बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

राष्ट्रीय ध्वज में परिवर्तन के लिए न्यूजीलैंड में जनमत संग्रह





राष्ट्रीय ध्वज में परिवर्तन के लिए न्यूजीलैंड में जनमत संग्रह

By Live News Desk | Publish Date:29 Oct 2014

वेलिंगटन : राष्‍ट्रीय ध्‍वज में परिवर्तन को लेकर न्यूजीलैंड में जनमत संग्रह कराया जाएगा. प्रधानमंत्री जॉन की ने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज में परिवर्तन किया जाए या नहीं, इस मुद्दे पर वर्ष 2016 में जनमत संग्रह कराया जाएगा.

* जॉन की वर्तमान ध्वज को बदलने के प्रबल समर्थक
प्रधानमंत्री जॉन की वर्तमान ध्वज को बदलने के प्रबल समर्थक हैं. इस ध्वज के एक कोने पर पूर्व औपनिवेशिक शक्ति ब्रिटेन का यूनियन जैक अंकित है. की ने एक बयान में कहा हमारा ध्वज हमारी राष्ट्रीय पहचान का सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक है और मेरा मानना है कि न्यूजीलैंड वासियों के लिए यह सही समय है कि वह ध्वज का डिजाइन इस तरह बदलने पर विचार करें जिससे एक आधुनिक, स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर हमारी पहचान बेहतर तरीके से जाहिर हो.

पूर्व में की कह चुके हैं कि वह चाहेंगे कि नये ध्वज में काली पृष्ठभूमि में चांदी की तरह चमकीला एक पौधा हो. न्यूजीलैंड की कई टीमों ने ऐसे बैनर का उपयोग किया है. पिछले महीने हुये आम चुनाव में तीसरी बार जीत दर्ज करने के बाद की ने कुछ वर्गों के विरोध के बावजूद प्रेस के सामने ध्वज बदलने के योजना की घोषणा की थी.
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                             न्यू जीलैंड में झंडे में बदलाव के लिए होगा जनमत संग्रह
एएफपी| Oct 29, 2014

वेलिंगटन
न्यू जीलैंड के पीएम जॉन की ने बुधवार को कहा कि नैशनल फ्लैग में बदलाव किया जाए या नहीं, इस मुद्दे पर साल 2016 में जनमत संग्रह कराया जाएगा।

हालांकि जॉन की झंडे को बदलने के प्रबल समर्थक हैं। इस झंडे के एक कोने पर ब्रिटेन का यूनियन जैक बना हुआ है।

की ने एक बयान में कहा कि हमारा झंडा हमारी राष्ट्रीय पहचान का सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक है। मेरा मानना है कि न्यूजीलैंड वासियों के लिए यह सही समय है कि वह झंडे का डिजाइन इस तरह बदलने पर विचार करें, जिससे एक आधुनिक, स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर हमारी पहचान बेहतर तरीके से जाहिर हो।

पूर्व में की कह चुके हैं कि वह चाहेंगे कि नए झंडे में काले बैकग्राउंड में चांदी की तरह चमकीला एक पौधा हो। न्यूजीलैंड की कई टीमों ने ऐसे बैनर का इस्तेमाल किया है।

मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

राजस्थान में नगरीय निकायों के चुनाव 22 नवंबर 2014 को



 राजस्थान में नगरीय निकायों के चुनाव 22 नवंबर 2014 को

जयपुर। जयपुर नगर निगम सहित प्रदेश के 46 नगरीय निकायों में चुनाव के लिए मतदान 22 नंवबर को होगा। मतगणना जिला मुख्यालयों पर 25 नवंबर को होगी। राज्य निर्वाचन आयोग दोपहर में निकाय चुनाव का विस्तृत कार्यक्रम जारी कर दिया। इस बार निकाय प्रमुख के अप्रत्यक्ष रीति से करवाएं जाएंगे। निकायों का प्रमुख सीधी जनता नहीं, पार्षद चुनेंगे। चुनाव की घोषणा के साथ ही चुनाव वाले निकायों में आचार संहिता लागू हो गई। वर्तमान बोर्ड का कार्यकाल 26 नवंबर, 2014 को पूरा हो रहा है।

निकाय चुनाव के लिए जहां भाजपा और कांग्रेस ने चुनावी तैयारियां कर ली हैं, वहीं निर्वाचन विभाग ने भी निकाय चुनाव की तैयारियों को अंतिम रूप दे दिया है। निर्वाचन विभाग के कार्यक्रम के अनुसार 22 नवंबर को मतदान और उसके बाद जिला स्तर पर मतगणना 25 नवंबर को होगी। मतगणना के बाद 26 नवंबर को निकाय अध्यक्ष के चुनाव होंगे।

नगरीय निकाय में जयपुर नगर निगम के साथ ही जोधपुर, कोटा, बीकानेर और पहली बार गठित उदयपुर, भरतपुर नगर निगम के चुनाव हो रहे हैं। इसी के साथ 9 नगर परिषद और 31 नगर पालिकाओं के लिए मतदान होगा। निकाय चुनाव में प्रदेश में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच माना जा रहा है। दोनों दलों ने निकायों के टिकट वितरण और चुनाव लड़ाने के लिए कवायद शुरू कर दी है।

रूक जाएगा तबादलों को दौर
निकाय चुनाव की आचार संहिता के साथ ही चुनाव वाले क्षेत्रों में तबादलों पर पाबंदी लग गई। अजमेर को छोड़ कर सभी नगर निगम क्षेत्रों सहित 46 निकायों में कर्मचारी और अधिकारियों के तबादलों पर रोक रहेगी।

ये हैं नगर निगम 
जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, कोटा, उदयपुर, भरतपुर।

ये हैं नगर परिषद-नगर पालिका 
ब्यावर, पुष्कर, अलवर, भिवाड़ी, बांसवाड़ा, छबड़ा, मांगरोल, बाड़मेर, बालोतरा, चित्तौड़गढ़, निम्बाहेड़ा, रावतभाटा, चूरू, राजगढ़, श्रीगंगानगर, सूरतगढ़, हनुमानगढ़, जैसलमेर, भीनमाल, जालौर, बिसाऊ, झुंझुनंू, पिलानी, फलौदी, कैथून, सांगोद, डीडवाना, मकराना, पाली, सुमेरपुर, अमेट, नाथद्वारा, नीमकाथाना, सीकर, माउंट आबू, पिंडवाड़ा, शिवगंज, सिरोही, टोंक, कानोड़।

रविवार, 26 अक्तूबर 2014

प्रधान मंत्री मोदी की चाय पार्टी में शिवसेना भी हुई शामिल,



                                               प्रधान मंत्री मोदी की चाय पार्टी में शिवसेना भी हुई शामिल,
                                                      मोदी ने गरीबों की मदद पर दिया जोर

aajtak.in [Edited By: स्वपनल सोनल] |
नई दिल्ली, 26 अक्टूबर 2014


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के घर रविवार को आयोजित एनडीए सांसदों की चाय पार्टी खत्म हो चुकी है. इस पार्टी में शिवसेना के सांसद भी मौजूद थे. पीएम ने पार्टी के दौरान अपने भाषण में स्वच्छ भारत अभियान की तारीफ की. मोदी ने कहा कि हमें गरीबों के हालात सुधारने की कोशिश करनी चाहिए. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जनधन योजना पर रिपोर्ट पेश की. बैठक का संचालन वेंकैया नायडू ने किया, जबकि आडवाणी ने भी सरकार के कामकाज की तारीफ की.

अगले महीने होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र से पहले प्रधानमंत्री की इस बैठक में सबसे खास नाराज चल रहे शिवसेना के सदस्यों का जुटना रहा. दिवाली के मौके पर बुलाई गई इस बैठक में शिवसेना के सदस्यों के आने से महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर बीजेपी और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली इस पार्टी के बीच सहयोग की उम्मीदें बढ़ती दिख रही हैं.

लगभग दो घंटे चली बैठक में प्रधानमंत्री ने अपनी महत्वाकांक्षी 'स्वच्छ भारत अभियान' योजना की महत्ता के बारे में सत्तारूढ़ सांसदों को अवगत कराया और उनसे इसमें बढ़चढ़कर सहयोग करने की अपील की. उन्होंने कहा कि सरकार की सभी योजनाओं को गरीबों को केंद्रित करके बनाया जाना चाहिए. पीएम ने विश्वास जताया कि इस तरह से सरकार गरीबी को कम करने में सक्षम हो सकती है.

वित्त मंत्री अरूण जेटली ने सरकार की एक अन्य महत्वपूर्ण जनधन योजना के बारे में सांसदों को जानकारी दी और ग्रामीण विकास मंत्री नितिन गडकरी ने हाल ही प्रधानमंत्री द्वारा घोषित आदर्श ग्राम योजना के बारे में सांसदों बताया.

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चाय पार्टी: मंत्रियों ने दिए प्रेजेंटेशन, मोदी ने दिए सांसदों को निर्देश
नवभारतटाइम्स.कॉम| Oct 26, 2014,
नई दिल्ली

पीएम नरेंद्र मोदी ने रविवार शाम को एनडीए के सांसदों के साथ 'चाय पर चर्चा' की। इस चाय पार्टी में सरकार की महत्वकांक्षी योजनाओं पर जहां मंत्रियों ने चर्चा की, वहीं सरकार के काम से जनता को रू-ब-रू कराने की रणनीति भी बनाई गई। चाय की चुस्कियों के बीच मोदी सरकार के 7 मंत्रियों ने डीटेल प्रेजेंटेशन दिए। मोदी ने भी सांसदों से सीधा संवाद किया। उन्होंने एनडीए के सांसदों को निर्देश दिया कि वे सरकार की योजनाओं के बारे में जनता को बताएं। मोदी की इस चाय पार्टी में एनडीए के अन्य सहयोगियों के साथ शिव सेना के सांसद भी शामिल हुए, लेकिन महाराष्ट्र पर कोई चर्चा नहीं हुई।

क्या हुआ मोदी की इस चाय पार्टी में
एनडीए के सांसदों के लिए मोदी की यह टी पार्टी करीब दो घंटे तक चली। बैठक में मोदी सरकार के सात मंत्रियों ने एक-एक कर अपने मंत्रालय की महत्वकांक्षी योजनाओं के बारे में प्रेजेंटेशन दिए। सबसे पहले वित्त और रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने जनधन योजना पर प्रेजेंटेशन दिया। उन्होंने कोल ऑर्डिनेंस पर बोला। इसके बाद नितिन गडकरी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना के बारे में बताया। फिर स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने स्वास्थ्य मंत्रालय की महत्वकांक्षी योजनाओं की जानकारी दी। इसके बाद पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने गैस कीमतों पर जानकारी दी। प्रधान ने बताया कि नेचरल गैस की कीमतों में बढ़ोतरी का क्या असर पड़ सकता है। इसके बाद लेबर मिनिस्टर नरेंद्र सिंह तोमर ने प्रेजेंटेशन दिया। उन्होंने मिनिमम पेंशन स्कीम की जानकारी दी। और सबसे आखिर में संसदीय कार्य मंत्री एम वेंकैया नायडू ने अपनी बात रखी।नायडू ने एनडीए के सभी सांसदों से संसद के शीतकालीन सत्र में हमेशा उपस्थित रहने और चर्चाओं में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने की अपील की।

बीजेपी नेता राजीव प्रताप रूडी ने बताया कि टी पार्टी के दौरान प्रधानमंत्री ने सभी सांसदों से सीधा संवाद किया।उन्होंने सांसदों के सामने सफाई और स्वच्छता को लेकर अपना नजरिया रखा और बताया कि वह इस पर क्या कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह बैठक बेहद कामयाब रही। वहीं बीजेपी सांसद कीर्ति आजाद ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी के विचार हमेशा जनता के हित के लिए होते हैं। चाय पार्टी में भी उन्होंने यही विचार रखे कि हमें जनता के सेवक के तौर पर काम करना चाहिए। सूत्रों के मुताबिक बैठक में मोदी ने सभी सांसदों से कहा कि वह राजनीतिक फायदे-नुकसान से ऊपर उठकर काम करें।


आडवाणी बोले, 'यह दिवाली बड़ी शुभ है' इस अवसर पर वरिष्ठ बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि बीजेपी के लिए यह बहुत शुभ दिवाली है, क्योंकि पार्टी पहली बार अपने बूते बहुमत में आई है।
प्रधानमंत्री की ओर से आयोजित यह दिवाली मिलन खास था, क्योंकि यह महाराष्ट्र में सरकार के गठन के पहले आयोजित हो रहा है । वहां बीजेपी-शिव सेना के संभावित गठबंधन को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि एनडीए के कुछ सहयोगी इस कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हुए, क्योंकि इनमें से कुछ दलों का एक भी निर्वाचित सांसद नहीं है।

रक्षा क्षेत्र में 80 हजार करोड़ की परियोजनाएं मंजूर


        यू पी ए ने सेना को बहुत कमजोर कर दिया था, उन्हे रक्षा संसाधन ही नहीं दिये। आधुनिक रक्षा उपकरणों की खरीद ही नहीं की !! जिससे रक्षा मामले में भारत आस पडौस से पिछडा हुआ था। मोदी सरकार के इस निर्णय से भारतीय सेनायें रक्षा के मामले में आत्म निर्भर हो सकेगीं।

रक्षा क्षेत्र में भी ‘मेक इन इंडिया’, 80 हजार  करोड़ की परियोजनाएं मंजूरaajtak.in [Edited By: महुआ बोस] | मुंबई, 25 अक्टूबर 2014


             केन्द्र सरकार ने शनिवार को 80 हजार करोड़ रुपये की रक्षा परियोजनाओं को मंजूरी दे दी. लेकिन यहां भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ आह्वान का ध्यान रखा गया है. सरकार ने तय किया है कि छह पनडुब्बियों का स्वदेशी स्तर पर निर्माण किया जाएगा, जबकि 8000 इस्राइली टैंक रोधी गाइडेड मिसाइल और 12 उन्नत डोरनियर निगरानी विमान खरीदे जाएंगे.

इन निर्णयों से पहले रक्षा मंत्री अरुण जेटली के नेतृत्व में रक्षा खरीद परिषद की दो घंटे से ज्यादा देर तक बैठक चली, जिसमें रक्षा सचिव, तीनों सेनाओं के प्रमुखों, डीआरडीओ प्रमुख एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया. अधिकतर निर्णय नौसेना के अनूकुल रहे जो अपग्रेडेशन एवं क्षमता विस्तार की भारी कमी महसूस कर रही है. बड़ा निर्णय बाहर से खरीदने के बजाय 50 हजार करोड़ रुपये की लागत से भारत में छह पनडुब्बियों का निर्माण करने का है.

एक अन्य महत्वपूर्ण फैसला भारतीय सेना के लिए अमेरिका से जेवलिन मिसाइल खरीदने के बजाय 3200 करोड़ रुपये में इस्राइल से 8356 टैंक रोधी मिसाइल खरीदना है. सेना मिसाइलों के लिए 321 लांचर भी खरीदेगी. हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड 1850 करोड़ रुपये की लागत से उन्नत सेंसरों वाले 12 डोरनियर निगरानी विमान खरीदेगा. डीएसी ने 662 करोड़ रुपये में मेदक के आयुध कारखाना बोर्ड से 36 इंफेट्री फाइटिंग व्हेकिल खरीदने का निर्णय किया है.

देश में छह पनडुब्बियां बनाने के निर्णय का ब्यौरा देते हुए आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि अब रक्षा मंत्रालय एक समिति का गठन करेगा. यह समिति अगले 6.8 सप्ताह में निजी एवं सार्वजनिक गोदियों का अध्ययन करेगी. इसके बाद अध्ययन के आधार पर मंत्रालय विशिष्ट बंदरगाह को प्रस्ताव का अनुरोध (आरएफपी) जारी करेगा. पनडुब्बी एयर इंडिपेंडेंट संचालन (एआईपी) क्षमता से लैस होगी, जिससे यह पारंपरिक पनडुब्बी की तुलना में अधिक समय तक पानी के भीतर रह सकेगी. इसके अलावा इसकी चलने की गति भी तेज हो जाएगी.

आपको बता दें कि नौसेना के पास इस समय परिचालनरत 13 पनडुब्बी हैं. 1999 में यह लक्ष्य तय किया गया था कि 2030 तक इनकी संख्या 24 होनी चाहिए. पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने छह स्कार्पियन पनडुब्बियों को मंजूरी दी थी और पहली पनडुब्बी की आपूर्ति 2016 तक होने की संभावना है. भारत में पनडुब्बी निर्माण करने का निर्णय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ आह्वान के अनुरूप है. इस पनडुब्बी में जमीनी हमला करने वाली क्रूज मिसाइल को लगाने की क्षमता होगी.

बैठक में भाग लेने वाले अधिकारियों को संबोधित करते हुए जेटली ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा सरकार के लिए सर्वोच्च चिंता का विषय है. उन्होंने कहा कि खरीद प्रक्रिया में सभी बाधाओं एवं अड़चनों पर शीघ्रता से ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि खरीद की गति बाधित न हो. डीएसी ने नौसेना के विशेष अभियानों के लिए उपकरणों की खरीद को मंजूरी दी, लेकिन इनकी जानकारी को गोपनीय रखा गया है.

सूत्रों ने बताया कि यह बुनियादी तौर पर नौसेना की प्रतिष्ठित कमांडो शाखा मार्कोस के लिए है. सूत्रों ने बताया कि स्कार्पियन पनडुब्बी के लिए तारपीडो तथा हैवी कैलिबर गन खरीदने का निर्णय तकनीकी आधार पर टाल दिया गया. उन्होंने कहा कि उसके बारे में जल्द ही कोई फैसला किया जाएगा. डीएसी का गठन 2001 में कारगिल युद्ध के बाद रक्षा क्षेत्र में सुधार के तहत किया गया था.

शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

हिन्दु जगे तो विश्व जगेगा,मानव का विश्वास जगेगा


हिन्दु जगे तो विश्व जगेगा, यू टियूब लिंक
https://www.youtube.com/watch?v=nLOEruUaWls



हिन्दु जगेगा देश जगेगा


हिन्दु जगे तो विश्व जगेगा मानव का विश्वास जगेगा
भेद भावना तमस ह्टेगा समरसता अमर्त बरसेगा
हिन्दु जगेगा विश्व जगेगा

हिन्दु सदा से विश्व बन्धु है जड चेतन अपना माना है
मानव पशु तरु गीरी सरीता में एक ब्रम्ह को पहचाना है
जो चाहे जिस पथ से आये साधक केन्द्र बिंदु पहुचेगा ॥१॥

इसी सत्य को विविध पक्ष से वेदों में हमने गाया था
निकट बिठा कर इसी तत्व को उपनिषदो में समझाया था
मन्दिर मथ गुरुद्वारे जाकर यही ज्ञान सत्संग मिलेगा ॥२॥

हिन्दु धर्म वह सिंधु अटल है जिसमें सब धारा मिलती है
धर्म अर्थ ओर काम मोक्ष की किरणे लहर लहर खिलती है
इसी पुर्ण में पुर्ण जगत का जीवन मधु संपुर्ण फलेगा

इस पावन हिन्दुत्व सुधा की रक्षा प्राणों से करनी है
जग को आर्यशील की शिक्षा निज जीवन से सिखलानी है
द्वेष त्वेष भय सभी हटाने पान्चजन्य फिर से गूंजेगा ॥३॥

'जब मैं कुर्सियां लगाता था' - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी



'जब मैं कुर्सियां लगाता था', पत्रकारों से बेबाक बोले पीएम मोदीSat, 25 Oct 2014 

नई दिल्ली। भाजपा कार्यालय में दिवाली मिलन कार्यक्रम के दौरान संपादकों और भाजपा कवर करने वाले पत्रकारों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 'मैं भी पहले कभी लोगों के इंतजार में यहीं पर कुर्सियां लगाया करता था। कुछ साल पहले तक मीडिया से हमारा नाता रहता था। वो दिन कुछ और थे, खुलकर बातचीत होती थी। इसका हमें सीधा लाभ गुजरात में मिला।'

मोदी ने कहा, 'मैं कुछ रास्ता खोज रहा हूं कि मीडिया से हमारा रिश्ता कैसे गहरा हो। मोदी ने कहा कि मीडिया से कई जानकारी भी मिलती है और विजन भी मिलता है। मीडिया की हर घटना पर पैनी नजर होती है। पत्रकारों से पहले बहुत सारी बातें होती थीं, लेकिन अब मौका नहीं मिल पाता है।'

साथ ही स्वच्छता अभियान पर मीडियाकर्मियों के सहयोग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सफाई पर जो कालम लिखे जा रहे हैं, वे अभूतपूर्व हैं। इसके पहले ऐसे कॉलम कभी नहीं लिखे गए। जितना स्वास्थ्य जरूरी है, उतना ही जरूरी है स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता। लोगों को एक साथ काम करने के लिए मीडिया ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। मोदी ने कहा कि आपने तो कलम को ही झाड़ू बना लिया। इसके साथ ही उन्होंने सभी पत्रकारों को दिवाली की शुभकामनाएं दीं।

सभी को संबोधित करने के बाद प्रधानमंत्री ने व्यक्तिगत तौर पर पहले संपादकों से मुलाकात की और फिर भाजपा कवर करने वाले पत्रकारों से मुलाकात कर सेल्फी भी खिंचवाई।

इसके पूर्व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सभा में मौजूद तमाम लोगों को दिवाली की शुभकामनाएं दी और बताया कि यह दिवाली भाजपा के लिए बहुत शुभ है। उन्होंने कहा कि हमारे कुशल नेतृत्व के ऊपर देश ने भरोसा जताया है जिसकी वजह से हाल ही में हमें दो राज्यों में सफलता मिली है।

भारत बनायेगा , चीन सीमा पर 54 नई चौकियां



भारत ने चीन को दिखाया ठेंगा, सीमा पर बनेंगी 54 नई चौकियां

 24 Oct 2014

जागरण न्यूज नेटवर्क, ग्रेटर नोएडा। अरुणाचल प्रदेश से लगती सीमा पर सड़क निर्माण को लेकर चीन की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए भारत ने इस सीमांत राज्य में 54 नई चौकियां बढ़ाने का एलान किया है। इसके अलावा सीमा पर अन्य निर्माण कार्यो के लिए 175 करोड़ रुपये के पैकेज की भी घोषणा की है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारत पड़ोसी मुल्कों से मधुर रिश्ते रखना चाहता है। इस दिशा में केंद्र सरकार ने मजबूती से कदम आगे बढ़ाए हैं। अगर चीन और पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आए तो उन्हें मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आइटीबीपी) के 53वें स्थापना दिवस पर शुक्रवार को आयोजित समारोह में राजनाथ सिंह ने कहा कि विश्व शांति के लिए भारत बातचीत के जरिये चीन के साथ सीमा विवाद को सुलझाने का प्रयास करता रहा है। एक बार फिर पाकिस्तान पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि पड़ोसी देश लगातार संघर्ष विराम का उल्लंघन कर रहा है। दिवाली के दिन भी सीमा पर घुसपैठ की कोशिश व गोलीबारी की गई, लेकिन सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने मुंहतोड़ जवाब देते हुए उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

चीनी सैनिक भी भारतीय सीमा में घुसने का प्रयास करते हैं। कोई पीठ पर गोली चलाएगा तो हम भी मुंहतोड़ जवाब देना जानते हैं। हम इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाएंगे ताकि दोनों देशों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जा सके। कुछ दिन पूर्व चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के भारत दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीमा विवाद मामले को प्रमुखता से उठाया था। चीन की तरफ से सीमा के नजदीक एयरफील्ड बनाने और रडार लगाने संबंधी रिपोर्टो पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए गृहमंत्री ने कहा कि सीमा विवाद से जुड़े सारे मसले सिर्फ बातचीत के माध्यम से ही सुलझाए जाने चाहिए।

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चीन-पाक से सभी मुद्दे बातचीत के जरिए सुलझाना चाहता है भारत

Publish Date:Fri, 24 Oct 2014

नई दिल्ली। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारत अपने दोनों पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान के साथ सभी विवादित मुद्दों को बातचीत के जरिए सुलझाने का पक्षधर है। गृहमंत्री ने साफतौर पर कहा कि पाकिस्तान से बातचीत तभी संभव है जब वह सीमा पार से हो रही गोलीबारी को बंद कर शांति बहाली की तरफ कदम बढ़ाए।
राजनाथ का यह बयान पाकिस्तान के उस कदम के बाद आया है जिसमें उसकी संसद में भारत के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया गया था। इस प्रस्ताव में पाकिस्तान ने भारत पर सीमा उल्लंघन का आरोप लगाते हुए निंदा की थी। भारत के खिलाफ लाए गए इस निंदा प्रस्ताव में कश्मीर का मुद्दा भी लाया गया। पाकिस्तान की संसद इस प्रस्ताव को पास कर भारत को चेतावनी दी है वह पाकिस्तान की परेशानियों का नाजायज फायदा उठाने की कोशिश न करे।
इस बाबत सवाल पूछे जाने पर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पाकिस्तान से बातचीत तभी संसद है जब वह सीमा पार से हो रही गोलीबारी को बंद करेगा।

शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

विश्व की सबसे ऊंची सैन्य चोटी पर मोदी ने जवानों संग मनाई दिवाली





विश्व की सबसे ऊंची सैन्य चोटी पर मोदी ने जवानों संग मनाई  दिवाली

24 Oct 2014 


नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सियाचिन के सैनिकों और कश्मीर के बाढ़ पीड़ितों के बीच दिवाली मनाई। विश्व की सबसे ऊंची व दुर्गम सैन्य चोटी पर तैनात सेना के जवानों को संबोधित किया और मिठाई बांटी। वे करीब एक घंटे तक सियाचिन में जवानों के बीच रहे। यहां से वे श्रीनगर गए, जहां उन्होंने बाढ़ पीड़ितों से मुलाकात की।
सियाचिन स्थित बर्फ की ऊंची चोटियों से मोदी ने दीपावली के मौके पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को बधाई दी। मैं समझता हूं कि प्रणब दा को मिली बधाई में यह अनोखी होगी। उन्होंने कहा कि शायद पहली बार किसी प्रधानमंत्री को दिवाली के शुभ दिन हमारे जवानों के साथ समय बिताने का अवसर मिला है। देश के प्रहरियों की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि चाहे ऊंचाई हो या भीषण ठंड, हमारे सैनिकों को कोई नहीं रोक सकता। वे वहां खड़े हैं और देश की सेवा कर रहे हैं। वे हमें सही मायने में गौरवान्वित कर रहे हैं।
उमर ने मांगी उदार मदद
सियाचिन से प्रधानमंत्री श्रीनगर पहुंचे। एयरपोर्ट पर राज्यपाल एनएन वोहरा व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने उनकी अगवानी की। उमर ने प्रधानमंत्री से राज्य के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास के लिए उदार वित्तीय मदद मांगी। सितंबर में आई भयावह बाढ़ के बाद मोदी की जम्मू-कश्मीर की यह दूसरी यात्रा थी। पहले वे राज्य के लिए 1 हजार करोड़ का राहत पैकेज घोषित कर चुके हैं। राज्य सरकार बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास के लिए 44 हजार करोड़ मांग रही है।
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पूरा देश आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने को तैयार है। सियाचिन के जवानों के साथ दिवाली मनाना गर्व की बात है। पूरा देश चैन से सोता है क्योंकि आप जागते हैं। आपके परिवारों का प्रतिनिधि बनकर आया हूं। आपके कारण देश के 125 करोड़ लोग खुशी से दिवाली मनाते हैं। आप दुश्मनों को खतरा और अपनों को जीवन देते हैं।
-नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

गुरुवार, 23 अक्तूबर 2014

Diwali : "Row of Lights." - Swami Chidanand Saraswati



 Diwali : "Row of Lights." 

The time of Diwali is one of the most festive and beautiful times of the year. Diwali literally means a "Row of Lights." It is a time filled with light and love; a time when Indians all over the world rejoice. Diwali is celebrated on the thirteenth/fourteenth day in the dark half of Kartik (October - November); it is also known as Krishna Chaturdashi. It is the darkest night of the darkest period, yet it is a celebration of light! Diwali is heralded as the triumph of good over evil.

The meanings of Diwali, its symbols and rituals, and the reasons for celebration are innumerable. Diwali celebrates Lord Rama's glorious and long-awaited return to his Kingdom of Ayodhya after his fourteen long years of exile in the forests. It commemorates Lord Krishna's victory over the demon Narakaasura who had kidnapped and terrorized the gopis of Vrindavan. When the evil Naraka was finally killed by Bhagwan Krishna and Satyabhaama, he begged pitifully for mercy; thus, upon his entreaties, it was declared that this day of his death would be celebrated with great joy and festivity. It is also celebrated as the day Bhagwan Vishnu married Maha Lakshmi.


Diwali is also associated with the story of the fall of Bali - a demon king who was conquered by Lord Vishnu. Lord Vishnu appeared to the demon king Bali in the form of a dwarf and requested only three steps of land. The evil and egotistic Bali granted the drawf's meager request of only three feet. Suddenly, Lord Vishnu took on His grand size and placed one foot on the Earth, another on the Heavens and His third on the head of the evil Bali.

In general, Diwali signifies the triumph of good over evil, of righteousness over treachery, of truth over falsehood, and of light over darkness.

Additionally, Diwali is the holy time in which we offer our prayers to Maha Lakshmi and we worship Her with piety and devotion. Maha Lakshmi is the goddess of wealth and prosperity, bestowing these abundantly upon her devotees.


Diwali is a holiday of joy; it is the time when we gather with loved ones, celebrating our family, our friends and the prosperity God has bestowed upon us.

However it is also a holiday that is widely misunderstood and misrepresented, especially in the West. I have heard that in the West Diwali is referred to as "The Indians' Christmas" and that it is celebrated with frivolity and decadence. Let us talk about what Diwali really means, about why we celebrate it and about why we worship Goddess Lakshmi on this day.

Celebration of Light
There are three main aspects of this holiday called Diwali. The first is the celebration of light. We line our homes and streets with lanterns; we explode fireworks; children play with sparklers.

However, Diwali is not a festival of light in order that we may burn candles, fireworks and sparklers. Sure, these are wonderful ways of expressing our gaiety. But, they are not the only or true meaning of "light." Diwali is a festival of the light which dispels the darkness of our ignorance; it is a festival of the light which shows us the way on our journey through life. The purpose is not to glorify the light of the candle, or the light of the firecracker. The purpose is to glorify the light of God. It is He who bestows the real light, the everlasting light upon the darkness of this mundane world. A candle burns out. A firework is a momentary visual experience. But, the candle of a still mind and the fireworks of a heart filled with bhakti are divine and eternal; these are what we should be celebrating.

We decorate our homes with lanterns; but why? What is the symbolism behind that? Those lanterns signify God's light, penetrating through the ignorance and sin of our daily lives. They signify the divine light, shining its way through this mundane world. A home bathed in light is a home in which anger, pain, and ignorance are being dispelled; it is a home that is calling to God. However, too many people turn this into a domestic beauty contest, spending days and a great deal of money to purchase the newest dias, the most beautiful candles. "We had 75 candles burning last night," we gloat. This is only the light of glamour. It is not the light of God, and thus the true meaning of the holiday is lost…

The light of Diwali should be within us. It should symbolize the personal relationship between God and our families. It should not be so we attract attention from passing cars, or so we are the envy of the neighborhood. Let the light penetrate inward, for only there will it have lasting benefit. One piece of cotton soaked in ghee, lit with a pure heart, a conscious mind and an earnest desire to be free from ignorance is far "brighter" than 100 fashion deepaks, lit in simple unconscious revelry.

A Fresh Start
Diwali also marks the new year. For some, the day of Diwali itself is the first day of the new year, and for others the new year's day is the day following Diwali. But, for all this season is one of heralding in the New Year.

In the joyous mood of this season, we clean our homes, our offices, our rooms, letting the light of Diwali enter all the corners of our lives. We begin new checkbooks, diaries and calendars. It is a day of "starting fresh."

On this day we clean every room of the house; we dust every corner of the garage, we sweep behind bookshelves, vacuum under beds and empty out cabinets. But, what about our hearts? When was the last time we swept out our hearts? When did we last empty them of all the dirt and garbage that has accumulated throughout our lives?

That is the real cleaning we must do. That is the real meaning of "starting fresh." We must clean out our hearts, ridding them of darkness and bitterness; we must make them clean and sparkling places for God to live. We must be as thorough with ourselves as we are with our homes. Are there any dark corners in our hearts we have avoided for so long? Are we simply "sweeping all the dirt under the rug?" God sees all and knows all. He knows what is behind every wall of our hearts, what is swept into every corner, and what is hidden under every rug. Let us truly clean out our hearts; let us rid ourselves of the grudges, pain, and anger that clutter our ability to love freely. Let us empty out every nook and cranny, so that His divine light can shine throughout.

Additionally, on Diwali, we begin a new checkbook; we put last year's accounts to rest. But, what about our own balance sheets? When was the last time we assessed our minuses and plusses, our strengths and our weaknesses, our good deeds and selfish deeds? How many years' worth of grudges and bitterness and pain have we left unchecked?

A good businessman always checks his balance sheet: how much he spent, how much he earned. A good teacher always checks the progress of her students: how many are passing, how many are failing. And they assess themselves accordingly: "Am I a good businessman?" "Am I a good teacher?" In the same way we must assess the balance sheets of our lives. Look at the last year. Where do we stand? How many people did we hurt? How many did we heal? How many times did we lose our temper? How many times did we give more than we received? Then, just as we give our past checkbooks and the first check of our new one to God, let us give all our minus and plus points to Him. He is the one responsible for all our good deeds. And our bad ones are due only to ignorance. So, let us turn everything over to Him, putting our strengths, our weaknesses, our wins and our losses at His holy feet. And then, let us start afresh, with a new book, unadulterated by old grudges and bitterness.

Maha Lakshmi
The third, and perhaps most important, aspect of Diwali is the worship of Maha Lakshmi. Maha Lakshmi is the goddess of wealth and prosperity, bestowing these abundantly upon her devotees. On Diwali we pray to her for prosperity; we ask her to lavish us with her blessings. However, what sort of prosperity are we praying for? All too often, we infer wealth to mean money, possessions, material pleasures. This is NOT the true wealth in life; this is not what makes us prosperous. There is almost no correlation between the amount of money we earn, the number of possessions we buy and our sense of inner bliss and prosperity.


It is only God's presence in our lives which makes us rich. Look at India. People in small villages, in holy towns, in ancient cities have very little in terms of material possessions. Most of them live below the Western standards of poverty. Yet, if you tell them they are poor, they won't believe you, for in their opinion they are not. This is because they have God at the center of their lives. Their homes may not have TV sets, but they all have small mandirs; the children may not know the words to the latest rock and roll song, but they know the words to Aarti; they may not have computers or fancy history text books, but they know the stories of the Ramayana, the Mahabharata and other holy scriptures; they may not begin their days with newspapers, but they begin with prayer.

If you go to these villages you may see what looks like poverty to you. But, if you look a little closer, you will see that these people have a light shining in their eyes, a glow on their faces and a song in their hearts that money cannot buy.

On Diwali, we must pray to Maha Lakshmi to bestow real prosperity upon us, the prosperity that brings light to our lives and sparkle to our eyes. We must pray for an abundance of faith, not money; we must pray for success in our spiritual lives, not a promotion at work; we must pray for the love of God, not the love of the beautiful girl (or boy) in our class.

There is another point about Maha Lakshmi that is important. We tend to worship only her most prominent of aspects - that of bestowing prosperity upon her devotees. However, she is a multi-faceted goddess, filled with symbols of great importance. As we worship her, let us look more deeply at her divine aspects. First, according to our scriptures, she is the divine partner of Lord Vishnu. In Hindu tradition, there is almost always a pair - a male and a female manifestation of the Divine, and they play interdependent roles. In this way it is said that Maha Lakshmi provides Lord Vishnu with the wealth necessary in order to sustain life. He sustains, but through the wealth she provides.

Therefore, in its highest meaning, Maha Lakshmi provides wealth for sustenance, not for indulgence. Our material wealth and prosperity should only sustain us, giving us that which is necessary to preserve our lives. All surplus should be used for humanitarian causes. She does not give wealth so that we may become fat and lazy; yet, that is what we tend to do with the wealth we receive. Let us remember that Maha Lakshmi's material wealth is meant for sustenance and preservation, not for luxury and decadence.
Additionally, we worship Maha Lakshmi who is the divine symbol of purity and chastity. Yet, in our celebration of her, we frequently indulge in frivolity and hedonism. How can we worship her while engaging in the opposite of what she represents? We must re-assess how we pay tribute to this holy Goddess!

The last point I want to mention is that she is typically portrayed wearing red. What does this mean? Red is the color of action, and she is the goddess of prosperity. This means that in order to obtain the true prosperity in life, we must engage in action. Most people think that in order to be spiritual, or to obtain "spiritual prosperity" one must be sitting in lotus posture in the Himalayas. This is not the only way. In the Bhagavad-Gita, Lord Krishna teaches about Karma Yoga, about serving God by doing your duty. We must engage ourselves in active, good service; that is truly the way to be with Him.


Let our inner world be filled with devotion to Him, and let our outer performance be filled with perfect work, perfect action. I once heard a story about a man who spent 40 years meditating so he could walk on water. He thought that if he could walk on water, then he had truly attained spiritual perfection. When I heard this story, I thought, "Why not spend 40 cents instead for a ride in the motorboat across the river, and spend the 40 years giving something to the world?" That is the real purpose of life.

So, on this holy day, let us fill our entire beings with the light of God. Let us clean out our minds and hearts, making a true "fresh start." Let us pray to Maha Lakshmi to bestow the divine gifts of faith, purity and devotion upon us. With those, we will always be always rich, always prosperous, and always fulfilled. Let us celebrate Diwali this year as a true "holy day," not only as another frivolous "holiday."


May God bless you all.
In the service of God and humanity,
Swami Chidanand Saraswati

दीपावली : धर्म का दीप जलाएं - ललित गर्ग



                                                   धर्म का दीप यानी घट में दीप जलाएं
                                                                      -ललित गर्ग- 

दीपावली का पर्व ज्योति का पर्व है। दीपावली का पर्व पुरुषार्थ का पर्व है। यह आत्म साक्षात्कार का पर्व है। यह अपने भीतर सुषुप्त चेतना को जगाने का अनुपम पर्व है। यह हमारे आभामंडल को विशुद्ध और पर्यावरण की स्वच्छता के प्रति जागरूकता का संदेश देने का पर्व है।

भगवान महावीर ने दीपावली की रात जो उपदेश दिया उसे हम प्रकाश पर्व का श्रेष्ठ संदेश मान सकते हैं। भगवान महावीर की यह शिक्षा मानव मात्र के आंतरिक जगत को आलोकित करने वाली है। तथागत बुद्ध की अमृत वाणी 'अप्पदीवो भव' अर्थात् 'आत्मा के लिए दीपक बन' वह भी इसी भावना को पुष्ट कर रही है। इतिहासकार कहते हैं कि जिस दिन ज्ञान की ज्योति लेकर नचिकेता यमलोक से मृत्युलोक में अवतरित हुए वह दिन भी दीपावली का ही दिन था।


यद्यपि लोक मानस में दीपावली एक सांस्कृतिक पर्व के रूप में अपनी व्यापकता सिद्ध कर चुका है। फिर भी यह तो मानना ही होगा कि जिन ऐतिहासिक महापुरुषों के घटना प्रसंगों से इस पर्व की महत्ता जुड़ी है, वे अध्यात्म जगत के शिखर पुरुष थे। इस दृष्टि से दीपावली पर्व लौकिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का अनूठा पर्व है।

यह बात सच है कि मनुष्य का रूझान हमेशा प्रकाश की ओर रहा है। अंधकार को उसने कभी न चाहा न कभी मांगा। 'तमसो मा ज्योतिगर्मय' भक्त की अंतर भावना अथवा प्रार्थना का यह स्वर भी इसका पुष्ट प्रमाण है। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चल इस प्रशस्त कामना की पूर्णता हेतु मनुष्य ने खोज शुरू की। उसने सोचा कि वह कौन-सा दीप है जो मंजिल तक जाने वाले पथ को आलोकित कर सकता है। अंधकार से घिरा हुआ आदमी दिशाहीन होकर चाहे जितनी गति करें, सार्थक नहीं हुआ करती। आचरण से पहले ज्ञान को, चारित्र पालन से पूर्व सम्यक्त्व को आवश्यक माना है। ज्ञान जीवन में प्रकाश करने वाला होता है। शास्त्र में भी कहा गया-'नाणं पयासयरं' अर्थात ज्ञान प्रकाशकर है।
हमारे भीतर अज्ञान का तमस छाया हुआ है। वह ज्ञान के प्रकाश से ही मिट सकता है। ज्ञान दुनिया का सबसे बड़ा प्रकाश दीप है। जब ज्ञान का दीप जलता है तब भीतर और बाहर दोनों आलोकित हो जाते हैं। अंधकार का साम्राज्य स्वतः समाप्त हो जाता है। ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता केवल भीतर के अंधकार मोह-मूर्च्छा को मिटाने के लिए ही नहीं, अपितु लोभ और आसक्ति के परिणामस्वरूप खड़ी हुई पर्यावरण प्रदूषण और अनैतिकता जैसी बाहरी समस्याओं को सुलझाने के लिए भी जरूरी है।

आतंकवाद, भय, हिंसा, प्रदूषण, अनैतिकता, ओजोन का नष्ट होना आदि समस्याएं इक्कीसवीं सदी के मनुष्य के सामने चुनौती बनकर खड़ी है। आखिर इन समस्याओं का जनक भी मनुष्य ही तो है। क्योंकि किसी पशु अथवा जानवर के लिए ऐसा करना संभव नहीं है। अनावश्यक हिंसा का जघन्य कृत्य भी मनुष्य के सिवाय दूसरा कौन कर सकता है? आतंकवाद की समस्या का हल तब तक नहीं हो सकता जब तक मनुष्य अनावश्यक हिंसा को छोड़ने का प्रण नहीं करता।

मोह का अंधकार भगाने के लिए धर्म का दीप जलाना होगा। जहां धर्म का सूर्य उदित हो गया, वहाँ का अंधकार टिक नहीं सकता। एक बार अंधकार ने ब्रह्माजी से शिकायत की कि सूरज मेरा पीछा करता है। वह मुझे मिटा देना चाहता है। ब्रह्माजी ने इस बारे में सूरज को बोला तो सूरज ने कहा-मैं अंधकार को जानता तक नहीं, मिटाने की बात तो दूर, आप पहले उसे मेरे सामने उपस्थित करें। मैं उसकी शक्ल-सूरत देखना चाहता हूं।

ब्रह्माजी ने उसे सूरज के सामने आने के लिए कहा तो अंधकार बोला-मैं उसके पास कैसे आ सकता हूं? अगर आ गया तो मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

हालांकि दीपावली एक लौकिक पर्व है। फिर भी यह केवल बाहरी अंधकार को ही नहीं, बल्कि भीतरी अंधकार को मिटाने का पर्व भी बने। हम भीतर में धर्म का दीप जलाकर मोह और मूर्च्छा के अंधकार को दूर कर सकते हैं। दीपावली के मौके पर सभी आमतौर से अपने घरों की साफ-सफाई, साज-सज्जा और उसे संवारने-निखारने का प्रयास करते हैं। उसी प्रकार अगर भीतर चेतना के आंगन पर जमे कर्म के कचरे को बुहारकर साफ किया जाए, उसे संयम से सजाने-संवारने का प्रयास किया जाए और उसमें आत्मा रूपी दीपक की अखंड ज्योति को प्रज्वलित कर दिया जाए तो मनुष्य शाश्वत सुख, शांति एवं आनंद को प्राप्त हो सकता है।

महान दार्शनिक संत आचार्य श्री महाप्रज्ञ लिखते हैं-हमें यदि धर्म को, अंदर को प्रकाश को समझना है और वास्तव में धर्म करना है तो सबसे पहले इंद्रियों को बंद करना सीखना होगा। आंखें बंद, कान बंद और मुंह बंद-ये सब बंद हो जाएंगे तो फिर नाटक या टीवी देखने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। नाटक देखने की जरूरत उन्हें पड़ती है, जो अंतर्दर्शन में नहीं जाते। यदि आप केवल आधा घंटा के लिए सारी इंद्रियों को विश्राम देकर बिलकुल स्थिर और एकाग्र होकर अपने भीतर झांकना शुरू कर दें और इसका नियमित अभ्यास करें तो एक दिन आपको कोई ऐसी झलक मिल जाएगी कि आप रोमांचित हो जाएंगे। आप देखेंगे-भीतर का जगत कितना विशाल है, कितना आनंदमय और प्रकाशमय है।

वहां कोई अंधकार नहीं है, कोई समस्या नहीं है। आपको एक दिव्य प्रकाश मिलेगा। अंधकार जीवन की समस्या है और प्रकाश उसका समाधान। जीवन जीने के लिए सहज प्रकाश चाहिए। प्रारंभ से ही मनुष्य की खोज प्रकाश को पाने की रही।
अंधकार हमारे अज्ञान का, दुराचरण का, दुष्टप्रवृत्तियों का, आलस्य और प्रमाद का, बैर और विनाश का, क्रोध और कुंठा का, राग और द्वेष का, हिंसा और कदाग्रह का अर्थात अंधकार हमारी राक्षसी मनोवृत्ति का प्रतीक है। जब मनुष्य के भीतर असद् प्रवृत्ति का जन्म होता है, तब चारों ओर वातावरण में कालिमा व्याप्त हो जाती है। अंधकार ही अंधकार नजर आने लगता है। मनुष्य हाहाकार करने लगता है। मानवता चीत्कार उठती है। अंधकार में भटके मानव का क्रंदन सुनकर करुणा की देवी का हृदय पिघल जाता है।

ऐसे समय में मनुष्य को सन्मार्ग दिखा सके, ऐसा प्रकाश स्तंभ चाहिए। इन स्थितियों में हर मानव का यही स्वर होता है कि-प्रभो, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। बुराइयों से अच्छाइयों की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो---। इस प्रकार हम प्रकाश के प्रति, सदाचार के प्रति, अमरत्व के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करते हुए आदर्श जीवन जीने का संकल्प करते हैं।

प्रकाश हमारी सद् प्रवृत्तियों का, सद्ज्ञान का, संवेदना एवं करुणा का, प्रेम एवं भाईचारे का, त्याग एवं सहिष्णुता का, सुख और शांति का, ऋद्धि और समृद्धि का, शुभ और लाभ का, श्री और सिद्धि का अर्थात्‌ दैवीय गुणों का प्रतीक है। यही प्रकाश मनुष्य की अंतर्चेतना से जब जागृत होता है, तभी इस धरती पर सतयुग का अवतरण होने लगता है।

प्रत्येक व्यक्ति के अंदर एक अखंड ज्योति जल रही है। उसकी लौ कभी-कभार मद्धिम जरूर हो जाती है, लेकिन बुझती नहीं है। उसका प्रकाश शाश्वत प्रकाश है। वह स्वयं में बहुत अधिक देदीप्यमान एवं प्रभामय है। इसी संदर्भ में महात्मा कबीरदासजी ने कहा था-'बाहर से तो कुछ न दीसे, भीतर जल रही जोत'।

दीपावली पर्व की सार्थकता के लिए जरूरी है, दीये बाहर के ही नहीं, दीये भीतर के भी जलने चाहिए। क्योंकि दीया कहीं भी जले उजाला देता है। दीए का संदेश है-हम जीवन से कभी पलायन न करें, जीवन को परिवर्तन दें, क्योंकि पलायन में मनुष्य के दामन पर बुजदिली का धब्बा लगता है, जबकि परिवर्तन में विकास की संभावनाएं जीवन की सार्थक दिशाएं खोज लेती हैं। असल में दीया उन लोगों के लिए भी चुनौती है जो अकर्मण्य, आलसी, निठल्ले, दिशाहीन और चरित्रहीन बनकर सफलता की ऊंचाइयों के सपने देखते हैं। जबकि दीया दुर्बलताओं को मिटाकर नई जीवनशैली की शुरुआत का संकल्प है।

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

ऑस्ट्रेलियाई संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करेंगे नरेंद्र मोदी



ऑस्ट्रेलियाई संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करेंगे मोदी

20 Oct 2014

मेलबर्न : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले माह ऑस्ट्रेलिया की संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करेंगे. मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री होंगे जो यहां संघीय संसद की विशेष संयुक्त बैठक में ऑस्ट्रेलिया की संसद के सदस्यों और नेताओं को संबोधित करेंगे. वह अगले माह ब्रिस्बेन में होने जा रहे जी 20 नेताओं के शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे. इसके बाद वह संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करेंगे.

प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी की पहली ऑस्ट्रेलिया यात्र को लेकर जहां कई सांसदों ने खुशी जाहिर की है वहीं यह अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि क्या वह अपना ऐतिहासिक संबोधन हिन्दी में देंगे जैसा कि उन्होंने पहले दुनिया के अलग अलग हिस्सों में किया. तस्मानिया की लेबर सीनेटर लीजा सिंह ने कहा कि मोदी के हिन्दी में संबोधन का मतलब होगा कि वह भारत का सम्मान, संस्कृति और क्षमताओं को साथ ले कर ऑस्ट्रेलिया आ रहे हैं.

42 वर्षीय लीजा ने कहा ‘‘मेरे विचार से इससे पता चलता है कि वह भारत का सम्मान, संस्कृति और क्षमताओं को साथ ले कर ऑस्ट्रेलिया आ रहे हैं तथा उनकी इस यात्र का हमारे देश में होना मेरी राय में महत्वपूर्ण है.’’उन्होंने कहा ‘‘हमारी संसद को संबोधित करना बहुत ही ज्यादा गर्व की बात है. मेरे लिये यह बात कोई मायने नहीं रखती कि वह हमारी संसद को कौन सी भाषा में संबोधित करेंगे.’’

बरकरार है मोदी का मैजिक






 महाराष्ट्र विधानसभा के चुनावी महासमर
Bhaskar news | Oct 20, 2014,
शरद पवार|टीम इंडिया
महाराष्ट्र. चुनाव डेस्क, महाराष्ट्र विधानसभा के चुनावी महासमर में कई मंत्री और विधायकों को पराजय का सामना करना पड़ा तो कई उम्मीदवारों ने पहली बार में ही किला फतह कर लिया। कई स्थानों पर निर्दलीयों ने राष्ट्रीय दलों के उम्मीदवारों को मात देते हुए रण जीत लिया।

विदर्भ : अब प्रबल संभावना है

राजनीतिक दलों और नेताओं के मन में इच्छा थी। कर नहीं पा रहे थे। जनादेश के जरिए मतदाता ने आसानी से गुत्थी सुलझा दी। भारतीय जनता पार्टी को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सहयोगी दलों समेत लगभग सवा सौ क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला है। इनमें से विदर्भ अंचल के 62 क्षेत्रों में 40 से अधिक भाजपा प्रत्याशी जीतकर आए हैं। लगभग दो तिहाई। विदर्भ में मनसे का नामोनिशान नहीं है। महाराष्ट्र के विभाजन की विरोधी शिवसेना को नाममात्र की सीटें मिली हैं। राज्य में शिवसेना 63 स्थानों पर जीतकर पिछली हैसियत बचाने में सफल हुई है। विदर्भ में जीते कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस के लगभग सभी विजयी प्रत्याशी समर्थक हैं। अलग विदर्भ राज्य के पक्ष में शिवसेना क्यों तैयार हो? यह पहला तथा सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

इसलिए कि विदर्भ उस संयुक्त महाराष्ट्र का कभी हिस्सा नहीं था जिसकी परिकल्पना उद्घव ठाकरे करते हैं। पौराणिक काल से लेकर मुगलों तक भी नहीं। वर्तमान विदर्भ और गोंडवाना सहित बुंदेलखंड पेशवा राज का हिस्सा था।

इस पैमाने पर ओडिशा से लेकर तमिलनाडु तक पेशवाई रही। अनेक हिंदीभाषी राज्य, दो बांग्लाभाषी, दो तेलुगुभाषी राज्य हैं। एक भाषा के अधिक राज्य होने से न विखंडन होता है न विकास रुकता है। लेकिन ये सब नीति और सिद्घांत की बातें हैं। व्यवहार की राजनीति के हिसाब से भाजपा और शिवसेना के 288 में 180 से अधिक प्रतिनिधि विराजमान होंगे। शिवसेना तालमेल कर उपमुख्यमंत्री पद पा सकती है, मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। भाजपा के तालमेल से शिवसेना को लंबी दौड़ में बने रहने में आसानी होगी। राष्ट्रवादी कांग्रेस पर निर्भरता से मुक्ति मिलगी। विदर्भ अलग होने पर शेष महाराष्ट्र के 226 प्रतिनिधियों में भाजपा-शिवसेना के 120 रहेंगे। बहुमत तब भी होगा। भाजपा के एक दो अधिक। चाहें तो दोनों बारी बारी से शेष अवधि को मुख्यमंत्री की खातिर बांट सकते हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने भाजपा को बाहर से समर्थन देने का वादा किया है। इस तरह का गोलमोल वादा विदर्भ के बारे में करना उनकी आदत में शुमार है। अलग विदर्भ राज्य का समर्थन कर शरद पवार अपनी साख बचाने का प्रयत्न कर सकते हैं।
अलग राज्य बनने पर विदर्भ में कांग्रेस की निश्चित ही इतनी बुरी हालत नहीं रहेगी। फजल अली आयोग ने विदर्भ को राज्य बनाने की अनुशंसा की थी। इस एक अधूरी सिफारिश को 50 बरस बाद पूरा कर कांग्रेस अपराध से मुक्त हो सकती है। पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने महाराष्ट्र के तत्कालीन नेताओं के दबाव में विदर्भ राज्य नहीं बनाया था। शिवसेना की संयुक्त महाराष्ट्र
बचाने की दलील देने वाले कांग्रेसजनों को इतिहास का कड़वा सच स्वीकार करना चाहिए-

1- संयुक्त महाराष्ट्र के पहले मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण संयुक्त महाराष्ट्र अांदोलन के विरोध में थे। उनका कहना था कि राज्य के समर्थन से अधिक नेता जवाहर लाल मेरे लिए अधिक  महत्वपूर्ण हैं।
2- विदर्भ का विकास करने के लिए किए गए करार बेकार रहे। न अकोला करार पर अमल हुआ और न नागपुर करार पर। कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ ही शिवसेना और भाजपा में शामिल हुए पुराने कांग्रेसजन विचार करें।
3- शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने एक बार कहा था कि पांच वर्ष में विकास नहीं हुआ तो विदर्भ की मांग की जा सकती है।
4- जनमंच सहित कुछ गैरराजनीतिक संगठनों ने कई जगह जनमत संग्रह कराया। 90 प्रतिशत लोग पृथक विदर्भ के पक्ष में रहे।

इससे शेष महाराष्ट्र का क्या लाभ होगा?

मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की आशंका सदा के लिए समाप्त होगी। तुल्य-बल होने के कारण न मुंबई के समृद्घ वर्ग की किसानों पर दादागीरी चलेगी और न राज्य में जाति, उपजाति, धर्म, क्षेत्रीय आधार पर अस्थिरता और अशांति होगी। ठाणे से लेकर नंदूरबार तक आदिवासी
पट्टी तथा सांगली सतारा से लेकर उस्मानाबाद- लातूर के दुष्काल की मार सहने वाले इलाकों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा। शेष महाराष्ट्र के इलाकों पर मुंबई का राजस्व खर्च होगा। वर्तमान महाराष्ट्र में उद्घव ठाकरे या आदित्य ठाकरे का मुख्यमंत्री बनने का सपना सच नहीं होगा। शेष महाराष्ट्र में इसकी संभावना है।

विदर्भ राज्य बनने से आम विदर्भवासी को क्या मिलेगा? ऐसा राज्य जिसमें प्रचुर संसाधन हैं। बस, विकास नहीं है। पड़ोसी छत्तीसगढ़, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की तरह विकास होगा। बेकारी और विफलता से उपजने वाली माओवाद जैसी समस्या का हल मिलेगा। गड़चिरोली से हजार किलोमीटर दूर बसी महंगी राजधानी मुुंबई पहुंच से दूर है। हर विर्दर्भवासी राजधानी नागपुर में काम निबटाकर उसी दिन घर पहुंच सकेगा।

भाजपा, शिवसेना सहित हर भविष्यदर्शी राजनीतिक दल के लिए यह अवसर है। वरना उक्ति है- अवसर चूके नर्तकी नाचे ताल बेताल। -प्रकाश दुबे  
   
ऐसे बदली सियासत की तस्वीर

हारकर चौंकाया-  नारायण राणे, हर्षवर्धन पाटील, नितीन राऊत, अनिल देशमुख, गणेश नाईक।

कांग्रेस के गढ़ ढहे- नागपुर्, यवतमाल, अमरावती, चंद्रपुर, गड़चिरोली, गोंदिया, भंडारा।
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बरकरार है मोदी का करिश्मा
प्रदीप सिंह , लेखक
विधानसभा चुनाव के नतीजों का असर देश की राजनीति पर हो, ऐसे अवसर कम ही आते हैं. महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के चुनाव के नतीजे के कई निहितार्थ हैं.


इन नतीजों से एक बात निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि देश में एक दल के प्रभुत्व का दौर लौट रहा है. भाजपा अब कांग्रेस की जगह देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में राज्यों में भी स्थापित होने की राह पर है. इन चुनावों ने एक बात और स्थापित की है कि इंदिरा गांधी के बाद नरेंद्र मोदी वोट दिलाने वाले देश के सबसे बड़े नेता हैं. लेकिन चिंता की बात यह है कि विपक्ष का दायरा घटता जा रहा है. भाजपा जिस अनुपात में बढ़ रही है, उसी अनुपात में कांग्रेस घट रही है.

नरेंद्र मोदी और भाजपा ने इन दोनों राज्यों के चुनावों में अकेले लड़ने का फैसला करके एक जोखिम उठाया था. दोनों राज्यों में पार्टी की हार की आंच सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंचती. खासतौर से ऐसी परिस्थिति में जब गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने पर जीत तय मानी जा रही हो. इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी. महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन टूटने का फायदा एनसीपी और कांग्रेस को हुआ है. दोनों दल पूरी तरह साफ होने की शर्मिंदगी से बच गए. बल्कि कह सकते हैं कि एनसीपी ने अपनी इज्जत बचा ली है. उसका वोट बढ़ा है. सीटें कम भले हुई हैं, पर इससे भी कम की उम्मीद थी. शरद पवार ने अपने किले को पूरी तरह ढहने से बचा लिया है. राज्य में भाजपा की संभावित सरकार को बाहर से समर्थन देने की घोषणा करके शरद पवार अब भ्रष्टाचार में फंसे अपने लोगों को बचाने का उपाय कर रहे हैं.

लेकिन कांग्रेस को क्या कहें. राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी जो पंद्रह साल से सरकार में थी, पहले नंबर से चौथे नंबर पर पहुंच गई. फिर भी कह रही है कि उतना नहीं हारे जितना हार सकते थे. इस मासूमियत पर कौन न कुर्बान हो जाए. पैर के नीचे से जमीन लगातार खिसकती जा रही है लेकिन कांग्रेस और उसके नेताओं को यकीन ही नहीं हो रहा. यह मासूमियत ओढ़ी हुई है या वास्तविक, कहना कठिन है. लेकिन नुक्सान दोनों ही हालत में है. क्योंकि जब तक आपको वास्तविकता का एहसास नहीं होगा तब तक सुधार के कदम नहीं उठा सकते.

शिवसेना तय नहीं कर पा रही है कि वह इन नतीजों से खुश हो या दुखी. क्योंकि मतदाता ने उसे पूरा दिया नहीं. आधे के लिए वह भाजपा पर निर्भर हो गई है. लेकिन उसे इस बात की ज्यादा खुशी है कि भाजपा को उसकी जरूरत है. जरूरत है यानी सौदेबाजी के लिए मैदान खुला है. उसने शुरु आत कर दी है. उसके नेता कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री पद से कम पर बात नहीं बनेगी. मुख्यमंत्री पद भी चाहिए और कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की महाराष्ट्र में कोई लहर नहीं है. मतलब कि हम तुम्हें गाली देंगे और तुम हमें मुख्यमंत्री पद दो. राजनीति में ऐसा व्यवहार शिवसेना ही कर सकती है. शिवसेना के नेता हकीकत जानने के बाद भी उसे मानने को तैयार नहीं हैं. शिवसेना की राजनीति से भाजपा पीछा छुड़ाना चाहती है. इसलिए वह शिवसेना की मांग एक हद के बाद नहीं मानेगी यह तय है. ऐसे में शिवसेना में टूट की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. इस मामले में एनसीपी ने भाजपा की सरकार को बाहर से समर्थन देने की घोषणा करके भाजपा को शिवसेना से बचा लिया है. लेकिन सवाल है कि अब शिवसेना को कौन बचाएगा!

भाजपा के लिए महाराष्ट्र अवसर और चुनौती एक साथ लेकर आया है. चुनाव नतीजे एक तरह से मुनाफे में घाटे वाली स्थिति हैं. उसे उम्मीद से कम सीटें मिली हैं. उम्मीद क्या करती है, इसका उदाहरण भाजपा है. महाराष्ट्र के प्रदेश बनने के बाद से इस राज्य में भाजपा तीसरे-चौथे नंबर की पार्टी रही है. अब वह एकदम से पहले नंबर की पार्टी बन गई है. इसके बावजूद उसके विरोधी ऐसी तस्वीर पेश कर रहे हैं मानो वह हार गई हो. चौथे नंबर की पार्टी छह महीने से भी कम समय में पहले नंबर पर आ जाए तो यह कोई सामान्य बात नहीं है. लेकिन पहले नंबर पर आना जितना मुश्किल था उससे भी ज्यादा मुश्किल मतदाताओं की अपेक्षा पर खरा उतरना है.

हरियाणा एक ऐसा राज्य है जो और चाहे जिस बात के लिए जाना जाता हो, पर विचारधारा की राजनीति के लिए तो नहीं ही जाना जाता. वहां एक विचारधारा पर आधारित पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलना आश्चर्य से कम नहीं है. हरियाणा में आज तक भाजपा को जो भी मिला है गठबंधन के जरिए ही. वह हरियाणा में हाशिए की पार्टी थी. विधानसभा का पिछला चुनाव अकेले लड़कर उसे चार सीटें मिली थीं. राज्य में पार्टी का कोई संगठन भी नहीं है. जिस राज्य में जाट मतदाता राजनीति को संचालित करते हों वहां जाटों में उसका कोई जनाधार नहीं है. ऐसे में भाजपा को अकेले दम पर सत्ता में लाने का श्रेय सिर्फ मोदी को जाता है. इस जनादेश से हरियाणा की जनता ने कांग्रेस के भ्रष्ट शासन से राज्य को मुक्ति तो दिलाई ही है, साथ ही यह भी बता दिया कि वह तिहाड़ से किसी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के लिए तैयार नहीं है. हरियाणा की राजनीति अब एक नए रास्ते पर जा रही है. इस राजनीति ने कांग्रेस को हाशिए पर धकेल दिया है. सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल भी नहीं बन पाई.

राजनीति का यह नया स्वरूप इन प्रदेशों में ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी दिखेगा. भाजपा की ताकत इस नतीजे से बढ़ेगी. केवल इसलिए नहीं कि दो और राज्यों में उसकी सरकार बन गई. इसलिए भी कि उसे केंद्रीय योजनाओं को लागू कराने के लिए दो और सरकारें मिल गई. इससे राज्यसभा में भी उसकी संख्या बढ़ेगी. उप चुनावों में भाजपा की हार के बाद मोदी का प्रभाव खत्म होने की बात करने वालों का मुंह महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता ने फिलहाल बंद करा दिया है. नतीजे प्रमाण हैं कि लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मतदाता ने जो विास जाहिर किया था, वह अभी क्षीण नहीं हुआ है. बिना प्रादेशिक नेतृत्व और कमजोर संगठन के होने के बावजूद इन दोनों राज्यों में पार्टी को सत्ता में लाकर मोदी ने साबित किया है कि लोगों का उन पर भरोसा अभी कायम है.

 लेकिन इस नतीजे से कांग्रेस में बहुत से मुंह खुल जाएंगे. सोनिया गांधी पार्टी में बढ़ रहे असंतोष के पतीले पर जो ढक्कन लगाकर बैठी थीं, उसमें उबाल से ढक्कन अब खुल जाएगा. कांग्रेस को अपने भावी नेतृत्व के बारे में कोई फैसला करना ही पड़ेगा. फैसला गांधी परिवार को करना है. फैसले को टालने का विकल्प अब सोनिया गांधी के पास नहीं रह गया है. कांग्रेस मुख्यालय के बाहर ‘प्रियंका लाओ देश बचाओ’ के लगने वाले नारे में दरअसल किसी को हटाने की मांग भी छिपी है.  कांग्रेस के लिए बेहद विकट स्थिति बन गई है. वह भीतर के संघर्ष से उबरे तो बाहर के संघर्ष के बारे में सोचे.

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं)

गोपीनाथ मुंडे की बेटी प्रीतम मुंडे ने बनाया जीत का रेकॉर्ड

                                             






                                                 गोपीनाथ मुंडे की बेटी प्रीतम मुंडे  ने बनाया जीत का रेकॉर्ड
                                                       एजेंसियां  Oct 20, 2014 मुंबई

महाराष्ट्र में बीड सीट पर उपचुनाव में दिवंगत बीजेपी नेता गोपीनाथ मुंडे की बेटी प्रीतम मुंडे ने इतिहास रचते हुए अब तक सबसे अधिक 6.96 लाख मतों के अंतर चुनाव जीतने का रेकॉर्ड बनाया।
साल 2004 के चुनाव में सीपीएम के अनिल बसु ने 5.92 लाख मतों के अंतर से जीत दर्ज करके रेकॉर्ड बनाया था, जिसे अब प्रीतम मुंडे तोड़ने में कामयाब रहीं। इस साल के प्रारंभ में हुए लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने 5 लाख 70 हजार से अधिक मतों से गुजरात के वड़ोदरा सीट से जीत दर्ज की थी और वह बसु का रेकॉर्ड तोड़ने से करीब 22 हजार मतों से वंचित रह गए थे। अब उनकी ही पार्टी में प्रीतम मुंडे ने यह रेकॉर्ड तोड़ दिया।
        दिल्ली में एक सड़क दुर्घटना में केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे के निधन के कारण बीड़ सीट पर उपचुनाव कराना पड़ा, जिसका प्रतिनिधित्व मुंडे कर रहे थे। इस सीट पर 15 अक्टूबर को उपचुनाव कराया गया था। प्रीतम मुंडे ने इस सीट पर अपने निकटमत प्रतिद्वन्द्वी और कांग्रेस उम्मीदवार अशोकराव शंकरराव पाटिल को 6.96 लाख मतों से पराजित किया। प्रीतम को 9,22,416 वोट मिले वहीं पाटिल को 2,26,095 वोट मिले।

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

राष्ट्रभक्ति ले हदय में .....






राष्ट्रभक्ति ले हदय में .....
राष्ट्रभक्ति ले हृदय मे हो खडा यदि देश सारा
संकटो पर मात कर यह राष्ट्र विजयी हो हमारा ॥

क्या कभी किसने सुना है सूर्य छिपता तिमिर भय से
क्या कभी सरिता रुकी है बांध से बन पर्वतों से
जो न रुकते मार्ग चलते चीर कर सब संकटोंको
वर्ण करती कीर्ती उनको तोड कर सब असुर दल को
ध्येय-मन्दिर के पथिक को कन्टकों का ही सहारा ॥

हम न रुकने चले है सूर्य के यदि पुत्र है तो
हम न हटने को चले है सरित की यदि प्रेरणा को
चरण अंगद ने रखा है आ उसे कोइ हटाए
बहकता ज्वालामुखी यह आ उसे कोइ बुझाए
मृत्यु की पी कर सुधा हम चल पडेंगे ले दुधारा ॥

ज्ञान के विज्ञान के भी क्षेत्र मे हम बढ पडेंगे
नील नभ के रूप के नव अर्थ भी हम कर सकेंगे
भोग के वातावरण मे त्याग का संदेश देंगे
त्रास के घन बादलोंसे सौख्य की वर्षा करेंगे
स्वप्न यह साकार करने सन्घठित हो हिन्दु सारा ॥

गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

आयुर्वेदिक दोहे


आयुर्वेदिक दोहे
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१Ⓜ
दही मथें माखन मिले,
केसर संग मिलाय,
होठों पर लेपित करें,
रंग गुलाबी आय..
२Ⓜ
बहती यदि जो नाक हो,
बहुत बुरा हो हाल,
यूकेलिप्टिस तेल लें,
सूंघें डाल रुमाल..
३Ⓜ
अजवाइन को पीसिये ,
गाढ़ा लेप लगाय,
चर्म रोग सब दूर हो,
तन कंचन बन जाय..
४Ⓜ
अजवाइन को पीस लें ,
नीबू संग मिलाय,
फोड़ा-फुंसी दूर हों,
सभी बला टल जाय..
५Ⓜ
अजवाइन-गुड़ खाइए,
तभी बने कुछ काम,
पित्त रोग में लाभ हो,
पायेंगे आराम..
६Ⓜ
ठण्ड लगे जब आपको,
सर्दी से बेहाल,
नीबू मधु के साथ में,
अदरक पियें उबाल..
७Ⓜ
अदरक का रस लीजिए.
मधु लेवें समभाग,
नियमित सेवन जब करें,
सर्दी जाए भाग..
८Ⓜ
रोटी मक्के की भली,
खा लें यदि भरपूर,
बेहतर लीवर आपका,
टी० बी० भी हो दूर..
९Ⓜ
गाजर रस संग आँवला,
बीस औ चालिस ग्राम,
रक्तचाप हिरदय सही,
पायें सब आराम..
१०Ⓜ
शहद आंवला जूस हो,
मिश्री सब दस ग्राम,
बीस ग्राम घी साथ में,
यौवन स्थिर काम..
११Ⓜ
चिंतित होता क्यों भला,
देख बुढ़ापा रोय,
चौलाई पालक भली,
यौवन स्थिर होय..
१२Ⓜ
लाल टमाटर लीजिए,
खीरा सहित सनेह,
जूस करेला साथ हो,
दूर रहे मधुमेह..
१३Ⓜ
प्रातः संध्या पीजिए,
खाली पेट सनेह,
जामुन-गुठली पीसिये,
नहीं रहे मधुमेह..
१४Ⓜ
सात पत्र लें नीम के,
खाली पेट चबाय,
दूर करे मधुमेह को,
सब कुछ मन को भाय..
१५Ⓜ
सात फूल ले लीजिए,
सुन्दर सदाबहार,
दूर करे मधुमेह को,
जीवन में हो प्यार..
१६Ⓜ
तुलसीदल दस लीजिए,
उठकर प्रातःकाल,
सेहत सुधरे आपकी,
तन-मन मालामाल..
१७Ⓜ
थोड़ा सा गुड़ लीजिए,
दूर रहें सब रोग,
अधिक कभी मत खाइए,
चाहे मोहनभोग.
१८Ⓜ
अजवाइन और हींग लें,
लहसुन तेल पकाय,
मालिश जोड़ों की करें,
दर्द दूर हो जाय..
१९Ⓜ
ऐलोवेरा-आँवला,
करे खून में वृद्धि,
उदर व्याधियाँ दूर हों,
जीवन में हो सिद्धि..
२०Ⓜ
दस्त अगर आने लगें,
चिंतित दीखे माथ,
दालचीनि का पाउडर,
लें पानी के साथ..
२१Ⓜ
मुँह में बदबू हो अगर,
दालचीनि मुख डाल,
बने सुगन्धित मुख, महक,
दूर होय तत्काल..
२२Ⓜ
कंचन काया को कभी,
पित्त अगर दे कष्ट,
घृतकुमारि संग आँवला,
करे उसे भी नष्ट..
२३Ⓜ
बीस मिली रस आँवला,
पांच ग्राम मधु संग,
सुबह शाम में चाटिये,
बढ़े ज्योति सब दंग..
२४Ⓜ
बीस मिली रस आँवला,
हल्दी हो एक ग्राम,
सर्दी कफ तकलीफ में,
फ़ौरन हो आराम..
२५Ⓜ
नीबू बेसन जल शहद ,
मिश्रित लेप लगाय,
चेहरा सुन्दर तब बने,
बेहतर यही उपाय..
२६.Ⓜ
मधु का सेवन जो करे,
सुख पावेगा सोय,
कंठ सुरीला साथ में ,
वाणी मधुरिम होय.
२७.Ⓜ
पीता थोड़ी छाछ जो,
भोजन करके रोज,
नहीं जरूरत वैद्य की,
चेहरे पर हो ओज..
२८Ⓜ
ठण्ड अगर लग जाय जो
नहीं बने कुछ काम,
नियमित पी लें गुनगुना,
पानी दे आराम..
२९Ⓜ
कफ से पीड़ित हो अगर,
खाँसी बहुत सताय,
अजवाइन की भाप लें,
कफ तब बाहर आय..
३०Ⓜ
अजवाइन लें छाछ संग,
मात्रा पाँच गिराम,
कीट पेट के नष्ट हों,
जल्दी हो आराम..
३१Ⓜ
छाछ हींग सेंधा नमक, x
दूर करे सब रोग, जीरा
उसमें डालकर,
पियें सदा यह भोग..।
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शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

करवाचौथ के व्रत की विधि






                                                       क्या है करवाचौथ के व्रत की विधि

कार्तिक कृष्ण पक्ष की चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी अर्थात उस चतुर्थी की रात्रि को जिसमें चंद्रमा दिखाई देने वाला है, उस दिन प्रात: स्नान करके अपने सुहाग (पति) की आयु, आरोग्य, सौभाग्य का संकल्प लेकर दिनभर निराहार रहें। सौभाग्यवती (सुहागिन) स्त्रियां अपने पति की आयु, स्वास्थ्य व सौभाग्य की कामना करती हैं वे यह व्रत रखती हैं। सायंकाल चंद्रमा के उदित होने पर चंद्रमा का पूजन कर अ‌र्घ्य प्रदान करें।

पूजन
उस दिन भगवान शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चंद्रमा का पूजन करें। पूजन करने के लिए बालू अथवा सफेद मिट्टी की वेदी बनाकर उपरोक्त वर्णित सभी देवों को स्थापित करें।

नैवेद्य
शुद्ध घी में पूरी और हलुवा अथवा खांड मिलाकर मोदक (लड्डू) नैवेद्य हेतु बनाएं।

करवा
मिट्टी से तैयार किए गए मिट्टी के करवे अथवा तांबे के बने हुए करवे।

व्रत का विधि-विधान-
करवा चौथ के व्रत के दिन शाम को लकड़ी के पटिए पर लाल वस्त्र बिछाएं। इसके बाद पटिए पर भगवान शिव, माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेशजी की प्रतिमा स्थापित करें। वहीं एक लोटे पर श्रीफल रखकर उसे कलावे से बांधकर वरुण देवता की स्थापना करें। तत्पश्चात मिट्टी के करवे में गेहूं, शक्कर व नकद रुपया रखकर कलावा बाँधे।

इसके बाद धूप, दीप, अक्षत व पुष्प चढ़ाकर भगवान का पूजन करें। पूजन के समय करवे पर 13 बार टीका कर उसे सात बार पटिए के चारों ओर घुमाएं। हाथ में गेहूँ के 13 दाने लेकर करवा चौथ की कथा का श्रवण करें। पूजन के दौरान ही सुहाग का सारा सामान चूड़ी, बिछिया, सिंदूर, मेंहदी, महावर आदि करवा माता पर चढ़ाकर अपनी सास या ननद को दें। फिर र्चद को अ‌र्घ्य देकर अपने पति के हाथों से पानी और पहला निवाला खाकर व्रत खोलें।

करवा चौथ के व्रत की सही विधि-

1. सूर्योदय से पहले स्नान कर के व्रत रखने का संकल्प लें और सास द्धारा भेजी गई सरगी खाएं। सरगी में , मिठाई, फल, सेंवई, पूड़ी और साज-श्रंगार का समान दिया जाता है। सरगी में प्याज और लहसुन से बना भोजन न खाएं।

2. सरगी करने के बाद करवा चौथ का निर्जल व्रत शुरु हो जाता है। मां पार्वती, महादेव शिव व गणेश जी का ध्यान पूरे दिन अपने मन में करती रहें।

करवा चौथ व्रत के लिये जरुरी सामग्री-

3. दीवार पर गेरू से फलक बनाकर पिसे चावलों के घोल से करवा चित्रित करें। इस चित्रित करने की कला को करवा धरना कहा जाता है जो कि बड़ी पुरानी परंपरा है।

4. आठ पूरियों की अठावरी बनाएं। हलुआ बनाएं। पक्के पकवान बनाएं।

5. फिर पीली मिट्टी से मां गौरी और गणेश जी का स्वरूप बनाइये। मां गौरी की गोद में गणेश जी का स्वरूप बिठाइये। इन स्वरूपों की पूजा संध्याकाल के समय पूजा करने के काम आती है।

6. माता गौरी को लकड़ी के सिंहासन पर विराजें और उन्हें लाल रंग की चुनरी पहना कर अन्य सुहाग, सिंगार सामग्री अर्पित करें। फिर उनके सामने जल से भरा कलश रखें।

7. मिट्टी का टोंटीदार करवा लें। गेहूं और ढक्कन में शक्कर का बूरा भर दें। उसके ऊपर दक्षिणा रखें। रोली से करवे पर स्वास्तिक बनाएं।

8. गौरी गणेश के स्वरूपों की पूजा करें। इस मंत्र का जाप करें - ऊॅं नम: शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥

अधिकतर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही पूजा करती हैं।

9. रात्रि पूजा के समय छननी के प्रयोग से चंद्र दर्शन करें और चन्द्रमा को अ‌र्घ्य प्रदान करें। फिर पति के पैरों को छूते हुए उनका आर्शीवाद लें। फिर पति देव को प्रसाद दे कर उनके हाथ से जल ग्रहण करें।

बुधवार, 8 अक्तूबर 2014

समाज चेतना के जागरण का समय : विजयादशमी उद्बोधन





समाज चेतना के जागरण का समय 

 

04 Oct 2014
समय के पंचांग में समाज अपने संस्कार इंगित करता है। सिर्फ ग्रह नक्षत्रों की नहीं खुद अपनी चाल के अनुसार इंगित करता है। विजयादशमी पर शक्ति का अर्चन और दुर्गुणों के पुतलों का दहन इस समाज की उस सोच का संकेतक है, जिसने सही को स्वीकारने में पूरी उदारता बरती और गलत को खारिज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। समाज जागरण का, हर भारतीय के पुरुषार्थ को जगाने का रोमांचकारी आह्वान सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत के विजयादशमी उद्बोधन का सारतत्व है। सबका भला, सबको साथ लेकर चलने का विशुद्ध हिन्दूभाव इस उद्बोधन की धुरी है।
यह सिर्फ स्वयंसेवकों से कही गई बात नहीं, बल्कि देश-दुनिया में बह रही परिवर्तनकारी हवाओं में लहराता समय का आह्वान है।
वैसे, समय क्या है? घटनाओं की अजस्र धारा या इससे भी परे कुछ ? क्या यह पूरी सृष्टि ही समय के धागों से नहीं बुनी गई ? सही समय पर डोर हिली, सही कदम बढ़ा तो बढ़त, अन्यथा एक गलत धागा उधड़ा और बुनावट में कुछ घट गया। कम हो गया। बढ़त का अच्छा-भला मौका गंवा दिया।
नीतिशतक में कहा गया है-
'का हानि: समयच्युति:।'
यानी, हानि क्या है? सिर्फ मौके पर चूक जाना?
समयानुकूल या कालसंगत शब्द संभवत: इसीलिए बने हैं। सृष्टि का, समय का अपना एक भाव है। किसी का अनिष्ट किए-सोचे बगैर सदा आगे बढ़ने का भाव। जो इससे कदमताल नहीं करता, उलट चलता है, समय उसे पलटकर फेंक देता है। वह व्यक्ति या सोच कालबाह्य हो जाती है। परंतु व्यक्ति इसके अनुरूप चले तो कालजयी उपलब्धियां प्राप्त कर सकता है। समय बीत जाए परन्तु बात बनी रहे, यह काम पुरुषार्थी व्यक्ति कर सकता है।
इस भूमि का भारतीय दर्शन कहें या पुरखों का संचित हिन्दू दर्शन, समय और सृष्टि के साथ ताल मिलाकर चलने का हुनर ही हमारी थाती है।
पुरुषार्थ के बिना अपने यहां मुक्ति की कल्पना ही नहीं है।
विजयादशमी उद्बोधन से इतर, हाल में हुए राजनीतिक परिवर्तन को भी देखें तो केंद्र सरकार के कर्म और आह्वान में भी समाज जागरण की ऐसी ही सकारात्मक सोच झलकती है।
भारतीय प्रधानमंत्री की वैश्विक प्रभाव डालने वाली अमरीका यात्रा अथवा महात्मा गांधी की जयंती पर स्वच्छता अभियान की अलख, यह व्यक्ति की दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रकटीकरण नहीं तो और क्या है ? ठान लो तो क्या नहीं हो सकता?

विजयादशमी के अवसर पर नागपुर से निकली बात इस राष्ट्र को ही नहीं मानवमात्र को झकझोरने वाली बात है। मजहबी उन्माद और मुनाफे के लिए दुनिया को तबाह करते दानवों की चुनौतियां पूरी दुनिया के लिए हैं। बुराइयों से युद्ध के लिए विश्व को जागना होगा। पुरुषार्थ दिखाने के लिए एकजुट होना होगा। परिवर्तन के संकल्प का यह क्षण सिर्फ पंचांग की तिथि से नहीं बंधा, इससे सबका भविष्य बंधा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : परम पूज्य डा0 हेडगेवार जी


सारा समाज उस रंग को देख सिर झुकाता है
04 Oct 2014  
प्रशांत बाजपेई

यह जरूरी नहीं कि जिस क्षण इतिहास रचा जा रहा हो, उस क्षण उसकी महत्ता को भी समझा जाए। ऐतिहासिक विजय की ओर बढ़ती किसी क्रिकेट टीम, युद्घ के मैदान में निर्णायक बढ़त लेती सेना की किसी टुकड़ी, या तख्त की ओर प्रथम बार बढ़ते किसी बादशाह को यह अहसास होता होगा कि कोई तारीख बनने जा रही है, परंतु संघ की प्रथम शाखा में आए सामान्य पृष्ठभूमि के चंद किशोरों को इस बात की तनिक भी अनुभूति नही थी कि वह किसी नवयुग के प्रारंभ के साक्षी बने हुए हैं। संघ का जन्म एक गुमनाम घटना थी। वैसे भी सृजन अंधेरे से ही प्रारंभ होता है। बीज धरती के अंधकार में अंकुरित होता है। जीव माँ के गर्भ में विकसित होता है। संघ भी इसी प्रकार विकसित होता रहा। संघ को समझने के लिए संघ प्रवर्तक के जीवन पर दृष्टिपात करना उपयुक्त होगा। वैसे संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के कार्य की विलक्षणता को सही अर्थों मे वही समझ सकता है, जिसे सार्वजनिक जीवन में काम का कुछ अनुभव हो। आज भी विस्मय होता है, कि किशोरावस्था से ही स्वतंत्रता संग्राम में तपता आ रहा व्यक्ति, जिसने क्रांतिकारी जीवन, तत्कालीन कांग्रेस और सार्वजनिक जीवन के अनेक मंचों पर कार्य करने का अनुभव लिया हो, जब जीवन के 36 वसंत देखने के बाद राष्ट्र के नवनिर्माण का यज्ञ प्रारंभ करता है, तो अनगढ़, अनुभवहीन किशोरों पर विश्वास करता है। बाल्यकाल से अत्यंत उग्र देशभक्त केशव ने छत्तीस वर्ष की आयु में राष्ट्रीय चरित्र से संपन्न सामर्थ्यशाली युवकों को तैयार करने का जो काम हाथ में लिया था, उसमें एक माँ जैसे हृदय और वृद्घ पिता जैसी परिपक्वता की आवश्यकता थी, साथ ही एक चिरयुवा मन आवश्यक था। आने वाले समय में संघ के स्वयंसेवकों के कतृर्त्व ने यह सिद्घ किया कि डॉ़ हेडगेवार के पास ये सारे गुण थे। स्वामी विवेकानंद के बारे में कहा गया है, कि जब वे एक सामान्य संन्यासी की तरह भारत भ्रमण कर रहे थे, तब भी इस अनुभवहीन युवा यति की प्रतिभा का छिपना कठिन था जैसे भभूति लपेटे महादेव का तेज छिप नहीं सकता वैसे ही गुमनाम, साधनहीन परंतु अनुुशासनबद्घ राष्ट्रभक्त दीवानों का यह संगठन सभी प्रकार के प्रचार से दूर रहकर भी जनमानस में स्थान बनाता गया, और भारत सफलता के छोटे बड़े कदम रखता गया। लेकिन यह सफलता यूँ ही नहीं आई थी। ''प्रत्येक दिन कम से कम एक घंटा देश के लिए दो'' इस आह्वान के साथ डॉ़ हेडगेवार ने जो कार्यपद्घति सामने रखी वह रामबाण साबित हुई। स्नेह के रेशों से मिलकर बने ध्येय के धागे पर संघ को गूंथा गया था। ऐसा न होता, तो राष्ट्र के लिए जीवन खपा देने वाले अनगिनत अनाम युवाओं की श्रंृखला न खड़ी होती।
डॉ़ हेडगेवार ने सामूहिक नेतृत्व, सामूहिक उत्तरदायित्व और सर्वसम्मति की कार्यशैली को व्यावहारिक रूप प्रदान किया। संघ का प्रत्येक सदस्य स्वयंसेवक होता है। औपचारिक व्यवस्थाएँ संगठन को सुचारु रूप से चलाने मात्र तक सीमित होती हैं, जबकि संघ की वास्तविक शक्ति अनौपचारिक व्यवहार में केंद्रित है। इसलिए यहाँ 'पद' नहीं 'दायित्व' होते हैं। संघ को बाहर से देखने वालों के लिए सबसे अबूझ पहेली यही है कि यहाँ शक्ति का केंद्र अपरिभाषित या अदृश्य रहता है। इन बातों को सरल रूप में समझने के लिए डॉ़ हेडगेवार द्वारा 1933 में की गई घोषणाओं को देखना चाहिए -
- इस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्मदाता अथवा संस्थापक मैं न होकर आप सब हैं - यह मैं भलीभांति जानता हूँ।
- आपके द्वारा स्थापित संघ का, आपकी इच्छा के अनुसार, मैं एक धाय का कार्य कर रहा हूँ।
- मैं यह काम आपकी इच्छा एवं आज्ञा के अनुसार आगे भी करता रहूँगा तथा ऐसा करते समय किसी भी प्रकार के संकट अथवा मान-अपमान की मैं कतई चिंता नहीं करूंगा।
- आपको जब भी प्रतीत हो कि मेरी अयोग्यता के कारण संघ की क्षति हो रही है तो आप मेरे स्थान पर दूसरे योग्य व्यक्ति को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वतंत्र हैं।
- आपकी इच्छा एवं आज्ञा से जितनी सहर्षता के साथ मैंने इस पद पर कार्य किया है, इतने ही आनंद से आपके द्वारा चुने हुए नए सरसंघचालक के हाथ सभी अधिकार सूत्र समर्पित करके उसी क्षण से उसके विश्वस्त स्वयंसेवक के रूप में कार्य करता रहूँगा।
- मेरे लिए अपने व्यक्तिगत के मायने नहीं हैं, संघ कार्य का ही वास्तविक अर्थ में महत्व है। अत: संघ के हित में कोई भी कार्य करने में मैं पीछे नहीं हटूँगा।
- संघ की आज्ञा का पालन स्वयंसेवकों द्वारा बिना किसी अगर-मगर के होना अनुशासन एवं कार्य प्रगति के लिए आवश्यक है। 'नाक से भारी नथ' इस स्थिति को संघ कभी उत्पन्न नहीं होने देगा। यही संघकार्य का रहस्य है।
- अत: प्रत्येक स्वयंसेवक स्वेच्छा से आज्ञा पालन करके दूसरे स्वयंसेवकों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करे, यह स्वयंसेवक का कर्तव्य है।
इन घोषणाओं में डॉ़ हेडगेवार ने जो कुछ कहा उनका अक्षरश: पालन किया। साथ ही अपने जीवन और अपनी देह को संगठन के कार्य में खपा दिया।
संगठन संघ की देह है, परंतु आत्मा हिंदुत्व है। संघ का जब जन्म हुआ, तब देश के वातावरण में खिलाफत आंदोलन के मजहबी उन्माद का जहर घुल चुका था। मुस्लिम लीग अंगेजों और कांगे्रस के साथ निर्लज्ज मोलभाव कर रही थी, और दोनों ही लीग को रिझाने में लगे थे। हिंदुत्व के प्रखर ध्वजवाहक स्वामी श्रद्घानंद की हत्या हो चुकी थी, और गाँधी जैसे विशाल कद के नेता इस हत्याकांड की निंदा तक करने में असमर्थ हो रहे थे। हिंदू नाम-हिंदू पहचान को लेकर तत्कालीन नेतृत्व में जिस प्रकार की उपेक्षा, नैराश्य और समझौतावादी रुख था, उसके कारण हिंदू संगठन की बात करने पर भी विरोध होने लगता था। ऐसे समय डॉ़ हेडगेवार ने निर्भयतापूर्वक कहा कि ''भारत हिंदू राष्ट्र है''। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह किसी संप्रदाय विशेष की आक्रामकता की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि सर्वसमावेशी व उदार प्राचीन हिंदू विचार की अभिव्यक्ति है। हिंदुत्व के इसी आधार ने संघ के स्वयंसेवकों को नयी परिस्थितियों व समय के हिसाब से ढलने का लचीलापन दिया है। बुद्घि को विस्तार और हृदय की विशालता दी है, जिसकी कार्यरूप में परिणति ने मानव क्षमता के नये आयाम और मापदंड खड़े किए हैं।

निरंतर चल रहा हवन

संघ के उद्भव को दो दशक ही बीते थे, कि स्वतंत्रता के साथ देश के विभाजन की विपदा भी आई। मारकाट मची। पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में फँसे लाखों हिंदू परिवारों के प्राण और सम्मान संकट में पड़ गए। तब संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी सारी शक्ति लगाकर लाखों प्राणों की रक्षा की। बचाए गए लोगों में अनेक मुस्लिम परिवार भी शामिल थे। वषोंर् तक पुनर्वास के कार्य भी चलते रहे। स्वतंत्रता के बाद सत्ता में आई सरकार के कुछ लोगों ने संघ को अपना शत्रु मानकर दमनचक्र चलाया, परंतु गाँधी हत्या के झूठे आरोप से लेकर आपातकाल में लगाए प्रतिबंध तक, संघ सदा निदार्ेष निकलकर सामने आया एवं और भी प्रखर होकर उभरा। 1947 में कश्मीर पर हुआ कबायली हमला हो या चीन का आक्रमण या 1965 अथवा 1971 का भारत पाक युद्घ, संघ के स्वयंसेवक सेना के जवानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। स्वयंसेवकों के इस राष्ट्रीय चरित्र को देख विरोधी भी समय-समय पर संघ के मुरीद होते रहे। यही कारण था कि जो पं़ नेहरू कहते थे कि संघ के लोगों को उनका झंडा लगाने के लिए एक इंच जमीन नही देंगे, उन्हीं पं़ नेहरू ने संघ के स्वयंसेवकों को 1962 की गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने को आमंत्रित किया था। जब कभी कोई प्राकृतिक आपदा हो, दुर्घटना हो या मानव निर्मित त्रासदी, हो संघ का स्वयंसेवक बिन बुलाए पहुँच जाता है, चुपचाप राहत कार्य करता है और लौट जाता है।
1972-73 में महाराष्ट्र के साढ़े चार हजार गाँव अकाल की चपेट में आए। स्वयंसेवकों ने 'महाराष्ट्र दुष्काल विमोचन समिति' बनाकर साढ़े चार लाख लोगों को काल के मुँह से बचाया। 1964 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में दंगों से त्रस्त होकर 36,000 नर नारियों का पुनर्वास किया। 1966 के बिहार के अकाल में 700 गाँवों में हजारों कुंतल अनाज का वितरण किया। नवंबर 1977 में आंध्र के तटवर्ती इलाके में भयंकर चक्रवात आया। 20 हजार लोग मारे गए। अगले दिन सुबह होते होते संघ के स्वयंसेवक वहाँ पहुँच गए। मनुष्यों व पशुओं के सड़ रहे शवों के बीच, जहाँ सरकारी तंत्र के हाथ पैर और मस्तिष्क सुन्न हो रहे थे, वहाँ स्वयंसेवकों ने अपनी मेहनत से नवजीवन की आशा का संचार किया। स्वयंसेवकों के इस कार्य को देख वयोवृद्घ सवार्ेदय नेता श्री प्रभाकर राव बोल पड़े कि 'आऱएस़एस को नया नाम दिया जाना चाहिए-रेडी फॉर सेल्फलेस सर्विस: नि:स्वार्थ सेवा के लिए तत्पर' ऐसे न जाने कितने प्रसंग आए। गत वर्ष उत्तराखंड में हुई विनाशलीला हो या इसी सितंबर माह में जम्मू-कश्मीर में आई विनाशकारी बाढ़, स्वयंसेवकों ने सेवा का मोर्चा संभाला हुआ है। ये अलग बात है, कि ये बातें मीडिया की सुर्खियों में जगह नहीं बनातीं।
केरल में पाकिस्तान की शह पर मोपलिस्तान बनाने का षड्यंत्र हो, या कश्मीर अथवा पंजाब में चलाया गया अलगाववाद का षड्यंत्र, स्वयंसेवकों ने संगीनों के आगे अपनी छाती अड़ाई है। निज़ाम के भारत विरोधी षड्यंत्रों से सामना हो, या गोवा की मुक्ति का संघर्ष हो, स्वयंसेवकों ने प्राण न्योछावर किए हैं। सामाजिक समरसता का वातावरण बनाने की दिशा में संघ निरंतर कार्य कर रहा है। छुआछूत और जातिगत भेदभाव दूर करने के संघ के प्रयासों की प्रशंसा स्वयं डॉ़ अंबेडकर और महात्मा गाँधी कर चुके हैं। आज भी संघ के कार्यकर्ता गाँव-गाँव संदेश दे रहे हैं, कि हमारा कुआं, मंदिर और श्मशान एक होना चाहिए।' आज संघ के स्वयंसेवक देश में 1,38,667 सेवा के प्रकल्प चला रहे हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्राम विकास, पर्यावरण रक्षा, वंचित वर्ग का सशक्तिकरण, स्वावलंबी समाज का निर्माण कोई क्षेत्र स्वयंसेवकों के पराक्रम से अछूता नहीं है। नित्यशाखा के माध्यम से अपनी संस्कृति का गौरव जाग्रत करके, संस्कार देकर सामान्य देशवासियों से असामान्य कार्य करवाया जा सकता है, यह संघ ने प्रत्यक्ष प्रमाणित किया है। सन्यासी का भगवा वस्त्र उसके त्याग का प्रतीक होता है, सारा समाज उस रंग को देख सिर झुकाता है। संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी ने स्वयं संन्यास लेने के पश्चात् भी सामाजिक क्षेत्र में काम करने का उद्देश्य लेकर भगवा वस्त्र धारण नहीं किए।
संघ के संस्थापक डॉ़ हेडगेवार को स्वामी सत्यमित्रानंद जी 'श्वेत वस्त्र युक्त संन्यासी' कहते आए हैं। इसी गंगोत्री से देश के लिए सबकुछ करके अनाम बने रहने की परंपरा प्रारंभ हुई है। इसीलिए संघ का अपने स्वयंसेवकों को संदेश है, कि संघ को समाज में अलग संगठन खड़ा नहीं करना है, बल्कि समाज का संगठन करना है। देश के लिए सब कुछ करना है, और श्रेय समाज के खाते में डालना है। 

शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

संबोधन विजयादशमी उत्सव : प.पू. सरसंघचालक डॉ. श्री मोहनराव भागवत






विजयादशमी उत्सव 2014 : सरसंघचालक जी का उद्बोधन
प.पू. सरसंघचालक डॉ. श्री मोहनराव भागवत के श्री विजयादशमी उत्सव 2014
(शुक्रवार दिनांक3अक्तुबर2014)के अवसर पर दिये गये उद्बोधन का सारांश-
http://www.rss.org/Encyc/2014

एक वर्ष के पश्‍चात् फिरसे हम सब विजयादशमी के पुण्यपर्व पर यहॉं एकत्रित हैं,परंतु इस वर्ष का वातावरण भिन्न है यह अनुभव हम सभी को होता है। भारतीय वैज्ञानिकों के द्वारा पहिले ही प्रयास में मंगल की कक्षा में यान का सफल प्रवेश करा कर हमारे संबंध में विश्‍व में गौरव तथा भारतीयों के मन में आत्मविश्‍वास की वृद्धि में चार चॉंद जोड़ दिये है। मंगल अभियान में जुड़े वैज्ञानिकों का तथा अन्य सभी कार्यकर्ताओं का हम स्रदय से शतशत अभिनंदन करते हैं। वैसे ही दक्षिण कोरिया में चल रहे आशियद खेलों में पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ानेवाले सभी खिलाडियों का भी हम अभिनन्दन करते है। यह वर्ष राजराजेंद्र चोल की दिग्विजयी जीवनगाथा का सहस्राब्दी वर्ष है। इस वर्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा एकात्म मानव दर्शन के आविर्भाव का50वॉं वर्ष भी हैं। भारत वर्ष का सामान्य समाज विश्‍व के तथाकथित प्रगत राष्ट्रों की,सुखसुविधासंपन्न व शिक्षित जनता से बढ़चढ़कर न कहे तो भी बराबरी में,अत्यंत परिपक्व बुद्धि से,देश के भविष्यनिर्माण में अपने प्रजातांत्रिक कर्तव्यों का निर्वाह करता है, इस साक्षात्कार के कारण विश्‍व के देशों में भारतीय प्रजा के संबंध में प्रकट अथवा अप्रकट गौरव की वृद्धि व हम सब भारतीयों के मन में धैर्य, उत्साह और आत्मविश्‍वास की वृद्धि दिखाई दे रही है। देश के बाहर बसे भारतीय मूल के निवासी भारत के प्रति जो उत्साह और संकल्प का प्रदर्शन कर रहे है, वह भी भविष्य के गौरवशाली व वैभवशाली भारत के लिये एक शुभसंकेत देता है।

परंतु हम सब को यह भी समझना और समझकर चलना होगा कि जगत में सुख,शांति व सामंजस्य के आधारपर चलनेवाली नई व्यवस्था का स्वयं उदाहरण बनकर चलनेवाला विश्‍वगुरू भारतवर्ष बनाने के अभियान का यह मात्र एक छोटासा पदक्षेप है। अभी बहुत कुछ करना,गन्तव्य की दिशा में सतत व लंबा मार्गक्रमण शेष है। दुनिया व देश की परिस्थिति को गौर से देखेंगे तो यह बात किसी के भी ध्यान में आ सकती है।

सृष्टि में व्याप्त स्वाभाविक विविधता को प्रेम व सम्मान के साथ स्वीकार करना,प्रति के साथ व परस्पर व्यवहार में समन्वय,सहयोग तथा परस्पर सह संवेदना व संवाद के आधारपर चलना तथा विचारों,मतों व आचरण में एकांतिक कट्टरपन व हिंसा को छोड़कर अहिंसा व वैधानिक मध्यममार्ग का पालन करना,इसी से संपूर्ण विश्‍व की मानवता को सुखशांतिपूर्ण सुंदर जीवन का लाभ होगा; इस सत्य का बौद्धिक प्रबोधन तो विश्‍व के ज्ञात इतिहास के प्रारंभ काल से होता आ रहा है; पर्याप्त मात्रा में हुआ है। सब बुद्धि से इसको जानते है। परंतु नित्य भाषणों, प्रवचनों, उपदेशों में सुनाई देने वाले उदात्त,उन्नत व सुखहितकारक तत्वों के मंडन के पीछे सुसंगत आचरण नहीं है। परस्पर व्यवहार में व्यक्तियों से लेकर तो राष्ट्रों तक के आचरण में व नीतियों में दंभ,अहंकार,स्वार्थ,कट्टर संकुचितता आदि का ही वर्चस्व दिखाई देता है।इसी के चलते हम यह देख रहे है कि आधुनिक मानवजाति जानकारी, शास्त्रज्ञान, तंत्रज्ञान व सुखसुविधाओं में पहले से कहीं अधिक प्रगत होने के बाद भी, विश्‍व के जीवन में से दु:ख, कष्ट, शोक आदि का संपूर्ण निवारण करने के सब प्रकार के प्रयोग गत दो हजार वर्षों में कर लेने के बाद में भी वहीं समस्याएँ बार-बार खड़ी हो रही है तथा मनुष्य की इस तथाकथित प्रगति ने कुछ नई दुर्ल्लंध्य समस्याएँ और खड़ी कर दी हैं।

इसलिये हम देख रहे है कि पर्यावरण विषय की चर्चा जगत में सर्वत्र गत कई दशकों से चल रही है,फिर भी प्रत्येक बीतता दिन पर्यावरण के क्षरण को और एक कदम निकट लाता हुआ सिद्ध हो रहा है। विश्‍व में पर्यावरण क्षरण के कारण नित नई व विचित्र प्रातिक आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है, फिर भी प्रचलित विकासपथ के पुनर्विचार में राष्ट्रों की व बड़े-बड़े बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नीतियों में शब्दों के परिवर्तन व ऊपरी मलमपट्टीयों के अतिरिक्त चिंतन में कोई मूलभूत परिवर्तन दिखाई देता नहीं। सारी करनी के पीछे वहीं पुरानी, एकांतिक जड़वादी, उपभोगाधारित व स्वार्थप्रेरित विचारधारा प्रच्छन्न या प्रकट रूप से काम करती हुई दिखती है।

इन्हीं एकांतिक सामूहिक स्वार्थों के कारण शोषण, दमन, हिंसा व कट्टरता का जन्म होता है। ऐसे ही स्वार्थों के चलते मध्यपूर्व में पश्‍चिमी देशों के जो क्रियाकलाप चले उसमें से कट्टरतावाद का नया अवतार इसिस (ISIS) के रूप में सारी दुनिया को आतंकित कर रहा है। विश्‍व के सभी देश तथा अनेक पंथ-संप्रदायों के समूह इस संकट के विरोध में एक सामूहिक शक्ति खड़ी करने की मन:स्थिति में है और वैसा करेंगे भी,परंतु बार-बार रूप बदलकर आने वाला यह आतंकवाद जिन एकांतिक प्रवृत्तियों व भोगलालसी स्वार्थों की क्रिया-प्रतिक्रिया के चक्र में से जन्मा है उस चक्र की गति को मूल से खंडित कर समाप्त किये बिना विश्‍व में सदियों से चलती आयी हुई आतंकवाद की संकट परंपरा जड़मूल से समाप्त नहीं होगी।

ऐसा करना चाहनेवालों को स्वयं के अंदर से स्वार्थ,भय,निपट भौतिक जड़वादिता को संपूर्ण समाप्त कर एक साथ सबके सुख का विचार करने वाली एकात्म व समग्र दृष्टि अपनानी पड़ेगी। जागतिकीकरण के नाम पर केवल अपने समूह के आर्थिक स्वार्थों को सरसाना चाहने वाले, परस्पर शांति प्रस्थापना की भाषा की आड़ में अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहने वाले अथवा नि:शस्त्रीकरण के नाम पर दूसरे देशों को स्वयं की अपेक्षा सदैव बलहीन बनाकर रखने की चेष्टा करने वाले, सुखी-सुंदर दुनिया के स्वप्न को न कभी साकार करना चाहेंगे और न करेंगे।

विश्‍व के गत हजार वर्षों के इतिहास में सत्य व अहिंसा के आधारपर इस दिशा में किये गये प्रामाणिक प्रयासों का उदाहरण केवल भारतवर्ष का है। अत्यंत प्राचीन काल से इस क्षण तक हिमालय और उसकी दोनों ओर की जुड़ी हुई पर्वत शृखंलाओं से सागर पर्यन्त विस्तार के अंदर जो सनातन अक्षुण्ण राष्ट्रीय विचार प्रवाह चल रहा है तथा जिसे आज हिन्दुत्व के नाम से जाना जाता है; उसकी यह विशेषता है कि भाषा, भू प्रदेश,पंथ-संप्रदाय,जाति-उपजाति, खान-पान, रीति-रिवाज आदि की सब स्वाभाविक विविधताओं को वह सम्मानपूर्वक स्वीकार करता है तथा साथ जोड़कर संपूर्ण विश्‍व के कल्याण में चलाता है। यहॉं जीवन के सत्य के बारे में अन्वेषण,अनुभव तथा निष्कर्ष की संपूर्ण स्वतंत्रता है। न किसी की भिन्न श्रद्धा को लेकर विवाद खड़े किये जाते है,न मूर्तिभंजक अभियान चलते है,न किसी पोथीबंद व्यवस्था के आधारपर श्रद्धा की व श्रद्धास्पदता की वैधता का निर्णय करने का प्रचलन इस परंपरा में है। बौद्धिक स्तर पर मतचर्चा का मुक्त शास्त्रार्थ चलते हुए भी व्यावहारिक स्तर पर श्रद्धा की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए समन्वय व सामंजस्य से एक समाज के नाते चलना यह हिंदु संस्ति का परिचायक लक्षण है। प्राचीन काल से ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की आत्मीय दृष्टि को लेकर यहॉं से ॠषि, मुनि, भिक्खु, श्रमण,संत, विद्वान शास्त्रज्ञ मैक्सिको से लेकर साइबेरिया तक फैले जगत के भूभाग में गये। बिना किसी साम्राज्य को विजित किये,बिना कहीं की किसी भिन्न जीवन पद्धति को,पूजा पद्धति को,राष्ट्रीय अथवा सांस्तिक पहचान को नष्ट किये,प्रेम से उन्होंने वहॉं आत्मीयता के सूत्र को,सुमंगल और सृष्टि कल्याण की भावना को प्रतिष्ठित किया। वहॉं के जीवन को अधिक उन्नत,ज्ञानवान,संपन्न किया। आधुनिक काल में भी हमारे जगतवन्द्य विभूतियों से लेकर तो सामान्य आप्रवासी भारतीयों का यही व्यवहार रहा है,यही कीर्ति है। दुनियाभर के चिन्तकों को,समाजों को इसीलिये भारत के भविष्य में अपने लिये और जगत् के लिये एक सुखद आशा का दर्शन होता है।

‘‘मैंने सीने का लहु पिलाकर
पाले हैं दुनिया के क्षुधित लाल
भूभाग नहीं
शत शत मानव के स्रदय जीतने का निश्‍चय।’’

यही अनुभव दुनिया को हमसे मिला हैं। इसलिये हमसे दुनिया की अपेक्षाएँ भी हैं। एक राष्ट्र के नाते सृष्टि में भारत के सनातन अस्तित्व का यही प्रयोजन हमारे प्राचीन ॠषि-मुनियों ने भी बताया है।

एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्व मानवा:॥

इसलिये आज विजयादशमी के इस पुण्य पर्व पर हमारे सामने विजय का यह नया क्षितिज स्पष्ट है। संपूर्ण विश्‍व को पथप्रदर्शक भारत का जीवन खड़ा करना। देश-काल-परिस्थिति-सुसंगत भारत का ऐसा नया निर्माण जो संपूर्ण विश्‍व के प्रति समग्र एकात्म-भेदरहित,स्वार्थ रहित,दृष्टि रखते हुए सर्वसमर्थ व सर्वांग सुंदर संपन्न बनकर खड़ा हो। सृष्टि की सारी विविधताओं को स्वीकार करते हुए समन्वय से चलाने में उदाहरणस्वरूप बने। संपन्नता जहॉं सुनीति सहित अवतरित हो,करूणा,सेवा व परोपकार निर्भयता सहित जहॉं अजेय सामर्थ्य का अंग बने, जिसका विकास पथ सर्वत्र मंगल सृष्टि करने वाला हो ऐसे भारत का निर्माण हमें करना है। जिस भारत के सुपुत्रों के नाते विश्‍वभर के देशों में जा कर बसे भारतीय मूल के लोग उन उन देशों की जनता के सम्मुख भद्रता,चारित्र्य तथा वैश्‍विकता का उदाहरण प्रस्थापित करते हो,जिस सामर्थ्यसंपन्न भारत के अस्तित्व मात्र से विश्‍व में सर्वत्र भारतभूमि,पूर्वज तथा संस्ति से नाता रखने वाले लोग अपने आप को निर्भय व सुरक्षित मानकर जी सके ऐसे भारत का निर्माण हमें करना है।

अभी कुछ दिन पूर्व ही ऐसी ही कुछ आकांक्षाओं को व अपेक्षाओं को मन में धारण करते हुए समाज ने देश के सत्ता तंत्र में एक बड़ा परिवर्तन लाया है। अभी इस परिवर्तन को6महिने भी पूरे नहीं हुए। परंतु ऐसे संकेत यदा-कदा प्राप्त होते रहते हैं,जिससे लगता है कि विश्‍व में भारत के उत्थान की तथा भारत की जनता के संपूर्ण सुरक्षित,सर्वांगीण उन्नत जीवन की आकांक्षा का प्रतिबिंब शासन-प्रशासन की नीतियों में खिलने लगेगा। इस अत्यंत अल्प कालखंड में भी केंद्र सरकार द्वारा आर्थिक,सुरक्षा,वैश्‍विक संबंधों एवं अन्यान्य क्षेत्रों में देशहित में जो कतिपय नीतिगत पहल की गई है,उससे आशा तो जगी हैं। इसी दिशा में आने वाले दिनों में उचित पथ पर देश की नीति सुनिश्‍चित और सुव्यवस्थित होकर आगे बढ़े यह इस सरकार को करना होगा। आशा और विश्‍वास के साथ हमें अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

पिछले दिनों देश के विभिन्न भागों विशेषकर जम्मू-कश्मीर में आयी बाढ़ से जन-धन की अपार क्षति हुई है। इस त्रासदी में काल कवलित हुए सभी लोगों की शांति व सद्गति के लिये प्रभुचरणों में प्रार्थना और उनके परिवारजनों के प्रति हार्दिक संवेदना है। जम्मू-कश्मीर में आयी इस अकल्पनीय त्रासदी के निवारण के लिये केन्द्र सरकार ने जिस तत्परता एवं उदार मन से सब प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई है,वह प्रशंसनीय है। हमेशा की भांति,अन्यान्य सामाजिक संस्थाओं के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं सेवाभारती के कार्यकर्ताओं ने भी तुरंत राहत कार्य प्रारंभ कर दिया और आगे भी आवश्यक कार्य की योजना बनाई है। ऐसे संकट के समय सब प्रकार के भेदों से ऊपर उठकर सहायता के लिये तत्पर हो जाना ही भारतीय समाज की समान सामाजिक संवेदना एवं राष्ट्रीय एकता का परिचय देती है।

परंतु देश की परिस्थिति व जमीन का वास्तव बहुत गंभीर है व जटिल है। केवल सत्ता व राजनीति के भरोसे देश के भविष्य को छोड़ देने से काम नहीं चलेगा। विश्‍व में प्रचलित सभी नीतिपथ खण्डित व अधूरी दृष्टि पर आधारित हैं। अपने देश के तंत्र व नीति पर भी स्वतंत्रता के बाद आज तक उसी का प्रभाव रहा है। एक राष्ट्र के नाते खड़े होने के लिये समाज में आवश्यक प्रामाणिकता का, समरस आत्मीयता का, उद्यमिता, ध्येयवादिता, संस्कारप्रवणता आदि सद्गुणों का सदियों से क्षरण होता आ रहा,वह अभी भी रूका नहीं है। अपने संकुचित स्वार्थ के लिये इन कमियों को कुरेदकर,बढ़ाकर,भेद के झगड़ों की आग पर अपनी रोटियॉं सेंकने का खेल करने वाली देशी व विदेशी शक्तियॉं अभी भी विद्यमान है। अपना खेल खेलने का प्रयास कर रही है। इसलिये देश का तंत्र चलाने वाले सबको सजग व सक्षम रहना ही पड़ेगा। प्रचलित विकास पथ की अच्छी बातों को अपनाते हुए नये कालसुसंगत पथ का निर्माण करना पड़ेगा। एकात्म व समग्र दृष्टि के अभाव से प्रचलित विकास पथ में आयी त्रुटिपूर्ण बातों का परित्याग करते हुए अपनी दृष्टि के आधार पर नये पर्याय खड़े करने पडेंगे। स्वामी विवेकानंद, योगी अरविंद, स्वामी रामतीर्थ, रविंद्रनाथ ठाकूर, लोकमान्य तिलक से लेकर तो महात्मा गांधी,सुभाषचंद्र बोस,स्वातंत्र्यवीर सावरकर,डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर,पू. विनोबा भावे,संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी उपाख्य श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर,श्री राममनोहर लोहिया, श्री जयप्रकाश नारायण,पं. दीनदयाल उपाध्याय आदि महापुरुषों ने स्वानुभव के आधार पर इस देश की शिक्षा, संस्कार, अर्थनीति, समाजनीति, सुरक्षानीति आदि के बारे में जो गहन, समग्र, मूलगामी व व्यावहारिक चिंतन किया है; उसके परिशीलन से व प्रयोगों के अनुभव से निर्मित एक नया कालसुसंगत विकास पथ देश के तंत्र में स्थापित करना पड़ेगा। देश के अंतिम पंक्ति में खड़े अंतिम मनुष्य के जीवन की स्थिति ही इस देश के विकास की निर्णायक कसौटी होगी तथा आत्मनिर्भरता देश की सुरक्षा व समृद्धि का अनिवार्य घटक है यह ध्यान में रखकर चलना पड़ेगा। जीवन का भिन्न दृष्टि से विचार करने वाला तथा उस विचार के आधार पर विश्‍व का सिरमौर देश बनकर सदियों तक जगत का नेतृत्व करने वाला अपना देश रहा है, इस तथ्य को निरंतर स्मृति में रखकर चलना पड़ेगा। उस दृष्टि में भारत में ही समस्त विश्‍व के कल्याण का सामर्थ्य विद्यमान है। उसका युगानुकूल आविष्कार नीतियों में प्रकट करना पड़ेगा।

ऐसी नीतियॉं चलाकर देश के जिस स्वरूप के निर्माण की आंकांक्षा अपने संविधान ने दिग्दर्शित की है उस ओर देश को बढ़ाने का काम होगा, इस आशा और विश्‍वास के साथ सत्ता अपना कार्य करे इसके लिये उनको समय तो देना पड़ेगा।

पर इसके साथ ही समाज के सहयोग के बिना मात्र सत्ता के प्रयासों से जीवन परिवर्तन नहीं होता, यह विश्‍व के सभी प्रगत देशों के विकास का इतिहास बताता है। इसलिये समाज को व समाज का प्रबोधन करने में, समाज की तरह-तरह की समस्याओं का निराकरण करने में लगे व्यक्तियों को व संगठनों को अपना कर्तव्य समझकर सक्रिय व सजग रहने की आवश्यकता है। प्रजातंत्र में उनकी सक्रियता,सजगता तथा समाज की राष्ट्रहितपरक प्रबुद्धता के कारण ही नीतियों के सफल होने में शासन-प्रशासन को सहयोग मिलता है व सत्ता की राजनीति में देश भटक जाने की संभावना से बचाव होता है।

ऐसे सब व्यक्ति, संस्था तथा संगठन, लोक प्रबोधन तथा लोक समस्या परिष्कार के काम में अपने संस्थागत स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित बुद्धि से लगे रहें। शासन, प्रशासन के साथ संवाद का उनका क्रम बने और चलता रहे तथा नीतियों के सुपरिणाम आखरी व्यक्ति तक पहुँच रहे हैं अथवा नहीं इसका सीधा प्रतिभाव शासन तक पहुँचते रहें इसकी आवश्यकता प्रजातांत्रिक देश में सदैव बनी रहती है।

देश की प्रगति में उपरोक्त सहयोग की आवश्यकता सद्य:स्थिति की गंभीरता और जटिलता को देखकर ध्यान में आती है। देश के दक्षिण भाग में स्थित केरल तथा तमिलनाडु राज्यों में जिहादी गतिविधियों में चिंताजनक वृद्धि दिखाई देती है। उन गतिविधियों के प्रतिरोध में ठोस व परिणामकारक उपाययोजना होती हुई ध्यान में नहीं आती है। दक्षिण सागर तट से वहॉं की रेत में पाये जाने वाले विरला खनिजों की (Rare Earth)तस्करी में कोई कमी नहीं आयी है। पश्‍चिम बंगाल में तथा असम में घुसपैठ तथा अन्य कारणों से निर्मित जनसंख्या की असंतुलित स्थिति तथा संप्रदाय विशेषों के कट्टरपन के आगे चुनावी मतों के लिये झुककर खुशामत की वहॉं के राज्यकर्ताओं की दब्बू नीति के कारण वहॉं पर हिन्दु समाज का जीवन, कानून व्यवस्था तथा देश की सुरक्षा भी खतरे में आ गये है। संपूर्ण देश में ही देश की अंतर्गत सुरक्षा को चुनौति बनने वाला जिहादी और नक्सली उग्रवाद तथा उनका पोषण करने वाली शक्तियों पर नियंत्रण लाने के लिये केन्द्र और राज्य सरकारों के सहयोग से प्रभावी उपाययोजना प्रत्यक्ष होती हुई दिखना अभी बाकी है। परंतु इसमें समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। समाज में इन सब समस्याओं के प्रति अधिक सजगता की आवश्यकता है। सीमापर दोतरफा चलने वाली अनेक प्रकार के तस्करी में लिप्त होने वाले व्यक्ति तो समाज से ही मिलते हैं। बिना अनुमति सीमा के अंदर घुसकर संपूर्ण देश में फैल जाने वाले घुसपैठियों को रोजगार व आश्रय देने वाले समाज के सामान्य लोग ही रहते हैं। समाज में शोषण के प्रभाव व विकास के अभाव के कारण नक्सली उग्रवाद को गोलाबारुद (Cannon fodder)उपलब्ध होता है। शोषण समाप्ति व विकास लाभ के लिये जैसे प्रशासन की चुस्ती, पारदर्शिता, संवेदनशीलता तथा नियमबद्धता आवश्यक है वैसे ही और उतना ही इन सब में समाज का सक्रिय सहयोग, अपनी स्वतंत्र गतिविधियों से शोषण समाप्ति के लिये प्रजातांत्रिक तरीके से संघर्षरत रहना तथा विकास को समाज के अभावग्रस्त व्यक्तियों तक पहुँचाने के लिये तरह-तरह की सेवा गतिविधि वहॉं प्रारंभ करना भी आवश्यक है। शासन की नीतियॉं देश को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने वाली ही हो परंतु साथ में समाज की उद्यमिता बढ़े, सस्ती मिलती है इसलिये नित्य उपयोग की सामग्री, यहॉं तक की देवी देवताओं की मूर्तियॉं भी विदेश में बनी हुई खरीदने की प्रवृत्ति हम समाज के सामान्य लोग त्यागे व जीवन में स्वदेशी का आचरण करें यह भी अनिवार्य आवश्यकता हैं। देश की सुरक्षा को शासन की सजग व शक्तिशाली नीति के तथा सेना की पूर्ण सिद्धता व पराक्रम के साथ-साथ ही समाज की जागरुकता, व्यक्तिगत चारित्र्य व देशभक्ति भी सुनिश्‍चित करती है। समाज में चलने वाला संवाद शासन और सेना का बल बढ़ाने वाला हो। सेना में सैनिकों तथा सैनिक अधिकारियों की पर्याप्त संख्या में आपूर्ति समाज के युवा वर्ग में से होती रहे तथा सामान्य लोगों के आँखे व कान समाज में चलने वाली गतिविधियों पर चौकस लगी रहें इसकी आवश्यकता है।

परंतु क्या इस दृष्टि से हम अपने समाज की स्थिति को लेकर आश्‍वस्त हो सकतेे हैं? हमारे घरों में पलने-बढ़ने वाले बालकों,किशारों की तैयारी घर में मिलने वाले वातावरण के संस्कारों से क्या इस प्रकार गढ़ी जाती है? ऐसे संस्कारों के पोषण के लिये आवश्यक आचरण का उदाहरण क्या घर के अभिभावक उपस्थित करते हैं? नई पीढ़ी में बढ़ने वाला नशीली द्रव्यों के उपयोग का प्रमाण, शिक्षा व परिवारों में आयी हुई आत्मीयता, संवाद व संस्कारों की कमी की ओर भी निर्देश करते हैं।

‘‘मातृवत् परदारेषु,परद्रव्येषु लोष्ठवत्। आत्मवत् सर्वभूतेषु’’

यह हमारी परंपरा का मुख्य संस्कार रहा है। उन संस्कारों का क्षरण देश में बढ़ते हुए अपराधों का, महिलाओं के साथ अत्याचार का तथा युवा पीढ़ी में बढ़ते अनाचार व उच्छृंखलता का मूल है। उस पर नियंत्रण करने के लिये कानून की कड़ाई व व्यवस्थाओं की पुनर्रचना जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यकता समाज के वातावरण में सुयोग्य आचरण के उदाहरण व सुसंस्कार प्रवणता की है।

इस वातावरण के परिवर्तन को लाने में शासन की भी भूमिका है यह सब जानते है। शिक्षा सर्वसुलभ, संस्कार प्रदान करने वाली व्यवस्थित हों, जीवनसंघर्ष में स्वाभिमान से खड़ा रहने का सामर्थ्य व साहस देने वाली हों यह शिक्षा विभाग को देखना चाहिये। जनता को जानकारी देना व उनका प्रबोधन करना यह जिनका कर्तव्य है उन दृकश्राव्य तथा पाठ्य् माध्यमों (Visual and Print media) के द्वारा संस्कार बिगाड़ने वाले कार्यक्रम व विज्ञापन न परोसे जाय ऐसा नियंत्रण रखने का काम भी सरकार के सूचना व प्रसारण विभाग का है ही। परंतु समाज इन कार्यों के शासन के द्वारा होने की बाट जोहते रुका रहे इसकी आवश्यकता नहीं। हमारा अपना परिवार भी समाज का एक छोटा रूप है। कुटुंब समाज की परिपूर्ण ईकाई के रूप में आज भी हमारी जीवनव्यवस्था में चल रहा है। उसमें हम विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम नहीं पढ़ा सकेंगे, परंतु जीवन में मनुष्यता का संस्कार भरने वाला,कर्तव्या-कर्तव्य का विवेक सिखाने वाला, साहस से जीवन का सामना करने की शक्ति व धैर्य देने वाला प्रशिक्षण तो अपने घर के वातावरण में ही मिलता है। इस दृष्टि से अपने कुटुंब के बड़े व सन्मान्य व्यक्तियों का व्यवहार, कुलपरंपरा की इस दृष्टि से उपयुक्त रक्षणीय बातें तथा तदनुरूप व्यवहार व संवाद का चलन बनाना तो पूर्णतया अपने ही हाथ में है। प्रत्येक घर में यह होना आज आवश्यक हो गया है।

शासन की भूमिका के बिना भी हम जिन क्षेत्रों में अपना कर्तव्य करने में अग्रेसर हो सकते है वह है अभाव व भेदभाव की समाप्ति। सौभाग्य से इन दोनों क्षेत्रों में चिंतन व कार्य पूर्व से चलता आ रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण के प्रति जागृति व पर्यावरण परिष्कार, स्वावलंबन के लिये स्वयं सहायता समूह व उद्यमिता प्रशिक्षण, जलसंधारण, जैविक कृषि, गौसंवर्धन, ग्राम विकास ऐसे अनेक क्षेत्रों में अनेक लोग कार्य कर रहे हैं। संघ के स्वयंसेवक भी इन क्षेत्रों में कार्यरत है। परंतु समाज की विशालता के अनुपात में इन कार्यों के विस्तार की बहुत गुंजाईश है। अपनी रुचि, प्रति व समय आदि क्षमताओं के अनुसार हम किसी पहले से चले कार्य में जुड़ सकते हैं अथवा हम स्वतंत्र रूप से किसी कार्य को कर सकते है। कम से कम अपने अड़ोस-पड़ोस में अथवा हमारे अपने घर में आजीविका के लिये सेवा देने वाले अपने समाज के अभावग्रस्त बंधु-भगिनिओं के लिये किसी उपयोगी कार्य में हम अपने कुटुंब को साथ लेकर जुट सकते हैं।

समाज से भेदभावना दूर करने का कार्य बहुत अधिक प्रमाण में व बहुत अधिक गति से होने की आवश्यकता हैं। मन में से भेदभावना निकालने का काम तो शासन अथवा अन्य कोई व्यवस्थागत तंत्र कर भी नहीं सकता। इसे तो समाज के उद्यम के द्वारा ही संपन्न किया जा सकता है। अपने मन से, अपने घर से तथा अपने मित्र परिवार से प्रत्यक्ष ति प्रारम्भ करके ही यह कार्य संभव होगा। इस हेतु मेरे अपने व्यक्तिगत व्यवहार में, मेरे अपने परिवार के वातावरण में, जो आदतें, रूढ़ि, कुरीतियॉं, भेदभाव के व्यवहार का पोषण करने वाली चली आ रही है उनका संपूर्ण त्याग करना होगा। जातिगत,प्रांतगत,भाषागत,अहंकारों तथा अभिनिवेशों के सूक्ष्मतम अवशेषों को भी निकाल बाहर करना होगा। ऐसे अहंकारों को लेकर भावना भड़काने वाले वक्तव्य सुनने,बोलने तथा भडकाऊ वातावरण में बह जाकर किसी आतताई कार्य को करने से बचना होगा। अपने विशाल हिंदू समाज का प्रत्येक व्यक्ति,भारतमाता का प्रत्येक सुपुत्र,मेरा अपना बंधु है इस आत्मीय भावना की कसौटी पर अपनी प्रत्येक छोटी-बड़ी कृति को तराशना होगा। अपने समविचारी सहयोगियों को साथ लेकर हिंदुओं के धर्मस्थान,स्मशान व जलाभरण के स्रोत सब हिंदुओं के लिये खुले हों, हिंदुओं के अनेकविध पंथ-संप्रदाय,भाषा, प्रांत, जातियों के गौरवास्पद महापुरुषों के नाम पर होने वाले कार्यक्रमों, उत्सवों में सब हिंदुओं की सहभागिता हों यह पहल करनी पड़ेगी। इस कार्य का स्वयं से प्रारंभ हम आज ही कर सकते हैं। कालक्रम में संकुचित हुए अपने आत्मीयता के दायरे के लिये यह एक सीमोल्लंघन आज हम अनिवार्य रूप से कर लें।

हमारे पास दर्शनों की कमी नहीं है। अपने शाश्‍वत मूल्यों के आधार पर व्यक्तिगत व सामूहिक जीवन का काल-सुसंगत विचार भी अनेक महापुरुषों ने रखा है। पं. दीनदयाल जी उपाध्याय के द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानव दर्शन के आविर्भाव का 50 वॉं वर्ष चल रहा है। सौभाग्य से प्रामाणिकता व नि:स्वार्थ बुद्धि से राष्ट्र कल्याण के लिये अपने आप्त पूर्वजों के द्वारा दिये गये उन स्वानुभूत उपदेशों को चरितार्थ करने का संकल्प भी देश का नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों में विद्यमान दिख रहा है। समाज में सजगता, एकात्मता, व्यक्तिगत व राष्ट्रीय चारित्र्य, अनुशासन इत्यादि सद्गुणों के आधार पर धैर्यपूर्वक सामूहिक उद्यम खड़ा हो तो अपने सामने खड़ी सारी चुनौतियों व संकटों को पार कर स्वयं के उदाहरण से संतुलित,सुखी, सर्वांग सुंदर, वैश्‍विक जीवन का पथ प्रदर्शक राष्ट्र जीवन खड़ा करना शीघ्र संभव होगा।

विजयादशमी विजयपर्व है। राष्ट्र के सामने प्रकट यह नये विजय का क्षितिज हमको ललकार रहा है। प्रतिपदा से लेकर नवमी तक जागृत रहकर सामूहिक शक्ति की उपासना चली तब दैवीसंपत्तियुक्त देवगणों को विजयादशमी के विजय प्राप्ति का अवसर देखने को मिला। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ1925 से आजतक इसी दैवीसंपदयुक्त,शक्तिसंपन्न,संगठित समाज की निर्मिति में लगा है। समाज में वातावरण निर्मिति से आचरण का परिवर्तन होता है, उसी के बल पर व्यवस्था परिवर्तन यशस्वी होता है। जितना बड़ा अपना समाज है, जितनी गंभीर व जटिल अंतर्गत व बाह्य समस्याओं का घेरा उस पर लगा है और जितने भव्य प्रयोजन की सिद्धी के लिये अपने इस राष्ट्र का अस्तित्व है,उसको देखते हुए अभी बहुत कार्य होना बाकी है। अपने राष्ट्रीय स्वत्व-हिन्दुत्व का गौरव मन में जगाकर उस गौरव के अनुरूप सद्गुणों को अपने स्वभाव का अंग बनाकर, देश के लिये संगठित होकर जीवन जीने वाले व प्रसंगोपात्त प्राणसर्वस्व अर्पण करने की तैयारी रखने वाले व्यक्तियों के निर्माण का यह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने जीवन के प्रारंभ से करते आया है। सभीको अपने अंदर समा लेने वाला, सर्व समावेशक, सर्वव्यापक सत्य ही हिंदुत्व है। वहीं अपना स्वत्व है। इसीलिये् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा गॉंव-गली-मोहल्ले में घर-घर तक पहुँचानी पड़ेगी। अपने इस सनातन राष्ट्र के उस स्वरूप के खड़े होने की प्रतीक्षा सारा विश्‍व कर रहा है,जिसके बारे में किसी कवि ने यह कहा है-

‘‘विश्‍व का हर देश जब भी,दिग्भ्रमित हो लड़खड़ाया,
सत्य की पहचान करने,इस धरा के पास आया।
भूमि यह हर दलित को पुचकारती,हर पतित को उद्धारती,
धन्य देश महान,धन्य हिन्दुस्थान।’’

उस महान देश की नवनिर्मिति में सहयोग का आवाहन करता हुआ मैं अपना निवेदन समाप्त करता हूँ।

॥ भारत माता की जय ॥