गुरुवार, 31 जुलाई 2014

अमेरिका को दो टूक, जासूसी कतई स्वीकार नहीं - भारत




भारत की अमेरिका को दो टूक, जासूसी कतई स्वीकार नहीं
नई दिल्ली, एजेंसी 31-07-2014

भारत ने आज अमेरिका से दो टूक शब्दों में कहा कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों द्वारा भारत में नेताओं तथा दूसरे लोगों की जासूसी किया जाना अस्वीकार्य है। इस पर अमेरिका ने कहा कि किसी भी मतभेद का समाधान दोनों देशों के खुफिया सेवा की ओर से मिलजुलकर किया जा सकता है।
   
अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बीच आज यहां लंबी बैठक के बाद यह बात सामने निकल कर आई। दोनों पक्षों ने व्यापार, रक्षा और उर्जा जैसे प्रमुख मुद्दों पर व्यापक बातचीत की। मोदी सरकार के बनने के बाद पहली बार कोई अमेरिकी विदेश मंत्री भारत के दौरे पर आया है।
   
साझा प्रेस वार्ता में सुषमा से पूछा गया कि क्या उन्होंने 2010 में अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) की ओर से भाजपा नेताओं की जासूसी कराए गए जाने का मुद्दा उठाया, इसका खुलासा हाल ही में एनएसएस के पूर्व कांट्रैक्टर एडवर्ड स्नोडेन किया था।
   
सुषमा ने जवाब दिया, मैंने विदेश मंत्री केरी के साथ यह मुद्दा उठाया। मैंने उन्हें बताया कि जब यह खबर भारतीय अखबारों में आई, तो भारतीयों ने इसका विरोध किया और अपना गुस्सा भी जताया। मैं उसी रोष से आपको अवगत करा रही हूं। उन्होंने कहा, मैंने उन्हें यह भी बताया कि दोनों देश एक दूसरे को मित्र राष्ट्र मानते हैं तथा किसी भी बिंदु से हमें यह स्वीकार्य नहीं होगा कि एक मित्र राष्ट्र दूसरे मित्र राष्ट्र की जासूसी करे।

कैरी ने अमेरिका खुफिया सेवा की ओर से की गई जासूसी का बचाव करते हुए कहा, हम भारत के साथ अपने रिश्ते, अपने द्विपक्षीय रिश्ते को अहमयित देते हैं, हम आतंकवाद विरोधी लड़ाई तथा दोनों देशों को दूसरे के खतरों के संदर्भ में सूचना को साक्षा करने को भी महत्व देते हैं। सामान्य तौर पर अगर कोई मतभेद अथवा प्रश्न खड़ा होता है तो हमारी कोशिश होती है कि हमारी खुफिया सेवाएं इसका समाधान करने के लिए काम करें। उन्होंने कहा, हम उन सभी जगहों पर भारत के साथ सक्रिय रूप से काम करना जारी रखेंगे जहां हमारे साक्षा हितों को खतरा दिखता है तथा हम मंत्री की भावना का सम्मान करते हैं और उसे समझते हैं।
   
कैरी ने कहा कि अमेरिका की नीति है कि वह खुफिया मामलों पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा नहीं करता। बहरहाल, उन्होंने कहा कि अमेरिका ने उसी वक्त बातचीत की थी जब मंत्री ने जासूसी से जुड़ी खबरों के बारे में सरकारी अधिकारियों को बताया। सुषमा ने सीनेट के समक्ष लंबित उस आव्रजन विधेयक का भी मुददा उठाया जिससे अमेरिका में भारतीय आईटी पेशेवरों का जाना सीमित हो जाएगा।
   
विदेश मंत्री ने कहा कि उन्होंने केरी से कहा कि अगर यह विधेयक पारित हो गया तो उस वक्त पेशेवरों के बीच नकारात्मक संदेश जाएगा जब भारत विस्तार कर रहा है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमन ने भी यह मुद्दा उठाया। दोनों के बीच बातचीत में डब्ल्यूटीओ में खाद्य सुरक्षा पर भारत के रूख को लेकर भी चर्चा हुई।
   
व्यापार संबंधित मुद्दों पर कैरी ने कहा कि व्यापार संबंधी अवरोधों को खत्म करने तथा बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण जैसी बाधाओं को दूर करने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। उन्होंने कहा, हम अधिक प्रतिस्पर्धी बाजार का निर्माण करने के साथ अवसरों का ऐसा सेतु निर्मित कर सकते हैं जहां हमारे नौजवान लोग बहुत अधिक उम्मीद रखते हों। हर साल एक करोड़ भारतीय कार्य बल के क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं, इसको देखते हुए भारत सरकार इस महत्व को स्पष्ट तौर पर समझती है।

नटवर सिंह से भाजपा को सावधान रहना होगा



नटवर सिंह से भाजपा को सावधान रहना होगा

श्रीमति सोनिया गांधी के बारे में कांग्रेस के वरिष्ठ राजनेता नटवरसिंह का खुलाशा पूरा सच नहीं लगता है। यूं भी वे कांग्रेस के इतने सारे क्रियाकर्मों में लिप्त  रहे हैं कि एक भी पोल खुल गई तो वे खुद भी नहीं बच सकते हैं। उनका बेटा भाजपा में अभी अभी आया है, लगता है कि उनकी बायोग्राफी  इसी तथ्य के आपास है कि भाजपा को खुश  कर कुछ अतिरिक्त हांसिल किया जाये। क्यों कि नटवरसिंह हमेशा ही खुश कर के  प्राप्त करने की रणनीति के माहिर रहे हैं।
जहां तक मेरी निजी राय श्रीमति सोनिया गांधी के बारे में प्रधानमंत्री बनने की बात पर यह है कि उनकी सारी तैयारियां प्रधानमंत्री बनने के लिये ही थीं, जिस अपमान जनक तरीके से तत्कालीन कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सीताराम केसरी को हटाया गया, यूपीए के गठन से पूर्व जब प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जी की सरकार गिरी थी तब भी राष्ट्रपति भवन 272 के नारे के साथ पहुचीं थीं , उन्हे बहूमत जुटाने को समय भी अतिरिक्त  मिला था। मगर तब उन्हेे मुलायमसिंह के समर्थन नहीं देने से बहूमत नहीं जुटा पाईं थीं। यूपीए प्रथम का बहूमत जुटाने के बाद भी वे राष्ट्रपति भवन तो प्रधानमंत्री बनने ही गईं थीं। वहां हुआ क्या यह तत्कालीन राष्ट्रपति महोदय ही जानते हैं। जहां तक सुनने में आया था कि तब सुब्रमण्यम स्वामी ने कुछ कानूनी प्रश्न खड़े करते हुये माननीय राष्ट्रपति महोदय को विरोध पत्र दिया हुआ था। सिर्फ राहुलजी की सलाह पर वे प्रधानमंत्री पद त्याग देतीं हैं यह तो गले नहीं उतरता । उनका विदेशी मूल का होना जरूर उनमें हीन भावना उत्पन्न करता होगा।

मेरा तो एक आग्रह ओर भी रहेगा कि वोल्कर समिति की रिपोर्ट को संसद में रख कर बहस हो और उसमें जिन जिन को  भी राष्टविरोधी और भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाये उन पर कार्यवाही हो।
अरविन्द सिसोदिया,
जिला कोटा राजस्थान 

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हत्‍या के डर से राहुल ने नहीं बनने दिया सोनिया को प्रधानमंत्री : नटवर  सिंहBy Live News Desk | Publish Date: Jul 30 2014


नयी दिल्ली: पूर्व विदेश मंत्री के नटवर सिंह ने दावा किया कि 2004 में सोनिया गांधी ने अपने बेटे राहुल गांधी के कडे एतराज के बाद प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया. राहुल ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उनको डर था कि अगर वह पद स्वीकार लेती हैं तो उनके पिता और दादी की तरह उनकी भी हत्या कर दी जाएगी.

एक समय गांधी परिवार के दोस्त माने जाने वाले सिंह (83) ने 2008 में कांग्रेस छोड दी थी. इराक के अनाज के बदले तेल घोटाले की पृष्ठभूमि में 2005 में संप्रग 1 से उन्होंने इस्तीफा दिया था. उन्होंने दावा किया है कि अंतरात्मा की आवाज के कारण सोनिया ने इससे मना नहीं किया बल्कि एक समय वह प्रधानमंत्री पद संभालने के बारे में कह चुकी थीं.

‘हेडलाइंस टुडे’ पर करण थापर को एक साक्षात्कार में सिंह ने दावा किया कि अपनी आत्मकथा में वह इस खास घटनाक्रम का उल्लेख नहीं करें, यह आग्रह करने कांग्रेस अध्यक्ष अपनी बेटी प्रियंका गांधी के साथ 7 मई को उनके आवास पर आयीं थी लेकिन उन्होंने तथ्य का खुलासा करने का फैसला किया क्योंकि वे सच बताना चाहते थे.

‘वन लाइफ इज नॉट इनफ : एन आटोबायोग्राफी’ शीर्षक वाली किताब जल्द ही बाजार में आने वाली है. नटवर सिंह ने कहा, ‘‘राहुल अपनी मां के प्रधानमंत्री बनने के पूरी तरह खिलाफ थे. उन्होंने कहा कि उनके पिता और दादी की तरह उनकी हत्या कर दी जाएगी और एक पुत्र होने के नाते वह उन्हें प्रधानमंत्री बनने नहीं देंगे. वह दृढता से अडे हुए थे.’’ उन्होंने 18 मई 2004 को हुयी एक बैठक का जिक्र करते हुए इस घटना का उल्लेख किया जिसमें मनमोहन सिंह, गांधी परिवार के दोस्त सुमन दुबे, प्रियंका और वह मौजूद थे. बाद में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने.

उन्होंने कहा कि राहुल के एतराज के बारे में प्रियंका ने उन लोगों को वाकिफ कराया. उन्होंने कहा, ‘एक बेटे के तौर पर राहुल को पूरे अंक जाते हैं.’ राहुल उस समय 34 साल के थे. सिंह ने दावा किया कि सोनिया ने 7 मई को उनसे उस बात के लिए ‘सॉरी’ भी कहा जब उन्होंने बताया कि संप्रग सरकार ने उन्हें किस तरह प्रताडित किया था और उनके :सोनिया के: इस दावे को मानने से इंकार कर दिया कि वह इस बात से वाकिफ नहीं थीं.

उन्होंने कहा, ‘‘उन्होंने कहा कि मुङो नहीं पता था :जैसा उनके साथ सलूक हुआ:. मैंने कहा कि कोई भी इस पर विश्वास नहीं करेगा क्योंकि कांग्रेस में आपकी जानकारी के बिना, आपकी मंजूरी के बिना कुछ भी नहीं होता. सरकार के साथ भी यही बात थी. उन्होंने कहा, ‘‘मुङो खेद है.’’  सिंह ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारु के उस दावे का समर्थन किया कि पीएमओ में रहे पुलक चटर्जी अहम सरकारी फाइल सोनिया के पास ले जाते थे. उन्होंने कहा कि इस पर विरोध का कोई सवाल ही नहीं था क्योंकि वह सर्वोच्च नेता थीं.

नटवर सिंह ने यह भी खुलासा किया कि 1991 में प्रधानमंत्री के तौर पर सोनिया की पहली पसंद तत्कालीन उपराष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा थे लेकिन बाद में राष्ट्रपति बनने वाले शर्मा ने अपने खराब स्वास्थ्य के कारण इस पेशकश को ठुकरा दिया था. उन्होंने कहा कि इसके बाद उन्होंने पीवी नरसिंह राव का चुनाव किया जिनके साथ उनके कभी गर्मजोशी भरे संबंध नहीं रहे.

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 1991 में चेन्नई के निकट श्रीपेरुमदूर में लिट्टे के आत्मघाती बम हमले में हत्या कर दी गयी थी. उनकी मां, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 1984 में उनके आवास पर सिख सुरक्षा गाडरें ने हत्या कर दी थी. यह पूछे जाने पर कि वर्ष 2004 में भाजपा नेतृत्व वाले राजग को हराकर कांग्रेस की अगुवाई वाले संप्रग के सत्ता में आने के बाद यह पूरी तरह सोनिया पर छोड दिया जाता तो क्या वह प्रधानमंत्री पद स्वीकार कर लेतीं, सिंह ने कहा, ‘‘इसका जवाब देना कठिन है.’’  गांधी परिवार द्वारा उनके साथ के बर्ताव को लेकर कडवाहट और प्रतिशोध के आरोपों को खारिज करते हुए सिंह ने कहा कि उन्होंने सार्वजनिक रुप से सोनिया के खिलाफ कभी एक शब्द नहीं कहा लेकिन तथ्य बताना महत्वपूर्ण है. सिंह का एक बेटा राजस्थान से भाजपा का विधायक है.

उन्होंने कहा, ‘‘वह एक सार्वजनिक शख्सियत हैं. वह भारत की सबसे महत्वपूर्ण नेता हैं, वह हरेक जीवनी लेखक का ख्वाब हैं. वह एक ऐतिहासिक शख्सियत हैं.’’ उन्होंने कहा कि ऐसी हस्तियों की कोई ‘‘निजता’’ नहीं होती. यह पूछे जाने पर कि प्रधानमंत्री नहीं बनने को लेकर राहुल के एतराज का दावा अगर मनमोहन सिंह और दुबे खारिज कर देते हैं तो, नटवर सिंह ने कहा, ‘‘निश्चित ही वे ऐसा करेंगे. मुङो पता है वे ऐसा करेंगे.’’ उन्होंने जोडा कि वे ऐसा कहते और इसपर टिके रहते अगर सोनिया और प्रियंका मेरे पास नहीं आयी होतीं. वे मेरे साथ कॉफी पीने के लिए नहीं आतीं. वे मेरे साथ भोजन के लिए नहीं आतीं.

उन्होंने नेता के तौर पर सोनिया को राजीव से ज्यादा अहमियत देते हुए कहा कि वह उनकी तुलना में ज्यादा मजबूत हैं. उन्होंने कहा ‘‘वह बडे दिलवाले थे. आप इनसे (सोनिया से) छूट नहीं ले सकते.’’
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नटवर सिंह का दावा राजनीति से प्रेरित : कांग्रेस
By Live News Desk | Publish Date: Jul 31 2014

नयी दिल्ली : कांग्रेस ने पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के दावे को राजनीति से प्रेरित बताया. गौरतलब हो कि नटवर सिंह ने दावा किया था कि 2004 में सोनिया गांधी ने अंतरात्मा की आवाज पर नहीं, बल्कि अपने बेटे राहुल गांधी के कडे ऐतराज के बाद प्रधानमंत्री बनने से इंकार किया था.

वोल्कर समिति की रिपोर्ट के बाद नटवर सिंह को संप्रग सरकार से हटना पड़ा था. बाद में कांग्रेस ने उन्हें निलंबित कर दिया था. पार्टी प्रवक्ता और वरिष्ठ वकील अभिषेक सिंघवी ने कहा, नटवर सिंह का बयान राजनीति से प्रेरित प्रतीत होता है और इसका मकसद किताब की बिक्री के लिए प्रचार पाने का प्रयास है.

कांग्रेस महासचिव और पार्टी के संचार विभाग के अध्यक्ष अजय माकन ने भी सिंह के दावे को हास्यास्पद बताते हुए खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, यह हास्यास्पद है. आजकल अच्छी बिक्री और मुफ्त के प्रचार के मकसद से किताब की विषय वस्तु को सनसनीखेज बनाना फैशन बन गया है. यह भी इसी तरह की एक कवायद है. इस पर कोई भी टिप्पणी करना बेकार होगा. पार्टी की प्रतिक्रिया सिंह के इस दावे के ठीक बाद आयी कि अंतरात्मा की आवाज के कारण सोनिया ने इससे मना नहीं किया, क्योंकि एक समय वह प्रधानमंत्री पद संभालने के बारे में कह चुकी थ।
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इतालवी होने के कारण निर्मम हैं सोनिया : नटवर सिंह
Date:Thursday,Jul 31,2014
नई दिल्ली [जागरण न्यूज नेटवर्क]। नटवर सिंह ने अपनी किताब के बारे में एक टीवी चैनल से चर्चा करते हुए सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को भी उठा दिया। उन्होंने कहा कि सोनिया के स्वभाव में इसलिए निर्ममता है, क्योंकि वह इटली की हैं। उनके मुताबिक कोई भारतीय वैसा व्यवहार नहीं कर सकता जैसा सोनिया ने मेरे साथ किया और वह भी तब जब मैं 45 साल तक परिवार के प्रति निष्ठावान रहा। उन्होंने मेरे साथ वैसा बर्ताव नहीं किया जैसा राजीव गांधी की पत्नी को करना चाहिए था। भारत में ऐसा नहीं होता। सोनिया की शख्सियत का एक पहलू ऐसा है जो निर्मम है। जब उनसे पूछा गया कि क्या यह उनके इटली का होने के कारण है तो उनका जवाब था-इसके सिवा और क्या हो सकता है? जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ऐसे नहीं थे। बातचीत में उन्होंने यह भी कहा कि राजीव गांधी प्रधानमंत्री के रूप में डेढ़ साल मूर्खो की टीम पर निर्भर रहे।
2008 में कांग्रेस छोड़ने वाले 83 साल के पूर्व राजनयिक और विदेश मंत्री रह चुके नटवर सिंह को 2005 में विदेश मंत्री से तब इस्तीफा देना पड़ा था जब इराक के तेल के बदले खाद्यान्न घोटाले की जांच करने वाली वोल्कर समिति में उनका नाम आया था। उन्होंने कहा कि वर्ष 1987 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने श्रीलंका में भारतीय शांति रक्षक बल (आइपीकेएफ) बगैर किसी स्पष्ट मकसद के भेज दिया था। श्रीलंका की उनकी वह नीति उनकी हत्या के बाद ही समाप्त हुई। आइपीकेएफ की विफलता को लेकर नटवर राजीव गांधी के बचाव में दिखे। उन्होंने कहा कि उसके लिए केवल उन्हें ही नहीं जिम्मेदार ठहराया जा सकता। सरकार में शामिल हर शख्स जिम्मेदार था। राजीव गांधी भी किसी पर विश्वास करते थे। सिंह ने दावा किया कि आइपीकेएफ को श्रीलंका भेजने का फैसला राजीव गांधी ने खुद लिया था। इस बारे में उन्होंने कैबिनेट या शीर्ष अधिकारियों से विमर्श नहीं किया था। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के शुरुआती डेढ़ साल राजीव पूरी तरह से अहं से भरे मूर्खो के दल पर निर्भर थे। एक के समाजवादी होने का दावा किया जाता है जबकि दूसरा अयोग्य राजनीतिक व्यक्ति था और तीसरा हस्तक्षेप कर परेशान करने वाला था। उन्होंने दो की पहचान गोपी अरोड़ा और अरुण नेहरू के तौर पर बताई। दोनों की मौत हो चुकी है। तीसरे का नाम बताने से उन्होंने इन्कार कर दिया क्योंकि वह बहुत बूढ़े हो चुके हैं और अब यह मामला उतना महत्वपूर्ण नहीं है। सिंह ने यह भी दावा किया कि 'ऑपरेशन ब्रासटैक्स' (राजस्थान में हुआ युद्धाभ्यास) जिसकी वजह से पाकिस्तान के साथ युद्ध की स्थिति पैदा हो गई थी वह योजना तत्कालीन रक्षा राज्यमंत्री अरुण सिंह और तत्कालीन सेना प्रमुख के सुंदरजी ने राजीव गांधी को अंधेरे में रखकर बनाई थी।

बुधवार, 30 जुलाई 2014

इंद्रधनुषी त्यौहारों का महीना श्रावण - पांचजन्य


इंद्रधनुषी त्यौहारों का महीना श्रावण


पांचजन्य का ताजा अंक अवश्य पढ़ें !

श्रावण मास का महत्व\इन्द्रधनुष - अनेक पर्वों वाला है श्रावण मास

तारीख: 28 Jul 2014


वैदिक परम्परा में 'श्रावणे पूजयेत शिवम्' के नियमानुसार श्रावण मास में भगवान शंकर की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। श्रावण मास के आरंभ होते ही शिव भक्त कांवडि़ये हरिद्वार, ऋषिकेश और गोमुख से गंगाजल भरकर कांवड़ उठाये अपने-अपने घर को लौटते हैं। ऐसे में 'बम-बम भोले' के उद्घोष से पूरा वातावरण शोभायमान हो जाता है।
भगवान शंकर अपने भक्तों को इस कठिन साधना का सुफल अवश्य देते हैं। कांवड़ के अतिरिक्त श्रावण मास में अमरनाथ यात्रा, श्रावण की शिवरात्रि, नागपंचमी, हरियाली तीज और अंत में राखी का पर्व मुख्य रूप से आते हैं। श्रावण में सोमवार के व्रत और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व है और इसीलिए इस माह को शिव आराधना का 'मास सिद्ध' कहते हैं। मंदिर में शिव परिवार पर जलाभिषेक विशेष महत्व रखता है और गंगाजल से भगवान शंकर का अभिषेक सर्वोत्तम माना गया है। जो श्रद्धालु मंदिर नहीं जा पाते हैं, वे घर में रखी शिवलिंग की पूजा कर सकते हैं। शिव पुराण में विभिन्न द्रव्यों से भगवान शिव का रुद्राभिषेक करने का फल बताया गया है। गन्ने के रस से धन प्राप्ति, शहद से अखण्ड पति का सुख, कच्चे दूध से पुत्र सुख, सरसों के तेल से शत्रु दमन और घी से रुद्राभिषेक करने पर सर्वकामना पूर्ण होती है। भगवान शिव की पूजा का सर्वश्रेष्ठ काल प्रदोष समय माना गया है। किसी भी दिन सूर्यास्त से एक घंटा पूर्व तथा एक घंटा बाद के समय को प्रदोषकाल कहते हैं।
श्रावण मास में त्रयोदशी, सोमवार और शिव चौदस प्रमुख दिन हैं। भगवान शंकर को भस्म, लाल चंदन, रुद्राक्ष, आक का फूल, धतूरा फल, बिल्व पत्र और भांग विशेष रूप से प्रिय हैं। भगवान शिव की आराधना वैदिक, पौराणिक या नाम मंत्रों से की जाती है। सामान्य व्यक्ति भी 'ऊंॅ नम: शिवाय या ऊंॅ नमो भगवते रुद्राय' मंत्र से शिव पूजन तथा अभिषेक कर सकते हैं। शिवलिंग की आधी परिक्रमा करनी चाहिए।
हिमालय नरेश की पुत्री देवी पार्वती ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए श्रावण मास में ही कठोर तपस्या की थी। इसी मास में समुद्र मंथन से हलाहल विष का पान कर भगवान शिव ने पूरी सृष्टि को बचाया था। इस माह में लघु रुद्र, महारुद्र और अतिरूद्र पाठ कराने का भी विधान है। श्रावण मास में जितने भी सोमवार पड़ें,यदि संभव हो तो श्रद्धालुओं को व्रत रखना चाहिए।
श्रवण कुमार के नाम पर है 'श्रावण मास'।
त्रेता युग में महाराजा दशरथ के हाथों भूलवश मारे गए श्रवण कुमार अपने नेत्रहीन माता-पिता को तीर्थ कराकर लौट रहे थे। श्रवण कुमार क ी मृत्यु उपरान्त ही उनके माता-पिता ने भी पुत्र के वियोग में अपने प्राण त्याग दिए थे और उससे पूर्व महाराजा दशरथ को श्राप भी दिया था कि उनकी भी पुत्र के वियोग में मृत्यु होगी। उस समय अपनी भूल का प्रायश्चित करते हुए महाराजा दशरथ ने वचन दिया था कि श्रवणा कुमार को सदा याद रखा जाएगा। तभी से श्रावण मास की परम्परा शुरू हुई थी। श्रावण नक्षत्र भी होता है और राखी वाले दिन घरों में जो सतिया बनाया जाता है, वह श्रवण कुमार से ही संबंधित है। इसकी शुरुआत के बाद से ही कांवड़ लेकर आने की परम्परा शुरू हुई थी।
मंगला गौरी व्रत
श्रावण मास में प्रत्येक मंगलवार को शिव-गौरी का पूजन करना चाहिए जिसे मंगला गौरी व्रत कहते हैं। यह व्रत विवाह के बाद पांच वर्ष तक प्रत्येक स्त्री को करना चाहिए। विवाह के उपरान्त पहले श्रावण मास में पीहर में रहकर तथा अन्य चार वर्ष ससुराल में रहकर यह व्रत संपन्न किया जाता है। मंगल गौरी पूजा में 16-16 प्रकार के पुष्प, मालाएं, वृक्षों के पत्ते, दूर्वा, धतूरे के पत्ते, अनाज पान के पत्ते सुपारी और इलायची पूजा में चढ़ाई जाती है। पूजन के उपरान्त परिवार में सबसे बुजुर्ग महिला को 16 लड्डुओं का बायना देने की परंपरा है।
इन्द्र को बांधी थी सबसे पहले राखी
देवराज इन्द्र जब बार-बार असुरों से युद्ध में पराजय का मंुह देख रहे थे तो सबसे पहले उन्हें इन्द्राणी ने राखी बांधी थी। उस दिन पूर्णिमा का ही दिन था और राखी बंधवाने के बाद इन्द्र ने असुरों पर विजय प्राप्त की थी। तभी से राखी या रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है। उसके बाद से बहन अपने भाई और भतीजों की दीर्घायु और रक्षा के लिए उन्हें राखी बांधने लगीं। राखी को मुख्य रूप से ब्राह्मणों का त्योहार माना जाता था। लेकिन आज इसे सभी वर्ग के लोग मनाने लगे हैं। वेद परायण के शुभारंभ को उपाकर्म कहते हैं। पूर्व में राखी के ही दिन पिछले वर्ष के वेदाध्ययन की समीक्षा और अध्ययन के नये सत्र का आरंभ विशेष रूप से किया जाता था। -आचार्य कृष्ण दत्त शर्मा

गाजा की गरज किसे लगती है गलत ? - पाञ्चजन्य




सामयिक- 

गाजा की गरज किसे लगती है गलत?

तारीख: 28 Jul 2014

दोेस्तों ये कैसी चिंतन-धारा है, कैसी मानवता है जो हिंसक के सामने मौन रहती है और आततायी के सामने समर्पित रहती है। ये कैसा हृदय है जो आक्रामक की दुष्टताओं की अवहेलना करता है और प्रत्युत्तर देने वाले की निंदा करता है।
आजकल गाजा पर इजरायल के प्रहारों को लेकर बहुत हाय-हाय की जा रही है. जमीन खो चुके तमाम कांग्रेसी, वामपंथी वाग्वीर कोलाहल मचाये हुए हैं इसलिए आवश्यक हो जाता है कि इस समस्या पर प्रारंभ से विचार किया जाये। संसार की प्राचीनतम किताबों में से एक ओल्ड टेस्टामेंट में इस बात की विस्तार से चर्चा है कि मोजेज या मूसा फिरओन के अत्याचारों से बचाने के लिये अपने लोगों अर्थात यहूदियों को लेकर मिस्र जो उस काल में इस पूरे क्षेत्र में फैला था, से निकल गये। इसी ग्रंथ में उनके इसी पैगंबर का वादा है कि एक दिन तुम अपनी धरती पर वापस लौटोगे। इसी कारण यहूदी इसे प्रतिश्रुत भूमि या प्रॉमिस्ड लैंड कहते हैं। हजारों वषोंर् तक यहूदी संसार भर में बिखरे रहे। एक अपवाद भारत वर्ष को छोड़कर तमाम ईसाई, मुस्लिम देशों में उनके साथ भयानक अत्याचार हुए। यहां तक कि कम्युनिस्ट रूस में भी लेनिन, स्टालिन के काल में लाखों यहूदी यातना दे-दे कर मार डाले गये। यहूदी स्वभाव से ही शांतिप्रिय हैं। ये व्यवसायी जाति है। उन पर सदियों तक अत्याचार हुए। दूसरे विश्व युद्घ में जर्मनी की नात्सी सरकार के हाथों करोड़ों यहूदी मार डाले गये। इसके उपरांत विश्व समुदाय के नेता विवश हो गये कि यहूदियों को उनका देश दिया जाए। कटी-फटी अवस्था में उनका देश इजरायल उन्हें दिया गया। ऐसा नहीं है कि 1948 में इजरायल बनाने के बाद ही यहूदी वहां बसने शुरू हुए। वो सदियों से उस क्षेत्र में इस आशा में रह रहे थे कि एक दिन ये उन्हें मिलेगा। सदियों तक संसार भर में एक यहूदी जब दूसरे यहूदी से विदा लेता था तो जैसे मुसलमान आपस में विदा लेते समय खुदा हाफिज कहते हैं, 'अगले वर्ष येरुशलम में' कहता था। अपनी खोयी हुई मातृभूमि के लिये ऐसी ललक विश्व समुदायों में दुर्लभ है। 1948 में विश्व के नेताओं ने यहूदियों को उनका देश दिया और इजरायल का निर्माण होते ही उस पर मिस्र, जार्डन, सीरिया, इराक, लेबनान ने आक्रमण कर दिया। नवनिर्मित देश के पास न तो नियमित सेना थी, न अस्त्र-शस्त्र थे। वो वीर लोग रसोई के चाकुओं, गैंतियों, कुदालों, हथौड़ों से लड़े। लड़ाई समाप्त होने के अंत में इजरायल का क्षेत्रफल प्राप्त हुए देश से बढ़ चुका था। हमलावरों के न केवल दांत खट्टे हुए बल्कि हाथ-पैर तोड़ डाले गये। मूलत: व्यापारी जाति के लोगों को सदियों के उत्पीड़न और अपने निजी देश की अंतिम आशा ने प्रबल योद्घा बना दिया।
इजरायल पर 1948, 1956, 1967, 1973 में चार बार घोषित आक्रमण हुए हैं। यह देश एक ओर से समुद्र और तीन ओर से मुस्लिम देशों से घिरा हुआ है। ये देश सामान्य कुरआनी सोच से अनुप्राणित हैं यानी काफिरों को खत्म करके इस क्षेत्र को दारूल-हरब से दारूल-इस्लाम बनाना है। इजरायल को घेरे हुए मुस्लिम देशों ने तो उसे समाप्त करने के लिए जोर लगाया ही मगर अन्य मुस्लिम देशों ने भी इन देशों की हर प्रकार से सहायता की। इन चार युद्घों में इजरायल के लिए हार कोई विकल्प थी ही नहीं। हार का अर्थ सदैव के लिए विश्व इतिहास से गायब हो जाना था। व्यापारी वर्ग के लोग, सदियों से पीडि़त लोग ऐसे प्रचंड योद्घा बन गये कि गोलान पहाडि़यां जहां से इजरायल पर आसानी से तोपों से हमला हो सकता था, छीन ली गयीं। इन मुस्लिम देशों की ऐसी धुनाई की गयी कि इनमें सबसे बड़े देश मिस्र को इजरायल से सबसे पहले संधि करने पर विवश होना पड़ा।
इजरायल पर बाह्य आक्रमण ही नहीं हुए अपितु देश में बसे मुसलमानों के आतंकी समूह जैसे फिलिस्तीनी मुक्ति मोर्चा, हमास, हिजबुल्ला लगातार उत्पात करते रहते हैं। इस संघर्ष की जड़ में भी वही कुरानी विश्वास  है। 'संसार का ध्रुव सत्य इस्लाम है। इससे इतर सोचने, जीवन जीने वाले लोग काफिर हैं और काफिर वजिबुल-कत्ल अर्थात मार डाले जाने के योग्य हैं।  वर्तमान संघर्ष का कारण गाजा के नागरिक क्षेत्रों में ठिकाना बनाये बैठे हमास के लोग हैं। इन्हांेने इजरायल को निशाना बनाकर 1200 से भी अधिक राकेट दागे हैं। एक स्वतंत्र राष्ट्र के पास इन हमलों का मुंह-तोड़ जवाब देने के अतिरिक्त कौन-सा विकल्प है? अपने नागरिकों, अपनी भूमि, अपने संस्थानों, अपनी संपत्ति की रक्षा के लिए किसी राष्ट्र को आक्रमणकारियों को समूल नष्ट करने के अलावा कौन-सा उपाय अपनाना चाहिए? आखिर हर देश के नेता भारतीय नेताओं जैसे तो नहीं हो सकते कि अपनी ही धरती कश्मीर से अपने ही समुदाय को निष्कासित होता देखकर मौन रहें। सुरक्षा के प्रति मानसिक सुस्ती आज नहीं कल पराजय में बदल जाती है। एकमेव शांति की कामना हार और मानसिक दासता में परिणत हो जाती है। पराजय मलिनता लाती है और विजय जीवन को उल्लास से भर देती है। संसार में वीर जातियां भी हैं।
हमास अगर अपने मिसाइल लांचर मस्जिदों, घरों में रखता है तो जवाबी कार्यवाही में मारे जाने वाले लोगों के लिए मूलत: हमास ही जिम्मेदार है। कुछ जिम्मेदारी उन लोगों की भी है जो इन आक्रमण केन्द्रों के पास रहते हैं और इन ठिकानों का विरोध नहीं करते। क्या उन्हें पता नहीं कि जब जवाबी रॉकेट इन केन्द्रों को नष्ट करेंगे तो चपेट में वो भी आएंगे। बुरों की सोहबत के नतीजे भुगतने तो पड़ेंगे। हममें से बहुत से लोग इजरायल से सहानुभूति रखते हैं मगर चुप रहते हैं और इजरायल के पक्ष में मुखर नहीं होते। -तुफैल चतुर्वेदी
दोस्तों ये कैसा प्यार है कि मैं किसी को चाहूं और उसे प्रकट भी न करूं? ये समय इजरायल के पक्ष में खड़े होने का है। एक शत्रु के दो पीडि़तों का मित्र होना न केवल स्वाभाविक है बल्कि अपने समवेत शत्रु से निपटने के लिए आवश्यक भी है।अल-कायदा,हिज्बुल-मुजाहिद्दीन, लश्करे-तय्यबा, बोको-हराम, हिजबुल्ला, हमास सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। इन संगठनों और इनकी जननी कुरआनी विचारधारा से जूझ रहे हर व्यक्ति और देश के साथ हमारा खड़ा होना, हमारे अपने लिए मित्र ढूंढ़ने का काम है। इस पुनीत काम में लगे हर योद्घा देश की पीठ पर हमारा हाथ होना अपने देश की पीठ पर मित्र के हाथ होने की तरह है।
मुहब्बतों को छुपाते हो बुजदिलों की तरह
ये इश्तिहार तो गली में लगाना चाहिए था।
लेखक साहित्यकार है। संपर्क : 9711296239

मोदी सरकार की 'सबका साथ, सबका विकास' नीति का समर्थन करता है अमेरिका : कैरी





मोदी सरकार की 'सबका साथ, सबका विकास' नीति का

 समर्थन करता है अमेरिका : कैरीFrom NDTV India, 30जुलाई, 2014 

वाशिंगटन: अमेरिका के विदेशमंत्री जॉन कैरी आज भारत के दौरे पर आ रहे हैं। इससे पहले वाशिंगटन में कैरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल की तारीफ की। उनके बयान को भारत-अमेरिका के बीच संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

दरअसल, गुजरात दंगों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वीजा देने से इनकार करने वाला अमेरिका अब उनसे नजदीकियां बढ़ाने के पुरजोर कोशिश कर रहा है। भारत आ रहे अमेरिका के विदेशमंत्री जॉन कैरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की।

उन्होंने दोनों देशों के रिश्तों को एक ऐसे मुकाम तक ले जाने की भी बात कही, जिससे दोनों एक-दूसरे के साझेदार बन सकें। वाशिंगटन में अमेरिकी थिंक टैंक सेंटर फॉर अमेरिकन प्रोग्रेस के समारोह में केरी ने मोदी सरकार की तारीफ करते हुए कहा कि सबका साथ सबका विकास की नीति में अमेरिका उनका साथ देना चाहता है।

जॉन कैरी ने कहा कि अब नई सरकार के साथ नई संभावनाओं और नए मौकों के साथ बातचीत का समय है। ये भारत के साथ हमारे रिश्तों में बदलाव का वक्त है और हम साथ मिलकर नया इतिहास रचने को प्रतिबद्ध हैं। भारत सरकार का सबका साथ सबका विकास की नीति का हम समर्थन करते हैं।

हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि दोनों देश कई मामलों में आमने-सामने हैं। चाहे वह विश्व व्यापार संगठन के नियमों की बहस हो
इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स की बात या सब्सिडी का मुद्दा हो या फिर इस्राइल-फिलस्तीन युद्ध का सवाल हो। इस पर दोनों देशों के बीच तीखी बहस चल रही है।

अमेरिका भारत को एशिया में चीन के खिलाफ एक ताकतवर साझेदार की तरह देखना चाहता है। दूसरी तरफ अमेरिकी उद्योग जगत भारत को एक बड़े बाजार की तरह देख रहा है, लेकिन वहां उसे कई रुकावटें नजर आ रही हैं। दूसरी तरफ भारत सरकार ने अब तक खुलकर अपनी अमेरिकी पॉलिसी साफ नहीं की है। माना जा रहा है कि सितंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ होने वाली उनकी मुलाकात से इस रिश्ते की दिशा तय होगी।

सावन में बुधवार-चतुर्थी का शुभ योग




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सावन में बुधवार-चतुर्थी का शुभ योग, इन उपायों से प्रसन्न होंगे श्रीगणेश


धर्म डेस्क|Jul 30, 2014, 

उज्जैन। इन दिनों सावन का पवित्र महीना चल रहा है, जो भगवान शिव को बहुत प्रिय है। सावन के महीने में आज (30 जुलाई) बुधवार व चतुर्थी का शुभ योग बन रहा है। बुधवार व चतुर्थी दोनों ही भगवान श्रीगणेश के प्रिय वार व तिथि हैं। इस प्रकार भगवान शिव के प्रिय महीने में उनके पुत्र श्रीगणेश के प्रिय वार व तिथि का संयोग बहुत ही शुभ फलदाई है।

इस दिन श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए व्रत व विशेष पूजन किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन कुछ विशेष उपाय किए जाएं तो भगवान श्रीगणेश अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी हर मनोकामना पूरी करते हैं। अगर भी इस विशेष अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं तो आगे बताए गए उपाय विधि-विधान पूर्वक करें-

1- बुधवार के दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद समीप स्थित किसी गणेश मंदिर जाएं और भगवान श्रीगणेश को 21 गुड़ की ढेली के साथ दूर्वा रखकर चढ़ाएं। इस उपाय को करने से भगवान श्रीगणेश भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं। ये बहुत ही चमत्कारी उपाय है।

2- अगर आपके जीवन में बहुत परेशानियां हैं, तो आप आज हाथी को हरा चारा खिलाएं और गणेश मंदिर जाकर भगवान श्रीगणेश से परेशानियों का निदान करने के लिए प्रार्थना करें। इससे आपके जीवन की परेशानियां कुछ ही दिनों में दूर हो जाएंगी।

3- यंत्र शास्त्र के अनुसार गणेश यंत्र बहुत ही चमत्कारी यंत्र है। आज घर में इसकी स्थापना करें। बुधवार, चतुर्थी या किसी शुभ मुहूर्त में भी इस यंत्र की स्थापना व पूजन करने से बहुत लाभ होता है। इस यंत्र के घर में रहने से किसी भी प्रकार की बुरी शक्ति घर में प्रवेश नहीं करती।

4- अगर आपको धन की इच्छा है, तो इसके लिए आप आज सुबह स्नान आदि करने के बाद भगवान श्रीगणेश को शुद्ध घी और गुड़ का भोग लगाएं। थोड़ी देर बाद घी व गुड़ गाय को खिला दें। ये उपाय करने से धन संबंधी समस्या का निदान हो जाता है।

5- शास्त्रों में भगवान श्रीगणेश का अभिषेक करने का विधान भी बताया गया है। बुधवार के दिन भगवान श्रीगणेश का अभिषेक करने से विशेष लाभ होता है। आज आप शुद्ध पानी से श्रीगणेश का अभिषेक करें। साथ में गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ भी करें। बाद में मावे के लड्डुओं का भोग लगाकर भक्तजनों में बांट दें।
6- आज के दिन किसी गणेश मंदिर जाएं और दर्शन करने के बाद नि:शक्तों को यथासंभव दान करें। दान से पुण्य की प्राप्ति होती है और भगवान श्रीगणेश भी अपने भक्तों पर प्रसन्न होते हैं।

7- आज सुबह उठकर नित्य कर्म करने के बाद पीले रंग के श्रीगणेश भगवान की पूजा करें। पूजन में श्रीगणेश को हल्दी की पांच गठान श्री गणाधिपतये नम: मंत्र का उच्चारण करते हुए चढ़ाएं। इसके बाद 108 दूर्वा पर गीली हल्दी लगाकर श्री गजवकत्रम नमो नम: का जप करके चढ़ाएं। यह उपाय प्रति बुधवार को करने से प्रमोशन होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

8- यदि किसी युवती का विवाह नहीं हो पा रहा है, तो वह आज विवाह की कामना से भगवान श्रीगणेश को मालपुए का भोग लगाए व व्रत रखे। शीघ्र ही उसके विवाह के योग बनने लगेंगे।
9- यदि किसी लड़के के विवाह में परेशानियां आ रही हैं, तो वह आज भगवान श्रीगणेश को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाए। इससे उसके विवाह के योग बनने लगेंगे।

10- आज दूर्वा (एक प्रकार की घास) के गणेश बनाकर उनकी पूजा करें। श्रीगणेश की प्रसन्नता के उन्हें मोदक, गुड़, फल, मावा-मिïष्ठान आदि अर्पण करें। ऐसा करने से भगवान गणेश सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

11- आज के दिन व्रत रखें। शाम के समय घर में ही गणपति अर्थवशीर्ष का पाठ करें। इसके बाद भगवान श्रीगणेश को तिल से बने लड्डुओं का भोग लगाएं। इसी प्रसाद से अपना व्रत खोलें और भगवान श्रीगणेश से मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।

भगवान गणेश सभी दु:खों को हरने वाले हैं। इनकी कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए प्रत्येक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को व्रत किया जाता है, इसे विनायकी चतुर्थी व्रत कहते हैं। विनायकी चतुर्थी का व्रत इस प्रकार करें-

- सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि काम जल्दी ही निपटा लें।

- दोपहर के समय अपने सामथ्र्य के अनुसार सोने, चांदी, तांबे, पीतल या मिट्टी से बनी भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।

- संकल्प मंत्र के बाद श्रीगणेश की षोड़शोपचार पूजन-आरती करें। गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं। गणेश मंत्र (ऊं गं गणपतयै नम:) बोलते हुए 21 दूर्वा दल चढ़ाएं।

- गुड़ या बूंदी के 21 लड्डुओं का भोग लगाएं। इनमें से 5 लड्डू मूर्ति के पास रख दें तथा 5 ब्राह्मण को दान कर दें। शेष लड्डू प्रसाद के रूप में बांट दें।

- पूजा में भगवान श्री गणेश स्त्रोत, अथर्वशीर्ष, संकटनाशक स्त्रोत आदि का पाठ करें।

-ब्राह्मण भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा प्रदान करने के पश्चात संध्या के समय स्वयं भोजन ग्रहण करें। संभव हो तो उपवास करें।

व्रत का आस्था और श्रद्धा से पालन करने पर भगवान श्रीगणेश की कृपा से मनोरथ पूरे होते हैं और जीवन में निरंतर सफलता प्राप्त होती है।

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

भाई बहन का अनूठा मंदिर : जगन्नाथपुरी धाम






भाई बहन का अनूठा मंदिर : जगन्नाथपुरी धाम  

पुरी में जगन्नाथ मंदिर के 8 अजूबे इस प्रकार है।


1.मन्दिर के ऊपर झंडा हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराते हुए।

2.पुरी में किसी भी जगह से आप मन्दिर के ऊपर लगे सुदर्शन चक्र को देखेगे तो वह आपको सामने ही लगा दिखेगा।

3.सामान्य दिन के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है, और शाम के दौरान इसके विपरीत, लेकिन पूरी में इसका उल्टा होता है.
4.पक्षी या विमानों मंदिर के ऊपर उड़ते हुए नहीं पायेगें।

5.मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य है.

6.मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी यह व्यर्थ नहीं जाएगी, चाहे कुछ हजार लोगों से 20 लाख लोगों को खिला सकते हैं.

7. मंदिर में रसोई (प्रसाद)पकाने के लिए 7 बर्तन एक दूसरे पर रखा जाता है और लकड़ी पर पकाया जाता है. इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकते जाती है।

8.मन्दिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर (मंदिर के अंदर से) आप सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि नहीं सुन सकते. आप (मंदिर के बाहर से) एक ही कदम को पार करें जब आप इसे सुन सकते हैं. इसे शाम को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

साथ में यह भी जाने:-
मन्दिर का रसोई घर दुनिया का सबसे बड़ा रसोइ घर है।

प्रति दिन सांयकाल मन्दिर के ऊपर लगी ध्वजा को मानव द्वारा उल्टा चढ़ कर बदला जाता है।

मन्दिर का क्षेत्रफल चार लाख वर्ग फिट में है।
मन्दिर की ऊंचाई 214 फिट है।

विशाल रसोई घर में भगवान जगन्नाथ को चढ़ाने वाले महाप्रसाद को बनाने 500 रसोईये एवं 300 उनके सहयोगी काम करते है।
” जय जगन्नाथ
जय जय जगन्नाथ “

जगन्नाथ धाम चार बड़े धामों में से एक29 Jun 2012


पुरी का जगन्नाथ धाम चार बड़े धामों में से एक है. भगवान जगन्नाथ और उनका रथ महोत्सव मिलन, एकता और अखंडता का प्रतीक है.
उड़ीसा में समुद्र तट पर स्थित पुरी में भगवान जगन्नाथ हिंदुओं के प्रमुख देवता हैं. यहां दर्शन के लिए केवल देश ही नहीं विदेशों से भी काफी संख्या में श्रद्धालु आते हैं. रथयात्रा आषाढ़ महीने के द्वितीया से शुरू होती है जो नौ दिनों तक चलती है. पुरी का जगन्नाथ धाम चार बड़े धामों में से एक है. रथयात्रा का शाब्दिक अर्थ होता है, रथ में बैठकर घूमना. यह रथयात्रा पूरे देश में खूब उत्साह और उमंग के साथ मनायी जाती है. भगवान जगन्नाथ और उनका रथ महोत्सव मिलन, एकता और अखंडता का प्रतीक है.

धार्मिक विशेषता

इस रथ को सजाने के लिए एक महीने से लोग कड़ी मेहनत करते हैं. पुरी के इस उत्सव की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इस रथ को सभी जातियों के लोग खींचते हैं. पुरी के राजा गजपति सोने के झाड़ू से रथ के मार्ग को साफ करते हैं. पूजा और अन्य धार्मिक विधियां समाप्त होने के बाद सुबह-सुबह यह रथ धीरे-धीरे आगे बढ़ता है.

रथ को विभिन्न रंगों और कपड़ों से सजाया जाता है. उनके अलग-अलग नाम भी रखे जाते हैं. भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम है ‘नंदी घोष’, जो 45.6 फीट ऊंचा होता है. बलराम के रथ का नाम ‘ताल ध्वज’, जो 45 फीट ऊंचा होता है और सुभद्राजी के रथ का नाम ‘दर्प दलन’ है. वह 44.6 फीट ऊंचा होता है.

‘नंदी घोष’ का रंग लाल और पीला, ‘ताल ध्वज’ का रंग लाल और हरा तथा ‘दर्प दलन’ का रंग लाल और नीला रखा जाता है. पुरी में देवी सुभद्रा की पूजा होने पर भी उन्हें हिंदू पुराणों में देवी नहीं माना गया है. भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण या जगन्नाथ और श्रीराम की प्रतिमा को रथ में रखा जाता है. इस रथ को बहुत ही भक्तिभाव से श्रद्धालु खींचते हैं. उसे लक्ष्मीजी, राधिकाजी और सीताजी के मंदिर ले जाया जाता है.

रथ पर जगन्नाथ, बलराम और बहन सुभद्रा

इस दिन भगवान जगन्नाथ, अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ तीन अलग-अलग रथों पर सवार होकर पुरी के मार्ग पर नगर यात्रा करने निकलते हैं. अंत में उन्हें जगन्नाथ पुरी के गुड़िया मंदिर ले जाया जाता है. ये तीनों आठ दिनों तक यहां आराम करते हैं और नौवें दिन सुबह पूजा करने के बाद वापस मंदिर में आते हैं. रथयात्रा के पहले दिन सभी रथों को मुख्य मार्ग की तरफ उचित क्रम में रखा जाता है.

उल्टारथ वापस लौटने की यात्रा को उड़िया भाषा में ‘बहुदा यात्रा’ या ‘उल्टा रथ’ कहा जाता है, जो सुबह शुरू होकर जगन्नाथ मंदिर के सामने पूरी होती है. श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा, तीनों को उनके रथ में स्थापित किया जाता है और एकादशी तक उनकी पूजा होती है. उसके बाद उन्हें अपने-अपने स्थान पर मंदिर में विराजमान किया जाता है.

कला-शिल्प का अद्वितीय नमूना

शिल्पकला जगन्नाथ मंदिर, कला और शिल्प जगत में अद्वितीय नमूना है. यह मंदिर 294 फुट ऊंचा है. यहां हर साल नया रथ बनता है, परंतु भगवान की प्रतिमाएं वही रहती हैं. हर साल तीनों रथ लकड़ियों से बनाए जाते हैं, जिसमें लोहे का बिल्कुल प्रयोग नहीं किया जाता है.

बसंत पंचमी के दिन लकड़ियां इकट्ठा की जाती है और तीज के दिन रथ बनाना शुरू होता है. रथ यात्रा के थोड़े दिन पहले ही उसका निर्माण कार्य पूरा होता है. यहां प्रति वर्ष नया रथ बनता है परंतु 9 से 19 वर्ष में आषाढ़ माह आने पर तीनों मूर्तियां नई बनाई जाती हैं. इस प्रक्रिया को ‘नव कलेवर’ या ‘नया शरीर’ भी कहा जाता है.

पुरानी प्रतिमाओं को मंदिर के अंदर स्थित कोयली वैकुंठ नामक स्थान में जमीन में दबा दिया जाता है. इस वर्ष रथयात्रा 29 जून को संपन्न होगी. इस समय किया गया कोई भी शुभ कार्य अत्यंत फलदायक माना जाता है.
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जगन्नाथ मंदिर पुरी
भारत डिस्कवरी प्रस्तुति

उड़ीसा राज्य के तटवर्ती शहर पुरी शहर में जगन्नाथ मंदिर स्थित है। यह मंदिर भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) को समर्पित है। जगन्नाथ मंदिर एक हिन्दू मंदिर है। जगन्नाथ शब्द का अर्थ जगत के स्वामी होता है। इनकी नगरी ही जगन्नाथपुरी या पुरी कहलाती है। पुरी के महान मन्दिर में तीन मूर्तियाँ हैं -
भगवान जगन्नाथ,
बलभद्र व
उनकी बहन सुभद्रा की।
ये सभी मूर्तियाँ काष्ठ की बनी हुई हैं।

पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, इन मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा राजा इन्द्रद्युम्न ने मंत्रोच्चारण व विधि - विधान से की थी। महाराज इन्द्रद्युम्न मालवा की राजधानी अवन्ति से अपना राज–पाट चलाते थे। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास में शुक्ल द्वितीया को होती है। यह एक विस्तृत समारोह है। जिसमें भारत के विभिन्न भागों से आए लोग सहभागी होते हैं। दस दिन तक यह पर्व मनाया जाता है। इस यात्रा को 'गुण्डीय यात्रा' भी कहा जाता है। गुण्डीच का मन्दिर भी है।


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क्यों नहीं है, भगवान जगन्नाथ के हाथ-पैर ?
Friday, June 22, 2012

अपने ही वरदान से हाथ-पांव गंवा बैठे भगवान जगन्नाथ ! भगवान जगन्नाथ तीनों लोकों के स्वामी हैं, इनकी भक्ति से लोगों की मनोकामना पूरी होती है ! लेकिन खुद इनके हाथ-पांव नहीं हैं !!

जगन्नाथ पुरी में जगन्नाथ जी के साथ बलदेव और बहन सुभद्रा की भी प्रतिमाएं है ! जगन्नाथ जी की तरह इनके भी हाथ-पांव नहीं हैं ! तीनों प्रतिमाओं का समान रूप से हाथ-पांव नहीं होना अपने आप में एक अद्भुत घटना का प्रमाण है !!
जगन्नाथ जी के अद्भुत रूप के विषय में यह कथा है कि मालवा के राजा इंद्रद्युम्न को भगवान विष्णु ने स्वप्न में कहा, “समुद्र तट पर जाओ वहां तुम्हें एक लकड़ी का लट्ठा मिलेगा उससे मेरी प्रतिमा बनाकर स्थापित करो ! राजा ने ऐसा ही किया और उनको वहां पर लकड़ी का एक लट्ठा मिला !!
इसी बीच देव शिल्पी विश्वकर्मा एक बुजुर्ग मूर्तिकार के रूप में राजा के सामने आये और एक महीने में मूर्ति बनाने का समय मांगा ! विश्वकर्मा ने यह शर्त रखी कि जब तक वह खुद आकर राजा को मूर्तियां नहीं सौप दे तब तक वह एक कमरे में रहेगा और वहां कोई नहीं आएगा !!
राजा ने शर्त मान ली, लेकिन एक महीना पूरा होने से कुछ दिनों पहले मूर्तिकार के कमरे से आवाजें आनी बंद हो गयी ! तब राजा को चिंता होने लगी कि बुजुर्ग मूर्तिकार को कुछ हो तो नहीं गया ! इसी आशंका के कारण उसने मूर्तिकार के कमरे का दरवाजा खुलावाकर देखा ! कमरे में कोई नहीं था, सिवाय अर्धनिर्मित मूर्तियों के, जिनके हाथ पांव नहीं थे !!
राजा अपनी भूल पर पछताने लगा तभी आकाशवाणी हुई कि यह सब भगवान की इच्छा से हुआ है ! इन्हीं मूर्तियों को ले जाकर मंदिर में स्थापित करो ! राजा ने ऐसा ही किया और तब से जगन्नाथ जी इसी रूप में पूजे जाने लगे !!
विश्वकर्मा चाहते तो एक मूर्ति पूरी होने के बाद दूसरी मूर्ति का निर्माण करते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और सभी मूर्तियों को अधूरा बनाकर छोड़ दिया ! इसके पीछे भी एक कथा है, बताते हैं कि एक बार देवकी रूक्मणी और कृष्ण की अन्य रानियों को राधा और कृष्ण की कथा सुना रही थी !!
उस समय छिपकर यह कथा सुन रहे कृष्ण, बलराम और सुभद्रा इतने विभोर हो गये कि मूर्तिवत वहीं पर खड़े रह गए ! वहां से गुजर रहे नारद को उनका अनोखा रूप दिखा ! उन्हें ऐसा लगा जैसे इन तीनों के हाथ-पांव ही न हों !!
बाद में नारद ने श्री कृष्ण से कहा कि आपका जो रूप अभी मैंने देखा है, मैं चाहता हूं कि वह भक्तों को भी दिखे ! कृष्ण ने नारद को वरदान दिया कि वे इस रूप में भी पूजे जाएंगे ! इसी कारण जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा के हाथ-पांव नहीं हैं !!

रविवार, 27 जुलाई 2014

पूर्व जन्मों की यादें



पुर्न जन्म की यादें
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ईश्वरीय करिश्मा, हत्यारे के घर ही लिया जन्म
चंडीगढ। समय से पहले मिली मौत के निशान दूसरे जन्म में मिले शरीर को दाग दे जाते हैं। पीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग की स्टडी कहती है कि अगर व्यक्ति अप्राकृतिक मौत का शिकार (हत्या, डूबना, स़डक हादसा या दुर्घटना) होता है तो आखिरी समय में वह जो भी कष्ट सहता है, वह बर्थ मार्क के रूप में अगले जन्म तक साथ नहीं छोडता।

स्टडी पिछले जन्मों के ऎसे कई राज खोलती है, जिसमें मौत के दो साल बाद व्यक्ति का पुर्न जन्म हुआ और उसे अपने पिछले जन्म के हर रिश्ते की याद थी। न्यूरोलॉजी विभाग पुर्न जन्म की थ्यौरी को सुलझाने के लिए 20 सालों से काम कर रहा है। एक मामूली सी चोट पर जोर-जोर से चिल्लाने वाले 5 साल के धु्रव (बदला नाम) को जब दिमागी रोग समझ बलटाना से पीजीआई इलाज को लाया गया तब पता चला कि धु्रव की यादों में मौजूदा नहीं पिछले जन्म का डर था। धु्रव की टांग में लगी चोट को जब मां दुपट्टे से बांधने लगी तो धु्रव ने मां को धक्का देकर कहा दूर हो जाओ तुम मेरा गला दबा दोगी।

धु्रव ने पिता को बताया कि उसका घर दूसरा है जहां उसके मम्मी-पापा, बहन, बीवी और बच्चे भी हैं। 6 साल की उम्र में धु्रव मां-बाप को सहारनपुर ले गया और वहां पिछले जन्म के मां, बाप और बीवी को पहचान लिया। पिछले जन्म के पिता ने धु्रव से पूछा फैवरेट चीज क्या थी तब धु्रव ने कहा वो ƒ़ाडी जो आपने कलाई पर बांध रखी है।

धु्रव की बात सुनकर पिता रो प़डे और कहने लगे कि मैंने बेटे की याद में ही ƒ़ाडी को कलाई पर बांध रखा है। बेटा रोशनलाल फौजी था और उसका किसी ने कार में ही खून कर दिया था। धु्रव ने पिता को बताया कि पिछले जन्म में जब एक केस की गवाही देने के लिए अदालत जा रहे थे तो रास्ते में एक आदमी और औरत ने लिफ्ट मांगी थी। औरत ने कहा कि वह गर्भवती है और चल नहीं सकती। औरत की हालत देख जब कार में लिफ्ट दे दी तो औरत ने आदमी के साथ मिलकर दुपट्टे के साथ मेरा गला दबा दिया था। न्यूरोलॉजिस्ट आज भी केस को फोलो कर रहे हैं और आज काफी साल बीत चुके हैं।

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तीसरे जन्म में दो पूर्व जन्मों की मुकम्मल याद
मनोरंजन Sep 23, 2010/ आर के भारद्वाज
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अब पुनर्जन्म को विश्व के सभी बुद्धिजीवी और विचारक मानने लगे हैं क्योंकि पुनर्जन्म की घटनाएं सब देशों धर्मों, जातियों और संप्रदायों में घट चुकी हैं। ये सारी घटनायें परामनोवैज्ञानिकों ने जांच परख कर सही पाई हैं और उनको लिपिबद्ध कर लिया गया है।

पुनर्जन्म कर्मों को भोगने के कारण होता है। जब तक कर्मों का क्षय या लय नहीं होता, जन्म मरण होता रहता है। जिस घटना का मैं वर्णन कर रहा हूं वह अनोखी इसलिये है कि इसमें एक सम्पन्न, सुखी, पढ़ी लिखी और विदुषी महिला को जीवन भर अपने दो पूर्व जन्मों की पूरी याद बनी रही जबकि बहुधा एक जन्म की याद रहती है और वह भी आठ दस साल की आयु तक ही।

यह घटना मध्प्रदेश के टीकमगढ़ जिले की है जहां 1948 में एक जिला शिक्षा अधिकारी के यहां एक लड़की ने जन्म लिया जिसका नाम स्वर्णलता मिश्र रखा गया। जब बच्ची साढ़े तीन साल की हुई तो उसने कहना शुरू कर दिया कि मेरा घर कटनी में है जहां मेरे माता पिता और चार भाई रहते हैं। तुम लोग मुझे वहां जाने दो।

उसने अपने पूर्व जन्म के पिता जो कटनी के एक प्रतिष्ठित जमीदार थे, और भाइयों के नाम, मकान का पता जो कटनी रेलवे स्टेशन के सामने है, की पूरी पहचान और भाइयों के नाम भी बताये। उसने अपना पहले का नाम विद्या पाठक बताया और कहा कि उसकी शादी मैहर में पांडेय परिवार में हुई थी जहां उसके दो बेटे और एक बेटी रहती हैं तथा उनके नाम भी बताये।

उसने यह भी बताया कि उसकी मृत्यु 31 वर्ष की आयु में हृदयाघात से हुई थी।

बेटी की परत-दर-परत पुनर्जन्म की स्मृतियों को सुनकर पिता चकित रह गये। उन्होंने निश्चय कर लिया कि वह इन सब की सत्यता की पुष्टि करेंगे। समय निकाल कर बच्ची के पिता कटनी जा पहुंचे और खोजबीन की तो आश्चर्य चकित रह गये। बेटी द्वारा बताई गई सारी बातें अक्षरशः सच निकली। ऐसा ही मेहर में भी हुआ जहां उसके पूर्व जन्म के ससुरालीजन रहते थे।

तब उन्हें स्वीकार करना पड़ा कि यह सचमुच ही पुनर्जन्म का मामला है। यह सोच कर कि इन सब बातों को लेकर अफवाहों का दौर चल पड़ेगा, इसलिये उन्होंने इस मामले को सख्ती से दबा दिया और परिजनों से इस संबंध में किसी भी प्रकार की चर्चा करने से मनाही कर दी।

जब बच्ची छतरपुर में जहां उसके पिता का तबादला हो गया था, पाठशाला पढ़ने के लिये जाने लगी तो वहां अपनी सहपठियों को अपनी पूर्व जन्म की बातें बतलाने लगी। यह बात धीरे-धीरे पूरे शहर में फैल गई तो लोग इस अद्भुत बालिका को बड़ी उत्सुकता से देखने आने लगे।

जब तत्कालीन मुख्यमंत्राी प॰ द्वारिका प्रसाद मिश्र छतरपुर आये तो उन्होंने भी यह बात सुनी और बच्ची के घर पहुंच गये। उन्होने स्वर्णलता से मुलाकात की और कई सवाल किये जिस से वह संतुष्ट हुए। तब मुख्यमंत्राी ने राजस्थान के परामनोवैज्ञानिक डा॰ एच॰ बनर्जी को परीक्षण हेतु भेजा।

जांच के बाद डा॰ बनर्जी ने बताया कि यह पुर्नजन्म की सत्य घटना है और इस का कारण दिमाग में अतिरिक्त याददाश्त है जो धीरे-धीरे विस्मृत हो जायेगी। जब कटनी में स्वर्णलता के पूर्व जन्म के रिश्तेदारों ने सुना तो इसको मनगढ़ंत माना लेकिन सही घटना को कब तक नकारते।

सच्चाई जानने के लिये बच्ची का एक भाई छतरपुर अपनी पहचान छिपा कर उसके घर जा पहुंचा। उसने बच्ची के पिता से कहा कि वह इलाहाबाद से आया है और स्वर्णलता से मिलना चाहता है। उसी समय बच्ची जो मन्दिर गई हुई थी, वापस घर आई और मेहमान को देखकर चैंक उठी और प्रसन्न हो कर बोली- अरे बाबू , तुम कब आये।

जब पिता ने कहा कि तुम इन्हें कैसे जानती हो, ये तो इलाहाबाद से आये हैं। स्वर्णलता ने कहा कि नहीं ये कटनी से आये हैं और मेरे बड़े भाई बाबू हैं। यह सुनकर बाबू ने जिसका नाम हरिहर प्रसाद था, बहिन के पांव छू लिये और सच को स्वीकार किया।

बच्ची ने भाई से समस्त परिवार वालों का हालचाल पूछा तथा कई ऐसी बातें भी पूछी जिन को केवल वह और हरि हर प्रसाद ही जानते थे। सब बातों को सुनकर उस को पूर्ण विश्वास हो गया कि स्वर्णलता उनके पूर्व जन्म की बहिन विद्या ही है।

कुछ समय बाद जब पिता उसको लेकर कटनी गये तो स्वर्णलता ने अपने आप अपना घर ढूंढ लिया जबकि उससे पहले वह वहां कभी नहीं गई थी। वहां उसने अपने पिता तथा पूर्व जन्म के अन्य तीनों भाइयों को पहचान लिया। वह जैसे इनको भी पूर्वजन्म में संबोधित करती थी, ठीक वैसे ही किया जिसे देखकर सब को पूर्ण विश्वास हो गया कि विद्या ने ही स्वर्णलता के रूप में पुनर्जन्म लिया है। उसने अपने भाइयों से मैहर का हालचाल भी पूछा जहां उसकी पूर्वजन्म की ससुराल थी। वहां का कुशल क्षेम जान कर वह बड़ी प्रसन्न हुई और मैहर जाने की जिद करने लगी। उस समय न ले जाकर बाद में पिता उसको मैहर ले गये। वहां भी उसने अपने पूर्व जन्म के पति को एक तीनों बेटे-बेटियों को पहचान लिया। उसने तीनों बच्चों को मां के समान प्यार किया। वे लोग भी उसको देखकर बहुत ही खुश हुए।

एक दिन जब स्वर्णलता 5 साल की थी तो वह असमिया भाषा में गाना गाने लगी और असमिया बोली बोलने लगी। पिता के पूछने पर उसने बताया कि उसका एक जन्म तो कटनी में हुआ था तथा एक जन्म आसाम के सिलहठ में हुआ। तब मेरा नाम कमलेश गोस्वामी था तथा मैं चार भाई बहनों में सबसे बड़ी थी।

उसने उस जन्म के मां बाप के नाम भी बताये और कहा कि तब उसकी मृत्यु 8 साल की आयु में कार दुर्घटना में हो गई थी जब वह शाला जा रही थी। बच्ची को आसाम की बोली, गीत एवं नृत्य आते थे जो गुजरते वक्त के साथ धुंधले होते चले गये लेकिन दूसरे जन्म की यादें रह गई थी और वह उस जन्म के स्वजनों से मिलने के लिये बेताब रहने लगी परन्तु वह क्षेत्रा देश के बंटवारे के साथ पूर्वी पाकिस्तान अब बंगला देश में चला गया जिस से उन लोगों से मिलना नहीं हो सका।

स्वर्णलता पढ़ने में बहुत होशियार थी। उसकी बुद्वि तीव्र थी। उसने एम. एस. सी वनस्पति शास्त्रा में किया और पर्यावरण एवं प्रदूषण में पी. एच. डी. कर के वनस्पति शास्त्रा की प्राध्यापिका हो गई। वह भाग्यवान भी थी। उसकी शादी एक उच्च अधिकारी से हो गई जो बाद में जिलाधीश हो गये। उसके दो बेटे हो गये और सुखी वैवाहिक जीवन मिला।

स्वर्णलता के केस की जांच वर्जीनिया विश्वविद्यालय यू. एस. ए. के परामनोचिकित्सा विभाग के संचालक प्रो॰ डा॰ इवान स्टीवेंसन ने की जिन्होंने विश्व में विभिन्न क्षेत्रों में पूर्वजन्म की लगभग 60 घटनाएं एकत्रा की हैं। उन्होंने स्वर्णलता के पहले जन्म के बारे में पूरी छानबीन की और सही पाया। इन घटनाओं से एक बात स्पष्ट होती है कि लड़की सदा लड़की पैदा होती है और लड़का लड़का ही जन्म लेता है।

स्वर्णलता तीनों जन्मों में लड़की पैदा हुई और उच्च ब्राहमण कुल में जन्मी। उसका पहला जन्म कटनी म. प्र. के प्रतिष्ठित पाठक परिवार में हुआ, दूसरा जन्म सिलहर आसम के प्रतिष्ठित गोस्वामी परिवार में हुआ और तीसरा वर्तमान जन्म टीकमगढ़ म. प्र. जिला के प्रतिष्ठित मिश्र परिवार में हुआ।

यह निश्चित नहीं है कि स्वर्णलता का आसाम वाले परिवार से जिस से मिलने को वह बड़ी बेताब रहती थी, संपर्क हुआ या नहीं। पूर्व जन्मों की यादें उन लोगों को रहती है जिन की मृत्यु किसी उत्तेजनात्मक आवेशग्रस्त मनःस्थिति में हुई है जैसे दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या, प्रतिशोध, कातरता, मोहग्रस्तता आदि। ऐसे विक्षुब्ध घटनाक्रम प्राणी की चेतना पर गहरा प्रभाव डालते हैं और वे उद्वेग नये जन्म में भी स्मृति पटल पर उभरते रहते हैं।

अधिक प्यार या अधिक द्वेष जिन से रहा हो, वे लोग विशेष रूप से याद आते हैं। भय, आशंका, अभिरूचि, बुद्धिमता, कला कौशल आदि की भी पिछली छाप बनी रहती है। आकृति की बनावट और शरीर पर जहां तहां पाये जाने वाले विशेष चिन्ह भी अगले जन्म में उसी प्रकार पाये जाते हैं।

बच्चे को याद है पिछला जन्म



7 साल के बच्चे को याद है पिछला जन्म, पत्नी को पहचाना
अंकुर अवस्थी|Jul 16, 2014
http://www.bhaskar.com


(स्कूल में टीचर्स के साथ रजनीश।)

अलवर. कुंडलका गांव का सात साल का रजनीश अचानक अपने आपको सवाईमाधोपुर के शेरपुर गांव का केदार कुम्हार बताने लगा और कहने लगा कि वहां पर मेरी पत्नी है, बच्चे है तो सब आश्चर्यचकित हो गए।

रजनीश ने यह बात घर पर पिता और स्कूल में क्लास टीचर को बताई। बात बढ़ी तो गांव वालों ने शेरपुर में भी संपर्क किया। वहां से भी लोग आए, उन्होंने दावा किया कि बच्चा जो भी बात बता रहा है वह सच है। उसने अपनी पत्नी कैलाशी और अन्य लोगों को भी पहचान लिया और उनसे बातें की।

जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी दूर भर्तृहरि के समीप कुंडलका निवासी रामकरण गुर्जर का बेटा रजनीश गुर्जर खुद को पिछले जन्म का केदार बताता है जो कि सवाईमाधोपुर के शेरपुर रहता था परिजनों का कहना है कि दो साल की उम्र से ही रजनीश पिछले जन्म की बातें बताई पर किसी को यकीन नहीं हुआ और टाल गए।

पिछले दिनों जब बालक ने अपने गांव जाने की जिद की तो परिजनों ने शेरपुर गांव से जानकारी हासिल की। बालक द्वारा बताए गए तथ्यों का पता लगाने के बाद रजनीश के पिता और परिवार के अन्य सदस्य उसे आठ जुलाई को शेरपुर-बिलचीपुर ले गए। जहां पर बालक ने जोगी महल और गणेश मंदिर को पहचाना और अपने पिछले जन्म के परिजनों की पहचान भी कर ली। इसके बाद से गांव में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया।
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{माता-पिता और भाइयों के साथ बैठा रजनीश (नीली शर्ट में)}
पत्नी कैलाशी और बेटी को पहचान गया रजनीश

पिछले जन्म में खुद को केदार बता रहे रजनीश से मिलने के लिए 12 जुलाई को शेरपुर से केदार की पत्नी कैलाशी और परिजन आए। रजनीश सभी को पहचान गया और उनसे बातचीत करने लगा। इसके बाद जाते समय रजनीश ने अपनी बेटी को गिफ्ट देने की जिद की।

रजनीश अगले माह शेरपुर में लगने वाले गणेश मेले में जाने की भी जिद कर रहा है। बालक की इन हरकतों से परिजन हैरान हैं और पूरे गांव के लिए यह बालक अनोखा बना हुआ है। गांव के सरकारी स्कूल में दूसरी कक्षा में पढ़ रहा रजनीश स्कूल में भी अपने पूर्वजन्म की बातें बताता रहता है।
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{भाई के साथ रजनीश (नीली शर्ट में)}
उम्र सात साल गंभीरता युवा जैसी

महज सात साल की उम्र में काफी गंभीर दिखाई देने वाला रजनीश हमउम्र बच्चों की तरह शरारतें नहीं करता। पिता रामकरण का कहना है कि कोई गलती होने पर रजनीश तुरंत माफी मांग लेता है और खुद ही अपनी गलती बता देता है।

इसकी पुष्टि करते हुए स्कूल की अध्यापिका निहारिका सैनी और उषा सैनी ने बताया कि स्कूल समय में रजनीश शरारतें कम ही करता हैं और एक बार समझाई बात को लंबे समय तक याद रखता है और अक्सर अपने पुनर्जन्म की बातें बताता रहता है। रजनीश की मां वीरवती ने बताया कि रजनीश अन्य तीनों भाई बहनों के मुकाबले गंभीर है।

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(स्कूल में रजनीश का हाथ पकड़कर कुछ समझाते हुए टीचर।)

रजनीश ने क्या बताया पूर्वजन्म के बारे में

रजनीश गुर्जर खुद को सवाई माधोपुर के शेरपुर-बिलचीपुर का निवासी केदार कुम्हार बताता है। बालक ने भास्कर से बातचीत में कहा कि शेरपुर में उसके पास दो गधे थे, जिससे किले पर मिट्टी ले जाने का काम करता था। इसके अलावा रजनीश ने पूर्वजन्म की अपनी पत्नी, संतानों के नाम, स्थानीय जोगी किले गणेश मंदिर की जानकारी दी। बालक के परिजनों का दावा है कि सभी तथ्य जांच में सही पाए गए।

'भारतीय दर्शन और धर्म के अनुसार पुनर्जन्म हो सकता है, लेकिन मेडिकल साइंस में दोबारा जन्म जैसे घटना को प्रमाणित करने के कोई ठोस तथ्य नहीं हैं। ऐसे में पुनर्जन्म को नकारना और स्वीकारना दोनों ही मुश्किल हैं।'

डॉ.जेएस शर्मा, कनिष्ठ विशेषज्ञ, मानसिक रोग विभाग, सामान्य चिकित्सालय

सावन और महादेव की महिमा




सावन, सोमवार, शिवलिंग और महादेव की अनंत महिमा

Sanjeev Kumar Dubey Tuesday, July 15, 2014
संजीव कुमार दुबे
http://zeenews.india.com
सावन का महीना और भगवान शंकर यानी भक्ति की ऐसी अविरल धारा जहां हर हर महादेव और बम बम भोल की गूंज से कष्टों का निवारण होता है, मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। यूं तो भगवान शंकर की पूजा के लिए सोमवार का दिन पुराणों में निर्धारित किया गया है। लेकिन पौराणिक मान्यताओं में भगवान शंकर की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन महाशिवरात्रि, उसके बाद सावन के महीने में आनेवाला प्रत्येक सोमवार, फिर हर महीने आनेवाली शिवरात्रि और सोमवार का महत्व है। लेकिन भगवान को सावन यानी श्रावण का महीना बेहद प्रिय है जिसमें वह अपने भक्तों पर अतिशय कृपा बरसाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस महीने में खासकर सोमवार के दिन व्रत-उपवास और पूजा पाठ (रुद्राभिषेक,कवच पाठ,जाप इत्यादि) का विशेष लाभ होता है। सनातन धर्म में यह महीना बेहद पवित्र माना जाता है यही वजह है कि मांसाहार करने वाले लोग भी इस मास में मांस का परित्याग कर देते है।

सावन के महीने में सोमवार महत्वपूर्ण होता है। सोमवार का अंक 2 (पहला रविवार और दूसरा सोमवार) होता है जो चन्द्रमा का प्रतिनिधित्व करता है। चन्द्रमा मन का संकेतक है और वह भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान है। चंद्रमा मनसो जात: यानी चंद्रमा मन का मालिक है और उसके नियंत्रण और नियमण में उसका (चंद्रमा का) अहम योगदान है। यानी भगवान शंकर शिव के मस्तक पर चंद्रमा को नियंत्रित कर उक्त साधक या भक्त के मन को एकाग्रचित कर उसे अविद्या रुपी माया के मोहपाश से मुक्त कर देते हैं। भगवान शंकर की कृपा से भक्त त्रिगुणातीत (सत, रज और तम गुण) भाव को प्राप्त करता है और यही उसके जन्म-मरण से मुक्ति का आधार बनता है।

सावन के महीने में सबसे अधिक बारिश होती है जो शिव के गर्म शरीर को ठंडक प्रदान करती है। भगवान शंकर ने स्वयं सनतकुमारों को सावन महीने की महिमा बताई है कि मेरे तीनों नेत्रों में सूर्य दाहिने, बांये चन्द्र और अग्नि मध्य नेत्र है। जब सूर्य कर्क राशि में गोचर करता है, तब सावन महीने की शुरुआत होती है। सूर्य गर्म है जो उष्मा देता है जबकि चंद्रमा ठंडा है जो शीतलता प्रदान करता है। इसलिए सूर्य के कर्क राशि में आने से झमाझम बारिस होती है। जिससे  लोक कल्याण के लिए विष को पीने वाले भोले को ठंडक व सुकून मिलता है। इसलिए शिव का सावन से इतना गहरा लगाव है।

सावन और साधना के बीच चंचल और अति चलायमान मन की एकाग्रता एक अहम कड़ी है जिसके बिना परम तत्व की प्राप्ति असंभव है। साधक की साधना जब शुरू होती है तब मन एक विकराल बाधा बनकर खड़ा हो जाता है। उसे नियंत्रित करना सहज नहीं होता। लिहाजा मन को ही साधने में साधक को लंबा और धैर्य का सफर तय करना होता है। इसलिए कहा गया है कि मन ही मोक्ष और बंधन का कारण है। यानी मन से ही मुक्ति है और हम ही बंधन का कारण है। भगवान शंकर ने मस्तक में ही चंद्रमा को दृढ कर रखा है लिहाजा साधक की साधना निर्विघ्न संपन्न होती चली जाती है।

यजुर्वेद के एक मंत्र में मन को बड़ा ही प्रबल और चंचल कहा गया है। मन जड़ होते हुए भी सोते-जागते कभी भी चैन नहीं लेता। जितनी देर हम जागते रहते हैं, उतनी देर यह कुछ न कुछ सोचता हुआ भटकता रहता है। मन की इसी अस्थिर गति को थामने और दृढ करने के लिए भगवान शंकर हमें सावन जैसा मास प्रदान करते हैं। इसी सावन में साधना हर बाधाओं को पार कर आगे बढ़ती है। सावन,सोमवार और भगवान शंकर की अराधना सर्वथा कल्याणकारी है जिसमें भक्त मनोवांछित फर प्राप्त करते हैं।

शिव (शि-व) मंत्र में एक अंश उसे ऊर्जा देता है और दूसरा उसे संतुलित करता है। इसलिए जब हम ‘शिव’ कहते हैं, तो हम ऊर्जा को एक खास तरीके से, एक खास दिशा में निर्देशित करने की बात करते हैं। 'शिवम' में यह ऊर्जा अनंत स्वरुप का रुप धारण करती है। 'ऊं नम: शिवाय' का महामंत्र भगवान शंकर की उस उर्जा को नमन है जहां शक्ति अपने सर्वोच्च रूप में आध्यात्मिक किरणों से भक्तों के मन-मस्तिष्क को संचालित करती है। जीवन के भव-ताप से दूर कर भक्ति को प्रगाढ़ करते हुए सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से मुक्त कर मानसिक और शारीरिक रूप में विकार रहित स्वरूप प्रदान करती है। यह स्वरूप निर्विकार होता है जो परमब्रह्म से साक्षात्कार का रास्ता तय कराता है।

'शिव' शब्द की उत्पत्ति वश कान्तौ धातु से हुई हैं। जिसका मतलब जिसको सब चाहें वही शिव। जीवन में सभी आनंद की इच्छा करते हैं यानी शिव का एक अर्थ आंनद भी है। 'शिव' का एक अर्थ - 'कल्याणकारी' भी है। शिव यानी जो सबको प्यारा।

भगवान शंकर यूं तो अराधना से प्रसन्न होते हैं लेकिन सावन मास में जलाभिषेक, रुद्राभिषेक का बड़ा महत्व है। वेद मंत्रों के साथ भगवान शंकर को जलधारा अर्पित करना साधक के आध्यात्मिक जीवन के लिए महाऔषधि के सामान है। पांच तत्व में जल तत्व बहुत महत्वपूर्ण है। पुराणों ने शिव के अभिषेक को बहुत पवित्र महत्व बताया गया है।

जल में भगवान विष्णु का वास है, जल का एक नाम 'नार' भी है। इसीलिए भगवान विष्णु को नारायण कहते हैं। जल से ही धरती का ताप दूर होता है। जो भक्त, श्रद्धालु भगवान शिव को जल चढ़ाते हैं उनके रोग-शोक, दुःख दरिद्र सभी नष्ट हो जाते हैं। भगवान शंकर को महादेव इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वह देव, दानव, यक्ष, किन्नर, नाग, मनुष्य, सभी द्वारा पूजे जाते हैं।

सावन मास में शिव भक्ति का पुराणों में भी उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो विष निकला उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसीसे उनका नाम नीलकंठ महादेव पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का खास महत्व है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। शिवपुराण में उल्लेख है कि भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से उनकी अभिषेक के रुप में अराधना का उत्तमोत्तम फल है जिसमें कोई संशय नहीं है।

संजीवनं समस्तस्य जगतः सलिलात्मकम्‌।
भव इत्युच्यते रूपं भवस्य परमात्मनः ॥

अर्थात्‌ जो जल समस्त जगत्‌ के प्राणियों में जीवन का संचार करता है वह जल स्वयं उस परमात्मा शिव का रूप है। इसीलिए जल का अपव्यय नहीं वरन्‌ उसका महत्व समझकर उसकी पूजा करना चाहिए। पुराणों में यह भी कहा गया है कि सावन के महीने में सोमवार के दिन शिवजी को एक बिल्व पत्र चढ़ाने से तीन जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। इसलिए इन दिनों शिव की उपासना का बहुत महत्व है।   

प्रजा-पालक रामराज्य के मूल भूत सिद्धांत


 

प्रजा-पालक रामराज्य

 11/3/2012 













































भ्रष्टाचार, हिंसा, असुरक्षा से जूझ रहे भारत की प्रेरणा और प्रकाश स्तंभ है

प्रजा-पालक रामराज्य

दैहिक दैविक भौतिक तापा।

रामराज काहुहिं नहिं व्यापा।।

सब नर करंहि परस्पर प्रीति।

चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।।

(उत्तरकांड 20:1)

इस प्रकार मध्य युग में घोर अत्याचारी और निरंकुश विधर्मी/विदेशी शासकों की दासता में पिस रही भारत की जनता को संत कवि तुलसीदास ने रामराज्य और श्रीराम के जीवन का परिचय देकर प्रजा सुख के लिए सत्ता सुख का त्याग और आतताई शक्तियों के संगठित प्रतिकार का पाठ पढ़ाया। रामभक्ति की इस लहर में से छत्रपति शिवाजी और गुरु गोविंद सिंह जैसे राष्ट्रभक्त योद्धा उत्पन्न हुए। वास्तव में त्रेतायुग में अवतरित हुए श्रीराम द्वारा स्थापित रामराज्य की आदर्श व्यवस्था प्रत्येक युग में शासकों और प्रजा के लिए मार्गदर्शक रही है। 
युगानुकूल राज्यव्यवस्था
आज के संदर्भ में देखा जाए तो अपने देश की सरकार और प्रजा दोनों के लिए रामराज्य की अवधारणा प्रकाश स्तंभ का काम कर सकती है। भ्रष्ट और सत्ता केन्द्रित शासकों का अंत, आतंकियों/नक्सलियों जैसे राक्षसों का संहार और संपूर्ण समाज को निरंकुश शासन के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देने की समयोचित क्षमता रामराज्य के सूत्रों में विद्यमान है। श्रीराम का अवतरण उस युग अथवा कालखंड में हुआ था जब मानवजाति हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई इत्यादि वर्गों में विभाजित नहीं थी। अत: रामराज्य की अत्यंत व्यावहारिक व्यवस्था किसी भी पंथ, भाषा, क्षेत्र और जन की प्रतिनिधि न होकर सम्पूर्ण मानवजाति के आदर्श का प्रतिनिधित्व है। वर्तमान भारत के संदर्भ में प्रखर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का स्थापित पर्याय है रामराज्य।
वोट बैंक की संकीर्ण राजनीति, चारों ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला, घपले/घोटालों में व्यस्त मंत्री, विदेश प्रेरित आतंकवाद, मजहबी तुष्टीकरण, जाति आधारित राजनीति, सामाजिक वैमनस्य और सत्ता लोलुपता की पराकाष्ठा में देशभक्ति सेवा, समर्पण, त्याग, सौहार्द और निरंकुशता के विरुद्ध संघर्ष का संदेश है राम राज्य। एक दिन असत्य पर सत्य की विजय निश्चित है, अधर्म के घोर अंधकार को चीरकर प्रकाश का आविर्भाव होगा ही। सारे समाज जीवन को नष्ट करने वाली भ्रष्ट व्यवस्थाओं का भी अंत होगा, यही संदेश है श्रीराम, रामराज्य और दीपावली का।
ध्येय पथ पर अडिग श्रीराम
श्रीराम के जीवन और उनके द्वारा स्थापित राज्य व्यवस्था अर्थात रामराज्य से भारत की वर्तमान दिशा भ्रमित राजनीति को रचनात्मक दिशा मिल सकती है। राष्ट्रीय कर्तव्य की बलिवेदी पर राजसत्ता के समस्त सुखों को ठोकर मार देने का आदर्श वर्तमान सत्ता केन्द्रित राजनीति को समाप्त कर सकता है। आम समाज के विचार मंथन को शिरोधार्य करते हुए लोकशक्ति अर्थात जनता जनार्दन (जन ईश्वर) का सम्मान करने के मार्ग में उनके प्राणों से भी प्यारे भ्राता लक्ष्मण का त्याग भी कम नहीं रहा। श्रीराम को अपने राष्ट्रीय कर्तव्य से पत्नी, भाई, पुत्र किसी का भी मोह विमुख नहीं कर सका। इस तरह श्रीराम अपने ध्येय पथ से कभी विचलित नहीं हुए।
धर्म की स्थापना, दुष्टों के संहार और संत-महात्माओं की रक्षा को अपनी जीवन यात्रा का ध्येय मानकर श्रीराम ने किशोरावस्था में जिस कठोर वज्र संकल्प को धारण किया था, वह वर्तमान भारतीय समाज के उन युवकों के लिए प्रेरणा स्रोत हो सकता है जो प्रत्येक प्रकार के व्यसनों, प्रलोभनों और मृगमरीचिकाओं में फंसकर भारत राष्ट्र की महान संस्कृति से दूर हटते जा रहे हैं। आज की भौतिकवादी चकाचौंध में अपनी उज्ज्वल परंपराओं से कटते जा रहे भारतीय युवकों को यदि रामराज्य की मानवी संस्कृति की शिक्षा दी जाए तो निश्चित रूप से भारत के भविष्य को महान बनाया जा सकता है।
निरहंकारी राजा, निष्काम कर्मयोगी
चौदह वर्ष तक निरंतर संघर्षरत रहने वाले संन्यासी राम को जब राजा के रूप में राजसत्ता प्राप्त हुई तो उन्होंने अपनी प्रजा और देश विदेश से आए समस्त राजाओं-महाराजाओं के समक्ष रामराज्य के अद्वितीय आदर्शों को ही अपने शेष जीवन का एकमात्र उद्देश्य घोषित किया 'मेरा कुछ भी नहीं, जो कुछ भी है वह तो समाज रूपी परमेश्वर का है। मैं तो उसकी धाती की रक्षा एवं संवर्धन के लिए नियुक्त एक न्यासी मात्र हूं।' राज्याभिषेक के समय उनके मुखमंडल पर लेशमात्र भी अभिमान का कोई चिह्न न था। एक निरहंकारी राजा और एक निष्काम कर्मयोगी की तरह उन्होंने अपनी समस्त सफलताओं का श्रेय अपने साथियों एवं सहयोगियों में बांट दिया। श्रीराम ने कभी स्वयं को एकमात्र नेता के रूप में महिमा मंडित नहीं किया। यही उनका आदर्श नेतृत्व कौशल था।
अपने देश में इन दिनों प्रचलित व्यक्ति विशेष पर केन्द्रित दलगत राजनीति से छुटकारा पाने के लिए श्रीराम का आदर्श राजनीतिक व्यवहार का दिशा सूचक हो सकता है। आज की राज्यव्यवस्था और दलीय प्रणाली को यदि श्रीराम की समाज केन्द्रित राजनीति की ओर मोड़ा जाए तो राष्ट्रीय राजनीति में निस्वार्थ और समर्पण का प्रादुर्भाव आसानी से हो सकता है। यह तभी संभव होगा जब श्रीराम को जाति, पंथ और क्षेत्र की सीमाओं में न बांधकर एक राष्ट्रीय महापुरुष के रूप में समझा जाएगा। अन्यथा रामराज्य की विशालता और समन्वय की अवधारणा भी साम्प्रदायिकता के आरोपों का शिकार हो जाएगी। आज इसी संकीर्ण राजनीति का प्रचलन है।
प्रजा समर्पित रामराज्य
मनीषी साहित्यकार श्री जैनेन्द्र कुमार ने अपने एक लेख 'राजा राम' में श्रीराम की राजनीतिक मर्यादा का बड़ा सुंदर विवेचन किया है 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की आदर्श पुरुषोत्तमता परिवार की सीमा तक ही नहीं रहती। यह सार्वजनिक और राजनीतिक मर्यादा के उत्कर्ष को भी अंकित करती है। यही कारण था कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के परम नायक महात्मा गांधी ने भी स्वराज्य की परिभाषा देने के लिए रामराज्य को ही आधार बनाया।' अत: देश में व्याप्त जातिवाद, भाषावाद और क्षेत्रवाद को मिटाकर सभी भारतवासियों को यदि किसी एक सूत्र में बांधा जा सकता है तो वह है श्रीराम का आदर्श जीवन चरित्र।
संसदीय प्रजातंत्र एवं दूसरे प्रकार की राज्य व्यवस्थाओं को देश और समाज के हित में संचालित करने के लिए भी श्रीराम द्वारा स्थापित मर्यादाओं का अनुसरण करना ही होगा। श्रीराम के लिए राज्य सत्ता व्यक्तिगत तथा पारिवारिक भोग का साधन न होकर समाज सेवा के लिए की जाने वाली तपस्या थी। राजा और सत्ता सेवा के साधन थे, न कि अथाह धन बटोरने का अवसर। रामराज्य की अवधारणा के अंतर्गत राजपद (वर्तमान भाषा में मंत्रालय) प्रजा की ओर से राजा को सौंपी गई थाती है। इसलिए इस पद का उपयोग समाज के लाभ के लिए होना चाहिए न कि घोटालों ओर घपलों के माध्यम से अपनी तिजोरियां भरने के लिए। यही व्यक्तिनिष्ठ राजनीति भ्रष्टाचार को जन्म देती है जिसका आज सर्वत्र बोलबाला है।
सत्तालोलुपता विहीन राज्य व्यवस्था
भारत के राष्ट्रजीवन पर मंडराने वाले संकटों में सबसे बड़ा संकट उसी राजनीति का है जो शासक को उत्तरदायित्व और कर्तव्यनिष्ठा की भावना से दूर हटाकर मात्र अधिकारों के साथ जोड़ रही है। बहुमत आधारित लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि निर्वाचित नेता जनता का प्रतिनिधि न बनकर स्वामी बन जाता है। सभी प्रकार के अधिकारों का स्वामी शासक और कर्तव्यों के पालन का काम जनता का। इसी में से समाज का उत्पीड़न करके अपने पद को बचाने के लिए 'कुछ भी करो' जैसी मनोवृत्ति का जन्म होता है। वर्तमान लोकतंत्र की इससे बड़ी घातक विडम्बना और क्या होगी कि पूरी सरकार अथवा सरकार का मुखिया भ्रष्ट मंत्रियों को बचाने के काम को ही अपना कर्तव्य समझता है। रामराज्य एक आदर्श लोकतंत्र है।
श्रीराम द्वारा प्रदत्त राजनीतिक मर्यादा में सत्ता के दुरुपयोग की कहीं कोई संभावना नहीं। शासक के अधिकारों और कर्तव्य की परिभाषा को रामराज्य में स्थापित की गई शासकीय मर्यादाओं के प्रकाश में समझा जा सकता है। रामराज्य की राजनीतिक व्यवस्था में संघर्ष, स्वार्थ, अहंकार और सत्तालोलुपता के लिए कोई स्थान नहीं। श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और सीता के व्यवहार में सहयोग, सहजीवन, सहचिंतन और सर्वोदय जैसे मानवीय मूल्यों का ही वर्चस्व है। श्रीराम ने रामराज्य की व्यवस्था के सभी आदर्शों को अपने व्यवहार में उतारकर विश्व के समक्ष रखा। उन्होंने अवतारी पुरुष होते हुए भी मनुष्य के नाते व्यवहार किया और आदर्श राजा के नाते शासन के सूत्र संभाले।
भारतीयता की सशक्त अभिव्यक्ति
किशोरावस्था में ही महर्षि विश्वामित्र के साथ जंगलों में जाकर भारत के मानबिन्दुओं को देखना, समझना और उनकी रक्षा करते हुए भारत की ऋषि परंपरा के आगे नतमस्तक होना उनके जीवन की शुरुआत थी। यहीं पर उन्होंने भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक अखंडता को राक्षसी शक्तियों से पूर्णतया सुरक्षित करने का महाव्रत लिया था। फिर अपनी सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा का परिचय सारे संसार के राजाओं के समक्ष देकर सीता का वरण किया। भारत के धर्मगुरु संतों की योजनानुसार पिता के संकल्प की पूर्ति हेतु और अपने जीवनोपद्देश्य के लिए सत्ता सुख को भी त्याग दिया।
श्रीराम ने वनों में जाकर वनवासियों एवं पिछड़ी जातियों को संगठित करके उनका उद्धार करते हुए उनको क्षत्रिय के रूप में सैनिक बाना पहनाकर राष्ट्र रक्षा हेतु तैयार किया। पिछड़ी जाति के निषाद राज केवट को गले लगाकर भाई कहा। पक्षीराज जटायू का स्वयं अपने हाथों से संस्कार करके उसे पिता का सम्मान दिया। भील जाति की एक वृद्धा शबरी के चरण छूकर उसे माता कौशल्या कहकर पुकारा। इसी प्रकार पतिता कहलाई अहिल्या को पापमुक्त करके समाज में प्रतिष्ठा दिलाई। इस तरह भारतीय राष्ट्र जीवन के सभी मापदंडों और सिद्धांतों की अभिव्यक्ति है श्रीराम और उनका रामराज्य।
पिछड़े वर्गों का उद्धार
आज अपने देश के कई राजनीतिक दल और नेता कथित दलित वर्ग के नाम पर अपनी सत्ता केन्द्रित राजनीति चला रहे हैं। इनके थोक वोट प्राप्त करने के लिए कई पिछड़े वर्गों के प्रति घृणा भरी गई थी। पहले ऊंचे वर्गों के मन में पिछड़े वर्गों के प्रति घृणा भरी गई थी और अब इन पिछड़े लोगों के मन में ऊंचे वर्गों के प्रति घोर नफरत भरी जा रही है। पिछड़े बंधुओं को हिन्दुत्व की विशाल राष्ट्रीय धारा से तोड़कर वोट बैंक पक्का करने वाले कथित समाज सुधारकों, समाजवादियों और सत्ता के लोभी राजनीतिज्ञों को यह बात समझ में आनी चाहिए कि इन कमजोर वर्गों का उद्धार इन्हें श्रीराम की राष्ट्रीय धारा से तोड़कर नहीं, जोड़कर ही किया जा सकता है।
श्रीराम का समस्त जीवन कमजोर वर्गों के उत्थान हेतु समर्पित था। पिछड़े बंधुओं का उत्थान ही श्रीराम की विस्तृत कर्मभूमि थी। यही वर्ग श्रीराम की समस्त लीलाओं का आधार रहे हैं। इन पिछड़ी जातियों यथा-वंचितों, गरीबों, वनवासियों और गिरिवासियों के बिना रामराज्य की समग्रता और पहचान अधूरी है। यदि श्रीराम हमारे राष्ट्र जीवन की चेतना हैं तो यह राष्ट्र जीवन भी इस वर्ग के बंधुओं के बिना अधूरा है। श्रीराम के जीवनादर्श समाज के सभी वर्गों में समरसता भरने का सामर्थ्य रखते हैं। आज वनवासी क्षेत्रों में विदेशों से आए ईसाई पादरी सेवा के बहाने मतान्तरण कर रहे हैं। नागालैंड, मिजोरम की समस्याएं इसी का सीधा दुष्परिणाम है। इसका समाधान श्रीराम ने बताया है। उन्होंने चौदह वर्ष तक इन्हीं लोगों में रहकर अपनत्व का नाता जोड़ा। आज कल्याण आश्रम जैसी संस्थाएं इस काम को सफलतापूर्वक कर रही हैं।
श्रीराम का घोषित उद्देश्य
आज अपने देश में चीन और पाकिस्तान की योजनानुसार हिंसक नक्सलवाद और जिहादी आतंकवाद जैसी आसुरी शक्तियां सिर उठा रही हैं। चरम सीमा लांघ रहे इस देशद्रोह से राष्ट्र की अखंडता को चुनौती मिल रही है। वोट की राजनीति ने सत्ता पक्ष को इतना स्वार्थी और कमजोर बना दिया है कि इस प्रकार की आतताई शक्तियों को सख्ती से समाप्त करने का साहस किसी में नजर नहीं आता। श्रीराम के अवतार लेने से पूर्व इक्ष्वाकु वंश के राजाओं की राजधानी अर्थात वृहत्तर भारत के हृदय स्थल अयोध्या के आसपास के दुर्गम पहाड़ी वनक्षेत्रों में धर्म विरोधी राक्षसी शक्तियों का बोलबाला था। राजा, रंक, संत, स्त्रियां, देवस्थल, आश्रम इत्यादि कुछ भी सुरक्षित नहीं था।
राष्ट्र को इस प्रकार की अशांत एवं दुखित परिस्थितियों से निकालकर आदर्श राज्य की स्थापना का बीड़ा श्रीराम ने उठाया। प्रजा के सुख के लिए सुचारु राज्य व्यवस्था की स्थापना का अपना निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए श्रीराम ने सत्ता, राजमहल और अपने प्रिय निकटतम संबंधियों का भी सहर्ष त्याग किया। आज तो अपने देश में नेता सत्ता सुख, पारिवारिक सुख और सम्पत्ति सुख के लिए प्रजा सुख को ठुकराकर बड़े-बड़े घपले, घोटालों में व्यस्त हैं। ऐसी घोर विकट स्थिति में शांत राज्य व्यवस्था की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आतंकियों और नक्सलियों जैसी विदेश प्रेरित आसुरी ताकतों का विनाश करना ही एकमेव रास्ता है।
आसुरी शक्तियों का विनाश
इस समझौतावादी राजनीति और अवसरवादिता के विपरीत श्रीराम ने गुरुकुल विद्यार्थी, वनवासी, संन्यासी और राजा के रूप में आसुरी शक्तियों के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई करने से परहेज नहीं किया। श्रीराम ने हिंसक आतंकवादियों-मारीच, खर-दूषण, ताड़का, त्रिशरा, सुबाहु और इनके पालक राजाओं- बाली, मेघनाद, कुंभकरण और रावण जैसे अपराजेय कहलाने वाले सेनापतियों का स्वयं अपने बाणों से संहार करके भारत राष्ट्र में आदर्श रामराज्य का मार्ग प्रशस्त किया। दूसरे देशों की सीमाओं, सम्पत्ति जन और संस्कृति पर खतरा बने ऐसे विदेशी तत्वों को समाप्त करना प्रत्येक राजा का राष्ट्रधर्म होता है।
भारत सहित पूरे विश्व के विनाश की व्यूहरचना करने वाले राक्षसों के महानायक और संचालक लंकाधिपति को उसके देश में जाकर समाप्त करने का महान कार्य श्रीराम ने किया। श्रीराम की इस प्रहारात्मक रणनीति से भारत के उन वर्तमान शासकों को सबक सीखना चाहिए जो सीमापार (पी.ओ.के.) में चलने वाले आतंकी प्रशिक्षण शिविरों और अपनी ही सीमाओं में पूर्वोत्तर में स्थापित राष्ट्रदोही अड्डों को समाप्त करने के लिए सैनिक कार्रवाई से घबरा रहे हैं। अपने समस्त जीवनकाल में श्रीराम ने जो भी निर्णय लिए वे सभी राष्ट्र और समाज की रक्षा और उत्थान के उद्देश्य से ही लिए। उनमें वोट बैंक की लालसा, तुष्टीकरण और वंशवादी राजनीति का कहीं कोई स्थान नहीं था। रामराज्य का यही सशक्त आधार था।
लोकहित और लोकमर्यादा
श्रीराम ने अपने आत्मसंयमी जीवन और अजेय सैनिक शौर्य द्वारा लंका से उठी अधर्म की आक्रामक लहरों को भी रोका। लंका विजय के पश्चात वहां राज नहीं किया, बल्कि लक्ष्मण को सम्बोधित करके सम्पूर्ण विश्व को भारतीय उज्ज्वल परंपराओं का संदेश दिया कि जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान होती है। अपना उद्देश्य पूरा करने के पश्चात विजयी सैनिकों को विजित प्रदेश में सैनिक मर्यादाओं का पालन करते हुए वापस अपनी मातृभूमि की ओर मोड़कर श्रीराम ने भारत के राष्ट्र जीवन की श्रेष्ठतम परंपराओं का प्रस्तुतिकरण किया। अयोध्या के सिंहासन पर बैठते समय राष्ट्रीय संस्कृति और धर्म का अंकुश स्वीकार किया। लोकहित और लोकमर्यादा पर आधारित राजसत्ता को समाज सेवा और देश रक्षा का साधन बनाकर रामराज्य की सर्वोत्तम आदर्श राज्य व्यवस्था का सूत्रपात किया।
रामराज्य जैसी उच्च कोटि, परंतु अत्यंत व्यावहारिक शासन पद्धति और श्रीराम के मर्यादायुक्त जीवन से न केवल भारतीय समाज और राष्ट्र को ही मार्गदर्शन मिला अपितु सारे संसार ने इस अलौकिक और अभूतपूर्व प्रकाश से अपने तमस को दूर किया। भारत को विश्वगुरु का सम्मान दिलाने में श्रीराम के मर्यादा युक्त जीवन का अद्भुत योगदान रहा। ये सभी मर्यादाएं और आदर्श श्रीराम के स्वयं के व्यक्तित्व से कहीं ऊपर भारतवर्ष की महान संस्कृति बन गए। आज के सत्तालोलुप व्यक्तिनिष्ठ राजनेताओं के लिए श्रीराम की मर्यादा पुरुषोत्तमता दिशा सूत्र बननी चाहिए।
श्रीराम की पुरुषोत्तमता
आज भी विश्व के अनेक देशों में श्रीराम और रामराज्य के मर्यादा पुरुषोत्तम चरित्र का जो प्रभाव दिखाई दे रहा है वह भारत राष्ट्र की मर्यादा पुरुषोत्तमता ही है। हमारे राष्ट्र की रामराज्य की कल्पना के विविध आयाम सृष्टि के सम्पूर्ण जीवन को मर्यादित करते रहे हैं। यह आदर्श और जीवन मूल्य राजा राम के पूर्व भी विद्यमान थे। सृष्टि के आदि में भी थे और अंत तक रहेंगे। भारत के अवतारी पुरुषों, महर्षियों और आध्यात्मिक राष्ट्र नेताओं ने समय समय पर इसकी व्याख्या की, इनको समयोचित बल प्रदान किया और समाज जीवन में समाहित कर दिया। श्रीराम अपने इस राष्ट्रीय और मानवीय कर्तव्य की पूर्ति करने के पश्चात अंत में स्वयं अपने हाथों से श्रेष्ठ नेतृत्व को राज्य व्यवस्था सौंपकर सत्ता से हट गए। अवतारी होते हुए भी श्रीराम ने एक मनुष्य के रूप में अपना अवतारी उद्देश्य पूरा किया।
रामराज्य की श्रेष्ठ राज्य व्यवस्था और श्रीराम का सम्पूर्ण जीवन भारतीय संस्कृति और राष्ट्रजीवन का पर्याय है। उनके आदर्शों के माध्यम से समस्त विश्व ने भारत को जाना है और उनके इन्हीं सर्वोत्तम एवं कल्याणकारक सत्कार्यों से विश्व फिर भारत को जानेगा। स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद और मा.स.गोलवलकर (श्री गुरुजी) ने अपनी दिव्य दृष्टि से 21वीं सदी में भारतमाता के जिस ज्योतिर्मय स्वरूप को विश्वगुरु के सिंहासन पर शोभायमान देखा है, उसका आधार रामराज्य की पुरुषोत्तमता ही होगी।

शनिवार, 26 जुलाई 2014

हरियाली तीज : श्रृंगार का उत्सव



हरियाली तीज : श्रृंगार का उत्सव
हरियाली तीज मुख्यत: स्त्रियों का त्योहार है। इस समय जब प्रकृति चारों तरफ हरियाली की चादर सी बिछा देती है तो प्रकृति की इस छटा को देखकर मन पुलकित होकर नाच उठता है। जगह-जगह झूले पड़ते हैं। स्त्रियों के समूह गीत गा-गाकर झूला झूलते हैं। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज कहते हैं। इसे हरितालिका तीज भी कहते हैं। जनमानस में यह हरियाली तीज के नाम से जानी जाती है

रीति रिवाज़
स्त्रियाँ अपने हाथों पर त्योहार विशेष को ध्यान में रखते हुए भिन्न-भिन्न प्रकार की मेहंदी लगाती हैं। मेहंदी रचे हाथों से जब वह झूले की रस्सी पकड़ कर झूला झूलती हैं तो यह दृश्य बड़ा ही मनोहारी लगता हैं मानो सुहागिन आकाश को छूने चली हैं। इस दिन सुहागिन स्त्रियाँ सुहागी पकड़कर सास के पांव छूकर उन्हें देती हैं। यदि सास न हो तो स्वयं से बड़ों को अर्थात जेठानी या किसी वृद्धा को देती हैं। इस दिन कहीं-कहीं स्त्रियाँ पैरों में आलता भी लगाती हैं जो सुहाग का चिह्न माना जाता है। हरियाली तीज के दिन अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं और माता पार्वती की सवारी बड़े धूमधाम से निकाली जाती है। वास्तव में देखा जाए तो हरियाली तीज कोई धार्मिक त्योहार नहीं वरन महिलाओं के लिए एकत्र होने का एक उत्सव है। नवविवाहित लड़कियों के लिए विवाह के पश्चात पड़ने वाले पहले सावन के त्योहार का विशेष महत्त्व होता है।
पौराणिक महत्त्व

    श्रावण शुक्ल तृतीया (तीज) के दिन भगवती पार्वती सौ वर्षों की तपस्या साधना के बाद भगवान शिव से मिली थीं।
    माँ पार्वती का इस दिन पूजन - आह्वान विवाहित स्त्री - पुरुष के जीवन में हर्ष प्रदान करता है।
    समस्त उत्तर भारत में तीज पर्व बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है।
    इसे श्रावणी तीज, हरियाली तीज तथा कजली तीज भी कहते हैं।
    बुन्देलखंड के जालौन, झाँसी, दनिया, महोबा, ओरछा आदि क्षेत्रों में इसे हरियाली तीज के नाम से व्रतोत्सव के रूप में मनाते हैं।
    पूर्वी उत्तर प्रदेश, बनारस, मिर्ज़ापुर, देवलि, गोरखपुर, जौनपुर, सुल्तानपुर आदि ज़िलों में इसे कजली तीज के रूप में मनाने की परम्परा है। लोकगायन की एक प्रसिद्ध शैली भी इसी नाम से प्रसिद्ध हो गई है, जिसे 'कजली' कहते हैं।

**** राजस्थान के लोगों के लिए त्योहार ही जीवन का सार है।
    तीज के आगमन के हर्ष में मोर हर्षित हो नृत्य करने लगते हैं।
    स्त्रियाँ उद्यानों में लगे रस्सी के झूले में झूलकर प्रसन्नचित् होती हैं तथा सुरीले गीतों से वातावरण गूँज उठता है। तीज सावन (जुलाई–अगस्त) के महीने में शुक्लपक्ष के तीसरे दिन मनाई जाती है।

तीज उत्सव की परम्परा
तीज भारत के अनेक भागों में मनाई जाती है, परन्तु राजस्थान की राजधानी जयपुर में इसका विशेष महत्त्व है। तीज का आगमन भीषण ग्रीष्म ऋतु के बाद पुनर्जीवन व पुनर्शक्ति के रूप में होता है। यदि इस दिन वर्षा हो, तो यह और भी स्मरणीय हो उठती है। लोग तीज जुलूस में ठंडी बौछार की कामना करते हैं। ग्रीष्म ऋतु के समाप्त होने पर काले - कजरारे मेघों को आकाश में घुमड़ता देखकर पावस के प्रारम्भ में पपीहे की पुकार और वर्षा की फुहार से आभ्यंतर आनन्दित हो उठता है। ऐसे में भारतीय लोक जीवन कजली या हरियाली तीज का पर्वोत्सव मनाता है। आसमान में घुमड़ती काली घटाओं के कारण ही इस त्योहार या पर्व को 'कजली' या 'कज्जली तीज' तथा पूरी प्रकृति में हरियाली के कारण 'तीज' के नाम से जाना जाता है।
इस त्योहार पर लड़कियों को ससुराल से पीहर बुला लिया जाता है। विवाह के पश्चात पहला सावन आने पर लड़की को ससुराल में नहीं छोड़ा जाता है। नवविवाहिता लड़की की ससुराल से इस त्योहार पर सिंजारा भेजा जाता है। हरियाली तीज से एक दिन पहले सिंजारा मनाया जाता है। इस दिन नवविवाहिता लड़की की ससुराल से वस्त्र, आभूषण, शृंगार का सामान, मेहंदी और मिठाई भेजी जाती है। इस दिन मेहंदी लगाने का विशेष महत्त्व है।
****साज– श्रृंगार और आनन्द का उत्सव
    तीज पूर्ण रूप से स्त्रियों का उत्सव है।
    स्त्रियाँ आकर्षक परिधानों से सुसज्जित हो भगवती पार्वती की उपासना करती हैं।
    राजस्थान में जिन कन्याओं की सगाई हो गई होती है, उन्हें अपने भविष्य के सास - ससुर से एक दिन पहले ही भेंट मिलती है।
    इस भेंट को स्थानीय भाषा में "शिंझार" (शृंगार) कहते हैं।
    शिंझार में अनेक वस्तुएँ होती हैं। जैसे - मेंहदी, लाख की चूड़ियाँ, लहरिया नामक विशेष वेश–भूषा, जिसे बाँधकर रंगा जाता है तथा एक मिष्टान जिसे "घेवर" कहते हैं।

तीज उत्सव की विशेष रस्म–बया
    इसमें अनेक भेंट वस्तुएँ होती हैं, जिसमें वस्त्र व मिष्ठान होते हैं। इसे माँ अपनी विवाहित पुत्री को भेजती है। पूजा के बाद 'बया' को सास को सुपुर्द कर दिया जाता है।
    पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी यदि कन्या ससुराल में है, तो मायके से तथा यदि मायके में है, तो ससुराल से मिष्ठान, कपड़े आदि भेजने की परम्परा है। इसे स्थानीय भाषा में 'तीज' की भेंट कहा जाता है।
    राजस्थान हो या पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रायः नवविवाहिता युवतियों को सावन में ससुराल से मायके बुला लेने की परम्परा है।
    सभी विवाहिताएँ इस दिन विशेष रूप से शृंगार करती हैं।
    सायंकाल बन ठनकर सरोवर के किनारे उत्सव मनाती हैं और उद्यानों में झूला झूलते हुए कजली के गीत गाती हैं।

मेंहदी रचाने का उत्सव
इस अवसर पर नवयुवतियाँ हाथों में मेंहदी रचाती हैं। तीज के गीत हाथों में मेंहदी लगाते हुए गाये जाते हैं। समूचा वातावरण शृंगार से अभिभूत हो उठता है। इस त्योहार की सबसे बड़ी विशेषता है, महिलाओं का हाथों पर विभिन्न प्रकार से बेलबूटे बनाकर मेंहदी रचाना। पैरों में आलता लगाना, महिलाओं के सुहाग की निशानी है। राजस्थान में हाथों व पाँवों में भी विवाहिताएँ मेंहदी रचाती हैं। जिसे "मेंहदी - माँडना" कहते हैं। इस दिन राजस्थानी बालाएँ दूर देश गए अपने पति के तीज पर आने की कामना करती हैं। जो कि उनके लोकगीतों में भी मुखरित होता है। तीज पर तीन बातें त्यागने का विधान है -

    पति से छल–कपट
    झूठ एवं दुर्व्यवहार करना
    परनिन्दा

मल्हार और झूलों का उत्सव
तीज के दिन का विशेष कार्य होता है, खुले स्थान पर बड़े–बड़े वृक्षों की शाखाओं पर झूला बाँधना। झूला स्त्रियों के लिए बहुत ही मनभावन अनुभव है। मल्हार गाते हुए मेंहदी रचे हुए हाथों से रस्सी पकड़े झूलना एक अनूठा अनुभव ही तो है। सावन में तीज पर झूले न लगें, तो सावन क्या? तीज के कुछ दिन पूर्व से ही पेड़ों की डालियों पर, घर की छत की कड़ों या बरामदे में कड़ों में झूले पड़ जाते हैं और नारियाँ, सखी - सहेलियों के संग सज - संवरकर लोकगीत, कजरी आदि गाते हुए झूला झूलती हैं। पूरा वातावरण ही उनके गीतों के मधुर लयबद्ध सुरों से रसमय, गीतमय और संगीतमय हो उठता है।
**** जयपुर का तीज माता उत्सव और जुलूस
    जयपुर के राजाओं के समय में पार्वती जी की प्रतिमा, जिसे 'तीज माता' कहते हैं, को एक जुलूस उत्सव में दो दिन तक ले जाया जाता था।
    उत्सव से कुछ पूर्व प्रतिमा में दोबारा से रंगकारी की जाती है तथा त्योहार वाले दिन इसे नवपरिधानों से सजाया जाता है।
    पारम्परिक आभूषणों से सुसज्जित राजपरिवार की स्त्रियाँ मूर्ति की पूजा, जनाना कमरे में करती हैं।
    इसके पश्चात प्रतिमा को जुलूस में सम्मिलित होने के लिए प्रांगण में ले जाया जाता है।
    हज़ारों दर्शक बड़ी अधीरता से भगवती की एक झलक पाने के लिए लालायित हो उठते हैं।
    लोगों की अच्छी ख़ासी भीड़ होती है। मार्ग के दोनों ओर, छतों पर हज़ारों ग्रामीण अपने पारम्परिक रंग–बिरंगे परिधानों में एकत्रित होते हैं।
    पुरोहित द्वारा बताए गए शुभ मुहूर्त में, जुलूस का नेतृत्व निशान का हाथी (इसमें एक विशेष ध्वजा बाँधी जाती है) करता है। सुसज्जित हाथी, बैलगाड़ियाँ व रथ इस जुलूस को अत्यन्त ही मनोहारी बना देते हैं।
    यह जुलूस फिर त्रिपोलिया द्वार से प्रस्थान करता है और तभी लम्बी प्रतीक्षा के बाद तीज प्रतिमा दृष्टिगोचर होती है। भीड़ आगे बढ़ प्रतिमा की एक झलक के रूप में आशीर्वाद पाना चाहती है।
    जैसे ही जुलूस आँखों से ओझल होता है, भीड़ तितर–बितर होना आरम्भ हो जाती है। लोग घर लौटकर अगले त्योहार की तैयारी में लग जाते हैं।
    तीज, नृत्य व संगीत का उल्लास भरा पर्व है। सभी प्रसन्न हो, अन्त में स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लेते हैं।
    प्रकृति एवं मानव हृदय की भव्य भावना की अभिव्यक्ति तीज पर्व (कजली तीज, हरियाली तीज व श्रावणी तीज) में निहित है।
    इस त्योहार के आस–पास खेतों में ख़रीफ़ की बुवाई भी शुरू हो जाती है। अतः लोकगीतों में उस त्योहार को सुखद, सुरम्य और सुहावने रूप में गाया–मनाया जाता है।

रामराज्य : आदर्श राज्य व्यवस्था


रामराज्य का वर्णन

चौपाई :
* दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥1॥

भावार्थ:-'रामराज्य' में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं॥1॥

* चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥
राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥2॥

भावार्थ:-धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगत्‌ में परिपूर्ण हो रहा है, स्वप्न में भी कहीं पाप नहीं है। पुरुष और स्त्री सभी रामभक्ति के परायण हैं और सभी परम गति (मोक्ष) के अधिकारी हैं॥2॥

* अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥3॥

भावार्थ:-छोटी अवस्था में मृत्यु नहीं होती, न किसी को कोई पीड़ा होती है। सभी के शरीर सुंदर और निरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुःखी है और न दीन ही है। न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणों से हीन ही है॥3॥

*सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥4॥

भावार्थ:-सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान्‌ हैं। सभी गुणों का आदर करने वाले और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ (दूसरे के किए हुए उपकार को मानने वाले) हैं, कपट-चतुराई (धूर्तता) किसी में नहीं है॥4॥

दोहा :
* राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं॥21॥

भावार्थ:-(काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) हे पक्षीराज गुरुड़जी! सुनिए। श्री राम के राज्य में जड़, चेतन सारे जगत्‌ में काल, कर्म स्वभाव और गुणों से उत्पन्न हुए दुःख किसी को भी नहीं होते (अर्थात्‌ इनके बंधन में कोई नहीं है)॥21॥

चौपाई :
* भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला॥
भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू॥1॥
भावार्थ:-अयोध्या में श्री रघुनाथजी सात समुद्रों की मेखला (करधनी) वाली पृथ्वी के एक मात्र राजा हैं। जिनके एक-एक रोम में अनेकों ब्रह्मांड हैं, उनके लिए सात द्वीपों की यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है॥1॥

*सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी॥
सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी॥ फिरि एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी॥2॥
भावार्थ:-बल्कि प्रभु की उस महिमा को समझ लेने पर तो यह कहने में (कि वे सात समुद्रों से घिरी हुई सप्त द्वीपमयी पृथ्वी के एकच्छत्र सम्राट हैं) उनकी बड़ी हीनता होती है, परंतु हे गरुड़जी! जिन्होंने वह महिमा जान भी ली है, वे भी फिर इस लीला में बड़ा प्रेम मानते हैं॥2॥

* सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला॥
राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा॥3॥
भावार्थ:-क्योंकि उस महिमा को भी जानने का फल यह लीला (इस लीला का अनुभव) ही है, इन्द्रियों का दमन करने वाले श्रेष्ठ महामुनि ऐसा कहते हैं। रामराज्य की सुख सम्पत्ति का वर्णन शेषजी और सरस्वतीजी भी नहीं कर सकते॥3॥

* सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी॥
एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी॥4॥
भावार्थ:-सभी नर-नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और ब्राह्मणों के चरणों के सेवक हैं। सभी पुरुष मात्र एक पत्नीव्रती हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्म से पति का हित करने वाली हैं॥4॥

दोहा :
* दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज॥22॥
भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी के राज्य में दण्ड केवल संन्यासियों के हाथों में है और भेद नाचने वालों के नृत्य समाज में है और 'जीतो' शब्द केवल मन के जीतने के लिए ही सुनाई पड़ता है (अर्थात्‌ राजनीति में शत्रुओं को जीतने तथा चोर-डाकुओं आदि को दमन करने के लिए साम, दान, दण्ड और भेद- ये चार उपाय किए जाते हैं। रामराज्य में कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिए 'जीतो' शब्द केवल मन के जीतने के लिए कहा जाता है। कोई अपराध करता ही नहीं, इसलिए दण्ड किसी को नहीं होता, दण्ड शब्द केवल संन्यासियों के हाथ में रहने वाले दण्ड के लिए ही रह गया है तथा सभी अनुकूल होने के कारण भेदनीति की आवश्यकता ही नहीं रह गई। भेद, शब्द केवल सुर-ताल के भेद के लिए ही कामों में आता है।)॥22॥

चौपाई :
* फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन॥
खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥1॥
भावार्थ:-वनों में वृक्ष सदा फूलते और फलते हैं। हाथी और सिंह (वैर भूलकर) एक साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभी ने स्वाभाविक वैर भुलाकर आपस में प्रेम बढ़ा लिया है॥1॥

* कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा॥
सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गुंजत अलि लै चलि मकरंदा॥2॥
भावार्थ:-पक्षी कूजते (मीठी बोली बोलते) हैं, भाँति-भाँति के पशुओं के समूह वन में निर्भय विचरते और आनंद करते हैं। शीतल, मन्द, सुगंधित पवन चलता रहता है। भौंरे पुष्पों का रस लेकर चलते हुए गुंजार करते जाते हैं॥2॥

* लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्रवहीं॥
ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी॥3॥
भावार्थ:-बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु (मकरन्द) टपका देते हैं। गायें मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेती से भरी रहती है। त्रेता में सत्ययुग की करनी (स्थिति) हो गई॥3॥

* प्रगटीं गिरिन्ह बिबिधि मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी॥
सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी॥4॥
भावार्थ:-समस्त जगत्‌ के आत्मा भगवान्‌ को जगत्‌ का राजा जानकर पर्वतों ने अनेक प्रकार की मणियों की खानें प्रकट कर दीं। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल बहाने लगीं॥।4॥

* सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥
सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा॥5॥
भावार्थ:-समुद्र अपनी मर्यादा में रहते हैं। वे लहरों द्वारा किनारों पर रत्न डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य पा जाते हैं। सब तालाब कमलों से परिपूर्ण हैं। दसों दिशाओं के विभाग (अर्थात्‌ सभी प्रदेश) अत्यंत प्रसन्न हैं॥5॥

दोहा :
*बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।
मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥23॥
भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी के राज्य में चंद्रमा अपनी (अमृतमयी) किरणों से पृथ्वी को पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं, जितने की आवश्यकता होती है और मेघ माँगने से (जब जहाँ जितना चाहिए उतना ही) जल देते हैं॥23॥

चौपाई :
* कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥
श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥1॥
भावार्थ:-प्रभु श्री रामजी ने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किए और ब्राह्मणों को अनेकों दान दिए। श्री रामचंद्रजी वेदमार्ग के पालने वाले, धर्म की धुरी को धारण करने वाले, (प्रकृतिजन्य सत्व, रज और तम) तीनों गुणों से अतीत और भोगों (ऐश्वर्य) में इन्द्र के समान हैं॥1॥

* पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता॥
जानति कृपासिंधु प्रभुताई॥ सेवति चरन कमल मन लाई॥2॥
भावार्थ:-शोभा की खान, सुशील और विनम्र सीताजी सदा पति के अनुकूल रहती हैं। वे कृपासागर श्री रामजी की प्रभुता (महिमा) को जानती हैं और मन लगाकर उनके चरणकमलों की सेवा करती हैं॥2॥
* जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥
निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई॥3॥
भावार्थ:-यद्यपि घर में बहुत से (अपार) दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवा की विधि में कुशल हैं, तथापि (स्वामी की सेवा का महत्व जानने वाली) श्री सीताजी घर की सब सेवा अपने ही हाथों से करती हैं और श्री रामचंद्रजी की आज्ञा का अनुसरण करती हैं॥3॥
* जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ॥
कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं॥4॥
भावार्थ:-कृपासागर श्री रामचंद्रजी जिस प्रकार से सुख मानते हैं, श्री जी वही करती हैं, क्योंकि वे सेवा की विधि को जानने वाली हैं। घर में कौसल्या आदि सभी सासुओं की सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बात का अभिमान और मद नहीं है॥4॥
* उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता॥5॥
भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं-) हे उमा जगज्जननी रमा (सीताजी) ब्रह्मा आदि देवताओं से वंदित और सदा अनिंदित (सर्वगुण संपन्न) हैं॥5॥
दोहा :
* जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ।
राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ॥24॥
भावार्थ:-देवता जिनका कृपाकटाक्ष चाहते हैं, परंतु वे उनकी ओर देखती भी नहीं, वे ही लक्ष्मीजी (जानकीजी) अपने (महामहिम) स्वभाव को छोड़कर श्री रामचंद्रजी के चरणारविन्द में प्रीति करती हैं॥24॥
चौपाई :
* सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई॥
प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं॥1॥
भावार्थ:-सब भाई अनुकूल रहकर उनकी सेवा करते हैं। श्री रामजी के चरणों में उनकी अत्यंत अधिक प्रीति है। वे सदा प्रभु का मुखारविन्द ही देखते रहते हैं कि कृपालु श्री रामजी कभी हमें कुछ सेवा करने को कहें॥1॥
* राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती॥
हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा॥2॥
भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी भी भाइयों पर प्रेम करते हैं और उन्हें नाना प्रकार की नीतियाँ सिखलाते हैं। नगर के लोग हर्षित रहते हैं और सब प्रकार के देवदुर्लभ (देवताओं को भी कठिनता से प्राप्त होने योग्य) भोग भोगते हैं॥2॥
* अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्री रघुबीर चरन रति चहहीं॥
दुइ सुत सुंदर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए॥3॥
भावार्थ:-वे दिन-रात ब्रह्माजी को मनाते रहते हैं और (उनसे) श्री रघुवीर के चरणों में प्रीति चाहते हैं। सीताजी के लव और कुश ये दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनका वेद-पुराणों ने वर्णन किया है॥3॥
* दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर॥
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे॥4॥
भावार्थ:-वे दोनों ही विजयी (विख्यात योद्धा), नम्र और गुणों के धाम हैं और अत्यंत सुंदर हैं, मानो श्री हरि के प्रतिबिम्ब ही हों। दो-दो पुत्र सभी भाइयों के हुए, जो बड़े ही सुंदर, गुणवान्‌ और सुशील थे॥4॥
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आदर्श लोकतंत्र भी था रामराज्य
April - 18 - 2013 निरंकार सिंह


सदियों से आदर्श राज्य व्यवस्था के लिए रामराज्य का उदाहरण दिया जाता रहा है। महात्मा गांधी ने भी जिस राम राज्य की कल्पना की थी उसमें आदर्श लोकतंत्र के सभी गुण मौजूद हैं। हालांकि लोकतंत्र की आधुनिक परिभाषा के अनुसार राम राज्य को लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता है। वह मर्यादित राजतंत्र था। लेकिन वह एक ऐसा राजतंत्र था जिसमें श्रेष्ठ लोकतंत्र और कुलीन तंत्र की सभी विशेषताओं को सम्मिलित कर लिया गया था। राम राज्य में राजा राम राज्य के कानून एवं समाज की मर्यादाओं का पालन करते हैं। राज्य द्वारा बनाये गये कानून और विधान केवल जनता के लिए नहीं हैं, राजा के लिए भी हैं। राम का आचरण इसका प्रमाण माना गया है। राम के अनुसार राजा का आचरण जिस प्रकार का होता है, प्रजा का आचरण भी उसी प्रकार का होता है। इसलिए अपनी प्रजा को कोई बात कहने से पहले वे स्वयं उस पर आचरण करते थे। वाल्मीकि ने अपनी रामायण में राम राज्य में जनता की खुशहाली पर प्रकाश डाला है। उस समय पुरवासी और जनपदवासी अत्यन्त खुशहाल थे। डाकुओं और चोरों का तो राज्य में कहीं कोई ठिकाना ही नहीं था। सभी अपने अपने कार्य से संतुष्ट थे। रामराज्य में प्रजा छल प्रपंच से दूर रहती थी और लोग धर्म परायण थे। हर व्यक्ति की बात सुनी जाती थी।
शुक्र नीति के अनुसार राजा ही काल का कारण होता है। सत् और असत् गुणों का प्रवर्तक राजा ही होता है। राजा ही प्रजा को धर्म में प्रतिष्ठित करता है। राम राज्य इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। वास्तव में नीति, प्रीति, परमार्थ एवं स्वार्थ के परम रहस्य को राम ही जानते थे। लोकतंत्रात्मक शासन में शासन की सम्पूर्ण गतिविधि जनसमूह की इच्छा का अनुसरण करने वाली होनी चाहिए। उसमें अपने या भाई-भतीजों के स्वार्थवश शासन कभी जनसामान्य की इच्छा को नहीं ठुकरा सकता। धर्मनियंत्रित राजतंत्र में भी लोकतंत्र के ये गुण बहुत उत्कृष्ट रूप में व्यक्त होते हैं। राम ने अपनी प्रतिज्ञा में इन्हीं भावों को व्यक्त किया था। स्नेह, दया, सुख यहां तक कि अपनी हृदयेश्वरी जनक नन्दिनी को भी त्यागना पड़ा तो उन्हें संकोच नहीं हुआ। आदर्श लोकतंत्र के सभी गुण राम राज्य व्यवस्था में दिखाई देते हैं। राम राज्य में समाज के कमजोर से भी कमजोर व्यक्ति की सुनवाई होती है।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजतंत्र होते हुए भी रघुवंशियों के राज्य काल में लोकतंत्र अक्षुण्ण था। इसलिए महाराज दशरथ को भी राम को युवराज बनाने के लिए जन स्वीकृति लेनी पड़ी थी। उस समय भी मंत्री वही होते थे जो पौरों एवं जनपदों के विश्वासपात्र होते थे। राजा की सभा में सभी जातियों के मुख्य लोग सभासद होते थे। राम जाति, धर्म, देश, श्रेणी धर्म तथा कुल धर्मों को जानते एवं उसका पालन करते थे। भारतीय नीति एवं राजधर्म में राजा का आचरण ही आदर्श राज्य का आधार होता है। राजा चाहे व्यक्ति हो या दल वह अपने व्यवहार से समाज का उन्नायक होता है। अतएव राम ने अपने आचरण द्वारा प्रजा तथा समाज को आदर्श रूप में ढाला था। राम का वैयक्तिक जीवन भी समाज के लिए ही था। तभी तो वे लोकाराधन के लिए वैयक्तिक स्नेह, दया, सुख तथा जानकी तक को त्यागने को तैयार थे। राम राज्य में कर के रूप में उचित धन लिया जाता था। यज्ञ-याज्ञों में धन दान दिया जाता था। तुलसी के अनुसार ‘श्रुतिपालक धर्मधुरन्धर’ राम ने विधान नहीं बनाया, किन्तु आदर्श आचरण उपस्थित किया। तुलसी के राम ने राजधर्म का सर्वस्व यही कहा था कि प्रजा के विभिन्न वर्गों का उनकी स्थिति, क्षमता और संस्कार के अनुसार पालन-पोषण करना राजा का कर्तव्य है, परन्तु विवेक के साथ। मुख द्वारा भक्षित अन्न रस रूप से हस्त, पाद, नेत्र, श्रोत, हृदय, मन, बुद्धि आदि सबको प्रभावित करता है परन्तु सबकी योग्यता तथा आवश्यकता एक सी नहीं है। ‘हाथी को मन भर चींटी को कण भर’ की कहावत प्रसिद्ध ही है।
धर्म नियंत्रित विवेकी राजा ही विभिन्न परिस्थितियों, व्यक्तियों एवं श्रेणियों के साथ गुणोचित कुशलता के साथ व्यवहार कर सकता है। भारतीय राजा उतना शासक नहीं होता था जितना प्रजा के हित का परामर्शदाता। श्री राम प्रजा को आत्मीयता की दृष्टि से उपदेश करते हैं राजा के रुआब में नहीं। ऐसा राजा ही प्रजा के हृदय सिंहासन का अधीश्वर होता है। इसलिए राम राज्य में भौतिक आदि ताप किसी को नहीं व्यापते थे। उच्च धर्मनिष्ठा एवं ब्रह्मïनिष्ठा का ही परिणाम था कि किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती थी। सभी नीरोग होते थे। कोई दु:खी, दरिद्र नहीं होता था। कोई मूर्ख एवं दुर्लक्षण वाला भी नहीं होता था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम का मंत्रिमंडल था, जिसमें विनय, शील, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय,अस्त्र-शस्त्र कुशल, पराक्रमी मंत्री थे।
हमारे देश के संवैधानिक ढांचे के अन्तर्गत ही राम राज्य शासन व्यवस्था अपनायी जा सकती है। उ.प्र. के योजनाकार जगदीश पाण्डेय ने एक ऐसी कार्य योजना तैयार की है जिसमें रामराज्य जैसे प्रशासन के ढांचे की पूरी रूपरेखा है। देश की सामाजिक,आर्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह ऐसा विकल्प है जिसे लागू करके आत्मनिर्भर भारत का निर्माण किया जा सकता है। पिछले 65 वर्षों में भारतीय शासन-प्रशासन का विकास, जनविरोधी, निहित स्वार्थों से कुंठित, अदूरदर्शी एवं राजनैतिक परिस्थितियों में हुआ है। राम राज्य व्यवस्था ही इस देश को संकट से बचा सकती है।
एक पार्टी राम की भावना लहर में चढ़कर सत्ता में आयी थी। पर उसके शासन में भी राम राज्य से वांछित प्रेरणा नहीं ली गई। राम राज्य के लिए शासन से जुड़े लोगों को स्वार्थ त्यागना होगा। पिछली सरकारों की कमजोरियों से उबरना होगा। राम राज्य व्यवस्था की कार्य योजना लागू करनी होगी। इसके अंतर्गत सार्वजनिक धन के कुल व्यय एवं लोक ऊर्जा के शत-प्रतिशत सदुपयोग की योजना तैयार की गयी है। राज्य स्तर पर कार्यकारिणी और सलाहकार मंडल की 25 समितियों के सहयोग से राज्यपाल और प्रशासनिक विभागों के सचिवों पर नियमानुसार दबाव बनाकर शासन-प्रशासन की समस्या के निदान पर जोर दिया गया है। शासन पर वोट के अंकुश से जनहित के लिए दबाव बनाया गया है। नौकरशाहों पर जन पर्यवेक्षण की व्यवस्था को लागू कर उन्हें नियंत्रित करने और नियम कानून, आचार संहिता का दंड चलाकर ‘नेता नौकरशाह गठबंधन’ को ध्वस्त करने की योजना बनायी गयी है।
हमारे पास प्राकृतिक सम्पदा और मानवीय शक्ति की कमी नहीं है। लेकिन नेतृत्व भी व्यवस्था परिवर्तन से भयभीत है और वह इस नयी व्यवस्था को लागू नहीं करना चाहता है। आवश्यकता है हम अपनी ताकत को जानें और इस नयी कार्ययोजना के अनुसार काम में जुट जायें।
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राम राज्य का विचार सपने में बना हुआ है: राष्ट्रपति
Tuesday, 4 February, 2014

नई दिल्ली : राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आज कहा कि ‘रामराज्य’ का विचार इस देश के सपने और आकांक्षाओं में बना हुआ है। तेल मंत्री वीरप्पा मोईली के महाकाव्य ‘श्री रामायण अन्वेषणम’ का हिंदी संस्करण जारी करते हुए मुखर्जी ने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का रामराज्य कोई सामाजिक विचार नहीं बल्कि एक शासन कौशल का एक मॉडल है।
उन्होंने कहा, जब गांधीजी रामराज्य का सपना देखते थे तब यह कोई सामाजिक विचार नहीं था बल्कि यह शासन कौशल का एक मॉडल है। हम उसे वास्तविकता में लागू नहीं कर पाए है लेकिन यह अब भी हमारे सपनों में बना हुआ है, यह हमारी कल्पनाओं में बना हुआ है जिसकी हम आकांक्षा पालते हैं। मोईली के दो खंड के इस महाकाव्य का कन्नड़ से हिंदी में अनुवाद प्रधान गुरूदत्ता ने किया है जिसे राष्ट्रपति को सौंपा गया।
मुखर्जी ने कहा कि कुछ नेताओं ने ही अपने विचार को कलमबद्ध किया है और मोईली उनमें से एक हैं जिन्होंने सरकारी दायित्व निभाते हुए अपने विचारों को कविता के रूप में पिरोया। (एजेंसी)