रविवार, 1 जून 2014

राष्ट्रीय विचारधारा की पूर्ण विजय




चिंतन : पूर्ण विजय की ओर

तारीख: 31 May 2014
- रमेश पतंगे -
16वीं लोकसभा के चुनावों का आखिरी चरण समाप्त होने के बाद पूरे देश में एक ही सवाल था, ये मोदी की लहर है या सुनामी? ये मोदी लहर थी, इस बारे में दो राय नहीं थी। हरेक राज्य में मतदान प्रतिशत बढ़ा है इससे यह अंदाजा लगा है कि देश भर में मोदी सुनामी थी। चुनाव परिणाम ने उस पर मुहर लगा दी है।
नरेंद्र मोदी की विजय क्यों हुई है, इस बारे में मीडिया में अलग अलग मत प्रकट किए जा रहे हैं। कांग्रेसी प्रवक्ता ने अपना मत रखा है। लालूप्रसाद यादव, मुलायम सिंह और चुनाव में पराभूत अन्य नेता भी अपना मत रख रहे हैं। इन लोगों ने पहले जो कुछ कहा, वही राग अब भी अलाप रहे हैं और आगे भी यही जारी रहेगा। इन सभी लोगों ने नरेंद्र मोदी को 'सांप्रदायिक नेता' बताया। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी ने चुनाव में बड़ी सफाई से जाति का मुद्दा भी उठाया और धर्म का मुद्दा भी। वे आगे कहेंगे कि, यह विजय भाजपा की नहीं बल्कि एक व्यक्ति मोदी की है और किसी व्यक्ति को पार्टी से बड़ा बनाना अच्छा नहीं होता है, इससे तानाशाही का खतरा पैदा हो जाता है। उनका कहना है, नरेंद्र मोदी प्रभुतावादी हंै। वे अपने सहयोगियों को आगे नहीं आने देते हैं। सब कुछ मोदी के वजह से है, वे ऐसा दिखाते हैं। ऐसा दुष्प्रचार किया जाता है।

यह सारा प्रचार बेमतलब का है। लालूप्रसाद, मुलायम सिंह और सोनिया गांधी, इन लोगों ने अपनी पार्टियों को एक पारिवारिक व्यावसायिक कंपनी बना दिया है। मायावती का मतलब है पूरी बहुजन समाज पार्टी। ममता बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस से हटा दें, तो शेष बचेगा शून्य, ऐसी स्थिति है। ये लोग और उनके तोते जब नरेंद्र मोदी पर ऐसे ही आरोप लगाते हैं तब कांच के घर में रहने वालों कोे दूसरे पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए, यह कहावत साफ हो जाती है। भारतीय मतदाताओं ने उनको ऐसी चपत लगाई है कि दूसरी चपत लगाने को जगह ही नहीं बची है। महाराष्ट्र में आईबीएन/ लोकमत पर ऐसे तोते जमा करके मोदी, भाजपा और संघ के खिलाफ प्रचार करने हेतु बड़ा मोर्चा खोला गया था। जनता ने उन सबके मुंह पर ताले जड़ दिए हैं। चुनाव के माध्यम से ऐसी चपत पड़ी है कि शब्दों के तीर चलाने की आवश्यकता नहीं रही है।

राष्ट्रीय विचारधारा की विजय
नरेंद्र मोदी की विजय राष्ट्रीय विजय है। यह एक व्यक्ति की विजय नहीं, केवल भाजपा की विजय नहीं बल्कि राष्ट्रीय विचारधारा की विजय है। इस विचारधारा का मातृत्व एवं नेतृत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जाता है। इसलिए यह विजय संघ विचारधारा की विजय है। इस विजय का महव असाधारण है तथा यह भविष्यकालीन दूरगामी परिणाम लानेे वाली भी है।
स्वाधीनता के बाद देश में दो विचारधाराएं स्थापित हो गई थीं। पहली विचारधारा है 'नेहरू विचारधारा', जिसे अंग्रेजी में 'नेहरूवियन मॉडल' कहा जाता है। इस विचारधारा ने मुस्लिम तुष्टीकरण, हिंदू समाज को जातियों में बांटकर देखना, अल्पसंख्यकवाद, हिंदू संस्कृति की निंदा, हिंदू चिंतन की अनदेखी, ऐसी नीति अपनाई जाती है। समाजवादी, कम्युनिस्ट, चर्चवादी, मुल्ला-मौलवी के लिए यह नीति बहुत सुविधाजनक और उपकारक होने के कारण वे सब इस विचारधारा के नुमाइंदे बन गए। सेक्युलरिज्म, इस एक शब्द में इस विचारधारा का सार बताया जा सकता है। राज्य को पांथिक आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए और सभी को समान न्याय, यह है सेक्युलरिज्म का सही मतलब, लेकिन भारत में इसका मतलब बन गया हिंदुओं पर जुल्म ढाना और अल्पसंख्यकों को सर पर बिठा लेना।

विदेशी मॉडल की नकल
नेहरूवियन मॉडल की दूसरी विशेषता है विकास के विदेशी मॉडल की नकल उतारना।। पंडित नेहरू ने रूस की विकास अवधारणा की नकल उतारी और समाजवाद भारत में लाने का कार्यक्रम बनाया। इस कार्यक्रम से गरीबी नहीं हटी केवल गरीबों की संख्या बढ़ती चली गई। सरकारीकरण के कारण नौकरीशाही प्रबल और दिन ब दिन भ्रष्ट बनती गई। उद्योग की प्रेरणा खत्म हो गई, कृषि विकास कुंठित हो गया। देश विदेशी कर्ज के खाई में डूब गया।
इस के बाद वैश्वीकरण का प्रयोग आरंभ हो गया। अमरीकीा विकास अवधारणा की नकल उतारी गई। इस नकल के चलते देश में पूंजीवाद आ गया। पूंजीवाद का मुख्य हेतु होता है अधिक मुनाफा कमाना और इसलिए संसाधन, मजदूर, शासन का जितना हो उतना शोषण करना। वैश्वीकरण के कारण एक ओर नया अमीर वर्ग खड़ा हो गया और चार पहियों वाली गाडि़यां बढ़ने लगीं। उनके लिए अच्छी सड़कें बनने लगीं और देहात उजड़ गए। किसान की हालत खस्ता हो गई और वह आत्महत्या करने लगा। शिक्षा का बाजारीकरण हो गया, आरोग्य सेवाओं का भी बड़े पैमाने पर बाजारीकरण हो गया। मध्यमवर्ग और गरीब आदमी वैश्वीकरण की मार से बेसहारा हो गया।

एक विचारधारा है हिन्दू
दूसरी विचारधारा है रा. स्व. संघ की। संघ विचारधारा ने संघ की स्थापना से ही जाति भावना के लिए कोई स्थान नहीं रखा और हरेक की उपासना की स्वतंत्रता मान्य की। यही हमारे देश की परंपरा है। अपनी संस्कृति एक है और सर्वसमावेशक है, उसके कुछ जीवनमूल्य हैं। इसका नाम है हिंदू संस्कृति। देश की अर्थनीति, समाजनीति, राजनीति हिंदू जीवनमूल्य के आधार पर ही खड़ी रहनी चाहिए। हिंदू जीवनमूल्य सभी को एक ही चेतना के आविष्कार के रूप में देखना सिखाते हैं, विश्व में चींटी से लेकर हाथी तक सभी को जीने का हक है और हरेक का सृष्टि में महवपूर्ण स्थान है। इसलिए हम मनुष्यों का केवल एक दूसरे के पूरक नहीं तो हमारी जीवनशैली सृष्टि की पूरक होनी चाहिए। पं़ दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानव दर्शन में यही विचार रखा है और यह विचारधारा भाजपा की प्राणशक्ति है।
यह विचार और जीवनमूल्य संपूर्ण समाज में पनपाने के कुछ चरण हैं। सर्वप्रथम संघकार्य को देशव्यापी बनाने का कार्य पू़ डॉक्टरजी के समय से ही प्रारंभ हो गया था। श्री गुरुजी के समय में इसे देशव्यापी के साथ ही राष्ट्र जीवन के सभी क्षेत्रों तक पहंुचाने का भी प्रयास हुआ और उस दौरान जनसंघ की स्थापना हुई। संघ के अत्यंत कतृर्त्वशाली प्रचारक जनसंघ में भेजे गए। बालासाहब देवरस के कार्यकाल में समाज के अंतिम तबके तक संघकार्य पहुंचाने का प्रयास किया गया। रज्जू भैया और श्री कुप्. सी. सुदर्शन के कार्यकाल में इस कार्य के दृढ़ीकरण पर बहुत बल दिया गया। यह दो स्तर पर किया गया, वैचारिक और कार्यकर्ता।

सर्वस्तरीय संघ-स्वीकृति
इस सारे कालखंड में संघकार्य को हर एक चरण पर बड़े पैमाने में स्वीकृति मिलती चली गई। इन चरणों की विशेषताएं ऐसी हैं कि सर्वप्रथम आम आदमी ने इस कार्य को स्वीकार किया और उसके बाद इसे समाज के प्रतिष्ठित और बुद्धिजीवी वर्ग ने भी स्वीकार किया। आज भी सर्वसाधारण हिंदुओं का संघ ही संघ का स्वरूप है। संघ निष्ठापूर्वक खुद को काम में लगाने वाले अनगिनत स्वयंसेवक हैं। सर्वसाधारण जनता को इनके माध्यम से ही संघ समझ में आता है। वह लेखन, भाषण, पुस्तकों, विचारगोष्ठी आदि के माध्यम से समझ में नहीं आ सकता है। मीडिया में संघ के बारे में होने वाली बौद्धिक ज्यादातर चर्चाएं अज्ञान पर आधारित होती हैं। किसी का कोई विधान लेकर उस पर चर्चा करना और वह ही संघ विचार है, ऐसा बताने का प्रयास करना तो संघ की दृष्टि में नासमझी है। बडे़ बडे़ बुद्धिवादी ऐसा करते हैं इसलिए उसे बौद्धिकनासमझी कहा जा सकता है। संघ स्वयंसेवक को संपूर्ण देश में पहचान दिलाने वाला कार्य, संघकार्य देशव्यापी, समाजव्यापी यानी समाज के अंतिम घटक तक पहुंचाने का कार्य सातत्यपूर्ण होते रहने से ही संघ का हरेक स्वयंसेवक उसके विशाल रूप में देशव्यापी बन जाता है। नरेंद्र मोदी संघ स्वयंसेवक हैं, संघ प्रचारक रहे हैं। वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे। वह अखिल भारतीय कैसे बन गए? यह सवाल मीडिया के बहुत से विद्वानों को सता रहा है। संघ स्वयंसेवक की यही पहचान उसे अखिल भारतीय बना देती 

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