शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

में प्रधानमंत्री नही प्रधान सेवक हूं - नरेन्द्र मोदी, लाल किले से



में प्रधानमंत्री नही प्रधान सेवक हूं - नरेन्द्र मोदी लाल किले से 

स्वतंत्रता दिवस पर PM मोदी ने की जातिगत-सांप्रदायिक हिंसा पर रोक लगाने की अपील
Friday, August 15, 2014    - भाषा

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को ऐलान किया कि वह देश को संसद में बहुमत के आधार पर नहीं बल्कि सहमति के आधार पर चलाएंगे। उन्होंने जातिगत और सांप्रदायिक हिंसा पर 10 वर्ष के लिए रोक लगाने का आह्वान किया। ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से पहली बार राष्ट्र को संबोधित करते हुए मोदी ने आतंकवाद और हिंसा के रास्ते पर चल निकले नौजवानों से अपने हथियार छोड़कर शांति और विकास का रास्ता अपनाने का आह्वान किया।

प्रधानमंत्री का पद संभालने के तीन माह से भी कम समय के भीतर मोदी ने अपनी सरकार का रोडमैप पेश किया, गरीबों के लिए जनधन योजना का ऐलान किया, जिसमें उनके लिए बीमा की सुविधा भी हो, सांसदों द्वारा आदर्श गांवों का विकास और एक समयसीमा के भीतर खुले में शौच को समाप्त करने की एक योजना का भी ऐलान किया।

उन्होंने कारपोरेट घरानों से कहा कि वह अपने सामाजिक दायित्व के तौर पर सरकार के साथ मिलकर काम करते हुए शौचालयों के निर्माण में सहयोग दें, जिसके अंतर्गत अगले स्वतंत्रता दिवस तक सभी स्कूलों में, लड़कियों के लिए अलग से शौचालयों का निर्माण किया जाए।

किसी बुलेट प्रूफ ढाल के बिना मोदी ने हिंदी में दिए अपने लगभग सवा घंटे के धाराप्रवाह संबोधन में योजना आयोग के स्थान पर जल्द ही भीतरी और वैश्विक आर्थिक परिवर्तनों को जहन में रखते हुए एक नये संस्थान की स्थापना की घोषणा की।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर देते हुए कि वह प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं बल्कि ‘प्रधान सेवक’ के रूप में अपनी बात कह रहे हैं, राष्ट्र के निर्माण में पूर्व सरकारों, पूर्व प्रधानमंत्रियों और राज्य सरकारों के योगदान का विशेष उल्लेख किया।

सभी राजनीतिक दलों से सहयोग की मांग करते और उनकी मदद का संकल्प लेते हुए मोदी ने कल ही समाप्त हुए संसद सत्र का जिक्र करते हुए कहा, ‘गुरुवार को संसद के सत्र का समापन हुआ। यह सत्र हमारी सोच की पहचान, हमारे इरादों की अभिव्यक्ति था कि हम बहुमति के बल पर आगे नहीं बढ़ना चाहते, हम सहमति के मजबूत धरातल पर आगे बढ़ना चाहते हैं।’

उन्होंने कहा, ‘आप सब लोगों ने देखा होगा कि विपक्ष सहित सभी दलों को साथ लेकर चलने से हमने अभूतपूर्व सफलता हासिल की। इसका यश प्रधानमंत्री अथवा सरकार को ही नहीं जाता बल्कि विपक्ष को, इसके नेताओं को और इसके प्रत्येक सांसद को भी जाता है। मैं सभी सांसदों और राजनीतिक दलों का भी अभिनन्दन करता हूं, जिनकी मदद से हमने सफलता के साथ इस पहले सत्र का समापन किया।’ देश के कुछ भागों में हाल की घटनाओं का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि सांप्रदायिकता और जातिवाद देश की प्रगति में बाधा है।

मोदी ने कहा, ‘हम सदियों से सांप्रदायिक तनाव से गुजर रहे हैं। इसकी वजह से देश विभाजन तक पहुंच गया ..जातिवाद संप्रदायवाद का जहर कब तक चलेगा? किसका भला होगा? बहुत लोगों को मार दिया, काट दिया, कुछ नहीं पाया, भारत मां के दामन पर दाग लगाने के अलावा कुछ नहीं पाया।’ उन्होंने कहा, ‘मैं देश की प्रगति के लिए अपील करता हूं कि हिंसा पर 10 साल के लिए अंकुश लगाया जाए, कम से कम एक बार, ताकि हम इन बुराइयों से मुक्त समाज की ओर बढ़ें। शांति, एकता, सद्भावना और भाईचारे के साथ आगे बढ़ने में कितनी ताकत है। मेरे शब्दों पर भरोसा कीजिए। हम अब तक किए पापों को छोड़ दें और देश को आगे ले जाने का संकल्प करें। हम ऐसा कर सकते हैं।’

मोदी ने अपनी हाल की नेपाल यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पड़ोसी हिमालय देश हिंसा का रास्ता छोड़कर संविधान के रास्ते पर आ गया है, वहां के नौजवान जो एक समय हिंसा के भटकाव में आ गए थे, अब वही संविधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने सवाल किया जब हमारा पड़ोसी देश नेपाल शस्त्र को छोड़कर शास्त्र (संविधान) और युद्ध से बुद्ध का का संदेश विश्व को दे सकता है तो भारत क्यों नहीं।

उन्होंने कहा कि समय की मांग है कि भारत के नौजवान हिंसा का रास्ता छोड़ें और भाईचारे के रास्ते पर चलें। क्या भारत की भूमि हिंसा का रास्ता छोड़ने का संदेश नहीं दे सकती। बलात्कार की घटनाओं पर गंभीर चिंता प्रकट करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, ‘हमारा माथा शर्म से झुक जाता है, जब हम इस तरह की घटनाओं के बारे में सुनते हैं।’ उन्होंने उन राजनेताओं पर प्रहार किया जो इस तरह के अपराध का विश्लेषण करने के लिए ‘मनोवैज्ञानिक’ बन जाते हैं।

उन्होंने कहा, ‘हर कोई मनोवैज्ञानिक बनकर बयान देता है। मैं माताओं और पिताओं से पूछना चाहता हूं कि आपके घर में जब बेटी 10 साल की होती है तो आप उससे पूछते हैं कि कहां जा रही हो, कब तक लौटोगी? पहुंचने पर फोन कर देना क्या बेटे से पूछने की हिम्मत है कि कहां जा रहे हो? बलात्कार करने वाला भी तो किसी का बेटा है। मां बाप होने के नाते क्या कभी बेटे से पूछा कि कहां जा रहे हो। बेटियों पर जितने बंधन डाले हैं, बेटों पर डालो।’ उन्होंने कहा, ‘कानून अपना काम करेगा, लेकिन समाज का भी दायित्व है। मां बाप की भी जिम्मेदारी है।'

मोदी ने कहा कि कंधे पर बंदूक लेकर खून बहाने वाले किसी के तो बेटे हैं जो निर्दोषों का खून बहा रहे हैं। उन्होंने हिंसा की राह पर चलने वाले नौजवानों का आह्वान किया, ‘हिंसा के रास्ते पर गए गिरते लिंगानुपात पर चिंता प्रकट करते हुए मोदी ने कन्या भ्रूण हत्या की निंदा की और कहा कि समाज में ऐसी सोच है कि बेटा होगा तो बुढ़ापे का सहारा बनेगा, लेकिन देखने में आता है कि पांच-पांच बेटे होने और बंगले होने के बावजूद मां बाप ‘ओल्ड ऐज होम’ या वृद्धाश्रम में रहते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘बेटियों की बलि मत चढ़ाइए.. जिनकी अकेली बेटी संतान के रूप में है तो वह अपने सपनों की बलि चढ़ा देती है, शादी नहीं करती और अपने मां बाप की सेवा करती है।’

मोदी ने कहा, ‘मां के गर्भ में बेटी की हत्या, ये कितना बड़ा अपराध है। 21वीं सदी के मानव का मन कितना कलंकित और पाप भरा है, इसे प्रदर्शित करता है। इससे हमें मुक्ति पानी होगी।’ प्रधानमंत्री ने कहा, ‘1000 लड़कों के सामने 940 लड़कियां पैदा होती है। यह समाज में असंतुलन पैदा कर रहा है। ईश्वर तो नहीं कर रहा है।.. मैं उन डॉक्टरों से अनुरोध करना चाहता हूं कि अपनी तिजोरी भरने के लिए किसी मां के गर्भ में पल रही बेटी को मत मारिए।’ लड़कियों की प्रतिभा को बयां करते हुए उन्होंने कहा कि हाल के राष्ट्रमंडल खेलों में हमारे खिलाड़ियों ने 64 पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया, लेकिन याद रखिए कि इनमें 29 पदक जीतने वाली बेटियां हैं।

खुद को दिल्ली के लिए ‘आउटसाइडर’ और ‘एलीट क्लास’ से अछूता करार देते हुए मोदी ने कहा, ‘मेरी बात को राजनीति के तराजू से नहीं तौला जाए.. मैंने जब दिल्ली आकर इंसाइडर व्यू देखा तो मैं चौंक गया।..ऐसा लगा कि एक सरकार के भीतर दर्जनों सरकारें चल रही हैं, हर एक की अपनी अपनी जागीरें बनी हैं। मुझे टकराव नजर आया, मुझे बिखराव नजर आया।’

उन्होंने कहा, ‘एक विभाग दूसरे विभाग से भिड़ रहा है। यहां तक भिड़ रहा है कि एक ही सरकार का एक विभाग उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर दूसरे विभाग से लड़ रहा है। इस टकराव, इस बिखराव से कैसे देश आगे बढ़ेगा। इसलिए मैंने कोशिश की है कि इन दीवारों को गिराया जाए। मैंने कोशिश आरंभ की है कि सरकार असेंबल्ड इंटिटी नहीं, आर्गैनिक इंटिटी (सहज इकाई) बने। एक लक्ष्य, एक मन, एक दिशा, एक मति, एक गति, हमारा संकल्प हो। हम इस संकल्प से सरकार चलाने का प्रयास करें।’

अपनी सरकार के सत्ता में आने के बाद सरकारी कर्मचारियों के समय पर दफ्तर आने की खबरें अखबारों में छपने का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा कि सरकार का मुखिया होने के नाते उन्हें इस तरह की खबरें पढ़कर आनंद आना चाहिए, लेकिन उन्हें यह देखकर पीड़ा हो रही है कि इस तरह की बातें खबरें बना रही हैं। उन्होंने कहा, ‘क्या इस देश में सरकारी अफसर अगर समय पर दफ्तर जाए तो कोई खबर होती है। और अगर यह खबर बनती है तो इससे पता चलता है कि हम कितने नीचे गए हैं। यह इस बात का भी सुबूत है कि सरकारें कैसे चली हैं? आज वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कोटि कोटि भारतीयों के सपनों को पूरा करना है तो ‘होती है, चलती है’ से देश नहीं चलेगा। आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए शासन व्यवस्था नाम का जो पुर्जा है उसे और धारदार, और तेज बनाना होगा।’ उन्होंने सरकारी कर्मचारियों से कहा कि वह काम में निजी हित न देखें बल्कि करोड़ों गरीबों के हितों को ध्यान में रखकर कार्य करें।

इस बात पर जोर देते हुए कि समय बदल गया है प्रधानमंत्री ने 1950 में स्थापित योजना आयोग को समाप्त करने और इसके स्थान पर नया संस्थान बनाने का ऐलान किया।

उन्होंने कहा, ‘हम योजना आयोग के स्थान पर ‘जल्दी ही’ एक नई संस्था स्थापित करेंगे।’ उन्होंने कहा कि योजना आयोग का गठन तात्कालिक अवश्यकताओं को देखकर किया गया था और उसने देश के विकास में अपना योगदान किया लेकिन ‘अब आंतरिक स्थिति बदल गयी है, वैश्विक वातावरण में भी बदलाव आया है।’ उन्होंने कहा कि यदि भारत को आगे बढ़ना है तो राज्यों का विकास जरूरी है। आज संघीय ढांचे को मजबूत करने की जरूरत पहले से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गयी है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि अब ‘पीएम’ और ‘सीएम’ (प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्रियों) को एक टीम के रूप में काम करने का समय है।  देशवासियों को अर्थव्यवस्थाओं के वैश्वीकरण की वास्तविकता को स्वीकार करने का आह्वान करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशी निवेशकों को भारत के विनिर्माण क्षेत्र में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का निमंत्रण दिया। मोदी ने ‘कम, मेक इन इंडिया’ .. ‘आइये, हिंदुस्तान में विनिर्माण कीजिए’ के नारे के साथ विदेशी निवेशकों से ‘इलेक्ट्रिक से इलेक्ट्रानिक, केमिकल से फार्मास्युटिकल्स, प्लास्टिक से लेकर पेपर, आटो से एग्रो इंडस्ट्री और उपग्रह से लेकर पनडुब्बी के विनिर्माण जैसे विविध क्षेत्रों में भारत में निवेश के अवसरों का लाभ उठाने की अपील की।

मोदी ने कहा कि भारत को विश्व में आये बदलावों के संदर्भ में सोचना होगा। उन्होंने उद्योगों और औद्योगिक हुनर रखने वाले युवकों का भी आह्वान किया कि वे ऐसे उत्पाद तैयार करे ताकि दुनिया भर में ‘मेड इन इंडिया’ का नाम स्थापित हो। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में रोजगार को बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने तथा देश की ताकत का सही इस्तेमाल करने के लिये हमें विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देना होगा। उन्होंने ‘जीरो डिफेक्ट’ (त्रुटिहीन उत्पाद) और ‘जीरो इफेक्ट’ (पर्यावरण अनुकूल उद्योग) पर बल देते हुए भारत के इस प्रयास में दुनिया के लोगों को जुड़ने का आह्वान किया।

प्रधानमंत्री ने कहा, ‘आज विश्व बदल चुका है। भारत अलग-थलग एक कोने में बैठकर अपना भविष्य तय नहीं कर सकता।’ उन्होंने इस मौके पर देश के गरीबों तक बैंकिंग सुविधा और बीमा सुरक्षा पहुंचाने के लिये ‘प्रधानमंत्री जनधन योजना’ की घोषणा की। इस योजना के तहत हर गरीब परिवार का बैंक खाता खोला जाएगा, जिसमें खाताधारक को एक लाख रुपए के जीवन बीमा का संरक्षण होगा।

मोदी ने इसे गरीबों के लिये एक अवसर बताते हुए कहा, ‘यही तो है, जो खिड़की खोलता है।’ प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि इस योजना के तहत जो खाते खोले जाएंगे, उन्हें डेबिट कार्ड दिया जाएगा और इसके साथ खाताधारक का एक लाख रपये का बीमा भी कराया जाएगा ताकि ऐसे व्यक्ति के जीवन में कोई संकट आये तो उसके परिजन को एक लाख रपये का बीमा मिल सके।

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

पाक में सीधी जंग की ताकत नहीं - नरेंद्र मोदी



मोदी ने कहा, पाक में सीधी जंग की ताकत नहीं
लेह, एजेंसी First Published:12-08-14 

भारत के खिलाफ आतंकवाद के रूप में परोक्ष युद्ध जारी रखने पर आज पाकिस्तान के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पाकिस्तान पारंपरिक युद्ध लड़ने की क्षमता खो चुका है।
   
अपनी पहली लेह और लद्दाख यात्रा के दौरान थलसेना और भारतीय वायुसेना के जवानों को संबोधित करते हुए मोदी ने पाकिस्तान द्वारा जारी परोक्ष युद्ध की निंदा की। मोदी ने कहा कि पड़ोसी देश पारंपरिक युद्ध लड़ने की क्षमता खो चुका है, लेकिन आतंकवाद के परोक्ष युद्ध में अभी भी संलिप्त है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय सशस्त्र बलों को युद्ध के मुकाबले आतंकवाद से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है।
     
आतंकवाद को एक वैश्विक समस्या बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया के सभी मानवतावादी ताकतों को इससे लड़ने के लिए एकजुट होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत इन मानवतावादी बलों को एकजुट करने और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।
     
मोदी ने कहा कि भारत आधुनिक हथियारों एवं प्रौद्योगिकी से सुसज्जित मजबूत सशस्त्र बलों के प्रति प्रतिबद्ध है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जवानों को आश्वस्त होना चाहिए कि पूरा देश उनका समर्थन करता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि काफी प्रतिकूल चीजों और अपने परिवारों के दैनिक जीवन में संघर्षों के बावजूद सैनिक अडिग रहते हैं। सैनिकों की यह उर्जा एवं कर्तव्य पालन का बोध उन्हें (मोदी को) प्रेरणा देता है। इसलिए वे प्रेरणा लेने के लिए सीमा पर जवानों के पास जाते रहते हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण और कल्याण के लिए केंद्रीय बजट में प्रावधान किए गए हैं। इन प्रावधानों में एक रैंक एक पेंशन का प्रावधान भी शामिल है। मोदी ने सैनिकों से वादा किया कि भारत की भावी पीढियों को प्रेरणा देने के लिए एक राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का निर्माण किया जाएगा। उन्होंने रक्षा कर्मियों को यह भी बताया कि सरकार रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।
   
सीमावर्ती इलाकों में तैनात सशस्त्र बलों का वहां रहने वाले लोगों से बेहतर जुड़ाव बताते हुए मोदी ने करगिल घुसपैठ का उदाहरण दिया। जिसके बारे में पहली सूचना ताशी नामग्याल नामक एक चरवाहे ने दी थी। यहां से रवाना होने से पहले मोदी ने सैनिकों से बातचीत की और आगंतुकों की पुस्तक में लिखा कि विकास के लिए शांति एवं सुरक्षा जरूरी हैं।
   
जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एन एन वोहरा, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, बिजली मंत्री पीयूष गोयल, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार अजित दोभाल और सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह भी इस अवसर पर मौजूद थे।

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छद्म युद्ध' के लिए मोदी ने की पाकिस्तान की आलोचना
12, AUG, 2014, TUESDAY

लेह | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान पर 'छद्म युद्ध' जारी रखने का आरोप लगाते हुए इसके लिए मंगलवार को उसकी आलोचना की। लेह में जवानों को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा, "पड़ोसी देश के पास परंपरागत युद्ध की क्षमता नहीं रही है, लेकिन वह आतंकवाद के छद्म युद्ध में लगातार शामिल है।"

जम्मू एवं कश्मीर में लद्दाख क्षेत्र के एक दिवसीय दौरे पर पहुंचे मोदी ने जवानों को संबोधित करते हुए केंद्रीय बजट में सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण तथा 'वन रैंक वन पेंशन' सहित सशस्त्र बलों के कल्याण के लिए किए गए प्रावधानों का जिक्र किया।उन्होंने कहा कि उनकी सरकार देश को रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बनाने का भी वादा किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि हमारे सुरक्षा बलों को युद्ध की बजाय आतंकवाद से अधिक नुकसान हो रहा है और इसकी वजह से हम अपने जवानों को खो रहे हैं। आतंकवाद को वैश्विक समस्या करार देते हुए मोदी ने कहा, "यह एक वैश्विक समस्या है और दुनिया के सभी मानवीय बलों को एकजुट होकर इसका मुकाबला करना चाहिए। भारत इन मानवीय बलों को मजबूत एवं एकजुट करने के लिए प्रतिबद्ध है।"उन्होंने यह भी कहा कि देश सशस्त्र बल को मजबूत बनाने तथा उन्हें आधुनिक हथियारों एवं प्रौद्योगिकी से संपन्न बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। मोदी ने कहा कि सैनिकों की 'ऊर्जा और कर्तव्यनिष्ठा' ने उन्हें प्रेरित किया। उन्होंने कहा, "जवानों को आश्वस्त किया जाना चाहिए कि पूरा देश उनका समर्थन करता है। अपने परिवार द्वारा दिन-प्रतिदिन के जीवन में कई नकारात्मकताओं और संघर्षो का सामना करने के बावजूद वे अडिग रहते हैं।"

उन्होंने यह भी कहा कि सीमा क्षेत्रों में तैनात सुरक्षा बलों के जवानों के संबंध इन इलाकों में रह रहे लोगों से अच्छे हैं। उन्होंने इसका उदाहरण भी दिया और कहा कि करगिल घुसपैठियों की सूचना सुरक्षा बलों को सबसे पहले ताशी नामग्याल नाम के गड़ेरिये ने ही दी थी।वर्ष 1999 में हुए करगिल युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को हरा दिया था। बाद में लेह ऑडिटोरियम में मोदी ने आगंतुक पुस्तिका में लिखा कि शांति और सुरक्षा विकास की पहली आवश्यकता है।

सोमवार, 11 अगस्त 2014

भारत में रहने वाले लोग हिंदू क्यों नहीं : परम पूज्य भागवत जी



भारत में रहने वाले लोग हिंदू क्यों नहीं:  भागवत जी 

सोमवार, 11 अगस्त 2014

कटक। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख परमपूज्य  मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि अगर इंग्लैंड में रहने अंग्रेज हैं, जर्मनी में रहने वाले जर्मन हैं और अमेरिका में रहने वाले अमेरिकी हैं तो फिर हिंदुस्तान में रहने वाले सभी लोग हिंदू क्यों नहीं हो सकते।

उड़िया भाषा के एक साप्ताहिक के स्वर्ण जयंती समारोह में भागवत ने कहा, ‘सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व है और देश में रहने वाले इस महान संस्कृति के वंशज हैं।’ उन्होंने कहा कि हिंदुत्व एक जीवन शैली है और किसी भी ईश्वर की उपासना करने वाला अथवा किसी की उपासना नहीं करने वाला भी हिंदू हो सकता है।

स्वामी विवेकानंद का हवाला देते हुए भागवत ने कहा कि किसी ईश्वर की उपासना नहीं करने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि कोई व्यक्ति नास्तिक है, हालांकि जिसका खुद में विश्वास नहीं है वो निश्चित तौर पर नास्तिक है।

उन्होंने कहा कि दुनिया अब मान चुकी है कि हिंदुत्व ही एकमात्र ऐसा आधार है जिसने भारत को प्राचीन काल से तमाम विविधताओं के बावजूद एकजुट रखा है। (भाषा)
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भारत में रहने वाले सभी लोग हिंदू क्यों नहीं हो सकते: मोहन भागवत
Monday, August 11, 2014 -
कटक : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि अगर इंग्लैंड में रहने वाले अंग्रेज हैं, जर्मनी में रहने वाले जर्मन हैं और अमेरिका में रहने वाले अमेरिकी हैं तो फिर हिंदुस्तान में रहने वाले सभी लोग हिंदू क्यों नहीं हो सकते।
उड़िया भाषा के एक साप्ताहिक के स्वर्ण जयंती समारोह में भागवत ने कहा, ‘सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व है और देश में रहने वाले इस महान सस्कृति के वंशज हैं।’ उन्होंने कहा कि हिंदुत्व एक जीवन शैली है और किसी भी ईश्वर की उपासना करने वाला अथवा किसी की उपासना नहीं करने वाला भी हिंदू हो सकता है।
स्वामी विवेकानंद का हवाला देते हुए भागवत ने कहा कि किसी ईश्वर की उपासना नहीं करने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि कोई व्यक्ति नास्तिक है, हालांकि जिसका खुद में विश्वास नहीं है वो निश्चित तौर पर नास्तिक है।
उन्होंने कहा कि दुनिया अब मान चुकी है कि हिंदुत्व ही एकमात्र ऐसा आधार है जिसने भारत को प्राचीन काल से तमाम विविधताओं के बावजूद एकजुट रखा है।
भाषा
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भागवत के हिंदू बयान पर मचा सियासी घमासान
Mon, 11 Aug 2014

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के बयान "भारत में रहने वाले सभी लोग हिंदू कहे जाएं" पर सियासी घमासान मच गया है। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने भागवत के इस बयान की कड़ी आलोचना की है।

कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, जनता दल युनाइटेड, माकपा और बसपा ने भागवत के इस बयान की कड़ी आलोचना की है जबकि भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने संघ प्रमुख के बयान का समर्थन किया है।

भागवत ने ओडिशा के कटक में एक कार्यक्रम में रविवार को कहा था कि अगर इंग्लैंड में रहने वाले अंग्रेज हैं, जर्मनी में रहने वाले जर्मन हैं और अमेरिका में रहने वाले अमरीकी हैं तो हिन्दुस्तान में रहने वाले सभी लोग हिन्दू क्यों नहीं हो सकते।

"पहले करें संविधान का अध्ययन"
इस पर बसपा प्रमुख मायावती ने संसद परिसर में कहा, "मैं समझती हूं कि उनको भारतीय संविधान का ज्ञान नहीं है। यदि उन्हें इसकी जानकारी होती तो वह ऎसा नहीं कहते। उन्हें पहले संविधान का अध्ययन करना चाहिए और फिर इस तरह की बातें करनी चाहिए।"

उन्हाेंने कहा कि बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने देश में रहने वाले विभिन्न धर्मो को ध्यान में रखकर ही देश का नाम हिन्दुस्तान नहीं, भारत रखा था और धर्मनिरपेक्षता के आधार देश का संविधान बनाया था।

भारत में रहने वाला भारतीय
राकांपा के डी पी त्रिपाठी ने कहा कि भागवत जी की इतनी बात ठीक है कि फ्रांस में रहने वाला फ्रांसीसी है और इटली में रहने वाला इतालवी। उसी तरह भारत में रहने वाले भारतीय हैं। लेकिन फ्रांस का कोई व्यक्ति यह नहीं कहेगा कि उसकी पहचान फ्रांसीसी कैथोलिक है, इसलिए भारत में रहने वाला हर व्यक्ति भारतीय है।

कांग्रेस के मधुसूदन मिस्त्री ने कहा कि संविधान में सभी धर्मो को बराबर का दर्जा दिया गया है। व्यक्तिगत तौर पर अगर वह हिन्दू धर्म मानते हैं उनको खुद को हिन्दू कहने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन देश को हिन्दू राष्ट्र नहीं कहा जा सकता।

माकपा नेता सीताराम येचुरी ने भी भागवत के बयान की आलोचना की। जदयू के अध्यक्ष शरद यादव ने कहा कि संविधान में इन्सान बनने का सबक है। 68 बरस हो गए हैं और देश संविधान के बताए रास्ते पर चल रहा है और आगे भी चलेगा। जो इस रास्ते को बदलने की कोशिश करेगा वह सफल नहीं होगा।

शिवसेना के संजय राउत ने भागवत के बयान का स्वागत करते हुए कहा कि बाला साहेब ठाकरे ने सबसे पहले इस मुद्दे को उठाया था। हिन्दू केवल एक धर्म नहीं है बल्कि एक जीवन शैली है। वे भागवत के बयान का पूरी तरह समर्थन करते हैं।

मलयाली नर्सों की व्यथा-कथा


यदि हम धर्म निरपेक्ष देश हैं तो केरल से विदेशों में धार्मिक आधार पर नौकरी पर जानें की सुविधा क्यों ?

मलयाली नर्सों की व्यथा-कथा

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ तमिल पत्रकार
10-08-2014 

आप हिन्दुस्तान के किसी भी अस्पताल में जाएं, तो संभव है कि वहां आपको कोई-न-कोई मलयाली नर्स मिल ही जाए। दुनिया के दूसरे मुल्कों की अपनी यात्रा के दरम्यान भी बहुत मुमकिन है कि वे आपको बीमार लोगों की तिमारदारी में जुटी दिखाई दे जाएं, खासकर खाड़ी के देशों में। आखिर केरल इतनी तादाद में नर्सों को विदेश क्यों भेजता है? क्या वजह है कि उनमें से कई नर्सें बमबारी और गोलियों की बरसात वाले खतरनाक हालात में भी काम छोड़कर आना नहीं चाहतीं? इसमें कोई दोराय नहीं कि यह एक महान पेशा है और नर्सें स्वास्थ्य सेवा में एक निर्णायक भूमिका अदा करती हैं। उनकी पेशेवर ईमानदारी और निजी प्रतिबद्धताओं से जुड़ी न जाने कितनी ही कहानियां हमें सुनने को मिलती हैं। अस्पताल से छुट्टी के वक्त हममें से ज्यादातर उनकी सेवा और देखभाल के लिए न सिर्फ उनका धन्यवाद करते हैं, बल्कि उनके प्रति हृदय से आभारी होते हैं। लेकिन हममें से ज्यादातर लोग शायद इस बात से वाकिफ नहीं हैं कि नर्सों और पैरा-चिकित्सकों के साथ ज्यादातर अस्पतालों में या उनके प्रबंधन का क्या सलूक होता है। यदि ‘यूनाइटेड नर्सेज एसोसिएशन’ के दावों पर यकीन करें, तो भारत में नर्सें चिकित्सा सेवा में खुद को हाशिये पर मानती हैं। उन्हें बेहतर तनख्वाह तो नहीं ही दी जाती, बल्कि खराब माहौल में काम करना पड़ता है।

ज्यादातर अस्पतालों में उन्हें अनुभव और योग्यता के मुताबिक वेतन नहीं मिलता। एसोसिएशन का कहना है कि ‘इस क्षेत्र में उत्पीड़न और शोषण लंबे समय से जारी है, मगर इसके खिलाफ आवाज उठाने का साहस आज भी कोई नहीं करता।’ पिछले सप्ताह नर्सों का एक दल लीबिया से सकुशल घर लौटा। लगभग एक महीने पहले ही इराक में फंसी 47 नर्सों को भारत सरकार स्वदेश वापस लाई थी। तब वह खबर हर तरफ सुर्खियों में थी। उन भयभीत नर्सों ने बेहद खौफनाक कहानियां सुनाई थीं। केरल के अखबारों और न्यूज चैनलों में वे कहानियां लगातार प्रकाशित-प्रसारित हुईं। उनमें कुछ तो त्याग और साहस की बेमिसाल निजी दास्तां थीं। लेकिन कुछ खबरें यह भी बता रही थीं कि इराक के इतने खतरनाक हालात के बावजूद उनमें से कुछ नर्सें वापस काम पर बगदाद लौटना चाहती हैं! कई नर्सें बैंक की कर्ज अदायगी की समस्या से जूझ रही थीं और एक के पिता को यह कहते हुए दिखाया गया था कि उसके पास अपनी बेटी को तिरकित वापस भेजने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं है, क्योंकि वहां के लिए एजेंट सबसे कम धन वसूलते हैं। तिरकित के लिए जहां एजेंट 1.5 लाख रुपये लेते हैं, वहीं कुवैत के लिए यह राशि 12 से 18 लाख रुपये के बीच बैठती है। ये पैसे वीजा, टिकट और एजेंटों की फीस के रूप में वसूले जाते हैं।

इराक से जो नर्सें भारत आईं, वे वहां 30 से 40 हजार रुपये महीना पगार पा रही थीं। लेकिन उन्होंने इराक पहुंचने और इन नौकरियों को हासिल करने के लिए जितना खर्चा किया, उतनी राशि वे कमा न सकीं। उनके माता-पिता ने उनकी पढ़ाई और यात्रा के लिए कर्ज लिए थे। कई अभिभावकों ने इसके लिए अपनी जायदाद तक बेच डाली थी। लेकिन जिस बुरे तरीके से उनका करियर संकट में पड़ गया है, उससे वे कठिन आर्थिक परेशानी में फंस गई हैं। केरल से प्रकाशित अखबारों में खाड़ी देशों में नौकरी के विज्ञापन लगातार प्रकाशित हो रहे हैं। मैंने पिछले दिनों पाया कि सिर्फ एक संस्करण में ऐसे चार विज्ञापन छपे थे। एक विज्ञापन में ढाई साल का अनुभव रखने वाली नर्सों को कुवैत में 705 दीनार (लगभग डेढ़ लाख रुपये) मासिक वेतन का प्रस्ताव किया गया था। दूसरे विज्ञापन में दो साल आठ महीने के अनुभव की शर्त थी, जबकि तीसरे में दो साल नौ महीने और चौथे में तीन साल के अनुभव की अपेक्षा की गई थी। ये विज्ञापन ट्रेवल एजेंसी द्वारा दिए गए थे और इनमें आवेदकों को ‘स्थायी नौकरी, आकर्षक तनख्वाह, मुफ्त भोजन, आवास, यातायात और भत्तें’ का प्रलोभन परोसा गया था। अक्सर एजेंटों पर ये आरोप लगते हैं कि कमीशन की अपनी राशि वसूले जाने तक वे आवेदकों का मूल पासपोर्ट जब्त कर लेते हैं। लेकिन नर्सें इसके बाद भी बाहर नौकरी पर जाना चाहती हैं।

केरल की अर्थव्यवस्था उन 20 लाख लोगों द्वारा विदेश से अपने घर भेजी गई रकम पर निर्भर है, जो विदेश में काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर लोग खाड़ी के देशों में काम कर रहे हैं। यही कारण है कि अक्सर केरल के बारे में ‘मनीऑर्डर इकोनॉमी’ पर निर्भर सूबे का जुमला उछाला जाता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इस राज्य में नौकरियों के अवसर काफी सीमित हैं। इसका मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र काफी उपेक्षित है और राज्य अपने लोगों के लिए नए मौके पैदा करने में नाकाम रहा है। इंडियन नर्सिंग कौंसिल का कहना है कि देश में 80 प्रतिशत नर्सें केरल से आती हैं और उनमें भी बड़ी संख्या ईसाई समुदाय के निम्न आयवर्ग वाले परिवारों की लड़कियों की है। ऐतिहासिक तथ्य है कि ईसाई मिशनरियों ने सबसे पहले केरल को ही एक पेशे के तौर पर नर्सिंग से परिचय कराया। युवा नर्सों का पहला दल जर्मनी प्रशिक्षण लेने गया था। सन 1960 में कैथोलिक समुदाय की 6,000 नर्सें जर्मनी गई थीं, क्योंकि तब वहां नर्सों की भारी कमी हो गई थी। उनका वह प्रवासन इसलिए आसानी से हो सका, क्योंकि मिशनरियों ने इसमें उनकी मदद की थी।

आखिर क्यों केरल की नर्सों को नौकरी के लिए विदेश जाने की जरूरत पड़ती है? यदि केरल उन्हें नौकरी दे सकने में नाकाम है, तो क्या देश के दूसरे हिस्सों में भी उनके लिए अवसर नहीं हैं? निस्संदेह, देश को काफी संख्या में स्वास्थ्यकर्मियों की जरूरत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंडों के मुताबिक, भारत में प्रति 10,000 नागरिक पर नर्सों-दाइयों का समायोजित अनुपात 2.4 है। लेकिन इस कसौटी पर भी देश में प्रति एलोपैथिक डॉक्टर के मुकाबले उनकी उपलब्धता एक से भी कम है। इस अनुपात को बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि नर्सें डॉक्टरों के मुकाबले बहुत कम वेतन पर अपनी सेवाएं देती हैं। साल 1991 के खाड़ी युद्ध के समय पश्चिम एशिया के देशों से काफी भारतीय देश लौट आए थे, इनमें नर्सें भी थीं। लेकिन साल 2014 में पूरा ध्यान नर्सों पर ही रहा है, जो इराक व लीबिया से वापस लौटी हैं। इन घटनाओं ने नर्सों के हालात को सामने लाने का काम किया है। क्या सरकार ऐसा माहौल नहीं बना सकती कि उन्हें देश के भीतर ही पर्याप्त मौके मिल सकें? ऐसा हो सकता है, अगर सरकार के पास इसकी इच्छाशक्ति हो।

रविवार, 10 अगस्त 2014

बँधा हुआ इक-इक धागे में भाई-बहन का प्यार




गाना / Title: राखी धागों का त्यौहार - raakhii dhaago.n kaa tyauhaar
चित्रपट / Film: Rakhi  राखी     / संगीतकार / Music Director: Ravi रवि 
गीतकार / Lyricist: Rajinder Krishan  राजेन्द्र किसन / गायक / Singer(s): Rafi रफ़ी 



यह गीत भले ही फ़िल्मी है 
मगर राखी के पवित्र पर्व की पवन भावनाओं को पूरी तरह प्रदर्शित करता है। 

राखी धागों का त्यौहार , राखी धागों का त्यौहार
बँधा हुआ इक-इक धागे में भाई-बहन का प्यार
राखी धागों का ...

कितना कोमल कितना सुन्दर भाई-बहन का नाता
इस नाते को याद दिलाने ये त्यौहार है आता
बहन के मन की आशाएँ राखी के ये तार
राखी धागों का ...

बहन कहे मेरे वीर तुझे ना बुरी नजरिया लागे
मेरे राजा भैय्या तुझको मेरी उमरिया लागे
धन हूँ पराया फिर भी मिलूँगी साल में तो इक बार
राखी धागों का ...

भाई कहे ओ बहन मैं तेरी लाज का हूँ रखवाला
गूँथूँगा मैं प्यार से तेरे अरमानों की माला
भाई-बहन का प्यार रहेगा जब तक है संसार
राखी धागों का ...
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8/9/2014

जयपुर। रक्षाबंधन भाई-बहन के बीच केवल धागे का नहीं बल्कि प्यार, खुशियों का त्योहार है। यह त्योहार ही है जो रिश्तों के बीच प्यार को जीवित रखते हैं। कितनी भी दूरियां क्यों ना हो भाई-बहन सभी सीमाओं को लांघकर रिश्तों में प्यार भरने के लिए एक दूसरे के पास पहुंच जाते है। त्योहार और फिल्मों का बहुत गहरा संबंध हैं। भाई बहन के पवित्र रिश्ते को हिंदी सिनेमा में कई फिल्में व गाने बने जिनका हमारे जीवन में इतना प्रभाव है कि रक्षाबंधन आते ही हम उन्हें गुनगुनाए बिना नहीं रहते है। तो फिर इस राखी पर इन गानों को जरूर गुनगुनाते है ताकि त्योहार यादगार बन जाएं।

राखी के खास मौके पर आपको रूबरू करवाते है मशहूर गानों से जिन्होंने ऑनस्क्रीन पर भाई बहन को प्यार को संजोए रखा।

भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना...
फिल्म- छोटी बहन
राखी पर फिल्माया गया बेहद लोकप्रिय है। यह गाना राखी के त्योहार में 4 चांद लगा देता है। इस फिल्म में एक्ट्रेस नंदा अपने भाई बलराज साहनी के साथ राखी का त्योहार मनाती है। राखी की लिस्ट के गानों में यह गाना सबसे ऊपर आता है। भाई बहन पर फिल्माए इस गाने को फैंस आज भी गुनगुनाए बिना नहीं रहते।

बहना के भाई की कलाई पर प्यार बाँधा है...
फिल्म- रेशम की डोरी
सायरा बानो, धर्मेन्द्र स्टारर इस फिल्म का यह गाना बेहद इमोशनल है। इसमें एक सीन के दौरान धर्मेन्द्र अपनी बहन के माथे पर हाथ रखते है और वे एक दूसरे के हाथ पकड़े हुए होते है। यह सीन दर्शकों बहुत भावुक कर देता है।

फूलों का तारों का कहना है...
फिल्म- हरे रामा हरे कृष्णा
देवानंद व जीनत अमान की जोड़ी ऑनस्क्रीन की रोमेंटिक जोडियों में मशहूर है। इस फिल्म में इस जोड़ी ने भाई बहन का रोल अदा किया था। इस फिल्म का यह गाना सुपरहिट हुआ था। राखी के दिन भाईयों के जुबां पर यह गाना जरूर सुनने को मिलता है।

ये राखी बंधन है ऎसा, जैसा चांद और किरण का...
फिल्म- बेईमान
मनोज कुमार स्टारर यह फिल्म भी भाई बहन के प्यार को बखूबी बयां करती है। मनोज अपनी बहन से राखी बंधवाते है। दोनों बहन-भाई राखी की ओर एक टक लगाकर देखते रहते है। इस फिल्म में राखी के बंधन की तुलना चांद और किरण से की गई है।

हम बहनों के लिए ऎ मेरे भैया आता है इक दिन साल में...
अंजाना (1969)
राजेन्द्र कुमार, बबीता स्टार इस फिल्म में राजेन्द्र अपनी बहन की ओर देखता रहता है। बहन हाथ में राखी से सजी थाली लिए हुए होती है। वह अपने भाई को बताती है कि उसकी लाइफ में उसका बहुत महत्व है। उसके बिना उसका जीवन अधुरा है।

मेरे भैया मेरे चंदा...
काजल
इस गाने में बहन का अपने भाई के लिए प्यार दिखाया गया है। वह भाई के प्रति अपनी फिलिंग्स बयां करती है और भाई के प्रार्थना करती है कि उसके जीवन में सब कुछ अच्छा हो।

चंदा रे, मेरे भैया से कहना, बहन याद करें, ओ चंदा रे...
फिल्म - चंबल की कसम
इस फिल्म में बहन चांद के जरिए भाई को मैसेज भेजती है। वह चांद को कहती है मेरे भाई से कहना बहन तुझे याद कर रही है। गाने के जरिए फिल्म में पेश किया गया दर्शकों के बीच यह मैसेज काफी पॉपुलर रहा।

ओ मेरे प्यारी बहना, मैं तेरे भैया भी, मै तेरी मय्या भी, बाबुल भी हूं मैं तेरा...
प्यारी बहना
इस फिल्म में तन्वी आजमी ने मिथुन चक्रवर्ती की बहन को रोल अदा किया है। एक सीन के दौरान तन्वी हाथ में थाली लिए हुए होती है। तिलक लगाकर लगाकर आरती उतारती है। मिथुन मुस्कराते हुए बहन से राखी बंधवाते है। इसमे फिल्माया गया यह सीन दर्शकों के दिल को छु लेता है।

रंग बिरंगी राखी लेकर आई बहना, राखी बँधवा लो मेरे वीर रे...
फिल्म- अनपढ़
बलराज साहनी व माया सिन्हा स्टार फिल्म (अनपढ़) में भाई बहन के रिश्ते को बहुत ही प्रभावित ढ़ंग से पेश किया गया। इसमें माया ने बलराज की बहन को रोल अदा किया है। एक दृश्य के दौरान माया अपने भाई को राखी बांधकर उसकी आरती उतारती है। यह इस फिल्म का बहुत ही इम्प्रेसिव सीन है। इसमें भाई बहन के रिश्ते को लेकर एक गाना भी पेश किया गया है।

अब के बरस भेजो...
फिल्म -बंदिनी
यह गानो इस फिल्म का बेहद पॉपूलर गाना रहा जिसने दर्शकों का दिल जीता और भाई बहन के रिश्ते को अमर बना दिया। इसमें नूतन, धर्मेन्द व मनोज कुमार ने काम किया है।

शनिवार, 9 अगस्त 2014

पंचायत से लेकर पार्ल्यामेंट तक हर चुनाव जरूरी - अमित शाह



अमित शाह ने कार्यकर्ताओं के सामने रखा नया लक्ष्य

नवभारतटाइम्स.कॉम | Aug 9, 2014 नई दिल्ली

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में अमित शाह के पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के मनोनयन पर मुहर लग गई है। अमित शाह ने इस मौके पर कार्यकर्ताओं में जोश भरते हुए कहा कि अध्यक्ष बनना कार्यकर्ताओं का सम्मान है। उन्होंने अपने ऊपर भरोसा जताने के लिए पार्टी का धन्यवाद भी जताया।

इसके बाद अमित शाह ने कहा कि पार्टी के कार्यकर्ता किसी चुनाव को हल्के में न लें, पंचायत से लेकर पार्ल्यामेंट तक हर चुनाव जरूरी है। अपने भाषण में बीजेपी अध्यक्ष ने अगले कुछ दिनों में चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों का जिक्र करते हुए कहा कि इन सूबों में प्रचंड बहुमत से हमारी जीत जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर को दो परिवारों के भ्रष्टाचार ने जनता को लूट लिया है, वहां बदलाव पूरे सिर्फ राज्य के नहीं पूरे देश के कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है।

हरियाणा का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यहां सबसे पहले चुनाव होना है, हो सकता है कि यहां हमारा किसी से गठबंधन हो लेकिन कार्यकर्ता इस काम में जुट जाएं कि पार्टी को 45 से ज्यादा सीटें मिले। अमित शाह ने कहा कि झारखंड में विकास की असीम संभावनाएं हैं, लेकिन यहां की जनता ने कभी किसी को पूर्ण बहुमत नहीं दिया। उन्होंने कहा, 'झारखंड की जनता से आह्वान करता हूं कि एक बार हमारी झोली में पूर्ण बहुमत डालकर दिखाएं, हम वहां विकास की गंगा बहाकर दिखाएंगे। पड़ोस के राज्य छत्तीसगढ़ में हमने यह करके दिखाया है।'

उन्होंने महाराष्ट्र में भी नेता और कार्यकर्तओं को चुनाव की तैयारी में जी-जान से जुट जाने का आह्वान किया और कहा कि लोग यहां 15 साल के कुशासन से मुक्ति चाहते हैं। अमित शाह ने देश के पूर्व में स्थित राज्यों का जिक्र करते हुए कहा कि बंगाल, ओडिशा जैसे राज्यों में हमें वोट तो मिले लेकिन सीटें उस अनुपात में नहीं मिल पाईं। बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि इन राज्यों में संगठन को मजबूत करने की जरूरत हैं। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि अब हम सरकार में आ गए हैं और मानसिकता बदलने की जरूरत है। कार्यकर्ताओं को सरकार और जनता के बीच सेतु के रूप में काम करना होगा।

इससे पहले पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय परिषद में अमित शाह के नाम पर औपचारिक मुहर लगने की घोषणा की और कहा कि बीजेपी प्रमुख के रूप में वह अपने कार्यकाल से पूरी तरह संतुष्ट हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की जीत का श्रेय पार्टी के नए अध्यक्ष अमित शाह को दिया। अब माना जा रहा है कि अगले दो हफ्तों में शाह की नई टीम की घोषणा हो जाएगी, जिसमें युवा चेहरों को मौका दिया जाएगा। लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की यह पहली बैठक है। जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित इस बैठक की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी का झंडा फहरा कर की। मोदी शाम को करीब 3.50 बजे भाषण देंगे।

शाह ने अपने भाषण की शुरुआत में कहा कि लोकसभा चुनाव में न सिर्फ बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला बल्कि कांग्रेस को नेता प्रतिपक्ष का ओहदा भी न देकर उसे इस हद तक छोटा बना दिया। पार्टी प्रमुख के तौर पर अपने पहले संबोधन में अमित शाह ने कहा कि सिर्फ बीजेपी में ही सबसे साधारण कार्यकर्ता पार्टी के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद तक पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने गरीबों की पार्टी के रूप में नई पहचान बनाई।

पुनर्जन्म की बात को सच मानते हैं ?




क्या वेद पुराणों में मौजूद पुनर्जन्म की बात को सच मानते हैं?
राकेश झा / टीम डिजिटल

पुनर्जन्म और पूर्वजन्म की बात याद आ जाना ऐसी घटनाएं समय-समय पर होती रहती हैं। विज्ञान इस तरह की बातों को पूरी तरह स्वीकार नहीं करता है। लेकिन वेदों पुराणों में यह स्पष्ट लिखा गया है कि आत्माओं का सफर निरंतर चलता रहता है।

गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है कि आत्मा एक शरीर का त्याग करके दूसरा शरीर को धारण कर लेता है। यानी जिसकी भी मृत्यु हुई है फिर से लौटकर किसी दूसरे रुप में आएगा।

महाभारत में एक कथा का उल्लेख है कि, भीष्म श्रीकृष्ण से पूछते हैं, आज मैं वाणों की शैय्या पर लेटा हुआ हूं, आखिर मैंने कौन सा ऐसा पाप किया था जिसकी यह सजा है।

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं आपको अपने छः जन्मों की बातें याद हैं। लेकिन सातवें जन्म की बात याद नहीं है जिसमें आपने एक नाग को नागफनी के कांटों पर फेंक दिया था। यानी भीष्म के रुप में जन्म लेने से पहले उनके कई और जन्म हो चुके थे। इन्हें अपने पूर्व जन्मों की बातें भी याद थी।

महाभारत का एक प्रमुख पात्र है शिखंडी। कथा है कि शिखंडी को भी अपने पूर्व जन्म की बातें याद थी। यह पूर्व जन्म में काशी की राजकुमारी था। उस जन्म में हुए अपमान का बदला लेने के लिए ही इसने शिखंडी के रुप में जन्म लिया था।

ऋग्वेद के ऋक्संहिता में लिखा है कि महर्षि वामदेव को माता के गर्भ में ही आत्मज्ञान हो गया था। जिससे उन्होंने अनेक जन्मों की बातें जान ली थी। वेदों और पुराणों में ऐसी अनेकों कथाएं हैं जो इस बताती हैं कि मौत और पुनर्जन्म निश्चित सत्य है।

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मरने के 20 मिनट बाद ही उसने ले लिया दूसरा जन्म
टीम डिजिटल     अमर उजाला, दिल्ली

कहते हैं कि मरने के बाद आत्मा यमलोक जाती है फिर अपने कर्मों के अनुसार लौट कर पृथ्वी पर लौटती है। लेकिन कुदरत कब कौन सा चमत्कार कर दिखाए कहा नहीं जा सकता।

ऐसी ही एक चमत्कारी घटना उत्तर प्रदेश, मैनपुरी के तिलयानी गांव की है। साल 2010 में सत्यभान सिंह यादव के पुत्र मनोज को एक बिच्छू ने काट लिया। इस समय मनोज महज 8 साल का था।

मनोज को मिनी पीजीआई सैफई में भर्ती कराया गया। इसी दिन तिलियानी के ही राजू की पत्नी को प्रसव पीड़ा होने पर मिनी पीजीआई में भर्ती कराया गया। यह अजब संयोग था कि रात के 10:40 बजे मनोज की मौत हो गई और लगभग 11 बजे राजू की पत्नी ने पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम छोटू रखा गया।

परिवार वालों का कहना है कि छोटू जब ढाई साल का हुआ तो वह मनोज के पिता सत्यभान को पापा कहकर बुलाने लगा। छोटू को अपने पूर्व जन्म के रिश्तेदार और उनसे जुड़ी बातें याद है।

सत्यभान का दावा है कि छोटू ने ऐसी कई बातें बताई हैं जो मनोज या उसके घर वाले ही जानते थे। अब पुनर्जन्म को मानते हुए छोटू को सत्यभान और उसका परिवार मनोज की तरह प्यार करते हैं। छोटू के मां-बाप को इससे कोई ऐतराज नहीं हैं। उनका कहना है कि छोटू को दो-दो मां-बाप का प्यार मिल रहा है।

एसएन मेडिकल कालेज के मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. विशाल सिन्हा का कहना है कि साइंस और मनोविज्ञान पिछले जन्म में विश्वास नहीं करता।

लेकिन विज्ञान और मनोविज्ञान से परे एक और विज्ञान है जिसे परामनोविज्ञान कहते हैं, जो इस तरह की घटनाओं का अध्ययन करता है।
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पुनर्जन्म से जुडी 10 सच्ची घटनाए (10 )

पुनर्जन्म सच या भ्रम :
जैसे भूत, प्रेत, आत्मा, से जुडी घटनाएं हमेशा से एक विवाद का विषय रही है वैसे हि पुनर्जन्म से जुड़ी घटनाय और कहानिया भी हमेशा से विवाद का विषय रही है। इन पर विश्वास और अविश्वास करने वाले, दोनो हि बड़ी संख्या मे है, जिनके पास अपने अपने तर्क है। यहुदी, ईसाईयत और इस्लाम तीनो धर्म  पुनर्जन्म मे यकीन नहि करते है, इसके विपरीत हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म पुनर्जन्म मे यकीन करते है। हिंदू धर्म के अनुसार मनुष्य का केवल शरीर मरता है उसकी आत्मा नहीं। आत्मा एक शरीर का त्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है, इसे ही पुनर्जन्म कहते हैं। हालांकि नया जन्म लेने के बाद पिछले जन्म कि याद बहुत हि कम लोगो को रह पाती है। इसलिए ऐसी घटनाएं कभी कभार ही सामने आती है। पुनर्जन्म की घटनाएं भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों मे सुनने को मिलती है।

Reincarnation


पुनर्जन्म के ऊपर हुए शोध :
पुनर्जन्म के ऊपर अब तक हुए शोधों मे दो शोध (रिसर्च) बहुत महत्त्वपूर्ण है।  पहला अमेरिका की वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉ. इयान स्टीवेन्सन का। इन्होने 40 साल तक इस विषय पर शोध करने के बाद एक किताब "रिइंकार्नेशन एंड बायोलॉजी" लीखी जो कि पुनर्जन्म से सम्बन्धित सबसे महत्तवपूर्ण बुक मानी जाती है। दूसरा शोध बेंगलोर की नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसीजय में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत डॉ. सतवंत पसरिया द्वारा किया गया है।  इन्होने भी एक बुक "श्क्लेम्स ऑफ रिइंकार्नेशनरू एम्पिरिकल स्टी ऑफ केसेज इन इंडिया" लिखी है।  इसमें 1973 के बाद से भारत में हुई 500  पुनर्जन्म की घटनाओ का उल्लेख है।

गीताप्रेस गोरखपुर ने भी अपनी एक किताब 'परलोक और पुनर्जन्मांक' में ऐसी कई घटनाओं का वर्णन किया है। हम उनमे से 10 कहानियां यहां पर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे है।


पहली घटना -
यह घटना सन 1950 अप्रैल की है। कोसीकलां गांव के निवासी भोलानाथ जैन के पुत्र निर्मल की मृत्यु चेचक के कारण हो गई थी। इस घटना के अगले साल यानी सन 1951 में छत्ता गांव के निवासी बी. एल. वाष्र्णेय के घर पुत्र का जन्म हुआ। उस बालक का नाम प्रकाश रखा गया। प्रकाश जब साढ़े चार साल का हुआ तो एक दिन वह अचानक बोलने लगा- मैं कोसीकलां में रहता हूं। मेरा नाम निर्मल है। मैं अपने पुराने घर जाना चाहता हूं। ऐसा वह कई दिनों तक कहता रहा।
प्रकाश को समझाने के लिए एक दिन उसके चाचा उसे कोसीकलां ले गए। यह सन 1956 की बात है। कोसीकलां जाकर प्रकाश को पुरानी बातें याद आने लगी। संयोगवश उस दिन प्रकाशकी मुलाकात अपने पूर्व जन्म के पिता भोलानाथ जैन से नहीं हो पाई। प्रकाश के इस जन्म के परिजन चाहते थे कि वह पुरानी बातें भूल जाए। बहुत समझाने पर प्रकाश पुरानी बातें भूलने लगा लेकिन उसकी पूर्व जन्म की स्मृति पूरी तरह से नष्ट नहीं हो पाई।
सन 1961 में भोलनाथ जैन का छत्ता गांव जाना हुआ। वहां उन्हें पता चला कि यहां प्रकाश नामक का कोई लड़का उनके मृत पुत्र निर्मल के बारे में बातें करता है। यह सुनकर वे वाष्र्णेय परिवार में गए। प्रकाश ने फौरन उन्हें अपने पूर्व जन्म के पिता के रूप में पहचान लिया। उसने अपने पिता को कई ऐसी बातें बताई जो सिर्फ उनका बेटा निर्मल ही जानता था।

दूसरी घटना :
यह घटना आगरा की है। यहां किसी समय पोस्ट मास्टर पी.एन. भार्गव रहा करते थे। उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम मंजु था। मंजु ने ढाई साल की उम्र में ही यह कहना शुरु कर दिया कि उसके दो घर हैं। मंजु ने उस घर के बारे में अपने परिवार वालों को भी बताया। पहले तो किसी ने मंजु की उन बातों पर ध्यान नहीं दिया लेकिन जब कभी मंजु धुलियागंज, आगरा के एक विशेष मकान के सामने से निकलती तो कहा करती थी- यही मेरा घर है।
एक दिन मंजु को उस घर में ले जाया गया। उस मकान के मालिक प्रतापसिंह चतुर्वेदी थे। वहां मंजु ने कई ऐसी बातें बताई जो उस घर में रहने वाले लोग ही जानते थे। बाद में भेद चला कि श्रीचतुर्वेदी की चाची (फिरोजाबाद स्थित चौबे का मुहल्ला निवासी श्रीविश्वेश्वरनाथ चतुर्वेदी की पत्नी) का निधन सन 1952 में हो गया था। अनुमान यह लगाया गया कि उन्हीं का पुनर्जन्म मंजु के रूप में हुआ है।

तीसरी घटना :
सन 1960 में प्रवीणचंद्र शाह के यहां पुत्री का जन्म हुआ। इसका नाम राजूल रखा गया। राजूल जब 3 साल की हुई तो वह उसी जिले के जूनागढ़ में अपने पिछले जन्म की बातें बताने लगी। उसने बताया कि पिछले जन्म में मेरा नाम राजूल नहीं गीता था। पहले तो माता-पिता ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया लेकिन जब राजूल के दादा वजुभाई शाह को इन बातों का पता चला तो उन्होंने इसकी जांच-पड़ताल की।
जानकारी मिली कि जूनागढ़ के गोकुलदास ठक्कर की बेटी गीता की मृत्यु अक्टूबर 1559 में हुई थी। उस समय वह ढाई साल की थी। वजुभाई शाह 1965 में अपने कुछ रिश्तेदारों और राजूल को लेकर जूनागढ़ आए। यहां राजून ने अपने पूर्वजन्म के माता-पिता व अन्य रिश्तेदारों को पहचान लिया। राजूल ने अपना घर और वह मंदिर भी पहचान लिया जहां वह अपनी मां के साथ पूजा करने जाती थी।

चौथी घटना :
मध्य प्रदेश के छत्रपुर जिले में एम. एल मिश्र रहते थे। उनकी एक लड़की थी, जिसका नाम स्वर्णलता था। बचपन से ही स्वर्णलता यह बताती थी कि उसका असली घर कटनी में है और उसके दो बेटे हैं। पहले तो घर वालों ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया लेकिन जब वह बार-बार यही बात बोलने लगी तो घर वाले स्वर्णलता को कटनी ले गए। कटनी जाकर स्वर्णलता ने पूर्वजन्म के अपने दोनों बेटों को पहचान लिया। उसने दूसरे लोगों, जगहों, चीजों को भी पहचान लिया।
छानबीन से पता चला कि उसी घर में 18 साल पहले बिंदियादेवी नामक महिला की मृत्यु दिल की धड़कने बंद हो जाने से मर गई थीं। स्वर्णलता ने यह तक बता दिया कि उसकी मृत्यु के बाद उस घर में क्या-क्या परिवर्तन किए गए हैं। बिंदियादेवी के घर वालों ने भी स्वर्णलता को अपना लिया और वही मान-सम्मान दिया जो बिंदियादेवी को मिलता था।

पांचवी घटना :
सन 1956 की बात है। दिल्ली में रहने वाले गुप्ताजी के घर पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम गोपाल रखा गया। गोपाल जब थोड़ा बड़ा हुआ तो उसने बताया कि पूर्व जन्म में उसका नाम शक्तिपाल था और वह मथुरा में रहता था, मेरे तीन भाई थे उनमें से एक ने मुझे गोली मार दी थी। मथुरा में सुख संचारक कंपनी के नाम से मेरी एक दवाओं की दुकान भी थी।
गोपाल के माता-पिता ने पहले तो उसकी बातों को कोरी बकवास समझा लेकिन बार-बार एक ही बात दोहराने पर गुप्ताजी ने अपने कुछ मित्रों से पूछताछ की। जानकारी निकालने पर पता कि मथुरा में सुख संचारक कंपनी के मालिक शक्तिपाल शर्मा की हत्या उनके भाई ने गोली मारकर कर दी थी। जब शक्तिपाल के परिवार को यह पता चला कि दिल्ली में एक लड़का पिछले जन्म में शक्तिपाल होने का दावा कर रहा है तो शक्तिपाल की पत्नी और भाभी दिल्ली आईं।
गोपाल ने दोनों को पहचान लिया। इसके बाद गोपाल को मथुरा लाया गया। यहां उसने अपना घर, दुकान सभी को ठीक से पहचान लिया साथ ही अपने अपने बेटे और बेटी को भी पहचान लिया। शक्तिपाल के बेटे ने गोपाल के बयानों की तस्दीक की।

छठवी घटना :
न्यूयार्क में रहने वाली क्यूबा निवासी 26 वर्षीया राचाले ग्राण्ड को यह अलौकिक अनुभूति हुआ करती थी कि वह अपने पूर्व जन्म में एक डांसर थीं और यूरोप में रहती थी। उसे अपने पहले जन्म के नाम की स्मृति थी। खोज करने पर पता चला कि यूरोप में आज से 60 वर्ष पूर्व स्पेन में उसके विवरण की एक डांसर रहती थी।
राचाले की कहानी में सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि जिसमें उसने कहा था कि उसके वर्तमान जन्म में भी वह जन्मजात नर्तकी की है और उसने बिना किसी के मार्गदर्शन अथवा अभ्यास के हाव-भावयुक्त डांस सीख लिया था।

सातवी घटना :
पुनर्जन्म की एक और घटना अमेरिका की है। यहां एक अमेरिकी महिला रोजनबर्ग बार-बार एक शब्द जैन बोला करती थी, जिसका अर्थ न तो वह स्वयं जानती थी और न उसके आस-पास के लोग। साथ ही वह आग से बहुत डरती थी। जन्म से ही उसकी अंगुलियों को देखकर यह लगता था कि जैसे वे कभी जली हों।
एक बार जैन धर्म संबंधी एक गोष्ठी में, जहां वह उपस्थित थी, अचानक रोजनबर्ग को अपने पूर्व जन्म की बातें याद आने लगी। जिसके अनुसार वह भारत के एक जैन मंदिर में रहा करती थी और आग लग जाने की आकस्मिक घटना में उसकी मृत्यु हो गई थी।

आठवी घटना :
जापान जैसे बौद्ध धर्म को मानने वाले देशों में पुनर्जन्म में विश्वास किया जाता है। 10 अक्टूबर 1815 को जापान के नकावो मूरा नाम के गांव के गेंजो किसान के यहां पुत्र हुआ। उसका नाम कटसूगोरो था। जब वह सात साल का हुआ तो उसने बताया कि पूर्वजन्म में उसका नाम टोजो था और उसके पिता का नाम क्यूबी, बहन का नाम फूसा था तथा मां का नाम शिड्जू था।
6 साल की उम्र में उसकी मृत्यु चेचक से हो गई थी। उसने कई बार कहा कि वह अपने पूर्वजन्म के पिता की कब्र देखने होडोकूबो जाना चाहता है। उसकी दादी (ट्सूया) उसे होडोकूबो ले गई। वहां जाते समय उसने एक घर की ओर इशारा किया और बताया कि यही पूर्वजन्म में उसका घर था।
पूछताछ करने पर यह बात सही निकली। कटसूगोरो ने यह भी बताया कि उस घर के आस-पास पहले तंबाकू की दुकानें नहीं थी। उसकी यह बात भी सही निकली। इस बात ये सिद्ध होता है कि कटसूगोरो ही पिछले जन्म में टोजो था।

नौवी घटना :
थाईलैंड में स्याम नाम के स्थान पर रहने वाली एक लड़की को अपने पूर्वजन्म के बारे में ज्ञात होने का वर्णन मिलता है। एक दिन उस लड़की ने अपने परिवार वालों को बताया कि उसके पिछले जन्म के मां-बाप चीन में रहते हैं और वह उनके पास जाना चाहती है।
उस लड़की को चीनी भाषा का अच्छा ज्ञान भी था। जब उस लड़की की पूर्वजन्म की मां को यह पता चला तो वह उस लड़की से मिलने के लिए स्याम आ गई। लड़की ने अपनी पूर्वजन्म की मां को देखते ही पहचान लिया। बाद में उस लड़की को उस जगह ले जाया गया, जहां वह पिछले जन्म में रहती थी।
उससे पूर्वजन्म से जुड़े कई ऐसे सवाल पूछे गए। हर बार उस लड़की ने सही जवाब दिया। लड़की ने अपने पूर्व जन्म के पिता को भी पहचान लिया। पुनर्जन्म लेने वाले दूसरे व्यक्तियों की तरह इस लड़की को भी मृत्यु और पुनर्जन्म की अवस्थाओं के बीच की स्थिति की स्मृति थी।

दसवी घटना :
सन 1963 में श्रीलंका के बाटापोला गांवमें रूबी कुसुमा पैदा हुई। उसके पिता का नाम सीमन सिल्वा था। रूबी जब बोलने लगी तो वह अपने पूवर्जन्म की बातें करने लगी। उसने बताया कि पूर्वजन्म में वह एक लड़का थी। उसका पुराना घर वहां से चार मील दूर अलूथवाला गांव में है। वह घर बहुत बड़ा है। उसने यह भी बताया कि पूर्वजन्म में उसकी मृत्यु कुएं में डुबने से हुई थी।
रुबी के पुराने माता-पिता पुंचीनोना को ढूंढ निकालना मुश्किल नहीं था। उन्होंने बताया कि उनका बेटा करुणासेना 1956 में मरा था। उन्होंने उसके कुएं में डूब जाने की घटना और दूसरी बातें भी सच बताई और कहा कि लड़की की सारी बातें बिलकुल सच है।



शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

शहद है कई मर्ज की दवा



इकलौता शहद है कई मर्ज  की दवा
Monday, March 17, 2014

वाशिंगटन: हमारे घरों में दादी-नानी एवं बुजुर्ग सर्दी, खांसी जैसी कई समस्याओं में शहद के फायदे गिनाती रही हैं। अब नए अध्ययन से पता चला है कि यह बैक्टीरिया की प्रतिरोधी क्षमता से भी लड़ सकता है। यह अध्ययन दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक संगठन अमेरिकन केमिकल सोसायटी की 247वीं राष्ट्रीय बैठक के हिस्से के तौर पर कराया गया है।
एक बयान के मुताबिक इस अध्ययन के प्रमुख शोधार्थी रोड आईलैंड के न्यूपोर्ट स्थित साल्वे रेगिना विश्वविद्यालय के एम. मेस्च्विट्ज ने कहा कि शहद का खास गुण यह है कि यह कई स्तरों पर बैक्टीरिया से लड़ता है, जिसके कारण बैक्टीरिया में प्रतिरोधी क्षमता का विकास कठिन हो जाता है।
उनके मुताबिक शहद हाइड्रोजन पेरोक्साइड, अम्लीयता, ओस्मोटिक इफेक्ट, हाई सुगर कंसंट्रेशन और पॉलीफिनोल्स जैसे हथियारों का उपयोग करता है। ये सभी बैक्टीरिया को मारने के लिए काफी हैं।
ओस्मोटिक प्रभाव का मतलब यह है कि चीनी की अधिक सांद्रता के कारण यह बैक्टीरिया की कोशिकाओं से पानी का अवशोषण कर लेता है, जिसके कारण बैक्टीरिया दम तोड़ देता है।
शहद में एक खास बात यह है कि यह बैक्टीरिया के आपसी संचार तंत्र, जिसे कोरम सेंसिंग कहा जाता है, को क्षतिग्रस्त कर देता है, जिससे बैक्टीरिया रोगकारक बायोफिल्म का निर्माण नहीं कर पाते हैं।
दवा की दुकान पर मिलने वाले एंटीबायोटिक्स बैक्टीरिया की विकास प्रक्रिया पर हमला करते हैं, जिसके कारण बैक्टीरिया में इसके खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाती है।
शहद इस प्रकार से काम नहीं करता है। इसलिए बैक्टीरिया में इसके खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता पैदा नहीं हो पाती है।
उन्होंने कहा कि शहद इसलिए अधिक प्रभावी हैं, क्योंकि इसमें कई स्वास्थ्यवर्धक पॉलीफिनोल्स या एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं। इनमें शामिल हैं फिनोलिक एसिड, कैफिक एसिड, कूमैरिक एसिड और इलैजिक एसिड तथा कई फ्लैवनॉयड।
उन्होंने कहा कि कई अध्ययनों में शहद के बैक्टीरिया रोधी, फंगस रोधी और वायरस रोधी गुणों का पता चला है। उनकी टीम ने भी इस बात की पुष्टि की है कि शहद में एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं और यह एंटीबायोटिक गुणों से भरपूर है। (एजेंसी)

जमीन घोटाले में कमला बेनीवाल को आरोपी बनना तय


कांग्रेस की बडी नेता रहीं और हाल ही में बर्खास्त श्रीमति कमला बेनीबाल की आवसीय भूमि घोटाला खुल चुका है। अब वे अदालती कार्यवाही से भी नहीं बच पायेंगीं। आसान तरीकों और राजनैतिक प्रभाव से धन कमानें का यह पहला मामला नहीं है। बल्कि जितने खोजोगे उतने ही मिलते चले जायेंगें।


1000 करोड़ के जमीन घोटाले में बेनीवाल को आरोपी बनाने की तैयारी

Aug 08, 2014,
http://www.bhaskar.com


जयपुर/नई दिल्ली. मिजोरम की राज्यपाल पद से बर्खास्‍त की गईं कमला बेनीवाल शुक्रवार को जयपुर पहुंच जाएंगी। मणिपुर के राज्यपाल विनोद कुमार दुग्गल भी आज ही मिजोरम का अतिरिक्‍त प्रभार संभाल लेंगे। खबर है कि परंपरा से हट कर बेनीवाल के लिए कोई विदाई समारोह आयोजित नहीं किया जा रहा है। उधर, बताया जा रहा है कि बेनीवाल की बर्खास्तगी के मामले में राष्ट्रपति ने बेनीवाल के खिलाफ साक्ष्यों को देखने के बाद एक गोपनीय नोट लिखकर संतुष्टि जताई थी। इसके बाद ही बेनीवाल की बर्खास्तगी का फैसला लिया गया। यह दावा 'एनडीटीवी' ने अपने सूत्रों के हवाले से किया है। दूसरी ओर, राज्यपाल पद पर रहते हुए मिला संवैधानिक संरक्षण हटने के साथ ही बेनीवाल को 1000 करोड़ की जमीन हड़पने के मामले में आरोपी बनाया जा सकता है। यह मामला इन दिनों जयपुर की एक स्थानीय अदालत में चल रहा है।

जयपुर की वैशाली नगर पुलिस इस मामले की जांच कर रही है। उसके मुताबिक, इस मामले में 16 अन्य अभियुक्तों के साथ बेनीवाल की भी स्पष्ट भूमिका होने के सबूत मिले हैं। मामले में पुलिस ने इसी साल 15 मई को रिपोर्ट भी ट्रायल कोर्ट को सौंप दी है। आगामी 27 अगस्त को अगली सुनवाई होनी है। एडवोकेट अजय जैन के मुताबिक, ''हम अब कोर्ट से बेनीवाल को आरोपी बनाने और नोटिस जारी करने की अपील करेंगे।'' जैन जमीन घोटाले के इस मामले को उजागर करने वाले एक्टिविस्ट संजय अग्रवाल के वकील हैं। अग्रवाल और अन्य ने ही अगस्त 2012 में बेनीवाल सहित 16 अन्य के खिलाफ जमीन हड़पने की यह शिकायत दर्ज कराई थी। इन आरोपियों में कांग्रेस के भी कई नेता हैं। बेनीवाल को अभी तक संविधान की धारा 361 के तहत मिली शक्तियों के चलते बतौर राज्यपाल संरक्षण मिला हुआ था, जो अब नहीं रहा।

क्या है मामला
किसान सामूहिक कृषि सहकारी समिति लिमिटेड को 1953 में 25 रुपए प्रति एकड़ से हिसाब से 20 साल के लिए 384 बीघा सरकारी जमीन लीज पर आवंटित की गई थी। जमीन जयपुर के बाहरी इलाके झूटवाड़ा में दी गई। कमला बेनीवाल 1954 में तब राजनीति में आईं, जब वह महज 27 साल की थीं। इसी साल वह राज्य की पहली महिला मंत्री भी बनीं। 1970 में कमला बेनीवाल इस समिति की सदस्य बनीं। एग्रीमेंट के आधार पर 1978 में लीज अवधि समाप्त हो गई और सरकार ने जमीन वापस ले ली। राज्य सरकार ने इसमें से 221 बीघा जमीन पर करघानी और पृथ्वीराज नगर रेजीडेंशियल स्कीम के तहत अक्टूबर 1999 में चिह्नित कर दी। लीज अवधि 1978 में ही समाप्त हो गई थी, इसलिए सोसाइटी क्षतिपूर्ति का दावा भी नहीं कर सकी, जबकि सोसाइटी के सदस्य इसे भूमि अधिग्रहण बता रहे थे। बाद में बतौर क्षतिपूर्ति 15 फीसदी विकसित जमीन (209 प्लाट) सोसाइटी को वापस की गई। इस फैसले पर ही आरोप लगा कि यह जमीन बेनीवाल और अन्य को फायदा पहुंचाने के लिए वापस की गई थी। यह तब हुआ जब बेनीवाल तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार (1998-2003) में राजस्व मंत्री थीं।

कोर्ट में दायर शिकायत के मुताबिक, सोसाइटी के वास्तविक सदस्यों को किनारे कर दिया गया और कुछ प्रभावशाली लोगों ने फायदा लिया। साथ ही, इन्होंने प्लाट बांटने के दौरान सोसाइटी नियमों का भी उल्लंघन किया। शिकायत के मुताबिक, प्रत्येक सदस्य को 7 प्लॉट बतौर क्षतिपूर्ति मिले।

भाजपा नेता किरीट सोमैया ने आरोप लगाया कि कमला बेनीवाल और दूसरे सदस्यों ने खुद को 'खेतिहर मजदूर' बताकर फायदा लिया और बताया कि वह बीते 58 वर्षों से यहां 14 से 15 घंटे काम कर रहे हैं और इस तरह उन्होंने क्षतिपूर्ति के तौर पर मिले प्लॉट हथिया लिए। 

भाई-बहिन का स्नेहिल बंधन है रक्षाबंधन - कविता रावत




भाई-बहिन का स्नेहिल बंधन है रक्षाबंधन

......कविता रावत

हमारी भारतीय संस्कृति में अलग-अलग प्रकार के धर्म,  जाति,  रीति,  पद्धति,  बोली, पहनावा, रहन-सहन के लोगों के अपने-अपने उत्सव, पर्व, त्यौहार हैं,  जिन्हें वर्ष भर बड़े धूमधाम से मनाये जाने की सुदीर्घ परम्परा है। ये उत्सव, त्यौहार, पर्वादि हमारी भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता की अनूठी पहचान कराते हैं। रथ यात्राएं हो या ताजिए या फिर किसी महापुरुष की जयंती, मन्दिर-दर्शन हो या कुंभ-अर्द्धकुम्भ या स्थानीय मेला या फिर कोई तीज-त्यौहार जैसे- रक्षाबंधन, होली, दीवाली, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, शिवरात्रि, क्रिसमस या फिर ईद सर्वसाधारण अपनी जिन्दगी की भागदौड़, दुःख-दर्द, भूख-प्यास सबकुछ भूल कर मिलजुल के उल्लास, उमंग-तरंग में डूबकर तरोताजा हो उठता है।

इन सभी पर्व, उत्सव, तीज-त्यौहार, या फिर मेले आदि को जब जनसाधारण जाति-धर्म, सम्प्रदाय से ऊपर उठकर मिलजुलकर बड़े धूमधाम से मनाता है तो उनके लिए हर दिन उत्सव का दिन बन जाता है। इन्हीं पर्वोत्सवों की सुदीर्घ परम्परा को देख हमारी भारतीय संस्कृति पर "आठ वार और नौ त्यौहार" वाली उक्ति चरितार्थ होती है।

परिवर्तन समाज की अनिवार्य प्रक्रिया है, युग का धर्म है। परिवर्तन हमारी संस्कृति की जीवंतता का प्रतीक है।  इसने न अतीत की विशेषताओं से मुंह मोड़ा ना ही आधुनिकता की उपयोगिता को अस्वीकारा, तभी तो महाकवि इकबाल कहते हैं-
"यूनान, मिश्र, रोमां , सब मिट गये जहाँ से ।
अब तक मगर है बाकी , नाम-ओ-निशां हमारा ।।
कुछ बात है कि हस्ती , मिटती नहीं हमारी ।
सदियों रहा है दुश्मन , दौर-ए-जहाँ हमारा ।।"

रक्षाबंधन पर्व बहिन द्वारा भाई की कलाई में राखी बांधने का त्यौहार भर नहीं है, यह एक कोख से उत्पन्न होने के वाले भाई की मंगलकामना करते हुए बहिन द्वारा रक्षा सूत्र बांधकर उसके सतत् स्नेह और प्यार की निर्बाध आकांक्षा भी है। युगों-युगों से चली आ रही परम्परानुसार जब बहिन विवाहित होकर अपना अलग घर-संसार बसाती है और पति, बच्चों, पारिवारिक दायित्वों और दुनियादारी में उलझ जाती है तो वह मातृकुल के एक ही मां के उत्पन्न भाई और सहोदर से मिलने का अवसर नहीं निकाल पाती है, जिससे विवशताओं के चलते उसका अंतर्मन कुंठित हो उठता है। ऐसे में ‘रक्षाबंधन‘ और भाई दूज, ये दो पर्व भाई-बहिन के मिलन के दो पावन प्रसंग हैं। इस पावन प्रसंग पर कई  बहिन बर्षों से सुदूर प्रदेश में बसे भाई से बार-बार मनुहार करती है-

"राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना 
अबकी बार राखी में जरुर घर आना 
न चाहे धन-दौलत, न तन का गहना 
बैठ पास बस दो बोल मीठे बतियाना 

मत गढ़ना फिर से कोई नया बहाना 
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना "
गाँव-देश छोड़ अब तू परदेश बसा है
बिन तेरे घर अपना सूना-सूना पड़ा है 
बूढ़ी दादी और माँ का है एक सपना
 नज़र भरके नाती-पोतों को है देखना
 लाना संग हसरत उनकी पूरी करना 
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना 
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

भागदौड़ भरी जिन्दगी के बीच आज भी राखी का त्यौहार बड़े उत्साह और उमंग से मनाया जाना हमारी भारतीय संस्कृति की जीवंतता का परिचायक है।  इस अद्भुत्, अमूल्य, अनंत प्यार के पर्व का हर बहिन महीनों पहले से प्रतीक्षा करती है। पर्व समीप आते ही बाजार में घूम-घूम कर मनचाही राखी खरीदती है। वस्त्र, आभूषणों आदि की खरीदारी करती है। बच्चों को उनके मामा-मिलन के लिए आत्मीय भाव से मन में उत्सुकता जगाती है। घर-आंगन की साफ-सफाई करती है। स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर और नये कपड़ों में सज-धज परिवार में असीम आनंद का स्रोत बहाती है। यह हमारी भारतीय संस्कृति की विलक्षणता है कि यहाँ देव-दर्शन पर भेंट चढ़ाने की प्रथा कायम है, अर्पण को श्रृद्धा का प्रतीक मानती है। अर्पण फूल-पत्तियों का हो या राशि का कोई फर्क नहीं। राखी के अवसर पर एक ओर भाई देवी रूपी बहिन के घर जाकर मिष्ठान, फूल, नारियल आदि के साथ "पत्रं-पुष्पं-फलं सोयम" की भावना से यथा सामर्थ्य दक्षिणा देकर खुश होता है तो दूसरी ओर एक-दूसरे की आप-बीती सुनकर उसके परस्पर समाधान के लिए कृत संकल्पित होते हैं।  इस तरह यह एक तरफ परस्पर दुःख, तकलीफ समझने का प्रयत्न है, तो दूसरी ओर सुख, समृद्धि में भागीदारी बढ़ाने का सुअवसर भी है।

दहेज मामलों में तुरंत गिरफ्तारी पर सर्वोच्च न्यायालय की रोक




दहेज के मामलों में तुरंत गिरफ्तारी पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगायी


न्यायाधीश चंद्रमौलि प्रसाद की पीठ का निर्णय

दहेज विरोधी कानून के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि ऐसे मामलों में पुलिस स्वत: ही आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकती और उसे ऐसे कदम की वजह बतानी होगी, जिनकी न्यायिक समीक्षा की जायेगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पहले गिरफ्तारी और फिर बाकी कार्यवाही करने का रवैया निन्दनीय है जिस पर अंकुश लगाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि दहेज प्रताड़ना मामले सहित सात साल तक की सजा के दंडनीय अपराधों में पुलिस गिरफ्तारी का सहारा नहीं ले।

न्यायमूर्ति चंद्रमौलि कुमार प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा, हम सभी राज्य सरकारों को निर्देश देते हैं कि वह अपने पुलिस अधिकारियों को हिदायत दे कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498-क के तहत मामला दर्ज होने पर स्वत: ही गिरफ्तारी नहीं करे बल्कि पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 में प्रदत्त मापदंडों के तहत गिरफ्तारी की आवश्यकता के बारे में खुद को संतुष्ट करें।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार करने की जरूरत के बारे में मजिस्ट्रेट के समक्ष कारण और सामग्री पेश करनी होगी। न्यायाधीशों ने कहा कि पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा स्त्री को प्रताड़ित करने की समस्या पर अंकुश पाने के इरादे से भारतीय दंड संहिता की धारा 498-क शामिल की गयी थी। धारा 498-क को संज्ञेय और गैर जमानती अपराध होने के कारण प्रावधानों में इसे संदिग्ध स्थान प्राप्त है जिसे असंतुष्ट पत्नियां कवच की बजाय हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं।

न्यायाधीशों ने कहा कि परेशान करने का सबसे आसान तरीका पति और उसके रिश्तेदारों को इस प्रावधान के तहत गिरफ्तार कराना है। अनेक मामलों में पति के अशक्त दादा दादी, विदेश में दशकों से रहने वाली उनकी बहनों को भी गिरफ्तार किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी व्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित और उसे अपमानित करती है और हमेशा के लिए धब्बा लगाती है और कोई भी गिरफ्तारी सिर्फ इसलिय नहीं की जानी चाहिए कि अपराध गैर जमानती और संज्ञेय है।

न्यायाधीशों ने कहा, गिरफ्तार करने का अधिकार एक बात है और इसके इस्तेमाल को न्यायोचित ठहराना दूसरी बात है। गिरफ्तार करने के अधिकार के साथ ही पुलिस अधिकारी ऐसा करने को कारणों के साथ न्यायोचित ठहराने योग्य होना चाहिए।

न्यायाधीशों ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध करने का आरोप लगाने के आधार पर ही फौरी तौर पर कोई गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। दूरदर्शी और बुद्धिमान पुलिस अधिकारी के लिए उचित होगा कि आरोपों की सच्चाई की थोड़ी बहुत जांच के बाद उचित तरीके से संतुष्ट हुए बगैर कोई गिरफ्तारी नहीं की जाये।

अपराध के आंकड़ों का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2012 में धारा 498-क के तहत अपराध के लिए 197762 व्यक्ति गिरफ्तार किये गए और इस प्रावधान के तहत गिरफ्तार व्यक्तियों में से करीब एक चौथाई पतियों की मां और बहन जैसी महिलायें थीं जिन्हें गिरफ्तारी के जाल में लिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता के तहत हुए अपराधों में कुल गिरफ्तार व्यक्तियों का यह छह फीसदी है। यह दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत हुए कुल अपराधों का 4.5 फीसदी है जो चोरी और चोट पहुंचाने जैसे अपराधों से इतर किसी अन्य अपराध से अधिक है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोप पत्र दाखिल करने की दर 93.6 फीसदी तक है जबकि सजा दिलाने की दर सिर्फ 15 फीसदी है जो विभिन्न मदों में सबसे कम है। शीर्ष अदालत ने कहा कि देश में पुलिस अभी तक ब्रितानी सोच से बाहर नहीं निकली है और गिरफ्तार करने का अधिकार बेहद आकर्षक है।

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धारा 498-ए : सुप्रीम कोर्ट का निर्णय बेअसर-निरंकुश  
Saturday July 05, 2014 
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
 
हमारी बहन-बेटियों को दहेज उत्पीड़न के सामाजिक अभिशाप से कानूनी तरीके से बचाने और दहेज उत्पीड़कों को कठोर सजा दिलाने के मकसद से संसद द्वारा सम्बंधित कानूनी प्रावधानों में संशोधनों के साथ भारतीय दण्ड संहिता में धारा 498-ए जोड़ी गयी थी। मगर किसी भी इकतरफा कठोर कानून की भांति इस कानून का भी प्रारम्भ से ही दुरुपयोग शुरू हो गया। जिसको लेकर कानूनविदों में लगातार विवाद रहा है और इस धारा को समाप्त या संशोधित करने की लगातार मांग की जाती रही है। इस धारा के दुरुपयोग के सम्बन्ध में समय-समय पर अनेक प्रकार की गम्भीर टिप्पणियॉं और विचार सामने आते रहे हैं। जिनमें से कुछ यहॉं प्रस्तुत हैं :-
1. 19 जुलाई, 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए को कानूनी आतंकवाद की संज्ञा दी। 
2. 11 जून, 2010 सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के सम्बन्ध में कहा कि पतियों को अपनी स्वतंत्रता को भूल जाना चाहिये।
3. 14 अगस्त, 2010 सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार से भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए में संशोधन करने के लिए कहा।
4. 04 फरवरी, 2010 पंजाब के अम्बाला कोर्ट ने स्वीकार कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के प्रावधानों का दुरूपयोग हो रहा है।
5. 16 अप्रेल, 2010 बॉम्बे हाई कोर्ट ने और 22 अगस्त, 2010 को बैंगलौर हाई कोर्ट ने भी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के दुरूपयोग की बात को स्वीकारा।
6. केवल यही नहीं, बल्कि 22 अगस्त, 2010 को केन्दीय सरकार ने सभी प्रदेश सरकारों की पुलिस को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के प्रावधानों के दुरुपयोग के बारे में चेतावनी दी।
7. विधि आयोग ने अपनी 154 वीं रिपोर्ट में इस बात को साफ शब्दों में स्वीकारा कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-ए के प्रावधानों का दुरुपयोग हो रहा है।
8. नवम्बर, 2012 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश द्वय टीएस ठाकुर और ज्ञानसुधा मिश्रा की बेंच ने कहा कि धारा 498-ए के आरोप में केवल एफआईआर में नाम लिखवा देने मात्र के आधार पर ही पति-पक्ष के लोगों के विरुद्ध धारा-498-ए के तहत मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिये।
उपरोक्त गंभीर विचारों के होते हुए भी धारा 498-ए भारतीय दंड संहिता में कायम है इसका दुरुपयोग भी लगातार जारी रहा है। जिसको लेकर देश की सर्वोच्च अदालत अर्थात् सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 02 जुलाई, 2014 को एक बार फिर से अनेक गम्भीर मानी जा रही टिप्पणियों के साथ अपना निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति चंद्रमौलि कुमार प्रसाद की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने अपने निर्णय में मूल रूप से निम्न बातें कही हैं:-
1. दहेज उत्पीड़न विरोधी धारा 498-ए का पत्नियों द्वारा जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है।
2. धारा 498-क में वर्णित अपराध के संज्ञेय और गैर जमानती होने के कारण असंतुष्ट पत्नियां इसे अपने कवच की बजाय अपने पतियों के विरुद्ध हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं।
3. धारा 498-क के तहत गिरफ्तारी व्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने के साथ-साथ, गिरफ्तार व्यक्ति को अपमानित भी करती है और हमेशा के लिए उस पर धब्बा लगाती है।
4. धारा 498-ए वर पक्ष के लोगों को परेशान करने का सबसे आसान तरीका है। पति और उसके रिश्तेदारों को इस प्रावधान के तहत गिरफ्तार कराना बहुत आसान है। अनेक मामलों में पति के अशक्त दादा-दादी, विदेश में दशकों से रहने वाली उनकी बहनों तक को भी गिरफ्तार किया गया है।
5. धारा 498-ए के इस प्रावधान के तहत गिरफ्तार व्यक्तियों में से करीब एक चौथाई पतियों की मां और बहन जैसी महिलायें होती हैं, जिन्हें गिरफ्तारी के जाल में लिया जाता है।
6. धारा 498-ए के मामलों में आरोप पत्र दाखिल करने की दर 93.6 फीसदी तक है, जबकि सजा दिलाने की दर सिर्फ 15 फीसदी है।
7. हाल के दिनों में वैवाहिक विवादों में इजाफा हुआ है। जिससे शादी जैसी संस्था प्रभावित हो रही है।
उपरोक्त कारणों से सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि धारा 498-ए के दुरुपयोग को रोकने के लिये हम सभी राज्य सरकारों को निम्न निर्देश देते हैं :-
(सुप्रीम कोर्ट के प्रत्येक निर्देश के सम्बन्ध में इस आलेख के लेखक द्वारा टिप्पणियॉं भी दी गयी हैं।)
1. देश में पुलिस अभी तक ब्रितानी सोच से बाहर नहीं निकली है और गिरफ्तार करने का अधिकार बेहद आकर्षक है। पहले गिरफ्तारी और फिर बाकी कार्यवाही करने का रवैया निन्दनीय है, जिस पर अंकुश लगाना चाहिए। पुलिस अधिकारी के पास तुरंत गिरफ्तारी की शक्ति को भ्रष्टाचार का बड़ा स्रोत है।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् सुप्रीम कोर्ट मानता है कि हमारी पुलिस न तो न्यायप्रिय है और न हीं निष्पक्ष है, बल्कि इसके साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट की दृष्टि में पुलिस भ्रष्ट भी है। इसके उपरान्त भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा केवल पुलिस के इस चरित्र की निन्दा करके ही मामले को समाप्त कर दिया गया। पुलिस के चरित्र में सुधार के लिये किसी प्रकार की पुख्ता निगरानी व्यवस्था कायम करने या अन्य किसी भी प्रकार के सुधारात्मक आदेश नहीं दिये गये। जबकि न मात्र धारा 498-ए के सन्दर्भ में बल्कि हर एक मामले पुलिस का न्यायप्रिय तथा निष्पक्ष नहीं होना और साथ ही भ्रष्ट होना आम व्यक्ति के लिए न्याय प्राप्ति में सबसे बड़ी और खतरनाक बाधा है। मगर सुप्रीम कोर्ट कम से कम इस मामले में आश्चर्यजनक रूप से मौन रहा है।
2. सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में आगे निर्देश देते हुए कहा है कि सभी राज्य सरकारें अपने-अपने पुलिस अधिकारियों को हिदायत दें कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498-क के तहत मामला दर्ज होने पर स्वत: ही गिरफ्तारी नहीं करें, बल्कि पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 में प्रदत्त मापदंडों के तहत गिरफ्तारी की आवश्यकता के बारे में खुद को संतुष्ट करें।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् जिस पुलिस को खुद सुप्रीम कोर्ट एक ओर भ्रष्ट मानता है, उसी पुलिस को खुद को ही इस बात की निगरानी रखनी है कि पुलिस के द्वारा कानूनी प्रावधानों का सही से प्रयोग किया जा रहा है या नहीं! क्या यह संभव है?
3. किसी व्यक्ति के खिलाफ पत्नियों द्वारा अपराध करने का आरोप लगाने के आधार पर ही फौरी तौर पर कोई गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। दूरदर्शी और बुद्धिमान पुलिस अधिकारी के लिए उचित होगा कि आरोपों की सच्चाई की थोड़ी बहुत जांच के बाद उचित तरीके से संतुष्ट हुए बगैर कोई गिरफ्तारी नहीं की जाये।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् यहॉं पर भी सुप्रीम कोर्ट की नजर में दूरदर्शी और बुद्धिमान पुलिस को ही स्वयं पर निगरानी रखनी है। सुप्रीम कोर्ट को किसी बाहरी ऐजेंसी से निगरानी करवाने की जरूरत प्रतीत नहीं होती है।
4. पुलिस स्वत: ही आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकती और उसे गिरफ्तार करने की वजह बतानी होगी और ऐसी वजहों की न्यायिक समीक्षा की जायेगी। पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार करने की जरूरत के बारे में मजिस्ट्रेट के समक्ष कारण और सामग्री पेश करनी होगी। क्योंकि पतियों को गिरफ्तार करने का कानूनी अधिकार एक बात है और इसके इस्तेमाल को पुलिस द्वारा न्यायोचित ठहराना दूसरी बात है। गिरफ्तार करने के अधिकार के साथ ही पुलिस अधिकारी ऐसा करने को कारणों के साथ न्यायोचित ठहराने योग्य होना चाहिए।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् यहॉं पर सुप्रीम कोर्ट के उक्त आदेश के बारे में दो बातें गौर करने वाली हैं। प्रथम तो आदेश में ये साफ नहीं है कि धारा 498-ए के तहत मुकदमा दर्ज होने के बाद आरोपियों को गिरफ्तार करने से पूर्व मजिस्ट्रेट के समक्ष गिरफ्तारी के आधारों को पुलिस की ओर से सिद्ध करना होगा या गिरफ्तारी के बाद में मजिस्ट्रेट के पूछने पर सिद्ध करना होगा। दूसरे जिन मजिस्ट्रटों की अदालत से राष्ट्रपति तक के खिलाफ आसानी से गिरफ्तारी वारण्ट जारी करवाये जा सकते हैं और जो अदालतें मुकदमों के भार से इस कदर दबी बड़ी हैं कि उनके पास वर्षों तक तारीख बदलने के अलावा लोगों की सुनवाई करने का समय नहीं है, उन अदालतों से ये अपेक्षा किया जाना कि पुलिस ने गिरफ्तारी करने से पूर्व अपनी अन्वेषण डायरी में जो कारण लिखें हैं, वे कितने न्यायोचित या सही या उचित हैं, इसकी पड़ताल किये जाने की अपेक्षा किया जाना कहॉं तक व्यावहारिक होगा?
5. जिन किन्हीं मामलों में 7 साल तक की सजा हो सकती है, उनमें गिरफ्तारी सिर्फ इस कयास के आधार पर नहीं की जा सकती कि आरोपी ने वह अपराध किया होगा। गिरफ्तारी तभी की जाए, जब इस बात के पर्याप्त सबूत हों कि आरोपी के आजाद रहने से मामले की जांच प्रभावित हो सकती है, वह कोई और क्राइम कर सकता है या फरार हो सकता है।
लेखक की टिप्पणी : अर्थात् सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी उक्त आदेश को पूर्व में भी अनेकों बार दोहराया जाता रहा है, लेकिन पुलिस द्वारा लगातार और बिना किसी प्रकार की परवाह किये इस प्रावधान का और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हर दिन उल्लंघन किया जाता रहा है। जिसका मूल कारण है, इस कानून का उल्लंघन करने वाले किसी पुलिस लोक सेवक को आज तक किसी प्रकार की सजा नहीं दिया जाना। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक बार फिर से दोहराये गये इस आदेश का क्या हाल होगा, सहज कल्पना की जा सकती है!
 
ये तो हुई बात सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय की उक्त टिप्पणियों तथा निर्देशों की, लेकिन जमीनी हकीकत इतनी भयावह है कि धारा 498-ए के कहर से निर्दोष पीड़ितों को मुक्ति दिलाने के लिये इससे भी कहीं आगे बढकर किसी भी संवैधानिक संस्था को विचार कर निर्णय करना होगा, क्योंकि फौरी उपचारों से इस क्रूर व्यवस्था से निर्दोष पतियों को न्याय नहीं मिल सकता है। अत: इसके बारे में कुछ व्यवहारिक और कानूनी मुद्दे विचारार्थ प्रस्तुत हैं :-
1. पति-पत्नी के बीच किसी सामान्य या असामान्य विवाद के कारण यदि पत्नी की ओर से भावावेश में या अपने पीहर के लोगों के दबाव में धारा 498-ए के तहत एक बार पति के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा देने के बाद इसमें समझौता करने का कानूनी प्रावधान नहीं हैं!
ऐसे हालातों में इस कानूनी व्यवस्था के तहत एक बार मुकदमा अर्थात् एफआईआर दर्ज करवाने के बाद वर पक्ष को मुकदमें का सामना करने के अलावा, समाधान का अन्य कोई रास्ता ही नहीं बचता है। इसलिये यदि हम वास्तव में ही विवाह और परिवार नाम की सामाजिक संस्थाओं को बचाने के प्रति गम्भीर हैं तो हमें इस मामले में मुकदमे को वापस लेने या किसी भी स्तर पर समझौता करने का कानूनी प्रावधान करना होगा। अन्यथा वर्तमान हालातों में मुकदमा सिद्ध नहीं होने पर, मुकदमा दायर करने वाली पत्नी के विरुद्ध झूठा मुकदमा दायर करने के अपराध में स्वत: आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की कानूनी व्यवस्था किया जाना प्राकृतिक न्याय की मांग है, क्योंकि स्वयं सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि 85 फीसदी मामलों में धारा 498-ए के आरोप सिद्ध ही नहीं हो पाते हैं। इस स्थिति से कैसे निपटा जाये और झूठे आरोप लगाने वाली पत्नियों के साथ क्या सलूक किया जाना चाहिए इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पूरी तरह से मौन है। जो दुखद है।
2. वरपक्ष के जिस किसी भी सदस्य का, वधुपक्ष की ओर से धारा 498-ए के तहत एफआईआर में नाम लिखवा दिया जाता है, उन सभी सदस्यों को बिना ये जाने कि उन्होंने कोई अपराध किया भी है या नहीं उनकी गिरफ्तारी करना पुलिस अपना परमकर्त्तव्य समझती रही है! 
मेरी राय में उक्त हालातों के लिये मूल में दो बड़े कारण हैं-
 
पहला तो यह कि धारा 498-ए के मामले में साक्ष्य अधिनियम के प्रावधान न्यायशास्त्र के उस मौलिक सिद्धान्त का सरेआम उल्लंघन करते हैं जिसके अनुसार आरोप लगाने के बाद आरोपों को सही सिद्ध करने का दायित्व अभियोजन या वादी पक्ष पर नहीं डालकर आरोपी को पर डालता है कि वह अपने आपको निर्दोष सिद्ध करे। जिसके चलते पुलिस को इस बात से कोई लेना-देना नहीं रहता कि कोर्ट से यदि कोई आरोपी छूट भी जाता है तो इसके बारे में उससे कोई सवाल-जवाब किये जाने की समस्या होगी।
दूसरा बड़ा कारण यह है कि ऐसे मामलों में पुलिस को अपना रौद्र रूप दिखाने का पूरा अवसर मिलता है और सारी दुनिया जानती है कि रौद्र रूप दिखाते ही सामने वाला निरीह प्राणी थर-थर कांपने लगता है! पुलिस व्यवस्था तो वैसे ही अंग्रेजी राज्य के जमाने की अमानवीय परम्पराओं और कानूनों पर आधारित है! जहॉं पर पुलिस को लोगों की रक्षक बनाने के बजाय, लोगों को डंडा मारने वाली ताकत के रूप में जाना और पहचाना जाता है! ऐसे में यदि कानून ये कहता हो कि 498-ए में किसी को भी बन्द कर दो, यह चिन्ता कतई मत करो कि वह निर्दोष है या नहीं! क्योंकि पकड़े गये व्यक्ति को खुद को ही सिद्ध करना होगा कि वह दोषी नहीं, निर्दोष है। अर्थात् अरोपी को अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने के लिये स्वयं ही साक्ष्य जुटाने होंगे। ऐसे में पुलिस को पति-पक्ष के लोगों का तेल निकालने का पूरा-पूरा मौका मिल जाता है।
इसलिये जरूरी है कि संसारभर में मान्यताप्राप्त न्यायशास्त्र के इस सिद्धान्ता को धारा 498-ए के मामले में भी लागू किया जाना चाहिये कि आरोप लगाने वाली पत्नियॉं इस बात के लिये जिम्मेदार हों कि उनकी ओर से लगाये गये आरोप पुख्ता तथा सही हैं और मंगठन्थ नहीं हैं। जिन्हें न्यायालय के समक्ष कानूनी प्रक्रिया के तहत सिद्ध करना उनका कानूनी दायित्व है। जब तक इस प्रावधान को नहीं बदला जाता है, तब तक गिरफ्तारी को पारदर्शी बनाने की औपचारिकता मात्र से कुछ भी नहीं होने वाला है।
3. अनेक बार तो खुद पुलिस एफआईआर को फड़वाकर, अपनी सलाह पर पत्नीपक्ष के लोगों से ऐसी एफआईआर लिखवाती है, जिसमें पति-पक्ष के सभी छोटे बड़े लोगों के नाम लिखे जाते हैं। जिनमें-पति, सास, सास की सास, ननद-ननदोई, श्‍वसुर, श्‍वसुर के पिता, जेठ-जेठानियॉं, देवर-देवरानिया, जेठ-जेठानियों और देवर-देवरानिया के पुत्र-पुत्रियों तक के नाम लिखवाये जाते हैं। अनेक मामलों में तो भानजे-भानजियों तक के नाम घसीटे जाते हैं।
पुलिस ऐसा इसलिये करती है, क्योंकि जब इतने सारे लोगों के नाम आरोपी के रूप में एफआईआर में लिखवाये जाते हैं तो उनको गिरफ्तार करके या गिरफ्तारी का भय दिखाकर आरोपियों से अच्छी-खायी रिश्‍वत वसूलना आसान हो जाता है (जिसे स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वीकारा है) और अपनी तथाकथित जॉंच के दौरान ऐसे आलतू-फालतू-झूठे नामों को रिश्‍वत लेकर मुकदमे से हटा दिया जाता है। जिससे अदालत को भी अहसास कराने का नाटक किया जाता है कि पुलिस कितनी सही जॉंच करती है कि पहली ही नजर में निर्दोष दिखने वालों के नाम हटा दिये गये हैं। ऐसे में इस बात का भी कानूनी प्रावधान किया जाना जरूरी है कि यदि इस बात की पुष्टि किसी भी स्तर पर हो जाती है कि धारा 498-ए के मामले में किसी व्यक्ति का असत्य नाम लिखवाया गया है तो उसी स्तर पर एफआईआर लिखवाने वाली के विरुद्ध मुकदमा दायर किया जाकर कार्यवाही की जावे।
 
इस प्रकार हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि न मात्र धारा 498-ए के मामलों में बल्कि जिन किन्हीं भी मामलों या प्रावधानों में कानून का दुरुपयोग हो रहा है, वहॉं पर किसी प्राभावी संवैधानिक संस्था को लगातार सतर्क और विवेकपूर्ण निगरानी रखनी चाहिये, जिससे कि ऐसे मामलों में धारा 498-ए की जैसी स्थिति निर्मित ही नहीं होने पाये। क्योंकि आज धारा 498-ए के मामले में सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों के बाद भी इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं दिख रहा है, बल्कि कुछ लोगों का तो यहॉं तक कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के कारण दहेज उत्पीड़कों के हौंसले बढेंगे, जिससे पत्नियों पर अत्याचार बढ सकते हैं। फिर भी मेरा साफ तौर पर मानना है कि जब तक इस कानून में से आरोपी के ऊपर स्वयं अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने का भार है, तब तक पति-पक्ष के निर्दोष लोगों के ऊपर होने वाले अन्याय को रोक पाना या उन्हें न्याय प्रदान करना वर्तमान व्यवस्था में असम्भव है, क्योंकि धारा 498-ए के मामले में साक्ष्य अधिनियम के प्रावधान न्याय का गला घोंटने वाले, अप्राकृतिक और अन्यायपूर्ण हैं! अत; धारा 498-ए के कहर से निर्दोष पतियों को बचाने में सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान निर्णय भी बेअसर ही सिद्ध होना है! 
-098750-66111
 

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

दस दिन उदयपुर में रहेगी 'श्रीमती वसुंधरा राजे सरकार'





अब दस दिन उदयपुर में रहेगी 'श्रीमती वसुंधरा राजे  सरकार'

Tue, 05 Aug 2014

जयपुर। राजस्थान सरकार के सरकार आपके द्वार कार्यक्रम के तहत इस बार पूरी सरकार दस दिन के लिए उदयपुर सम्भाग में जाएगी। यह दौरा 16 से 25 अगस्त तक रहेगा, हालांकि सरकार 14 अगस्त को ही उदयपुर पहुंच जाएगी, क्योंकि इस बार का राज्यस्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह उदयपुर में मनाया जाएगा।

सत्ता में आने के बाद से मौजूदा सरकार ने सरकार आपके द्वार कार्यक्रम शुरू किया है। इसके तहत पूरी सरकार दस दिन के लिए एक सम्भाग में जाती है। सभी मंत्री और विभागों के प्रमुख सचिव टीमें बना कर सम्भाग की एक-एक पंचायत समिति में जाते हैं। लोगों से मिलते है, जनसुनवाई करते हैं और सरकारी कार्यालयों का निरीक्षण करते हैं। दौरे के अंतिम दिन सम्भाग मुख्यालय पर ही कैबिनेट की बैठक होती है और इस बैठक में उस सम्भाग के संबंध में महत्वपूर्ण फैसले किए जाते है। अब तक राजस्थान सरकार फरवरी में भरतपुर सम्भाग और जून में बीकानेर सम्भाग के दौरे पर जा चुकी है। अब उदयपुर सम्भाग का दौरा किया जा रहा है।

हालात सुधारने में जुटे अधिकारी
सरकार को दौरे में विभागों के हालात सही मिले, इसके लिए संबंधित अधिकारियों ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है। हर विभाग में तैयारियों को लेकर बैठकें चल रही हैं। हर सम्भाग में डॉक्टरों की कमी बड़ी शिकायत बनकर सामने आती है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विभाग ने 47 डॉक्टरों को हर पंचायत समिति में भेजा है। इसी तरह नगरीय विकास विभाग भी उदयपुर सम्भाग की नगरीय सुविधाओं को चाकचौबंद करने में जुटा है।

जानकारों का कहना है कि पहले के दो दौरों में अधिकारियों को बहुत ज्यादा अंदाजा नहीं था कि दौरा किस तरह का रहेगा, लेकिन अब सभी समझ गए हैं कि क्या होगा, इसलिए इस बार हो सकता है कि सरकार को हालात बहुत ज्यादा खराब नहीं मिले।

बुधवार, 6 अगस्त 2014

राजस्थान भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी घोषित, 39 जिलाध्यक्ष भी बने



राजस्थान भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी घोषित, 39 जिलाध्यक्ष भी बने
Wed, 06 Aug 2014

जयपुर। भाजपा ने अपनी प्रदेश कार्यकारिणी घोषित कर दी। प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी ने बुधवार को इसे जारी किया। प्रदेश कार्यकारिणी में युवाओं व महिलाओं को तरजीह दी गई है। कार्यकारिणी में 5 सांसदों व सात विधायकों को भी शामिल किया गया है। इनमें चित्तौड़गढ़ सांसद सी.पी. जोशी को युवा मोर्चा का प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया है। कुछ वर्तमान जिलाध्यक्षों को भी इस टीम में शामिल किया गया है। उधर, जिलाध्यक्षों की कार्यकारिणी में पांच विधायकों को शामिल किया गया है। इस टीम में भी ज्यादातर जगहों पर युवाओं को ही प्राथमिकता दी गई है। हालांकि इसमें किसी महिला कार्यकर्ता को जगह नहीं मिली है।

ये बने प्रदेश पदाधिकारी : -

प्रदेश उपाध्यक्ष - रामकिशोर मीणा, संतोष अहलावत, चुन्नीलाल गरासिया, अनीता भदेल, नंदकिशोर सोलंकी, भजनलाल शर्मा, मोहनलाल गुप्ता, महेन्द्र बोहरा।

महामंत्री - नारायण पंचारिया, हरिओम सिंह राठौड़, बाबूलाल वर्मा, कुलदीप धनकड़।

मंत्री- अशोक लाहोटी, मुकेश दाधीच, सुरेश यादव, बीरमदेव सिंह, कैलाश मेघवाल, जगमोहन बघेल, दीया कुमारी, सरोज प्रजापत।

प्रवक्ता - कैलाश भट्ट, अल्का सिंह गुर्जर, राज्यवर्द्धन सिंह राठौड़, प्रियंका चौधरी।

मीडिया प्रभारी - नवदीप सिंह।

प्रदेश कार्यालय प्रभारी- मुकेश पारीक, सोहन लाल ताम्बी।

इन्हें बनाया प्रदेशाध्यक्ष

युवा मोर्चा- सी.पी.जोशी

अनुसूचित जनजाति मोर्चा- हेमराज मीणा

महिला मोर्चा- विनीता सेठ

अनुसूचित जाति- गोरधन वर्मा

अल्पसंख्यक मोर्चा- अमीन पठान
(इन्हें लगातार तीसरी बार अल्पसंख्यक मोर्चे का प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया है)

किसान मोर्चा- कैलाश चौधरी

39 जिलाध्यक्ष बनाए-
जयपुर शहर - संजय जैन,
जयपुर देहात - डीडी कुमावत,
सीकर - झावर सिंह खर्रा (विधायक),
झुंझुनूं - राजीव सिंह,
दौसा - घनश्याम शर्मा,
अलवर - इंद्रजीत सिंह,
भरतपुर - भानू प्रताप सिंह,
करौली - प्रहलाद सिंहल,
सवाई माधोपुर -मानसिंह गुर्जर (विधायक),
धौलपुर - बहादुर सिंह त्यागी,
कोटा शहर - हेमंत विजयवर्गीय,
कोटा देहात - जयवीर सिंह राठौड़ सांगोद वाले,
बूंदी - शौकीन राठौड़,
बारां - नरेश सिकरवाल,
झालावाड़ - नरेन्द्र नागर (विधायक),
उदयपुर शहर - दिनेश भट्ट,
उदयपुर देहात - तख्तसिंह शेखावत,
राजसमंद - भंवरलाल शर्मा,
बांसवाड़ा - मनोहर पटेल,
डूंगरपुर -हरीश पाटीदार,
चित्तौड़गढ़ - रतनलाल गाड़री,
प्रतापगढ़ - धनराज शर्मा,
अजमेर शहर - अरविंद यादव,
अजमेर देहात -भगवती प्रसाद सारस्वत,
टोंक - सत्यनारायण चौधरी,
भीलवाड़ा - शिवजीराम मीणा,
नागौर - रामचंद्र ऊता,
जोधपुर शहर - देवेन्द्र जोशी,
जोधपुर देहात - पब्बाराम विश्नोई (विधायक),
पाली - मदन राठौड़ (विधायक),
जालौर - अमीचंद जैन,
सिरोही - लूम्बाराम चौधरी,
बाड़मेर -जालम सिंह,
जैसलमेर - स्वरूप सिंह राठौड़,
बीकानेर शहर - विजय आचार्य,
बीकानेर देहात - रामगोपाल सुथार,
श्रीगंगानगर -अशोक नागपाल,
हनुमानगढ़ -प्रदीप बेनीवाल,
चूरू -गौरीशंकर गुप्ता। -

*दीया कुमारी का बढ़ा कद
सवाईमाधोपुर से विधायक दीया कुमारी का कद पार्टी में बढ़ गया है। उन्हें हाल ही राज्य सरकार ने बेटी बचाओ अभियान का ब्रांड एम्बेसेडर बनाया था और अब उन्हें प्रदेश कार्यकारिणी में मंत्री बनाया गया है। उनके अलावा किशनपोल से विधायक मोहनलाल गुप्ता को उपाध्यक्ष, जयपुर ग्रामीण से सांसद राज्यवर्द्धन सिंह राठौड़ को प्रवक्ता, अशोक लाहोटी, मुकेश दाधीच को मंत्री और नवदीप सिंह को मीडिया प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है।

*जैन और कुमावत को जयपुर की कमान
जयपुर शहर और जयपुर देहात जिलाध्यक्ष के पदों पर क्रमश: संजय जैन और दीनदयाल कुमावत को नियुक्त किया गया है। जैन पार्टी में शहर महामंत्री के पद पर कार्यरत थे और पूर्व में पार्षद भी रह चुके हैं। दूसरी ओर कुमावत युवा मोर्चा के वर्तमान में प्रदेशाध्यक्ष थे और पूर्व में राजस्थान विवि में छात्रनेता रहे हैं।

दो हजार साल पुराना शिवलिंग खुदाई में निकला



खुदाई में निकला दो हजार साल पुराना शिवलिंग

IANS [Edited By: अभिजीत श्रीवास्तव] |
महासमुंद, 6 अगस्त 2014
http://aajtak.intoday.in

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में पुरातत्व विभाग को खुदाई के दौरान द्वादश ज्योतिर्लिगों वाले पौरुष पत्थर से बना शिवलिंग मिला है. माना जा रहा है कि यह दो हजार वर्ष पुराना है. सिरपुर में मिले इस शिवलिंग को काशी विश्वनाथ जैसा शिवलिंग बताया जा रहा हैं. छत्तीसगढ़ के पुरातत्व सलाहकार अरुण कुमार शर्मा का दावा है कि यह दो हजार साल पुराना है और राज्य में मिला अब तक का सबसे प्राचीन व विशाल शिवलिंग है.
पुरातत्वविदों का कहना है कि वाराणसी के काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकालेश्वर शिवलिंग जैसा है सिरपुर में मिला यह शिवलिंग. यह बेहद चिकना है. खुदाई के दौरान पहली शताब्दी में सरभपुरिया राजाओं के द्वारा बनाए गए मंदिर के प्रमाण भी मिले. इस शिवलिंग में विष्णु सूत्र (जनेऊ) और असंख्य शिव धारियां हैं.

सूबे के सिरपुर में साइट नंबर 15 की खुदाई के दौरान मिले मंदिर के अवशेषों के बीच 4 फीट लंबा 2.5 फीट की गोलाई वाला यह शिवलिंग निकला है. बारहवीं शताब्दी में आए भूकंप और बाद में चित्रोत्पला महानदी की बाढ़ में पूरा मंदिर परिसर ढह गया था. मंदिर के खंभे नदी के किनारे चले गए. सिरपुर में कई सालों से चल रही खुदाई में सैकड़ों शिवलिंग मिले हैं. इनमें से गंधेश्वर की तरह यह शिवलिंग भी साबूत निकला है.

भूकंप और बाढ़ से गंधेश्वर मंदिर भी पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था. पर यहां मौजूद सफेद पत्थर से बना शिवलिंग सुरक्षित बच गया. सिरपुर में मिले गंधेश्वर शिवलिंग की विशेषता उससे निकलने वाली तुलसी के पौधे जैसी सुगंध है. इसलिए इसे गंधेश्वर शिवलिंग कहा जा रहा है.

पुरातत्व सलाहकार अरुण कुमार शर्मा ने बताया कि ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता बैडलर ने 1862 में लिखे संस्मरण में एक विशाल शिवमंदिर का जिक्र किया है. लक्ष्मण मंदिर परिसर के दक्षिण में स्थित एक टीले के नीचे राज्य के संभवत: सबसे बड़े और प्राचीन शिव मंदिर की खुदाई होना बाकी है. जो भविष्य में यहां से प्राप्त हो सकती हैं.

पुरातत्व के जानकारों के अनुसार भूकंप और बाढ़ ने सिरपुर शहर को 12वीं सदी में जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया था. कालांतर में नदी की रेत और मिट्टी की परतें शहर को दबाती चलीं गईं. टीलों को कई मीटर खोदकर शहर की संरचना को निकाला गया. खुदाई में मिले सिक्कों, प्रतिमाओं, ताम्रपत्र, बर्तन, शिलालेखों के आधार पर उस काल की गणना होती गई.

साइट पर खुदाई की गहराई जैसे-जैसे बढ़ती है, प्राचीन काल के और सबूत मिलते जाते हैं. जमीन में जिस गहराई पर शिवलिंग मिला, उसके आधार पर इसे दो हजार साल पुराना माना गया है. बहरहाल यहां मिल रहे शिवलिंग पुरातत्व के जानकारों के लिए अब शोध का विषय बनता जा रहा है.


गीता पढ़ाना संवैधानिक : भारतीय विचार केन्द्रम्



गीता पढ़ाना संवैधानिक  : भारतीय विचार केन्द्रम् 


तिरुवनंतपुरम। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ए. आर दवे द्वारा स्कूलों में गीता पढ़ाए जाने की बात का समर्थन करते हुए आरएसएस के एक प्रमुख विचारक ने बुधवार को कहा कि गीता सिर्फ धार्मिक ग्रंथ नहीं है, यह एक उत्कृष्ट आध्यात्मिक और दार्शनिक कृति भी है। इसके साथ ही उन्होंने गीता को 'राष्ट्रीय पुस्तक' घोषित करने की भी अपील की।

प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने न्यायाधीश दवे के विचारों पर आपत्ति जताई थी। इस मुद्दे पर सांस्कृतिक मंच भारतीय विचार केंद्रम के निदेशक पी परमेश्वरम ने कहा कि गीता ने कई शताब्दियों से भारत पर गहरा प्रभाव डाला है।

उन्होंने कहा कि जिन्होंने एक बार भी भगवद् गीता पढ़ी होगी, वे समझेंगे कि यह एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है। किसी भी अन्य किताब का इतना व्यापक प्रसार नहीं है। गीता की तरह कोई भी अन्य किताब इतनी बड़ी संख्या में व्याख्याओं के साथ प्रकाशित नहीं हुई है।

परमेश्वरम ने एक बयान में कहा कि इसका प्रभाव समय और स्थान से परे है। यह किसी भी प्रखर मस्तिष्क के लिए ज्ञान का खजाना है और इसका प्रभाव शाश्वत है। महात्मा गांधी जैसी शख्सियत ने गीता को अपनी मां बताया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें जब भी उलझन या दुख महसूस होता है, वे गीता की शरण लेते हैं। गांधी ने हमारी स्वतंत्रता के संघर्ष को निर्णयात्मक ढंग से प्रभावित किया था।

परमेश्वरम ने कहा कि उच्चतम मानवीय मूल्य सिखाने वाली गीता हमेशा से विश्वभर में तेज गति से गिरते मूल्यों का एक हल रही है। गीता को 'भारत की राष्ट्रीय पुस्तक' घोषित करने की अपील करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान की मूल प्रति, जिस पर संविधान सभा के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर हैं, उसमें 'गीतोपदेश' की तस्वीर थी।

उन्होंने पूछा कि जिस किताब को संविधान से सहमति मिली हो, उसे पढ़ाया जाना असंवैधानिक कैसे हो सकता है? न्यायाधीश एआर दवे ने शनिवार को कहा था कि भारतीयों को अपनी प्राचीन परंपराओं की ओर लौटना चाहिए और महाभारत एवं भगवद गीता जैसे ग्रंथों की जानकारी अपने बच्चों को छोटी उम्र से ही देनी चाहिए।

रक्षा बंधन पर रक्षा सूत्र : संघ का महाभियान

रक्षाबंधन : संघ के महाभियान का एक चरणरूप


August 06, 2014
http://vskbharat.com
(लेखक डा. कृष्ण गोपाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह हैं)


रक्षा बंधन के पर्व का महत्व भारतीय जनमानस में प्राचीन काल से गहरा बना हुआ है. यह बात सच है कि पुरातन भारतीय परंपरा के अनुसार समाज का शिक्षक वर्ग होता था, वह रक्षा सूत्र के सहारे इस देश की ज्ञान परंपरा की रक्षा का संकल्प शेष समाज से कराता था. सांस्कृतिक और धार्मिक पुरोहित वर्ग भी रक्षा सूत्र के माध्यम से समाज से रक्षा का संकल्प कराता था. हम यही पाते हैं कि किसी भी अनुष्ठान के बाद रक्षा सूत्र के माध्यम से उपस्थित सभी जनों को रक्षा का संकल्प कराया जाता है. राजव्यवस्था के अन्दर राजपुरोहित राजा को रक्षा सूत्र बाँध कर धर्म और सत्य की रक्षा के साथ साथ संपूर्ण प्रजा की रक्षा का संकल्प कराता था. कुल मिलाकर भाव यही है कि शक्ति सम्पन्न वर्ग अपनी शक्ति सामर्थ्य को  ध्यान में रखकर समाज के श्रेष्ठ मूल्यों का एवं समाज की रक्षा का संकल्प लेता है. संघ के संस्थापक  परम पूज्य डॉक्टर साहब हिन्दू समाज में सामरस्य स्थापित करना चाहते थे तो स्वाभाविकरूप से उनको इस पर्व का महत्व भी स्मरण में आया और समस्त हिन्दू समाज मिलकर समस्त हिन्दू समाज की रक्षा का संकल्प ले, इस सुन्दर स्वरूप के साथ यह कार्यक्रम (उत्सव) संघ में स्थापित हो गया.

वैसे तो हिन्दू समाज के परिवारों में बहिनों द्वारा भाइयों  को रक्षा सूत्र बांधना, यह इस पर्व का स्थायी स्वरूप था. संघ के उत्सवों के कारण इसका अर्थ विस्तार हुआ. सीमित अर्थों में न होकर व्यापक अर्थों में समाज का प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक वर्ग की रक्षा का संकल्प लेने लगा. समाज का एक भी अंग अपने आपको अलग-थलग या असुरक्षित अनुभव न करने पाये – यह भाव जाग्रत करना संघ का उद्देश्य है.

महाविकट लंबे पराधीनता काल के दौरान समाज का प्रत्येक वर्ग ही संकट में था. सभी को अपने अस्तित्व की सुरक्षा एवं प्राण रक्षा की चिंता थी. इस कारण समज के छोटे-छोटे वर्गों ने अपने चारों ओर बड़ी दीवारें बना लीं. समाज का प्रत्येक वर्ग अपने को अलग रखने में ही सुरक्षा का अनुभव कर रहा था. इसका लाभ तो हुआ, किंतु भिन्न-भिन्न वर्गों में दूरियां बढ़तीं गईं. हिन्दू समाज में ही किन्हीं भी कारणों से आया दूरी का भाव बढ़ता चला गया. कहीं-कहीं लोग एक दूसरे को स्पर्श करने से भी भयभीत थे. कुछ लोग, कुछ लोगों की परछाईं से भी डरने लगे. जातियों के भेद गहरे हो गये. भाषा और प्रांत की विविधताओं में कहीं-कहीं सामञ्जस्य के स्थान पर विद्वेष का रूप प्रकट होने लगा. यह विखण्डन का काल था. ऐसा लगता था कि हिन्दू समाज अनगिनत टुकड़ों में बंट जायेगा. सामञ्जस्य एवं समरसता के सूत्र और कम होते गये. विदेशी शक्तियों ने बजाय इसके कि इसको कम किया जाये, आग में घी डालने का काम किया. विरोधों का सहारा लेकर खाई को चौड़ा किया. विविधता में विद्वेष पैदा करने में वे लोग सिद्धहस्त थे.


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हिन्दू समाज की इस दुर्दशा का दृश्य देखा तो न केवल इसकी पीड़ा का अनुभव किया वरन् इसके स्थायी निवारण का संकल्प लिया. रक्षा बंधन के पर्व को सनातन काल से सामरस्य का पर्व माना गया है. यह आपसी विश्वास का पर्व है. इस पर्व पर जो-जो सक्षम थे, वे अन्य को विश्वास दिलाते थे कि वे निर्भय रहें. किसी भी संकट में सक्षम उनके साथ खड़े रहेंगे. संघ ने इसी  विश्वास को हजारों स्वयंसेवकों के माध्यम से समाज में पुनर्स्थापित करने का श्रेयस्कर कार्य किया. रक्षा बंधन के पर्व पर स्वयंसेवक परम पवित्र भगवा ध्वज को रक्षा सूत्र बांधकर उस संकल्प का स्मरण करते हैं, जिसमें कहा गया है कि धर्मो रक्षति रक्षित: अर्थात् हम सब मिलकर धर्म की रक्षा करें. समाज में मूल्यों का रक्षण करें. अपनी श्रेष्ठ परंपराओं का रक्षण करें. यही धर्म का व्यावहारिक पक्ष है. तभी तो धर्म सम्पूर्ण समाज की रक्षा करने में सक्षम हो सकेगा. धर्म बाहरी तत्व नहीं है. हम सबमें छिपी या मुखर उदात्त भावनाओं का नाम है. हमारा जो व्यवहार लोकमंगलकारी है, वही धर्म है. ध्वज को रक्षा सूत्र बांधने का हेतु भी यही है कि समाज के लिये हितकर उदात्त परंपरा का रक्षण करेंगे. स्वयंसेवक भी एकदूसरे को स्नेह-सूत्र बांधते हैं. जाति, धर्म, भाषा, धनसंपत्ति, शिक्षा या सामाजिक ऊंचनीच का भेद अर्थहीन है. रक्षाबंधन का सूत्र इन सारी विविधताओं और भेदों के ऊपर एक अभेद की सृष्टि करता है. इन विविधताओं के बावजूद एक सामरस्य का स्थापन करता है. इस नन्हें से सूत्र से क्षणभर में स्वयंसेवक परस्पर आत्मीय भाव से बंध जाते हैं. परम्परा का भेद और कुरीतियों का कलुष कट जाता है. प्रेम और एक दूसरे के प्रति समर्पण का भाव गहराई तक सृजित होता है.

कार्यक्रम के उपरांत स्वयंसेवक अपने समाज की उन बस्तियों में चले जाते हैं जो सदियों से वंचित एवं उपेक्षित हैं. वंचितों एवं उपेक्षितों के बीच बैठकर उनको भी रक्षा सूत्र बांधते और बंधवाते हुए हम उस संकल्प को दोहराते हैं जिसमें भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- समानम् सर्व भूतेषु. यह अभूतपूर्व कार्यक्रम है जब लाखों स्वयंसेवक इस देश की हजारों बस्तियों में निवास करने वाले लाखों वंचित परिवारों में बैठकर रक्षा बंधन के भाव को प्रकट करते हैं. विगत वर्षों के ऐसे कार्यक्रमों के कारण हिंदू समाज के अंदर एक्य एवं सामरस्य भाव-संचार का गुणात्मक परिवर्तन दिखाई दे रहा है. इसके पीछे संघ के इस कार्यक्रम की महती भूमिका है. भाव यही है कि सम्पूर्ण समाज, सम्पूर्ण समाज की रक्षा का व्रत ले. लोग श्रेष्ठ जीवन मूल्यों की रक्षा का व्रत लें. सशक्त, समरस एवं संस्कार संपन्न समाज ही किसी देश की शक्ति का आधार हो सकता है. इसी प्रयत्न में संघ लगा है. रक्षा बंधन का यह पर्व इस महाअभियान के चरणरूप में है.


देश को बाहर से कम अंदर से ज्यादा खतरा : परमपूज्य भागवत जी


देश को बाहर से कम अंदर से ज्यादा खतरा :  परमपूज्य   मोहन जी भागवत

04 August 2014   भोपाल,04 / अगस्त/2014 (ITNN) |

भारत को अमीर देश और भारतीयों को गरीब बताते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन जी 
भागवत ने कहा कि राष्ट्र की आर्थिक नीतियों में सुधार करना होगा। बढ़ते पूंजीवाद को देश के लिए घातक बताते हुए भागवत ने कहा कि स्वावलंबन और स्वाभिमान की बुनियाद पर देश से गरीबी समाप्त हो सकती है।

भागवत जी ने राजनीतिक दलों से समाज में गरीबी मिटाने के लिए पहल करने की अपील भी की। भोपाल में आयोजित चिंतन बैठक के आखिरी दिन आरएसएस के सर संघचालक मोहन जी भागवत ने कहा कि देश को बाहर से कम, अंदर से ज्यादा खतरा है। इससे निपटने के लिए एकता की जरूरत है। भागवत जी ने समाज से छुआछूत को मिटाने व राष्ट्रीयता को मजबूत करने के लिए स्वयंसेवकों को एकजुट होने का आदेश दिया।

भागवतजी  ने कहा कि हिंदू व हिंदुस्तान को मजबूत करने के लिए जात-पात और ऊंच-नीच की विचारधारा से ऊपर उठकर काम करना होगा। उन्होंने कहा कि निजी स्वार्थ और रिश्वतखोरी आज की सबसे बड़ी समस्या है। विकास के लिए सिर्फ सरकारों के भरोसे बैठना ठीक नहीं है। जरूरत इसकी है कि लोग खुद अपने विकास के बारे में सोचें। समाज को संगठित करना देश के लिए बेहद आवश्यक है। ऐसा संघ ने समझा है, इसलिए संघ कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देता है। इसके लिए शाखाओं, कार्यक्रमों एवं शिविरों द्वारा लोगों को प्रशिक्षण देना संघ की पद्धति है।

चिंतन शिविर में समापन समारोह को संबोधित करते हुए आरएसएस के अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख वी भागैया ने कहा कि आज हमारे देश में जो शिक्षा दी जा रही है उसमें ज्ञान व तकनीकी तो सम्मिलित है लेकिन नैतिक पक्ष पर ध्यान नहीं दिया जा रहा।

नरेंद्र मोदी व भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार का नाम लिए बिना भागवत ने कहा कि देश में नए नेतृत्व से लोगों को बेहतरी की उम्मीद है। केंद्र सरकार से सामंजस्य बनाकर संघ अपना काम करता रहेगा। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व व भारतीयता की हमारी पहचान पूरी दुनिया में मजबूत होनी चाहिए, इसके लिए यही सुनहरा सुअवसर है।

समाज क्या होता है, संस्कार क्या होते हैं, हमें किसके साथ किस प्रकार का बर्ताव करना चाहिए। ये सारी बातें शिक्षा पद्धति में सम्मिलित की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि हमारे देश से संस्कार लुप्त हो गए हैं। आज भी माताएं अपने बच्चों को संस्कार सिखाती हैं और भारत इसीलिए जिंदा भी है