बुधवार, 21 जनवरी 2015

भारतीय राष्ट्रवाद : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद !




इतिहास दृष्टि - डा. सतीश चन्द्र मित्तल
http://panchjanya.com/arch/2009/5/10/File20.htm
भारतीय राष्ट्रवाद का अतीत तथा वर्तमान राष्ट्रीयता की भारतीय अवधारणा तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

आधुनिक युग में राष्ट्रीयता अथवा राष्ट्रवाद एक विश्वव्यापी, अत्यंत महत्वपूर्ण तथा प्रभावी अवधारणा है। यह मानवता के विकास में बाधक नहीं बल्कि उसकी पोषक तत्व है। राष्ट्र, व्यक्ति और मानव जाति के बीच एक अनिवार्य शर्त है। यह विश्व के विभिन्न कालखण्डों में प्रेरक, प्रखर तथा प्रभावी तत्व रहा है। इसकी अवधारणा पूर्वी जगत में अति प्राचीन काल से तथा पाश्चात्य जगत में 18वीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध में विकसित मानी जाती है।

राष्ट्रवाद के विकास क्रम के बारे में भ्रामक धारणा

पाश्चात्य विचारकों ने इस गलत तथा भ्रामक धारणा को बल दिया कि राष्ट्रवाद मूलत: एक यूरोपीय विचार है। कुछ ने आगे बढ़कर यह भी भ्रम फैलाया कि यह इंग्लैण्ड की देन है तथा 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के साथ इसका भारत में भी विकास हुआ। माक्र्सवादी चिंतक ए.आर. देसाई ने इसे एक आधुनिक विचार माना है जिसका विकास भारत में ब्रिटिश शासन तथा विश्व के प्रभावों के फलस्वरूप हुआ। यह सोचना मूर्खतापूर्ण होगा कि प्रत्येक देश का ऐतिहासिक विकासक्रम यूरोप अथवा पश्चिम की देन है। सही बात तो यह है कि इसका विकास विभिन्न देशों में, विभिन्न कालों में, विभिन्न परिस्थितियों में हुआ। सन् 1940 में सर तेजबहादुर सप्रू ने भारत के बारे में ठीक ही कहा, "भारतीय राष्ट्रीयता निश्चित रूप से यूरोप की इस प्रादेशिक राष्ट्रीयता से भिन्न है जो 100 वर्ष पूर्व की गई तथा जो वियाना संधि का फल है, जिसने यूरोप की व्यापारिक प्रतिबद्धता को बढ़ावा दिया।"

भारत में राष्ट्रवाद की अवधारणा

यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि भारत विश्व के प्राचीनतम राष्ट्रों में से है। वैदिक साहित्य तथा अन्य ग्रंथों में, अंग्रेजी शब्द "नेशन" से हजारों साल पहले भारत में "राष्ट्र" नामक शब्द का उल्लेख मिलता है। वेदों में इस पर विस्तृत चिंतन किया गया है। इसे पवित्रतम मनोभाव माना गया है। महाभारत के शांतिपर्व में युधिष्ठिर भीष्म पितामह से अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हैं कि राष्ट्र की रक्षा तथा वृद्धि के लिए क्या उपयोगी है। महाभारत में यह भी कहा गया है कि, युद्ध में प्राणों की बाजी का अवसर आने पर जिस राष्ट्र में ऐसा निश्चय आ जाता है कि इसके संरक्षण तथा देश की रक्षा करता रहूंगा, उसे ब्राहृलोक की प्राप्ति होती है। अत: राष्ट्रहित को सर्वोपरि माना गया है।

लोकमान्य तिलक ने राष्ट्र को धर्म से भी ऊंचा स्थान दिया है। महर्षि अरविन्द ने विश्व विख्यात उत्तर-पाड़ा के भाषण में कहा, "राष्ट्रीयता राजनीति नहीं बल्कि एक धर्म है, एक विश्वास है, एक निष्ठा है, सनातन धर्म है, मेरे लिए राष्ट्रीयता है।" उन्होंने प्रश्न किया, "राष्ट्र क्या है? हमारी मातृभूमि क्या है? साथ ही कहा, यह भूमि का टुकड़ा नहीं, भाषा का अलंकार नहीं, मन की कहानी नहीं है... यह भारत के समस्त लोगों की जीवित जाग्रत शक्ति है।" बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने राष्ट्र को सर्वोत्तम धर्म के रूप में प्रस्तुत किया है। पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का कथन है कि राष्ट्र का हित ही राष्ट्रीयता है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

भारत में प्राचीन काल से राष्ट्रवाद के दो अभिन्न तत्व बताए गए हैं- समान भूमि तथा समान सांस्कृतिक जीवन। भारत भूमि के प्रति जन के अटूट संबंध की अवधारणा को अत्यन्त महत्व दिया गया है। अत: राष्ट्र का आधारभूत तत्व भौगोलिक तथा सांस्कृतिक एकता को माना गया है। संक्षेप में राष्ट्र कोई इकरारनामा या समझौता नहीं है बल्कि स्वयं निर्मित है। राष्ट्र का शरीर इसकी भूमि तथा इसकी आत्मा इसकी संस्कृति है। उपरोक्त दोनों तत्वों को संक्षेप में जानना आवश्यक होगा।

भूमि तथा जन का अटूट संबंध

यजुर्वेद के कुछ मंत्रों में राष्ट्र तथा इसके गुणों की विवेचना की गई। राष्ट्र उन व्यक्तियों से बनता है जो एकत्रित होकर एक निश्चित भू-भाग में रहते हों, साथ ही जो विवेक-बुद्धि को महत्व देते हों, विद्वानों का आदर करते हों तथा बाहरी आक्रमण तथा आन्तरिक प्रकृति प्रकोपों से सुरक्षा करने में सामथ्र्यवान हों। अथर्ववेद के पृथ्वीसूत्र में मातृभूमि के प्रति 63 भावूपर्ण मंत्र दिये गए हैं। भूमि को समुद्र के साथ घिरी बताया गया है तथा जहां के लोग विभिन्न भाषाओं को बोलते हैं तथा अनेक परम्पराओं का निर्वाह करते हैं। प्रसिद्ध विद्वान दामोदर सातवलेकर ने इन मंत्रों को "वेदों का राष्ट्रीय गीत" कहा है। उदाहरण के लिए कुछ मंत्र इस प्रकार से है। जैसे- माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या: अर्थात मेरी माता भूमि है तथा मैं पृथ्वी का पुत्र हूं। सा नो भूमि विसृजनां माता पुत्राय मे पय: अर्थात यह भूमि मेरी माता है जो मुझे दूध पिलाती है। भूमे मातर्निधेहि मा भद्रया: सुप्रतिष्ठितम् अर्थात हे मातृभूमि, मेरी रक्षा कर। वैदिक साहित्य की भांति अन्य ग्रंथों में मातृभूमि का यशोगान किया गया है। विष्णुपुराण का एक पूरा अध्याय भूमि के सन्दर्भ में है। बाल्मीकि रामायण में मातृभूमि की तुलना स्वर्ग से करते हुए इसे महान बताया गया है तथा कहा है-

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी

अत: संक्षेप में राष्ट्र निर्माण में पहला अभिन्न तत्व मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम तथा समर्पण का भाव बताया गया है। इसकी प्राकृतिक सीमाओं को जीवन का आधार माना है। प्राकृतिक सम्पदाओं को- जैसे नदियों, पर्वतों, वृक्षों तथा अन्य वनस्पतियों को यथेष्ठ सम्मान दिया गया है।

भूमि के प्रति अगाध श्रद्धा तथा प्रेम व्यक्त करने के लिए भारत में तीर्थयात्रा की परम्परा को बड़ा महत्व दिया गया है। प्राचीन ग्रंथों- महाभारत, गरुड़ पुराण, दैवी भागवत पुराण, कालिका पुराण, शिवपुराण, स्कन्दपुराण आदि अनेक ग्रंथों में तीर्थ यात्रा के महत्व को दर्शाया गया है। भारतीयों में विभिन्न तीर्थस्थानों के लिए प्राचीनकाल से ही सदैव अगाध श्रद्धा, पूजा तथा एकत्व का भाव रहा है।

समान सांस्कृतिक जीवन मूल्य

राष्ट्रवाद का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व समान सांस्कृतिक जीवन मूल्यों को माना गया है। इसमें जीवन के विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं- धर्म, अध्यात्म, अर्थ, राजनीति, भाषा व साहित्य, सभी का गहराई से मंथन किया गया है।

जीवन मूल्यों में धर्म को सर्वोपरि महत्व दिया गया है। धर्म सही अर्थ में न "रिलीजन" है और न ही "मजहब"। धर्म का अर्थ कर्तव्य बताया गया है। धर्म में मतान्तरण, मंदिर या हिंसा से कोई संबंध नहीं है। यह सदैव सकारात्मक तथा मानव के लिए कल्याणकारी है। धर्म व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास तथा समाज व्यवस्था के लिए है। राष्ट्र के निर्माण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसे मानव धर्म कहा गया है। इसे सनातन धर्म भी कहा जाता है। सनातन धर्म को शाश्वत धर्म कहा गया है। पं. मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, श्री अरविन्द ने सनातन धर्म को बड़ा महत्व दिया है। महर्षि अरविन्द ने लिखा, "हमारे राष्ट्रवाद का अर्थ सनातन धर्म है। सनातन धर्म के साथ हिन्दू राष्ट्र का जन्म हुआ। इसी के साथ पल्लवित पुष्पित हुआ। जब सनातन धर्म का क्षय होता है तो राष्ट्र का भी क्षय होता है।" उन्होंने इसे राष्ट्र की आत्मा बताया। मालवीय जी ने इसे विश्व की सर्वोत्तम वस्तु कहा।

अथर्ववेद में भारतीय राष्ट्र को संतों तथा विद्वानों की निर्मित माना है। यह राजाओं अथवा राजनीतिज्ञों की कृति नहीं है। राज्य बदलते रहते हैं पर राष्ट्र अक्षुण्ण रहता है। भारतीय जीवन में राजनीतिक विकेन्द्रीयकरण तथा शक्ति के विभाजन को सर्वोच्च वरीयता दी है। भारतीय सांस्कृतिक जीवन मूल्यों में अर्थ को भी यथेष्ठ स्थान दिया गया है। अर्थ को जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक माना है। यजुर्वेद तथा ईशोपनिषद् में भारत के सांस्कृतिक जीवन मूल्यों में आर्थिक विचारों का निरूपण किया है। एक मंत्र में कहा है-

ईशावास्यमिंद सर्व यÏत्कच जगत्यां जगत। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:, मा गृध:, कस्य-स्विद्धनम्।।

वस्तुत: इस मंत्र में पांच प्रमुख आर्थिक प्रश्नों को उभारा गया है। यदि मंत्र के अन्त से प्रारंभ की ओर चलें तो पहला प्रश्न है धन का स्वामी कौन है। गंभीर चिंतन के पश्चात धन का स्वामी प्रजापति या प्रजा के रक्षक को बताया है। जो प्रजा की रक्षा न कर सके वह धन का स्वामी नहीं हो सकता। दूसरे प्रश्न में कहा गया कि मनुष्य लालची नहीं चाहिए। आवश्यक धन व्यय करें तथा अपरिग्रह को महत्ता देते हुए उपभोग करें। तीसरे प्रश्न में आवश्यकता से अधिक धन को दान अथवा जनहित कार्यों में लगाने को कहा गया है। चौथे प्रश्न में व्यक्ति से ऊपर समाज को स्थान दिया गया। और पांचवें प्रश्न में कहा कि जो भी प्राप्त है वह ईश्वर की कृपा से है। अत: अर्थ को धर्म तथा नैतिकता के आधार पर प्रयोग करने तथा इसमें व्यक्ति तथा समाज के हितों का समान चिंतन किया गया है।

उपरोक्त सभी सांस्कृतिक जीवन मूल्यों को विभिन्नता में एकता का प्रेरक तथा मार्गदर्शक तत्व बताया गया है। अत: कुल मिलाकर भारत राष्ट्र तथा राष्ट्रवाद मूलत: सांस्कृतिक तथा अध्यात्मिक, सामूहिक तथा विवेकपूर्ण सनातन धर्म (विश्वव्यापी) पर आधारित है। इसकी प्रमुखता सांस्कृतिक तथा सामाजिक है न कि राजनीतिक व आर्थिक, प्रकृति में यह विकासवादी है न कि किसी विशेष परिस्थिति की उपज है। सांस्कृतिक जीवन की यह विचारधारा प्राचीनकाल से वर्तमान तक भारतीयों के मनोभावों को विभिन्न क्षेत्रों में व्यक्त करती रही है। यह सदैव भारतीय जनजीवन में सतत प्रेरणा, स्फूर्ति जागरण के साथ-साथ संघर्ष, त्याग तथा बलिदान के लिए भी प्रेरित कर रही है। इसी भाव को बनाये रखने के लिए आधुनिक काल में भी स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि अरविन्द, लोकमान्य तिलक और बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने निरंतर यशस्वी प्रयत्न किये। इसीलिए कोटि कण्ठों से आज भी एक स्वर निकलता है- भारत माता की जय। द

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