बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

विदेशी इशारों पर विकास को अवरुद्ध करते एनजीओ

                                       





  पश्चिम के इशारे पर विकास को अवरुद्ध करते एन जी ओ

 साभार - पाथेयकण, जयपुर, राजस्थान 

http://www.patheykan.in
देश की गुप्तचर संस्था आई.बी.ने हाल ही में एक बड़ा खुलासा किया है कि देश के अनेक एनजीओ (गैर सरकारी संगठन- Non Governmental Organisation) पर्यावरण सुरक्षा, विस्थापन आदि के नाम पर भारत में विकास की बड़ी परियोजनाओं का विरोध पश्चिमी देशों के इशारे पर करते हैं। इसके लिए उन्हें अमरीका व दूसरे पश्चिमी देशों से अथाह धनराशि प्राप्त होती है। ये एनजीओ पश्चिमी देशों के हितों को आगे बढ़ाने का माध्यम बन गये हैं। आई बी का तो यहॉं तक कहना है कि एनजीओ की इस भूमिका के कारण भारत का आर्थिक विकास धीमा हो गया है।  इंटेलिजेंस ब्यूरो का अनुमान है कि इससे भारत की जीडीपी वृद्धिदर 2 से 3 प्रतिशत कम हो रही है।


एन जी ओ के बारे में आम धारणा रही है कि ये संगठन ग्रामीण विकास, स्वच्छता, शिक्षा,स्वास्थ्य, साक्षरता, अनाथालय आदि सामाजिक सेवा करने वाले संगठन हैं। परन्तु आई बी ने अपनी रपट में खुलासा किया है कि मानवाधिकार, पर्यावरण सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता, असमानता आदि के नाम पर अनेक एनजीओ देश के विकास की बड़ी परियोजनाओं का विरोध करते हैं। ये आसपास की गरीब ग्रामीण जनता तथा वनवासियों को बेघरबार होने का झूठा डर दिखा कर प्रदर्शन करते हैं। अपनी जमात के प्रशांत भूषण जैसे कुछ वकीलों से मिल कर न्यायालय में जनहित याचिका लगाकर उन योजनाओं को उपरोक्त वर्णित कारणों के आधार पर रोकने का प्रयास करते हैं।
विकास परियोजनायें अटकी-आई बी ने देश की ऐसी 7 परियोजनाओं का उदाहरण दिया हैजो देश के बुनियादी विकास में महत्वपूर्ण हैं, परन्तु एनजीओ के विरोध प्रदर्शन के कारण रुकी पड़ी हैं। इस प्रकार एनजीओ विदेशी एजेंट की भूमिका में नजर आने लगे हैं।
आई बी के अनुसार "ग्रीन पीस' नाम के एनजीओ ने देशभर में पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर परमाणु प्लांट विरोधी माहौल तैयार कर कोयले की खानों एवं कोयला आधारित पावर प्लांट को रोकने का जबर्दस्त प्रयास किया। मध्य प्रदेश में "हिंडाल्को' की एल्यूमिनियम उत्पादन सम्बन्धी परियोजना का भी ग्रीनपीस ने ही विरोध किया, जिसकी लागत 9,200 करोड़ रु. है।
मेधा पाटेकर ने नर्मदाबांध परियोजना का विरोध इस आधार पर किया कि इससे वहॉं के निवासी बेघर हो जायेंगे। विरोध के कारण परियोजना 8 वर्ष लटकी रही तथा उसका बजट 6,40,604 करोड़ से बढ़कर 39,24,245 करोड़ रु. हो गया। परियोजना का उद्‌देश्य गुजरात के सूखाग्रस्त इलाकों को पानी पहुँचाना तथा बिजली पैदा करना है। इससे महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश व राजस्थान को सिंचाई व पीने के लिए पानी तथा बिजली मिलेगी।
इस परियोजना को रोकने में मेधा पाटेकर को आगे करने में अमरीका तथा
वर्ल्ड बैंक की  बड़ी भूमिका है। अमेरिका पर्यावरण तथा पुनर्वास के नाम पर इस परियोजना को बंद कराना चाहता था ताकि भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर न बन सके। इसीलिए मेधा पाटेकर सर्वोच्च न्यायालय तक गयी। परन्तु, न्यायालय ने बांध निर्माण रोकने से मना कर दिया। तब मेघा पाटेकर, प्रशांत भूषण तथा अरूंधति राय ने सुप्रीम कोर्ट पर हमला करते हुए न्यायालय के समक्ष प्रदर्शन तक किया। न्यायालय ने इसे अपनी अवमानना माना तो मेधा पाटेकर व प्रशांत भूषण ने माफी मांग ली परन्तु अरूधंति राय द्वारा मांफी न मांगने पर न्यायालय ने उसे एक दिन के लिये जेल भेजा। उल्लेखनीय है कि नर्मदा बांध परियोजना से एक भी वनवासी बेघर नहीं हुआतथा गुजरात सरकार के पुनर्वास कार्यक्रम की पूरे विश्व में सराहना हुई।  इतना ही नहीं इससे वनवासियों को भी फल व सब्जियों की खेती के लिए पानी उपलब्ध हुआ।
20 लाख एनजीओ- सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान भारत की प्रमुख जॉंच एजेंसी सीबीआई को भारत में कार्यरत एनजीओ तथा उन्हें विदेशों से प्राप्त धन के बारे में जानकारी एकत्र करने के निर्देश दिये थे। सीबीआई के अनुसार इस समय भारत में लगभग 20 लाख एनजीओ कार्यरत हैं। देश की कुल आबादी  में इनका हिसाब लगाया जाय तो प्रति 600 व्यक्तियों पर एक एनजीओ है। प्रत्येक एनजीओ में अनेक व्यक्ति काम करते हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता हैकि एनजीओ तंत्र का फैलाव कितना व्यापक है।


अथाह धनराशि का दुरुपयोग-

एनजीओ को समाजसेवा के विविध प्रकल्प चलाने के लिए केन्द्र व राज्य सरकारों के साथ ही विदेशों से अपार धनराशि प्राप्त होती है। एक अनुमान के अनुसार सन्‌ 2002 से 2009 के मध्य केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा एनजीओ को छःहजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि दी गई। इस अवधि में विदेशों से उनको प्राप्त धन की जानकारी सामने नहीं आयी है। परन्तु 2010-11 में इन्हें विदेशों से एक खरब 25 अरब रुपये प्राप्त हुए। इसमें केन्द्र व राज्य सरकारों से प्राप्त राशि जोड़ दी जावे तो इतनी भारी भरकम राशि से देश के सामाजिक क्षेत्र का कायापलट हो जाना चाहिए था। परन्तु हुआ क्या?

ये संस्थाएं नियमानुसार प्रतिवर्ष अपनी आय-व्यय का ब्यौरा तथा आयकर रिटर्न आदि प्रस्तुत नहीं करते। हाल यह है कि समाज सेवा के नाम पर एनजीओ में काम करने वाले लोग एनजीओ को रोजगार व कमाई का साधन तथा नाम, यश व देश-विदेश की यात्राओं का माध्यम  बना बैठे हैं।
"कबीर' नाम के एनजीओ के सर्वेसर्वा आप पार्टी के अरविन्द केजरीवाल तथा मनीष सिसोदिया हैं। इस एनजीओ को फोर्ड फाउन्डेशन ने लाखों डालर दिये। इसके माध्यम से अमरीका  ने भारत की अनेक विकास परियोजनाओं को रोकने के साथ ही सरकार  के अन्दर तक अपनी पहुँच बना ली थी।
तमिलनाडु के कुडनकुलम में परमाणु ऊर्जा  संयंत्र रूस के सहयोग से लग रहा है। आर्थिक संकट में फॅंसा अमरीका यह ठेका लेना चाह रहा था। ठेका न मिलने पर उसने पी.उदय कुमार के एनजीओ सहित कुछ अन्य एनजीओ को भारी पैसा देकर उन्हें परमाणु संयंत्र के विरुद्ध खड़ा कर दिया। उदयकुमार ने अमरीकी पैसे से पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर कुडनकुलम संयंत्र के विरोध में आंदोलन चलाया तथा अदालतों में इसे रोकने की कोशिश की।  आखिर सर्वोच्च न्यायालय ने कुडनकुलम परमाणु प्लॉंट को देश के विकास में उपयोगी मानकर अपनी अनुमति प्रदान कर दी।
यू.पी.ए. सरकार का भ्रष्टाचार-

लगभग एक वर्ष पूर्व प्रस्तुत एसीएचआर (Asian Centre for Human Rights) की रपट के अनुसार पिछली यू.पी.ए. सरकार के कई मंत्रालयों ने एनजीओ को अनुदान देने में भारी भ्रष्टाचार किया था। मंत्रालयों के पास एनजीओ को दिये धन का कोई लेखा-जोखा तक नहीं है। एक उदाहरण लें- मानव संसाधन मंत्रालय ने सूचित किया कि 2008-09 की अवधि में मंत्रालय ने एनजीओ की सहायतार्थ 22 करोड़ रु. दिये जबकि मंत्रालय की रपट के अनुसार 120 करोड़ रु. दिये गये।

परिवार कल्याण मंत्रालय ने सूचना के अधिकार के तहत  बताया था कि मंत्रालय द्वारा एनजीओ को उक्त अवधि में 123 करोड़ रु. दिये गये जबकि सम्बन्धित मंत्री गुलाम नबी आजाद ने लोकसभा में  218 करोड़ रु. देना बताया। यही हाल अन्य मंत्रालयों का था। स्पष्ट है कि पिछली यूपीए सरकार के स्तर पर भी खूब भ्रष्टाचार हुआ। एनजीओ के पदाधिकारी बताते हैं कि सरकार से अनुदान प्राप्त करने में उन्हें 15 से 30 प्रतिशत तक घूस देनी प़डी। समाजसेवा के लिए धन प्राप्त करने हेतु घूस देना कितना विचित्र मामला है।
आईबी, सीबीआई तथा एसीएचआर की रपट आँखें खोल देने वाली हैं। पर्यावरण, विस्थापन आदि के नाम पर देश की विकास परियोजनाओं का विरोध करना भयंकर अपराध से कम नहीं है। यह सब पश्चिमी देशों के इशारे पर करना और भी खतरनाक है। देश की जनता के सामने ऐसे एनजीओ का असली चेहरा आना चाहिए। सरकार को भी ऐसे एनजीओ की गतिविधियों का पर्दा-फाश करते हुए उनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करनी चाहिये।
--------
                                                 कांग्रेसी भी नही थे धर्मांतरण के पक्षधर

September 17, 2013 उगता भारत ब्यूरो प्रमुख समाचार/संपादकीय, राजनीति/धर्मचिंतन
राकेश कुमार आर्य
भारत धर्मान्तरण का जहर फेेलता ही जा रहा है। धर्म के नाम पर भारतीय उपहाद्वीप विभाजन की भयानक पीड़ा पूर्व में झेल चुका है। आगे क्या हो सकता है ये सोचकर भी मन सिहर उठता है। परंतु देश का बहुसंख्यक यदि किसी गफलत में सोता रहा तो कुछ भी संभव है, देश के पूर्वोत्तर भाग का ईसाईकरण कर दिया गया है। वहां से अलगाव की बातें उठ रही हैं। स्मरण रहे कि चीन इस भूभाग को भारत से अलग कराने में ईसाई देशों के साथ होगा। क्योंकि वह नही चाहता कि उसके पड़ोस में भारत एक महाशक्ति बनकर उभरे। वह खंडित भारत को अपने लिए अधिक उपयुक्त मानता है। ऐसा नही है कि भारत के पूर्वोत्तर में ही धर्मांतरण का खेल खेला जा रहा है, अपितु देश के अन्य भागों में भी इस्लाम और ईसाइयत के द्वारा यह भयानक स्तर पर चल रहा है। शाहबुद्दीन का वह वाक्य काम कर रहा है कि हमने हिंदुस्तान पर कभी तलवार के बल पर शासन किया था पर अब वक्त बदल चुका है, आज तलवार का काम वोट करेगी।

संविधान सभा में धर्मांतरण के मुद्दे पर बड़ी तार्किक बहस हुई थी। उस समय कांग्रेस के बड़े नेताओं तक ने भी धर्मांतरण के प्राविधान का विरोध किया था। संविधान सभा में इस विषय पर बोलते हुए सरदार पटेल ने कहा था कि ‘श्रीमान जी! यह सभी जानते हैं कि बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है, जो ताकत के बल पर, भय और प्रलोभन के बल पर छल और षडयंत्र से हो रहा है। बच्चे मां बाप के साथ धर्म परिवर्तन करने को विवश हैं। अनाथ बच्चों का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। ऐसे में क्या करना उचित होगा? मेरी राय में धर्म परिवर्तन के प्राविधानों को पुनर्विचार के लिए सलाहकार समिति को वापस कर दिया जाए।’ (इस पर सदन ने अपनी सहमति व्यक्त की थी) तब सदन के विचार से सहमत होकर सलाहकार समिति ने इन प्राविधानों को संविधान में न रखने की सलाह दी थी।

कांग्रेस के ही पुरूषोत्तम दास टण्डन ने बहस में भाग लेते हुए कहा था-’अध्यक्ष महोदय, हमारे ईसाई भाइयों के यहां दिये गये भाषणों से मैं हतप्रभ हूं। हम कांग्रेसी धर्मपरिवर्तन को अनुचित मानते हैं और इसके पक्ष में नही हैं। मेरी राय में किसी को अपने धर्म में परिवर्तन कराने का काम निरर्थक है। यह तभी हो जबकि कोई व्यक्ति अपना धर्म परिवर्तन कराने का आवेदन स्वेच्छा से करे। अब यह कहा जा रहा है कि उन्हें (ईसाईयों को) युवाओं का धर्म परिवर्तन कराने का अधिकार हो….यह क्या है? श्रीमान जी मैं अवाक हूं, यह देखकर कि मेरे कुछ ईसाई मित्र अल्पवयस्कों के धर्म परिवर्तन को अधिकार बनाने के पक्ष में तर्क दे रहे हैं।

हम कांग्रेसी धर्म परिवर्तन को किसी भी तरह सही नही मानते हैं। लेकिन हमें अपने ईसाई मित्रों को साथ लेकर चलना है। हम तो धर्म प्रचार तक को भी मूल अधिकार बनाए जाने तक के विरूद्घ थे। पर हम सहमत हो गये हैं।’
इसी विषय पर लोकनाथ मिश्रा ने अपने विचार यूं प्रकट किये थे-’श्रीमान जी…आप जानते हैं कि धर्म प्रचार ने ही भारत की यह दशा की है, और इसी के कारण भारत पाकिस्तान का बंटवारा हुआ। अगर इस्लाम ने भारत आकर अपनी आस्थाएं न थोपी होतीं तो भारत पूर्णत: पंथ निरपेक्ष तथा सर्वधर्म समभाव वाला देश बना रहता और इसके खंडित होने का, बंटवारे का कोई सवाल ही नही उठता (माननीय सदस्य के ये शब्द विचारणीय हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि मुस्लिम लीग का साम्प्रदायिक दृष्टिकोण ही विभाजन के लिए उत्तरदायी था) वर्तमान संदर्भों में धार्मिक प्रचार के क्या माने हैं? ….ईसाइयों ने पिछले दरवाजे से यह गुपचुप शांति से घुसपैठ बनाने की युद्घ नीति अपनाई है गलती हमारी है कि हम सुरक्षा के लिए बाड न ही लगाते हैं। अगर लोग धर्म प्रचार करना चाहते हैं तो मैं कहूंगा कि उन्हें करने दो, लेकिन संविधान में इसे मूल अधिकार का दर्जा देकर धर्म प्रचार को प्रोत्साहन मत दो।’

इस विषय में गांधी जी के विचार भी उल्लेखनीय हैं। उन्होंने ‘यंग इंडिया’ में 24 अप्रैल 1931 को तथा ‘हरिजन’ में 7 फरवरी 1931 को लिखा था-’यदि वे पूरी तरह से मानवीय कार्यों तथा गरीबों की सेवा करने की बजाए डॉक्टरी सहायता व शिक्षा आदि के द्वारा धर्म परिवर्तन करते हैं तो मैं चाहूंगा कि वे ईसाई यहां से चले जाएं। प्रत्येक राष्ट्र का धर्म अन्य राष्ट्र के धर्म के समान ही श्रेष्ठ है। हमें धर्म परिवर्तन की कोई आवश्यकता नही।’

कांग्रेस के ही अनंत शयनम आयंगर (पूर्व लोकसभा अध्यक्ष) ने भी कहा था-’यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मजहब का उपयोग किसी की आत्मा को बचाने के लिए नही बल्कि समाज को तोड़ने के लिए किया जा रहा है। इसीलिए मैं चाहता हूं कि भारतीय संविधान में एक मूल अधिकार जोड़ा जाए जिसमें धर्मांतरण पर रोक की व्यवस्था हो।’
राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता हुसैन इमाम ने कहा था…’जबरदस्ती धर्म परिवर्तन घोर अवांछनीय है। इसलिए जैसा कि सरदार पटेल ने स्वीकार किया कि इन्हें मूल अधिकारों में नही रखना चाहिए’ (यही उचित है)।
तजम्मुल हुसैन साहब ने कहा था ‘धर्म निजी मामला होना चाहिए। मैं क्यों आपसे कहूं कि आप मेरे तरीके से अपनी आत्मा को शांति दें और आप क्यों मुझसे कहें कि मैं आपके तरीके से अपनी आत्मा को शांति दूं। अगर इस पर सिद्घांतत: सहमति है तो फिर धर्म के प्रचार की बात क्यों?…ईमानदारी से अपने घर पर धर्म को मानो और आचरण करो।

….अगर आपने इस देश में धर्म का प्रचार करना आरंभ कर दिया तो आप समस्या बन जाएंगे।
यह सारे तर्क अपने आप में विचारणीय हैं। इनसे सिद्घ होता है कि कांग्रेस भी मूल रूप में धर्म प्रचार के माध्यम से धर्मांतरण के विरूद्घ थी और यहां तक कि उसके मुस्लिम सदस्य भी धर्मांतरण के राष्ट्रघाती खेल के विरोधी थे। परंतु केवल नेहरू परिवार की विपरीत धर्मालंबियों से विवाह करने की पारिवारिक पृष्ठभूमि ने इस सोच को पलीता लगा दिया। कांग्रेस की चारण संस्कृति ने सदा ही नेता के इशारे पर काम किया है, इसलिए जैसा नेता ने चाहा वैसा ही नाच किया। नेहरू का लेडीमाउंट बेटन के प्रति ल गाव, इंदिरा का फिरोज से विवाह करना और राजीव का सोनिया से विवाह करना ये वो लम्बा सफर है, जिसके कमजोर पेंचों ने देश की इस सबसे बड़ी पार्टी को वैचारिक खोखले पन तक ला खड़ा किया। सोनिया के कारण ही मदर टेरेसा जैसी उस स्त्री का भारत में महिमामंडन हुआ जिसने अपने समय में पूर्वोत्तर का सर्वाधिक धर्मांतरण कराया।

अब यदि भारत का भविष्य उज्ज्वल करना है तो हमें श्रीमती ऐनीबीसेंट के इन शब्दों पर ध्यान देना ही होगा-’यदि अपने भविष्य को मूल्यवान समझते हो व अपनी मातृभूमि से प्रेम करते हो तो अपने प्राचीन धर्म की अपनी पकड़ को छोड़िए नही। उस निष्ठा से च्युत न होइए जिस पर भारत का प्राण निर्भर है। हिंदू धर्म के अतिरिक्त अन्य किसी मत की रक्तवाहिनियां ऐसी शुद्घ स्वर्ण की नही है, जिनमें आध्यात्मिक जीवन का रक्त प्रवाहित किया जा सके। भारत और हिंदू धर्म एक रूप है। मैं यह कार्य भार आपको सौंप रही हूं। जो हिंदू धर्म के प्रति निष्ठावान रहा, वही आपका सच्चा जीवन है। कोई धर्म भ्रष्ट कलंकित हाथ आपको सौंपी गयी इस पवित्र धरोहर को स्पर्श कर सकें।’ (हिंदू जीवनादर्श से)

इसलिए जागिए किसी को चोट पहुंचाने के लिए नही, अपितु स्वयं को मिटने से बचाने के लिए जागिए। 2014 का चुनाव सभी देशभक्त और राष्ट्रप्रेमी लोगों के विवेक की परीक्षा के रूप में आ रहा है। चुनावी जंग राष्ट्रवादियों और छद्म वादी गद्दरों के बीच है। देखते हैं आप क्या निर्णय लेते हैं?

मुजफ्फर नगर के दंगे छद्मनीतियों और वोटों की राजनीति के गंदे खेल का परिणाम हैं। धर्मांतरण की प्रक्रिया को यदि प्रारंभ में ही अवैध घोषित कर दिया जाता और मजहब को व्यक्ति का नेतांत निजी मामला मान लिया जाता तो आज सैकड़ों जानें इन दंगों में चली गयीं हैं वो न गयी होतीं। कांग्रेस और कांग्रेसी नीतियों पर चलने वाले सभी राजनीतिक दलों के लिए यह चिंतन का विषय होना चाहिए कि जब प्रारंभ में ही धर्मांतरण को उचित नही माना गया तो भारतीय लोकतंत्र के राजपथ पर चली रेल में यह कहां से और क्यों कर सवार हो लिया था? यदि अब भी नही चेते तो क्या सर्वनाश कराके ही चेतेंगे?

मदर टेरसा और उनका मकसद





---------- संघ के परम पूज्य सरसंघचालक मोहनजी भगवत ने क्या कहा और उसे तोड़ मरोड़ कर क्या पेश किया यह सभी समझते हैं । उनका कहना था सेवा के पीछे कोई निहित स्वार्थ नहीं होना चाहिए । और यह भी सब जानते हैं की ईसाई मिशनरियां शुद्ध रूप से धर्मांतरण करवाती हैं । विदेशों से इस हेतु अरबों रूपये आते हैं । महात्मा  गांधी भी ईसाईयों के इस कुकृत्य के खिलाफ थे । ईसाईयों के रोम रोम में धर्मांतरण है , मात्र 2000 साल में यूरोप , दोनों अमरीका , ऑस्ट्रेलिया  , अफ्रीका महाद्वीपों पर इन्होनें वहां के मूल पंथों को समाप्त कर दिया है । ईसाई और इस्लाम ने बहुतसे धर्मयुद्ध लड़े हैं । एशिया को ईसाई बनाने  के लिए , भारत को ईसाई बनाओ के उद्देश्य से ईसाई मिशनरियां और ईसाई देश काम कर रहे हैं । ईसाई धर्मांतरण की रक्षा और उसके पोषण के लिए उनके धन से स्थापित मिडिया और व्यापारिक तथा रणनीतिक संस्थान तरह तरह के पाखंडों में लिप्त रहते हैं । ---------अरविन्द सिसोदिया, कोटा राजस्थान 

आखिर मदर टेरेसा का मकसद क्या था?
By  एबीपी न्यूज Tuesday, 24 February 2015
http://abpnews.abplive.in/ind/2015/02/24/article510902.ece/mother-teresa
नई दिल्ली: मदर टेरेसा एक बार फिर चर्चा में हैं. मदर टेरेसा की पहचान गरीबों के लिए काम करने वाले मसीहा की जैसी है लेकिन इस बार चर्चा है उनकी सेवा के पीछे छिपे हुए मकसद के लिए जिसे आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने धर्मांतरण कहा है. तो क्या है मदर टेरेसा का पूरा सच?

एक आम भारतीय के जहन में मदर टेरेसा की ये तस्वीर उस बेमिसाल सेवा का प्रतीक है जिसने दीन-दुखियारों के दुख को अपना दुख बना लिया. हर उस शख्स को गले लगा लिया जिसे दुनिया ने ठुकरा दिया करती है. 1910 में युगोस्लाविया में जन्मी मदर टेरेसा 1929 में भारत आकर कोलकाता में बस गई थीं. साल 1950 में उन्होंने मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की और इसके जरिए उन्होंने गरीबों और कुष्ठ रोगियों की जो सेवा की उसकी मिसाल बहुत कम मिलती है. साल 1979 में उन्हें शांति का नोबल पुरस्कार मिला. 73 साल की उम्र तक बिना रुके बिना थके वो गरीबों और कुष्ठ रोगियों के बीच प्यार लुटाती रहीं और साल 1997 में उनका देहांत हो गया.

मदर टेरेसा की ये कहानी उनकी मत्यु के 18 बरस बाद हम आपको क्यों सुना रहे हैं? इसकी भी वजह है. वजह है आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का बयान. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ चालक यानी मुखिया हैं मोहन भागवत और उनका बयान आते ही आरएसएस के समर्थक और बीजेपी – शिवसेना जैसी राजनीतिक पार्टियां उनके समर्थन में उतर आई हैं.

  मोहन भागवत ने क्या कहा था-
गैर सरकारी संगठन ‘अपना घर’ की ओर से आयोजित समारोह में भागवत ने कहा, ‘‘मदर टेरेसा की सेवा अच्छी रही होगी. परंतु इसमें एक उद्देश्य हुआ करता था कि जिसकी सेवा की जा रही है उसका ईसाई धर्म में धर्मांतरण किया जाए.’’ उन्होंने कहा, ‘‘सवाल सिर्फ धर्मांतरण का नहीं है लेकिन अगर यह (धर्मांतरण) सेवा के नाम पर किया जाता है तो सेवा का मूल्य खत्म हो जाता है.’’

भागवत ने कहा, ‘‘परंतु यहां (एनजीओ) उद्देश्य विशुद्ध रूप से गरीबों और असहाय लोगों की सेवा करना है.’’ सरसंघचालक यहां से करीब आठ किलोमीटर दूर बजहेरा गांव में एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे. गांव में उन्होंने ‘महिला सदन’ और ‘शिशु बाल गृह’ का उद्घाटन किया.

आरएसएस का पक्ष-
आरएसएस का हालांकि कहना है कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया. संगठन के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर कहा गया है, "मीडिया गलत तरीके से रिपोर्ट दे रहा है.  भरतपुर में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के पूर्व महानिदेशक ने कहा था कि मदर टेरेसा ने उद्देश्य के साथ सेवा की थी. इसके जवाब में भागवत ने कहा था कि जैसा कि डॉ. एम. वैद्य ने कहा है कि मदर टेरेसा के सेवा का उद्देश्य था, लेकिन हम बदले में किसी चीज की अपेक्षा किए बगैर सेवा करते हैं."

दूसरी तरफ है मदर टेरेसा जैसी शख्सियत पर भागवत के बयान का तीखा विरोध – बहस शुरू हो चुकी है. कांग्रेस, सपा, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है. अरविंद केजरीवाल ने आज ट्वीट करके कहा, 'मैंने कुछ महीने कोलकाता स्थित निर्मल हृदय आश्रम में मदर टेरेसा के साथ काम किया है. वह महान इंसान थीं, उन्हें बख्श दिया जाए.'

बहस के बीच हैं मदर टेरेसा. आखिर मदर टेरेसा का मकसद क्या था – सेवा या धर्मांतरण.

मदर टेरेसा की ईसाई धर्म में आस्था बेहद गहरी थी. जीसस क्राइस्ट के लिए उनका समर्पण ही उन्हें ईसाई मिशनरी बनाकर भारत ले आया था. कोलकाता के कालीघाट इलाके से शुरु हुआ ये सेवा का सफर मदर टेरेसा के लिए लाया बेशुमार शोहरत. उनका गरीबों से ये प्रेम दुनिया के सामने तब आया जब 1969 में इंग्लैंड के खबरिया चैनल बीबीसी ने उनके इस काम को अपने कैमरे में कैद कर दुनिया के सामने पहुंचा दिया.

मदर टेरेसा को जो शोहरत मिली वो जल्द ही विवादों में भी आ गई. साल 1989 में बड़ा सवाल उठाया कोलकाता में उनके साथ 9 साल काम करने वाली सुजैन शील्ड ने सुजैन ने लिखा कि मदर को इस बात की बेहद चिंता थी कि हम खुद को गरीब बनाए रखें. पैसे खर्च करने से गरीबी खत्म हो सकती है. उनका मानना था इससे हमारी पवित्रता बनी रहेगी और पीड़ा झेलने से जीसस जल्दी मिलेगा. यहां तक कि वह जिनकी सेवा करती थीं उन्हें पुराने इंजेक्शन की सुई खराब हो जाने से दर्द होता था लेकिन वह नए इंजेक्शन भी नहीं खरीदने देती थीं.
मदर टेरेसा ऐसा क्यों चाहती थीं?  इसका जवाब 1989 में मदर टेरेसा ने खुद टाइम मैगजीन को दिए एक इंटरव्यू में दिया था.
सवाल – भगवान ने आपको सबसे बड़ा तोहफा क्या दिया है?

मदर टेरेसा – गरीब लोग

सवाल – (चौंकते हुए) वो तोहफा कैसे हो सकते हैं?

मदर टेरेसा –उनके सहारे 24 घंटे जीसस के पास रहा जा सकता है.

मदर टेरेसा ने इसी इंटरव्यू में धर्मांतरण पर भी अपना रुख साफ किया था

सवाल – भारत में आपकी सबसे बड़ी उम्मीद क्या है?

जवाब – सब तक जीसस को पहुंचाना.

सवाल – आपके दोस्तों का मानना है कि आपने भारत जैसे हिंदू देश में ज्यादा धर्मांतरण ना करके उन्हें निराश किया है?

जवाब – मिशनरी ऐसा नहीं सोचते. वे सिर्फ जीसस के शब्दों पर भरोसा करते हैं. संख्या का इसके कोई लेना देना नहीं है. लोग लगातार सेवा करने और खाना खिलाने आ रहे हैं. जाइए और देखिए. हमें कल का पता नहीं लेकिन क्राइस्ट के दरवाजे खुले हैं. हो सकता है ज्यादा बड़ा धर्मांतरण ना हुआ हो लेकिन हम अभी नहीं जान सकते कि आत्मा पर क्या असर हो रहा है.

सवाल – क्या उन लोगों को जीसस से प्यार करना चाहिए?

जवाब – सामान्य तौर पर अगर उन्हें शांति चाहिए, उन्हें खुशी चाहिए तो उन्हें जीसस को तलाशने दीजिए. अगर लोग हमारे प्यार से बेहतर हिंदू बनें, बेहतर मुसलमान बनें, बेहतर बौद्ध बनें तो इसका मतलब है उनमें कुछ और जन्म ले रहा है. वो ऊपरवाले के पास जा रहे हैं. जब वो उसके और करीब जाएंगे तो वो उसे चुन लेंगे.

क्या यही वजह है कि अब आरएसएस के समर्थक और बीजेपी दोनों मदर टेरेसा की सेवा को धर्मांतरण से जोड़ कर देख रहे हैं.

मीनाक्षी लेखी ने कहा कि मदर टेरेसा अपने बारे बेहतर जानती थीं, उनकी बायोग्राफी लिखने वाले नवीन चावला खुद स्वीकार कर रहे हैं कि मदर टेरेसा ने खुद कहा था कि मैं कोई सोशल वर्कर नहीं हूं. मेरा काम जीसस की बातों को लोगों तक पहुंचाना है.

मीनाक्षी जिस पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला का जिक्र कर रही हैं मदर टेरेसा के अच्छे दोस्त थे और उन्होंने मदर टेरेसा की जीवनी लिखी है. इसके मुताबिक उन्होंने नवीन चावला से पूछा था.


नवीन चावला - क्या आप धर्मांतरण करवाती हैं?

मदर टेरेसा – बिल्कुल. मैं धर्मांतरण करवाती हूं. मैं बेहतर हिंदू बनाती हूं या बेहतर मुसलमान या बेहतर इसाई. एक बार आपको आपका भगवान मिल गया तो आप तय कर सकते हैं किसे पूजना है.

ये वही बात थी जो वो टाइम मैगजीन से पहले भी कह चुकी थीं. 90 के दशक में भगवान में भरोसा ना रखने वाले क्रिस्टोफर हिचिन्स ने भी मदर टेरेसा पर गंभीर आरोप लगाते हुए एक डाक्यूमेंट्री बनाई जिसकी आज भी चर्चा होती है. इसी डाक्यूमेंट्री में एक सीनियर पत्रकार ने भी कहा कि उनका मकसद धर्म था ना कि सेवा.

भारत में भी मदर टेरेसा के मकसद को लेकर कई बार सवाल उठते रहे हैं.

हालांकि मदर टेरेसा के साथ काम करने वाली सुनीता कुमार उनके मकसद पर देश और दुनिया में बार बार उठने वाले सवालों को गलत ठहराती हैं. मदर टेरेसा ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को धर्म की आजादी का कानून बनाते वक्त भी एक खत लिख कर इसका विरोध किया था.

एम एस चितकारा की किताब के मुताबिक मदर टेरेसा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को 1978 में एक खुला खत लिखा था और इसकी प्रतियां सांसदों में बांटी थीं. खत का रिश्ता धार्मिक स्वतंत्रता के कानून से था. मदर टेरेसा इसके विरोध में थीं क्योंकि इससे धर्मांतरण की प्रक्रिया खतरे में पड़ सकती थी.

मदर टेरेसा की जिंदगी पर उठे से सवाल पिछले 20 साल से बार बार सामने आते रहे हैं. इल्जाम ये भी लगा कि वो अपने मरीजों की देखभाल इसलिए नहीं करती थीं ताकि वो भगवान को याद करते रहें.

ये बेहद खूबसूरत है कि कोई भी बिना सेंट पीटर के स्पेशल टिकट के नहीं मर सकता. हम इसे सेंट पीटर का बपतिस्मा टिकट कहते हैं. हम लोगों से पूछते हैं क्या तुम्हें अपने पापों को माफ करने वाला आशीर्वाद और भगवान चाहिेए. उन्होंने कभी मना नहीं किया. कालीघाट में 29 हजार लोगों की मौत हुई है.

मदर टेरेसा
कैलिफोर्निया, 1992

मदर टेरेसा को लेकर मोहन भागवत ने भले ही आरोप लगाया है लेकिन इसाई आस्था से जुड़े लोग मदर टेरेसा को अब भी चाहते हैं और पूजते हैं.

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

गरीब की सेवा में नहीं हो धर्मांतरण का भाव - परम पूज्य सरसंघचालक मोहन जी भागवत




इसाईयत सिर्फ 2000 वर्ष पुराना है। विस्तारवाद उसकी रग रग में है। पहले यूरोप फिर , दोनों अमरीका , अस्ट्रेलिया, अफ्रिका महादीपों को  इसाई बनाया, अब हिन्दुस्तान को इसाई बनाने का कार्य योजनापूर्वक चल रहा है। इसी षडयंत्र का एक हिस्सा मदर टेरसा भी थीं, पोप ने उन्हे संत घोषित कर सम्मानि किया था। किसी भी षडयंत्र को उजागर करना अथवा उससे सावचेत करना कोई गलत नहीं है। - अरविन्द सिसोदिया

------------
              गरीब की सेवा में नहीं हो धर्मांतरण का भाव - परम पूज्य सरसंघचालक मोहन जी भागवत

कल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन जी भागवत के भरतपुर के एक कार्यक्रम दिए उध्बोधन को अपने हित से तोड़ मरोड़ कर अपने कौन से मंसूबे पुरा कर रहा है किसी से छिपा नहीं है .
सेवा और सेवा के पीछे के भाव  वास्तव में एक चिंता का विषय है।

स्थानीय समाचार पत्रों  में छपे समाचार से स्थति स्पष्ट है कि भागवत जी ने ऐसा कुछ नहीं कहा था।

गरीब की सेवा में नहीं हो धर्मांतरण का भाव- भागवत


अपना घर के कार्यक्रम में बोले संघ प्रमुख
भास्कर न्यूज | भरतपुर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक डॉ. मोहनराव भागवत ने कहा कि दीन-हीन की सेवा निस्वार्थ भाव से करनी चाहिए। इसमें कुछ पाने का भाव नहीं होना चाहिए।
उन्होंने मदर टेरेसा का जिक्र करते हुए कहा कि टेरेसा द्वारा अच्छी सेवा की जाती होगी, किंतु उसके पीछे कहीं कहीं धर्मांतरण का भाव रहता था। जबकि अपना घर में चल रहे सेवा कार्य में जाति वर्ग का कोई भेद नहीं होता। क्योंकि सेवा की आड़ में हित साधने से सेवा का अवमूल्यन होता है। संघ प्रमुख अपना घर में परम सेवा गृह शिशु बाल गृह के लोकार्पण समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस मौके पर उन्होंने 600 आवासीय क्षमता के महिला सदन का भी भूमि पूजन किया।
इस मौके पर संघ प्रमुख ने कहा कि दीन हीन की सेवा करना ईश्वरीय कार्य है। इससे बढ़कर कोई परोपकार नहीं है। निरपेक्ष भाव से सेवा करनी चाहिए। अहंकार नहीं होना चाहिए। सेवा के प्रति भावना ऐसी होनी चाहिए कि पीड़ित पर कोई उपकार नहीं किया, वरन पीड़ित ने सेवा का मौका देकर उसके जीवन का उद्दार किया है। उन्होंने कहा कि ऐसी संवेदना अगर समाज के प्रति रहेगी तो समाज को कोई तोड़ नहीं सकता। भारत को कोई गुलाम नहीं बना सकता।
उन्होंने कहा कि सेवा कार्य करने के साथ-साथ अन्य लोगों में भी सेवा करने का भाव पैदा करना चाहिए। जिससे सेवा कार्य सतत चलता रहे। अपना घर के सेवा कार्य से अभिभूत संघ प्रमुख ने इसे तीर्थस्थल की उपमा दी। उन्होंने कहा कि नौजवानों को देश के गौरव बढ़ाने वाले स्मारकों तथा कर्तव्य की भावना पैदा करने वाले स्थानों का भ्रमण कराना चाहिए।
इस मौके पर यूपी के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने कहा कि मदर टेरेसा ने अच्छा काम किया था, किंतु उनकी संस्था के लोग अन्य धर्म के पीड़ित लोगों पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए दबाव डालते थे। जबकिअपना घर में बिना किसी भेदभाव के सेवा कार्य होता है। अपना घर के संस्थापक डॉ. बीएम भारद्वाज ने बताया कि परम सेवा गृह और शिशु बाल गृह करीब 1.5 करोड़ की लागत से बनकर तैयार हुआ है। महिला सदन करीब 5 करोड़ की लागत से तैयार होगा। उन्होंने लोगों से महिला सदन के लिए 21-21 ईंट का सहयोग करने का आह्वान किया। साथ ही कहा कि लोगों में यह भ्रांति है कि अपना घर में करोड़ों रुपया आता है, जबकि संस्था पर करीब 31 लाख रुपए का कर्ज है। इस मौके पर मुंबई के रामप्रसाद अग्रवाल, दिल्ली के रामपाल पगड़ी, आगरा के बीड़ी अग्रवाल, धन कुमार आदि ने विचार रखे। राष्ट्रीय अध्यक्ष वीरपालसिंह ने बताया कि संस्था द्वारा देश भर में 10 स्थानों पर आश्रम चलाए जा रहे हैं। इनमें करीब 1200 आवासी हैं। उन्होंने संस्था की गतिविधियों की जानकारी दी। संस्थापिका डॉ. माधुरी भारद्वाज ने आभार जताया। इस मौके अतिरिक्त जिला कलेक्टर ओपी जैन, विधायक विजय बंसल, भाजपा नेता भजनलाल शर्मा,कृष्ण कुमार अग्रवाल, सीए विनय गर्ग, सिद्धार्थ फौजदार, महेंद्रसिंह मग्गो, ईश्वरसिंह आदि मौजूद थे।
भागवतजयपुर रवाना
चारदिवसीय दौरे के बाद संघ प्रमुख डा. मोहनराव भागवत सोमवार की शाम जयपुर रवाना हो गए। संघ प्रमुख आज जवाहर नगर स्थित संघ कार्यालय पहुंचे तथा कार्यकर्ताओं से चर्चा की। इसके अलावा दोपहर में पूर्ण कालिक कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भारत का भविष्य उज्जवल है तथा विश्व गुरू का सपना साकार करने के लिए पूरी ताकत के साथ जुट जाएं।
----------
http://samvada.org/2015/news/audio-speech-by-bhagwat-at-bharatpur-rajasthan/
Speech by Mohan Ji Bhagwat at Bharatpur, Rajasthan
FULL TEXT OF MOHAN BHAGWAT’S SPEECH:
“Dear Bharadwajji, gentlemen present of the occasion, mothers, friends and sisters,
In reality, many people have contributed to the good service being done here. My service here is to only speak and that is what I mostly do by traveling across the country. I can only serve whatever I have and so I have served here through my speech. I am not speaking just to address you for the sake of it. This is my service.
As you might have seen here, those who come here and witness the work being done, they too will become volunteers to serve the society. This is because what we see here is the personification of service. When after the Mahabharata war, Yudhishtira conducted the RajasuyaYagna, a mongoose comes and rolls over the place and only half its body which was on the ground turns into gold. Then it goes in search of another such yagna where it could turn the other half of its body into gold. After sometime it comes in contact of a family that gives away everything it had in the service of their guests. The mongoose arrives here and rolls over the house and the other half also turns into gold. But in case, the mongoose was not able to find this family, I would recommend it to come at this event and roll over to turn into gold.
In fact, the mongoose had gone to Yudishtira’syagna only to convey that he need not feel too proud about his service as service is to be done selflessly without any pride in self. We do lot of service to the society but also deem it to be very important and feel proud of it. As normal men, we are born with the worldly attitudes and are susceptible to the wishes of our senses. But even in such a world, there are people who dedicated their entire lives to ‘seva’ and also exited this world without seeking anything in return. Such people and their service has to be encouraged. It is a man who serves others as animals serve only themselves. This is the way man has made them. An animal does not think why it was born or what it has to achieve in the world. Until it is alive after it has been born it feeds itself as much as required and finally dies. It does not even become like a demon who extracts more from others. An animal takes as much as is required for that meal and does not consume more than what is required, like a demon. But a man is different as he is a thinking animal. If he becomes selfish, he becomes a demon. If he works for the service of others he becomes bhagwan himself. It is such people to whom we should encourage. This is like how Raja Harishchandra was asked what he wishes to have and he replies that he wishes nothing for himself but only wants to give away everything to others. Despite all the difficulties that he faced due to the tests he was given by the devas, Yama appears and asks he could wish for anything for himself. Even then Harishchandra says that we only wishes for the well-being of people and animals and nothing for himself.
This is how ‘seva’ is done in our land. When ‘seva’ is done nothing is expected in return expect the wellbeing of the affected. But today we see that ‘Mother Teresa’ kind of ‘seva’ is being done. This kind of ‘seva’ should not be done. Her service may have been important but her service was rendered with an intention that those served converted to Christianity. Whether a person wishes to convert to Christianity should be left to the person. But to goad people to convert in the name of ‘seva’ is an affront to the service being done. Service has to be completely selfless and expecting absolutely nothing in return. Those who are the recipients of such selfless ‘seva’ may be thinking that they have seen their god in those who serve but those who serve would be thinking that their life became blessed after getting an opportunity to serve the needy.
There is not even pride after ‘seva’ because the opportunity was given to them to serve by the needy. It is such fervor we need to have for each other in a society. When such character becomes a part of a society, no one can find a fault in it and only good will happen to such a society. If our own people are becoming part of a conspiracy and we do nothing about it, then whatever ill will happen to them continues to happen. When people come from outside, known places are shown to them. But what can be shown to the people born here? We can show them people who inspire and take them to places that inspires them to work for the society. Those places which instills pride and those that reminds one of their duty towards the country are the modern day pilgrimage places. Today, by coming to this event in Bharatpur I could witness both these happening at the same place.
Yesterday I visited Maharaja Surajmal’s palace. I could see how we fought the invaders to retain our glorious heritage and history. This is what we have received from our ancestors. And today I saw here as to what is the duty we have towards the nation. Ramakrishna Paramahams also said the same. See bhagwan in others and serve them selflessly. Why should someone else from abroad come and serve our own people when we ourselves are here? We need to serve our own needy people and not delegate it to those who come from outside. A needy who is served will later become able enough to stand on his/her own and in turn serve other who are in need.
There are several kinds of ‘seva’. One way is to cater to whatever basic needs is missing in the needy. Second way is to show the way to fulfill the missing needs. This is like the difference between teaching a man to fish instead of giving a fish to a man to fill his hunger. Third is to teach a man as to how he can teach everyone the way to fish. This way there will be no need to serve anyone as everyone will cater to their own needs. Fourth is to organize for one of these i.e either arrange for the fish to be fed or arrange for teaching of ways to fish or see to it that everyone in the country learns to fish so that no one is hungry. This will happen when we feel that the needy are my own and my life is for their sake. To create such persons who think like this is most ideal way of service. Here we are witnessing all these four forms of ‘seva’.
The basic needs are being taken care of, people are getting to know how to cater to themselves, then there are others who are teaching others in different skills and finally we also saw those who are arranging for all the above. By witnessing this spectacle our lives have been enriched and felt divine. By we ourselves involving in these ‘seva’ activities and by getting more people to engage in selfless ‘seva’, our lives will be more divine. This is no less than the divinity we accrue through a pilgrimage. Marathi is my mother tongue and as we used to address our father as ‘theertharoop’ in Marathito which means he who has become divine himself by serving the almighty bhagwan and has thus become the caretaker of the world. Similarly, you people too have been involved in the service of the almighty and one day you all will become divine. With this wish and gratitude, I offer my deep respects to all and end my speech.”

-Mohan Bhagwat, RSS Sarasanghachalak
Bharatpur, Rajasthan   February 23, 2015


रविवार, 22 फ़रवरी 2015

संघ वटवृक्ष के बीज – परम पूज्य आद्य सरसंघचालक डॉक्टर हेडगेवार जी


मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

संघ वटवृक्ष के बीज – परम पूज्य आद्य सरसंघचालक डॉक्टर हेडगेवार जी
(डॉक्टर  हेडगेवार की 125वीं जयन्ती)
- डॉ. मनमोहन वैद्य (अ.भा.प्रचार  प्रमुख)
लिंक http://hi.tuffer.org/2015/02/life-tree-of-rss-dr-hedgevar.html

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम आज सर्वत्र चर्चा में है. संघ कार्य का बढ़ता व्याप देख कर संघ विचार के विरोधक चिंतित होकर संघ का नाम बार-बार उछाल रहे हैं. अपनी सारी शक्ति और युक्ति लगाकर संघ विचार का विरोध करने के बावजूद यह राष्ट्रीय शक्ति क्षीण होने के बजाय बढ़ रही है, यह उनकी चिंता और उद्वेग का कारण है. दूसरी ओर राष्ट्रहित में सोचने वाली सज्जन शक्ति संघ का बढ़ता प्रभाव एवं व्याप देख कर भारत के भविष्य के बारे में अधिक आश्वस्त होकर संघ के साथ या उसके सहयोग से किसी ना किसी सामाजिक कार्य में सक्रिय होने के लिए उत्सुक हैं, यह देखने में आ रहा है. संघ की वेबसाइट पर ही संघ से जुड़ने की उत्सुकता जताने वाले युवकों की संख्या 2012 में प्रतिमास 1000 थी. यही संख्या प्रतिमास 2013 में 2500 और 2014 में 9000 थी. इस से ही संघ के बढ़ते समर्थन का अंदाज लगाया जा सकता है. संघ की इस बढती शक्ति का कारण शाश्वत सत्य पर आधारित संघ का शुद्ध राष्ट्रीय विचार एवं इसके लिए तन–मन–धन पूर्वक कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं की अखंड श्रृंखला है
.
संघ का यह विशाल वटवृक्ष एक तरफ नई आकाशीय ऊंचाइयां छूता दिखता है, वहीँ उसकी अनेक जटाएं धरती में जाकर इस विशाल विस्तार के लिए रस पोषण करने हेतु नई-नई जमीन तलाश रही हैं, तैयार कर रही हैं. इस सुदृढ़, विस्तृत और विशाल वटवृक्ष का बीज कितना पुष्ट एवं शुद्ध होगा इसकी कल्पना से ही मन रोमांचित हो उठता है. इस संघ वृक्ष के बीज संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार, जिनके जन्म को इस वर्ष प्रतिपदा पर 125 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं. कैसा था यह बीज?
नागपुर में वर्ष प्रतिपदा के पावन दिन 1 अप्रैल, 1889 को जन्मे केशव हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे. आजादी के आन्दोलन की आहट भी मध्य प्रान्त के नागपुर में सुनाई नहीं दी थी और केशव के घर में राजकीय आन्दोलन की ऐसी कोई परंपरा भी नहीं थी, तब भी शिशु केशव के मन में अपने देश को गुलाम बनाने वाले अंग्रेज के बारे में गुस्सा तथा स्वतंत्र होने की अदम्य इच्छा थी, ऐसा उनके बचपन के अनेक प्रसंगों से ध्यान में आता है. रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के हीरक महोत्सव के निमित्त विद्यालय में बांटी मिठाई को केशव द्वारा (उम्र 8 साल) कूड़े में फेंक देना या जॉर्ज पंचम के भारत आगमन पर सरकारी भवनों पर की गई रोशनी और आतिशबाजी देखने जाने के लिए केशव (उम्र 9 साल) का मना करना ऐसे कई उदहारण हैं.
बंग-भंग विरोधी आन्दोलन का दमन करने हेतु वन्देमातरम के प्रकट उद्घोष करने पर लगी पाबन्दी करने वाले रिस्ले सर्क्युलर की धज्जियाँ उड़ाते हुए 1907 में विद्यालय निरीक्षक के स्वागत में प्रत्येक कक्षा में वन्देमातरम का उद्घोष करवा कर, उनका स्वागत करने की योजना केशव की ही थी. इसके माध्यम से अपनी निर्भयता, देशभक्ति तथा संगठन कुशलता का परिचय केशव ने सबको कराया. वैद्यकीय शिक्षा की सुविधा मुंबई में होते हुए भी क्रन्तिकारी आंदोलन का प्रमुख केंद्र होने के कारण कोलकाता जाकर वैद्यकीय शिक्षा प्राप्त करने का उन्होंने निर्णय लिया और शीघ्र ही क्रान्तिकारी आन्दोलन की शीर्ष संस्था अनुशीलन समिति के अत्यंत अंतर्गत मंडली में उन्होंने अपना स्थान पा लिया. 1916 में नागपुर वापिस आने पर घर की आर्थिक दुरावस्था होते हुए भी, डॉक्टर बनने के बाद अपना व्यवसाय या व्यक्तिगत जीवन – विवाह आदि करने का विचार त्याग कर पूर्ण शक्ति के साथ स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्होंने अपने आप को झोंक दिया.
1920 में नागपुर में होने वाले कांग्रेस के अधिवेशन की व्यवस्था के प्रबंधन की जिम्मेदारी डॉक्टर जी के पास थी. इस हेतु उन्होंने 1200 स्वयंसेवकों की भरती की थी. कांग्रेस की प्रस्ताव समिति के सामने उन्होंने दो प्रस्ताव रखे थे. भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता और विश्व को पूँजीवाद के चंगुल से मुक्त करना, यह कांग्रेस का लक्ष्य होना चाहिए. पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव कांग्रेस ने संघ स्थापना के बाद 1930 में स्वीकार कर पारित किया, इसलिए डॉक्टर जी ने संघ की सभी शाखाओं पर कांग्रेस का अभिनन्दन करने का कार्यक्रम करने के लिए सूचना दी थी. इससे डॉक्टर जी की दूरगामी एवं विश्वव्यापी दृष्टि का परिचय होता है.
व्यक्तिगत मतभिन्नता होने पर भी साम्राज्य विरोधी आन्दोलन में सभी ने साथ रहना चाहिए. और यह आन्दोलन कमजोर नहीं होने देना चाहिए ऐसा वे सोचते थे. इस सोच के कारण ही खिलाफत आन्दोलन को कांग्रेस का समर्थन देने की महात्मा गाँधी जी की घोषणा का विरोध होने के बावजूद उन्होंने अपनी नाराजगी खुलकर प्रकट नहीं की तथा गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन में वे बेहिचक सहभागी हुए.
स्वतंत्रता प्राप्त करना किसी भी समाज के लिए अत्यंत आवश्यक एवं स्वाभिमान का विषय है किन्तु वह चिरस्थायी रहे तथा समाज आने वाले सभी संकटों का सफलतापूर्वक सामना कर सके, इसलिए राष्ट्रीय गुणों से युक्त और सम्पूर्ण दोषमुक्त, विजय की आकांक्षा तथा विश्वास रख कर पुरुषार्थ करने वाला, स्वाभिमानी, सुसंगठित समाज का निर्माण करना अधिक आवश्यक एवं मूलभूत कार्य है. यह सोच कर डॉक्टर जी ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. प्रखर ध्येयनिष्ठा, असीम आत्मीयता और अपने आचरण के उदाहरण से युवकों को जोड़ कर उन्हें गढ़ने का कार्य शाखा के माध्यम से शुरू हुआ. शक्ति की उपासना, सामूहिकता, अनुशासन, देशभक्ति, राष्ट्रगौरव तथा सम्पूर्ण समाज के लिए आत्मीयता और समाज के लिए निःस्वार्थ भाव से त्याग करने की प्रेरणा इन गुणों के निर्माण हेतु अनेक कार्यक्रमों की योजना शाखा नामक अमोघ तंत्र में विकसित होती गयी. सारे भारत में प्रवास करते हुए अथक परिश्रम से केवल 15 वर्ष में ही आसेतु हिमालय, सम्पूर्ण भारत में संघ कार्य का विस्तार करने में वे सफल हुए.
अपनी प्राचीन संस्कृति एवं परम्पराओं के प्रति अपार श्रद्धा तथा विश्वास रखते हुए भी आवश्यक सामूहिक गुणों की निर्मिती हेतु आधुनिक साधनों का उपयोग करने में उन्हें जरा सी भी हिचक नहीं थी. अपने आप को पीछे रखकर अपने सहयोगियों को आगे करना, सारा श्रेय उन्हें देने की उनकी संगठन शैली के कारण ही संघ कार्य की नींव मजबूत बनी.
संघ कार्य आरंभ होने के बाद भी स्वातंत्र्य प्राप्ति के लिए समाज में चलने वाले   तत्कालीन सभी आंदोलनों के साथ न केवल उनका संपर्क था, बल्कि उसमें समय-समय पर वे व्यक्तिगत तौर पर स्वयंसेवकों के साथ सहभागी भी होते थे. 1930 में गांधीजी के नेतृत्व में शुरू हुए सविनय कानून भंग आन्दोलन में सहभागी होने के लिए उन्होंने विदर्भ में जंगल सत्याग्रह में व्यक्तिगत तौर पर स्वयंसेवकों के साथ भाग लिया तथा 9 मास का कारावास भी सहन किया. इस समय भी व्यक्ति निर्माण एवं समाज संगठन का नित्य कार्य अविरत चलता रहे, इस हेतु उन्होंने अपने मित्र एवं सहकारी डॉ. परांजपे को सरसंघचालक पद का दायित्व सौंपा था तथा संघ शाखाओं पर प्रवास करने हेतु कार्यकर्ताओं की योजना भी की थी. उस समय समाज कांग्रेस–क्रान्तिकारी, तिलकवादी–गाँधीवादी, कांग्रेस–हिन्दु महासभा ऐसे द्वंद्वों में बंटा हुआ था. डॉक्टर जी इस द्वंद्व में ना फंस कर, सभी से समान नजदीकी रखते हुए कुशल नाविक की तरह संघ की नाव को चला रहे थे.
संघ को समाज में एक संगठन न बनने देने की विशेष सावधानी रखते हुए उन्होंने संघ को सम्पूर्ण समाज का संगठन के नाते ही विकसित किया. संघ कार्य को सम्पूर्ण स्वावलंबी एवं आत्मनिर्भर बनाते हुए उन्होंने बाहर से आर्थिक सहायता लेने की परंपरा नहीं रखी. संघ के घटक, स्वयंसेवक ही कार्य के लिए आवश्यक सभी धन, समय, परिश्रम, त्याग देने हेतु तत्पर हो, इस हेतु गुरु दक्षिणा की अभिनव परंपरा संघ में शुरू की. इस चिरपुरातन एवं नित्यनूतन हिन्दू समाज को सतत् प्रेरणा देने वाले, प्राचीन एवं सार्थक प्रतीक के नाते भगवा ध्वज को गुरु के स्थान पर स्थापित करने का उनका विचार, उनके दूरदृष्टा होने का परिचायक है. व्यक्ति चाहे कितना भी श्रेष्ठ क्यों ना हो, व्यक्ति नहीं, तत्वनिष्ठा पर उनका बल रहता था. इसके कारण ही आज 9 दशक बीतने के बाद भी, सात–सात पीढ़ियों से संघ कार्य चलने के बावजूद संघ कार्य अपने मार्ग से ना भटका, ना बंटा, ना रुका.
संघ संस्थापक होने का अहंकार उनके मन में लेशमात्र भी नहीं था. इसीलिए सरसंघचालक पद का दायित्व सहयोगियों का सामूहिक निर्णय होने कारण 1929 में उसे उन्होंने स्वीकार तो किया, परन्तु 1933 में संघचालक बैठक में उन्होंने अपना मनोगत व्यक्त किया. उसमें उन्होंने कहा –
“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्मदाता या संस्थापक मैं ना हो कर आप सब हैं, यह मैं भली-भांति जानता हूँ. आप के द्वारा स्थापित संघ का, आपकी इच्छानुसार, मैं एक दाई का कार्य कर रहा हूँ. मैं यह काम आपकी इच्छा एवं आज्ञा के अनुसार आगे भी करता रहूँगा तथा ऐसा करते समय किसी प्रकार के संकट अथवा मानापमान की मैं कतई चिंता नहीं करूँगा.
आप को जब भी प्रतीत हो कि मेरी अयोग्यता के कारण संघ की क्षति हो रही है, तो आप मेरे स्थान पर दूसरे योग्य व्यक्ति को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वतंत्र हैं. आपकी इच्छा एवं आज्ञा से जितनी सहर्षता के साथ मैंने इस पद पर कार्य किया है, इतने ही आनंद से आप द्वारा चुने हुए नए सरसंघचालक के हाथ सभी अधिकार सूत्र समर्पित करके उसी क्षण से उसके विश्वासु स्वयंसेवक के रूप में कार्य करता रहूँगा. मेरे लिए व्यक्तित्व के मायने नहीं है; संघ कार्य का ही वास्तविक अर्थ में महत्व है. अतः संघ के हित में कोई भी कार्य करने में मैं पीछे नहीं हटूंगा”
संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार के ये विचार उनकी निर्लेप वृत्ति एवं ध्येय समर्पित व्यक्तित्व का दर्शन कराते है.
सामूहिक गुणों की उपासना तथा सामूहिक अनुशासन, आत्मविलोपी वृत्ति स्वयंसेवकों में निर्माण करने हेतु भारतीय परंपरा में नए ऐसे समान गणवेश, संचलन, सैनिक कवायद, घोष, शिविर आदि कार्यक्रमों को संघ कार्य का अविभाज्य भाग बनाने का अत्याधुनिक विचार भी डॉक्टर जी ने किया. संघ कार्य पर होने वाली आलोचना को अनदेखा कर, उसकी उपेक्षा कर वादविवाद में ना उलझते हुए सभी से आत्मीय सम्बन्ध बनाए रखने का उनका आग्रह रहता था.
“वादो नाSवलम्ब्यः” और “सर्वेषाम् अविरोधेन” ऐसी उनकी भूमिका रहती थी. प्रशंसा और आलोचना में - दोनों ही स्थिति में डॉ. हेडगेवार अपने लक्ष्य, प्रकृति और तौर तरीकों से तनिक भी नहीं डगमगाते. संघ की प्रशंसा उत्तरदायित्व बढाने वाली प्रेरणा तथा आलोचना को आलोचक की अज्ञानता का प्रतीक मान कर वह अपनी दृढ़ता का परिचय देते रहे.
1936 में नासिक में शंकराचार्य विद्याशंकर भारती द्वारा डॉक्टर हेडगेवार को “राष्ट्र सेनापति” उपाधि से विभूषित किया गया, यह समाचार, समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ. डॉक्टर जी के पास अभिनन्दन पत्र आने लगे. पर उन्होंने स्वयंसेवकों को सूचना जारी करते हुए कहा कि “हम में से कोई भी और कभी भी इस उपाधि का उपयोग ना करे. उपाधि हम लोगों के लिए असंगत है.” उनका चरित्र लिखने वालों को भी डॉक्टर जी ने हतोत्साहित किया. “तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें ना रहें” यह परंपरा उन्होंने संघ में निर्माण की.
शब्दों से नहीं, आचरण से सिखाने की उनकी कार्य पद्धति थी. संघ कार्य की प्रसिद्धि की चिंता ना करते हुए, संघ कार्य के परिणाम से ही लोग संघ कार्य को महसूस करेंगे, समझेंगे तथा सहयोग एवं समर्थन देंगे, ऐसा उनका विचार था. “फलानुमेया प्रारम्भः” याने वृक्ष का बीज बोया है इसकी प्रसिद्धि अथवा चर्चा ना करते हुए वृक्ष बड़ा होने पर उसके फलों का जब सब आस्वाद लेंगे तब किसी ने वृक्ष बोया था, यह बात अपने आप लोग जान लेंगे, ऐसी उनकी सोच एवं कार्य पद्धति थी.
इसीलिए उनके निधन होने के पश्चात् भी, अनेक उतार-चढाव संघ के जीवन में आने के बाद भी, राष्ट्र जीवन में अनेक उथल-पुथल होने के बावजूद संघ कार्य अपनी नियत दिशा में, निश्चित गति से लगातार बढ़ता हुआ अपने प्रभाव से सम्पूर्ण समाज को स्पर्श और आलोकित करता हुआ आगे ही बढ़ रहा है. संघ की इस यशोगाथा में ही डॉक्टर जी के समर्पित, युगदृष्टा, सफल संगठक और सार्थक जीवन की यशोगाथा है.
डॉक्टर हेडगेवार जी के गौरवमय जीवन के 125 वर्ष पूर्ण होने के पावन पर्व पर उनके चरणों में शत-शत नमन.

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

हम सभी भारत माता के पुत्र हैं - परम पूज्य सरसंघचालक भागवत जी




स्मारक  के अवलोकन के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा.मोहन जी भागवत  ने अपने सन्देश में लिखा कि "शाश्वत सनातन भारत की रक्षा तथा संवर्धन के लिए सतत प्रेरणा देने वाले इस स्थल का उसी रूप में विकास करने का कार्य हो रहा है , सभी कार्यकर्ताओ का अभिनन्दन ". 

 कार्यक्रम की अध्यक्षता संत बालकदास महाराज ने की। उन्होंने कहा कि मुनि और ऋषियों के काम को संघ आगे बढ़ा रहा है। ईश्वर मनुष्य का भाग्य बनाता है और संघ मनुष्य का सौभाग्य। संघ हमें जीना सिखाता है। 


कार्यक्रमके विशिष्ट अतिथि धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के अध्यक्ष ओंकारसिंह लखावत ने कहा कि इतिहास को पुन: लिखने की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि अभी तक अबुल फजल और कर्नल टाड का लिखा विकृत इतिहास पढ़ाया जा रहा है। इसमें भारत के पक्ष को ठीक से प्रस्तुत नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार देश की एकता और अखंडता का संदेश देने वाले स्मारक खड़े कर रही है। इसी कड़ी में करीब 35 स्मारक राजस्थान में बनाए जा रहे हैं। इस अवसर पर पर विशिष्ट अतिथि पर्यटन मंत्री कृष्णेंद्र कौर दीपा  ने  लोकार्पण टिकट खरीदने वाले खरीदारों को सम्मानित किया गया।

अखण्डता और अक्षुण्णता को जीवन का सर्वोपरि ध्येय बनाकर सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले महाराणा सांगा (महाराणा संग्राम सिंह ) की स्मृति को चिर स्थाई बनाये रखने के लिए राणा सांगा  स्मृति समिति - खानुआं , रूपवास , भरतपुर  ने यह कार्यक्रम आयोजित किया था  

उल्लेखनीय है कि खानुआं का युद्ध १७ मार्च १५२७ को आगरा से ६० किमी दूर खानुआं गाँव (रूपवास , भरतपुर) में लड़ा गया था। बाबर द्वारा लड़ा गया पानीपत के युद्ध के बाद यह दूसरा बड़ा युद्ध था।

पूर्व में समितिके संरक्षक डा. जीसी कपूर तथा अध्यक्ष हरि ओमसिंह जादौन ने सरसंघचालक डा. मोहनराव भागवत का पुष्पगुच्छ भेंट कर स्वागत किया। धीरेंद्र बिष्ट ने वंदेमातरम् गीत प्रस्तुत किया। प्रारंभ में संघ प्रमुख ने राणा सांगा स्मारक पर पुष्प चढाए। इस मौके पर कवि सूर्यद्विज द्वारा लिखित और प्रकाश माली द्वारा संगीतमय गीत मैं खानवा गांव बोल रहा हूं का भी संघ प्रमुख ने लोकार्पण किया। साथ ही  कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्रीय प्रचारक दुर्गादासजी, अखिल भारतीय अधिकारी गुणवंत सिंह जी कोठारी,जयपुर प्रान्त प्रचारक शिव लहरी जी, सह प्रान्त प्रचारक निम्बा राम जी, सांसद बहादुरसिंह कोली, पूर्व मंत्री डा. दिगंबरसिंह, विधायक विजय बंसल,  सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।   कार्यक्रम स्थल पर निहाला एंड पार्टी शीशवाड़ा ने बंब वादन एवं लोक गायन किया। इसमें कई संदेश दिए गए।  

-------------------
                                                      भागवत ने की एकजुटता की अपील, 
                                       सभी धर्मों के लोगों ने आक्रमणकारियों का सामना किया

परम पूज्य सरसंघचालक आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जी ने कहा कि विभिन्न धर्म, जाति और भाषा होने के बावजूद देश के लोग बाहरी आक्रमणकारियों के खिलाफ एकजुट होकर खड़े रहें क्योंकि ‘हमारे पूर्वज एक थे.’
उन्होंने भरतपुर से 35 किलोमीटर दूर खानवा में कहा, ‘‘हम सभी भारत माता के पुत्र हैं और विभिन्न संस्कृति, जाति और धर्म होने के बजाय अनंतकाल से साथ में रह रहे हैं.’’

इतिहास से एक उदाहरण लेते हुए भागवत ने राणा सांगा और बाबर के बीच 1527 के खानवा के युद्ध का जिक्र किया तथा कहा कि यह युद्ध दुनिया में मील का पत्थर था.

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि सांगा के योद्धा हसन खान मेवाती ने बाबर की ओर से अपनी सेना में धार्मिक आधार पर शामिल होने की पेशकश ठुकरा दी थी और वह भारत मात्रा के पुत्र थे.

उन्होंने बताया, ‘‘हसन ने कहा था कि उसकी भाषा, जाति और धर्म भले ही बाबर जैसी हो सकती है लेकिन वह सबसे पहले पहले भारतीय है और भारत माता का पुत्र है.’’ उन्होंने लोगों से तुच्छ मुद्दों में शामिल हुए बगैर एकजुट रहने की अपील की.

उन्होंने लोगों से अपील की, ‘‘छोटी-छोटी बातों को लेकर आपस में नहीं लड़ना, एक साथ खड़े रहो, देश को खड़ा करो, एकता की जय बोलो, सारी दुनिया को एकता सिखाइए.’’

भागवत ने कहा, ‘‘हम भारत माता के पुत्र हैं, हम परमभागवत पुत्र हैं और हमारे पूर्वज एक थे.’’  वह यहां राणा सांगा की एक पट्टिका का अनावरण करने के बाद लोगों को संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा, ‘‘बुलंद दरवाजे से बड़ा स्मारक यहां खड़ा है खानवा में..जो जवाब देगा कि भारत यहां खड़ा है एकता के साथ.’’ उन्होंने कहा कि भारत के पास विश्व को दिशानिर्देशित करने की शक्ति है.

भागवत ने कहा, ‘‘दिया तले अंधेरा होता है, सूरज तले अंधेरा नहीं होता..हमारा राष्ट्र सूरज के जैसा है जो दुनिया को ऊर्जा देता है. यह हमारी संस्कृति का प्रसाद है और प्रसाद देश दुनिया में हर एक तक पहुंचना चाहिए.’’

खानवा में स्मारक का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘सीकरी दरवाजा यह बताता है कि हम एक थे, हम एक हैं और हमारा धर्म, जाति या भाषा चाहे जो कुछ हो हम एक बने रहेंगे.’’

उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सांगा और उनकी सेना हार गई लेकिन इसने जाहिर कर दिया कि भारत एक है और प्रत्येक व्यक्ति साहस दिखाते हुए अपना बलिदान देने के लिए तैयार है जो पहला धर्म है.

उन्होंने अन्य योद्धाओं को याद करते हुए कहा कि चाहे महाराष्ट्र में शिवाजी हों या अयोध्या में संत, प्रत्येक देशभक्त का एक जवाब है कि हम ‘भारत पुत्र’ हैं और धर्म एवं भाषा अपनी जगह है, मुझे बदलने की कोशिश नहीं करें.

इससे पहले लोगों को संबोधित करते हुए धरोहर एवं संरक्षण आयोग के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत ने कहा कि राजस्थान सरकार ने राणा सांगा स्मृति बनाने के लिए डेढ़ करोड़ रूपये आवंटित किये हैं.

उन्होंने बताया कि भाजपा सरकार ने राज्य के अलग-अलग हिस्सों में इस तरह के प्रसिद्ध स्मारकों के जीर्णोद्धार के लिए 37 बड़ी परियोजनाएं भी आवंटित की हैं.

-------------------
                                     ऐतिहासिक धरोहर: 3 करोड़ 75 लाख रुपये
July 23, 2014 - राजस्थान

जयपुर – ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री श्री गुलाब चंद कटारिया ने   विधानसभा में कहा कि सरकार राजस्थान की सभी ऐतिहासिक अमूल्य धरोहरों को समुचित  संरक्षण देने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के शासी बोर्ड का पुनर्गठन किया है।

श्री कटारिया  ने  कहा कि रविन्द्र मंच के नवीनीकरण एवं सुधार कार्य पर वर्ष 2014-15 में 3 करोड़ 75 लाख रुपये खर्च किये जायेंगे। इसी तरह झालावाड के प्राचीन अवशेष मऊबोरदा में 3 करोड़ 53 लाख रुपये तथा दलहनपुर में 6 करोड़ 25 लाख रुपये की लागत से संरक्षण जीर्णोंधार और विकास के नवीन कार्य करवाये जायेंगे।

उन्होंने कहा कि पुरातत्व महत्व के भरतपुर के खानवा ग्राम में राणा सांगा स्मारक एवं पैनोरमा, वैर में किला व सफेद महल तथा भरतपुर के संग्रहालय का विकास कार्य पर इस वित्तीय वर्ष में 3 करोड़ 55 लाख रुपये खर्च किये जायेंगे।

श्री कटारिया ने कहा कि राज्य में विभिन्न भाषाओं को समुचित संरक्षण प्रदान करने के लिए राजस्थान भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, संस्कृत, ब्रजभाषा, सिंधी, उर्दू एवं पंजाबी भाषा अकादमियों को प्रभावी बनाने का प्रयास किया जायेगा।

राजस्थान की लोक कलाओं की चर्चा करते हुए श्री कटारिया ने कहा कि लोक कलाओं को आगे बढाने के समुचित प्रयास नहीं किये गये लेकिन अब कलाकारों को मंच प्रदान करने, सहायता करने और प्रोत्साहन दिया जायेगा।

ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री ने यह भी बताया कि ऐतिहासिक महत्व के दस्तावेजों एवं प्राचीन पाण्डलुपियों का संरक्षण किया जायेगा ताकि हमारे पूर्वजों के इस विशान ज्ञान को सुरक्षित रखा जा सकें। इन प्रचीन ग्रंथों एवं दस्तावेजों का डिजीटाईजेशन एवं माईक्रोफिल्मीकरण कर उन्हें शोधकार्ताओं एवं अध्येताओं के लिए ऑनलाईन किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि कला साहित्य एवं संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग राज्य की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, कलात्मक एवं साहित्यिक एवं विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है।
------------------

                                    "राष्ट्र को नहीं तोड़ सकती मजहब की दीवारें"
Saturday, February 21, 2015

जयपुर/भरतपुर।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत ने अखंडता का संदेश देते हुए कहा कि मजहब की दीवारें राष्ट्र को नहीं तोड़ सकती। उन्होंने आह्वान किया कि हमारी पूजा पद्धति, भाषा, जीवन शैली अलग-अलग होने के बावजूद राष्ट्र रक्षा के लिए एकजुट होकर सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।

भागवत ने खानवा (भरतपुर) में राणा संागा स्मारक पर आयोजित समारोह में कहा कि हिंदुस्तान में पहली बार विदेशी हमलावर बाबर ने "मैं भी मुसलमान और तुम भी मुसलमान" कहकर वीर योद्धा देशभक्त हसनखां मेवाती को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया, लेकिन मेवाती भारत की मिट्टी और देशभक्ति का परिचय देते हुए देश पर कुर्बान हो गए। मेवाती का बाबर को दिया गया यह उत्तर भारतीयता का परिचय है। भारत एक है और राष्ट्र पर होने वाले विदेशी हमले का हम सब मिलकर मुंहतोड़ जवाब देंगे।

हमारे लिए खानवा तीर्थ
भागवत ने कहा कि खानवा हमारे लिए तीर्थ है और इसकी मिट्टी देशभक्तों के लहू से सिंचित है, इसलिए पावन और पूजने योग्य है। हमारे जीवन में राणा सांगा स्मारक का महत्व और ऊंचाई बाबर की ओर से निर्मित बुलंद दरवाजे से कई गुना अधिक है। राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्रधिकरण अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत ने कहा कि राणा सांगा स्मारक केवल एक किलोमीटर की परिधि में निर्मित किया और इसमें भारत के उन सभी शूरवीरों की मूर्तियां लगाई गई हैं, जिन्होंने राणा सांगा के नेतृत्व में बाबर की सेना का मुकाबला किया।

"भेद करते हैं तो हार जाते हैं"
भागवत ने कहा कि भारत में करीब पौने सात लाख गांव हैं। सभी की बोली, रीति-रीवाज, रहन-सहन अलग-अलग हैं, लेकिन सभी भारत माता के पुत्र हैं। जब तक हम इसे याद रखते हैं, तब तक सुखी रहते हैं। जब हम जात-पांत का भेद करते हैं, तब हार जाते हैं। उन्होंने कहा, "क्या आप जात-पांत में पड़कर भारत छोड़ दोगे?"

आरएसएस राष्ट्रभक्ति वाला संगठन
संत बालकदास महाराज ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आतंकवाद नहीं, राष्ट्र भक्त संगठन है। पहले जो काम ऋषि-मुनि किया करते थे, वही कार्य आरएसएस के स्वयंसेवक करते हैं।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

21 मार्च 2015 से प्रारंभ होगा हिन्दू नव वर्ष विक्रम संवत् 2072




                                    21 मार्च 2015 को विक्रम संवत् के नये साल का आरम्भ


क्या है गुड़ी पड़वा या हिन्दू नववर्ष या चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (21 मार्च 2015 को) ?
http://www.himalayauk.org
चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या नववर्ष का आरम्भ माना गया है। ‘गुड़ी’ का अर्थ होता है विजय पताका । ऐसा माना गया है कि शालिवाहन नामक कुम्हार के पुत्र ने मिट्टी के सैनिकों का निर्माण किया और उनकी एक सेना बनाकर उस पर पानी छिड़ककर उनमें प्राण फूँक दिये। उसमें सेना की सहायता से शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित किया। इसी विजय के उपलक्ष्य में प्रतीक रूप में ‘‘शालीवाहन शक’ का प्रारम्भ हुआ। पूरे महाराष्ट्र में बड़े ही उत्साह से गुड़ी पड़वा के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। कश्मीरी हिन्दुओं द्वारा नववर्ष के रूप में एक महत्वपूर्ण उत्सव की तरह इसे मनाया जाता है।

इसे हिन्दू नव संवत्सर या नव संवत् भी कहते हैं।इस वर्ष 21 मार्च 2015 को कीलक नामक विक्रम संवत् 2072 का प्रारंभ होगा| 21 मार्च 2015 (शनिवार) को इस धरा की 1955885115वीं वर्षगांठ है| पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार ऐसी मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि की रचना प्रारम्भ की थी। इसी दिन से विक्रम संवत् के नये साल का आरम्भ भी होता है। सिंधी नववर्ष चेटीचंड उत्सव से शुरू होता है जो चैत्र शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है। सिंधी मान्यताओं के अनुसार इस शुभ दिन भगवान् झूलेलाल का जन्म हुआ था जो वरूण देव के अवतार हैं।

चैत्रे मासि जगत्‌ ब्रह्म ससर्ज प्रथमे हनि
शुक्ल पक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति॥


कहा जाता है कि ब्रह्मा ने सूर्योदय होने पर सबसे पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि की संरचना शुरू की। उन्होंने इसे प्रतिपदा तिथि को प्रवरा अथवा सर्वोत्तम तिथि कहा था। इसलिए इसको सृष्टि का प्रथम दिवस भी कहते हैं। इस दिन से संवत्सर का पूजन, नवरात्र घटस्थापन, ध्वजारोपण, वर्षेश का फल पाठ आदि विधि-विधान किए जाते हैं।चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वसन्त ऋतु में आती है। इस ऋतु में सम्पूर्ण सृष्टि में सुन्दर छटा बिखर जाती है। विक्रम संवत के महीनों के नाम आकाशीय नक्षत्रों के उदय और अस्त होने के आधार पर रखे गए हैं। सूर्य, चन्द्रमा की गति के अनुसार ही तिथियाँ भी उदय होती हैं। मान्यता है कि इस दिन दुर्गा जी के आदेश पर श्री ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इस दिन दुर्गा जी के मंगलसूचक घट की स्थापना की जाती है।

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार आज भी हमारे भारत देश में प्रकृति, शिक्षा तथा राजकीय कोश आदि के चालन-संचालन में मार्च अप्रेल के रूप में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही देखते हैं। यह समय दो ऋृतुओं का संधिकाल माना जाता है। इसमें रात्रि छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। प्रकृति एक नया रूप धारण कर लेती है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति नव पल्लव धारण कर नव संरचना के लिए ऊर्जावान हो रही हो। मानव, पशु-पक्षी यहाँ तक की जड़-चेतन प्रकृति भी प्रमाद एवं आलस्य का परित्याग कर सचेतन हो जाती है। इसी समय बर्फ पिघलने लग जाती है। आमों पर बौर लगना प्रारम्भ हो जाता है। प्रकृति की हरितिमा नवजीवन के संचार का प्रतीक बनकर हमारे जीवन से जुड़ सी जाती है।

इसी प्रतिपदा के दिन आज से 2072 वर्ष पूर्व उज्जयिनी नरेष महाराज विक्रमादित्य ने विदेषी आक्रांत शकों से भारत भूमि की रक्षा की और इसी दिन से कालगणना प्रारम्भ की गई। उपकृत राष्ट्र ने भी उन्हीं महाराज के नाम से विक्रमीसंवत् का नामकरण किया। महाराज विक्रमादित्य ने आज से 2072 वर्ष पूर्व राष्ट्र को सुसंगठित कर शकों की शक्ति का जड़ से उन्मूलन कर देश से पराजित कर भगा दिया और उनके मूल स्थान अरब में विजय की पताका फहरा दी। साथ ही साथ यवन, हूण, तुषार, पारसिक तथा कम्बोज देशों पर अपनी विजय ध्वजा फहरा दी। इन्हीं विजय की स्मृति स्वरूप वर्ष प्रतिपदा संवत्सर के रूप में मनाई जाती रही और आज भी बड़े उत्साह एवं ऐतिहासिक धरोहर की स्मृति के रूप में मनाई जा रही है। इनके राज्य में कोई चोर या भिखारी नहीं था। विक्रमादित्य ने विजय के बाद जब राज्यारोहण हुआ तब उन्होंने प्रजा के तमाम ऋणों को माफ कर दिया तथा नये भारतीय कैलेण्डर को जारी किया, जिसे विक्रम संवत् नाम दिया।

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है| करीब एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 111 वर्ष पूर्व इसी दिन ब्रह्मा जी ने जगत की रचना की थी| इस दिन चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती है| हिन्दू परम्परा के अनुसार इस दिन को ‘नव संवत्सर’ या ‘नव संवत’ के नाम से भी जाना जाता है|

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार हिंदू पंचांग के मुताबिक, इस वर्ष 21 मार्च 2015 को कीलक नामक विक्रम संवत् 2072 का प्रारंभ होगा| 21 मार्च 2015 को इस धरा की 1955885115वीं वर्षगांठ है| इसी दिन ब्रह्मा जी ने जगत की रचना प्रारंभ की थी इसीलिए हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नए साल का आरम्भ मानते हैं| हिन्दू पंचांग का पहला महीना चैत्र होता है| यही नहीं शक्ति और भक्ति के नौ दिन यानी कि नवरात्रि स्थापना का पहला दिन भी यही है| ऐसी मान्यता है कि इस दिन नक्षत्र शुभ स्थिति में आ जाते हैं और किसी भी नए काम को शुरू करने के लिए यह मुहूर्त शुभ होता है|

सबसे प्राचीन काल गणना के आधार पर ही प्रतिपदा के दिन विक्रमी संवत् के रूप में इस शुभ एवं शौर्य दिवस को अभिषिक्त किया गया है। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के राज्याभिषेक अथवा रोहण के रूप में मनाया गया। यह दिन वास्तव में असत्य पर सत्य की विजय को याद करने का दिवस है। इसी दिन महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ था।अगर ज्योतिष की माने तो प्रत्येक संवत् का एक विशेष नाम होता है| विभिन्न ग्रह इस संवत् के राजा, मंत्री और स्वामी होते हैं| इन ग्रहों का असर वर्ष भर दिखाई देता है| सिर्फ यही नहीं समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को ‘आर्य समाज’ स्थापना दिवस के रूप में चुना था| इसी शुभ दिन महर्षि दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना की थी। यह दिवस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक श्री केशव बलिराम हेडगेवार के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। पूरे भारत में इसी दिन से चैत्र नवरात्र की शुरूआत मानी जाती है।

वैदिक संस्कृति से जोड़ता है हमें विक्रम संवत्—-

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार गुलामी के बाद अंग्रेजों ने हम पर ऐसा रंग चढ़ाया ताकि हम अपने नववर्ष को भूल उनके रंग में रंग जाए| उन्ही की तरह एक जनवरी को ही नववर्ष मनाये और हुआ भी यही लेकिन अब देशवासियों को यह याद दिलाना होगा कि उन्हें अपना भारतीय नववर्ष विक्रमी संवत बनाना चाहिए, जो आगामी 21 मार्च 2015 (शनिवार)को है|

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार वैसे अगर देखा जाये तो विक्रम संवत् ही हमें अपनी संस्कृति से जोड़ता है| भारतीय संस्कृति से जुड़े सभी समुदाय विक्रम संवत् को एक साथ बिना प्रचार और नाटकीयता से परे होकर मनाते हैं और इसका अनुसरण करते हैं| दुनिया का लगभग हर कैलेण्डर सर्दी के बाद बसंत ऋतु से ही प्रारम्भ होता है| यही नहीं इस समय प्रचलित ईस्वी सन बाला कैलेण्डर को भी मार्च के महीने से ही प्रारंभ होना था| आपको बता दें कि इस कैलेण्डर को बनाने में कोई नयी खगोलीय गणना करने के बजाए सीधे से भारतीय कैलेण्डर (विक्रम संवत) में से ही उठा लिया गया था|

हिंदी में 12 महीनों के नाम—

ऐसा कहा जाता है कि पृथ्वी द्वारा 365/366 दिन में होने वाली सूर्य की परिक्रमा को वर्ष और इस अवधि में चंद्रमा द्वारा पृथ्वी के लगभग 12 चक्कर को आधार मानकर कैलेण्डर तैयार किया और क्रम संख्या के आधार पर उनके नाम रखे गए हैं| हिंदी महीनों के 12 नाम हैं चैत्र, बैशाख, ज्‍येष्‍ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्‍गुन|

हम कैसे मनायें नव वर्ष-नव संवत्सर..????

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस भारतीय और वैदिक नव वर्ष की पूर्व संध्या पर हमें दीपदान करना चाहिये। घरों में शाम को 7 बजे लगभग घण्टा-घडियाल व शंख बजाकर मंगल ध्वनि से नव वर्ष का स्वागत करें। इष्ट मित्रों को एसएमएस, इमेल एवं दूरभाष से नये वर्ष की शुभकामना भेजना प्रारम्भ कर देना चाहिये। नव वर्ष के दिन प्रातःकाल से पूर्व उठकर मंगलाचरण कर सूर्य को प्रणाम करें। हवन कर वातावरण शुद्ध करें। नये संकल्प करें। नवरात्रि के नो दिन साधना के शुरू हो जाते हैं तथा नवरात्र घट स्थापना की जाती है।

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार नव वर्ष का स्वागत करने के लिए अपने घर-द्वार को आम के पत्तों से अशोक पत्र से द्वार पर बन्दनवार लगाना चाहिये। नवीन वस्त्राभूषण धारण करना चाहिये। इसी दिन प्रातःकाल स्नान कर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल ले कर ‘ओम भूर्भुवः स्वः संवत्सर-अधिपति आवाहयामि पूजयामि च’ मंत्र से नव संवत्सर की पूजा करनी चाहिये एवं नव वर्ष के अशुभ फलों के निवारण हेतु ब्रह्माजी से प्रार्थना करनी चाहिये। हे भगवन्! आपकी कृपा से मेरा यह वर्ष मंगलमय एवं कल्याणकारी हो। इस संवत्सर के मध्य में आने वाले सभी अनिष्ट और विघ्न शांत हो जाये।

नव संवत्सर के दिन नीम के कोमल पत्तों और ऋतु काल के पुष्पों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा, मिश्री, इमली और अजवाइन मिलाकर खाने से रक्त विकार आदि शारीरिक रोग होने की संभावना नहीं रहती है तथा वर्षभर हम स्वस्थ रह सकते हैं। इतना न कर सके तो कम-से-कम चार-पाँच नीम की कोमल पत्त्यिाँ ही सेवन कर ले तो पर्याप्त रहता है। इससे चर्मरोग नहीं होते हैं। महाराष्ट्र में तथा मालवा में पूरनपोली या मीठी रोटी बनाने की प्रथा है। मराठी समाज में गुड़ी सजाकर भी बाहर लगाते हैं। यह गुड़ी नव वर्ष की पताका का ही स्वरूप है।

गुड़ी का अर्थ विजय पताका होती है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की संधि से बना है ‘युगादि‘ । आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में ‘उगादि‘ और महाराष्ट्र में यह पर्व ‘ग़ुड़ी पड़वा‘ के रूप में मनाया जाता है। विक्रमादित्य द्वारा शकों पर प्राप्त विजय तथा शालिवाहन द्वारा उन्हें भारत से बाहर निकालने पर इसी दिन आनंदोत्सव मनाया गया । इसी विजय के कारण प्रतिपदा को घर-घर पर ‘ध्वज पताकाएं’ तथा ‘गुढि़यां’ लगाई जाती है गुड़ी का मूल …संस्कृत के गूर्दः से माना गया है जिसका अर्थ… चिह्न, प्रतीक या पताका ….पतंग….आदि- कन्नड़ में कोडु जिसका मतलब है चोटी, ऊंचाई, शिखर, पताका आदि। मराठी में भी कोडि का अर्थ है शिखर, पताका। हिन्दी-पंजाबी में गुड़ी का एक अर्थ पतंग भी होता है। आसमान में ऊंचाई पर फहराने की वजह से इससे भी पताका का आशय स्थापित होता है।

भारत भर के सभी प्रान्तों में यह नव-वर्ष विभिन्न नामों से मनाया जाता है जो दिशा व स्थानानुसार सदैव मार्च-अप्रेल के माह में ही पड़ता है | गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है।

सच तो यह है कि विक्रम संवत् ही हमें अपनी संस्कृति की याद दिलाता है और कम से कम इस बात की अनुभूति तो होती है कि भारतीय संस्कृति से जुड़े सारे समुदाय इसे एक साथ बिना प्रचार प्रसार और नाटकीयता से परे हो कर मनाते हैं। हम सब भारतवासियों का कर्तव्य है कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक और भारतीय कैलेण्डर विक्रम संवत् के अनुसार इस दिन का स्वागत करें। पराधीनता एवं गुलामी के बाद अंग्रेजों ने हमें एक ऐसा रंग चढ़ाया कि हम अपने नव वर्ष को भूल कर-विस्मृत कर उनके रंग में रंग गये। उन्हीं की तरह एक जनवरी को नव वर्ष अधिकांश लोग मनाते आ रहे हैं। लेकिन अब देशवासी को अपनी भारतीयता के गौरव को याद कर नव वर्ष विक्रमी संवत् मनाना चाहिये जो आगामी 21 मार्च को है।

क्या करें नव-संवत्सर के दिन (गुड़ी पड़वा विशेष)—-
—घर को ध्वजा, पताका, तोरण, बंदनवार, फूलों आदि से सजाएँ व अगरबत्ती, धूप आदि से सुगंधित करें।
—-दिनभर भजन-कीर्तन कर शुभ कार्य करते हुए आनंदपूर्वक दिन बिताएँ।
—सभी जीव मात्र तथा प्रकृति के लिए मंगल कामना करें।
—नीम की पत्तियाँ खाएँ भी और खिलाएँ भी।
—ब्राह्मण की अर्चना कर लोकहित में प्याऊ स्थापित करें।
—इस दिन नए वर्ष का पंचांग या भविष्यफल ब्राह्मण के मुख से सुनें।
—इस दिन से दुर्गा सप्तशती या रामायण का नौ-दिवसीय पाठ आरंभ करें।
—इस दिन से परस्पर कटुता का भाव मिटाकर समता-भाव स्थापित करने का संकल्प लें।

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के द्वारा आप सभी को नव वर्ष की अनेक-अनेक शुभकामनाएँ… यह वर्ष भारतीयों के लिये ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के लिये भी सुख, शांति एवं मंगलमय हो।

धन्यवाद…
पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री,(ज्योतिष-वास्तु सलाहकार)
राष्ट्रिय महासचिव-भगवान परशुराम राष्ट्रिय पंडित परिषद्
मोब. 09669290067 (मध्य प्रदेश) एवं 09024390067 (राजस्थान)
--------------------------------

संवत 2072 का मंत्रीमण्डल एवं फलादेश 
भोपाल. गुड़ी पड़वा पर 21 मार्च से विक्रम संवत्सर 2072 का शुभारंभ होगा। कीलक नाम के इस नए संवत्सर का राजा शनि और मंत्री पद मंगल के पास रहने से भारत समेत कई देशों की न्याय व्यवस्था पहले से काफी मजबूत होगी। मंगल प्रशासनिक क्षेत्र में अनुशासन को बढ़ावा देगा। चंद्रमा के पास दुर्गेश (रक्षा) का पद रहेगा। इसके स्त्रीकारक ग्रह होने के कारण महिलाओं का वर्चस्व बढ़ेगा, सुरक्षा बढ़ेगी और कई महिलाओं को उच्च पद की प्राप्ति होगी।

नया विक्रम संवत्सर 13 माह का होगा क्योंकि इस वर्ष दो अाषाढ़ मास रहेंगे। इनमें एक को अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) कहा जाता है। हिंदू नए वर्ष की शुरूआत जिस वार को होती है, उस वार का स्वामी ही आकाशीय ग्रहों के मंत्रिमंडल का राजा होता है।
अन्य पदों का भार भी शास्त्रोक्त विधि से की गई गणना के मुताबिक निर्धारित होता है। इस बार 21 मार्च, शनिवार को गुड़ीपड़वा से विक्रम संवत 2072 का शुभारंभ होगा। भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि की रचना की थी। इस दिन से चैत्र नवरात्र का शुभारंभ होता है। भगवान विष्णु का मत्स्यावतार इसी दिन हुआ था।
कीलक नाम है नए वर्ष का
प्रत्येक संवत्सर का एक विशेष नाम होता है। इस संवत्सर का नाम कीलक है, जिसका अर्थ पंडितों ने रहस्य माना है। चूंकि शनिदेव इस वर्ष के राजा हैं, इसलिए इस वर्ष न्याय प्रक्रिया से जुड़े कई रहस्यों के उजागर होने की संभावना है। वर्तमान में शनि, मंगल के अधिपत्य वाली वृश्चिक राशि में है। इसका यह प्रभाव होगा कि पुलिस, प्रशासन, सेना में न्याय तंत्र व अनुशासन का पालन सख्ती से होगा। शुक्र व चंद्रमा के प्रभावी पदों पर होने से सालभर लोगों का वैभव विलासिता के प्रति अधिक रुझान रहेगा और वर्षा की स्थिति संतोषजनक रहेगी। चंद्रमा के दुर्गेश के साथ ही धनेश होने से विदेशी व्यापार के लिए केंद्र सरकार सरल नीतियां लागू करेगी। कृषि उत्पादों, पेट्रोलियम व दूरसंचार उपकरणों के क्षेत्र में भी विदेशी निवेश बढ़ेगा।
भारत की साख बढ़ेगी, परंतु भूमि व भवन संबंधी कानूनों के सख्त होने के कारण उद्योगों पर एक बार फिर कुछ दिनों मंदी की मार दिखाई देगी। सोना-चांदी के भाव में नवंबर से तेजी से उतार-चढ़ाव की स्थित बनेगी। किसानों के लिए यह साल सुख-समृद्धिदायक रहेगा।
इस साल होंगे दो अाषाढ़ मास
पं. धर्मेंद्र शास्त्री के मुताबिक सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को संक्राति होना कहते हैं। जब दो पक्षों में संक्रांति नहीं होती तब अधिकमास होता है। आमतौर पर यह स्थिति 32 माह व 16 दिन में एक बार यानी हर तीसरे वर्ष में बनती है। इसकी वजह सूर्य व पृथ्वी की गति में होने वाला परिवर्तन है। इस वर्ष आषाढ़ 3 जून से 30 जुलाई तक रहेगा। इसमें 17 जून से 16 जुलाई की अवधि अधिकमास कहलाएगी।

किस ग्रह के पास कौन सा पद
ज्योतिषी अंजना गुप्ता के अनुसार नए संवत्सर में ग्रह व विभाग इस प्रकार होंगे। शनि-राजा, मंत्री-मंगल, चंद्रमा-दुर्गेश-धनेश, बुध-धान्येश, गुरु नीरसेश, शनि-शुक्र-रसेश होंगे। ग्रह स्थितियां व पदों के कारण महिलाओं का वर्चस्व बढ़ेगा। चंद्रमा के दुर्गेश होने से गौ-वंश की सुरक्षा बढ़ेगी।

'करप्शन' के खिलाफ शनि लेंगे 'एक्शन'

शरद द्विवेदी, इलाहाबाद
विक्रम संवत 2072 में 'करप्शन' पर जोरदार 'रिएक्शन' होगा। न्याय के अधिपति शनि देव 'एक्शन' लेंगे। नव संवत्सर पर वह आकाशीय मंत्रिमंडल के प्रधानमंत्री होंगे। युद्ध के कारक माने जाने वाले अग्नि (मंगल) देव मंत्री होंगे, ऐसे में ज्योतिर्विदों का यही मानना है कि कुछ हो ना हो, भ्रष्टाचार पर जरूर अंकुश लगेगा। हां, सत्यमार्ग का अनुशरण करने वाले पुरस्कृत होंगे, इसलिए परोपकारी व सदाचारी लोगों के लिए दिन मंगलकारी ही रहेंगे।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू हो रहे नए विक्रम संवत में ग्रहों, देवताओं को नई जिम्मेदारी मिलेगी। इस बार 21 मार्च से 'कीलक' नामक संवत्सर शुरू होगा। इसके राजा शनि होंगे। भारतीय मनीषी शनि को चिंतन, विचार, रहस्य एवं न्याय के देवता मानते हैं। मंगल मंत्री होंगे। आकाशीय मंत्रिमंडल में इनका नंबर दो का दर्जा रहेगा। ज्योतिर्विद आचार्य अविनाश राय कहते हैं कि भरण-पोषण एवं मन के कारक चंद्रमा नए सेनापति होंगे। खाद्य आपूर्ति व जल के प्रभारी शुक्र होंगे। देवगुरु वृहस्पति, दुर्गो का प्रभाग चलाएंगे। सूर्य तरल पदार्थो एवं बुध अन्न के स्वामी होंगे। बुध के पास वित्त मंत्रालय रहेगा। नए आकाशीय मंत्रिमंडल की वजह से भारतीय वैज्ञानिक जहां नए शोध एवं आविष्कार से अपना परचम लहराएंगे, वहीं विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों में भूकंप जैसी स्थिति भी बन सकती है।
ज्योतिर्विद वैश्विक महाशक्ति अमेरिका की स्थिति कमजोर पड़ने व चीन-भारत को और मजबूत होने की संभावना भी व्यक्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि युद्ध के कारक मंगल मंत्री हैं, इसलिए चीन व पाकिस्तान की सीमा पर तनाव रहेगा, अलबत्ता भारत का अधिक नुकसान नहीं हो सकेगा। वरिष्ठ ज्योतिर्विद डॉ. जय नारायण मिश्र व श्रीधर्मज्ञानोपदेश संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य देवेंद्र प्रसाद त्रिपाठी का मत है कि शिक्षा, तकनीकी में विकास होने के साथ सत्ता-प्रशासन का बेहतर तालमेल होगा।
---------
क्या है नवसंवत्सर
भारतीय विद्या भवन के निदेशक डॉ. रामनरेश त्रिपाठी के अनुसार परमपिता ब्रह्मा ने चैत्र शुक्ल प्रतिप्रदा को सृष्टि रची थी। समय, वर्ष, मास, ऋतु, दिन-रात, घंटा-मिनट, कला-बिकला स्वरूप की रचना आज से लगभग एक अरब, 95 करोड़, 58 लाख, 85 हजार, 117 वर्ष पहले हुई थी। बकौल त्रिपाठी, विक्रम संवत का संबंध विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत, ब्रह्मांड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। विक्रम संवत्सर के बाद वर्ष 12 माह और सप्ताह सात दिन का माना गया। महीनों का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की चाल पर होता है। माह को कृष्णपक्ष व शुक्लपक्ष में बांटा गया है। दिन का नामकरण आकाश में ग्रहों की स्थिति सूर्य से प्रारम्भ होकर क्रमश: मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि और चंद्र से हुआ है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने चैत्र शुक्ल प्रतिप्रदा को ही सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना व वर्ष की गणना करते हुए पंचांग की रचना की थी।
-----
राशियों के प्रभाव
वरिष्ठ ज्योतिर्विद डॉ. जय नारायण मिश्र के अनुसार नवसंवत्सर में हर राशि पर प्रभाव पड़ेगा।
-मेष : धन सुख व आनंद में वृद्धि होगी, हनुमत उपासना करें।
-वृष : मन में अशांति, धन व स्वास्थ्य हानि होगी, शुक्र की पूजा करें।
-मिथुन : पारिवारिक झगड़ा बढ़ेगा, भगवान कार्तिकेय की पूजा करें।
-कर्क : सुख एवं समृद्धि की बढ़ोत्तरी होगी, चंद्रमा की पूजा करें।
-सिंह : रोजगार व व्यवसाय में बाधा आएगी, सूर्योपासना करें।
-कन्या : विश्वासपात्र परेशानी देंगे, गणेश की पूजा करें।
-तुला : साढ़े साती व रोग से मुक्ति मिलेगी, शुक्र की पूजा करें।
-वृश्चिक : मानहानि व धन हानि की संभावना, हनुमत उपासना करें।
-धनु : धन की वृद्धि, पुत्र का सुख मिलेगा, भगवान शंकर की पूजा करें।
-मकर : समाजिक अपमान की संभावना, शिव स्तुति करें।
-कुंभ : धन हानि व कर्मचारियों से दिक्कत आएगी, शिव स्तुति करें।
-मीन : रोग में बढ़ोत्तरी की संभावना है, वृहस्पति की पूजा करें।

संसद भवन की डिजाइन : चौसठ योगिनी मंदिर की







                     हमारे संसद भवन की डिजाइन चौसठ योगिनी मंदिर जैसी है

                                                   रविन्द्र झारखरिया    Apr 13, 2014,

मुरैना. हमारा संसद भवन ब्रिटिश वास्तुविद् सर एडविन लुटियंस की मौलिक परिकल्पना माना जाता है। लेकिन, इसका मॉडल हू-ब-हू मुरैना जिले के मितावली में मौजूद चौसठ योगिनी शिव मंदिर से मेल खाता है। 9वीं सदी में प्रतिहार वंश के राजाओं द्वारा बनाए गए मंदिर में 101 खंभे कतारबद्ध हैं। और 64 कमरों में एक-एक शिवलिंग है। मंदिर के मुख्य परिसर में भी एक बड़ा शिवलिंग स्थापित है।
माना जाता है कि हर कमरे में शिवलिंग के साथ देवी योगिनी की मूर्ति भी रही होगी, जिसके आधार पर इसका नाम चौसठ योगिनी मंदिर पड़ा। इकंतेश्वर महादेव के नाम से भी प्रतिष्ठित यह मंदिर कभी तांत्रिक अनुष्ठान के विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता था। छह एकड़ में फैली संसद में 12 दरवाजे और 27 फीट ऊंचे 144 खंभे कतारबद्ध हैं। इसका व्यास 560 फीट और घेरा 533 मीटर है। इसके निर्माण में 1927 में 83 लाख रुपए की राशि खर्च हुई थी।
------------------

अतुलनीय भारत का दिल बेहद खूबसूरत है। घुमक्कड़ी के शौकीनों के लिए मध्यप्रदेश में कई ठिकाने हैं। यह अलग बात है कि कई शानदार पर्यटन स्थल अब भी पर्यटकों की बाट जोह रहे हैं। मुरैना जिले के मितावली गांव में स्थित चौसठ योगिनी शिवमंदिर अपनी वास्तुकला और गौरवशाली परंपरा के लिए आसपास के इलाके में तो प्रसिद्ध है लेकिन मध्यप्रदेश पर्यटन के मानचित्र पर जगह नहीं बना सका है। अपने क्रियेटिव विज्ञापनों को लेकर चर्चित मध्यप्रदेश का पर्यटन विभाग चौसठ योगिनी शिवमंदिर की मार्केटिंग ढंग से नहीं कर सका है। आप यदि मितावली आएंगे और नौवीं सदी के इस मंदिर को निहारेंगे तो हैरत से भर उठेंगे। जमीन से करीब ३०० फीट ऊंचाई पर एक पहाड़ी पर बने गोलाकार शिवमंदिर को देखकर अनायास ही आपको मशहूर ब्रिटिश वास्तुकार सर एडविन लुटियंस की याद आएगी। सर लुटियंस, जिन्होंने दिल्ली को एक नया रूप, रंग और आकार दिया था। भारत के खूबसरत संसद भवन की रचना के लिए आज भी उन्हें तहेदिल से याद किया जाता है। मितावली में इकंतेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी पहचाने जाने वाला चौसठ योगिनी शिवमंदिर हू-ब-हू हमारी संसद के जैसा दिखता है। मंदिर परिसर में आकर दिमाग की कुछ खिड़कियां खुलने लगती हैं और हवा के साथ कुछ प्रश्न इन खिड़कियों से होकर भीतर घुस आते हैं। क्या वाकई हमारी संसद के भवन की परिकल्पना लुटियंस की मौलिक सोच थी? १२ फरवरी १९२१ को दिल्ली में जिस संसद भवन की आधारशिला रखी गई, क्या उसके वास्तु की प्रेरणा लुटियंस को चम्बल के चौसठ योगिनी शिवमंदिर से मिली थी? ये कुछ सवाल हैं जो इतिहास के विद्यार्थियों के लिए शोध का विषय तो बनते ही हैं। गहन शोध के जरिए ही इन सवालों के सही जवाब भी हमारे सामने आएंगे। तब ही हम गर्व के साथ कह सकेंगे कि दुनिया में अपनी खूबसूरती के लिए विख्यात भारतीय संसद की इमारत की परिकल्पना सर लुटियंस के दिमाग की उपज नहीं बल्कि गौरवशाली भारतीय वास्तुकला का ही एक नायाब नमूना है।
मितावली का यह चौसठ योगिनी शिवमंदिर मुरैना जिला मुख्यालय से करीब ३५ किलोमीटर की दूर पर स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए सिंगललेन सड़क है, कई जगह जिसकी हालत खराब है। यहां तक पहुंचने में पर्यटकों को थोड़ी मुश्किल का सामना जरूर करना पड़ता है लेकिन यहां आने के बाद उन्हें महसूस होगा कि यदि वे इस मंदिर को न देखते तो देखने के लिए बहुत कुछ छूट जाता। नौवीं सदी में शिवमंदिर का निर्माण तत्कालीन प्रतिहार राजवंश ने कराया था। मंदिर गोलाकार है, ठीक भारतीय संसद के भवन की तरह। मंदिर की गोलाई में चौसठ कमरे हैं। प्रत्येक कमरे में एक-एक शिवलिंग है। कभी इन कमरों में भगवान शिव के साथ देवी योगिनी की मूर्तियां भी थीं। देवी योगिनी की चौसठ मूर्तियों के कारण ही इसका नाम चौसठ योगिनी शिवमंदिर पड़ा। देवी योगिनी की काफी मूर्तियां ग्वालियर किले के संग्रहालय में रखी हैं। परिसर के बीचों-बीच एक बड़ा गोलाकार शिवमंदिर भी है। मुख्य मंदिर में १०१ खंभे कतारबद्ध खड़े हैं, जो संसद भवन के गलियारे की याद दिलाते हैं। मंदिर के निर्माण में लाल-भूरे बलुआ पत्थरों का उपयोग किया गया है, जो मितावली और उसके आसपास के इलाके में पाए जाते हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि प्राचीन समय में मंदिर में तांत्रिक साधना की जाती थीं। यह तांत्रिक अनुष्ठान का बड़ा केन्द्र था।
भव्य शिवमंदिर को देखने के लिए जनवरी-फरवरी के माह में हम घुमक्कड़ मित्रों की टोली ने योजना बनाई थी। इस टोली में मेरे साथ युवा पत्रकार हरेकृष्ण दुबोलिया, महेश यादव और गिरीश पाल भी शामिल थे। हम ग्वालियर से किराए की टैक्सी से मितावली की ओर निकले। मितावली के नजदीक पहुंचकर जब कुछ स्थानीय लोगों से हमने मंदिर तक पहुंचने के रास्ते के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा- ‘चम्बल की संसद देखने जा रहे हो।’ इस कथन से स्पष्ट होता है कि स्थानीय लोगों के लिए देश में दो संसद भवन हैं। एक दिल्ली में तो दूसरा उनके गांव मितावली में। वैसे रास्ता बताने में गूगल मैप ने भी हमारी खूब मदद की। आखिर गूगल मैप और ग्रामवासियों की मदद से हम जल्द ही चौसठ योगिनी शिवमंदिर पहुंच गए। टैक्सी नीचे छोड़कर पैदल ही करीब २०० सीढिय़ां चढ़कर पहाड़ी के ऊपर मंदिर के सामने पहुंचे। पर्यटकों की ज्यादा संख्या नहीं थी। किसी दूसरे शहर से आए करीब पांच-छह और लोग वहां मौजूद थे। मंदिर को लेकर उनसे काफी देर तक बातचीत हुई। वे भी आश्चर्यचकित थे चम्बल में संसद भवन का प्रतिरूप देखकर। पर्यटकों के उस समूह में एक बुजुर्ग धोती-कुर्ता पहने हुए थे। बातचीत में पता चला कि वे पंडित हैं और मुम्बई से आए हैं। उनके साथ अप्रवासी भारतीय थे, जो उनके यजमान थे। पंडितजी भारत के गौरव से रू-ब-रू कराने के लिए अपने यजमानों को कुछ चिह्नित जगहों पर घुमाने निकले थे। उनकी भारत दर्शन की योजना में चम्बल का यह हिस्सा भी शामिल था, यह जानकर सुखद अनुभव हुआ।
मितावली के आसपास बिखरा पड़ा है सांस्कृतिक इतिहास : मध्यप्रदेश सरकार और केन्द्र सरकार चाहे तो चम्बल में पर्यटकों की संख्या को आसानी के साथ बढ़ाया जा सकता है। इसका फायदा यहां के ग्रामवासियों को तो होगा ही साथ ही सरकारों के राजकोष में भी इजाफा हो सकेगा। आगरा का ताजमहल और ग्वालियर का किला तो दुनिया के लोगों को आकर्षित कर अपने पास बुलाता ही है। अगर सरकार थोड़े से प्रयास करे तो आगरा और ग्वालियर आने वाले इन मेहमानों को डकैतों-बागियों के लिए कुख्यात चम्बल की खूबसूरत और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध तस्वीर भी दिखाई जा सकेगी। ग्वालियर-चम्बल क्षेत्र पर्यटन के नजरिए से काफी समृद्ध है। मुरैना से सिहोनिया गांव (ककनमठ), मितावली, पडावली, बटेश्वर होते हुए नूराबाद तक के बेल्ट में गौरवशाली इतिहास के दर्शन होते हैं। मुरैना शहर से उत्तर-पूर्व दिशा में करीब २० किलोमीटर दूर सिहोनिया गांव में आठवीं सदी का ककनमठ मंदिर है। ककनमठ मंदिर खजुराहो के कंदारिया महादेव मंदिर से भी विशाल है। ककनमठ मंदिर से पश्चिम की दिशा में करीब ३० किलोमीटर की दूरी पर मितावली का चौसठ योगिनी मंदिर स्थित है। मितावली से दक्षिण-पश्चिम दिशा में करीब चार किलोमीटर ही आगे बढऩे पर पडावली आता है। पडावली में विशाल विष्णु मंदिर है। मंदिर के मण्डप की चार दीवारों पर चार युगों, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग में मनुष्य की प्रवृत्ति को दिखाने का प्रयास किया गया है। इसके लिए सेंड स्टोन पर खूबसूरती से संभोग से लेकर समाधि में लिप्त आकृतियां उकेरी गई हैं। पडावली में शानदार नक्काशी को देखकर करीब एक किलोमीटर ही आगे बढऩा होगा कि शिवमंदिरों का खजाना हमारी प्रतीक्षा कर रहा होता है। कहते हैं आठवीं शताब्दी में कभी यहां ३००-४०० शिवमंदिरों का समूह था। एक समय में ये सभी मंदिर जमींदोज हो गए थे। पुरातत्व विभाग के प्रयासों से यहां फिर से आधा सैकड़ा से अधिक मंदिर पुनर्जन्म ले चुके हैं। यहां आकर पर्यटकों को अलौकिक शांति का अनुभव होता है। अब यहां से उत्तर-पूर्व की दिशा में करीब आठ किलोमीटर आगे बढऩे पर शनिश्चरा मंदिर के दर्शन होते हैं। यह भारत का दूसरा शनिमंदिर है। यह पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यहां से ग्वालियर की दूर २७ किमी रह जाती है। पर्यटन के नजरिए से इस बेल्ट पर ध्यान दिया जाए तो ग्वालियर-चम्बल को डकैत, बीहड़, बंदूक के अलावा उसकी खूबसूरती, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक समृद्धि के लिए भी पहचाना जाएगा।
----------------------

भारत का संसद भवन

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

शिव थे मुस्लिमों के पहले पैगंबर: मुफ्ती मोहम्मद इलियास

शिव थे मुस्लिमों के पहले पैगंबर: जमीयत उलेमा
नवभारत टाइम्स| Feb 18, 2015
मनोज पांडेय, फैजाबाद

जमीयत उलेमा के मुफ्ती मोहम्मद इलियास ने अयोध्या में चौंकाने वाला बयान देते हुए कहा कि भगवान शंकर मुस्लिमों के पहले पैगंबर हैं। उन्होंने कहा कि इस बात को मानने में मुसलमानों को कोई गुरेज नहीं है।

जमीयत उलेमा का एक डेलिगेशन बुधवार को अयोध्या आया था। जमीयत उलेमा 27 फरवरी को बलरामपुर में कौमी एकता का कार्यक्रम करने जा रहा है। इसी सिलसिले में वह अयोध्या के साधु-संतों को कार्यक्रम में हिस्सा लेने की अपील करने आए थे। मौलाना ने कहा कि मुसलमान भी सनातन धर्मी है और हिंदुओं के देवता शंकर और पार्वती हमारे भी मां-बाप है। उन्होंने आरएसएस के हिंदू राष्ट्र वाली बात पर कहा कि मुस्लिम हिंदू राष्ट्र के विरोधी नहीं हैं।

मुफ्ती मोहम्मद इलियास ने कहा कि जिस तरह से चीन में रहने वाला चीनी, अमेरिका में रहने वाला अमेरिकी है, उसी तरह से हिंदुस्तान में रहने वाला हर शख्स हिंदू है। यह तो हमारा मुल्की नाम है। उन्होंने कहा कि जब हमारे मां-बाप, खून और मुल्क एक है तो इस लिहाज से हमारा धर्म भी एक है। इस दौरान मुस्लिम डेलिगेशन ने राम जन्मभूमि के मुख्य पुजारी सतेंद्र दास और शनि धाम के महंत हरदयाल शास्त्री के साथ मिलकर आतंकवाद का पुतला फूंका।

-------

मुसलिम धर्मगुरु मुफ्ती मोहम्मद इलियास ने कहा, भगवान शंकर व पार्वती हमारे भी अभिभावक हैं
By Prabhat Khabar | Publish Date: Feb 19 2015

फैजाबाद : जमीयत उलेमा के मुफ्ती मोहम्मद इलियास ने कहा है कि भगवान शंकर मुसिलमों के पहले पैगंबर हैं. उन्होंने कहा कि इस बात को मानने में मुसलमानों को कोई गुरेज नहीं है. मौलाना ने कहा कि हिंदुओं के देवता शंकर और पार्वती हमारे अभिभावक है.

उन्होंने आरएसएस के हिंदू राष्ट्र संबंधी बयान पर कहा कि मुसलिम हिंदू राष्ट्र के विरोधी नहीं हैं. मुफ्ती मोहम्मद इलियास ने कहा कि जिस तरह से चीन में रहने वाले चीनी, अमेरिका में रहने वाले अमेरिकी हैं, उसी तरह हिंदुस्तान में रहने वाला हर शख्स हिंदू है. उन्होंने कहा कि हिंदू हमारा मुल्की नाम है. उन्होंने कहा कि जब हमारे मां, पिता खून और मुल्क एक हैं तो इस लिहाज से हमारा धर्म भी एक है.

इस दौरान मुसलिम प्रतिनिधिमंडल ने राम जन्मभूमि के मुख्य पुजारी सतेंद्र दास और शनि धाम के महंत हरदयाल शास्त्री के साथ मिल कर आतंकवाद का पुतला फूंका. जमीयत उलेमा का एक प्रतिनिधिमंडल बुधवार को अयोध्या पहुंचा था. यह संगठन 27 फरवरी को बलरामपुर में कौमी एकता का कार्यक्रम करने जा रहा है. इस कार्यक्रम में साधु संतों को आमंत्रित करने के लिए प्रतिनिधिमंडल अयोध्या आया था. बहरहाल, अब इसका तीखा विरोध शुरू  हो गया है.
 --------------
‘शंकर को पैगंबर बताने वाले मुफ्ती पहले हिंदू धर्म को जानो’
 News Feb 19, 2015
लखनऊ।

हिंदुओं के आराध्य देव भगवान शंकर को मुसलमानों का पहला पैगंबर बताने वाले जमीयत उलेमा के मुफ्ती मोहम्मद इलियास के विवादित बयान पर लखनऊ के ईदगाह इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा कि इस तरह के बयान से मुसलमानों पर कोई असर नहीं होता। आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना डॉ. कल्बे सादिक ने कहा कि मुफ्ती मोहम्मद इलियास धर्म के नाम पर विवाद न खड़ा करें। सादिक के मुताबिक वह (मुफ्ती मोहम्मद इलियास) पहले साबित करें कि वे जमीयत उलमा में क्या हैसियत रखते हैं। इस तरह के बयान से पहले वह हिंदू धर्म के बारे में जानें, क्योंकि शंकर भगवान हिंदू धर्म की आस्था का केंद्र हैं। फैजाबाद के शहर उलेमा ने कहा है कि भगवान शंकर को मुसलमानों का पहला पैगंबर बताना उनका अपना विचार है। उनके मुताबिक, ‘हर धर्म अपनी धार्मिक आस्था के आधार से समाज से जुड़ा है। हिंदू धर्म के मानने वालों व मुस्लिम धर्म के मानने वालों का अलग-अलग इतिहास है और इसे किसी से जोड़ा नहीं जा सकता।’
मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली
‘जमीयत उलमा के मुफ्ती के बयान को जमीयत के उलमा ही जवाब देंगे। मुसलमान हमेशा से हर धर्म व धार्मिक व्यक्ति का सम्मान करता रहा है। हिंदुस्तान में रहने वाला हर मुसलमान हिंदुस्तानी है। यह बार-बार बताने की जरूरत नहीं है। हम सब हिंदुस्तान की सरजमीं को ही अपना वतन समझते हैं। आखिर में इस सरजमीं की मिट्टी में ही सुपुर्द होना है। बयानबाजी कर मजहब में खराबी व फिक्र पैदा करना गलत है।’

‘इस्लाम हर धर्म का सम्मान करना सिखाता है। हिंदुस्तान में हिंदुस्तानी कहलाने में किसी मुसलमान को कभी कोई आपत्ति नहीं हुई और न होगी। हम सब वतन से मोहब्बत करने वाले लोग हैं हम सब हिंदुस्तानी हैं।’
मुफ्ती मुकर्रम
‘उन्होंने (मुफ्ती मोहम्मद इलियास) जो कहा, हमें वह मंजूर नहीं है। यह बिल्कुल गलत है। कुरान में यह कहीं नहीं लिखा है। यह राजनीतिक बयान हो सकता है।’
बीजेपी की प्रतिक्रिया
मुफ्ती मोहम्मद इलियास के बयान पर बीजेपी की उत्तर प्रदेश ईकाई के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने कहा है कि यह इलियास का निजी बयान है। शंकर को पैगंबर बताने वाले मुफ्ती को कल्बे सादिक ने कहा- पहले हिंदू धर्म को जानो।
खबर दैनिक भास्कर

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

भारत सरकार ने डिजीटल लॉकर लांच किया




लिंक http://digitallocker.gov.in/

प्रिय साथियों  
अब आपको अपने जरूरी दस्तावेज साथ लेकर घूमने की जरूरत नही है।
इसके लिए सरकार ने डिजीटल लॉकर लांच कर दिया है। जहां आप
जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, शैक्षणिnक प्रमाण पत्र जैसे अहम दस्तावेजों को
ऑनलाइन स्टोर कर सकते हैं। यह सुविधा पाने के लिए बस आपके पास
आधार कार्ड होना चाहिए। आधार का नंबर फीड कर आप डिजीटल लॉकर
अकाउंट खोल सकते हैं। इस सुविधा की खास बात ये है कि एक बार लॉकर में
अपने दस्तावेज अपलोड करने के बाद आपको कहीं भी अपने सर्टिफिकेट की
मूल कॉपी देने की जरूरत नहीं होगा। इसके लिए आपके डिजीटल लॉकर का
लिंक ही काफी होगा। डिजिटल लॉकर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया
प्रोग्राम का अहम हिस्सा है। डिपार्टमेंट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंफॉर्मेशन
टेक्नोलॉजी (डीईआईटीवाई) ने डिजिटल लॉकर का बीटा वर्जन लॉन्च किया है।

कैसे मिलेगा डिजीटल लॉकर
डिजीटल लॉकर को खोलने के लिए आपको http://digitallocker.gov.in/ वेबसाइट
पर जाकर अपनी आईडी बनानी होगी। आईडी बनाने के लिए आपको अपना
आधार कार्ड नंबर से लॉगिन करना होगा। लॉगिन होने के बाद आपसे जो
इन्फॉर्मेंशन मांगी जाए उसे भरें। इसके बाद आपका अकाउंट बन जाएगा।
अकाउंट खुलने के बाद आप कभी भी अपने पर्सनल डॉक्युमेंट्स अपलोड कर सकेंगे।
क्या है खासियत
डिजिटल लॉकर की खासियत ये है कि आप कहीं भी और कभी भी अपने डॉक्युमेंट्स
इसके जरिए जमा कर सकते हैं। डिजिटल लॉकर स्कीम में हर भारतीय एजुकेशनल,
मेडिकल, पासपोर्ट और पैन कार्ड डिटेल्स को डिजिटल फॉर्म में रख सकता है।
वेबसाइट में कहा गया है, 'डिजिटल लॉकर अधिकृत उपभोक्ताओं/ एजेंसियों को
किसी भी समय और कहीं भी अपने दस्तावेजों को सुरक्षित तरीके से अपलोड
और साझा करने की सहूलियत देंगे
------------

आधार कार्ड से ऑनलाइन मिल जाएगा DIGITAL LOCKER, ये है प्रोसेस
 POLICY TEAM   Feb 14, 2015
नई दिल्ली. अब आपको अपने जरूरी दस्तावेज साथ लेकर घूमने की जरूरत नही है। इसके लिए सरकार ने डिजीटल लॉकर लांच कर दिया है। जहां आप जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, शैक्षणिक प्रमाण पत्र जैसे अहम दस्तावेजों को ऑनलाइन स्टोर कर सकते हैं। यह सुविधा पाने के लिए बस आपके पास आधार कार्ड होना चाहिए। आधार का नंबर फीड कर आप डिजीटल लॉकर अकाउंट खोल सकते हैं। इस सुविधा की खास बात ये है कि एक बार लॉकर में अपने दस्तावेज अपलोड करने के बाद आपको कहीं भी अपने सर्टिफिकेट की मूल कॉपी देने की जरूरत नहीं होगा। इसके लिए आपके डिजीटल लॉकर का लिंक ही काफी होगा। डिजिटल लॉकर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया प्रोग्राम का अहम हिस्सा है। डिपार्टमेंट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (डीईआईटीवाई) ने मंगलवार को डिजिटल लॉकर का बीटा वर्जन लॉन्च किया है।
कैसे मिलेगा डिजीटल लॉकर
डिजीटल लॉकर को खोलने के लिए आपको http://digitallocker.gov.in/ वेबसाइट पर जाकर अपनी आईडी बनानी होगी। आईडी बनाने के लिए आपको अपना आधार कार्ड नंबर से लॉगिन करना होगा। लॉगिन होने के बाद आपसे जो इन्फॉर्मेंशन मांगी जाए उसे भरें। इसके बाद आपका अकाउंट बन जाएगा। अकाउंट खुलने के बाद आप कभी भी इस पर अपने पर्सनल डॉक्युमेंट्स अपलोड कर सकेंगे।
क्या है खासियत
डिजिटल लॉकर की खासियत ये है कि आप कहीं भी और कभी भी अपने डॉक्युमेंट्स इसके जरिए जमा कर सकते हैं। डिजिटल लॉकर स्कीम में हर भारतीय एजुकेशनल, मेडिकल, पासपोर्ट और पैन कार्ड डिटेल्स को डिजिटल फॉर्म में रख सकता है। वेबसाइट में कहा गया है, 'डिजिटल लॉकर अधिकृत उपभोक्ताओं/ एजेंसियों को किसी भी समय और कहीं भी अपने दस्तावेजों को सुरक्षित तरीके से अपलोड और साझा करने की सहूलियत देंगे।'
--------------------