बुधवार, 2 जुलाई 2014

भगवा संस्कृति ही, भारत का परम् सत्य है - अरविन्द सिसोदिया




लेख
शासन में ”स्वराष्ट्रबोध“ ही महत्वपूर्ण
भगवा संस्कृति ही, भारत का परम् सत्य है
- अरविन्द सिसोदिया [ कोटा , राजस्थान ]


भाजपा की स्वराष्ट्रबोध की विचारधारा, जिसका अर्थ यह देश मेरा है, इस देश के निवासी मेरे हैं, के भाव को कांग्रेस एवं तथाकथित सेक्युलर मण्डली, भगवा आतकंवाद कह कर चीखती चिल्लाती रही, इनके द्वारा इस देश की मूल भगवा संस्कृति को इस तरह अपमानित किया गया जैसे भगवा कोई अपराध हो, अनैतिकता हो। किन्तु पूरे देश ने भाजपा को ही लोकसभा 2014 में शासन के लिये पूर्ण बहूमत से चुन लिया ! पूर्ण बहूमत के साथ ही बहुत सम्मानजन संख्या राजग गठबंधन को दी, 1984 के बाद पहलीबार किसी दल को लोकसभा में पूर्ण बहूमत मिला। कांग्रेस की भारी पराजय का मूल कारण इसके नेतृत्व का बाहरी संस्कृति और विदेश का निवासी होने से, भारत की मूल संस्कृति, सभ्यता और समाज को नहीं समझपाना था। भारत के स्वंय के स्वहितों की उपेक्षा अर्थात ”स्वराष्ट्रबोध“ की उपेक्षा ने कांग्रेस को तथाकथित सेक्युलर मण्डली सहित धो डाला ।

 जो - जो दल इसे भगवा ब्रिगेड , साम्प्रदायिक पार्टी या अन्य तरह के आरोप मढ़ते थे, सभी हांसिये पर प्रभावहीन एवं प्रभुत्वहीन हो गयें । जैसे कांग्रेस को मात्र 44 उनके साथी मुलायमसिंह को 5, करूणा निधि को शून्य, शरद पंवार को 4, मायावती को शून्य, लालूप्रसाद यादव को 4, अजीत सिंह को शून्य  और फारूख अब्दुल्ला को शून्य। इतना ही नहीं साम्यवादी दलों की भी बुरी दुर्गत हो गई, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को मात्र 1 सीट मिली तो माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को मात्र 9 सीटें ही हांसिल हुईं। पश्चिम बंगाल में भाजपा को 2 व साम्यवादियों को 2 सीटें बराबर हैं। मगर वोट प्रतिशत में अब भाजपा वहां 16 प्रतिशत से अधिक होकर चुनौती देने में सक्षम होने जा रही है।
नरेन्द्र मोदी और भाजपा को लम्बे समय से अपमानित कर रहे तथा अपने आप को नरेन्द्र मोदी के समकक्ष मान रहे नितिश कुमार का सबसे बुरा हाल हुआ, वे मात्र दो सीटों पर जा टिके, मुख्यमंत्री पद से भी त्यागपत्र देना पड़ा। कांग्रेस और भाजपा का विकल्प बनने का सपना देख रही आप पार्टी पूरी तरह साफ हो गई। उसकी 4 सीटें पंजाब में मात्र नाम से आप पार्टी की है असलियत में ये लोग बाबा रामरहीम के आर्शीवाद से जीते हुये उनके ही लोग हैं। सामान्यतः भाजपा का बहुत ज्यादा विरोध नहीं करने वाली तथा कभी एनडीए का हिस्सा रहीं ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और जयललिता अपने - अपने प्रांतों में बच गये।

भाजपा और एनडीए की सीटों का नक्शा सम्पूर्ण भारत को भगवा किये हुये है और भगवा हो भी क्यों नहीं, इस देश का हजारों वर्षों से भगवा ध्वज नेतृत्व करता रहा है, इस देश का संत समाज भगवा वस्त्र पहन कर हजारों - हजारों वर्षों से देश का आध्यात्मिक और समाज सुधार कार्यों का नेतृत्व प्रदान करता हैं। इस देश की संस्कृति सभ्यता और स्वाभिमान का नेतृत्व भी भगवा रंग ही करता आ रहा है।  इस देश की राष्ट्ररक्षा के लिये केसरिया बाना पहन कर यु़द्ध भूमि में अपने प्राणो उत्सर्ग करने की परम्परा भी भगवा है। तो सामाजिक एकत्व और आपसी मिलन का पवित्र त्यौहार होली भी टेसू के फूलों के भगवा रंग से ही हजारों वर्षों से मनाया जाता रहा है। यह संस्कृति तो भगवा है कांग्रेस और उसकी मण्डली के लोग इसे गलत तरीके से पेश कर , अंग्रेजों की फूट डालो राज करों की नीति  को अपना कर, इसे भगवा आतंकवाद कह रहे थे। उन्हे देश के जनमत ने जबाव दे दिया कि ”स्वराष्ट्रबोध“  ही सर्वोपरी है। उसी में राष्ट्रहित और जनहित का समावेश है। जो सरकार सीमा उल्लंघन पर चुप रहे, सैनिकों के सिर काटे जानें पर शत्रु राष्ट्र का पक्ष ले, भयानक मंहगाई को रोके नहीं, भष्टाचार के नवीनतम रिकार्ड बना डाले , देश के बहूसख्यक और मूल निवासियों को नारकीय जीवन देने के कानून गढे़, वह कैसे कह सकती है कि उसमें देश का तत्वबोध है। इसी की जनता के द्वारा सजा कांग्रेस को मिली ।

 चुनाव परिणामों से तो स्पष्ट है कि देशवासियों ने विचारधारा के आधार पर ही भाजपा को वोट दिये हैं। भाजपा का मुख्य फोकस ही इस देश का अपना स्वत्व ही था। देशहित पर स्वतंत्र भारत में पहली बली जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष के रूप् में डाॅ0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर को बचाते हुये दी। रोम - रोम से जिसमें भारत है वह भाजपा ही है। कांग्रेस लम्बे समय से इस देश के स्वत्व के साथ छल-कपट कर रही है, उसने भारत को भारत बनने ही नहीं दिया। वह भारत को राज करो की वस्तु मात्र के रूप में देखती रही। स्वतंत्रता का मतलब उसने बहुत ही संर्कीणता से लिया कि पहले अंग्रेज राज करते थे अब कांग्रेस को उनके स्थान पर राज करना है। इसी संर्कीणता के चलते वे धीरे - धीरे प्रांतों से उखड़ गये और अब देश से भी उखड़ चुके हंै। उनके पास मात्र 44 सीटें हैं जो उन्हे नेता प्रतिपक्ष का पद भी नहीं दिला पा रही है। कुल मिला कर कांग्रेस लोकसभा में 10 प्रतिशत से कम रह गई है। इसका मूल कारण विदेशी नेतृत्व के कारण वह स्वत्व भाव से जुड़ नहीं पाई, जितनी थी उससे भी पिछड़ गई। उसे देश हित और जनहित दोनों ही गौड़ नजर आये और विदेशी हितों के पक्ष में ही वह काम करती रही।

कोई भी राजनैतिक दल या विचारधारा देश को भोगने के लिये शासन पर नहीं बिठाई जाती, बल्कि वह देश के निमार्ण ओर संसाधनों के विकास के लिये ही सत्ता में लाई जाती है। जो भी देशहित की नजर अंदाजी करेगा, वह अन्ततः सत्ता से जनशक्ति के द्वारा च्युत कर दिया जायेगा। यही लोकतंत्र है। ऐशा आपातकाल के बाद इन्दिरा गांधी सरकार के साथ हुआ, येशा ही जनता पार्टी की सरकार के साथ भी हुआ और यही मनमोहनसिंह की यूपीए 2 की सरकार के साथ हुआ।

देशहित और जनहित को कभी भी विचारधारा की बेडियों में नहीं जकड़ा जा सकता। अपराध और अनैतिकता को विचारधारा के आधार पर कभी भी स्विकार नहीं किया जा सकता , शासन का मतलब न्याय और नैतिकता की रक्षा करना ही होता है। मगर हमारे यहां पर कांग्रेस शासन रहे हों या अन्य गैर भाजपा शासन रहे हों सभी में देशहित, मूल देशवासी हिन्दूओं के न्याय, शत्रुदेश के आतंकवाद से मुकाबला , सीमाओं की रक्षा जैसे गंभीर मुद्दे हमेशा हांसिये पर डाले, चिन्ता यही रही कि देश में हिन्दू - मुस्लिम फूट बनी रहे। मुस्लिमों महज वोट बैंक बना रहे, देश पर कांग्रेसी राज करते रहें , इस हेतु हिन्दूओं के हितों पर भी अन्याय को काबिज रखा गया। हिन्दू को अपमानित करने के लिये उनके आस्था केन्द्रों पर हमले नजर अंदाज कियेे गये। भारतीय मीडिया में विदेशी निवेश नीति इस तरह की बनाई गई उससे देशहित गायब हो जाये। यूरोप, अमरीका और चीन के व्यापारिक हित पूरे होते रहें, भले ही देश लुट जाये। डाॅलर मंहगा होकर भले ही देश और देश के एक - एक नागरिक को चैपट करता रहे, मगर हम चुप रहेंगे की नीति ने कांग्रेस का भी और देश का भी बंटाधार कर दिया। मंहगे डाॅलर ने खूब लूटा, कांग्रेस हाई कमान और मनमोहनसिंह इस तरह चुप रहे मानों उनका देश भारत न हो कर अमरीका हो।

भारत में शासन की नैतिकता का मार्गदर्शन करने के लिये विश्व में मौजूदा साहित्य से हजार गुणा अधिक अपना भारतीय साहित्य मौजूद है। मगर हम अपनों की बातों को तो भगवा एवं साम्प्रदायिक कह कर नकार देते हैं। दुर्भावनाग्रस्त अंग्रेज हमारे वारे में जो लिख गये, उसे आज तक ढ़ोये जा रहे हैं। शासन में राजा से पहली अपेक्षा न्याय की होती है। युद्धकाल में राष्ट्ररक्षा के लिये सर्चोच्च संघर्ष की होती है। कांग्रेस के रूप में या समाजवाद के रूप में या साम्यवाद के रूप में अथवा हालिया नया सगूफा नेहरूमाडल के रूप में, जनता और देश के लिये ये अपने आपको सही साबित नहीं सके। क्यों कि इन सब में विदेशियत छिपी हुई है। न्याय और सीमाओं की रक्षा हमेशा खतरे में पढ़ी ही दिखीं हैं। क्यों कि इनमें देश प्रेम नहीं था। स्व का भाव नहीं था, अपनापन नहीं था।

स्व का भाव जनहित का प्रेरक बनता है, कांग्रेस शासन जहां कुशासन का पर्याय बना वहीं गुजरात में नरेन्द्र मोदी का शासन बार - बार जनहित के कारण स्विकार किया गया, मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह चैहान का शासन, छतीसगढ में रमनसिंह का शासन स्विकार किया और इन प्रांतों ने जनता की सेवा का इतिहास भी रचा है। क्यों कि इनके पास स्व भाव था स्वदेशी माॅडल था । पश्चिम बंगाल में तीन दसक विदेशी माॅडल साम्यवादी शासन रहा मगर वहां की गरीबी, जीवनस्तर,समस्यायें और विकास शून्यता के हालात और बिगड़ गये। क्यों कि वहां साम्यवादी शासन भय और हिंसा के बल पर लाया जाता था, साम्यवादी प्रभाव के दो प्रांत बंगाल और केरल में राजनैतिक हिंसा का अतिवाद आज भी किसी दुस्वप्न की तरह मौजूद है। अवसर मिलते ही पश्चिम बंगाल की जनता ने मुक्ति को चुना किया आज साम्यवाद वहां शून्य जैसी स्थिती में पहुंच गया।

देशहित और जनहित की बातों की प्रथमिकता हर समय आवश्यक है। देश को आपस में लड़ा कर कितने दिन राज कर सकते हो ? आखिर एक दिन सोचने पर सभी मजबूर होते ही है। विदेशी हमलावरों को पहले भी अन्ततः परास्त होना ही पड़ा है। आज मुस्लिम के सामने भी प्रश्न है कि उसे वोट बैंक बनने से क्या मिला ? अलग - आलग चलने से क्या मिला ? कश्मीर में 370 से क्या हांसिल हुआ ? जम्मू और कश्मीर के आकाओं को यह जानना चाहिये वहां की 6 सीटों में से 3 सीटें उस पार्टी ने जीती है जो धारा 370 हटाना चाहती है। बांगलादेशी घुसपैठ अन्ततः किसको सबसे ज्यादा नुकसान पहुचा रही है ? भारत को ! असाम जो पीडि़त है वहां भाजपा को 14 में से 7 सीटें मिली हैं।  राममंदिर हिन्दुओं का है, पूरा देश ही हिन्दुओं का है। मगर कांग्रेस के नृतत्व में इसे उलछाया गया वहां 80 में से 73 सीटें भाजपा गठबंधन के पास आईं हैं। कौन यहां आक्रमणकारी की तरह आया सब जानते है! बहुत हो गया झूठ के आधार पर धोखाधड़ी का खेल और 60 साल से ज्यादा गुजर गये अब !! अब झूठों की पराजय का युग आ गया है। जनता ने उन्हे परास्त कर दिया है।

इस चुनाव में अल्पसंख्यकवाद के आधार पर जीत तय करने का मिथक टूट चुका है। इस चुनाव में जाती के आधार पर जीत तय करने का मिथक टूट चुका है। इस चुनाव में क्षैत्रवाद का मिथक भी टूट गया । सम्पन्नता और विपन्नता का आधार भी नहीं रहा। पूरा देश देशहित के लिये उठ खड़ा हुआ। देश की नई पौध ने एक नई इबारत लिखी कि अब शासक को ”स्वराष्ट्रबोध“  के साथ खडा होना ही होगा। इस संदर्भ में अपना रिर्पोकार्ड देना ही होगा। समाज में फूट डालो राज करो नहीं चलेगा। आगे भी शासन को जनहित और राष्ट्रहित के र्मोचे पर पूरी ताकत से काम करना ही होगा। शासन में ”स्वराष्ट्रबोध“ होना ही चाहिये ।
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