शनिवार, 31 जनवरी 2015

सोनिया, राहुल से नाराज पूर्व केंद्रीय मंत्री नटराजन ने कांग्रेस छोड़ी



कांग्रेस में नहीं आंतरिक लोकतंत्र, हाई कमान में समस्याः जयंती नटराजन

January 30, 2015 
नई दिल्ली: यूपीए सरकार में पर्यावरण मंत्री रहीं जयंती नटराजन ने कांग्रेस छोड़ दी है। उनके द्वारा सोनिया गांधी को लिखा लेटर मीडिया में आने के बाद शुक्रवार दोपहर उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की कमी की बात भी उठाई।

जयंती नटराजन ने कहा, ‘मैंने पार्टी की हर बात मानी, मगर मुझे क्यों हटाया गया था, कुछ पता नहीं। अभी मेरा किसी और पार्टी को जॉइन करने का इरादा नहीं है।’ कांग्रेस हाई कमान पर हमला करते हुए जयंती ने कहा कि राज्य कांग्रेस से कोई विवाद नहीं। समस्या हाई कमान से है। मुझे मैडम सोनिया गांधी से मिलने का वक्त नहीं दिया गया।

प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में ही जयंती ने कांग्रेस से अपने रिश्ते की बात कही। उन्होंने कहा कि मेरे लिए ये दर्द भले पल हैं क्योंकि मेरा परिवार कांग्रेस के साथ इसके गठन के वक्त से है। हालांकि उन्होंने यह कहते देर नहीं लगाई कि अब वक्त आ गया है जब मुझे कांग्रेस से जुड़े होने पर पुनर्विचार करना पड़ेगा। यह कांग्रेस वह नहीं है, जिसके साथ मैं जुड़ी थी।

पर्यावरण मंत्री के पद से हटाए जाने पर जयंती ने बोला, मैंने मंत्री के रूप में हर कदम कानून के मुताबिक और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए उठाया। मैंने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया।’ इसके अलावा ‘कांग्रेस उपाध्यक्ष के ऑफिस ने भी कहा कि बड़े प्रॉजेक्ट्स की वजह से पर्यावरण का नुकसान नहीं होना चाहिए। पार्टी का भी यही रुख था। ऐसे में मैंने यही किया।’

जयंती ने कहा कि पार्टी लाइन पर चलने के बावजूद मुझे मंत्री पद से इस्तीफा क्यों दिलवाया गया, यह मुझे आज तक समझ में नहीं आया। ‘जब मैंने इस्तीफा दिया था, प्रधानमंत्री ने मेरे काम की तारीफ की थी। कोई गलती या कमी नहीं गिनाई गई थी।’

लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी ने पर्यावरण मंत्रालय को लेकर ‘जयंती टैक्स’ कहकर तंज कसा था। इस पर जयंती नटराजन ने कहा, ‘पीएम मोदी ने ‘जयंती टैक्स’ की बात की थी। अब वह सरकार में हैं, इसकी जांच करवा लें। मैं इसका स्वागत करती हूं।’
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सोनिया, राहुल से नाराज जयंती नटराजन ने कांग्रेस छोड़ी

By  एबीपी न्यूज़   Friday, 30 January
नई दिल्ली: कांग्रेस को करारा झटका देते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री जयंती नटराजन ने पार्टी की प्राथमिक  सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है. जयंती ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर तीखे प्रहार करते हुए उनपर परियोजनाओं के लिए पर्यावरण मंजूरी दिए जाने के 'खास अनुरोध' भेजने का आरोप लगाया है. जयंती नटराजन ने राहुल गांधी के दफ्तर पर गलत प्रचार करने का लगाते हुए कहा है कि लगातार उनकी छवि खराब करने की कोशिश की गई है.

चार बार कांग्रेस की सांसद रह चुकीं नटराजन ने कांग्रेस की मुसीबतों को बढ़ा दिया है और संप्रग सरकार की शासन की शैली को लेकर बीजेपी नेताओं ने हमले किए हैं. नटराजन तमिलनाडु की कांग्रेस की दूसरी नेता हैं जिन्होंने पार्टी छोड़ी है. इससे पहले जी. के. वासन ने पार्टी छोड़कर अपनी अलग पार्टी बनाई थी.

कांग्रेस की तमिलनाडु इकाई आंतरिक कलह का सामना कर रही है और हाल में कथित तौर पर पार्टी विरोधी टिप्पणी को लेकर पार्टी की राज्य इकाई की ओर से जारी कारण बताओ नोटिस का कार्ती चिदंबरम ने जवाब देने से मना कर दिया था. कार्ती पार्टी के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम के पुत्र हैं.

क्या हैं जयंती नटराजन के आरोप
इस्तीफा देने से पहले जयंती नटराजन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करके कहा कि 'घुटन वाले माहौल में' वह नहीं रह सकतीं. नटराजन ने आरोप लगाया कि संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल में पर्यावरण मंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद उनकी प्रतिष्ठा धूमिल करने के लिए राहुल गांधी के कार्यालय की ओर से कहानियां गढ़ीं गईं. हालांकि कांग्रेस छोड़ने के बाद वह कोई दूसरी पार्टी ज्वाइन करेंगी इस उनका कहना है, 'ऐसे कड़वे अनुभवों के बाद मेरी किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल होने की कोई योजना नहीं है.'

जयंती नटराजन ने कहा, 'मैं ऐसे परिवार से हूं जिसके खून में कांग्रेस है. यूथ कांग्रेस के दिनों से यह मेरे खून में है. लेकिन वक्त आ गया है जब मुझे कांग्रेस से जुड़े होने पर पुनर्विचार करना पड़ेगा. यह कांग्रेस वह नहीं है जिसके साथ मैं जुड़ी थी. मेरे लिए ये दर्द भले पल हैं क्योंकि मेरा परिवार कांग्रेस के साथ इसके गठन के वक्त से है.'

जयंती नटराजन ने कहा, 'मेरा लिखा लेटर जब न्यूज पेपर में छपा तो मुझे लगा कि इस मामले पर अपना रुख मुझे साफ करना चाहिए. मुझे दुख है कि यह इस हालत में पहुंच गई है. देश और पार्टी की सेवा के लिए मुझे जो मौके दिए गए, उसके लिए मैं पार्टी की शुक्रगुजार हूं.'

राहुल गांधी के भाषण से लगा धक्का- जयंती
जयंती ने कहा है कि उन्हें सबसे ज्यादा धक्का कांग्रेस उपाध्यक्ष द्वारा फिक्की में दिए गए भाषण से लगा. आपको बता दें कि फिक्की में राहुल गांधी के भाषण से एक दिन पहले ही जयंती नटराजन ने पर्यावरण मंत्री के पद से इस्तीफा से दिया था. अगले ही दिन फिक्की में उद्योगपतियों के बीच जाकर राहुल ने कहा कि अब आपको (उद्योगपतियों को) कोई दिक्कत नहीं होगी. इस पर जयंती नटराजन ने बताय कि उन्होंने ई-मेल में राहुल गांधी को लिखा, 'मैंने फिक्की का भाषण सुना, मैं जानना चाहती हूं कि आपने ऐसा क्यों किया?' इस पर राहुल  गांधी का जवाब आया कि वे अभी व्यस्त हैं और बाद में कॉल करेंगे लेकिन अब तक उन्होंने कोई फोन नहीं किया.

जयंती नटराजन ने पर्यावरण के मुद्दे पर कहा, 'कांग्रेस उपाध्यक्ष की तरफ से कई गुजारिशें आईं. उनके ऑफिस ने मुझे पर्यावरण की सुरक्षा को ध्यान में रखने के लिए कहा. मैंने मंत्री के रूप में हर कदम कानून के मुताबिक और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए उठाया. अपना काम ईमानदारी से किया.'

नटराजन ने अपने कार्यकाल के दौरान दी गई पर्यावरण मंजूरियों की किसी भी तरह की जांच का स्वागत करते हुए कहा कि इससे उन्हें अपनी स्थिति स्पष्ट करने का मौका मिलेगा. नटराजन ने कहा, 'मैंने कुछ भी गलत नहीं किया. अगर इस बात का कोई ठोस सुबूत है कि मैंने कुछ गलत किया है तो मैं फांसी पर चढ़ने या जेल जाने के लिए तैयार हूं.'

नटराजन ने यहा भी कहा, 'यूपीए-2 में मंत्री के रूप में मैं जासूसी मुद्दे पर नरेंद्र मोदी पर हमला नहीं करना चाहती थी, लेकिन पार्टी उच्च स्तर पर चाहती थी कि मैं ऐसा करूं.'



दिग्विजय सिंह ने आरोपों को नकारा
कांग्रेस प्रवक्ता दिग्विजय सिंह ने जयंती नटराजन के इन आरोपों को निराधार बताया है. दिग्वजिय सिंह ने कहा है, 'जयंती नटराजन  के आरोप गलत हैं. राहुल/सोनिया जी ने कभी सरकार के कामकाज में दखल नहीं दिया. मंत्री निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र थे.' दिग्विजय सिंह ने सोनिया और राहुल का बचाव करते हुए कहा, 'अगर राहुल और सोनिया गांधी को ऐसा करना होता तो वे खुद ही प्रधानमंत्री या फिर मंत्री बन जाते.'

कांग्रेस नेता शोभा ओझा ने इस पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहा है, 'उनके आरोप निराधार हैं. उनके पास कोई तथ्य नहीं है. उस समय वे चुप क्यों थीं?

चिट्ठी से भूचाल
एक अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित पत्र में कहा गया है कि जयंती से देश में होने वाले आम चुनाव से 100 दिन से भी कम समय पहले पद से इस्तीफा देने को कहा गया था. यह पत्र नटराजन ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखा है जिसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि पार्टी के एक हिस्से ने मीडिया में ‘‘गलत रूप से उन्हें अपमानित’’ और ‘‘बदनाम’’ किया.

जयंती नटराजन ने आरोप लगाया है कि जब वे पर्यावरण मंत्री थीं तब राहुल ने उनसे कई प्रोजेक्ट्स की पर्यावरण से जुड़ी मंजूरी रोकने को कहा था.  नवंबर 2014 में जयंती नटराजन ने सोनिया गांधी को ये चिट्ठी लिखी थी. यह चिट्ठी अंग्रेजी अख़बार 'द हिदू' के पास उपलब्ध है.

नटराजन ने अपने पत्र में लिखा है, 'मुझे श्री राहुल गांधी और उनके कार्यालय से विशेष अनुरोध (जो हम लोगों के लिए निर्देश हुआ करता था) मिला जिसमें कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पर्यावरण चिंताओं को अग्रसारित किया गया और मैंने उन अनुरोधों का सम्मान करने का ध्यान रखा.' नटराजन ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी के 'अपने पर्यावरणोन्मुखी रूख' से 'कॉरपोरेट फ्रेंडली' रूख अपनाने के बाद वह पार्टी के कुछ लोगों द्वारा मीडिया में चलाए गए 'विद्वेषपूर्ण, गलत और प्रायोजित' अभियान का शिकार बनीं.

उन्होंने यह भी बताया कि जब पार्टी में काम करने के बहाने दबाव डालकर उनसे इस्तीफा दिलवाया गया था तब अगले ही दिन फिक्की में उद्योगपतियों के बीच जाकर राहुल ने कहा कि अब आपको (उद्योगपतियों को) कोई दिक्कत नहीं होगी. जयंती ने यह भी आरोप लगाया कि उनपर पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के कैबिनेट मंत्रियों की ओर से भी कई बड़े प्रोजेक्ट्स को पर्यावरण की मंजूरी देने का दवाब था लेकिन वे दवाब में नहीं आईं.



बताते चलें कि जयंती नटराजन को दिसंबर 2013 में सरकार से हटाकर कांग्रेस पार्टी के संगठन में लाया गया था. तब ये प्रचार हुआ था कि जयंती के कारण कई प्रोजेक्ट्स अटके हुए हैं क्योंकि वे इन प्रोजेक्ट्स को मंजूरी नहीं देती हैं.



जयंती नटराजन की इस चिट्ठी का निचोड़ निकाला जाए तो यह बात सामने आती है कि राहुल गांधी यूपीए-2 के वक्त सरकार के फैसलों में दखल देते थे. कांग्रेस लगातार इन आरोपों को नकारती रही है कि राहुल का सरकार की नीतियों में दखल था.

सोनिया गांधी की चिट्ठी से ये संकेत भी मिलने लगे हैं कि जयंती के मन में आजकल क्या चल रहा है. नवंबर की चिट्टी में जयंती ने कई ऐसी बातें लिखी हैं जो मोदी के प्रति उनकी नरमी का इशारा कर रही हैं. जय़ंती ने स्नूपगेट यानी जासूसी के मामले में नरेंद्र मोदी पर हमले का विरोध किया था और ये भी लिखा कि उन पर मोदी पर हमले की दबाल डाला गया.

बावरिया ने स्वीकारा
जयंती ने आरोप लगाया है कि अदाणी के मामले में उन्हें राहुल गांधी के आफिस ने दीपक वाबरिया के नाम के व्यक्ति से संपर्क के लिए कहा गया था. एबीपी न्यूज ने बावरिया से संपर्क किया. बावरिया ने कहा है कि वो 2012-13 में राहुल गांधी से मछुआरे और किसानों के साथ मिले थे. उसी के बाद मुंद्रा मामले में सुनीता नारायण की नियुक्ति हुई थी.

बीजेपी ने कांग्रेस के खिलाफ खोला मोर्चा
जयंती नटराजन के आरोपों के बाद सरकार के मंत्री कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा बोलने लगे हैं. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि पर्यावरण मंत्रालय को पर्यावरण मंजूरियों की जांच करनी चाहिए.

इस खबर पर प्रतिक्रिया जताते हुए अरूण जेटली ने कहा, 'यूपीए सरकार इस देश का संचालन किस तरह देश परकरती रही है  इसकी सच्चाई इस चिट्ठी से सामने आ गई है. किसी भी सरकार के संचालन में देश की अर्थव्यवस्ता किस प्रकार से चलाई जाती है, देश का विकास किस प्रकार होता है ये प्रमुख होता है. पर्यावरण संबंधित अनुमति मिलने में सालों लग जाएं, मनमानी के साथ किसको देनी है  किसे नहीं देनी है इसके संबंध में अफवाहें थी जो अब सच साबित हुई हैं. इसकी एक कानूनी व्यवस्था है उस व्यवस्था के अनुकूल देनी चाहिए लेकिन मनमानी से दी जाएं, पार्टी की हित किसमें है और  पार्टी की इच्छा किसमें है, सरकार ये तय न करे, पार्टी तय करें. प्रधानमंत्री और  सरकार मूकदर्शक रह जाएं इस आधार पर ये अनुमतियां दी जाती थीं.'

अब पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर का बयान आया है कि सरकार जयंती के आरोपों की जांच करेगी

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

संघ देश, धर्म और समाज पर न्यौछावर होने वाले राष्ट्र भक्त तैयार करता है - ओमप्रकाश



सोमवार, 19 जनवरी 2015
संघ देश, धर्म और समाज पर न्यौछावर होने वाले राष्ट्र भक्त तैयार करता है - ओमप्रकाश

पाली १९ जनवरी १४। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश, धर्म और समाज पर न्यौछावर होने वाले राष्ट्र भक्त तैयार करता है। जो समस्याओं से भागता नहीं, बल्कि साहस एवं सकारात्मक सोच के साथ उसका मुकाबला करता है। यह बात रविवार दोपहर को धर्मपुरा केरिया दरवाजा स्थित गोशाला मैदान में मकर संक्रान्ति उत्सव एवं सभा में स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए संघ के क्षेत्र प्रचार प्रमुख ओमप्रकाश जी  ने कही।

उन्होंने कहा कि लोग जिम्मेदारी लेने से बचते है। इस बात को संघ ने समझा और शाखा शुरू कर खेलकूद के माध्यम से स्वयंसेवकों में सकारात्मक सोच, साहस, निर्भिकता का विकास करने की कोशिश की। इस दौरान उन्होंने भारत-चीन युद्ध के दौरान घायल हुए भारतीय सैनिकों के लिए रक्त देने के लिए तैयार हुए सैकड़ों स्वयंसेवकों का प्रसंग सुनाया।

इसके साथ ही उन्होंने सुभाषचंद्र बोस द्वारा बचपन में मां काली को खून से तिलक लगाने का प्रसंग सुनाया। उसके बाद प्रार्थना एवं ध्वज प्रणाम किया गया। अंत में रेवड़ी का प्रसाद बांटा गया।
पाली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश, धर्म और समाज पर न्यौछावर होने वाले राष्ट्र भक्त तैयार करता है। जो समस्याओं से भागता नहीं, बल्कि साहस एवं सकारात्मक सोच के साथ उसका मुकाबला करता है। यह बात रविवार दोपहर को धर्मपुरा केरिया दरवाजा स्थित गोशाला मैदान में मकर संक्रान्ति उत्सव एवं सभा में स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए संघ के क्षेत्र प्रचार प्रमुख ओमप्रकाश ने कही।

उन्होंने कहा कि लोग जिम्मेदारी लेने से बचते है। इस बात को संघ ने समझा और शाखा शुरू कर खेलकूद के माध्यम से स्वयंसेवकों में सकारात्मक सोच, साहस, निर्भिकता का विकास करने की कोशिश की। इस दौरान उन्होंने भारत-चीन युद्ध के दौरान घायल हुए भारतीय सैनिकों के लिए रक्त देने के लिए तैयार हुए सैकड़ों स्वयंसेवकों का प्रसंग सुनाया।

इसके साथ ही उन्होंने सुभाष   चँद्र   बोस द्वारा बचपन में मां काली को खून से तिलक लगाने का प्रसंग सुनाया। उसके बाद प्रार्थना एवं ध्वज प्रणाम किया गया। अंत में रेवड़ी का प्रसाद बांटा गया।

बुधवार, 28 जनवरी 2015

हिन्दुस्थान, हिन्दुराष्ट्र है,यह सत्य है !

प. पू. सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी का बौद्धिक
16 फरवरी 2014,स्थान: भाऊराव देवरस सभागार
निवेदिता शिक्षा सदन, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

हिन्दुस्थान, हिन्दुराष्ट्र है,यह सत्य है 
प. पू. सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी का बौद्धिक
16 फरवरी 2014,स्थान: भाऊराव देवरस सभागार
निवेदिता शिक्षा सदन, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
http://vskkashi.blogspot.in/2014/03/blog-post_12.html
माननीय क्षेत्र संघचालक जी और माननीय विभाग संघचालाक जी, उपस्थित अन्य अधिकारीगण एवं आत्मीय स्वयंसेवक बन्धुओं. ये मेरा भी सौभाग्य है कि प्रवास के निमित्त देश के विभिन्न स्थानों पर जाना होता है, और आप सब लोगों के दर्शन का अवसर मिले, लगभग दो तीन वर्षों में एकाध बार अवश्य प्राप्त होता ही है. यहाँ कार्यक्रम की प्रस्तावना में यह कहा गया कि, आपका सौभाग्य है कि सरसंघचालक जी के दर्शन हो गए, और मैं कह रहा हूँ कि मेरा सौभाग्य ये है कि आपके दर्शन हो गए. अब ८८ वर्षों से ये संघ चल रहा है, तो ये भाषा भी अपनी परिचित है. लेकिन हम सबलोग जानते हैं, और अगर नहीं जानते हैं तो हमको ये जानना चाहिए कि ये भाषा मात्र नहीं है, कोई कार्यकर्ता मिलता है, दीखता है, स्वयंसेवक को आनंद होता है. स्वयंसेवक को स्वयंसेवक मिलता है तो मिलने मात्र से आनंद है. ट्रेन में मिल जाए, बस में मिल जाए, नया अपरिचित मिल जाये, और पता चले कि वो स्वयंसेवक है तो एक आनंद की अनुभूति हम सब लोग करते हैं. अब आप विचार कीजिये कि अपने देश के आज के वातावरण में ये एक चमत्कार हीहै की नहीं? एक दुसरे को लोग देखते हैं, तो पहला विचार तो ये करते हैं की ये मेरे किस काम आएगा? दूसरा विचार ये करते हैं की ये मेरे काम आएगा कि मेरे काम के विरुद्ध जायेगा? और फिर उसके अनुसार उनका व्यवहार होता है. यहाँ पर देश में लाखों लोग ऐसे हैं की जो मिल जाये, और एक परिचय मिल जाये की हम संघ के स्वयंसेवक हैं, तो सब आनंदित हो जाते हैं, और एक दुसरे पर विश्वास रखकर आत्मीयता का व्यवहार करते हैं,और ऐसा उनका व्यवहार अनेक वर्षों से चल रहा है, जिसका अनुभव वो तो कर ही रहे हैं लेकिन समाज भी कर रहा है.
समाज का स्वयंसेवकों पर विश्वास:
समाज को भी और किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है, समाज को अगर पता चल गया कि ये स्वयंसेवक है, तो समाज भी एकदम आश्वस्त हो जाता है. अभी उत्तरान्चल में इतना बड़ा एक विभीषिका हो गयी, तो उस समय तो लोगों का वहाँ पहुँचना भी दूभर था, अन्दर वाले अन्दर फंसे थे बाहर वाले बाहर खड़े थे, सबसे पहले लोग वहां पर विमान लेकर पहुंचे और हमारे स्वयंसेवक पैदल पहुंचे. बद्रीनाथ के आस-पास कुछ चार-साढ़े चार हज़ार लोग फंस गए थे, और अपने स्वयंसेवक लोग वहां जाने के प्रयत्न में थे, साधन कुछ मिल नहीं रहा था, जल्दी जाना था, सेना के लोगों को भी सूचना हो गयी की वहां लोग फंसे हैं,तो उन्होंने झट अपना एक विमान बुला लिया, और उसमे वहां के लिए निकलने को तैयार हो गए, अपने स्वयंसेवकों को पता चला, स्वयंसेवक वहां गए, जैसे संघ का अनुशासन है, वैसे सेना का भी अनुशासन है. सेना के विमान में जाने वालों की तो सूचि होती है, औरउतने ही लोग जाते हैं, बाकि लोगों को जाने की अनुमति होती नहीं है. लेकिन लोग फंसे हैं, उनको मदद करनी है, ये व्याकुलता इतनी तीव्र थी की अपने दो स्वयंसेवक, उस विमान में जैसे तैसे घुस गए, विमान में जो लोग जा रहे थे, उनके जो प्रमुख थे उनको भी पता नहीं था. विमान के उड़ने के बाद सेना के लोगों ने गिना तो दो लोग ज्यादा थे, उन्होंने पूछा, “भाई आप लोग किस रेजिमेंट के हो?” स्वयंसेवकों ने उत्तर दिया, “हम रेजिमेंट- वेगिमेंट से नहीं, हम आर०एस०एस० के लोग हैं”, तो विमान प्रमुख बोले, “अच्छा बिना अनुमती तुम घुस गए, विमान नहीं होता तो बाहर फेंक देता तुम्हें, लेकिन अब चलो,वापसी में अपना रास्ता ढूंढ लेना”, उन्होंने (स्वयंसेवकों ने) कहा, “ठीक है हमको तो जाना ही है, वापसी का हमने सोचा ही नहीं”. विमान उतरा, वहाँ सारी भीड़ थी, वो आशावादी निगाहों से देख रही थी, विमान उतरा, एक ही विमान था, वह भी छोटा विमान, १०-१२ लोग जिसमे आते हैं. कुछ लोगों को निराशा भी लगी होगी, की जल्दी छुट्टी नहीं होगी, लेकिन जैसे ही वो दो निक्करधारी स्वयंसेवक उतरे, वो सारी चार साढ़े चार हज़ार की भीड़ में एक बात चली, “अरे वो निक्कर वाले आ गए, अब सब ठीक हो जाएगा”. ये निक्कर वालों के प्रति समाज का विश्वास है, क्यों है? क्योंकि हमारा एक आचरण ८८ वर्षों से चल रहा है, उस आचरण को बढ़ते हुए कार्य में भी संगठन के प्रत्येक घटक में उत्पन्न करने की सतत साधना, सतत तपस्या हम सब लोग कर रहे हैं. इसका बड़ा महत्व है और यही उपाय है.
समस्या नहीं, उपायों की चर्चा:
अपने संगठन में समस्याओं की चर्चा, केवल जानकारी रखने के लिए जितनी आवश्यक है, उतनी ही होती है. परिस्थिति का डर दिखाकर लोगों को खड़ा करना, ये हमारा उपाय नहीं है, ये हमारा प्रयास ऐसा नहीं रहता, बाकी लोग करते हैं, एक दुसरे के प्रति डराना, परिस्थिति के प्रति डराना, उसके आधार पर अपने छत्र के नीचे लाना. हमारे यहाँ ऐसा नहीं है, हम लोग उपायों की चर्चा करते हैं. डॉ० साहब के भी जो उपलब्ध हैं, दो तीन भाषण उपलब्ध हैं, वो आपने पढ़े, तो आपके ध्यान में आएगा, कि देश की परिस्थिति को इतनी बारीकी से समझने वाले डॉ० साहब, संघ स्थापना के बाद, स्वयंसेवकों के सामने जब-जब बोलते थे, तो बहुत ज्यादा परिस्थिति का वर्णन नहीं करते थे, उस परिस्थिति का उपाय करने के लिए जो करना चाहिए, उसके बारे में ही ज्यादा बोलते थे. हमारा भी स्वभाव वैसा ही बना है, और इसीलिए उसी की चर्चा हम ज्यादा करते हैं. क्योंकि हमें पता है की परिस्थिति क्या है, इसका महत्व नहीं है, परिस्थिति तो रहती ही है, और वो अपने हाँथ में नहीं रहती है, और वो नित्य बदलती रहती है. कल वर्षा थी, आज धूप है, और कल फिर से क्या होगा? कोई बता नहीं सकता. नित्य बदलने वाली परिस्थिति में हम हैं, उपाय करने वाले हम तब भी थे, आज भी हैं, और कल भी रहेंगे. और इसलिए हम जो उपाय करेंगे उसके आधार पर परिस्थिति को झेलना सबके लिए संभव हो जायेगा. परिस्थिति अनेक प्रकार की प्रतिकूल भी हैं, परिस्थिति का विचार करते हैं, जब लोग बोलने लगते हैं, तो लोगों का दिल जैसे बैठ जाता है, क्योंकि इतने संकट हैं, सीमायें सुरक्षित नहीं, आर्थिक स्थिति बिगड़ गयी है, सामाजिक स्थिति कलहों से भरी है, लोगों में स्वार्थ प्रबल है, अब ऐसी सब बातें सामने आती हैं तो लोग कहते हैं, “इसका मतलब कुछ करना बेकार है”, तो परिस्थिति के डर से कुछ करने के लिए प्रवृत्त होने की बजाय लोग बैठ जाते हैं, जो करना चाहते हैं उनका हाल ऐसा हो जाता है की इधर दौडूँ या उधर दौडूँ, पहले चीन को रोकूँ की पाकिस्तान को रोकूँ, भ्रष्टाचार को समाप्त करूं की गरीबी को हटाऊँ, कई ऐसी बातें हैं जो करने लायक हैं और एक आदमी के मन में इतने सारे सवाल उठते हैं, ये करना की वो करना. लेकिन इधर जाओ उधर जाओ, ये करो वो करो से, इन सब बातों का मूल कहाँ है, उसको देखना और उसका उपाय करना, तो सारी बातें ठीक हो जाती हैं, ये अगर हम करते हैं, तो सब ठीक होता है. एक बार ऐसा हुआ, जंगल में एक खरगोश सो रहा था, छोटा सा खरगोश, कोमल उसका शरीर, सुन्दर भी बड़ा दिखने वाला. सोया था तो ताड़ का पेड़ था जंगल में उसका एक पत्ता सूखा था, टूट कर गिर गया, आवाज़ हुई ताड़ से, हडबडा के वो खरगोश जागा, और भागा क्योंकि आवाज़ हुई थी, दूर एक स्थान पर जाकर बैठता है, सोचता है क्या हुआ, तो कुछ नहीं, एक बडे पेड़ का बड़ा पत्ता, सुखा हुआ गिरा, तो उसको खुद पर बड़ी ग्लानी हुई. (खरगोश सोचता है) क्या मैं हूँ? भगवान, तूने मुझे कैसा बनाया है? कोई मैं प्रतिकार नहीं कर सकता, मेरे दांत नहीं, नाखून नहीं, सींह नहीं, कुछ नहीं, सुखा पत्ता खडका, तो मुझे अपनी नींद छोड़ कर भागना पड़ा, कैसा तूने बनाया? इतना सा छोटा सा जीव, क्या करेगा, डरेगा नहीं तो? कम से कम मुझे हाथी जैसा शरीर देता, तो मैं डरता नहीं बड़े पत्ते से. भगवान सबकी सुनता है, उसकी (खरगोश की) भी सुन रहा है, भगवान की क्या इच्छा हुई, सुनकर ज़रा हंसा, और तथास्तु कह दिया, तो खरगोश हाथी जैसा बन गया. खरगोश को बड़ा आनंद हुआ, सोचा अबतो डरने की बात नहीं है, हाथी जैसे बड़े बन गए, अब आराम से हम नहाएँगे, नींद लगभग हो गयी है, नहा धो कर फ्रेश हो जाएँगे, फिर घूमेंगे जंगल में. वो तालाब की ओर चला, तालाब के किनारे मेढकों के झुण्ड ने देखा कोई विचित्र प्राणी आया है, दीखता तो खरगोश जैसा है, लेकिन है तो हाथी जितना बड़ा, तो मेढक भागने और छिपने लगे, तो उसने आवाज़ दिया, “ए डरो मत भाई लोगों, मै रोज़ दिखने वाला वही खरगोश ही हूँ, ये भगवान की कृपा से इतना बड़ा बन गया हूँ, अब बिना डरे जंगल में घूमूँगा, घूमकर आकर फिर नहाऊंगा तालाब में, आपको मुझसे कोई डरने की ज़रुरत नहीं है”. मेढकों ने कहा, “लगते तो तुम वही हो आवाज़ से, हमको तो अब डर नहीं है, तुमने परिचय दिया तो हम समझ गए कि तुम हमारा कुछ नहीं बिगाडोगे, लेकिन तुमको बड़ा भय है इसमें”. खरगोश बोला, ”क्यों?”. मेढ़को ने बताया, “यहाँ एक मगरमच्छ आ गया है, और पानी के अन्दर वह हाथी पर भारी पड़ता है. इसलिए स्नान मत करो और वापस जाओ”. तो बेचारा खरगोश उलटे पाँव लौट गया, फिर से रोने लगा, क्या भगवान क्या फायदा हुआ, हाथी जितना बड़ा  बनाया, क्या अच्छा होता, मगरमच्छ जैसी ताकत देता, मोटी खाल देता, शरीर पर कांटे देता, तो मैं डरता नहीं, आराम से स्नान कर लेता. भगवान तो सुन ही रहा था, क्या हश्र हुआ हाथी जैसा बनाने के बाद. भगवान फिर से हंस दिया, और कहा ‘तथास्तु’. तो तुरंत खरगोश की खाल मोती हो गयी, कांटे आ गए उस पर, ताकत आ गयी शरीर में. खरगोश को लगा की चलो अब तो डरने की ज़रुरत नहीं है. फिर से निकला छुपने की जगह से बाहर, जैसे ही बाहर कदम रखा, शेर की दहाड़ सुनी. अब शरीर तो दूसरा बन गया था लेकिन मन तो वही था, तो दहाड़ जैसे ही सुनी, फिर से दौड़ कर दूसरे झुरमुट में जाकर छुप गया. फिर उसके ध्यान में आया, हम तो बड़े बन गए हैं, मोटे भी बन गए हैं, और ताकत भी है, तो हमको डरने की क्या आवश्यकता? मगर फिर से रोने लगा, क्या भगवान क्या किया तुमने, ये सब दिया तुमने, मगर फिर भी शेर से डरता हूँ, उसके जैसे दांत नहीं है, नाखून नहीं है, तो भगवान ने कह दिया तथास्तु, वो भी उसको प्राप्त हो गया. फिर निकला की अब तो किसी से डरने की आवश्यकता नहीं है, तो देखा की जंगल में सारे पशु भाग रहे हैं, देखा सब भाग रहे हैं एक दिशा में, पीठ पर पैर रखकर भाग रहे हैं, कोई रुककर बोलने बताने की जगह सब भाग रहे हैं. तभी कूदते-फांदते बंदरों में से एक रूककर बोला, “अरे भैया, हुम भाग रहे हैं, तुम भी भागो जान प्यारी है तो, क्योंकि जंगली भैंसों का एक झुण्ड यहाँ आ रहा है, सबको रौंद रहा है, तो तुम बगल हट जाओ, छुप जाओ या यहाँ से भाग लो”. खरगोश फिर से जाकर रोने लगा क्या भैंसे जैसा तो तुमने नहीं बनाया, क्या मजाक कर रहे हो भगवान, मैं प्रार्थना करता हूँ, तुम वरदान भी देते हो, लेकिन समस्या तो सँभालते नहीं हो. तो फिर भगवान ने उसको कहा आकाश से कि, “अरे मुर्ख, तुम अगर डर भगाना है तो ये मोटी खाल, वो वजन और वो आकार, दांत, नाखून, ये सब मांगने की बजाए, पहले तू अपने छोटे से सुकोमल शरीर में ही, एक निडर ह्रदय मांग लेता तो सारा संकट समाप्त हो जाता, जो करना चाहिए वो तो तुम कर नहीं रहे हो, और इधर उधर की सब बातें कर रहे हो.”
हिन्दू समाज ही पूरी दुनिया की समस्याओं का निवारणकर्ता:
अपने देश की समस्याओं को आज की तारिख में देखते हैं, तो यही बात ध्यान में आती है. समस्याएँ आज की हैं नहीं, बहुत पुरानी हैं, शतकों पुरानी समस्याओं से हम जूझ रहे हैं. ऐसा नहीं की हम चुपचाप पड़े समस्याओं की मार खाते रहे, कितने महापुरुष हुए, कितने पराक्रमी वीर हुए, सबने अपना-अपना काम किया बलिदान दिया. सब प्रकार की समस्याओं से लड़ने वाले लोग हमें मिले, पिछले २०० वर्ष के इतिहास में हमारे देश में जितने महापुरुष हुए, और जितने प्रयोग हुए, उतने दुनिया के गत २००० वर्ष के इतिहास में नहीं हुए. लेकिन ऐसा होने के बाद भी समस्याएँ ज्यों की त्यों कायम हैं. अब समस्याएँ हैं तो बड़ी विकराल बड़ी भयंकर. ये समस्याएँ ऐसी हैं, जहाँ से चलीं वहां से भारत आते-आते, रास्ते में जितने देश थे, कोई ५० साल में, कोई १०० साल में, उन्होंने बदल ही दिया पूरा, समाप्त ही हो गए वो, देश के देश. इस्लाम की आंधी अरबिस्तान के बाहर निकली तो ७७ साल में स्पेन से साइबेरिया तक, पूरा आधिपत्य उनका हो गया. पारसियों का देश ईरान, वो ईरान भी रहा नहीं, पारसी भी रहा नहीं, आर्यों का भी रहा नहीं, पारसियों का भी रहा नहीं, वो तो आज शिया मुस्लिमों का देश माना जाता है, बचे-खुचे लोग उसके भारत में आकर पनाह लेकर, सदियों से रह रहे हैं. ऐसी समस्या है, लेकिन विचार करते हैं तो ध्यान में आता है कि ऐसी भयंकर इस्लाम की आंधी को, भारत वर्ष की सीमा पर दो छोटे राज्य थे काबुल और जाबुल, उसको जीतने में १०० साल लग गए, सिन्धु नदी के किनारे आते-आते पौने तीन सौ साल लग गए, अन्दर घुस गए और २०० साल में भारत पदाक्रांत करना चाहा लेकिन आसाम को छू नहीं सके, आसाम पर कभी मुगलों का सुल्तानों का बादशाहों का तुर्कों का अफगानों का राज्य रहा ही नहीं, हिन्दुओं का ही राज्य रहा, बहुत आक्रमण किये, चार बार आक्रमण हुए, आखिर चौथी बार तो ब्रम्हपुत्र के पानी में उस आक्रामक सेना को बहा दिया आसाम के वीरों ने, तब जाके समाप्त हो गयी आक्रमण की बातें. और ५०० साल यहाँ पांच सल्तनतें और एक बादशाही राज करती रही, लेकिन आज अपना देश हिंदुस्तान है, अभी भी अस्सी प्रतिशत हिन्दू हैं, हिन्दुओं के प्राचीन जीवन को आज भी ज्यों का त्यों यहाँ देखा जा सकता है. तो इन समस्याओं की तो अपने को (हम को) समाप्त करने की ताकत ही नहीं है, क्योंकि ५०-१०० साल में उन्होंने जो अन्यत्र कर दिया, और यहाँ १००० साल माथा पटक रहे कुछ नहीं हो रहा है. तो समस्याओं की तो हमको समाप्त करने की ताकत ही नहीं, और हम १००० साल से प्रयत्न कर रहे वो समाप्त नहीं हो रहे. तो गड़बड़ कहाँ है, वो भी नहीं मिटते हम भी नहीं मिटते, कोई परिणाम ही नहीं, ऐसा क्यों हो रहा है? इसको सोचते हैं तो ध्यान में आता है, संघ के चिंतन के मूल में परिस्थिति का ये आकलन है. हिन्दू समाज के पास सबकुछ है, आज की अपनी स्थिति में भी हिन्दू समाज सारी दुनिया पर भारी है, हिन्दू समाज की एक ही बात है (समस्या है) की वह भूल ही गया है कि वह कौन है, और भूल गया है इसलिए बंट गया है. अगर हम हिन्दू नहीं हैं, तो किसी जाति के हो जाते हैं. अगर हम हिन्दू नहीं हैं, तो किसी एक पंथ, सम्प्रदाय के हो जाते हैं. अगर हम हिन्दू नहीं हैं, तो किसी एक प्रान्त के रहने वाले हो जाते हैं, तो किसी एक भाषा के बोलने वाले हो जाते हैं. और बाकी लोगों को पराया मान लेते हैं. इसमें और स्वार्थ आ जाता है, तब हम अपनों के प्रति अपनत्व को भूलकर अपनों के ही गले पर अपना पैर रखते हैं, और स्वार्थ के लिए विदेशियों को भी सर पर बैठा लेते हैं. पूरा इतिहास देखेंगे अभी तक का, इस क्षण तक का, तो यही हो रहा है. इस स्वभाव के दोष को हिन्दू समाज से निकालना, उसको आत्मगौरव संपन्न बनाना, गुणसम्पन्न बनाना, और संगठित रूप में चलना सिखाना, ये अगर करते हैं, तो इस समाज की शक्ति इतनी प्रचण्ड है, कि अपनी समस्याओं का समाधान तो ढूंढ ही लेगा, सारी दुनिया की समस्याओं का निवारणकर्ता भी वही बनेगा, उसी के पथ प्रदर्शन में सब देश चलेंगे, और सुखी हो जायेंगे. नहीं तो इन समस्याओं का कोई पार नहीं है, सारी दुनिया में ये समस्याएँ हैं, दुनिया को भी उपाय नहीं पता. आजकल दुनिया चिंतन कर रही, कि भारत के पास इसका उपाय होगा, क्योंकि उनके पास उनका प्राचीन विचार है. और विचार तो बिलकुल ठीक है, लेकिन दुनिया राह देख रही कि अपने विचार के आधार पर चलने वाला समाज ये लोग खड़ा करेंगे, तो उसके चलने से हमको भी रास्ता मिलेगा, हम भी उसके पीछे- पीछे चलेंगे, ये (हिन्दू समाज) एक उपाय करते तो बाकी सारा ठीक हो जाता.
अंग्रेज थे, तो हम उनको दोष देते हैं कि उन्हीं के कारण हमारी सब दुर्गति है, अब अंग्रेज चले गए, ६७ साल हो गए, अब क्या है? अब कौन है जिम्मेवार? अपने ही लोग हैं, बिगाड़ने वाले भी अपने ही लोग हैं. तो हम तो अपने ही दोषों के चलते दुस्थिति में हैं. जैसे गरिष्ठ अन्न खाकर आदमी सो गया, और हाजमा ठीक नहीं है, तो उसको स्वप्न आयेगा, दुस्वप्न भी आयेगा. अब स्वप्न में कोई बड़ा राक्षक पीछा करता है, तो वो भागता है, भागता है, भागना होता नहीं है, राक्षक पास आरहा है, भाग रहे, लेकिन राक्षक पीछा नहीं छोड़ रहा है. अब वो सपने में कितना भी चिल्लाए कुछ भी करे, राक्षक उसे सपने में पकड़ेगा ही नहीं, क्योंकि सपने में मार ही नहीं सकता, सपना तो सपना ही है, लेकिन डर तो लगता है. सपने में दौड़ रहे हैं, सोते-सोते ह्रदय गति तेज़ हो जाती है. उपाय? उपाय क्या है? नींद छोड़ कर जागो, एक मिनट में समस्या समाप्त, जाग गए तो सपने रहते ही नहीं, ऐसा ही हो रहा है. और इसलिए हम लोगों ने सोचा, कि ठीक है, तात्कालिक समस्याओं से लड़ने वाले अनेक लोग हैं, उस समय तो थे ही, अच्छे-अच्छे लोग थे, उन सबका अनुभव भी यही बताता है, कि कुछ मूलभूत बातें हिन्दू समाज की कमियां हैं, उनको जब तक दूर नहीं करते तब तक हमारा काम भी पूरा नहीं होगा, सफल नहीं होगा, ऐसा सब लोग सोचते थे, और मानते थे, और डॉ० साहब को पता था, क्योंकि डॉ० साहब सबके साथ सम्बन्ध रखते थे, सबके कामों में कार्यकर्ता बनकर के काम करते थे. तो उनको (डॉ० साहब को) उनके (अन्य सभी के) चिंतन के निष्कर्षों का भी पता था. अब मालूम सबको था, लेकिन करना कैसे पता नहीं था. जिनको कैसे करना, इसको हम खोज लेंगे ऐसी उम्मीद थी, उनको फुर्सत नहीं थी. तो डॉ० साहब ने सोचा, सब छोड़कर, इसी के पीछे मैं लगता हूँ, ८-१० साल उन्होंने प्रयोग किये, और अपना संघ अस्तित्व में आया, उस काम को हम कर रहे हैं. जब शुरू किया तब तो लोगों का बिलकुल ही ध्यान नहीं था और लोग तो डॉ० साहब को पागल समझते थे. छोटे बच्चों को लेकर मैदान में कुछ खेल खेल रहे और कह रहे हैं देश का इससे कुछ भला होगा, ऐसा नहीं होगा, “डॉ० हेडगेवार बड़ा अच्छा आदमी था, लेकिन आजकल लगता है की पागल हो गया, नाँक साफ़ नहीं कर सकते ऐसे बच्चों के आधार पर, कह रहा है की देश को परम वैभव संपन्न बनायेंगे”. आज ऐसा कोई नहीं कहता. आज सब लोग संघ की ओर टकटकी लगाए देख रहे, संघ क्या करता है? क्या नहीं करता है, अनुमान भी करते हैं, और अनुमान हमेशा उनका गलत होता है. मैं चार दिन से यहाँ हूँ, और खबरें छप रही हैं बाहर पेपर में, अन्दर क्या हुआ किसी को पता नहीं है, अपने-अपने अनुमान चला रहे हैं. अरे भाई जिन बातों का आप लोग (पत्रकार) खूब मन से विचार करते हो और मानते हो कि इसी के आधार पर देश का भाग्य बदलने वाला है, वो बातें तो हमारी गिनती में भी नहीं हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि, नेता, नारा, नीति, पार्टी, सरकार, अवतार इसके आधार पर भाग्य नहीं बदलता, हाँ वो सहायक होते हैं, इसलिए उनका अच्छा होना आवश्यक है, उस सम्बन्ध में अपना जो कर्तव्य है उतना तो हमको करना ही है, और हम करते भी हैं, परन्तु वो उपाय नहीं हैं. ये सब जहाँ से आते हैं उस समाज को बनाना, और समाज प्रबोधन से नहीं बनता, प्रबोधन से समाज की जानकारी बनती है. प्रबोधन से समाज को बदलना होता, तो हमारे यहाँ प्रबोधन कुछ कम है क्या? राम हुए, कृष्ण हुए, बुद्ध हुए, महावीर हुए, १०-१० सिख गुरु हुए, वहीँ इतने सारे नेता हुए, दुनिया में जिनका नाम चमकता है, और लोग जिनके विचारों की दुहाई देकर काम कर रहे हैं सारी दुनिया में, ऐसे लोग हमारे यहाँ हुए, और हमलोग कहाँ हैं? हम लोग किस स्थिति में हैं? हमारे यहाँ कौन से दृष्य दिखते हैं? तो उपदेशों से होता, महापुरुषों से होता, तत्वज्ञान से होता, तो हमारा देश तो अबतक स्वर्ग बन जाना चाहिए था. लेकिन उसपर चलना पड़ता है. जो उपदेश हैं, जो आदर्श हैं, जो महापुरुष हैं, उनके बनाए रास्तों पर चलना पड़ता है, तब काम होता है. और चलने की हिम्मत अकेले को नहीं रहती, और कोई एक दौड़ पड़ा महापुरुष उस रास्ते से चला गया, देखा तो अपनी हिम्मत नहीं बनती, क्योंकि फिर हम लोग क्या करते हैं? हमलोग उस महापुरुष की पूजा करते हैं. आप बड़े महान हैं, देश के लिए बलि गए, बस ये तो वही कर सकते हैं हम तो नहीं कर सकते हैं. इसलिए हम उनकी जयंती, पुण्यतिथि, पूजा सब करेंगे. वो जैसा करते हैं, वैसा नहीं करेंगे. डॉ० साहब को एक सज्जन मिले और पूछा कि, “आप राम की पूजा तो रोज़ करते नहीं हो, और धर्म का काम करते हो, ऐसा कहते हो, तो ये सब ठीक नहीं है”. तो डॉ० साहब ने उनसे पूछा कि, “ठीक है रामायण मैंने पढ़ी है, आपने पढ़ी है, तो भगवन राम के जो आदर्श हैं उसको अपने जीवन में कितना उतारा?” तो वो सज्जन गुस्सा हो गए, बोले, “भगवान राम, भगवान हैं, और न देव चरितं चरेत, देवों के जैसा नहीं चलना, ऐसा अपनी संस्कृति का आदेश है”. अब ये उलटी गंगा कब से बही, क्योंकि अपने यहाँ तो, शिवो भूत्वा, शिवो ...........है. शिव की पूजा करना है, तो शिव बनकर करो. ये विचित्र स्थिति अपने समाज की उसको बदलना ज़रूरी है. और इसलिए हमने सोचा कि सामान्य लोगों में परस्पर आत्मीयता, भेद और स्वार्थ का पूर्ण तिरोहन. और उसकी गुणवत्ता ऐसी बनायेंगे कि वो देश के लिए जियेगा-मरेगा और अकेले नहीं, सबको साथ लेकर चलेगा, सबके साथ चलेगा. समाज बोलेगा, समाज चलेगा, समाज करेगा, तो एक दिशा में करेगा, एक जैसा करेगा, एक ही समय में उसी समय में करेगा.
इतने विदेशी आक्रामक आये, और जिस दिन उन्होंने अपनी देश की सीमा के अन्दर पैर रखा, उसी दिन से उनके खिलाफ संघर्ष शुरू हुआ, यही अपना इतिहास है. अपना इतिहास पराजय का नहीं है, अपना इतिहास संघर्ष का इतिहास है. जिस कोई विदेशी आक्रामक अपने यहाँ प्रवेश कर गया, उस दिन से उसके खिलाफ संघर्ष हुआ. लेकिन पूरे इतिहास में, पुरे देश में, एक समय सबलोग उठे ऐसा दुर्भाग्य से नहीं हुआ, और ये पहेली बुझाने में उनको देर नहीं लगी. एक होकर सब उठ जाते, तो भारत वर्ष का इतिहास बदल गया होता. एकसाथ मिलकर, एक समय में, एक काम जैसा तय है वैसा करना, अपने मन और मत सबको बाजु रखना, सबने मिलकर तय किया है, वो करना. तय करने के पहले जो चर्चा होती है उसमे सबको स्वतंत्रता है, मत रखने की चर्चा करने की सब, लेकिन एक बार निर्णय हो गया तो उसके अनुसार काम करना. ये आदत नहीं रही, आज भी नहीं है. आज भी देश के अच्छे प्रामाणिक लोगों में भी इस मतभेद के कारण मनभेद है, तो सज्जन शक्ति में कभी एकता आती ही नहीं, दुर्जन लोगों के खिलाफ. एक तो सब एकसाथ सक्रीय नहीं होते, और सक्रियता में छोटे-मोटे विचार को लेकर भेद हो जाता है, तो अलग चल देते हैं. ये संगठन का स्वभाव हिन्दू समाज का बनाना, ये काम लेकर अपना संघ शुरू हुआ, और जहाँ तक आया है, जहाँ पर हम तो इन सब बातों का अनुभव अपने मन में करते ही हैं, जो मैं बोल रहा हूँ कोई नई बात नहीं, हमारे नित्य अनुभव की बात है, जो स्वयंसेवक हैं उसके लिए, लेकिन समाज भी उसका अनुभव आज कर रहा है, इसलिए हमारे सामने कर्तव्य कौन सा है? ऐसा विचार करते हैं तो स्पष्ट बात है, संघ को बढाओ. गाँव-गाँव तक, प्रत्येक बस्ती में, संघ के ऐसे लोगों को निर्माण करने वाली शाखा होती है, उसके बिना दूसरा चारा नहीं है. देश में आपत्ति आती है आसमानी हो या सुल्तानी हो, सेना-पुलिस के पहले कभी-कभी संघ के स्वयंसेवक पहुँच जाते हैं, अपना काम बिलकुल ठीक करते हैं, पाई-पाई का हिसाब रखते हैं, जितने समय में काम होना है, उतने समय में काम पूरा करते हैं, और करते समय अपना स्वार्थ देखते नहीं, अपना घर देखते नहीं, अपनी गृहस्थी देखते नहीं, समाज का काम पहले. तो लोगों को आश्चर्य होता है की आपलोग क्या सिखाते हैं? हमलोग क्या सिखाते हैं, हमको पता है, हमलोग कुछ नहीं, शाखा पर कबड्डी सिखाते हैं. बड़े-बड़े भाषण अपने यहाँ होते नहीं, एक-एक समस्या का गहन और व्यापक विचार करके अपने स्वयंसेवक को प्रशिक्षित करना, ऐसे तो हम नहीं करते. जानकारी बताते हैं, लेकिन बहुत ज्यादा हम इन लोगों को मैदान पर लाते हैं, शारीरिक कार्यक्रम, बौधिक कार्यक्रम, छोटे सरल कार्यक्रम करते हैं, और उसके आधार पर हमारा जो स्वयंसेवक तैयार होता है, वो सब करता है, उसका ट्रेनिंग हम नहीं देते हैं. गोला-बारी चल रही है, और सेना को अन्न पहुँचाना है, कैसे पहुँचाना है, ट्रेनिंग नहीं है हमारी, लेकिन जब ये काम पड़ता तो हमारा स्वयंसेवक सबसे आगे होता है और ठीक करता है. सेना के लोग कहते हैं, सामान्य आदमी मिले, तो उसको बॉर्डर पर भेजना है तो तैयार करने के लिए उन्हें ६ महीने लग जायेगा, संघ का स्वयंसेवक मिले तो ३-४ दिन काफी हैं. यहाँ क्या पढ़ाते हैं हमलोग? यहाँ कुछ नहीं पढ़ाते हैं, यहाँ शाखा है. यह इस शाखा की महत्ता है, क्योकि सब काम करने के लिए, जो आवश्यक मन है मनुष्य का, स्वभाव है, प्रत्यक्ष आचरण है, और समर्पण है, वो यहाँ निर्माण होता है. हम संघ के स्वयंसेवकों को स्वयंसेवक कहते हैं, उसका अर्थ क्या है? वो स्वयं होकर सेवा करने आया है, स्वयं होकर आया है, वो किसी की आज्ञा की राह नहीं देखता, उसको पता है ये अपना समाज है, और उसका दुःख है तो मुझे क्यों किसी का आदेश चाहिए. मेरा समाज है और वहां दुःख है तो मै जाऊंगा, करूंगा. कोई घर को आग लग गयी, अन्दर एक छोटा बच्चा रह गया, और परिवार खड़ा है, तो बैठक करते हैं क्या? की बच्चा अपना अन्दर फंसा है, उसको छुड़ाना की नहीं छुड़ाना, कैसे छुड़ाना, कौन छुड़ाएगा, कौन पहले जायेगा, ऐसे कुछ करते हैं क्या? जिसको पहले ध्यान में आता है कि एक बच्चा फंस गया, वो दौड़ पड़ता है, माता दौड़ पड़ती है, उसको पता है की वो घर जल रहा है, हम अन्दर जायेंगे तो बच्चा तो नहीं बचेगा मैं भी जल जाऊँगी, लेकिन रहा नहीं जाता है. ये अन्दर की आत्मीयता काम करती है. एक बहुत बड़े सज्जन आये, कुछ दिन पहले मिलने के लिए, बहुत बड़े, दुनिया में उनको बहुत बड़ा धनपति माना जाता है, दुनिया के पहले सौ धनपतियों में उनका नाम है, वो आये और मुझे कहने लगे कि, “हमारे पिताजी ने सोचा था, और हमको भी बताया कि देखो भाई, दुनिया में भला करना चाहिए, बात तो ठीक है, लेकिन भला करने के लिए पहले खुद कुछ बनो, तो उन्होंने और हमने मिलकर अब इतना बड़ा धन खड़ा कर लिया है कि अब किसी बात की कमी नहीं है, तो अब हमने सोचा है की भारत वर्ष में खूब सेवा करेंगे, तो बजट की कोई कमी नहीं, ५०० करोड़ हो १००० करोड़ हो, चाहे जितना लगा देंगे, आप लोगों के बहुत सारे सेवा कार्य, सुनते हैं की एक लाख तीस हज़ार से ऊपर है, मैं जानने के लिए आया हूँ कि इंफ्रास्ट्रक्चर आपने कैसे खड़ा किया, तो हम भी उसका लाभ लेकर हम भी ऐसा जाल खड़ा करेंगे.” तो मैंने उनको कहा कि “ये आपसे होगा नहीं, आप स्वतंत्र विचार कीजिये, आप कर सकेंगे, लेकिन हमारे तरीके से आप नहीं कर सकेंगे, वो क्यों? थोड़ा हमारा-आपका तरीका बिलकुल अलग है.” “आपको समाज का दुःख दिखा, आपने सोचा कि पहले मैं कमा लूँ, बाद में समाज को दूँ. हमारे यहाँ, हमारा स्वयंसेवक है, मुख्यशिक्षक है, कार्यवाह है, मंडलकार्यवाह है, खंडकार्यवाह है, वो तो बिलकुल सामान्य व्यक्ति है, उसका अपना घर भी बड़ी मुश्किल से चलता है, लेकिन वो समाज का दुःख देखता है तो दौड़ पड़ता है, वो विचार नहीं करता की मैं सेवा कार्य करने जा रहा हूँ, तो धन कहाँ से आएगा? वो शुरू कर देता है. जब शुरू कर देता है, और अन्दर की आत्मीयता से करता है, लोग देखते हैं तो पैसा आता है.”
और एक ऐसे ही सज्जन मिले, भारतवर्ष के बहुत से लोग हैं उस पहले १०० की सूचि में. क्योंकि मैं गया था मिलने उनसे मिलने के लिए, वो तो पहले से ही मान कर चले थे कि धन मांगने आया है. क्योंकि उनके पास सबलोग इसी के लिए जाते हैं. वो बहुत अच्छा सेवा कार्य करते हैं. सादगी से रहते हैं, अपने ऊपर कम से कम व्यय करते हैं, बहुत धन समाज में लगाते हैं. उनको ऐसा लगा, ये भी आये हैं कुछ न कुछ मांगेंगे. हम लोगों की बात हुई, लगभग एक घंटा गप-शप हुई, कोई विषय ही नहीं निकला पैसे का. वो अस्वस्थ हो गए, कब मांगेगा? क्या मांगेगा? राह देख रहे थे. फिर उन्होंने ही विषय निकाला कि, “आपने अभी बताया कि लाखों सेवा कार्य आपके चलते हैं, तो इसके फण्ड की व्यवस्था आप कैसे करते हैं?” उनको लगा की अब मैंने दी है जगह बोलने की तो अब ये मांगेगा. मगर मैंने कहा, “उसकी हमारी योजना कोई होती नहीं. हम काम शुरू कर देते हैं. हाँ पैसा जो आता है उसकी योजना हम व्यवस्थित रखते हैं, उसके हिसाब-किताब पर कोई ऊँगली नहीं रख सकता. लेकिन काम हमारा पहले शुरू हो जाता है, बाद में फिर जो पासा आता है उसपर आगे कार्य चलाते हैं”. तो फिर उनको रहा नहीं गया, कि अभी भी नहीं मांग रहा है. उन्होंने सीधा पुछा, “तो फिर आप आये क्यों हैं मेरे पास?” मैंने कहा, “मैं इसलिए आया हूँ, आप भी बहुत अच्छा काम कर रहे हो समाज में, शिक्षा में. हमारे पास भी चार-चार शिक्षा संगठन हैं, जिनका बहुत अनुभव है, अगर आपको काम करने में हमारी कोई मदद चाहिए, तो हम हमारे तग्य और अनुभवी लोगों को आपके पास भेज सकते हैं, जिससे आपको मदद हो सकती है. यही बताने के लिए आया था.” तो उनको बहुत आश्चर्य लगा. अब विद्या भारती के लोग उनके साथ जाते हैं और अपना सहयोग देते हैं. तो हमारा स्वयंसेवक काम करता है वो स्वयं प्रेरणा से करता है, कोई उस पर दबाव नहीं है. संघ में नियम नहीं है जो सेवा कार्य नहीं करेगा, उसको स्वयंसेवक नहीं माना जायेगा. इतने सारे स्वयंसेवक आते हैं, सब थोड़े ही सेवा में जाते हैं, लेकिन स्वयंसेवक हैं. कोई दबाव नहीं है, दबाव के कारण सेवा नहीं करता, अपनत्व के कारण करता है. स्वयंसेवक मजबूरी में काम नहीं करता, मजबूरी में बहुत से अन्य लोग काम करते हैं. बच्चा था पानी में गिर गया, गाँव के तालाब में, डूबने लगा तो चिल्लाया जोर से, वहां पे खड़ा एक लड़का कूद गया, और बच्चे को निकाल कर ले आया किनारे पर, तो लोगों ने उसको कंधे पर उठाकर जूलूस निकला. पत्रकार आये तो उन्होंने पूछा, “आपको कैसे प्रेरणा आयी, उस बच्चे को बचाने के लिए?” उसने कहा, “प्रेरणा-व्रेरणा छोड़ो, पहले ये पता करो मुझे गिराया किसने पानी में?” किसी ने धक्का मार के गिरा दिया, सीधा बच्चे के पास गिरा, बच्चे ने हडबडा कर उसका गला पकड़ लिया. अब मरना है तो दोनो को, बचना है तो दोनों को, तो मजबूरी में बच्चे को को भी बचा लिया. अपना स्वयंसेवक ऐसा नहीं है, उसकी कोई मजबूरी नहीं है, संघ का काम अपनी मर्ज़ी का काम, कोई स्वार्थ भी नहीं, हो भी तो पूरा तो होता ही नहीं है. स्वार्थी लोगों के स्वार्थ यहाँ पुरे नहीं होते. कल ही पूछा किसी ने बैठक में कि, “संघ में कोई आई-कार्ड नहीं मिलता, सर्टिफिकेट नहीं मिलता फिर हम संघ में क्यों आयें? ऐसा लोग हमसे पूछते हैं, तो क्या जवाब दें?” तो मैंने कहा, “आप जवाब दो, संघ में कोई सर्टिफिकेट या आई-कार्ड मिलेगा नहीं, तो आप संघ से दूर रहो, बिलकुल मत आना. ये तो बिलकुल पागल लोगों का काम है, जो बर्बाद कर लेते हैं अपने आप को, मिलता कुछ नहीं. कोई इनसेनटिव भी नहीं मिलता. इसलिए जब तुम पागल हो जाओगे तब आना. जब तक तुम पागल नहीं हो और संघ में नहीं हो, तब तक संघ भी ठीक है, तुम भी ठीक हो.” तो अपने यहाँ तो केवल देने के लिए ही आना होता है. हम सूचियाँ बनाते हैं हर काम की. मराठी में सूचि के लिए शब्द है ‘यादि’, इसका बहुवचन है ‘याद्या’. अपने प्रान्त संघचालकजी हैं महाराष्ट्र के, अपने बौधिक वर्ग में कहते हैं, “संघ में याद्या काम है” यानि सूचि बनाने का काम है, चार लोगों की बैठक है, सब एक दूसरे से परिचित हैं, फिर भी कागज़ पर लिखते हैं, ऐसी हमारी नीति है. वो कहते थे इसी का काम है, और कुछ काम नहीं है, और मतलब समझाते थे, मराठी में ‘या’ यानि आइये, और ‘द्या’ यानि दीजिये, अर्थात इसी का काम है, आइये और दीजिये, लीजिये वाला शब्द ही नहीं आता है. तो स्वयंसेवक को स्वार्थ की तो कोई आशा ही नहीं है, न मजबूरी है, न भय है, वो अपने आत्म प्रेरणा से काम करता है. मेरा समाज है, उसका दुःख मुझे निवारण करना ही है, उसके लिए योग्य बनना है. रोज़ आऊंगा, तपस्या करूंगा, और सेवा करूंगा. और सेवा करने के बदले क्या मिलेगा? कुछ नहीं मिलेगा, सेवा ही अधिकार है, इसलिए और-और सेवा करूँगा. तन समर्पित, मन समर्पित, और यह जीवन समर्पित. अब जीवन भी दे दिया तो क्या बचा? बची है एक चीज़ बची है, ‘चाह’ बची है. चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ. और इसीलिए संघ का स्वयंसेवक, हम स्वयंसेवक कहते हैं सभी को, लेकिन सबको यह विचार करना चाहिए, संघ जो हमें स्वयंसेवक कह रहा है, मैं स्वयंसेवक हूँ क्या? आज उसी का प्रश्न है. आज समस्या निवारण की लालच देकर समाज से अपना काम निकलने वाले बहुत लोग हैं. और भोला समाज उस लालच में कभी-कभी गलत लोगों के पीछे भी जाता है, उनको बड़ा भी कर देता है, फिर अपना माथा ठोकते रहता है. फिर हमारे पास आता है, कुछ करो. अब इस परिस्थिति को अगर पाटना है तो हर स्वयंसेवक को ऐसा बनना पड़ेगा. स्वयंसेवक तो हमको संघ ने कह दिया, जिस दिन पहला ध्वज प्रणाम किया, उस दिन संघ ने कहा ये हमारा स्वयंसेवक है. लेकिन स्वयंसेवक क्यों है? स्वयंसेवक बनने के लिए है. स्वयं प्रेरणा से माता की सेवा का व्रत धारा है, सत्य स्वयंसेवक बनने का सतत प्रयत्न हमारा है. सतत प्रयत्न है, खूब किया स्वयंसेवक के नाते, स्वयंसेवक जैसा जीवन जिए, और फिर लगने लगा की मैंने बहुत किया तो फिर गलत है, बहुत नहीं किया, और भी कर सकते हो और भी करने लायक है, गर्व मत करो. युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया और इतना दान दिया कि स्वर्ग में घंटा बजने लगा, सुना सब ने. सभी गर्व से फूल गए, इसके पहले कभी ऐसा नहीं हुआ, इंद्रदेव ने स्वर्ग में घंटा बजाने की आज्ञा दी, इतना दान दिया हमने (पांडवों ने). इतने में एक नेवला आया वहां पर, वो नेवला विचित्र था, था नेवले जैसा लेकिन आधा शरीर उसका सोने (स्वर्ण) का था. वो नेवला यज्ञकुंड के पास आया और वहां की भूमि की धूलि में लोटपोट हो गया, फिर अपने शरीर को देखा उसने इधर-उधर से ध्यान से, और फिर वापस जाने लगा. तो युधिष्ठिर महाराज ने पूछा कि, “आप कौन हैं? यहाँ क्यों आये हैं? और वापस क्यों जा रहे हैं बिना कुछ लिए हुए? हम तो देने के लिए बैठे हुए हैं, हमने इतना दान किया है कि स्वर्ग में घंटे बजने लगे, इतना श्रेष्ठ दान अभी तक नहीं हुआ है. आपको कुछ चाहिए तो बताइए.” तो नेवले ने उत्तर दिया कि, “मै यह देखने आया था कि क्या इतना कोई श्रेष्ठ यज्ञ है कि मेरा बाकी का शरीर सोने का कर दे, मगर मुझे बड़ी निराशा हुई, स्वर्ग में तो घंटे बज गए मगर मेरा बाकी का शरीर तो सोने का नहीं हुआ.” तो युधिष्ठिर को लगा, ऐसा कैसे हुआ? तो सुनो (नेवले ने सुनाया) “एक गरीब बेचारा, वानप्रस्थी ब्राम्हण था, वो इतनी खराब स्थिति में था कि भोजन भी बड़ी मुश्किल से कर पाता था. वो भोजन कैसे कमाता था, तो खेत जब लहलहाते हैं, पंछी कुछ दाना चुग लेते हैं, और भी प्राणी कुछ न कुछ दाने खा लेते हैं, बाद में किसान आकर काट लेते हैं, फिर वो दाना झाड़ते हैं, और घर पर ले जाते हैं, लेकिन कुछ दाने मिट्टी में गिर जाते हैं, वह उन दानों को बिनकर, उनसे अपना पेट भरता था, ऐसा तपस्वी था वह. लेकिन एक बार भयंकर अकाल पड़ा, किसी के पास कुछ नहीं बचा, मुझे भी दो-तीन दिन से कुछ नहीं मिला, और बहुत भूख लगी थी. तो उसके (ब्राह्मण के) के घर में कुछ मिलता है क्या? ऐसा देखने के लिए गया. फिर जो भूखा होता है वो बेशरम भी हो जाता है और निडर भी हो जाता है. तो जहाँ बैठे थे भोजन के लिए, वहीँ गया मैं, और देखने लगा उनके पात्रों पर आशा से. कई दिनों में, लगभग १५ दिनों में, बिन-बिन कर तकरीबन मुट्ठी भर दाने जमा हुए थे, उसको पीस कर, उसमे पानी मिलाकर,  चार भाग करके, वो, उसका लड़का, उसकी लड़की और उसकी पत्नी, चारों बैठे थे भोजन करने. मैं गया उनके यहाँ. और कहा, महाराज मेरे लिए क्या? तो उसने अपना हिस्सा दिया, मेरा पेट नहीं भरा तो पत्नी ने दिया, फिर लड़के ने दिया, और आखिरी में लड़की ने भी अपना भोजन मुझे दे दिया. और क्योंकि १५ दिन से भूखे थे, और आया हुआ अन्न मेरे पेट में चला गया, तो थोड़ी देर के बाद पूरा परिवार मर गया. मैंने तो भूख के मारे विचार नहीं किया, और वहीँ सो गया, लेकिन उठ के देखता हूँ तो वहां की धुल से मेरा आधा शरीर सोने का हो गया. मुझे लगा कि स्वर्ग की घंटियाँ बजती हैं तो तुम्हारा भी यज्ञ इतना ही शक्तिशाली होगा, लेकिन ऐसा तो है नहीं तुम्हारा.” गर्व नहीं करना, कितना भी किया हो, कितना भी कर रहे हो. सतत प्रयत्न हमारा, और भी कर सकते हैं. इतना आगे इतना आगे, जिसका कोई छोर नहीं, जहाँ पूर्णता भी मर्यादा हो, सीमाओं की डोर नहीं. समाज में भी हम ऐसे ही कहते हैं, स्वयंसेवक को कहते हैं, राष्ट्रभक्ति मेरा नाम आर०एस०एस०-आर०एस०एस०, बिलकुल मत कहना, ये गलत है. हमने ठेका नहीं लिया है, सारा समाज राष्ट्रभक्त है. पथसंचलन में ये कभी मत कहना, कौन चले, भाई कौन चले? भारत माँ के लाल चले. हम अकेले भारत माँ के लाल नहीं हैं, पूरा समाज भारत माँ का लाल है. करने के बाद भी अपना अहंकार नहीं होना चाहिए, संगठन का भी अहंकार नहीं होना चाहिए. ऐसी पूर्ण मनोवृत्ति के, केवल सेवा का अधिकार मान कर, अधिकाधिक सेवा की इच्छा रखकर, स्वयं प्रेरणा से समाज के लिए काम करने वाला, काम करने के लिए योग्य बनने की शाखा पर साधना करने वाला, वो स्वयंसेवक होता है. अब आप सोचिये अपने-अपने बारे में कि हम स्वयंसेवक कितने हैं? टोपी-निकर पहन कर यहाँ बैठे हैं तो कुछ तो स्वयंसेवक जरूर हैं सब, मेरे सहित. लेकिन स्वयंसेवकत्व के इस स्तर तक हमको जाना है, कदम बढ़ा रहे है की नहीं? पहुंचे नहीं हैं तो कोई बात नहीं, कभी न कभी तो पहुँच जायेंगे. लेकिन कदम बढ़ाते हों तभी पहूँचेंगे. रस्ते में रुक गए हों, बैठ गए हों तो कैसे पहुंचेंगे?
हम लोग राष्ट्रीय हैं, यानी हमलोग पुरे राष्ट्र का विचार करते हैं. आज हिन्दू समाज की जो दृष्टि है उसमे हम भी किसी जाति में जन्मे हैं, किसी कुल में जन्मे हैं, किसी भाषा को बोलने वाले हैं, किसी मत-सम्प्रदाय को मानने वाले हैं, किसी प्रान्त के रहने वाले हैं. थोड़ा बहुत इसका अभिमान अपने मन में भी रहता है, लेकिन अपने जीवन में कोई भी कृत्य करेंगे, किसी भी कृत्य में अपना बल लगायेंगे, तो ये सोच कर लगायेंगे की सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए ये ठीक है की नहीं. अगर राष्ट्र के लिए ठीक नहीं, और मेरे लिए ठीक होगा तो भी नहीं करेंगे. क्योंकि हम राष्ट्र के हैं, हम जाति के नहीं हैं, हम कुल के नहीं हैं, हम पंथ-सम्प्रदाय के नहीं हैं, हम भाषा के नहीं हैं, हम प्रान्त के नहीं हैं, हम पार्टी के नहीं हैं. हम राष्ट्र के हैं. उस राष्ट्र का छोटा स्वरुप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. वो विस्तारित होते-होते एकदिन राष्ट्र के साथ समव्याप्त हो जायेगा, उसके हम घटक हैं, हम राष्ट्रीय हैं.
और ये राष्ट्र कौन सा है? कैसा है? इसके बारे में बोलने में हमको कोई संकोच नहीं. उस बोलने से हमारे साथ लोग आते हों, या हमको लोग छोड़ जाते हों, हमको इसकी परवाह नहीं. हम डंके की चोट पर कहते हैं हिन्दुस्थान, हिन्दू राष्ट्र है, हिन्दुओं का है. हिन्दू धर्म संस्कृति के अनुसार चलेगा, हिन्दू समाज की इच्छा के अनुसार चलेगा. इससे सर्वांगीण उन्नति होगी हमारी, और हम बताते हैं इसकी सर्वांगीण उन्नति हम करने वाले हैं. एक सज्जन मिले, और उन्होंने कहा कि, “भाईसाहब ये तो बहुत अच्छा काम है और जल्दी बढ़ने की आवश्यकता है, बहुत ज्यादा समय नहीं है, और जल्दी बढ़ाइए, एक बात है, आप अगर ये हिन्दू-हिन्दू कहना बंद कर देते न, भारतीय कहते या सनातन ऐसा कुछ कहते, तो बहुत लोग जुड़ेंगे आपसे.” तो मैंने कहा, “बहुत लोग जुड़ेंगे, ये बात तो सही है, लेकिन हम नहीं छोड़ेंगे इस हिन्दू शब्द को, हम हिन्दू हैं, हमारा हिन्दू राष्ट्र है. हम इसी भाषा में बोलेंगे, इन्हीं शब्दों का उपयोग करेंगे. संघ तो हिन्दू और हिन्दुस्थान, इसको छोड़ेगा नहीं. हिन्दूराष्ट्र को छोड़ेगा नहीं.” तो उन्होंने कहा कि, “भाईसाहब विचार करना चाहिए, नहीं तो डूब जायेगा सब.” हमने बोला, “अगर हिन्दू, हिन्दुस्थान, और हिन्दुराष्ट्र डूबने वाला हो, तो हम उसके साथ डूबेंगे. बिना हिन्दुराष्ट्र के जीने की इच्छा हमको है ही नहीं, हम भी उसके साथ डूबेंगे, लेकिन उसको छोड़ेंगे नहीं.” क्योंकि वो सत्य है, हम सत्य पर चल रहे हैं, सत्य डूबने वाला हो, तो सत्य के साथ हम डूबेंगे. हमको बिना सत्य के रहना ही नहीं, हमको कोई पॉपुलैरिटी चाहिए ही नहीं, हमको खूब भीड़ चाहिए अपने पीछे, ऐसा भी कुछ नहीं है. सत्य है, सत्य के लिए जीना है, सत्य के साथ जीना है. हिन्दुस्थान, हिन्दुराष्ट्र है, यह सत्य है, हम सारी दुनिया को बताते हैं. जब लोग कहते थे गधा कहो, लेकिन हिन्दू मत कहो, तब भी हम यही कहते थे, और आज जब लोग कह रहे हैं, गर्व से कहो हम हिन्दू हैं, तब भी हम वही बात कह रहे हैं, क्योंकि सत्य परिस्थितियों के साथ नहीं बदलता. स्वामी विवेकानंद ने कहा है, “सत्य किसी को आदर वन्दना नहीं देता. सत्य के सामने, सब संस्कृतियों को, सब राष्ट्रों को आदर वन्दना करनी पड़ती है.” हम उस सत्य के साथ हैं. हमको बाकी किसी बात की चाह नहीं, उसी में रहना है, उसी में जीना है, उसी में मरना है. और अगर वो डूबने वाला है, तो उसी के साथ डूबना है.

नेताजी सुभाषचंद्र बोस,भारत के प्रथम स्वाधीन राष्ट्राध्यक्ष थे : इन्द्रेशजी



नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे भारत के प्रथम स्वाधीन राष्ट्राध्यक्ष: इन्द्रेशजी

स्त्रोत: vskbharat.com
बुधवार, 28 जनवरी 2015
भुवनेश्वर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य श्री इंद्रेश कुमार जी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भारत का प्रथम राष्ट्राध्यक्ष बताते हुए कहा है कि उनके नेतृत्व में गठित प्रथम स्वाधीन भारत सरकार को जापान, जर्मनी, रूस और दस अन्य देशों ने मान्यता दी थी. इतना ही नहीं, वे स्वाधीन भारतीय सेना के प्रथम सेना नायक भी थे.
नेताजी और वीर सुरेन्द्र साये की जयंती पर 23 जनवरी को संघ व्दारा आयोजित युवा सम्मेलन में इंद्रेश जी ने मुख्य वक्ता के रूप में कहा कि अगर नेताजी होते तो पिछले 60 सालों में भारत की राजनीति का चित्र काफी अलग होता. उन्होंने कहा कि जानबूझकर नेताजी, वीर सुरेन्द्र साये और स्वामी विवेकानन्द जैसे राष्ट्रनायकों को   लोगों से दूर रखा गया. इसलिये अब आने वाले दो वर्षों में इन क्रांतिकारियों के जीवन को लोगों के सामने लाने के लिये प्रयत्न जरूरी हैं.

सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में सेना के सेवानिवृत्त कर्नल हिमांशु शेखर महापात्र ने युवा पीढ़ी को अपने दृष्टिकोण में राष्ट्रीय भावना विकसित करने की सलाह दी. इस अवसर पर तीन शहीदों के परिवार को सम्मानित भी किया गया.

सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए क्षेत्रीय प्रचारक अद्वैत दत्त जी ने कहा कि आज देशभक्ति की भावना के साथ मिलजुलकर काम करना सभी समस्याओं के हल की मुख्य कुंजी है. उनके साथ संघ के भुवनेश्वर महानगर संघचालक डॉ. बसंत कुमार और उत्कल प्रांत के संघचालक समीर कुमार मोहन्ती उपस्थित थे.
 
यूनिट-8, सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में आयोजित इस सम्मेलन में 15 से 35 वर्ष की आयु के 1500 से अधिक युवकों ने भाग लिया. संघ की 50 से अधिक शाखाओं के स्वयंसेवक और भुवनेश्वर के अनेक कॉलेजों के विद्यार्थी भी सम्मेलन में उपस्थित थे.

सुबह 9 बजे आरम्भ हुए कार्यक्रम में युवकों ने देशभक्ति के गीत गाये तथा नेताजी और सुरेन्द्र साये के जीवन पर आधारित नाटक प्रदर्शित किये. मालुद के जय हनुमान अखाड़ा पाइक दल की ओर से पाइक अखाड़ा प्रदर्शित किया गया. इसके उपरांत इंद्रेश जी ने जिज्ञासु युवकों के प्रश्नों के उत्तर दिये.

दोपहर में नेताजी, वीर सुरेन्द्र साये और भारत माता के चित्रों की एक साथ विशाल शोभायात्रा निकाली गयी. हाथ में भगवा ध्वज पकड़े हुए युवकों के भारत माता की जय, वंदे मातरम तथा जय हिंद के नारों से वातावरण गूंज उठा. संघ के भुवनेश्वर महानगर के सहकार्यवाह श्री जयकृष्ण जी के नेतृत्व में श्री रिषभ नन्दा, दीपक राउत, इराशीष  आचार्य, महाविद्यालय प्रमुख श्री अखिल पाढि, संपर्क प्रमुख श्री गोपाल पाणिग्रहि, बौद्धिक प्रमुख देवी प्रसाद महापात्र, सह बौद्धिक प्रमुख श्री साई प्रसाद दास ने कार्यक्रम का कुशल संचालन किया.

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

अमेरिकी राष्ट्रपति , हनुमान भक्त बराक ओबामा !

ओबामा , प्रतिभा आडवाणी के पास  आए और बड़े गर्व से हनुमान जी की छोटी सी प्रतिमा दिखाई
The photo by Brooks Kraft that appeared in Time on June 2, 2008 shows candidate Obama displaying a palm-full of “lucky” charms.   The full photo is 




कैसे हनुमान भक्त बन गए बराक ओबामा
http://khabar.ibnlive.in.com/news/135284/1

आईबीएन-7 | Jan 27, 2015
http://khabar.ibnlive.in.com/news/135284/1

नई दिल्ली। जिंदगी के तमाम पड़ावों में, मुश्किलों में, परेशानी में, जब हौसला चाहिए होता है, हिम्मत चाहिए होती है, तब ओबामा याद करते हैं हनुमान को। एक ऐसा सहारा जो तब से उनने साथ है जब उनके पहले पिता उन्हें छोड़कर चले गए थे जब जिंदगी में दूसरे पिता आए थे।

जी हां, दुनिया के सबसे ताकतवर शख्स अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को शक्ति मिलती है भगवान हनुमान से। इस बात का चर्चा पिछले काफी सालों से होती रही है। लेकिन रविवार को पहली बार खुद बराक ओबामा ने बताया कि हनुमान जी की उनकी जिंदगी में क्या अहमियत है।

रविवार रात सवा नौ बजे के करीब जब ओबामा राष्ट्रपति भवन में खास मेहमानों से एक एक करके मिल रहे थे। कतार में बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी की बेटी प्रतिभा आडवाणी भी थीं। अपनी बारी आने पर प्रतिभा ओबामा के पास पहुंचीं और उनसे कुछ कहा। ओबामा का चेहरा बता रहा है कि उन्होंने बेहद खुशी के साथ किसी बात पर प्रतिभा की हां में हां मिलाई। ओबामा से बात करने के बाद प्रतिभा आगे बढ़ गईं। इस मुलाकात में जो बात हुई वो बेहद दिलचस्प है।

प्रतिभा आडवाणी के मुताबिक उन्होंने बराक ओबामा से कहा, गुड इवनिंग मिस्टर प्रेसिडेंट, भारत में आपका स्वागत है। आपका स्वागत कर हमें काफी खुशी हो रही है। ओबामा ने जवाब दिया- थैंक यू। फिर प्रतिभा ने उनसे कहा- जानते हैं, हम दोनों की जिंदगी में हमारा एक प्यार कॉमन है। ओबामा ने पूछा- वो क्या है? प्रतिभा ने जवाब दिया- भगवान हनुमान के लिए हमारा प्यार। ओबामा ने जवाब दिया- अरे...अच्छा। प्रतिभा ने फिर उनसे कहा- मुझे जब आपके इस प्यार के बारे में पता चला तो बड़ी खुशी हुई। फिर ओबामा बोले- मैं तो अपने पॉकेट में हर वक्त उनकी छोटी सी प्रतिमा रखता हूं।

प्रतिभा आडवाणी का कहना है कि इस बातचीत के दौरान ओबामा अपने पॉकेट में हनुमान जी की मूर्ति तलाश रहे थे। लेकिन मेहमानों से मिलने की हड़बड़ाहट में वो मूर्ति उन्हें मिली नहीं। उस वक्त तक लोग बैंक्वेट से वापस जाने लगे थे। ओबामा उस ओर गए। लेकिन कुछ ही पलों में वो प्रतिभा आडवाणी के पास वापस आए और बड़े गर्व से हनुमान जी की छोटी सी प्रतिमा दिखाई और कहा देखो मैंने इसे ढूंढ लिया, ये दरअसल मेरा लकी चार्म है। भगवान हनुमान के बारे में उनके दो भक्तों की इस बातचीत का खुलासा प्रतिभा ने आज किया।


क्यों बने ओबामा हनुमान भक्त?

आखिर ऐसा क्या हुआ जो अमेरिकी राष्ट्रपति एक हिंदू देवता का भक्त बन गया। आखिर ऐसा क्या हुआ जिसके बाद एक अमेरिकी राष्ट्रपति मुश्किल वक्त में हनुमान जी को याद करता है। इसकी कहानी जितनी पुरानी है, उतनी ही दिलचस्प भी।

हनुमान जी के साथ बराक ओबामा का प्रेम जागा था बचपन में या कहें भक्ति के बीज पड़े थे। उस वक्त बराक ओबामा सिर्फ 6 साल के थे। 1995 में लिखे ड्रीम्स फ्रॉम माई फादर के नाम से लिखे अपने यादगार अनुभवों में बराक ओबामा ने उन दिनों को याद किया है। ओबामा ने विस्तार से लिखा है कि कैसे पहली बार उन्हें पता चला था कि हनुमान नाम के भी कोई देवता हैं।

आपको बता दें कि बराक ओबामा की मां का अपने पहले पति से तभी तलाक हो गया था जब वो सिर्फ दो साल के थे। जब ओबामा पांच साल के हुए तो उनकी मां ने दूसरी शादी कर ली। ओबामा के सौतेले पिता इंडोनेशिया के रहने वाले थे। अपने दूसरे पति के साथ रहने के लिए ओबामा की मां ने भी जकार्ता चले जाने का फैसला किया। जकार्ता एयरपोर्ट से निकलने के बाद घर के रास्ते में ओबामा के पिता ने उन्हें रास्ते में एक बड़ी सी मूर्ति दिखाकर कहा-

उधर सामने की तरफ देखो। सड़क के किनारे वो दस मंजिला ऊंची इमारत जितनी मूर्ति, जिसका शरीर तो इंसान जैसा है और चेहरा बंदरों जैसा। वो हनुमान हैं। भगवान हैं। वो बहुत बड़े योद्धा थे। सौ आदमियों जितनी ताकत थी उनमें। जब वो बुरी ताकतों से लड़ते थे तो कोई भी उन्हें हरा नहीं सकता था।

ओबामा के मुताबिक उस वक्त वो हैरत से हनुमान जी की मूर्ति की तरफ देखते रहे। उस शक्तिशाली भगवान की मूर्ति ओबामा के जेहन में बस गई थी । उस दिन के बाद से ही भगवान हनुमान ओबामा के लिए हौसले, उम्मीद, शक्ति और हिम्मत का प्रतीक बन गए थे। पहले पिता के दूर जाने के बाद दुनिया की तमाम चुनौतियों का सामना करने के लिए ओबामा को ऐसी हिम्मत की जरूरत भी थी। हनुमान के तौर पर उन्हें एक ऐसा साथी मिला था, जो उन्हें हर हालात से मुकाबला करने का साहस देता था।

हर छोटा बच्चा अपने पिता में एक हीरो को देखता है। एक ऐसा हीरो जो मुसीबत में, परेशानी में उसका हाथ थामकर उस बच्चे को सारी आफतों से बाहर निकाल ले। ओबामा के पास उनका हीरो नहीं था। इसलिए उन्हें भगवान हनुमान में अपने लिए सहारा दिखता था। 6 साल की उम्र में बना वो रिश्ता आज भी कायम है।

बचपन से लेकर आज तक ओबामा की जिंदगी में आए हर अहम पड़ाव के वक्त भगवान हनुमान की झलक जरूर मिली है। अपने विरोधियों को चारों खाने चित कर देने वाले हनुमान हर वक्त ओबामा के दिल में बसे नजर आए। इस बात का भी अंदाजा लगाना जा सकता है कि संघर्ष के दिनों में युवा ओबामा को हनुमान जी से ही शक्ति मिली।

बराक ओबामा और मिशेल ओबामा की बरसों पुरानी एक तस्वीर में दोनों सोफे पर बैठे हैं और उनके पीछे दीवार पर तीन तस्वीरें नजर आती हैं। एक तस्वीर धुंधली है, लेकिन बाकी दो तस्वीरें हनुमान जी की हैं। आपको बता दें इंडोनेशिया में हनुमान जी की ऐसी ही मूर्तियों और तस्वीरों की पूजा की जाती है।

जाहिर है ओबामा की जिंदगी में वक्त -वक्त पर हनुमान की झलक सार्वजनिक भी होती रही है। किताब हो, पेंटिंग हो या फिर साल 2008 के अमेरिकी चुनाव। तब बराक ओबामा को खास तौर पर हनुमान जी की 2 फीट की मूर्ति भिजवाई गई थी। ये मूर्ति सौंपी गई थी ओबामा के भारतीय प्रतिनिधि को। उनकी तरफ से ये भी कोशिश की गई थी चुनाव के नतीजे आने से पहले ये मूर्ति ओबामा तक पहुंच जाए।

पीतल की इस मूर्ति का वजन 15 किलो था और उस पर सोने का पानी चढ़ा था। कहते हैं जब ओबामा के करीबियों से उस वक्त इस मूर्ति के बारे में पूछा गया तो वो सिर्फ मुस्करा दिए थे। वो ओबामा के इस राज को सार्वजनिक नहीं करना चाहते थे। मूर्ति के साथ ही ओबामा को हनुमान चालीसा की एक प्रति भी भेंट की गई थी। ये भी दिलचस्प है कि जिस दिन चुनाव के नतीजे आए उस दिन मंगलवार था और ओबामा की हनुमान भक्ति के बारे में जानने वाले यही कह रहे थे कि उनका मंगल होगा और हुआ भी वही। ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति चुन लिए गए।

ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद भारत को लेकर भी अमेरिकी प्रशासन का रवैया बदला। व्हाइट हाउस में प्रशासन ने जानना शुरू किया कि हिंदू धर्म क्या है, उसके मूल्य क्या हैं, हनुमान क्या हैं। ये ओबामा की हनुमान भक्ति ही थी कि साल 2009 में पहली बार व्हाइट हाउस में आधिकारिक तौर पर दीवाली का दीया जलाया गया। मैरिलैंड में बने शिव-विष्णु मंदिर के मुख्य पुजारी ने बाकायदा मोदी से पूजा कराई तमाम मेहमानों की मौजूदगी में ओबामा ने दीप प्रज्वलित किया।

इस मौके पर मौजूद हर मेहमान को दीवाली का तोहफा भी दिया गया। इसके बाद मुख्य पुजारी ने बराक ओबामा को लाल रंग की ये खूबसूरत शॉल पहनाई। बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक इस त्योहार से ओबामा हमेशा बहुत प्रभावित रहे। ये जश्न जितना भगवान राम की जीत का है उतना ही हनुमान की भक्ति का भी। व्हाइट हाउस में इसके बाद ओबामा ने एक और परंपरा शुरू की। दीवाली पर उनकी तरफ से एक रिकॉर्डेड संदेश जारी किया जाने लगा।

दीवाली के साथ ओबामा का गहरा रिश्ता एक बार फिर नजर आया साल 2010 में। ओबामा के भारत दौरे का कार्यक्रम इस तरह बनाया गया कि दीवाली के वक्त वो भारत में रहें। एजेंसियों की मानें तो भारत दौरे में बराक ओबामा और मिशेल ने भगवान गणेश और हनुमान जी की मूर्तियां खरीदीं। इनमें से कुछ मूर्तियां उन्होंने बेटियों को तोहफे में दी। हनुमान की धरती से ओबामा का प्यार पूरे दौरे में साफ नजर आया।

पहले दौरे को कामयाबी से निपटाने के बाद ओबामा अमेरिका लौट गए। इस दौरे के बाद व्हाइट हाउस में हनुमान जी और दीवाली के लिए बनी खास जगह और खास हो गई। अगले साल दीवाली आई तो बराक ओबामा ने एक बार फिर व्हाइट हाउस में दीए जलाए। व्हाइट हाउस ने अपने संदेश में कहा भी कि ओबामा पहले राष्ट्रपति हैं जिन्होंने दीवाली को आधिकारिक तौर पर मनाया। ओबामा की ये भक्ति देख देश में भी संत खुश हैं। उनकी मानें तो हनुमान भक्ति ने ही ओबामा को इस मुकाम तक पहुंचाया है।

बराक ओबामा कभी खुलेआम ये स्वीकारने में नहीं हिचकिचाते कि वो हनुमान के भक्त हैं। ओबामा की ये भक्ति देख उनके प्रशंसकों में भी हनुमान जी को लेकर दिलचस्पी बढ़ रही है। कहते हैं एक बार ओबामा की कट्टर समर्थक और चैट शो होस्ट ओप्रा विन्फ्रे ने भारत आने की तैयारी कर ली थी। सिर्फ ये जानने के लिए कि हनुमान जी का जन्म कहां हुआ था। हालांकि स्वाइन फ्लू के चलते उन्हें वो दौरा रद्द करना पड़ा था। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ईसाई धर्म को मानने वाले बराक ओबामा को असल जिंदगी में शक्ति कहां से मिलती है।

ओबामा : भारत और अमरीका विविधता में एकता वाले देश


 ओबामा के भाषण की 12 ख़ास बातें


 अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दिल्ली के सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम में शहर के युवाओं और अन्य निवासियों को संबोधित करते हुए अमरीका को भारत का बेस्ट पार्टनर बताया. उन्होंने भारत में विविधता का ज़िक्र करते हुए ज़ोर देकर कहा कि अमरीका और भारत की सबसे बड़ी ताकत दोनों की अनेकता में एकता है.

भारत और अमरीका विविधता में एकता वाले देश हैं और दोनों देशों को इसे बचाना और बढ़ाना चाहिए.

1 . अमरीका के मार्टिन लूथर किंग गांधी जी से प्रेरित थे. ये बात दोनों देशों को जोड़ती है.

2 . भारत और अमरीका विविधता में एकता वाले देश हैं और दोनों देशों को इसे बचाना और बढ़ाना चाहिए.

3 .   एक और संपर्क है. एक समय विवेकानंद आए थे अमरीका..वो भी मेरे शहर शिकागो में और हिंदू धर्म का संदेश दिया था. उनके शब्द थे अमरीका के भाईयो और बहनो. मैं वो शब्द दोहराता हूं...भाइयो और बहनो

4 . हर धर्म का सम्मान होना चाहिए और धर्म के प्रचार प्रसार की आज़ादी भी.

5 . अमरीका चाहता है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार हो और भारत को स्थायी सीट मिले.

6 . भारत और अमरीका में ही ये हो सकता है कि एक कुक का बेटा राष्ट्रपति बन सकता है और एक चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री.

7 . किसी भी देश के बारे में इससे ज्यादा पता चलता है कि वो अपनी महिलाओं को कैसे ट्रीट करता है. भारत में मेरा स्वागत एक महिला कमांडिंग अधिकारी ने स्वागत किया.

8 . हम चाहते हैं कि ऐसी दुनिया बने जहां परमाणु हथियार न हों और इसमें भारत को भी भूमिका निभानी होगी.

9 . भारत में अधिकांश आबादी 30 साल से कम की है. नई दुनिया कैसी होगी ये तय करने की ज़िम्मेदारी इन्हीं युवाओं की है

10 . हम पिछली बार आए थे तो मुंबई में हमने दीवाली मनाई थी. डांस वगैरह भी किया था. इस बार डांस का कार्यक्रम नहीं हो सका.

11 .गणतंत्र दिवस में मुझे मुख्य अतिथि बनाने के लिए मैं यही कहूंगा...बहुत धन्यवाद.

1 2 . ओबामा ने अपने भाषण का अंत भी हिंदी में - जय हिंद - से किया.

भारत-अमेरिका : सुधरते रिश्तों ने शेयर बाजार को लगाए पंख



अमेरिका से सुधरते रिश्तों ने बाजार को लगाए पंख
जागरण Tue, 27 Jan 2015
मुंबई। दलाल स्ट्रीट में मंगलवार को लगातार आठवें सत्र में तेजी का दौर बना रहा। भारत-अमेरिका के सुधरते कारोबारी रिश्तों से उत्साहित निवेशकों ने शेयरों में चौतरफा लिवाली की। इससे बंबई शेयर बाजार (बीएसई) का सेंसेक्स 292.20 अंक यानी एक फीसद उछलकर नए शिखर पर पहुंच गया। यह संवेदी सूचकांक 29571.04 अंक के रिकॉर्ड स्तर पर बंद हुआ। इसी प्रकार नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी भी 74.90 अंक की छलांग लगाकर 8900 अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया। यह 8910.50 अंक पर बंद हुआ।

विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआइआइ) बाजार में बड़े लिवाल बने हुए हैं। भारत के साथ कारोबार को बढ़ावा देने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चार अरब डॉलर के निवेश का एलान किया है। इसने निवेशकों का मनोबल बढ़ाया। ओबामा की भारत यात्रा के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में हुए समझौतों से भी बाजार का माहौल गरम रहा। इसमें वह करार विशेष रूप से शामिल है जिसके तहत अमेरिकी कंपनियां भारत में परमाणु संयंत्र बना सकेंगी।

तीस शेयरों वाला सेंसेक्स इस दिन 29451.65 अंक पर मजबूत खुला। इसका निचला स्तर 29286.09 अंक रहा। अंतिम कारोबारी घंटों में निवेशकों की तेज लिवाली के चलते सेंसेक्स ने 29618.59 अंक का स्तर छुआ।

बीएसई के सूचकांकों में बैंकिंग, कैपिटल गुड्स, ऑटो, एफएमसीजी और रीयल एस्टेट कंपनियों के शेयरों में निवेशकों ने ज्यादा दिलचस्पी ली। इसके उलट आइटी और टेक्नोलॉजी खंड की कंपनियों के शेयरों को बिकवाली की मार पड़ी। सेंसेक्स की तीस कंपनियों में 19 के शेयर बढ़े, जबकि 11 में गिरावट दर्ज की गई।

रविवार, 25 जनवरी 2015

नेहरूजी ने गणतंत्र दिवस परेड में संघ के स्वयंसेवकों को आमंत्रित किया था



गणतंत्र दिवस परेड में स्वंय सेवक
इतिहास के झरोखे से -
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्र हितैषी भूमिका
  http://www.krantidoot.in/2014/11/blog-post_30.html 
नेहरू जी के विशेष आग्रह पर 1963 में गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेते संघ स्वयंसेवक

सामान्यतः आज की पीढ़ी के अधिकाँश लोगों को ज्ञात नही है कि 1962 में भारत चीन युद्ध के समय आरएसएस स्वयंसेवकों द्वारा भारतीय सशस्त्र सेनाओं की जो सहायता की गई उसके आभार स्वरुप 1963 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. जवाहर लाल नेहरू ने गणतंत्र दिवस की परेड में आर एस एस को आमंत्रित किया था |
1962 में चीन युद्ध के दौरान आरएसएस के स्वयंसेवक व्यापक तौर पर सरकारी कार्यों में सहयोग और विशेष रूप से जवानों के लिए समर्थन जुटाने में जुट गए थे | पंडित नेहरू ने 26 जनवरी 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए संघ को आकस्मिक रूप से आमंत्रित किया किन्तु एक मात्र दो दिन की सूचना पर 3500 से अधिक स्वयंसेवकों ने पूर्ण संघ गणवेश में परेड में भाग लिया जोकि मार्च कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण बन गया | बाद में कुछ कांग्रेसी नेताओं ने संघ को निमंत्रित किये जाने के पंडित नेहरू के निर्णय पर आपत्ति जताई तो उन आपत्तियों को दरकिनार कर नेहरू जी ने कहा कि सभी देशभक्त नागरिकों को परेड में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था |
श्री जवाहर लाल नेहरू ने आरएसएस स्वयंसेवकों की भावना को देखते हुए यहां तक कहा कि “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया !”
इन दिनों कांग्रेस और अन्य छद्म धर्मनिरपेक्ष नेताओं के बीच एक फैशन सा है कि लोगों को आरएसएस और संघ परिवार के बारे में मिथ्या प्रचार करो कि वे नफरत फैलाते हैं, सांप्रदायिक तनाव पैदा करते है और समाज को विभाजित करते हैं |
दुनिया के सबसे बड़े और सबसे सम्मानित स्वयंसेवी संगठन के खिलाफ जहर उगलने से पहले इन तथाकथित छद्म धर्मनिरपेक्ष नेताओं को भारत के इतिहास को पढ़ना चाहिए | महात्मा गांधी की हत्या के मामले में भी कानून की अदालत में स्पष्ट तौर पर कहा गया कि यह एक व्यक्ति का दुष्कृत्य था तथा इसके पीछे कोई संगठन नही जुड़े थे | उन्हें पता होना चाहिए कि उनके अपने आदर्श और नायक आरएसएस का सम्मान करते रहे हैं तथा उन्होंने समय समय पर संघ की प्रशंसा भी की है |
सन 1934 में जब गांधी जी वर्धा में आयोजित 1500 संघ स्वयंसेवकों के एक शिविर में पहुंचे तब यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि स्वयंसेवक एक दूसरे की जाति से अनजान थे | वहां अस्पृश्यता जैसी कोई चर्चा ही नहीं थी | इस अनुभव ने गांधी जी को इतना अधिक प्रभावित किया ने 13 साल बाद भी उन्होंने इसे स्मरण रखा तथा इसका उल्लेख किया | 16 सितंबर 1947 को दिल्ली की भंगी कालोनी में संघ के कार्यकर्ताओं के समक्ष अपने संबोधन में उन्होंने कहा था कि “जब संघ संस्थापक श्री हेडगेवार जिंदा थे, मैंने आरएसएस के शिविर का दौरा किया था तथा अनुशासन, अस्पृश्यता के पूर्ण अभाव और कठोर सादगी से प्रभावित हुआ था | तब से मैं मानता हूँ कि संघ सेवा और आत्म बलिदान के उच्च आदर्श से प्रेरित है, जो किसी भी संगठन की ताकत होता है" (हिंदू : 17 सितंबर, 1947 ) .
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर 1939 में पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में गए तो वे भी इस द्रश्य से आश्चर्यचकित रह गए कि वहां स्वयंसेवक बिना एक दूसरे की जाति पता किये पूर्ण समानता और भाईचारे के साथ रह रहे हैं | जब उन्होंने डॉ. हेडगेवार से पूछा कि शिविर में कितने अछूत हैं तो उन्होंने उत्तर दिया कि यहाँ केवल हिन्दू हैं, न तो स्पर्श्य न अस्पर्श्य | यहाँ छूत - अछूत का कोई विचार नहीं करता |
विभाजन के बाद कश्मीर के महाराजा एक स्वतंत्र राज्य के रूप में कश्मीर को बनाए रखने के इच्छुक थे | सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भारत में शामिल होने के लिए महाराजा को समझाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु गोलवलकर को भेजा था | श्रीगुरुजी 17 अक्टूबर 1947 को वायुयान द्वारा श्रीनगर पहुंचे | श्री गुरुजी के साथ विचार विमर्श के बाद अंततः महाराजा ने भारत के साथ विलयपत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए सहमति दी | श्रीगुरुजी ने 19 अक्टूबर को नई दिल्ली लौटकर विलय हेतु महाराजा की सहमति के सम्बन्ध में सरदार पटेल को सूचना दी |
विभाजन के बाद दिल्ली मुस्लिम लीग द्वारा हिंसा और साजिशों की चपेट में था | महान विद्वान और भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित डा. भगवान दास ने उन संकटपूर्ण दिनों में आरएसएस की भूमिका का विवरण पता करने का प्रयत्न किया | 16 अक्टूबर 1948 को उन्होंने लिखा कि " मुझे विश्वस्त रूप से ज्ञात हुआ है कि आरएसएस के स्वयंसेवकों ने सरदार पटेल और नेहरू जी को सूचित किया कि ` लीगियों ने सरकार के सभी सदस्यों और सभी हिंदू अधिकारियों के साथ हजारों हिन्दुओं की हत्याकर 10 सितंबर 1947 को तख्ता पलट की योजना बनाई है तथा उनका इरादा लाल किले पर पाकिस्तान का झंडा फहराकर समूचे हिन्दुस्थान को सीज कर देने का है |
उन्होंने आगे कहा कि मैं यह सब क्यों कह रहा हूँ ? यदि उन उत्साही और आत्माहुति को तत्पर युवाओं ने नेहरू जी और पटेल जी को समय पर सूचना नहीं दी होती तो आज कोई भारत सरकार ही नहीं होती | सम्पूर्ण देश का नाम बदलकर पाकिस्तान हो गया होता | करोड़ों हिन्दू काट दिए जाते और शेष इस्लाम स्वीकारने या गुलामी करने के लिए विवश होते |
कांग्रेस नेताओं ने कब कब क्या कहा था ?
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन विदेशी गणमान्य व्यक्तियों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ आरएसएस शाखा में पहुंचे जो भारी भारी बारिश के बावजूद चल रही थी | शाखा में शामिल अनुसंधान विद्वानों , व्याख्याताओं , ग्रेजुएट और स्नातकोत्तर छात्रों से मिलकर आगंतुक और राधाकृष्णन बेहद खुश और प्रभावित हुए |

सर्वप्रमुख घटना है जब गांधीजी ने मीरा बेन और महादेव देसाई के साथ वर्धा में 24 दिसंबर, 1934 को एक आरएसएस शिविर का दौरा किया | उनके सम्मान में आयोजित परेड देखने पर , उन्होंने कहा: " मैं काफी खुश हूँ | मैंने इसके पहले देश में कहीं इस प्रकार का द्रश्य नहीं देखा है |"वे इस बात से अत्यंत प्रभावित हुए कि शिवर में न तो जाति भेद है और न अस्पृश्यता | अपनी यात्रा के अंत में उन्होंने घोषित किया कि जो कुछ उन्होंने आरएसएस में देखा बैसा इसके पूर्व कहीं नहीं देखा |
" आप हर द्रष्टि से उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं | अगर कोई कमी है तो केवल यह कि यह संगठन " अन्य धर्मों के लोगों को स्वीकार नहीं करता है” | गांधी जी के आमंत्रण पर अगले दिन डॉ. हेडगेवार वर्धा पहुंचे और गांधी जी के सभी प्रश्नों का उत्तर दिया और संगठन के बारे में उठाये गए मुद्दों को स्पष्ट किया |
मैंने आरएसएस के शिविर का दौरा किया था और उनके अनुशासन और अस्पृश्यता के पूर्ण अभाव से प्रभावित हुआ था | - आरएसएस रैली में महात्मा गांधी , दिल्ली 1947/09/16
कांग्रेस में जो लोग सत्ता में हैं वे सोचते हैं कि वे अपने प्रभाव से आरएसएस को कुचलने में सक्षम हैं | किन्तु आप डंडे के जोर से आरएसएस जैसे संगठन को नहीं दबा सकते हैं बैसे भी आरएसएस डंडे का उपयोग राष्ट्र की रक्षा के लिए करता है | अंततः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक महान देशभक्त हैं | वे अपने देश से प्यार करते है | - 16 जनवरी 1948 को लखनऊ की एक सार्वजनिक सभा में सरदार वल्लभ भाई पटेल

मैं अचंभित हूँ कि स्वयंसेवक दूसरों की जाति पता किये बिना पूर्ण समानता और भाईचारे के साथ आगे बढ़ रहे हैं | - पुणे शिविर में बाबा साहेब अंबेडकर, मई 1939

20 नवंबर, 1949 को डॉ. जाकिर हुसैन ने मुंगेर की एक मिलाद महफ़िल में कहा कि " मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा और घृणा फैलाने के जो आरोप आरएसएस के विरुद्ध लगाए जाते हैं, पूरी तरह गलत हैं | मुसलमानों को आरएसएस से आपसी प्यार का सबक, पारस्परिक सहयोग और संगठन सीखना चाहिए " | - डॉ. जाकिर हुसैन
3 नवंबर 1977 को पटना में आयोजित आरएसएस के प्रशिक्षण शिविर में जयप्रकाश नारायण ने कहा, " इस क्रांतिकारी संगठन ने एक नया भारत बनाने की जिस चुनौती को हाथ में लिया गया है उससे मुझे महान उम्मीद है | मैं पूरे दिल से आपके उद्यम का स्वागत करता हूँ |".............आपका क्रांतिकारी संगठन सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में अग्रणी है | तुममें अकेले जातिवाद समाप्त करने और गरीब की आँखों से आँसू पोंछने की क्षमता है |
आरएसएस का नाम पूरे देश में नि: स्वार्थ सेवा के लिए एक सुपरिचित शब्द है | - कोका सुब्बा राव , सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट . भारत , 1968/08/25
आरएसएस ने पंजाब , दिल्ली और अन्य स्थानों पर इंदिरा गांधी की हत्या के पहले और बाद में हिंदू सिख एकता को बनाए रखने में एक सम्मानजनक भूमिका निभाई है . - रविवार कॉलम में सरदार खुशवंत सिंह
भ्रष्टाचार से ध्यान हटाने के लिए कांग्रेस के नेताओं द्वारा आरएसएस की छवि धूमिल करने के प्रयास कोई आश्चर्य की बात नहीं है | लंबे वर्षों से स्वयंभू छद्म धर्मनिरपेक्ष राजनेता एक सांप्रदायिक संगठन के रूप में आरएसएस की आलोचना करते रहे हैं | आलोचकों को पहले प्रमुख लोगों द्वारा पूर्व में व्यक्त किये विचारों को जानने की जहमत उठाना चाहिए |
1967 के आम चुनाव के बाद से आरएसएस को हव्वा बताकर मुसलमानों को जताया जाता है कि आलोचक ही धर्मनिरपेक्षतावादी हैं जबकि आज भी मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के बेनर तले राष्ट्रभक्त मुसलमान संघ स्वयंसेवकों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर देश और समाजहित में कार्य कर रहे हैं |

एटमी डील को लेकर मतभेद दूर : मोदी-ओबामा ने लिखा नया अध्याय



पीएम नरेंद्र मोदी से हाथ मिलाते अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा
मोदी-ओबामा ने लिखा रिश्ते का नया अध्याय, एटमी डील को लेकर सारे मतभेद दूर
aajtak.in [Edited By: अमरेश सौरभ] | नई दिल्ली, 25 जनवरी 2015
http://aajtak.intoday.in/story/narendra-modi-and-barack-obama-joint-statement-after-bilateral-talks-1-796772.html
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ मिलकर दोनों देशों के बीच रिश्ते को नई बुलंदी तक पहुंचा दिया है. भारत और अमेरिका के बीच न्यूक्लियर डील पर फंसा पेच अब खत्म हो गया है. इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी को अमेरिका का समर्थन मिल गया है. अमेरिका रक्षा क्षेत्र में भी भारत की मदद करने को तैयार है. एटमी डील पर आगे बढ़ेंगे भारत और अमेरिका

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हाल के दिनों में भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते में नया उत्साह और भरोसा पैदा हुआ है. उन्होंने कहा कि इस रिश्ते की सफलता से हमारी तरक्की होगी और दुनिया में भी स्थ‍िरता और संपन्नता बढ़ेगी.

अमेरिका से परमाणु करार की बाधा दूर
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से बातचीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि छह साल पहले हुए असैन्य परमाणु करार को लेकर अब दोनों अपने कानून, अपनी अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही, तकनीकी व वाणिज्यिक सहयोग की दिशा में बढ़ रहे हैं. साथ ही दोनों देश आतंकवाद से लड़ने के लिए व्यापक रणनीति की जरूरत पर सहमत हुए हैं.

मोदी ने कहा, ‘मुझे खुशी है कि हम छह साल पहले हुए अपने द्विपक्षीय समझौते (असैन्य परमाणु करार) को लेकर आगे बढ़ रहे हैं.’ उन्होंने कहा कि असैन्य परमाणु करार हमारे बदलते रिश्तों का एक केंद्र बिन्दु और एक नए विश्वास का प्रतीक भी है. पिछले चार महीनों में हमने इसे आगे ले जाने पर दृढ़ता से काम किया है.'


आतंकवाद के ख‍िलाफ भारत-अमेरिका
मोदी ने कहा, ‘आतंकवाद पूरी दुनिया के लिए खतरा बना हुआ है. आतंकवाद की मौजूदा चुनौतियां बने रहने के बीच यह एक नया रूप रूप ले रहा है. हम इस बात पर सहमत हुए हैं कि हमें इससे लड़ने के लिए एक व्यापक रणनीति और नजरिया अपनाने की जरूरत है.’

प्रधानमंत्री ने साथ ही इस बात पर भी जोर दिया कि आतंकी गुटों के बीच कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘हर देश आतंकी पनाहगाहों को खत्म करने और आतंकियों को न्याय के कटघरे में लाने की अपनी प्रतिबद्धताओं को अवश्य पूरा करे.’

उन्होंने कहा, ‘हम दोनों देश आतंकी समूहों के खिलाफ अपने द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग को और गहरा करेंगे. हम अपनी आतंकवाद विरोधी क्षमताओं को और मजबूत बनाएंगे, जिसमें प्रौद्योगिकी का क्षेत्र भी शामिल है.’

जलवायु परिवर्तन पर बोले मोदी- भारत पर दबाव नहीं
जलवायु परिवर्तन को लेकर दोनों देशों के बीच सहमति के बारे में पूछे जाने पर प्रधानमंत्री ने कहा कि चीन और अमेरिका के बीच जलवायु परिवर्तन को लेकर जो समझौता हुआ है, उसका भारत पर दबाव नहीं पड़ेगा. भारत एक सम्प्रभु देश है और उस पर किसी देश या व्यक्ति का दबाव नहीं आता है. उन्होंने कहा, ‘हां, यह दबाव जरूर है कि भावी पीढ़ी को हम कैसी पृथ्वी देना चाहते हैं. जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग बहुत बड़ा विषय है. जिनके मन में भावी पीढ़ी को लेकर चिंताएं हैं, उनका दायित्व है कि वे इसके प्रति सचेत बने.’ उन्होंने कहा कि यह दबाव हर सरकार, हर देश और हर व्यक्ति पर होना चाहिए और उसी दबाव पर हम अपनी भूमिका निभा रहे हैं

दिल्ली के हैदराबाद हाउस में मीडिया के सामने ओबामा का शुक्रिया अदा करते हुए मोदी ने कहा, 'यह हमारे के लिए खुशी की बात है कि आपने हमारा न्योता कबूल किया. हाल के महीनों में भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते में सकारात्मक बदलाव आया है. आपसी रिश्ते की कामयाबी से पूरी दुनिया में खुशहाली आएगी.'

PM मोदी ने साफ किया कि अमेरिका के साथ भारत का रिश्ता कभी भी शक में घेरे में नहीं था. उन्होंने कहा, 'हमें एक अच्छी शुरुआत को लंबे समय तक चलने वाली तरक्की के रूप में बदलना होगा. अगले कुछ सालों में हम इन समझौतों को और ऊंचाई पर ले जाएंगे'

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत को यह सीट दिलाने का भरोसा दिलाया है.

दोनों देशों के बीच समझौतों का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा, 'डिजि‍टल युग में हमें नए तरीके से आगे बढ़ना होगा. हम समुद्री सुरक्षा को लेकर भी समझौते की तरफ आगे बढ़े हैं. हमने सामरिक तौर पर भी साथ आने की बात की.'

मोदी ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ आतंकवाद को खत्म करने के लिए और आतंकवाद को पनाह मिलने वाली जगह को खत्म करने पर बात हुई. आतंकवाद निरोध पर भी चर्चा हुई.

PM ने कहा कि अर्थव्यवस्था व व्यापार को लेकर हम अमेरिका के साथ आगे बढ़े हैं. मोदी ने डिजिटल टेक्नोलॉजी, अक्षय ऊर्जा पर भी साथ काम करने का भरोसा जताया.

'हॉटलाइन' से बढ़ेगी रिश्ते में गरमाहट
दोनों देशों ने अमेरिकी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री, साथ ही दोनों ओर के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच ‘हॉटलाइन’ स्थापित करने पर सहमति जताई. प्रधानमंत्री ने बताया कि दोनों देशों ने अपने बढ़ते रक्षा सहयोग को एक नये स्तर तक ले जाने का भी निर्णय किया है. उन्होंने कहा, ‘हमने अत्याधुनिक रक्षा परियोजनाओं के लिए भी सिद्धांत के तौर सहमति जताई है. इससे हमारे घरेलू रक्षा उद्योगों की तरक्की में मदद मिलेगी.’

भारत के साथ रिश्ता टॉप प्रायोरिटी पर: बराक ओबामा
बराक ओबामा ने अपने संबोधन में कहा कि अमेरिका के लिए भारत के साथ रिश्ता टॉप प्रायोरिटी पर है. ओबामा ने कहा, 'हम दोनों देश दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था हैं. अमेरिका में लाखों भारतीय रहते हैं. हमारे रिश्ते बेहद गहरे हैं.'

ओबामा ने कहा, 'जिस देश में अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और सरकार मजबूत होती है, वहां आतंकवाद जड़ें नहीं जमा पाता है.' उन्होंने आतंकवाद के ख‍िलाफ मिलकर लड़ने की बात कही.

ओबामा ने इकोनॉमी का जिक्र करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि हमारे बीच सामरिक अभ्यास भी बढ़े हैं.

एनर्जी सेक्टर में भारत की तरक्की को स्वीकारते हुए ओबामा ने कहा कि भारत तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि अमेरिका भारतीय शहरों में स्वच्छ हवा के लिए मिलकर प्रोजेक्ट शुरू करेगा.

ओबामा ने आगे की योजना के बारे में कहा, 'एश‍िया पैसिफिक के लिए दोनों ही देशों ने प्लान तैयार किया है.' उन्होंने अफगानिस्तान में सहयोग के लिए भारत को शुक्रिया कहा.

दिलचस्प बात यह रही कि ओबामा ने 'नमस्कार' शब्द के साथ सभी का अभ‍िवादन किया. उन्होंने भारत में गणतंत्र दिवस पर चीफ गेस्ट के तौर पर बुलाने के लिए पीएम मोदी के प्रति आभार जताया.

ओबामा ने कहा, मोदी मुझसे कम सोते हैं



साझा बयान जारी करते राष्ट्रपति ओबामा ओर प्रधानमंत्री मोदी
                                 aajtak.in [Edited By: स्वपनल सोनल] | नई दिल्ली, 25 जनवरी 2015
http://aajtak.intoday.in
रविवार सुबह पालम एयरपोर्ट पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगाया. हैदराबाद हाउस में चाय की केतली की गर्माहट दोनों के रिश्तों में घुलती दिखी, तो साझा बयान के दौरान प्रधानमंत्री ने ओबामा के साथ दोस्ती की नई केमिस्ट्री पर खुशी जताई. दोनों नेताओं के बीच रिश्तों की यह इबारत और भी पक्की तब हुई, जब ओबामा ने हंसी-ठिठोली में सही, यह जता दिया कि दोनों आपस में राजनीति से इतर आपसी मुद्दों पर, यहां तक कि सोने की आदतों पर भी चर्चा करते हैं.

हैदराबाद हाउस में साझा बयान के दौरान एक सवाल का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि उनमें और बराक ओबामा में अच्छी दोस्ती हो गई है और दोनों के बीच जो बातचीत हुई है, उसे पर्दे में ही रहने देना बेहतर है. मोदी ने कहा, 'मैं और बराक अब अच्छे दोस्त हो गए हैं. हमने कई मुद्दों पर बातचीत की, जिन्हें पर्दे में रहने दिया जाए, तो अच्छा है. हमने आपस में मजाक भी साझा करते हैं.'

दूसरी ओर, बराक ओबामा ने पीएम की बात पर स‍हमति जताते हुए कहा, 'यह सच है कि हमने कई मुद्दों पर बात की. हमने यह भी बात की कि कौन कितना सोता है और मुझे प्रधानमंत्री ने बताया कि वह मुझसे भी कम सोते हैं. हालांकि इसका एक कारण यह हो सकता है कि वह अभी नए हैं. मुझे लगता है जब उन्हें भी शासन करते हुए 6 साल हो जाएंगे, तो उनकी नींद एक घंटे बढ़ जाएगी.'

राष्ट्र ध्वज



                                                           हिंदू भगवा ध्वज

http://www.ugtabharat.com 

विजय कुमार सिंघल
भगवा ध्वज हिन्दू संस्कृति और धर्म का शाश्वत प्रतीक है। यह हिन्दू धर्म के प्रत्येक आश्रम, मन्दिर पर फहराया जाता है। यही श्रीराम, श्रीकृष्ण और अर्जुन के रथों पर फहराया जाता था और छत्रपति शिवाजी सहित सभी मराठों की सेनाओं का भी यही ध्वज था। यह धर्म, समृद्धि, विकास, अस्मिता, ज्ञान और विशिष्टता का प्रतीक है। इन अनेक गुणों या वस्तुओं का सम्मिलित द्योतक है अपना यह भगवा ध्वज।
भगवा ध्वज का रंग केसरिया है। यह उगते हुए सूर्य का रंग है। इसका रंग अधर्म के अंधकार को दूर करके धर्म का प्रकाश फैलाने का संदेश देता है। यह हमें आलस्य और निद्रा को त्यागकर उठ खड़े होने और अपने कर्तव्य में लग जाने की भी प्रेरणा देता है। यह हमें यह भी सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य
स्वयं दिनभर जलकर सबको प्रकाश देता है, इसी प्रकार हम भी निस्वार्थ भाव से सभी प्राणियों की नित्य और अखंड सेवा करें।
यह यज्ञ की ज्वाला का भी रंग है। यज्ञ सभी कर्मों में श्रेष्ठतम कर्म बताया गया है। यह आन्तरिक और बाह्य पवित्रता, त्याग, वीरता, बलिदान और समस्त मानवीय मूल्यों का प्रतीक है, जो कि हिन्दू धर्म के आधार हैं। यह केसरिया रंग हमें यह भी याद दिलाता है कि केसर की तरह ही हम इस संसार को महकायें।
भगवा ध्वज में दो त्रिभुज हैं, जो यज्ञ की ज्वालाओं के प्रतीक हैं। ऊपर वाला त्रिभुज नीचे वाले त्रिभुज से कुछ छोटा है। ये त्रिभुज संसार में विविधता, सहिष्णुता, भिन्नता, असमानता और सांमजस्य के प्रतीक हैं।
ये हमें सिखाते हैं कि संसार में शान्ति बनाये रखने के लिए एक दूसरे के प्रति सांमजस्य,
सहअस्तित्व, सहकार, सद्भाव और सहयोग भावना होना आवश्यक है।
भगवा ध्वज दीर्घकाल से हमारे इतिहास का मूक साक्षी रहा है। इसमें हमारे पूर्वजों, ऋषियों और माताओं के तप की कहानियां छिपी हुई हैं। यही हमारा सबसे बड़ा गुरु, मार्गदर्शक और प्रेरक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने किसी व्यक्ति विशेष को अपना गुरु नहीं माना है, बल्कि अपने परम पवित्र भगवा ध्वज को ही गुरु के रूप में स्वीकार और अंगीकार किया है। साल में एक बार हम सभी स्वयंसेवक अपने गुरु भगवा ध्वज के सामने ही अपनी गुरु दक्षिणा समर्पित करते हैं. मौलिक भगवा ध्वज में कुछ भी लिखा नहीं जाता।
लेकिन मंदिरों पर लगाये जाने वाले ध्वजों में ओउम् आदि लिखा जा सकता है। इसी प्रकार संगठन या व्यक्ति विशेष के ध्वज में अन्य चिह्न हो सकते हैं, जैसे अर्जुन के ध्वज में हनुमान का चिह्न था। लेकिन किसी भी स्थिति में उनका रंग भगवा ही होना चाहिए।
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                                   डा.हेडगेवार, राष्ट्र-ध्वज और कांग्रेस - कृष्णानंद सागर
http://panchjanya.com/arch/2009/4/12/File31.htm
पूर्ण स्वातंत्र्य के अग्रदूत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार की मान्यता थी कि भारत अत्यंत प्राचीन काल से एक राष्ट्र है और राष्ट्र जीवन के सभी प्रतीक, यहां सदा विद्यमान रहे हैं। फलत: हमारी राष्ट्रीय आकांक्षाओं, जीवन की आध्यात्मिक दृष्टि एवं सम्पूर्ण इतिहास के गौरव को हमारे सम्मुख रखने वाला भगवा ध्वज सदैव से राष्ट्र के मानबिन्दुओं के रूप में हमारे आदर और श्रद्धा का केन्द्र रहा है। इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कभी यह विचार करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी कि संघ का ध्वज कौन सा हो। परंपरा से चले आ रहे राष्ट्रध्वज रूपी भगवाध्वज को ही संघ ने अपने ध्वज के नाते अपना लिया।

किंतु राजनीतिक क्षेत्र में भारत के राष्ट्रीय ध्वज के संबंध में लोगों में बहुत अज्ञान दिखायी देता है। सन् 1906 से लेकर 1929 तक विभिन्न व्यक्तियों और विभिन्न संस्थाओं ने अपनी-अपनी कल्पना के अनुसार समय-समय पर अनेक झंडों को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया था। इन्हीं में तिरंगे झंडे का भी भारत की राजनीति में आविर्भाव हुआ। ये सारे झंडे भारतीय राष्ट्र जीवन से संबंधित अज्ञान और विस्मरण में से उत्पन्न हुए थे।

कांग्रेस के तिरंगे का जन्म

भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने "अवर फ्लैग" नामक पुस्तक प्रकाशित की हुई है। इस पुस्तक के पृष्ठ क्र.6 पर निम्नलिखित विवरण दिया है-

"1929 के लगभग बैजवाड़ा में हुए कांग्रेस अधिवेशन में आंध्र के एक युवक ने एक ध्वज तैयार किया और उसे गांधी जी के पास ले गया। यह दो रंग का था-लाल और हरा-दो प्रमुख समुदायों का प्रतीक। गांधी ने बीच में एक सफेद पट्टी जोड़ने का सुझाव दिया ताकि भारत के शेष समुदायों का भी प्रतिनिधित्व हो सके और चर्खे का भी सुझाव दिया जोकि प्रगति का प्रतीक था। इस प्रकार तिरंगे का जन्म हुआ। पर अभी इसे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने अधिकृत रूप से स्वीकार नहीं किया था। फिर भी गांधी जी के अनुमोदन का प्रभाव यह पड़ा कि वह पर्याप्त लोकप्रिय हो गया और सभी कांग्रेस अधिवेशनों के अवसर पर फहराया जाने लगा।"

राष्ट्र ध्वज का प्रश्न

इसी कारण 1931 की कराची कांग्रेस में राष्ट्र ध्वज का प्रश्न विचार के लिए आया। तब तक हिन्दू, मुसलमान तथा अन्यों का प्रतिनिधित्व करते हुए तीन रंग कांग्रेस के झंडे में प्रयुक्त होते जा रहे थे। अब सिखों ने अपना अलग से पीला रंग जोड़ने का आग्रह किया। वास्तव में उन्होंने तिरंगे झंडे में तीन रंगों के चयन पर आपत्ति भी की। उनका कहना था कि ध्वज असाम्प्रदायिक होना चाहिए और यदि वह साम्प्रदायिक आधार पर ही रहता है तो उसमें सिख समुदाय के प्रतीक पीले रंग का भी समावेश किया जाए।

ध्वज समिति का प्रतिवेदन

अत: राष्ट्रीय ध्वज के विषय में ठीक से निर्णय करने के लिए सात सदस्यों की एक समिति बना दी गई। इस समिति के सदस्य थे-1-सरदार वल्लभ भाई पटेल, 2-पं.जवाहर लाल नेहरू, 3-डा.पट्टाभि सीतारमैया, 4-डा.ना.सु.हर्डीकर, 5-आचार्य काका कालेलकर, 6-मास्टर तारा सिंह और 7-मौलाना आजाद।

इस ध्वज समिति ने सब दृष्टि से विचार कर सर्वसम्मति से अपना जो प्रतिवेदन दिया, उसमें लिखा-"हम लोगों का एक मत है कि अपना राष्ट्रीय ध्वज एक ही रंग का होना चाहिए। भारत के सभी लोगों का एक साथ उल्लेख करने के लिए उन्हें सर्वाधिक मान्य केसरिया रंग ही हो सकता है। अन्य रंगों की अपेक्षा यह रंग अधिक स्वतंत्र स्वरूप का तथा भारत की पूर्व परंपरा के अनुकूल है।" निष्कर्ष के रूप में उन्होंने आगे लिखा, "भारत का राष्ट्रीय ध्वज एक रंगा हो और उसका रंग केसरिया रहे तथा उसके दंड की ओर नीले रंग में चर्खे का चित्र रहे।"

ध्वज समिति का यह प्रतिवेदन राष्ट्रीय एकात्मता की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसमें अलग अलग सम्प्रदायों के प्रतिनिधित्व के रूप में अलग-अलग रंगों को स्थान नहीं दिया गया था, जैसा कि तब तक तिरंग झंडे में चला आ रहा था।

यद्यपि यह ध्वज समिति की सर्वसम्मत संस्तुति थी, तो भी इस पर कांग्रेस कार्यसमिति की मुहर लगना आवश्यक था। अंतिम निर्णय वहीं होना था।

डा.हेडगेवार के प्रयत्न




ध्वज समिति का यह प्रतिवेदन प्रकाशित होने पर डा.हेडगेवार को बहुत प्रसन्नता हुई। किंतु उन्हें आशंका थी गांधी जी की ओर से। गांधी जी को मुसलमानों की बहुत चिंता रहती थी और तिरंगा गांधी जी द्वारा ही प्रचलित किया गया था, किंतु ध्वज समिति ने तिरंगे को पूरी तरह से नकार दिया था, अत: गांधी जी इस प्रतिवेदन को अस्वीकार कर सकते हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी। डाक्टर हेडगेवार ऐसी स्थिति को टालने के लिए सक्रिय हो गए।

लोकनायक बापूजी अणे कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य थे। कार्य समिति की बैठक दिल्ली में होने वाली थी और लोकनायक अणे भी उसमें भाग लेने दिल्ली जाने वाले थे। वे केसरिया रंग के पक्षधर नहीं थे, भगवा रंग के पक्षधर थे। डाक्टर हेडगेवार उनके पास गए और उन्हें समझाया कि केसरिया और भगवा रंग कोई दो रंग नहीं हैं। इनमें बहुत ही मामूली सा अंतर है, मूलत: वे एक ही हैं। दोनों ही लाल व पीले रंग के सम्मिश्रण हैं। केसरिया रंग में लाल की तुलना में पीला रंग थोड़ा सा अधिक होता है और भगवा रंग में पीले की अपेक्षा लाल रंग थोड़ा सा अधिक होता है। अत: केसरिया ध्वज के समर्थन का अर्थ भगवा ध्वज का ही समर्थन है। डाक्टर जी ने आगे कहा-"यद्यपि काफी अध्ययन और खोज के उपरांत समिति ने केसरिया रंग का सुझाव दिया है, पर गांधी जी के सम्मुख सब मौन हो जाएंगे। गांधी जी ने केसरिया को अमान्य कर तिरंगे को ही बनाए रखने का आग्रह किया, तो ये नेता मुंह नहीं खोलेंगे। अत: आपको आगे आकर निर्भयतापूर्वक अपने पक्ष का प्रतिपादन करना चाहिए।"-डा.हेडगेवार चरित्र, प्रथम संस्करण, पृ.251

डाक्टर जी के यह बताने पर कि केसरिया रंग और भगवा रंग में कोई विशेष अंतर नहीं है, बापू जी मान गए और उन्होंने कांग्रेस कार्य समिति में केसरिया ध्वज का समर्थन करने का आश्वासन दे दिया। किंतु डा.हेडगेवार जी ने अपने कर्तव्य की इतिश्री यहीं नहीं मान ली। वे किसी भी विषय में प्रयत्न एक साथ कई दिशाओं से करते थे। अत: वे स्वयं भी दिल्ली पहुंच गए और लोकनायक अणे के आवास पर ही जम गए। लोकनायक के ही कथनानुसार-"वे दिन भर दिल्ली में इधर उधर घूमते रहते थे। अत: निश्चय ही वे कार्यसमिति के अन्य सदस्यों से भी इस संबंध में मिले होंगे।"

लेकिन हुआ वही, जिसकी डाक्टर जी को आशंका थी। श्री हो.वे. शेषाद्रि के अनुसार-"परंतु, अखिल भारतीय कांग्रेस समिति गांधीजी के मन की तिरंगी योजना से मतभेद करने का साहस न कर सकी और उसने सीधे उसे ही स्वीकृति दे दी। जिस मानसिक पृष्ठभूमि के कारण यह निर्णय लिया गया, वह घोर दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध हुआ।"(...और देश बंट गया, पृष्ठ-138)

डा.हेडगेवार की सारी मेहनत बेकार गई। ध्वज समिति का प्रतिवेदन अमान्य कर दिया गया और तिरंगे को बनाए रखने का निर्णय ले लिया गया। हां, डाक्टर जी की दौड़ धूप का इतना परिणाम अवश्य निकला कि तिरंगे में गहरे लाल रंग के स्थान पर केसरिया रंग मान लिया गया और इस रंग का क्रम सबसे ऊपर कर दिया गया। इससे पहले लाल रंग की पट्टी सबसे नीचे रहती थी।

चारों ओर से होने वाली साम्प्रदायिकता विषयक आलोचनाओं से बचने के लिए कांग्रेस द्वारा रंगों की व्याख्या में परिवर्तन किया गया और कहा गया कि तीन रंग विभिन्न सम्प्रदायों के द्योतक न होकर गुणों के प्रतीक हैं-केसरिया रंग त्याग का, सफेद रंग शांति का तथा हरा रंग हरियाली का प्रतीक है। किंतु यह व्याख्या आज तक किसी के गले नहीं उतरी, स्वयं कांग्रेस के भी नहीं। यदि वास्तव में यह कांग्रेस के गले उतर गई होती, तो आज कांग्रेस भगवाकरण अथवा केसरिया से इतना बिदकती नहीं।

नारायण हरि पालकर के अनुसार, "इस प्रकार समिति के सारे परिश्रम पर पानी फिर गया तथा राष्ट्र ध्वज का प्रश्न इतिहास और परंपरा के आधार पर निश्चित न होते हुए, व्यक्ति की इच्छा और धारणा से तय हुआ। (डा.हेडगेवार चरित्र, पृ.251)

राष्ट्र ध्वज के विषय में चर्चा करते समय हमें इतिहास के इस पृष्ठ की ओर से आंख नहीं मूंदनी चाहिए।


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भारतीय ध्वज


http://hindi.mapsofindia.com/indian-flag.html

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को स्वतंत्रता के प्रतीक के तौर पर डिजाइन किया गया था। स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने इसके लिए कहा था ‘यह ना सिर्फ हमारी स्वतंत्रता का ध्वज हैै बल्कि सबकी आजादी का प्रतीक है’।

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज एक हाॅरीजोंटल तिरंगा है, जिसमें बराबर अनुपात में गहरा भगवा रंग सबसे उपर, मध्य में सफेद और गहरा हरा रंग नीचे है। ध्वज की लंबाई चैड़ाई का अनुपात 2:3 है। सफेद पट्टी के बीच में एक गहरे नीले रंग का पहिया है जो धर्म चक्र का प्रतीक है। इस पहिये की 24 तीलियां हैं।

ध्वज में भगवा रंग साहस, बलिदान और त्याग का प्रदर्शन करता है। इसका सफेद रंग पवित्रता और सच्चाई तथा हरा रंग विश्वास और उर्वरता का प्रतीक है।


भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का इतिहास


भारतीय राष्ट्रीय ध्वज बहुत महत्वपूर्ण है और यह भारत के लंबे स्वतंत्रता संग्राम का प्रतिनिधित्व करता है। यह भारत के एक स्वतंत्र गणतंत्र होने का प्रतीक है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के वर्तमान स्वरुप का अस्तित्व 22 जुलाई 1947 को हुई संवैधानिक सभा की बैठक मेें आया। इस ध्वज ने 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक डोमिनीयन आॅफ इंडिया और उसके बाद से भारत गणराज्य के राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर देश का प्रतिनिधित्व किया। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को पिंगली वैंकया ने डिजाइन किया और इसमें भगवा, सफेद और हरे रंगों की समान पट्टियां हैं। इसकी चैड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के मुकाबले 2:3 है।

सफेद पट्टी के बीच स्थित चक्र को अशोक चक्र कहा जाता है और इसमें 24 तीलियां होती हैं। भारतीय मानक संस्थान यानि आईएसआई के द्वारा निर्धारित मानक के अनुसार चक्र सफेद पट्टी के 75 प्रतिशत भाग पर फैला होना चाहिये। राष्ट्रीय ध्वज हमारे सबसे सम्मानजनक राष्ट्रीय चिन्हों में से एक है। इसके निर्माण और इसे फहराने को लेकर सख्त कानून बनाए गए हैं। आधिकारिक ध्वज ब्यौरे के अनुसार ध्वज का कपास, सिल्क और वूल को हाथ से कात कर बनाई खादी से बना होना आवश्यक है।

1904 : भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का इतिहास स्वतंत्रता मिलने से भी पहले का है। सन् 1904 में पहली बार राष्ट्रीय ध्वज अस्तित्व में आया। इसे स्वामी विवेकानंद की एक आयरिश शिष्य ने बनाया था। उनका नाम सिस्टर निवेदिता था और कुछ समय बाद यह ‘सिस्टर निवेदिता का ध्वज’ के नाम से पहचाना जाने लगा। उस ध्वज का रंग लाल और पीला था। लाल रंग स्वतंत्रता के संग्राम और पीला रंग उसकी विजय का प्रतीक था। उस पर बंगाली में ‘बाॅन्दे मातरम्’ लिखा था। इसके साथ ही ध्वज पर भगवान इन्द्र के हथियार वज्र का भी निशान था और बीच में एक सफेद कमल बना था। वज्र का निशान शक्ति और कमल शुद्धता का प्रतीक था।

1906 में भारतीय ध्वज 1906 : सिस्टर निवेदिता के ध्वज के बाद सन् 1906 में एक और ध्वज डिजाइन किया गया। यह एक तिरंगा झंडा था और इसमें तीन बराबर पट्टियां थीं जिसमें सबसे उपर इसमें नीले, बीच में पीले और तल में लाल रंग था। इसकी नीली पट्टी में अलग अलग आकार के आठ सितारे बने थे। लाल पट्टी में दो चिन्ह थे, पहला सूर्य और दूसरा एक सितारा और अर्द्धचन्द्राकार बना था। पीली पट्टी पर देवनागरी लिपि में ‘वंदे मातरम्’ लिखा था।

सन् 1906 में इस ध्वज का एक और संस्करण बनाया गया। यह भी एक तिरंगा था पर इसके रंग अलग थे। इसमें नारंगी, पीला और हरा रंग था और इसे ‘कलकत्ता ध्वज’ या ‘लोटस ध्वज’ के नाम से जाना जाने लगा, इसमें आठ आधे खुले कमल थे। माना जाता है कि इसे सचिन्द्र प्रसाद बोस और सुकुमार मित्रा ने बनाया था। इसे 7 अगस्त 1906 को कलकत्ता के पारसी बागान में फहराया गया था। इसे बंगाल के विभाजन के खिलाफ बहिष्कार दिवस के दिन सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने भारत की एकता के प्रतीक के तौर पर फहराया था।

1907 में भारतीय ध्वज 1907 : यह ध्वज रंगों और इस पर बने फूल के अलावा सन् 1906 के ध्वज से काफी मिलता जुलता था। इस झंडे के तीन रंग थे, नीला, पीला और लाल और इसमें फूल का आकार काफी बड़ा था।

इसके बाद मैडम भीकाजी रुस्तम कामा का झंडा आया। इस ध्वज को मैडम भीकाजी कामा, वीर सावरकर और कृष्णा वर्मा ने मिलकर बनाया था। इस झंडे को मैडम कामा नेे जर्मनी में स्टूटग्राट में 22 अगस्त 1907 को फहराया और यह ध्वज विदेशी धरती पर फहराया जाने वाला पहला ध्वज बन गया। उस दिन से इसे बर्लिन कमेटी ध्वज भी कहा जाने लगा। यह ध्वज तीन रंगों से बना था, जिसमें सबसे उपर हरा, मध्य में भगवा और आखिरी में लाल रंग था। इस के उपर ‘वंदे मातरम’ लिखा था।

1916 : पूरे राष्ट्र को जोड़ने के उद्देश्य से सन् 1916 में एक लेखक और भूभौतिकीविद पिंगली वैंकया ने एक ध्वज डिजाइन किया। उन्होंने महात्मा गांधी से मिलकर ध्वज को लेकर उनकी मंजूरी मांगी। महात्मा गांधी ने उन्हें ध्वज पर भारत के आर्थिक उत्थान के प्रतीक के रुप में चरखे का चिन्ह बनाने का सुझाव दिया। पिंगली ने हाथ से काती गई खादी का एक ध्वज बनाया। उस झंडे पर दो रंग थे और उन पर एक चरखा बना था, लेकिन महात्मा गांधी ने उसे यह कहते हुए नामंजूर कर दिया कि उसका लाल रंग हिंदू और हरा रंग मुस्लिम समुदाय का तो प्रतिनिधित्व करता है पर भारत के अन्य समुदायों का इसमें प्रतिनिधित्व नहीं होता।

1917 : बाल गंगाधर तिलक द्वारा गठित होम रुल लीग ने सन् 1917 में एक नया झंडा अपनाया। उस समय भारत द्वारा डोमिनियन के दर्जे की मांग की जा रही थी। झंडे पर सबसे उपर यूनियन जैक बना था। ध्वज के बचे हुए हिस्से पर पांच लाल और चार नीली पट्टियां थी। इस पर हिंदुओं में पवित्र माने जाने वाले सप्तर्षि नक्षत्र के सात तारे भी बने थे। इस पर उपर की ओर एक सितारा और एक अर्धचन्द्र भी बना था। यह ध्वज आम जनता में ज्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ।

1921 में भारतीय ध्वज 1921 : महात्मा गांधी चाहते थे कि राष्ट्रीय ध्वज में भारत के सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व हो, इसलिए एक नया ध्वज बनाया गया। इस झंडे में तीन रंग थे। इसमें सबसे उपर सफेद, मध्य में हरा और सबसे नीचे लाल रंग था। इस ध्वज का सफेद रंग अल्पसंख्यकों का, हरा रंग मुस्लिमों का और लाल रंग हिंदू और सिख समुदायों का प्रतीक था। एक चरखा इन तीन पट्टियों पर फैलाकर बनाया गया था जो इनकी एकता का प्रतीक था। यह ध्वज आयरलैंड के ध्वज की तर्ज पर बनाया गया था जो कि भारत की तरह ही ब्रिटेन से स्वतंत्रता पाने के लिए संघर्ष कर रहा था। हालांकि कांग्रेस कमेटी ने इसे आधिकारिक ध्वज के तौर पर नहीं अपनाया पर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीयता के प्रतीक के तौर पर इसका व्यापक इस्तेमाल हुआ।

1931 में भारतीय ध्वज 1931 : ध्वज की सांप्रदायिक व्याख्या से कुछ लोग खुश नहीं थे। इसे ध्यान में रखते हुए एक नया झंडा बनाया गया जिसमें लाल की जगह गेरुआ रंग रखा गया। यह रंग दोनों समुदायों की संयुक्त भावना का प्रतीक था क्योंकि भगवा हिंदू योगियों और मुस्लिम दरवेशों का रंग है। सिख समुदाय ने ध्वज में अपने प्रतिनिधित्व की मांग की अथवा धार्मिक रंगों को ध्वज से हटाने को कहा। नतीजतन, पिंगली वैंकया ने एक और ध्वज बनाया। इस नए ध्वज में तीन रंग थे। सबसे उपर भगवा, उसके नीचे सफेद और सबसे नीचे हरा रंग। सफेद पट्टी के मध्य में चरखा बना था। सन् 1931 में कांग्रेस कमेटी की बैठक में इस ध्वज को कमेटी के आधिकारिक ध्वज के तौर पर अपनाया गया था।


1947 में भारतीय ध्वज 1947 : भारत को आजादी मिलने के बाद भारत के राष्ट्रीय ध्वज पर चर्चा के लिए राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई। कमेटी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ध्वज को कुछ संशोधनों के साथ अपनाना तय किया। नतीजतन, 1931 के ध्वज को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर अपनाया गया, लेकिन चरखे की जगह मध्य में चक्र रखा गया और इस तरह भारतीय राष्ट्रीय ध्वज अस्तित्व में आया।


ब्रिटिश भारत ध्वज 1858 1947 ब्रिटिश भारत ध्वज 1858-1947 : ब्रिटिश भारत का ध्वज सन् 1858 में लाया गया। इसका डिजाइन पश्चिमी हेरैल्डिक मानकों के आधार पर था और यह कनाडा और आॅस्ट्रेलिया सहित अन्य ब्रिटिश काॅलोनियों के ध्वजों से मिलता जुलता था। इस नीले बैनर पर उपरी बाएं चतुर्थांश में यूनियन ध्वज और दाहिनीं तरफ मध्य में शाही ताज और स्टार आॅफ इंडिया बना हुआ था।


उत्पादन
ध्वज के उत्पादन के मानक तय करने के लिए एक कमेटी है। कमेटी ने इसे फहराने के लिए भी नियम बनाए हैं। इस कमेटी का नाम भारतीय मानक ब्यूरो है। इसने ध्वज संबंधी सभी बातों जैसे कपड़ा, डाई, रंग, धागों की गिनती और सभी बातों का विस्तृत विवरण दिया है। भारतीय ध्वज केवल खादी से बनाया जा सकता है। यह दो प्रकार की खादी से बनाया जाता है, एक प्रकार मुख्य हिस्से के काम आता है और दूसरा प्रकार जो ध्वज को डंडे से बांधे रखता है।

आचार संहिता


राष्ट्रीय प्रतीक होने के नाते हर भारतीय इसका सम्मान करता है। आम लोगों के लिए भारतीय ध्वज संबंधी कुछ नियम बनाए गए हैं।
  • राष्ट्रीय ध्वज को फहराते समय भगवा रंग सबसे उपर होना चाहिए।
  • कोई भी ध्वज या प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज से उपर या दाहिनी ओर नहीं रखा जाना चाहिए।
  • यदि राष्ट्रीय ध्वज के साथ अन्य ध्वज भी एक ही कतार में लगाने हांे तो उन्हें बांई ओर लगाना चाहिए।
  • यदि राष्ट्रीय ध्वज को किसी परेड या जुलूस में थामा जाता है तो उसे दाहिनी ओर लेकर मार्च करना होता है। यदि दूसरे ध्वज भी साथ हांे तो उसे कतार के मध्य में रखना होता है।
  • सामान्यतः राष्ट्रीय ध्वज को महत्वपूर्ण इमारतों पर फहराया जाता है, जैसे राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, सचिवालय, आयुक्त कार्यालय आदि।
  • राष्ट्रीय ध्वज या उसकी नकल का इस्तेमाल व्यापार, व्यवसाय या पेशे के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
  • राष्ट्रीय ध्वज को सूर्यास्त के समय उतारना आवश्यक है।

ध्वज संहिता के अनुसार भारत के नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज को कुछ महत्वपूर्ण दिन, जैसे गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और महात्मा गांधी के जन्मदिन के अलावा फहराने का अधिकार नहीं है। प्रसिद्ध उद्योगपति नवीन जिंदल ने अपने कार्यालय के भवन पर झंडा फहराने पर दी गई चेतावनी को कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने इसके खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की जो कि अभी विचाराधीन है, लेकिन फैसला आने तक कोर्ट ने आम लोगों को सम्मानजनक तरीके से ध्वज फहराने की अस्थाई अनुमति दी है।

कुछ रोचक तथ्य


विश्व की सबसे उंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर 29 मई 1953 में भारतीय झंडा फहराया गया। विदेशी धरती पर पहली बार भारतीय झंडा मैडम भीकाजी कामा ने फहराया। उन्होंने इसेे जर्मनी में स्टूटग्राट में 22 अगस्त 1907 को फहराया।

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज पहली बार अंतरिक्ष में विंग कमांडर राकेश शर्मा के साथ 1984 में गया। राकेश शर्मा के स्पेस सूट पर वह एक पदक की तरह जोड़ा गया था।

अंतिम संशोधन : अक्टूबर 3, 2014