शनिवार, 27 जून 2015

आपातकाल के संघर्ष को याद रखना नई पीढ़ी के लिए जरूरी है : अमित शाह



भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह जी
द्वारा आपातकाल के ४० वर्ष - लोकतंत्र का काला अध्याय विषय
पर आयोजित संगोष्ठी पर दिये गये भाषण के प्रमुख अंश

आपातकाल ना तो अध्यादेशों से आता है और ना ही अध्यादेशों को लाने के विचारों से आता है, आपातकाल कुत्सित मानसिकता से आता है: अमित शाह

आपातकाल के संघर्ष को याद रखना नई पीढ़ी के लिए जरूरी है: अमित शाह

इतना संघर्षऔर दमन होने के बावजूद न कोई टूटा और न ही कोई झुका। वास्तव में भारत के मिटटी में लोकतंत्र की खुशबू बहुत गहरी है: अमित शाह

आज जो हमारा लोकतंत्र इतना मजबूत है, जो मीडिया की स्वतंत्रता बची है और लोगों की अभिव्यक्ति की जो स्वतंत्रता व्यापक हुई है वह आपातकाल के दौरान उन हज़ारों लोगों के बलिदान के फलस्वरूप ही संभव हो पाया है: अमित शाह

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह ने आज दिल्ली के मावलंकर हॉल में आपातकाल के ४० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्ठी "लोकतंत्र का काला दिवस" को सम्बोधित किया।

उन्होंने अपने उद्बोधन की शुरुआत करते हुये सर्वप्रथम उनलोगों को श्रद्धा-सुमन अर्पित किया जिन्होंने आपातकाल की मानसिकता के खिलाफ संघर्ष किया था और १९७५-१९७७ के दौरान यातनाएं झेलीं थी। उन्होंने कहा कि इन्हीं लोगों ने उस नाजुक मोड़ पर देश के लोकतंत्र को न केवल बचाया वरन लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूत किया तथा यह सुनिश्चित किया कि सालों साल तक किसी की हिम्मत न हो सके फिर से ऐसा दुस्साहस करने की। श्री शाह ने कहा की उनका बलिदान आनेवाली कई पीढ़ियों के लिए वंदनीय है।

श्री शाह ने सम्मलेन में द्वारिका में श्रीकृष्ण की शासन प्रणाली व मगध साम्राज्य के शासन व्यवस्था की चर्चा करते हुये कहा कि विश्व में सबसे पहले संवैधानिक शासन प्रणाली की शुरुआत भारत से ही हुई थी। भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा, सबसे मज़बूत और सबसे परिवर्तनशील लोकतंत्र है।

श्री शाह ने कहा कि २५ जून १९७५ से लेकर मार्च १९७७ तक का समय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय है। आपातकाल के संघर्ष को याद रखना नई पीढ़ी के लिए जरूरी है। आपातकाल ना तो अध्यादेशों से आता है और ना ही अध्यादेशों को लाने के विचारों से आता है, आपातकाल कुत्सित मानसिकता से आता है जब शासनतंत्र दूसरे के विचारों को सुनना ही नहीं चाहती, स्वतंत्र विचारों का दमन करने लगती है और लोकतंत्र के चारों स्तम्भों को सीखचों के पीछे डाल देती है तो यह तानाशाही की ही मानसिकता होती है।

श्री शाह ने आपातकाल की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुये कहा कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही कांग्रेस में सिंडिकेट युग की शुरुआत हो गई और अंततः कांग्रेस के दो टुकड़े हो गये। उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि उस वक्त कांग्रेस के असंतुष्टों को पार्टी नहीं छोड़नी चाहिये थी, उन्हें पार्टी के अंदर रहते हुये संघर्ष करना चाहिए था ताकि लोकतंत्र की जड़ें मजबूत बनी रहती। उन लोगों के पार्टी छोड़ने से सत्ता और संगठन की सारी बागडोर इंदिरा गांधी के हाथों में आ गई और वह निरंकुश और तानाशाह हो गई और उसका ही परिणाम था कि देश को आपातकाल जैसी वीभत्स परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

श्री शाह ने कहा कि उस वक्त चापलूस और चाटुकारों का बोलबाला था, मुद्रास्फीति काफी बढ़ गई थी, शासन व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई थी और भ्रष्टाचार अपने चरम पर था। आपातकाल देश की शान्ति, सुरक्षा और संविधान की रक्षा के लिए नहीं लाया गया था जैसा कि प्रचारित किया गया वरन इसे अपनी सत्ता को बचाने के लिये लाया गया जो कि निश्चित रूप से एक असंवैधानिक कदम था।

उन्होंने एक घटना का ज़िक्र करते हुये कहा कि पटना में देवकांत बरूआ की गाड़ी ने एक ९ वर्ष के बच्चे को कुचल दिया। पूरा काफिला उस बच्चे के ऊपर से गुजर गया पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। जब यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में अगले दिन प्रकाशित हुई तो पूरे देश में आक्रोश के लहर दौड़ गई।

श्री शाह ने सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन का विस्तृत रूप से उल्लेख करते हुये कहा कि जयप्रकाश जी के आंदोलन ने पूरे देश में क्रांति की एक नई अलख जगाई थी। पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का आहवान किया था।

३ जनवरी १९७५ को तत्कालीन रेल मंत्री श्री ललित नारायण मिश्रा की हत्या कर दी गई। १२ जून १९७५ को इलाहबाद हाई कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर इसे असंवैधानिक करार कर दिया। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले पर हालांकि रोक लगा दी और एक ऐसा फैसला दिया जिससे इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री पद पर बने रहना बिलकुल असंवैधानिक हो गया। इंदिरा गांधी और उनके पूरे शासन तंत्र ने यह प्रचारित करने की पूरी कोशिश की कि यह इंदिरा गांधी की जीत हो गयी है। इतने अपमानित तरीके से प्रधानमंत्री की कुर्सी बचाई गई कि पूरा लोकतंत्र शर्मसार हो गया और अंततः २५ जून की आधी रात को पूरे देश में आपातकाल लागू कर दिया गया और फिर शुरू हुआ दमन चक्र। विरोधी पक्ष के लोग जो जहाँ थे उन्हें वहीं गिरफ्तार कर लिया गया, उन्हें नज़रबंद कर दिया गया। सुबह ६ बजे कैबिनेट की बैठक बुलाई गई तब कैबिनेट को पता चला कि देश में आपातकाल लगा दिया गया है। एक आंकड़े के अनुसार सुबह ६ बजे तक लगभग ९ हज़ार से ज्यादा लोगों को एक रात में ही गिरफ्तार कर लिया गया था। श्री अटल बिहारी वाजपेयी एवम श्री आडवाणी जी को बंगलोर में ही गिरफ्तार कर लिया गया।

सरकार ने अध्यादेश पर अध्यादेश जारी करके न्यायपालिका को मजबूर कर दिया, मीडिया पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया और मीसा को और अधिक मजबूत बना दिया ताकि लोगों की आवाजें पूर्णतया खामोश हो जाये। कांग्रेस सरकार ने लोकतंत्र के चारों स्तम्भों को कुचलने की भरपूर कोशिश की गई। लगभग १ लाख ४० हज़ार लोगों को अमानवीय तरीके से लगातार १९ महीनों तक जेल के सलाखों के पीछे रखा गया और उन्हें कठोरतम यातनाएं दी गई लेकिन इतना संघर्ष और दमन होने के बावजूद न कोई टूटा और न ही कोई झुका। वास्तव में भारत के मिटटी में लोकतंत्र की खुशबू बहुत गहरी है।

इन संघर्षों के परिणामस्वरूप १९७७ में जनसंघ ने नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिये और लोकतंत्र को और मजबूत करने के लिए जनता पार्टी में अपना पूर्ण विलय कर दिया। श्री मोरारजी के नेतृत्व में सरकार बनते ही आपातकाल के दौरान जारी किये गए सारे अध्यादेशों को निरस्त कर दिया गया और संविधान संशोधन द्वारा यह सुनिश्चित किया गया कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सके।

आज जो हमारा लोकतंत्र इतना मजबूत है, जो मीडिया की स्वतंत्रता बची है और लोगों की अभिव्यक्ति की जो स्वतंत्रता व्यापक हुई है वह आपातकाल के दौरान उन हज़ारों लोगों के बलिदान के फलस्वरूप ही संभव हो पाया है।

श्री शाह ने संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहा कि क्यों कांग्रेस पार्टी को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की जासूसी करानी पडी, क्यों सरदार पटेल को भारत रत्न देने में सालों लग जाते हैं, संविधान निर्माता बाबासाहब अंबेडकर के चित्र को संसद में लगाने में वर्षों लग जाते हैं वहीँ भारतीय जनता पार्टी की सरकार नेहरू जी के जन्मशती मनाने के लिए समिति का तुरंत गठन कर देती है और लौह पुरुष सरदार पटेल की सबसे ऊंची प्रतिमा लगाने का कार्य गुजरात में शुरू करती है।

कांग्रेस के आतंरिक लोकतंत्र पर हमला करते हुए श्री शाह ने कहा कि जिस पार्टी का कभी भी आतंरिक लोकतंत्र में विश्वास नहीं रहा, जिसकी सोच ही तानाशाही है, जहाँ किसी भी फैसले में आम कार्यकर्ताओं की सुनी ही नहीं जाती उसके हाथ में सबसे बड़े और सबसे मजबूत लोकतंत्र की चाभी कैसे दी जा सकती है। कांग्रेस का पूरा अतीत इस बात की गवाही देता है कि शुरू से लेकर अबतक केवल एक परिवार के हाथ में ही पार्टी की पूरी कुंजी रही है।

उन्होंने सम्मलेन में उपस्थित लोगों से अपील करते हुए कहा कि आप व्यक्ति को वोट ना दें। देश की जनता का विचार बदलने का वक्त आ गया है। आप पार्टी की विचारधार व विचारों में अपनी आस्था व्यक्त करें, आप एक ऐसी पार्टी को चुनें जहाँ आपकी बातों व हितों को महत्व दिया जाए, जिस पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र की जड़ें गहरी हो। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर ऐसा होता है तो देश में कभी भी आपातकाल नहीं आयेगा।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में १६५० पार्टियों के जंगल में दो-तीन पार्टियां ही ऐसी हैं जिसमे आतंरिक लोकतंत्र है। उन्होंने आश्वासन दिया कि भारतीय जनता पार्टी राजनीति को उन्हीं दिशाओं में ले जाने का सतत प्रयास करेगी जिसका सपना स्वर्गीय श्री जय प्रकाश नारायण ने की थी और जिसकी रक्षा के लिए हज़ारों लोगों ने संघर्ष किया और यातनाएं झेलीं।

उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा बिहार के छपरा में जन आंदोलन के नायक स्वर्गीय श्री जय प्रकाश नारायण जी की स्मृति में स्मारक बनाये जाने की घोषणा पर अपना आभार व्यक्त करते हुये कहा कि हम लोग सदैव जय प्रकाश जी के जीवन से प्रेरणा लेते रहेंगे।

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