध्वज्य फहराने के लिये एकता यात्रा के साथ श्रीनगर पहुच कर, तिरंगा झंडा फहराते हैं। नरेन्द्र मोदी इन दानों यात्राओं में अग्रसर के रूप में सहयोगी थे। वे भयानकतम भ्रष्टाचार एवं प्राणलेवा मंहगाई से जूझ रहे देश को अधोपतन से बाहर निकालने में जुटते हैं पूरे देश में परिश्रम की पराकाष्ठा कर जनजागरण करते हैं।

देश पर विपदा हो संघ और उसका स्वंयसेवक चुप बैठ जाये यह हो ही नहीं सकता , इसीलिये एक बार परमपूज्य सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा था कि हम भाजपा को राख में से भी खडा कर देंगें। यह पूरा भी हुआ अब भारत भाजपा मय हो गया हैं ।

संघ की विचारधारा की जरूरत सिर्फ समाज में हो इतने भर से काम नहीं चलता है बल्कि यह विचारधारा जो भारत का निर्माण करती है, इसकी जरूरत तो राजनीति को ही कहीं अधिक है। यही कारण है कि जनसंघ स्थापना से लेकर आज तक निरंतर संर्घष करता रहा हो मगर वह जनशक्ति में हमेशा प्रिय रहा, हर बार चुनौती में आगे - आगे ही बढता गया, राजनैतिक यात्रा में उसका नामकरण भाजपा भी हो गया मगर विचारधारा जो उसकी पहचान है, उसने उसे 2 सीटों से चलाकर 282 तक पहुंचा दिया। भाजपा की यह विजय यात्रा व्यक्ति की नहीं विचारधारा की है। मगर विचारधारा व्यक्ति का निर्माण करती है । इसलिये विचारधारा और योग्य व्यक्ति दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू हैं।

देश तीन हजार साल से विदेशी आक्रमणकारियों का सामना कर रहा है और हम अपने जीवट से जिन्दा है। मगर स्वतंत्रता के बावजूद गत यूपीए सरकार ने विदेशी हितों की चिन्ता में ही 10 साल बिता दिये। कहीं भी राष्ट्रीय स्वाभिमान के दर्शन नहीं हुये, सैनिकों के सिर सीमा पर कट गये मगर संसद में कायरता की भाषा सुनी गई। चीन ने भारतीय सीमाओं को घूमने फिरने का पार्क बना लिया। रूपये का अवमूल्यन रोकने के बजाये सरकार उसे और धक्का देती नजर आई ताकि विदेशी डालर को फायदा होता रहै। आयात निर्यात में देशहित की चिन्ता विषय ही नहीं रहा, अमरीका के राष्ट्रपति ने मनमोहनसिंह की सराहना इसीलिये की है कि उनके शासन में भारत पर व्हाईट हाउस की नीतियां हावी रहीं।

कांग्रेस ने कभी नहीं सोचा कि द्वितीय विश्वयुद्ध में धूलधूसरित हुये जापान , इटली, जर्मनी और ब्रिटेन तथा हमारे बाद स्वतंत्र चीन, सैन्य और औद्योगिक उन्नती में हमसे हजारों गुना आगे कैसे निकल गये और हम सोते रहे। चीन अमरीका को टक्कर दे रहा है। हम अमरीका से याचना कर रहे हैं। क्यों कि एक विदेशी मूल के व्यक्ति के द्वारा स्थापित कांग्रेस में कभी भी राष्ट्रीय स्वाभिमान नहीं आया। यूपीए का नेतृत्व भी विदेशी मूल की राजनेता के हाथ में था सो उसमें जो भी हुआ भारत और भारतीय संस्कृति को नुकसान पहुचाने वाला ही हुआ। मंहगाई ने हर दिन आम आदमी को मारा, मंहगाई से पीडि़त व्यक्ति हिन्दू ही नहीं मुस्लिम भी था इसाई भी था । महिलाओं ने मंहगाई और रसोई गैस सिलेण्डरों के जो आंसू पिये वह यूपीए को जन विरोधी सरकार करार देने के लिये काफी था। लोकशक्ति ने लोकतंत्र के हित के लिये वर्तमान सत्तारूढ़ कांग्रेस और उसको समर्थन दे रहे मुलायमसिंह, मायावती , लालूप्रसाद, करूणानिधि, शरद पंवार और फारूख अब्दुल्ला सहित ज्यादातर दलों को हांसिये पर डाल दिया।

जब देश और देश की जनशक्ति पर परोक्ष अत्याचार हो रहे हों , शोषण की कोई सीमा ही नहीं बची हो, येशे में एक स्वंयसेवक चुप रह जाये यह संभव नहीं था। अत्याचार का प्रतिकार तो 1948 में भी संघ ने ही किया था, 1952 में जनसंघ ने राष्ट्रहित के लिये पहली बली श्यामाप्रसाद मुखर्जी के रूप में कश्मीर में दी थी। संघ पर तीन प्रतिबंध लगे , आपातकाल लगा , हमेशा ही स्वंयसेवकों ने अन्याय का प्रतिकार किया। जनसंघ का जन्म ही अन्याय के विरूद्ध न्याय पाने के लिये हुआ था। वर्तमान स्थितियों में देश को अन्यायाी सरकार के विरूद्ध न्याय की जरूरत थी।

नरेन्द्र मोदी के रूप में राजनैतिक क्षैत्र में कार्यरत एक स्वंयसेवक सिर पर संकल्प का साफा बांध कर निकला और पूरी तरह विफल हो चुकी सरकार को सिंहासन से च्युत करके ही दम लेता है। आज विचारधारा की इस विजययात्रा पर सहज ही मन कहता है। केशव की जय जय - माधव की जय जय । केशव माधव की जय जय । देश के लोकतंत्र में भगवा वातावरण इस तरह का है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक , अरूणाचल से लेकर राजस्थान तक हर ओर भाजपा ही भाजपा जीत लिये हुये खडी है। संघ की शाखाओं में एक गीत ओर भी सुनाई देता है तो उसके मार्गदर्शी परमपूज्य संस्थापक डाॅ केशवबलीराम हेडगेवारजी को सर्मपित है। केशव माधव की दिखाई डगर ने ही यह ऐतिहासिक सुअवसर भारत को प्रदान किया है।

हमें वीर केशव मिले आप जबसे,
नयी साधना की डगर मिल गयी है ॥

भवदीय
अरविन्द सिसोदिया, जिला उपाध्यक्ष भाजपा
जिला कोटा देहात।
09509559131 एवं 09414180151



शुक्रवार, 13 जून 2014

समाज के सहयोग से ही साकार परिवर्तन - परम पूज्य डॉ0 मोहनजी भागवत



समाज के सहयोग से ही साकार परिवर्तन
- परम पूज्य  डॉ0  मोहनजी भागवत

राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ के तृतीय संघ शिक्षा  वर्ग के समापन कार्यक्रम में स्वंयसेवकों को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख सरसंघचालक परमपूज्य डा0 मोहन जी भागवत ने कहा कि आज भी शिवाजी के यश  गाथा हम सुनते है और शिवाजी को बड़ी शिद्दत  के साथ स्वीकार करते है इसका कारण यह है कि देश  को शिवाजी के रूप में एक उत्तम शासक मिला। शिवाजी के राज में न्यायपूर्ण, समतायूक्त और शोषणमुक्त  शासन था।शिवाजी का शासन अनुशासन पर कड़ाई से चलने वाला शासन था। शिवाजी का शासन दीन दुखियो के भलाई से काम करने वाला शासन था।

परम पूज्य मोहन जी भागवत ने कहा कि अब लोगों को लगने लगा है कि देश के अच्छे दिन आने वाले है। देश के आम जन को  इस सरकार से काफी उम्मीद है। इस बार सब लोगो ने विचार किया। अपने मन को  सुना। इस सरकार को देखकर लगता है कि सरकार का इरादा पक्का है। सिर्फ सरकार से ही  नहीं होगा। संपूर्ण देश को जगाना होगा। संपूर्ण देशवासियों को जगाने के लिए सबको जागृत करना होगा।

परम पूज्य भागवत  जी ने कहा कि हमारा देश मानवता को मानने वाला है।

        संघ प्रमुख ने कहा कि संघ के पास कोई रिमोट कट्रोल नहीं है। संघ प्रत्येक व्यक्ति के अंदर अनुशासन पैदा करता है। संघ का काम शक्ति सम्पन्न, शील सम्पन्न और वैभव सम्पन्न राष्ट्र  का निर्माण करना है। विविधता में एकता देखकर और संपूर्ण समाज को अपना मानकर काम करने वाले देशवासियों की जरूरत है। संघ यही काम करता है। प्रत्येक व्यक्ति के आँख  में अपने देश के प्रति गौरव की दृष्टि  पैदा करता है। 

श्री भागवत ने कहा कि देश के लिए आवश्यकता होने पर  मर मिटने वाले युवाओं का निर्माण संघ करता है लेकिन आज मरने का  नहीे देश के लिए जीने का समय है। श्री भागवत ने कहा कि सुनामी हो या चुनाव हो संघ के स्वंयसेवक  सबसे पहले पहुचने लगा है। परिवर्तन आया है लेकिन सिर्फ सरकार बदलने से कुछ नहीं होगा। समाज अगर परिवर्तन के लिए तैयार नहीे है तो सरकार से कुछ  होना नहीं है। समाज को परिवर्तन के लिए खुद को तैयार करना होगा। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री श्री रविशंकर थे।

एलपीजी के दाम में नहीं होगी बढ़ोत्तरी: पेट्रोलियम मंत्री धमेंद्र प्रधान




एलपीजी के दाम में नहीं होगी बढ़ोत्तरी: पेट्रोलियम मंत्री
http://www.samaylive.com
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धमेंद्र प्रधान ने कहा कि रसोई गैस (एलपीजी) में कोई बढ़ोत्तरी नहीं होगी और सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या व मूल्य यथावत रहेंगे. पटना पहुंचे प्रधान से रसोई गैस सिलेंडर पर देय सब्सिडी समाप्त किए जाने तथा इस कारण उसकी कीमत लगभग दोगुनी होने की चर्चा के बारे में पूछा गया था. इस पर उन्होंने कहा कि एलपीजी के दाम में कोई वृद्धि नहीं होगी और सब्सिडी वाला रसोई गैस सिलेंडर जितनी कीमत व मात्रा में मिल रहा है, सरकार उसे जारी रखेगी.

उन्होंने कहा कि बिहार में एलपीजी के कनेक्शन अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम मात्र 26 प्रतिशत हैं जो कि देश के अन्य राज्यों में 45 से 50 प्रतिशत है.पेट्रोल एवं डीजल के दाम के बारे में धमेंद्र ने कहा कि यह बड़े मुद्दे हैं और केंद्र सरकार उनपर ध्यान दे रही है.


उन्होंने कहा कि वर्ष 2006 से बाजार मूल्य तंत्र से जुडने के बाद पेट्रोल के दाम सरकार के नियंत्रण के बाहर हैं. डीजल मूल्य अब भी सब्सिडी के साथ नियंतण्रमें है. देश में तेल और प्राकृतिक गैस उत्पानदन में वृद्धि की जरूरत है. मंत्री ने कहा कि नीति ऐसी होनी चाहिए कि न तो सरकार और न ही किसान और जनता बोझ महसूस करें.

केंद्रीय मंत्री बनने पर पहली बार पटना पहुंचे धमेंद्र का भाजपा की प्रदेश इकाई के द्वारा अभिवादन किया गया.
पेट्रोलियम मंत्री ने इंडियन आयल कापरेरेशन के अधिकारियों के साथ यहां बैठक की और बिहार में तेल और गैस की स्थिति के बारे में जानकारी हासिल की.

उन्होंने कहा कि उनके विभाग से संबंधित बिहार के बरौनी स्थित रिफाईनरी की स्थिति तथा पश्चिम बंगाल के हल्दिया से बिहार के जगदीशपुर तक गैस पाईपलाईन की समीक्षा की जाएगी.

बुधवार, 11 जून 2014

'कुशल भारत' की छवि बनानी होगी: नरेंद्र मोदी



'कुशल भारत' की छवि बनानी होगी: नरेंद्र मोदी
(भाषा)
http://www.jansatta.com
नई दिल्ली। हाशिए पर खिसके विपक्ष की ओर दोस्ताना हाथ बढ़ाते हुए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज कहा कि वह निर्णय लेने की प्रक्रिया में विपक्ष को साथ लेकर चलेंगे और मुसलमानों सहित सभी वर्गों के विकास के लिए कार्य करेंगे। संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के जवाब के रूप में अपने पहले भाषण में मोदी ने कहा कि विजय कई सबक देती है। उन्होंने आलोचनाओं का स्वागत किया ताकि उनकी सरकार अहंकारी होने से बच सके।

मोदी ने विपक्ष से कहा कि पूर्व की कड़वाहट भूल जाइए। हमें देश के विकास के लिए मिलकर कार्य करना है। हम बदलाव ला सकते हैं। ‘‘मैं आपके (विपक्ष के) बिना आगे नहीं बढ़ना चाहता। मैं संख्या के आधार पर नहीं बल्कि सामूहिक निर्णय करने के आधार पर आगे बढ़ना चाहता हूं।’’
मोदी ने कहा कि उन्हें वरिष्ठों यहां तक कि विपक्ष के वरिष्ठों का भी मार्गदर्शन चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि उनकी ओर से किसी गलत शब्द का इस्तेमाल हो गया तो उन्हें माफ कर दिया जाए। लेकिन साथ ही वह सदन में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडगे की चुटकी लेने से नहीं चूके। खडगे ने भाजपा को स्मरण कराया था कि पांडवों की तरह कांग्रेस सत्ता में वापसी करेगी और अधिक संख्या होने के बावजूद कौरव पांडवों को हरा नहीं पाए थे।
मोदी ने सत्ता पक्ष के सदस्यों की मेजों की थपथपाहट के बीच कहा कि सदन में कल महाभारत का जिक्र किया गया था। ‘‘एक बार दुर्योधन से पूछा गया कि धर्म अधर्म, सच और झूठ की समझ है या नहीं। दुर्योधन ने जवाब दिया कि वह धर्म को जानता है लेकिन वह उसकी प्रवृत्ति नहीं है। सच क्या है मुझे पता है लेकिन वो मेरे डीएनए में नहीं है।’’
मुस्लिम समुदाय के उत्थान की बात करते हुए मोदी ने कहा, जब मैं छोटा था तो देखा था कि एक मुसलमान भाई साइकिल रिपेयरिंग करता था और आज उसकी तीसरी पीढ़ी का बेटा भी साइकिल रिपेयरिंग करता है, बदलाव करना होगा। शरीर का अगर एक अंग विकलांग हो तो शरीर स्वस्थ नहीं हो सकता है। समाज का कोई एक अंग दुर्बल रहा तो समाज सशक्त नहीं हो सकता है। इस मूलभूत भावना से काम करना है और हम प्रतिबद्ध हैं। हमारे देश में विकास की एक नई परिभाषा की आवश्यकता है।’’
मोदी ने कहा कि राजनीतिक दलों को अब हार और जीत से ऊपर उठना चाहिए और जनादेश से सही सीख चाहिए। हर किसी को विजय और पराजय से सीख लेनी चाहिए। जो विजय से सीख नहीं लेते, वे पराजय का बीज बोते हैं और जो पराजय से सीख नहीं लेते वह विनाश के बीज बोते हैं।’’
चुनावी भाषणों में अपने पसंदीदा विषय को छूते हुए उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामलों का जिक्र किया और कहा कि ऐसे मामलों में मुकदमा तेजी से चलाने की आवश्यकता है ताकि दोषियों को दंडित किया जा सके और निर्दोष की रक्षा हो सके। उन्होंने कहा, ‘‘कानून का डर होना चाहिए।’’
अभिभाषण में ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के नारे की कांग्रेस द्वारा आलोचना का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा कि भारत विविधता में एकता वाली भूमि है और इस नारे के पीछे भावना ये थी कि जनता और दलों को विभाजन की भाषा छोड़कर एकता की भाषा अपनानी चाहिए।
मोदी ने देश के विकास के लिए देखे गए सपनों की जिक्र किया और ‘स्कैम इंडिया’ (घोटालों के भारत) की जगह ‘स्किल्स इंडिया’ (कुशल भारत) की छवि बनाने की चर्चा की। कृषि और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों को सुधारने के बारे में उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में यदि किसी राज्य में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है तो उसे अपनाया जाएगा।
मोदी ने कहा कि उनकी सरकार की शीर्ष प्राथमिकता गरीबों का उन्नयन होगी। सरकार सुनिश्चित करेगी कि देश की आजादी की 75वीं वर्षगांठ 2022 तक देश के हर परिवार के पास पक्का मकान हो, जिसमें बिजली, पानी और शौचालय हो। महात्मा गांधी का जिक्र कई बार करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘आइए हम सपने देखें और उन सपनों को पूरा करने का प्रयास करें। कठिनाइयां आएंगी लेकिन आपके (विपक्ष के) सहयोग से हम आगे बढ़ेंगे।’’
राज्यों को भी पूरा भरोसा देते हुए मोदी ने कहा कि हम (राज्यों के प्रति) ‘‘बड़े भाई’’ वाले नजरिए में यकीन नहीं करते। हम सहयोगात्मक संघवाद में यकीन करते हैं।’’
कुछ सदस्यों ने सवाल किया था कि अभिभाषण में दिए गए एजेंडा को पूरा कैसे किया जाएगा। इस पर मोदी ने कहा कि इतने वर्षों से छायी निराशा से चलते ऐसी आशंकाएं उठना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि जब वह 2001 में पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे तो भी ऐसी आशंकाएं और सवाल थे लेकिन उन्होंने दिखा दिया कि ये सब कुछ किया जा सकता है। ‘‘राष्ट्रपति ने जो रोडमैप दिया है, उसे अमल में लाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी जाएगी।’’
उन्होंने कहा कि देश के कई वर्ग विकास की प्रक्रिया में पीछे छूट गए हैं। ‘‘मैं आरोप नहीं लगा रहा हूं कि किसी सरकार ने पिछड़े वर्ग, आदिवासियों आदि के जीवन में परिवर्तन लाने की कोशिश नहीं की। धन खर्च किया गया लेकिन कोई परिवर्तन नहीं आया।’’ साथ ही कहा कि इसे बदलना होगा।
उत्तर प्रदेश के बदायूं सहित हाल की बलात्कार की कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार किसके लिए होनी चाहिए। पढ़े-लिखे लोगों के लिए या फिर गरीबों के लिए। साथ ही बोले कि सरकार गरीबों के लिए होनी चाहिए। सरकार की सबसे बडी जिम्मेदारी है कि वह गरीबों की सुने और उनके लिए कार्य करे। यदि हमने गरीबों के लिए कार्य नहीं किया तो जनता हमें कभी माफ नहीं करेगी।
मोदी ने कहा कि सारी शासन व्यवस्थाएं गरीब को सशक्त बनाने के काम आनी चाहिए। अगर हम आखिरी छोर पर बैठे इंसान के काम आए तब जाकर उसका कल्याण कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि हम सदियों से कहते आए हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है, गांवों का देश है। ये नारे तो अच्छे लगते हैं, सुनना भी अच्छा लगता। ‘‘क्या हम आज अपने सीने पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि हम अपने गांवों के जीवन को बदल पाए हैं, किसानों के जीवन को बदल पाए हैं। यहां मैं किसी सरकार की आलोचना करने को नहीं खड़ा हूं।’’
मोदी ने कहा कि भारत के गांवों का जीवन बदलना हम सबका सामूहिक दायित्व है। गांव की पहचान गांव की आत्मा में बंधी हुई है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि गांव को आधुनिक सुविधाएं दें तो गांव इस देश की प्रगति में ज्यादा योगदान करेगा। उन्होंने गांवों को 24 घंटे बिजली, इंटरनेट कनेक्टिविटी और अन्य सुविधाएं देने की प्रतिबद्धता व्यक्त की ताकि ग्रामीण युवा शिक्षा और रोजगार हासिल कर सकें और उन्हें अपना घर छोड़कर अन्यत्र न जाना पड़े। इस कड़ी में उन्होंने सिक्किम का उदाहरण देते हुए कहा कि सिक्किम छोटा सा राज्य है। छोटे से राज्य ने बहुत बड़ा काम किया है। सिक्किम हिन्दुस्तान के लिए गौरव देने वाला ‘ऑर्गेनिक स्टेट’ बनने जा रहा है। वहां हर उत्पादन ‘ऑर्गेनिक’ होने जा रहा है।
मोदी ने कहा कि सभी पूर्वोत्तर राज्यों को ऑर्गेनिक स्टेट के रूप में कैसे उभार सकते हैं, ये सोचना होगा। ऑर्गेनिक खाद्य वस्तुओं के विश्व बाजार पर कब्जे के लिए भारत सरकार की ओर से उनकी मदद हो तो उनके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव आएगा।


मंगलवार, 10 जून 2014

हिन्दू साम्राज्य दिवस : स्वराज्य और सुशासन की विरासत - रमेश पतंगे



हिन्दू साम्राज्य  दिवस : ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी
छत्रपति शिवाजी का राज्यभिषेक दिवस
तारीख: 09 Jun 2014 13:18:53
हिन्दू साम्राज्य दिवस पर विशेष 
http://www.panchjanya.com

पाञ्चजन्य से 

स्वराज्य और सुशासन की विरासत
 - रमेश पतंगे


छत्रपति शिवाजी महाराज ने 340 साल पहले स्वराज्य, स्वधर्म, स्वभाषा और स्वदेश के पुनरुत्थान के लिए जो कार्य किया, उसकी तुलना नहीं हो सकती। उनका राज्याभिषेक एक व्यक्ति को राजसिंहासन पर बैठाने तक सीमित नहीं था। शिवाजी महाराज एक व्यक्ति नहीं थे, वे एक सोच थे, वे एक विचार थे, वे एक युगप्रवर्तन के शिल्पकार थे। भारत एक सनातन देश है, यह हिन्दुस्थान है, तुर्कस्थान नहीं, और यहां पर अपना राज होना चाहिए। 

ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक समारोह रायगढ़ किले पर संपन्न हुआ। तारीख 6 जून 1674, आज इस घटना को तीन सौ चालीस साल हो रहे हैं। शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक एक युगप्रवर्त्तक घटना थी। महाराजा पृथ्वीराज चौहान के बाद भारत से हिन्दू शासन लगभग समाप्त हो चुका था। दिल्ली में मुगलों की सल्तनत थी, और दक्षिण में आदिलशाही, कुतुबशाही आदि मुस्लिम राजा राज्य कर रहे थे। सभी जगह इनके सरदार-सेनापति हिन्दू ही रहा करते थे। मतलब यह हुआ कि, हिन्दू सेनाप्रमुखों ने ही हिन्दुओं को गुलाम किया और उन पर विदेशी मुसलमानों की सल्तनत बिठा दी।
शिवाजी महाराज उस जमाने में एक ऐसे युगपुरुष हो गये, जिन्होंने विदेशी सल्तनत से खुद को अलग रखा और अपना स्वतंत्र राज्य निर्माण किया। उनके समकालीन सभासद राज्याभिषेक के संदर्भ में लिखते हैं-'येणे प्रमाणे राजे सिंहासनारूढ़ जाले.या युगी सर्व पृथ्वीवर म्लेच्छ बादशाह मन्हाटा पातशहा येवढा छत्रपति जाला ही गोष्ट काही सामान्य जाली नहीं' मतलब भारत भर में म्लेच्छ राजा थे, उनको चुनौती देकर शिवाजी ने अपना स्वतंत्र राज्य निर्माण किया। यह घटना सामान्य नहीं थी।
जब देश परतंत्र हो जाता है तब लोग शासनकर्ता जमात का अनुकरण और अनुसरण करने लगते हैं। समाज का नेतृत्व करने वाले विद्वज्जन, सेनानी, राजधुरंधर परानुकरण में धन्यता मानने लगते हैं। समाज भी इन्हीं लोगों का अनुकरण करता रहता है। धर्म को ग्लानि आती है, परधर्म में जाने वालों की संख्या बढ़ती रहती है। अपने जीवनादर्श से लोग दूर होते रहते हैं। दिल्लीश्वर ही जगदीश्वर हंै, ऐसी भावना पनपने लगती है।
भाषा का विकास अवरुद्ध हो जाता है। परकीय भाषा का बोलबाला होता रहता है। मुगल शासन के काल में अरबी, पारसी, तुर्की भाषा का प्रयोग भारत में होने लगा। राजव्यवहार की भी यही भाषा रही। समर्थ रामदास स्वामी ने इस परानुकरण वृत्ति को इन शब्दों में वर्णित किया है,

'कित्येक दावलमलकास जाती। 
कित्येक पिरास भजती।
कित्येक तुरुक होती। आपुल्या इच्छेने।'
ब्राह्मण बुद्धिपासून चेवले। 
आचारापासून भ्रष्टले।
गुरुत्व सांडुन झाले। शिष्य शिष्यांचे।
राज्यनेले म्लेच्छ क्षेत्री। गुरुत्व गेले कुपात्री।
आपण अरत्री ना परत्री। काहीच नाही।।

इसका सारांश ऐसा है कि,स्वेच्छा से कोई पीर भक्त बन गये हैं, तो कोई मुसलमान बन रहे हैं। समाज का बौद्धिक नेतृत्व ब्राह्मणों को करना चाहिए, लेकिन वे भ्रष्ट हो गये हैं। राज्य म्लेच्छों के हाथों में गया, और समाज के गुरु कुपात्र व्यक्ति बन गये हैं। जब भारत में अंग्रेजों का शासन आया, तब यही स्थिति बनी रही। अंग्रेजों के काल में अंग्रेजी भाषा का प्रभाव बढ़ा, ईसाइयत का प्रभाव बढ़ा, और लोग ईसाई बनने लगे। स्वतंत्रता के बाद भी, गोरे अंग्रेज चले गये और काले अंग्रेजों का राज शुरू हुआ। परिस्थिति में कोई मौलिक अंतर नहीं आया। अंग्रेजी भाषा का प्रभाव वैसे ही बना रहा और ईसाई बनने की होड़ पहले जैसी ही बनी रही।


प्रजा के जो धार्मिक कर्मकांड हैं उनको राज्य की ओर से यथाशक्ति मदद भी करनी चाहिए। न्याय सबके लिए समान होना चाहिए। जो उच्च पदस्थ है, उसके लिए एक न्याय और जो सामान्य है, उसके लिए दूसरा न्याय यह अधर्म है। छत्रपति शिवाजी महाराज  हिन्दू राजनीति के सिद्धांत अपने राजव्यवहार में कड़ाई से लाए।

छत्रपति शिवाजी महाराज ने 340 साल पहले स्वराज्य, स्वधर्म, स्वभाषा और स्वदेश के पुनरुत्थान के लिए जो कार्य किया, उसकी तुलना नहीं हो सकती। उनका राज्याभिषेक एक व्यक्ति को राजसिंहासन पर बिठाने तक सीमित नहीं था। शिवाजी महाराज एक व्यक्ति नहीं थे, वे एक सोच थे, वे एक विचार थे, वे एक युगप्रवर्तन के शिल्पकार थे। भारत एक सनातन देश है, यह हिन्दुस्थान है, तुर्कस्थान नहीं, और यहां पर अपना राज होना चाहिए। अपने धर्म का विकास होना चाहिए, अपने जीवनमूल्यों को चरितार्थ करना चाहिए। अपने धर्म का विकास होना चाहिए। शिवाजी महाराज का जीवन संघर्ष इसी सोच को प्रस्थापित करने के लिए था। वे बार-बार कहा करते थे कि, 'यह राज्य हो, यह परमेश्वर की इच्छा है। मतलब स्वराज्य संस्थापना ईश्वरीय कार्य है,मैं ईश्वरीय कार्य का केवल एक सिपाही हूं।'

ईश्वरीय कार्य की प्रेरणा उन्होंने अपने सभी सहकर्मियों में निर्माण की। हमें लड़ना है, लड़ाई जीतनी है, वह किसी एक व्यक्ति के सम्मान के लिए नहीं, तो ईश्वरीय कार्य की पूर्ति के लिए हमको लड़ना है। जब यह भाव जीवन का एक अविभाज्य अंग बनता है, तब हर एक व्यक्ति में सहस्र हाथियों का बल निर्माण होता है। पन्हाल गढ़ से शिवाजी महाराज सिद्दी जौहर को चकमा देकर विशालगढ़ की ओर जा रहे थे, सिद्दी जौहर को पता लगा और उसने महाराज का पीछा किया। रास्ते में एक दुर्गम रास्ता आता है, जिसे मराठी में घोड़ खिंड बोलते हैं, जहां से दो-तीन व्यक्ति ही जा सकते हैं। उस घाटी में बाजी देशपांडे ने अपने चंद साथियों से जो लड़ाई दी है, उसकी तुलना अन्य किसी लड़ाई से नहीं हो सकती है। हजारों की सेना को उसने रोक कर रखा और अंत में वे धराशायी हो गये। उन्होंने अपने प्राण तब तक रोक के रखे थे जब तक विशालगढ़ से शिवाजी महाराज के सुखरूप पहुंचने के संकेत रूप में तोपों की आवाज नहीं आयी थी। एक व्यक्ति और उनके साथियों में इस प्रकार का दशसहस्र हाथी बल कार्य की ईश्वरीय निष्ठा के कारण ही उत्पन्न हुआ था।
तंत्र के मूलभूत सिद्धांत कभी बदलते नहीं, उन सिद्धांतों को आज की परिस्थिति में किस प्रकार क्रियान्वित किया जा सकता है, इस पर विचार करना चाहिए, और उसको अमल में लाना चाहिए। सुराज्य और सुशासन की विरासत छत्रपति शिवाजी महाराज ने हमको दी है, उस विरासत को अब हमको अपने राष्ट्र जीवन में लाना पड़ेगा। अपना सेनादल स्वयं पूर्ण रहे, इस पर छत्रपति शिवाजी महाराज काफी ध्यान दिया करते थे। तोपें बनाने का कारखाना उन्होंने बनाया था, गोला बारूद बनाने का उपक्रम उन्होंने शुरू किया था।

 छत्रपति शिवाजी महाराज का शासन भोंसले घराने का शासन नहीं था। उन्होंने परिवार वाद को राजनीति में स्थान नहीं दिया। उनका शासन सही अर्थ में प्रजा का शासन था। शासन में सभी की सहभागिता रहती थी। सामान्य मछुआरों से लेकर वेदशास्त्र में पारंगत पंडित सभी उनके राज्य शासन में सहभागी थे। छुआछूत का कोई स्थान नहीं था। पन्हालगढ़ की घेराबंदी में नकली शिवाजी जो बने थे, उनका नाम था, शिवा काशिद जो वो जाति से नाई थे। अफजल खान के समर प्रसंग में शिवाजी के प्राणों की रक्षा करने वाला जीवा महाला था। और आगरा की कैद में उनकी सेवा करने वाला मदारी वाल्मीकी समाज से था। उनके किलेदार सभी जाति के रहते थे। महाराज का एक नियम था कि, सूरज ढलने के बाद किले के दरवाजे बंद करने चाहिए और किसी भी  हालत में किले के अंदर प्रवेश नहीं देना चाहिए। बड़ी कड़ाई से इस नियम का पालन किया जाता था। सीमा की सुरक्षा इसी प्रकार रखनी पड़ती थी। अवांछित लोगों को प्रवेश करने नहीं देना चाहिए। आज भारत में बंगलादेशी अपनी इच्छा से घुसपैठ करते रहते है, और उनकी मदद सीमा की रक्षा करने वाले ही करते हैं।
महाराष्ट्र के श्रेष्ठ इतिहासकार न.र.फाटकजी ने एक किस्सा सुनाया। पुणे के पास के किले पर कुछ तरुण गये थे। किलेदार बूढ़ा हो गया था, और वह बुरूज पर खड़े रहकर उपर से चावल के दाने नीचे डाल रहा था (मराठी में उसे अक्षता कहते हैं) युवकों ने उनसे पूछा, 'चाचाजी यह आप क्या कर रहो हो? ' किलेदार ने कहा,'नीचे गांव में मेरे पोते की शादी है, इसलिए मैं उपर से मंगल अक्षता डाल रहा हूं। मैं किले का किलेदार हूं, और महाराज की आज्ञा थी कि, किलेदार को बिना अनुमति अपना किला नहीं छोड़ना चाहिए। अब महाराज नहीं है, अनुमति किससे मांगें? लेकिन महाराज के नियम को मैं तोड़ नहीं सकता।' शिवाजी महाराज ने क्या परिवर्तन किया, कैसी निष्ठा निर्माण की, इसका यह अत्यंत सुंदर उदाहरण है।

शिवाजी महाराज ने मुसलमानी शासनकाल में लुप्त हो रही हिन्दू राजनीति को फिर से पुनर्जीवित किया। हिन्दू राजनीति की विशेषता क्या है? पहली विशेषता यह है कि यह राजनीति धर्म के आधार पर चलती है। यहां धर्म का मतलब राजधर्म है। राजा का धर्म प्रजा का पालन, प्रजा का रक्षण और प्रजा का संवर्धन है। राजा, हिन्दू राजनीति के सिद्धांतों के अनुसार उपभोगशून्य स्वामी है। प्रजा उनके लिए अपनी संतान के समान है। राज्य में कोई भूखा न रहे, किसी पर अन्याय न हो, इसकी चिंता उसे करनी चाहिए। प्रजा अपनी रुचि के अनुसार उपासना पद्धति का अवलंबन करती है, राजा को प्रजा को सब प्रकार का उपासना स्वातंत्र्य देना चाहिए। प्रजा के जो धार्मिक कर्मकांड हैं उनको राज्य की ओर से यथाशक्ति मदद भी करनी चाहिए। न्याय सबके लिए समान होना चाहिए, जो उच्चपदस्थ है, उसके लिए एक न्याय और जो सामान्य है, उसके लिए दूसरा न्याय यह अधर्म है। छत्रपति शिवाजी महाराज हिन्दू राजनीति के सिद्धांत अपने राजव्यवहार में कड़ाई से लाए।

उनके मामाजी ने भ्रष्टाचार किया, शिवाजी महाराज ने उनको अपने पद से मुक्त किया, और अपने देश के बाहर निकाल दिया। बेटे संभाजी ने कुछ अपराध किया, उसे बंदी बनाकर पन्हाल गढ़ पर रख दिया। रांझा के पाटिल ने एक युवती पर बलात्कार किया, उसके हाथ पैर काटने की सजा दी। विजय दुर्ग समुंदर में किला बनाने का काम चल रहा था। इस काम में एक ब्राह्मण शासकीय अधिकारी ने सामग्री पहुंचाने में अक्षम्य विलंब किया। महाराज ने उनको खत लिखकर कहा कि, आप ब्राह्मण हैं, इसलिए आपको सजा नहीं होगी, इस भ्रम में मत रहना। आपने शासकीय काम सही ढंग से नहीं किया, इसलिए आपको सजा मिलेगी। छत्रपति शिवाजी महाराज गो ब्राह्मण जाति के प्रतिपालक थे। ब्राह्मण शब्द का अर्थ होता है, धर्म का अवलंबन करने वाला, विधि को जानने वाला। आज की परिभाषा में कहना हो तो, महाराज यह कहते हैं कि यह राज्य कानून के अनुसार चलेगा।

छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दू धर्म की रक्षा का बीड़ा उठाया था, इसका मतलब यह नहीं कि वे इस्लाम के दुश्मन थे। उन्होंने कभी भी कुरान की अवमानना नहीं की, न कोई मस्जिद गिरायी, न किसी फकीर को फांसी के फंदे पर चढ़ाया। उनका नौदल प्रमुख मुसलमान था। लेकिन वे धर्म की आड़ में अगर कोई हिन्दू धर्म पर आघात करता दिखाई देता, तो वे उसे नहीं छोड़ते थे। शेजवलकर नाम के विख्यात इतिहासकार थे, उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज पर काफी लेख किया है।

गोवा में शिवाजी महाराज की जब सवारी हुई तब कुछ ईसाई मिशनरी पकड़े गये। ये ईसाई मिशनरी डरा धमकाकर हिन्दुओं का मतान्तरण करते थे। शिवाजी महाराज ने उनसे कहा कि यह काम आप छोड़ दीजिए। तब उन्होंने उत्तर दिया कि मतान्तरण करना यह हमारी धर्माज्ञा है, उस पर महाराज ने कहा, अगर ऐसा है तो, हमारी धर्माज्ञा ऐसी है कि, जो मतान्तरण करेगा उसकी गर्दन काट देनी चाहिए और शिवाजी महाराज ने दो मिशनरियों की गर्दन काट दी। सर्वधर्म समभाव का मतलब भोले-भाले हिन्दुओं को डरा धमकाकर ईसाई या मुसलमान बनाना नहीं, यह काम अधर्म का काम है। हिन्दू धर्म के खिलाफ काम है, इसलिए ऐसे काम करने वालों से किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, इसका एक उदाहरण छत्रपति शिवाजी महाराज ने दिया है।
हम सब शिवाजी महाराज की लड़ाईयों को जानते हैं, लेकिन यह नहीं जानते हैं कि लगभग 36 साल तक उन्होंने राजकाज किया, और उसमें से केवल 6 साल भिन्न-भिन्न लड़ाइयों में उन्होंने बिताए। तीस साल तक वे एक आदर्श शासन की नींव रखने में कार्यरत थे। आज के पारिभाषिक शब्द हैं, सुशासन, विकास, विकास में सबका सहयोग, राष्ट्रीय संपत्ति का समान वितरण, दुर्बलों का सबलीकरण इत्यादि। छत्रपति शिवाजी महाराज ने यह कार्य कैसे करना चाहिए, इसका मानो एक ब्ल्यू प्रिंट हमारे सामने रखा है। अब तक के शासनकाल में दुर्भाग्य से इस पर जितना ध्यान देना चाहिए, इसका जितना अभ्यास करना चाहिए, उतना नहीं हो पाया, लेकिन अब शिवाजी महाराज की इस ब्ल्यू प्रिंट को राष्ट्र जीवन में उतारने का समय आया है, ऐसा लगता है।
राष्ट्र की शक्ति के अनेक अंग होते हैं, उसमें सबसे महत्वपूर्ण अंग सामाजिक ऐक्य भावना का होता है। दूसरा महत्व का अंग उसकी अर्थनीति का होता है। तीसरा महत्व का
अंग उसकी परराष्ट्रनीति का होता है, और

चौथा महत्व का अंग उसकी सैन्य शक्ति का होता है। शिवाजी महाराज ने उस काल की शब्दावली के अनुसार, 'मराठा तितुका मेहलावा, आपुला महाराष्ट्र धर्म वाढवावा।' इस उक्ति को चरितार्थ किया है। यहां पर मराठा का मतलब हिन्दू है और महाराष्ट्र धर्म का मतलब हिन्दू धर्म ही है।
अपना स्वराज्य आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी, और सशक्त बने इसकी ओर शिवाजी महाराज का हमेशा ध्यान रहता था। काश्तकारों को वे मदद देते रहते थे। यह मदद कभी भी नकद राशि के रूप में नहीं दी जाती थी। काश्तकारों को औजार, बीज, बैल आदि साधनों के रूप में मदद दी जाती थी। महाराज का सख्त आदेश रहता था कि, सेना दल को लगने वाली वस्तु, धान्य बाजार में जाकर खरीदनी चाहिए। काश्तकारों से जबरदस्ती वसूल नहीं करनी चाहिए, यदि कोई जबरदस्ती करने की हिम्मत करता तो उसे कड़ी सजा मिलती थी। आज हम देखते हैं कि चौराहे पर खड़ा पुलिस वाला पान ठेले से, पटरी वालों सेे, चायवाले से,होटल से फोकट का माल लेता है, शिवाजी महाराज ऐसी लूट को बर्दाश्त नहीं करते थे।

अपना सेनादल स्वयंपूर्ण रहे, इस पर छत्रपति शिवाजी महाराज काफी ध्यान दिया करते थे। तोपें बनाने का कारखाना उन्होंने बनाया था। गोला बारूद बनाने का उपक्रम उन्होंने शुरू किया था। अच्छे घोड़ों की पैदाइश हो इस पर उनका ध्यान रहता था। उस समय के लोहे के शस्त्र अपने देश के अंदर ही निर्माण हों, ऐसा उन्होंने प्रयास किया। अंग्रेजों ने उनको अच्छे सिक्के बनाने का एक सुझाव दिया था- मेटलिक कॉईन्स, महाराज ने यह सुझाव ठुकरा दिया और कहा कि, हमारे देसी कारीगर ही सिक्के तैयार करेंगे। राज व्यवहार भाषा का कोष उन्होंने तैयार किया और राज व्यवहार से पारसी, अरबी भाषा को निकाल दिया।

छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का स्मरण केवल इतिहास का स्मरण नहीं है,अपने राष्ट्र ने अभी करवट बदली है। एक नयी जागृति और नयी चेतना का कालखंड आया है। हमारा राष्ट्र सनातन राष्ट्र है। हमारी अपनी विशेषताएं हैं, हमारा अपना जीवनदर्शन है, हमारी अपनी राजनीतिक सोच है, इन सबको पुनरुज्जीवित करने का कालखंड आया है। हजारों साल तक हम विदेशी लोगों के प्रभाव में रहे, स्वतंत्रता मिलने के बाद भी हमने अपने स्व की कभी खोज नहीं की, हम स्वतंत्र होकर भी तंत्र से परतंत्र रहे। अब सही अर्थ में हमको स्व का बोध करना है, स्व तंत्र की खोज करनी है। काल बदलता है, संदर्भ बदलते हैं, परिस्थिति बदलती है इसलिए छत्रपति शिवाजी की नकल नहीं की जा सकती, नकल करने की आवश्यकता भी नहीं, लेकिन शिवाजी महाराज के तंत्र का हम अभ्यास कर सकते हैं।

तंत्र के मूलभूत सिद्धांत कभी बदलते नहीं, उन सिद्धांतों की आज के परिस्थिति में किस प्रकार क्रियान्वित किया जा सकता है, इस पर विचार करना चाहिए, और उसको अमल में लाना चाहिए। सुराज और सुशासन की विरासत छत्रपति शिवाजी महाराज ने हमको दी है, उस विरासत को अब हमको अपने राष्ट्र जीवन में लाना पड़ेगा।



प्रजा के जो धार्मिक कर्मकांड हैं उनको राज्य की ओर से यथाशक्ति मदद भी करनी चाहिए। न्याय सबके लिए समान होना चाहिए। जो उच्च पदस्थ है, उसके लिए एक न्याय और जो सामान्य है, उसके लिए दूसरा न्याय यह अधर्म है। छत्रपति शिवाजी महाराज  हिन्दू राजनीति के सिद्धांत अपने राजव्यवहार में कड़ाई से लाए।