रविवार, 7 जून 2015

आपातकाल : भूमिगत कार्यकर्ताओं का संघर्ष





आपातकाल का काला अध्याय और भूमिगत कार्यकर्ताओं का संघर्ष
 भूमिगत रहे कार्यकर्ताओं ने भी भारी यातनाएं भोगी
                                                नारायण प्रसाद गुप्ता (पूर्व सांसद राज्यसभा)

                      आप सब जानते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 352 का भारी दुरूपयोग करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. श्रीमति इंदिरा गांधी ने सत्ता में बने रहने के लिए 25 जून की अर्द्धरात्रि को अत्यंत बेरहमी से एक दुस्साहसी कदम उठाकर चुनाव के सब नियम कायदे अपने हित में बदलकर देश को आपातकाल की जंजीरों में जकड़ दिया। अपने सभी विपक्षी नेताओं को लंबे समय तक जेल में सड़ा देने के इरादे से देश को, प्रजातंत्र को भारी आघात पहुंचाया। आपातकाल लगाने के पीछे उनके इरादे बिल्कुल नेक नहीं थे। देश में क्रांति और परिवर्तन की लहर चल रही थी। उल्लेखनीय है कि इस धारा का उपयोग चीन और पाकिस्तान के हमले के समय किया था। दुर्भाग्य से देश के तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. श्री फखरूद्दीन अली अहमद भी एक कठपुतली की तरह के कार्य कर रहे थे। परिणामतः संविधान के सभी मौलिक अधिकारों का भारी हनन हुआ।

                        देश की समस्त जेलों में राजनैतिक एवं सामाजिक क्षेत्र में कार्य कर रहे सभी दलों के वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ समस्त सक्रिय और मैदानी कार्यकर्ताओं को ढूंढ कर जेलों में डाल दिया गया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को तो विशेष रूप से निशाना बनाया गया। मध्यप्रदेश में तो विषेष रूप से ही आर.एस.एस. और भारतीय जनसंघ को भारी निशाना बनाया गया। समाजवादी विचारधारा के भी सभी नेताओं की गिरफ्तारी की गई। देश की दोनेां कम्युनिस्ट पार्टियों का उस समय क्या रवैया था, यह पूरी तरह ज्ञात नहीं है। दुर्भाग्य से इन दोनों दलों ने राष्ट्रवादी सोच को कभी आगे नहीं बढ़ने दिया।

                    देश के सभी संपूर्ण क्रांति के समर्थक वरिष्ठ नेता स्व. बाबू जयप्रकाश नारायण, लालकृष्ण आडवाणी, मधु लिमये, माननीय श्री सुदर्शनजी, मोरारजी देसाई, श्री चंद्रशेखर, संघ के अनुसांधिक संगठनों के वरिष्ठ नेता श्री शरद यादव, श्रीमान अटल बिहारी वाजपेयी, स्व. श्री कुशाभाऊ ठाकरे, प्रांत संघचालक श्री रामनारायण जी शास्त्री, श्री आरिफ बेग, श्री वीरेन्द्र सखलेचा, श्री कैलाश जोशी, श्री सुंदरलाल जी पटवा, श्री कैलाश नारायण सारंग, भाई उद्धवदास जी मेहता, मेघराज जैन, श्री बाबूलाल जी गौर, श्री राघवजी भाई, श्री शिवराज सिंह चौहान, श्री लखीराम अग्रवाल, श्री रामहित गुप्ता, श्री नारायणकृष्ण शेजवलकर, डॉ. लक्ष्मी नारायण पांडे, डॉ. सत्य नारायण जटिया, श्री बाबूलाल जी जैन आदि अनेकों नेता जेल के सीखचों में बंद थे। तत्कालीन प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री प्रकाशचंद सेठी हुआ करते थे।

                   यह अतिशयोक्ति न हो तो कहना पड़ेगा कि देश भर में मध्यप्रदेश को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। आर.एस.एस. और भारतीय जनसंघ के कार्यकर्ताओं से सत्ताधीशो ने अपना द्वेष प्रकट कर नंगा नाच किया। सभी नैतिक और तार्किक मान्यताएं समाप्त हो गई।

                  जहां एक ओर गांव-गांव तक कार्यकर्ताओं को ढूंढ कर जेल में डाला गया। वहीं पार्टी के निर्देश पर बड़ी संख्या में अपने आपको कार्यकर्ताओं ने बड़ी कुशलता से गिरफ्तार नहीं होने दिया। जो कार्यकर्ता जेल चले गए वे तो पंगु बना दिए गए थे। शासन के गलत निर्णय के खिलाफ आवाज उठाना भी संभव नहीं था। अब यह भारी भार उन नेताओं पर था जो भूमिगत रहकर ही जन आंदोलन चलाकर, जन चेतना कायम रख उनका मनोबल कायम रख सकते थे। लड़ाई लंबी चलनी थी। लोगों में यह भय व्याप्त हो चुका था कि इंदिरा गांधी किसी भी सीमा तक जाकर रूस में चलाए गए साइबेरिया आंदोलन की तरह वर्षों तक लोगों को जेल में सड़ा सकती है।

                  प्रदेश के वरिष्ठ नेता श्रीमान कुशाभाऊ ठाकरे ने 26 जून को एक आपात बैठक, जो प्रदेश कार्यालय पीरगेट पर संपन्न हुई थी, उसमें उन्होंने घोषित कर दिया था कि उनका स्वयं का भूमिगत रहना संभव नहीं होगा। वे तो गिरफ्तारी दे देंगे किन्तु आगामी आंदोलनों को भूमिगत रहकर श्री प्यारेलाल खंडेलवाल, श्री नारायण प्रसाद गुप्ता, श्री मोरेश्वर राव गद्रे एवं तत्कालीन कार्यालय प्रमुख श्री कैलाश नारायण सारंग भूमिगत रहकर तीव्र आंदोलन, सत्याग्रह आरंभ करेंगे। भोपाल में ही लगातार रहने के कारण माननीय कैलाश सारंग तो कुछ दिनों पश्चात गिरफ्तारी के शिकार हो गए किन्तु हम तीनों प्रमुख संगठन मंत्रियों, जिन पर संपूर्ण मध्यप्रदेश का भार था, बाहर रहकर कुशलता से आंदोलन चलाये रखना था।

                अतएव हम तीनों ने आपस में कार्य विभाजन कर अपनी रणनीति से कार्य आरंभ किया। प्रदेश भर में प्रयास कर पर्याप्त धनसंग्रह आंदोलन चलाने के लिए एकत्र करना, बाहर रहे सभी संघ एवं जनसंघ के कार्यकर्ताओं से तेजी से संपर्क स्थापित करना, उनका मार्गदर्शन करना, साहित्य छपवा कर लोगों में बांटना, सत्याग्रह कर नुक्कड़ मीटिंगे करना और जेल भरना जैसे कार्यक्रम में धनसंग्रह का प्रमुख कार्य मेरी ओर दिया गया। श्री प्यारेलाल जी ने मध्यभारत और महाकौशल, विन्ध्यप्रदेश का कार्य संभाला तो श्री मोरेश्वर गद्रे की ओर छत्तीसगढ़ का दायित्व दिया गया। दुर्भाग्य से आपातकाल के दौरान श्री गद्रेजी का देहावसान हो गया और श्री प्यारेलालजी भी अब अपने संस्मरण सुनाने के लिए जीवित नहीं है। वे वास्तव में अमर शहीद थे।

विषेश उल्लेख:

1. 25 जून 1975 का दिन मेरे लिए धनसंग्रह करने का आखिरी दिन था। मध्यभारत का दौरा मैंने खंडवा में समाप्त किया।

2 भावी आशंकाओ को भांपते हुए 26 जून को मैं भोपाल पहुंचा। कार्यालय में आपात बैठक संपन्न हुई । स्व. श्री ठाकरे जी ने मार्गदर्शन करते हुए निर्णय किया कि वे स्वयं तो गिरफ्तार हो जायेंगे किन्तु जनचेतना जागृत रखने, सत्याग्रह करने, धनसंग्रह कर कार्यकर्ताओं के घरों में पहुंचाने का कार्य और बाहर रह गए कार्यकर्ताओं से संपर्क बनाए रखने का महत्वपूर्ण कार्य। माननीय श्री प्यारेलाल खंडेलवाल, मैं स्वयं, श्री मोरेश्वर गद्रे एवं श्री कैलाश नारायण भूमिगत होकर जन आंदोलन चलायेंगे। लगातार भोपाल में रहने के कारण श्री कैलाश सारंग कुछ दिनों बाद ही गिरफ्तारी के शिकार हो गए।

3 संगठन का प्रमुख दायित्व संभालने वाले हम अब शेष तीन संगठन मंत्री ही थे। काफी जिलों में जिला और विभागीय संगठन मंत्री भी भूमिगत हो गये थे। अनुसांगित संगठनों के तो बड़ी संख्या में कार्यकर्ता पुलिस गिरफ्त में नहीं आ सके।

4 26 जून को दोपहर चढ़ रही थी। आगे क्या होगा इससे सभी चिंतित थे। हम सब संभल पाते कि इससे पूर्व ही पीरगेट कार्यालय को पुलिस ने घेर लिया । उपर आने का एक ही द्वार था। मैं पैजामा और बनियान पहने बैठा था। इसी हालात में मुख्य द्वार से मुझे नीचे उतरने में कामयाबी मिल गई। पुलिस ने पूछताछ करने की कोशिश की तो हमने कहा उपर जाओ ठाकरे साहब वहां आपसे चर्चा करेंगे।

5 कार्यालय से एक पाजामा, बनियान पहने बगैर कुर्तें के ही मुझे लखेरापुरा बाजार से गुजरना पड़ा। लोगों ने पाजामा पहली बार देखा, शरीर पर कुर्ता क्यों नहीं है, यह लोग समझ नहीं पाएं। जैसे-तैसे आपने भतीजे के घर पर काजीपुरा में पहुंचा। मैं भूमिगत रहकर वहां बगैर कुर्ते के तीन दिन बिताए क्योंकि मेरे साईज का कुर्ता ही नहीं मिल पाया। पुलिस की पूछताछ जारी थी। बगैर वस्त्र और जरूरी सामान के तीन दिन बिताएँ । एक दिन तो वह घर छोड़ देना पड़ा और लक्ष्मी टाकीज़ के पास राज होटल की आखिरी मंजिल पर एक कमरा लेना पड़ा। वहां शराब की शीशीयों का भंडार पड़ा हुआ था। जैसे-तैसे नये घरों में जाना पड़ा। एक स्थान पर रूकना कठिन था। लोग खाना खिला देते थे, पर रात को घर में ठहराने को तैयार नहीं थे। अत्यंत अपमानजनक स्थिति। आगे कहां जायें पता नहीं। जैसे-तैसे कुछ वस्त्र एक झोला और रूपयों का प्रबंध होने पर मैंने भोपाल छोड़ने का निश्चय किया। श्री खंडेलवाल और श्री गद्रेजी योजना बनाकर प्रदेश के प्रवास पर निकले। काम भी संपादित करना और अपने को बचाना भी।

6 सर्वप्रथम ट्रेन से रात के 1.00 बजे भोपाल से निकल कर बैतूल जिले के ग्राम भौंरा में अपने पुराने कार्यकर्ता गणेश प्रसाद गुप्ता के घर ठहरा। उन्होंने बड़ी सहायता की। किन्तु मुझे वह स्थान छोड़ना पड़ा। चारों तरफ पुलिस का भय एक वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी भी थे, ने अपने घर पर ठहराया। दिन भर छुपे रहना और शाम होते ही मिलना जुलना शुरू करना। आखिरकार बैतूल भी छोड़ना पड़ा। वहां से ग्राम सांवलीखेड़ा, जहां पूर्व विधायक श्री अन्नाजी नासेरी ने मुझे घर में स्थान दिया, नहा-धोकर जैसे ही हम भोजन पर बैंठे, बैतूल से फोन आया, पुलिस आपका पीछा कर रही है। भूखे पेट खाने की थाली छोड़ नासेरी जी के बच्चे ने पीछे के दरवाजे से निकालकर ग्राम के बाहर सड़क पर पहुंचाया।

7 मैंने सोचा महाराष्ट्र की सीमा लगी हुई है, वहां जाना ठीक होगा। वहां अपने को कोई जानता भी नहीं। इस प्रकार अमरावती जाते समय पुराने निष्ठावान कार्यकर्ता जो गिरफ्तार नहीं हुए थे, श्री मारूतिराव पाणसे के निवास ग्राम वरूढ़ में कुछ दिन रहा। किन्तु शीघ्र ही वह स्थान मुझे छोड़ना पड़ा क्योंकि चर्चा होने लगी कि यह नए मेहमान कौन हैं? आपके यहां कैसे रूके हुए हैं?

8 अंततः एक रात अमरावती में मुझे रात में महंगे होटल में स्थान मिला। वहां से मैंने नागपुर जाकर रहने का निश्चय किया। मैं वहां के भारतीय जनसंघ के प्रादेशिक कार्यालय मे पहुंचा। श्री बसंतराव देशपांडे वहां संगठन मंत्री होते थे। उन्होंने रहने का प्रबंध कर दिया। वहां से भी मुझे हटना पड़ा और फिर कॉटन मार्केट के होटल में कुछ दिन नाम पिता का नाम बदलकर रहना पड़ा। यहां अपने कुछ मित्रों से धनसंग्रह किया। संघ कार्यालय और रेशम बाग पर पुलिस की नजर बनी हुई थी।

9 अब मैंने नागपुर से अपने प्रदेश में छत्तीसगढ़ जाना उचित समझा। सर्वप्रथम बिलासपुर कार्यालय में रातके 1.00 बजे पहुंचा। वहां केवल एक कर्मचारी कार्यालय की देखभाल कर रहा था। रात बिताने के बाद शहर में संपर्क आरंभ हुआ। श्री मूलचंद खंडेलवाल किसी तरह बाहर थे। डॉ. अग्रवाल भी पैराल पर आते-जाते रहते थे। मैं बिलासपुर से खरसिया और रायगढ़ पहुंचा। बीच में कोरबा, जांजगीर, अकलतरा, चांपा, मुंगेली लगभग सभी तहसील केन्द्रों तक पहुंचा। छत्तीसगढ़ में सराहनीय योगदान मीसाबंदियों के परिवारों और हित चिंतकों ने किया। लखीराम जी का परिवार तो आने जाने वालों का अड्डा बना हुआ था। मैंने बहुत अधिक वेषभूषा नहीं बदली। धोती के स्थान पर पायजामा और बाल अवश्य बढ़ा लिए थे। मैं केवल समाधान रहने के कारण आपने को बचा सका। दिन का समय तो लगभग बेकार ही जाता था।

10 एक मास बिलासपुर जिले में बिताने के बाद मैंने रायपुर को अपना केन्द्र बनाया किन्तु यहां का कार्यालय तो लगभग बंद पड़ा था। आखिरकार मुझे 18 दिन तक राज्य परिवहन के कर्मचारियों के कमरे में पांच रूपए रोज किराए पर रहना पड़ा। कभी-कभी मैं अस्वस्थ्य हो जाता था। अकेले रहने का शरीर पर काफी प्रभाव पड़ा। एक दिन रायपुर स्टेशन पर मेरी मानसिक स्थिति बिगड़ गई, मुझे यह भी पता नहीं रहता था कि अब मुझे कहां जाना है? जेल में जैसे-तैसे संपर्क किया गया। सब कार्यकर्ताओं ने घरों पर चिट्ठी भेजी, नानाजी आए हुए है। अवश्य कठिनाई में होंगे। आप लोग उन्हें होटल मे जाकर अपनी सहयोग राशि पहुंचाएं। श्री झुमुकलाल टावरी, डॉ. रमेश, जयनारायण जी अग्रवाल, डॉ. पाटणकरजी आदि लगभग सब लोगों ने राशि भिजवाई। अब मेरे पास भरपूर पैसा हो गया था। दुर्ग, धमतरी, जगदलपुर, नांदगांव, राजिम, कवर्धा, कांकेर आदि सभी तहसील केन्द्रों पर संपर्क किया।

11 इसी समय श्री प्यारेलाल खंडेलवाल और श्री गद्रेजी से मेरी रायपुर में महत्वपूर्ण भेंट हुई। आगे की रणनीति बनाई गई। श्री खंडेलवाल जी ने तो बहुत कुछ बदल लिया था। पेंट, शर्ट, चश्मे में उनको पहचानना कठिन होता था। वे तेजी से प्रवास करते थे। श्री मोरेश्वर गद्रे ने भी धोती कुर्ते के स्थान पर पेंट शर्ट पहन लिया था। वे पूछते थे, मैं कैसा दिखता हूं। तो लोग कहते थे - एक रिटायर्ड तहसीलदार दिखाई देते हो। वे डायबिटीज के मरीज थे। उन्हें अकेले कई बार गंदे स्थानों पर ही रात बिताना पड़ती थी। आपातकाल हटने के कुछ दिन पूर्व ही, धमतरी में वे जहां ठहरे थे, कोमा में आ गए। रायपुर लाया गया, पर वे नहीं बचाए जा सके। अंत तक निःस्वार्थ भाव से भारत माता की सेवा में लगे रहे। डर इतना अधिक था कि श्मषान घाट भी चार लोग उन्हें ले जाने को तैयार नहीं थे। तब एक निष्ठावान कार्यकर्ता ने अकेले ही ले जाकर दाह संस्कार संपन्न किया। उनके झोले में कुल साढ़े तीन रूपए और कुछ जरूरी वस्त्र निकले। हमने एक वरिष्ठ मार्गदर्शक को खो दिया।

12 हम लोगों ने जन-जागरण का कार्य जारी रखा। छत्तीसगढ़ के दौरे के पश्चात मैंने विन्ध्यप्रदेश, महाकौशल और संपूर्ण मध्यभारत का अपना दौरा पूरा किया।

13 उज्जैन के श्रीराम होटल से रवाना होते समय जब काउंटर पर मुनीम ने मुझसे पिता का नाम पूछा तो मै नाम बताना भी भूल गया क्योंकि नाम, पिता का नाम बदलकर रहना पड़ता था।

14 इंदौर के धनसंग्रह के समय कार्यकर्ताओं की सूची मेरे पास थी। पुलिस द्वारा पीछा करने पर उस सूची को मुंह में डाल लेना पड़ा।

15 ग्वालियर में तो समय बिताने के लिए राजवाड़ा सिनेमागृह में जाना पड़ा जहां मैंने जंजीर फिल्म देखी। ग्वालियर की गर्मी बरदास्त से बाहर थी। एक दिन मुझे चक्कर आ गया। मैं घबराने लगा, शेजवलकर साहब के यहां आकर मैंने शरण ली।

16 शिवपुरी में धनसंग्रह के पश्चात जब रात्रिकालीन बस से मैं भोपाल रवाना हुआ तो शिवपुरी पुलिस ने मेरा पीछा किया, मुझे बस बदलना पड़ी।

17 घरों में जब मैं पहुंचता, बच्चे बोलते पापा तो जेल में है। हम आपको नहीं पहचानते, तब अंदर से मां की आवाज आती, बेटा आने दे। गुप्ताजी होंगे तेरे पापा उन्हें सौ रूपये देते थे। इन्हें खाना खिलाकर, सौ रूपये देकर, बाईक से बस स्टेण्ड पर छोड़ने जाओ। हम ऐसे परिवारों के आजीवन आभारी रहेंगे।

18 संपूर्ण यात्रा का अंत फिर मैंने भोपाल में किया किन्तु यहां भी खैरियत नहीं। विधायक विश्रामगृह के भिन्न-भिन्न कमरों में काफी दिन बिताने पड़े। एक दिन तो इतना पीछा हुआ कि श्री लक्ष्मीनारायण शर्मा के कमरे से भाग कर श्री कैलाश जोशीजी के कमरे पर जाना पड़ा जहां भाभी जी ने प्रश्रय दिया। वहां भी पूछताछ होने लगी तो लगभग एक घंटे मुझे बाथरूम में गुजारना पड़ा। आपातकाल हटने के कुछ दिन पूर्व श्री खंडेलवाल जी और मैंने बेगमगंज जेल पहूँचकर श्री ठाकरे जी से विचार-विमर्श कर आगे की रणनीति बनाई।

19 19 मास तक घर का मुंह देखना संभव नहीं था। घरवाले सभी चिंतित रहते थे किन्तु बड़े भ्राता श्री गोपीकृष्ण गुप्ता ने सदैव प्रोत्साहित किया। परिवार के किसी सदस्य से भेंट तक संभव नहीं हुई। किन्तु हिम्मत नहीं हारना, यहीं तो संघ से सीखा था। इस कारण अत्यंत कष्टकारक स्थिति में धैर्य रखकर सैकड़ों कार्यकर्ता जुटे रहे। संघ के सभी प्रचारकों ने बड़ी कठिनाई से 19 मास गुजारे। अंत में प्रजातंत्र की जीत हुई। संपूर्ण क्रांती का अभियान सफल हुआ। इंदिरा गांधी को पराजय का मुंह देखना पड़ा। मोरारजी भाई के नेतृत्व में केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बनी। सबने मतभेद भुलाकर, झंडे-डंडे अलग रखकर एकता का परिचय दिया और जनता पार्टी की सरकार बनाई। अंत में, मैं प्रदेश के मुख्यमंत्री जी को यह विनम्र सुझाव देना चाहूंगा कि वे आपातकाल का अधिकृत दस्तावेज तैयार कराएं। उसी प्रकार भारतीय जनता पार्टी को भी एक अधिकृत दस्तावेज तैयार कराना चाहिए जो भावी पीढ़ी को समझा सकें कि प्रजातंत्र की रक्षा के लिए देशभक्तों को क्या-क्या सहना पड़ा है? जेल में रहे मीसाबंदियों के साथ-साथ भूमिगत रहकर कार्य करने वालों को भी सम्मान और सुविधाएं प्रदान की जायें जिससे वह इस चेतना को जीवित रख सकें। स्थानाभाव के कारण जिन प्रमुख स्थान और और वहां के प्रमुख कार्यकर्ताओं के नाम का उल्लेख नहीं हो सका है वे मुझे क्षमा करेंगे।

अंत में, मैं 19 मास तक बंद प्रदेश कार्यालय की देखभाल करने वाले श्री बापूराव कोर्डे, जो अब हमारे बीच नहीं रहे, सम्मानपूर्वक उन्हें नमन करता हूं । इति।
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भोपाल में लोकतंत्र संरक्षक संघ का सम्मेलन वक्ताओं ने कहा- मीसाबन्दी अपनी ऊर्जा का उपयोग करें

"आजादी के पूर्व तथा आजादी के बाद लोकतन्त्र और जनता के अधिकारों के लिए हमने लगातार आंदोलन किए हैं। सत्ता तो बदली है लेकिन जिस समाज की हम कल्पना करते थे, वह नहीं बना पाए हैं। इस सबसे बडी चुनौती का सामना करने के लिए लोकतंत्र रक्षकों को आगे आना होगा।" यह कहना है भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर का। वे गत 25 जून को भोपाल के दीनदयाल परिसर में आयोजित मीसाबंदियों के एक समारोह को सम्बोधित कर रहे थे।

इस अवसर पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष श्री प्रभात झा ने कहा कि कांग्रेस की तानाशाही का अंत करने के लिए मीसाबन्दियों ने जो संघर्ष किया है उससे देश के राजनैतिक इतिहास ने नया मोड़ ले लिया। इंदिरा गांधी की तानाशाही समाप्त हुई थी और देश ने लोकतंत्र में सांस ली थी। आपातकाल ने हमारा लोकतंत्र में विश्वास मजबूत किया। आज देश में जो लोकतंत्र है उसके लिए हम मीसाबन्दियों के कृतज्ञ हैं।

पूर्व सांसद एवं पूर्व संगठन मंत्री श्री नारायण प्रसाद गुप्ता ने उस काले अध्याय पर प्रकाश डालते हुए कि बताया कि आपातकाल में जेल में बंद मीसाबन्दियों से अधिक कठिनाइयों का सामना उन लोगों को करना पड़ा जो आपातकाल के विरुद्ध चलाए जा रहे आंदोलन का सूत्रपात कर रहे थे। वे तत्कालीन पुलिस और कांग्रेस के निशाने पर थे। ऐसे में मीसाबन्दियों और भूमिगत रहकर कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं के बीच भेदभाव नहीं होना चाहिए। मीसाबन्दी लोकतंत्र के आह्वान पर खरे उतरे और भूमिगत रहकर कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं ने उनके उत्साह को कम नहीं होने दिया। इन कार्यकर्ताओं ने आंदोलन को बनाए रखा और मीसाबन्दियों के परिवारों के धैर्य को टूटने नहीं दिया। राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वह भूमिगत रहने वाले कार्यकर्ताओं के त्याग और समर्पण पर भी विचार करे।

वरिष्ठ भाजपा नेता श्री सुन्दर लाल पटवा ने कहा कि आपातकाल की चुनौती पर हम खरे उतरे। कांग्रेस का इतिहास रहा है कि उसने कभी लोकतंत्र और संविधान को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा।

समाजवादी नेता रघु ठाकुर ने इस अवसर पर कहा कि आज देश की आर्थिक नीतियां साम्राज्यवाद के विस्तार की भूमिका तैयार कर रही हैं। लोकतंत्र के सभी स्तंभ अपनी भूमिका से हट चुके हैं। लोकतंत्र का अवमूल्यन हो रहा है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि देश का प्रधानमंत्री बहुराष्ट्रीय कम्पनी के हित में सोचता है और उनके हितों के अनुरूप नीतियां बनाकर अमल करने के लिए चिंता में रात-दिन व्यस्त रहता है।

मीसाबन्दी सम्मेलन में सांसद रामकृष्ण कुसमरिया, अजय विश्नोई, मेघराज जैन, भरत चतुर्वेदी आदि ने अपने संस्मरण सुनाए। समारोह में मेघराज जैन के प्रस्ताव पर श्री कैलास सोनी को पुन: तीन वर्षों के लिए लोकतंत्र संरक्षक संघ, मध्य प्रदेश के अध्यक्ष पद पर सर्वसम्मति से चुन लिया गया।


In 1971, Indira Gandhi swept to power. However, the euphoria soon died away and dreams fizzled out owing to the rampant corruption. Amid all the discontent, Indira Gandhi in 1975 promulgated the Emergency. Democracy was under attack, freedom of the press was muzzled. Senior opposition leaders such as L K Advani, Atal Bihari Vajpayee were arrested.

Modi was at the core of the anti-Emergency movement. He became the general secretary of the Gujarat Lok Sangharsh Samiti and his primary role was to coordinate between activists in the state. It is said that to avoid arrests and the government’s ire, Modi began disguising himself -- dressed as a Sikh one day, an elderly man another day.




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