शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

जमीन घोटाले में कमला बेनीवाल को आरोपी बनना तय


कांग्रेस की बडी नेता रहीं और हाल ही में बर्खास्त श्रीमति कमला बेनीबाल की आवसीय भूमि घोटाला खुल चुका है। अब वे अदालती कार्यवाही से भी नहीं बच पायेंगीं। आसान तरीकों और राजनैतिक प्रभाव से धन कमानें का यह पहला मामला नहीं है। बल्कि जितने खोजोगे उतने ही मिलते चले जायेंगें।


1000 करोड़ के जमीन घोटाले में बेनीवाल को आरोपी बनाने की तैयारी

Aug 08, 2014,
http://www.bhaskar.com


जयपुर/नई दिल्ली. मिजोरम की राज्यपाल पद से बर्खास्‍त की गईं कमला बेनीवाल शुक्रवार को जयपुर पहुंच जाएंगी। मणिपुर के राज्यपाल विनोद कुमार दुग्गल भी आज ही मिजोरम का अतिरिक्‍त प्रभार संभाल लेंगे। खबर है कि परंपरा से हट कर बेनीवाल के लिए कोई विदाई समारोह आयोजित नहीं किया जा रहा है। उधर, बताया जा रहा है कि बेनीवाल की बर्खास्तगी के मामले में राष्ट्रपति ने बेनीवाल के खिलाफ साक्ष्यों को देखने के बाद एक गोपनीय नोट लिखकर संतुष्टि जताई थी। इसके बाद ही बेनीवाल की बर्खास्तगी का फैसला लिया गया। यह दावा 'एनडीटीवी' ने अपने सूत्रों के हवाले से किया है। दूसरी ओर, राज्यपाल पद पर रहते हुए मिला संवैधानिक संरक्षण हटने के साथ ही बेनीवाल को 1000 करोड़ की जमीन हड़पने के मामले में आरोपी बनाया जा सकता है। यह मामला इन दिनों जयपुर की एक स्थानीय अदालत में चल रहा है।

जयपुर की वैशाली नगर पुलिस इस मामले की जांच कर रही है। उसके मुताबिक, इस मामले में 16 अन्य अभियुक्तों के साथ बेनीवाल की भी स्पष्ट भूमिका होने के सबूत मिले हैं। मामले में पुलिस ने इसी साल 15 मई को रिपोर्ट भी ट्रायल कोर्ट को सौंप दी है। आगामी 27 अगस्त को अगली सुनवाई होनी है। एडवोकेट अजय जैन के मुताबिक, ''हम अब कोर्ट से बेनीवाल को आरोपी बनाने और नोटिस जारी करने की अपील करेंगे।'' जैन जमीन घोटाले के इस मामले को उजागर करने वाले एक्टिविस्ट संजय अग्रवाल के वकील हैं। अग्रवाल और अन्य ने ही अगस्त 2012 में बेनीवाल सहित 16 अन्य के खिलाफ जमीन हड़पने की यह शिकायत दर्ज कराई थी। इन आरोपियों में कांग्रेस के भी कई नेता हैं। बेनीवाल को अभी तक संविधान की धारा 361 के तहत मिली शक्तियों के चलते बतौर राज्यपाल संरक्षण मिला हुआ था, जो अब नहीं रहा।

क्या है मामला
किसान सामूहिक कृषि सहकारी समिति लिमिटेड को 1953 में 25 रुपए प्रति एकड़ से हिसाब से 20 साल के लिए 384 बीघा सरकारी जमीन लीज पर आवंटित की गई थी। जमीन जयपुर के बाहरी इलाके झूटवाड़ा में दी गई। कमला बेनीवाल 1954 में तब राजनीति में आईं, जब वह महज 27 साल की थीं। इसी साल वह राज्य की पहली महिला मंत्री भी बनीं। 1970 में कमला बेनीवाल इस समिति की सदस्य बनीं। एग्रीमेंट के आधार पर 1978 में लीज अवधि समाप्त हो गई और सरकार ने जमीन वापस ले ली। राज्य सरकार ने इसमें से 221 बीघा जमीन पर करघानी और पृथ्वीराज नगर रेजीडेंशियल स्कीम के तहत अक्टूबर 1999 में चिह्नित कर दी। लीज अवधि 1978 में ही समाप्त हो गई थी, इसलिए सोसाइटी क्षतिपूर्ति का दावा भी नहीं कर सकी, जबकि सोसाइटी के सदस्य इसे भूमि अधिग्रहण बता रहे थे। बाद में बतौर क्षतिपूर्ति 15 फीसदी विकसित जमीन (209 प्लाट) सोसाइटी को वापस की गई। इस फैसले पर ही आरोप लगा कि यह जमीन बेनीवाल और अन्य को फायदा पहुंचाने के लिए वापस की गई थी। यह तब हुआ जब बेनीवाल तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार (1998-2003) में राजस्व मंत्री थीं।

कोर्ट में दायर शिकायत के मुताबिक, सोसाइटी के वास्तविक सदस्यों को किनारे कर दिया गया और कुछ प्रभावशाली लोगों ने फायदा लिया। साथ ही, इन्होंने प्लाट बांटने के दौरान सोसाइटी नियमों का भी उल्लंघन किया। शिकायत के मुताबिक, प्रत्येक सदस्य को 7 प्लॉट बतौर क्षतिपूर्ति मिले।

भाजपा नेता किरीट सोमैया ने आरोप लगाया कि कमला बेनीवाल और दूसरे सदस्यों ने खुद को 'खेतिहर मजदूर' बताकर फायदा लिया और बताया कि वह बीते 58 वर्षों से यहां 14 से 15 घंटे काम कर रहे हैं और इस तरह उन्होंने क्षतिपूर्ति के तौर पर मिले प्लॉट हथिया लिए। 

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