गुरुवार, 30 जुलाई 2015

कब तक बर्दाश्त करें पाकिस्तानी आतंक के दंश को ?'

कब तक बर्दाश्त करें पाकिस्तानी  आतंक के दंश को ?'
- सिद्धार्थ शंकर गौतम

30 जुलाई को मुंबई बम धमाकों के आरोपी याकूब मेनन की प्रस्तावित फांसी, 26 जुलाई को कारगिल विजय का जश्न और सोमवार 27 जुलाई को तड़के पंजाब के गुरदासपुर जिले के दीनानगर पुलिस थाने पर आतंकी हमला। देखने पर ये तीनों घटनाएं भले ही अलग प्रतीत हों किन्तु इनके बीच समानता की एक महीन लकीर नज़र आती है। याकूब मेनन की प्रस्तावित फांसी के विरोध में जिस तरह कथित बुद्धिजीवी पत्र लिखते हुए भारतीय न्याय व्यवस्था का मखौल उड़ा रहे हैं, उसे पूरी दुनिया देख रही है। क्या संभव नहीं कि याकूब के पाकिस्तानी आका भी उसकी फांसी पर देश के भीतर छिड़ी मजहब आधारित बहस का फायदा उठाना चाह रहे हों? क्या भरोसा कि पंजाब के आतंकी हमले को याकूब की फांसी से जोड़कर सियासतदां इस पर भी राजनीतिक रोटियां सेंकने लगें? हो सकता पाक समर्थित आतंकी संगठन याकूब की फांसी का बदला लेने का मंसूबा पाले हों जैसा उन्होंने कसाब की फांसी के बाद कहा और किया। वहीं 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के एक दिन बाद ही यह आतंकी हमला साबित करता है कि पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन आज भी कारगिल पराजय को बुरे स्वप्न की तरह याद करते हैं और भारत को अस्थिर करना उनका मुख्य शगल बन चुका है।

ख़बरों के अनुसार आतंकी अमरनाथ यात्रा को निशाना बनाना चाहते थे किन्तु रास्ता भटकने की वजह से 20 सालों बाद पंजाब की धरती को आतंक का पुराना मंजर ताजा करवा दिया। रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो पंजाब में खून की होली खेलनेवाले आतंकियों के हमले का तरीका बिलकुल लश्कर-ए-तैयबा जैसा है जिससे यह स्पष्ट होता है कि ये आतंकी पाकिस्तान के रास्ते भारत में दहशत फैलाने आए थे। हालांकि पाकिस्तान इस सच को कभी स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि पाकिस्तान में होनेवाली तमाम आतंकी घटनाओं को शरीफ सरकार द्वारा ऐसे पेश किया जाता रहा है, मानो पाकिस्तान खुद आतंकवाद से पीड़ित हो।

देखा जाए तो 1995 के बाद पंजाब में इस तरह के हमले नहीं हुए हैं। यह हमला बिल्कुल कश्मीर में लश्कर-ए-तैयबा द्वारा किए जाने वाले हमलों के पैटर्न पर है। इसका जिक्र जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी कर चुके हैं। कुछ लोगों का मानना है कि पंजाब में खालिस्तान समर्थित आतंकवाद फिर सिर उठा सकता है। 26 जुलाई को ही शिरोमणि अकाली दल (शिअद-अमृतसर) के कार्यकर्ताओं द्वारा एक कार्यक्रम में पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के संबोधन के दौरान खालिस्तान के समर्थन में नारे लगाए थे जिसपर बादल ने सांप्रदायिक विभाजन और कट्टरपंथ के खिलाफ लोगों को आगाह किया था। ऐसा संभव है किन्तु ताजा हमला खालिस्तान समर्थित आतंकवादी हमला नहीं है। वैसे भी खालिस्तान समर्थक आतंकवादियों का इतिहास फिदायीन हमले का नहीं रहा है। हां, इतना जरूर है कि खालिस्तान के कई नेता अभी भी पाकिस्तान में बैठे हैं और यह संभव हो सकता है कि गुरुदासपुर में हमले को अंजाम देने के लिए स्थानीय आतंकियों की मदद ली गई होगी। ऐसी भी खबरें हैं कि पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई भारत में खालिस्तान आंदोलन को फिर से उभारने में जुटी है। आतंकी हमले को लेकर एक और तथ्य उभर रहा है कि चूंकि कश्मीर में फिलहाल सुरक्षा चौक-चौबंद है और वहां मौका नहीं मिलने के कारण पंजाब को सॉफ्ट टारगेट के रूप में चुना गया हो। वैसे भी पंजाब का यह इलाका पाकिस्तानी सीमा से महज 15 किलोमीटर दूर है।

पंजाब में आतंकी हमले ने हमारी सुरक्षा एजेंसियों की चूक को पुनः उजागर किया है वहीं सीमा पर घुसपैठ से भी इंकार नहीं किया जा रहा। क्या इस स्थिति में बदलाव आएगा? साफ़ दिख रहा है कि यह आतंकी हमला पाकिस्तान समर्थिक आतंकियों की करतूत है तो क्या पाकिस्तान पर दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए? हो सकता है भारत की ओर से किसी भी प्रकार की अति मानवाधिकारवादियों व अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को खल सकती है, पर क्या पाकिस्तान की हरकतों को यूं ही नकारा जाना चाहिए? कदापि नहीं। फिर पाकिस्तान जैसा देश दुनिया के लिए नासूर बन चुका है उसके प्रति कैसा अपनापन? अपनापन भी उसी को शोभा देता है जो उसकी कद्र करना जानता हो। आखिर कब तक देश के बेगुनाह नागरिक और सुरक्षा बल के जवान अपनी जान गवांते रहेंगे? भारत सरकार आतंकवाद पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करें, यही जनता चाहती है।

बुधवार, 29 जुलाई 2015

मजहब के नाम पर आतंकवादी का समर्थन क्यों ?



मजहब के नाम पर आतंकवादी का समर्थन क्यों?   '


ओवैसी साहब, जब आप ही आतंकवादी का मजहब ढूंढ़ेंगे तो फिर शेष समाज को दोष न देना कि आतंकवाद को किसी धर्म विशेष से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है?
- लोकेन्द्र सिंह
मुम्बई सीरियल धमाकों में सैकड़ों लोगों की जान लेने वाले आतंकवादी याकूब मेमन की फांसी पर जबरन का विवाद खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। एआईएमआईएम के अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असुद्दीन ओवैसी ने अल्पसंख्यकों को आकर्षित करने के लिए मेमन की फांसी पर मजहबी पत्ता खेला है। उसने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश की है। साम्प्रदायिकता का जहर घोलने और भड़काऊ बयान देने के लिए ओवैसी पहले से ही कुख्यात है। मेमन की फांसी की सजा पर ओवैसी ने कहा है कि याकूब मेमन मुसलमान है इसलिए उसे फांसी दी जा रही है।

उसके इस बयान से राजनीतिक गलियारे में सियासी हलचल तेज हो गई है। बयान के विरोध और पक्ष में आवाजें आने लगी हैं। एक आतंकवादी के पक्ष में जनप्रतिनिधि का इस तरह बयान देना कितना सही है? यह तो सभी जानते हैं कि ओवैसी मुस्लिम राजनीति करते हैं। लेकिन, वोटबैंक को साधने और मजबूत करने के लिए एक हत्यारे के पक्ष में उतर आना कहां जायज है?

मेमन की फांसी को मुस्लिम रंग देने के प्रयास में ओवैसी ने कहा है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद (ढांचा) को गिराने, मुम्बई और गुजरात में साम्प्रदायिक दंगों में भी ऐसी ही सजा दी जाएगी क्या? राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी पर नहीं लटकाने पर भी ओवैसी ने सवाल उठाए हैं। ओवैसी को शायद यह बताने की जरूरत है कि यह तो न्यायालय तय करेगा कि किस मामले में क्या सजा सुनाई जानी है? किसी भी जघन्य अपराध के खिलाफ न्यायालय में पर्याप्त सबूत मिलेंगे तो न्यायालय अपने विवेक से उचित ही फैसला करेगा? न्यायालय के फैसले पर ओछी मानसिकता का प्रदर्शन करते हुए साम्प्रदायिक टिप्पणी करना उचित नहीं। शायद, ओवैसी ने अब तक हुई फांसी की सजाओं का रिकार्ड नहीं देखा होगा, इसलिए यह कह गए कि सिर्फ मुसलमानों को ही फांसी क्यों?

 नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के ‘डेथ पेनाल्टी रिसर्च प्रोजेक्ट’ के मुताबिक आजादी के बाद से अब तक देश में तकरीबन 1414 कैदियों को फांसी दी गई, जिनमें से मात्र 72 कैदी ही मुसलमान थे। यानी पांच फीसदी से भी कम। बहरहाल, सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि अपराधी, अपराधी होता है, हिन्दू या मुसलमान नहीं। फिर भी आंकड़े तो यही बताते हैं कि मुसलमानों से कहीं ज्यादा फांसी की सजा दूसरे धर्म को मानने वालों को हुई है।

भारत की बहुसंख्यक आबादी को एक और आपत्ति है कि आतंकवादी घटनाओं में धर्म को नहीं देखने की बात तो बड़े जोर-शोर से की जाती है तो फिर सजा भुगतने का समय आने पर आतंकवादी का मजहब कहां से पैदा
हो गया? जब यह कहा जाता है कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं लेकिन प्रत्येक आतंकवादी मुसलमान क्यों होता है? तब सब मुस्लिम रहनुमा और प्रगतिशील दलील देते हैं कि यह कथन ठीक नहीं। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, आतंकवाद को धर्म से जोडऩा गलत है। अब एक आतंकवादी में धर्म ढूंढऩे की घटना के समय
रहनुमाओं और सेक्युलरों की जमात कहां चली गईं? बहरहाल, समाज के अपराधियों का धर्म ढूंढऩेवाले कौन लोग हैं? आतंकवादी को धर्म से जोड़कर आखिर क्या साबित करना चाहते हैं ये लोग? क्या हासिल होगा इन्हें?

मुसलमानों का समर्थन? पर क्यों? मुसलमानों का समर्थन कैसे हासिल होगा? बम विस्फोट में सैकड़ों लोगों की हत्या करनेवाले आतंकवादी का समर्थन भारतीय मुसलमान करेंगे क्या? क्या याकूब मेमन उनका हीरो हैं? नहीं, तो फिर ओवैसी क्यों आसमान सिर पर उठा रहा है? ये सवाल, बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करते हैं? एक सार्थक बहस की शुरुआत भी करते हैं?

ओवैसी ने जो विवाद खड़ा किया है, उसका रचनात्मक समाधान खोजना होगा। यह रचनात्मक समाधान आएगा, मुस्लिम समाज से। मुस्लिम समाज को आगे आकर ओवैसी और इस तरह की घटिया राजनीति का जमकर विरोध करना चाहिए। मुस्लिम समाज को जोर से कहना होगा कि याकूब मेमन की फांसी का मुस्लिम होने से कोई लेना-देना नहीं। वैसे भी उसने जो बम फोड़े थे, उसमें हिन्दू ही नहीं, कई मुस्लिम जिन्दगियां भी धुंआ हो गईं थीं। गोली, बम और तलवारें धर्म पूछकर नहीं मारतीं। इसलिए इनका इस्तेमाल करके लोगों खून बहानेवाले का कोई धर्म नहीं होता। भारतीय न्याय प्रणाली और न्यायालय पर इस तरह ओछी टिप्पणी करने के मामले को तत्काल संज्ञान में लेने की जरूरत है।

गैर-जिम्मेदारान तरीके से सम्मानित संस्थाओं पर टिप्पणी करनेवाले जिम्मेदार लोगों पर गंभीरता से कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे लोगों के खिलाफ की गई कार्रवाई नजीर बननी चाहिए, भविष्य के लिए। आखिर में, ओवैसी साहब जब आप ही आतंकवादी का मजहब ढूंढ़ेंगे तो फिर शेष समाज को दोष न देना कि आतंकवाद को किसी धर्म विशेष से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है? याकूब मेमन को 30 जुलाई को फांसी होनी है। मेमन ने अपनी सजा माफ कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। आज सर्वोच्च न्यायालय की विशेष पीठ उसकी माफी की याचिका पर सुनवाई करेगी। 

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

डॉ.कलाम भारत को एक ज्ञानवान समाज और सशक्त राष्ट्र बनाना चाहते थे: परम पूज्य डॉ. मोहन भागवत



डॉ.कलाम भारत को एक ज्ञानवान समाज और सशक्त राष्ट्र बनाना चाहते थे: परम पूज्य डॉ. मोहन भागवत

डॉ.कलाम भारत को एक ज्ञानवान समाज और सशक्त राष्ट्र बनाना चाहते थे: डॉ. मोहन भागवत
डॉ.कलाम के रूप में भारत ने अपने सबसे महान सपूतों में से एक को खो दिया है : संघ
कलाम के रूप में भारत ने अपने सबसे महान सपूतों में से एक को खो दिया है : संघ
स्रोत: न्यूज़ भारती हिंदी  
 
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नई दिल्ली, जुलाई 28 : भारत के महान वैज्ञानिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति भारतरत्न डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम कल निधन होने पर देशभर में शोक की लहर दौड़ गई है। देश-विदेश से उनके चाहनेवाले और उनसे प्रेरणा लेनेवालों ने डॉ.कलाम के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त की है। इसी कड़ी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और सरकार्यवाह श्री सुरेश (भैयाजी) जोशी ने संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि “हमारे पूर्व राष्ट्रपति, हमारे सबसे बड़े वैज्ञानिकों में से एक और असंख्य मनों को प्रकाशित करनेवाले दूरद्रष्टा डॉ. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम के निधन के साथ भारत ने अपने सबसे महान सपूतों में से एक को खो दिया है।” डॉ.भागवत ने कहा कि “डॉ.कलाम ने एक वैज्ञानिक के रूप में हमारी रक्षा तैयारियों को अत्यंत प्रभावशाली और मौलिक योगदान दिया था। और उन्होंने एक राजनेता के रूप में हमारे राष्ट्रपति पद के कार्यक्षेत्र के अपने अनुकरणीय आचरण के माध्यम से राष्ट्रपति कार्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ाकर भारत को गौरवान्वित किया था।”

डॉ.कलाम के जीवन कार्य पर अपने विचार व्यक्त करते हुए सरसंघचालक ने कहा कि, “मंदिरों के नगर रामेश्वरम में गुमनामी में रह रहे एक छोटे लड़के से लेकर भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति बनने तक डॉ. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम का जीवन असाधारण साहस, दृढ़ संकल्प, दृढ़ता और उत्कृष्टता प्राप्त करने की इच्छा की कहानी रहा। उनकी जीवन गाथा ने हमारे राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रक्षेपास्त्र शक्तियों में से एक के रूप में स्थापित किया है।” उन्होंने कहा, “डॉ.कलाम जो भारत की समृद्ध विरासत में आस्था और हमारे प्रतिभाशाली युवाओं में अडिग विश्वास रखते थे, भारत को एक ज्ञानवान समाज और सशक्त राष्ट्र बनाना चाहते थे।”
डॉ.कलाम के प्रति शोक संवेदना व्यक्त करते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि, “उनकी मृत्यु पर, जो हमारे देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है, पूरे राष्ट्र के साथ गहरा दुःख बांटते हुए हम उनके शोक संतप्त परिवार के प्रति हार्दिक संवेदना व्यक्त करते हैं और सर्वशक्तिमान परमात्मा से दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं।

सोमवार, 27 जुलाई 2015

पूर्व राष्ट्रपति और मशहूर वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम का निधन




APJ अब्दुल कलाम का दिल का दौरा पड़ने से निधन, 7 दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित
aajtak.in [Edited By: कुलदीप मिश्र] | शिलॉन्ग, 27 जुलाई 2015

पूर्व राष्ट्रपति और मशहूर वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम नहीं रहे. दिल का दौरा पड़ने से सोमवार को शिलॉन्ग में उनका निधन हो गया.
83 वर्ष के अब्दुल कलाम अपनी शानदार वाक कला के लिए मशहूर थे, लेकिन खबरों के मुताबिक, एक लेक्चर के दौरान ही काल ने उन्हें अपना ग्रास बना लिया. आईआईएम शिलॉन्ग में लेक्चर के दौरान ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा, जिसके बाद वह बेहोश होकर गिर पड़े.

उन्हें तुरंत शिलॉन्ग के बेथानी अस्पताल लाया गया. अस्पताल में डॉक्टरों ने भरसक कोशिश की, लेकिन तब तक उनका देहांत हो चुका था. देर शाम 7:45 बजे उन्हें मृत घोषित किया गया. देश में सात दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित कर दिया गया है. कलाम का शव मंगलवार को दिल्ली लाया जाएगा. रामेश्वरम में उन्हें सपुर्दे-ए-खाक किया जाएगा.

अस्पताल के सीईओ जॉन साइलो ने बताया कि जब कलाम को अस्पताल लाया गया तब उनकी नब्ज और ब्लड प्रेशर साथ छोड़ चुके थे. डॉक्टरों ने कोशिश की, लेकिन उनके शरीर ने वापसी का कोई रिस्पॉन्स नहीं दिखाया.

अपनी मौत से करीब 9 घंटे पहले ही उन्होंने ट्वीट करके बताया था कि वह शिलॉन्ग आईआईएम में लेक्चर के लिए जा रहे हैं.

देश के 11वें राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम का शुक्रवार को शिलॉन्ग में निधन हो गया. 83 साल के कलाम हमेशा से युवाओं और बच्चों का हौंसला बढ़ाते रहे. बेशक वो अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनके ये 10 कथन हमेशा उनकी याद दिलाते रहेंगे.
कलाम के 10 प्रसिद्ध कथन

1. सपने सच हों इसके लिए सपने देखना जरूरी है.

2. छात्रों को प्रश्न जरूर पूछना चाहिए. यह छात्र का सर्वोत्तम गुण है.

3. युवाओं के लिए कलाम का विशेष संदेशः अलग ढंग से सोचने का साहस करो, आविष्कार का साहस करो, अज्ञात पथ पर चलने का साहस करो, असंभव को खोजने का साहस करो और समस्याओं को जीतो और सफल बनो. ये वो महान गुण हैं जिनकी दिशा में तुम अवश्य काम करो.

4. अगर एक देश को भ्रष्टाचार मुक्त होना है तो मैं यह महसूस करता हूं कि हमारे समाज में तीन ऐसे लोग हैं जो ऐसा कर सकते हैं. ये हैं पिता, माता और शिक्षक.

5. मनुष्य को मुश्किलों का सामना करना जरूरी है क्योंकि सफलता के लिए यह जरूरी है.

6. महान सपने देखने वालों के सपने हमेशा श्रेष्ठ होते हैं.

7. जब हम बाधाओं का सामना करते हैं तो हम पाते हैं कि हमारे भीतर साहस और लचीलापन मौजूद है जिसकी हमें स्वयं जानकारी नहीं थी. और यह तभी सामने आता है जब हम असफल होते हैं. जरूरत हैं कि हम इन्हें तलाशें और जीवन में सफल बनें.

8. भगवान उसी की मदद करता है जो कड़ी मेहनत करते हैं. यह सिद्धान्त स्पष्ट होना चाहिए.

9. हमें हार नहीं माननी चाहिए और समस्याओं को हम पर हावी नहीं होने देना चाहिए.

10. चलो हम अपना आज कुर्बान करते हैं जिससे हमारे बच्चों को बेहतर कल मिले.

भारत में हुए 10 सबसे बड़े आतंकी हमले


ये हैं भारत में हुए 10 सबसे बड़े आतंकी हमले
नई दिल्ली, लाइव हिन्दुस्तानFirst Published:27-07-2015 
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*26/11 मुंबई आतंकी हमला: 10 आत्मघाती हमलावर मुंबई में हथियारों से लैस होकर घुसे। सीरियल बम धमाकों के अलावा आतंकियों ने कई जगहों पर अंधाधुंध फायरिंग की। आतंकियों ने नरीमन हाउस, होटल ताज और होटल ओबेराय को कब्जे में ले लिया था। इसमें कुल 166 लोग मारे गए थे और 293 लोग घायल हुए थे। आतंकी कसाब पकड़ा गया था, जबकि नौ आतंकी मारे गए।

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*12 मार्च 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट: पूरे मुंबई में सीरियल धमाके हुए। इन धमाकों के पीछे दाउद इब्राहिम और डी कंपनी का हाथ था। इसमें 257 लोग मारे गए थे, जबकि 713 लोग घायल हुए थे।
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*24 सितंबर 2002 अक्षरधाम मंदिर पर हमला: लश्कर और जैश ए मोहम्मद के 2 आतंकी मुर्तजा हाफिज यासिन और अशरफ अली मोहम्मद फारुख दोपहर 3 बजे अक्षरधाम मंदिर में घुस गए। ऑटोमैटिक हथियारों और हैंड ग्रेनेड से उन्होंने वहां मौजूद लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया। इसमें 31 लोग मारे गए जबकि 80 लोग घायल हो गए थे।
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*29 अक्टूबर 2005 दिल्ली सीरियल बम ब्लास्ट: दीवाली से 2 दिन पहले आतंकियों ने 3 बम धमाके किए। 2 धमाके सरोजनी नगर और पहाड़गंज जैसे मुख्य बाजारों में हुए। तीसरा धमाका गोविंदपुरी में एक बस में हुआ। इसमें कुल 63 लोग मारे गए जबकि 210 लोग घायल हुए थे।
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*11 जुलाई 2006 मुंबई ट्रेन धमाका: मुंबई की लोकल ट्रेनों में अलग-अलग 7 बम धमाके हुए थे। सभी फर्स्ट क्लास कोच में बम रखे गए थे। इन धमाकों में इंडियन मुजाहिदीन का हाथ था। इसमें कुल 210 लोग मारे गए थे और 715 लोग जख्मी हुए थे।
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*13 मई 2008 जयपुर ब्लास्ट: 15 मिनट के अंदर 9 बम धमाकों से पिंक सिटी लाल हो गई थी। इन धमाकों में कुल 63 लोग मारे गए थे जबकि 210 लोग घायल हुए थे।
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*30 अक्टूबर 2008 असम में धमाके: राजधानी गुवाहाटी के विभिन्न जगहों पर कुल 18 धमाके आतंकियों ने किए। इन धमाकों में कुल 81 लोग मारे गए जबकि 470 लोग घायल हुए।
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*13 दिसंबर 2001 भारतीय संसद पर हमला: लश्कर ए तैयबा और जैश मोहम्मद के 5 आतंकी भारत के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले संसद भवन परिसर में घुस गए। हालांकि सुरक्षा बलों ने आतंकियों को मार गिराया और आतंकी अपने मंसूबे में नाकाम हो गए। हमले के समय संसद भवन में 100 राजनेता मौजूद थे। इस हमले में 6 पुलिसकर्मी और 3 संसद भवन कर्मी मारे गए।
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*14 फरवरी 1998 कोयम्बटूर धमाका: इस्लामिक ग्रुप अल उम्माह ने कोयम्बटूर में 11 अलग-अलग जगहों पर 12 बम धमाके किए। इसमें 200 लोग घायल हुए जबकि 60 लोग मारे गए।
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*1 अक्टूबर 2001 जम्मू कश्मीर विधानसभा भवन पर हमला: जैश ए मोहम्मद ने 3 आत्मघाती हमलावरों और कार बम की सहायता से भवन पर हमला किया। इसमें 38 लोग मारे गए।

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#लखनऊ #उत्तर प्रदेश पंजाब के गुरदासपुर में सोमवार को हुए आतंकी हमले से एक बार फिर देश दहल गया है. इससे हमले ने देश में आतंकी खतरे का बड़ा संकेत दिया है.
पंजाब के दीनानगर कस्बे में सोमवार सुबह आतंकवादियों ने लोगों पर अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसमें 12 लोगों की मौत की खबर आ रही है. इस आतंकी हमले में कई लोगों के घायल होने की सूचना भी मिल रही है. घायलों में पुलिसकर्मी भी शामिल हैं. इस मुठभेड़ में एक आतंकी के मारे जाने की भी खबर आ रही है. मिली जानकारी के मुताबिक आतंकी हमले की जवाबी गोलीबारी में पंजाब पुलिस के एसपी शहीद हो गए हैं.
लेकिन यह कोई पहला मौका नहीं है, जब देश कोई आतंकी हमला झेल रहा है. इससे पहले भी भारत को कई आतंकी हमलों से दहल उठा है. आइए भारत पर हुए अब तक के आतंकी हमलों पर एक नजर डालते हैं :
4 जून 2015 मणिपुर में पुलिसवालों पर हमला
पढ़ें, कब-कब आतंकी हमलों ने दहलाया देश को
मणिपुर के चंदेल जिले में आतंकियों ने पुलिसवालों के काफिले पर हमला कर दिया, जिसमें 20 जवान शहीद हुए थे.
28 दिसंबर 2014 चर्च स्ट्रीट बम धमाका
बेंगलुरू के चर्च स्ट्रीट इलाके में बम धमाका हुआ था. इस ब्लास्ट में एक शख्स की मौत हुई थी.
21 फरवरी 2013 हैदराबाद सीरियल ब्‍लास्‍ट
हैदराबाद में सीरियल ब्लास्ट हुए, जिसमें 16 लोगों की मौत हुई और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे.
26/11 मुंबई आतंकी हमला
10 आत्मघाती हमलावर मुंबई में हथियारों से लैस होकर घुसे. सीरियल बम धमाकों के अलावा आतंकियों ने कई जगहों पर अंधाधुंध फायरिंग की. आतंकियों ने नरीमन हाउस, होटल ताज और होटल ओबेराय को कब्जे में ले लिया था. इसमें कुल 166 लोग मारे गए थे और 293 लोग घायल हुए थे. आतंकी कसाब पकड़ा गया था, जबकि नौ आतंकी मारे गए थे.
13 जुलाई 2011 मुबंई सीरियल ब्‍लास्‍ट
मुंबई के तीन इलाकों में सीरियल ब्लास्ट हुए, जिसमें 26 लोगों की मौत हुई और 130 से ज्यादा लोग घायल हुए थे.
13 फरवरी 2010 पुणे का जर्मन बेकरी ब्‍लास्‍ट
पुणे के जर्मन बेकरी में ब्लास्ट हुआ था, जिसमें 17 लोगों की मौत हुई थी और 60 लोग घायल हुए थे.
26 नवंबर 2008 मुंबई में फायरिंग
10 आतंकियों ने पूरी मुंबई को हिलाकर रख दिया. इन आतंकियों ने कई इलाकों में अंधाधुध फायरिंग की थी, जिसमें 171 लोगों की मौत हुई थी और 250 से ज्यादा लोग घायल हुए थे.
30 अक्टूबर 2008 असम में धमाके
राजधानी गुवाहाटी के विभिन्न जगहों पर कुल 18 धमाके आतंकियों ने किए थे. इन धमाकों में कुल 81 लोग मारे गए, जबकि 470 लोग घायल हुए.
13 सितंबर 2008 में दिल्‍ली में हुए ब्‍लास्‍ट
दिल्ली के कई बड़े बाजारों में सीरियल ब्लास्ट हुए, जिसमें 21 लोगों की मौत हुई और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए.
26 जुलाई 2008 अहमदाबाद सीरियल ब्‍लास्‍ट
गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में सीरियल बम ब्लास्ट में 45 लोगों की मौत और 150 लोग घायल हुए थे.
13 मई 2008 जयपुर ब्लास्ट
15 मिनट के अंदर 9 बम धमाकों से पिंक सिटी लाल हो गई थी. इन धमाकों में कुल 63 लोग मारे गए थे जबकि 210 लोग घायल हुए थे.
26 मई 2007 गुवाहाटी बम धमाके
गुवाहाटी में हुए धमाकों में 6 लोगों की मौत और 30 लोग घायल हुए थे.
8 सितंबर 2006 मालेगांव बम ब्‍लास्‍ट
महाराष्ट्र के मालेगांव की एक मस्जिद के पास बम ब्लास्ट, 37 लोगों की मौत और 125 घायल.
11 जुलाई 2006 मुंबई ट्रेन धमाका
मुंबई की लोकल ट्रेनों में अलग-अलग 7 बम धमाके हुए थे. सभी फर्स्ट क्लास कोच में बम रखे गए थे. इन धमाकों में इंडियन मुजाहिदीन का हाथ था. इसमें कुल 210 लोग मारे गए थे और 715 लोग जख्मी हुए थे.
7 मार्च 2006 वाराणसी में हुए आतंकी हमले
वाराणसी में हुए आतंकी हमले में 28 लोगों की मौत हुई थी और 101 लोग घायल हो गए थे.
29 अक्टूबर 2005 दिल्ली सीरियल बम ब्लास्ट
दीवाली से दो दिन पहले आतंकियों ने 3 बम धमाके किए. 2 धमाके सरोजनी नगर और पहाड़गंज जैसे मुख्य बाजारों में हुए. तीसरा धमाका गोविंदपुरी में एक बस में हुआ. इसमें कुल 63 लोग मारे गए जबकि 210 लोग घायल हुए थे.
15 अगस्त 2004 असम में ब्लास्ट
असम में ब्लास्ट हुआ जिसमें 16 लोगों की मौत हो गई. इनमें ज्यादातर स्कूली बच्चे शामिल थे.
25 अगस्त 2003 मुंबई में दोहरे कार धमाके
मुबंई में हुए दोहरे कार धमाके में 52 लोगों की मौत हो गई थी और 150 लोग घायल हो गए थे.
14 मई 2002 जम्‍मू के आर्मी कैंट पर आतंकी हमला
जम्मू के पास आर्मी कैंट पर आतंकी हमले में 30 लोगों की मौत हो गई थी.
24 सितंबर 2002 अक्षरधाम मंदिर पर हमला
लश्कर और जैश ए मोहम्मद के 2 आतंकी मुर्तजा हाफिज यासिन और अशरफ अली मोहम्मद फारुख दोपहर 3 बजे अक्षरधाम मंदिर में घुस गए. ऑटोमैटिक हथियारों और हैंड ग्रेनेड से उन्होंने वहां मौजूद लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया. इसमें 31 लोग मारे गए जबकि 80 लोग घायल हो गए थे.
13 दिसंबर 2001 भारतीय संसद पर हमला
लश्कर ए तैयबा और जैश मोहम्मद के 5 आतंकी भारत के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले संसद भवन परिसर में घुस गए. हालांकि सुरक्षा बलों ने आतंकियों को मार गिराया और आतंकी अपने मंसूबे में नाकाम हो गए. हमले के समय संसद भवन में 100 राजनेता मौजूद थे. इस हमले में 6 पुलिसकर्मी और 3 संसद भवन कर्मी मारे गए.
1 अक्टूबर 2001 जम्मू कश्मीर विधानसभा भवन पर हमला
जैश ए मोहम्मद ने 3 आत्मघाती हमलावरों और कार बम की सहायता से भवन पर हमला किया. इसमें 38 लोग मारे गए.
14 फरवरी 1998 कोयम्बटूर धमाका
इस्लामिक ग्रुप अल उम्माह ने कोयम्बटूर में 11 अलग-अलग जगहों पर 12 बम धमाके किए. इसमें 200 लोग घायल हुए जबकि 60 लोग मारे गए थे.
12 मार्च 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट
पूरे मुंबई में सीरियल धमाके हुए. इन धमाकों के पीछे दाउद इब्राहिम और डी कंपनी का हाथ था. इसमें 257 लोग मारे गए थे, जबकि 713 लोग घायल हुए थे.
23 जून 1985 में एयर इंडिया के बोइंग 747-237B को बम से उड़ा दिया था
पंजाब के आतंकी गुट ने एयर इंडिया के बोइंग 747-237B कनिष्क विमान को 31,000 फीट की ऊंचाई पर बम से उड़ा दिया गया था. इस विमान में सवार सभी 329 लोग मारे गए थे.

रविवार, 26 जुलाई 2015

करगिल में हमारा एक जवान 100 पाकिस्तानी जवानों पर भारी पड़ा - प्रधानमंत्री मोदी

करगिल में हमारा एक जवान 100 पाकिस्तानी जवानों पर भारी पड़ा - प्रधानमंत्री मोदी


पढ़ें: मन की बात में पीएम ने क्या-क्या कहा
July 26, 2015 11:26 AM IST | Updated on: July 26, 2015 12:41 PM IST
आईबीएन-7
नई दिल्ली।  आज मन की बात में प्रधानमंत्री मोदी ने करगिल में शहीद जवानों को याद किया। पीएम ने कहा कि करगिल में हमारा एक जवान 100 पाकिस्तानी जवानों पर भारी पड़ा। 26 जुलाई, देश के इतिहास में करगिल विजय दिवस के रूप में अंकित है। देश के किसान का नाता, जमीन से जितना है, उतना ही देश के जवान का है। आज करगिल विजय दिवस पर इन सभी हमारे सेनानियों को मेरा शत-शत प्रणाम। पढ़ें- पीएम ने मन की बात में क्या-क्या कहा
मेरे प्यारे देशवासियों, नमस्कार!
इस वर्ष बारिश की अच्छी शुरुआत हुई है। हमारे किसान भाईयों, बहनों को खरीफ की बुआई करने में अवश्य मदद मिलेगी। और एक खुशी की बात मेरे ध्यान में आई है और मुझे बड़ा आनंद हुआ। हमारे देश में दलहन की और तिलहन की  बहुत कमी रहती है। ग़रीब को दलहन चाहिये, खाने के लिये सब्ज़ी वगैरह में थोड़ा तेल भी चाहिये। मेरे लिये ख़ुशी की बात है कि इस बार जो उगाई हुई है, उसमें दलहन में क़रीब-क़रीब 50 प्रतिशत वृद्धि हुई है। और तिलहन में क़रीब-क़रीब 33 प्रतिशत वृद्धि हुई है। मेरे किसान भाई-बहनों को इसलिए विशेष बधाई देता हूं, उनका बहुत अभिनंदन करता हू।
मेरे प्यारे देशवासियों, 26 जुलाई, हमारे देश के इतिहास में कारगिल विजय दिवस के रूप में अंकित है। देश के किसान का नाता, ज़मीन से जितना है, उतना ही देश के जवान का भी है। कारगिल युद्ध में, हमारा एक-एक जवान, सौ-सौ दुश्मनों पर भारी पड़ा। अपने प्राणों की परवाह न करके, दुश्मनों की कोशिशों को नाकाम करने वाले उन वीर सैनिकों को शत-शत नमन करता हूं। कारगिल का युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा गया, भारत के हर शहर, हर गांव में, इस युद्ध में योगदान था। ये युद्ध, उन माताओं, उन बहनों के लिए लड़ा, जिनका जवान बेटा या भाई, कारगिल में दुश्मनों से लड़ रहा था। उन बेटियों ने लड़ा, जिनके हाथों से अभी, पीहर की मेहंदी नहीं उतरी थी। पिता ने लड़ा, जो अपने जवान बेटों को देखकर, ख़ुद को जवान महसूस करता था। और उस बेटे ने लड़ा, जिसने अभी अपने पिता की उंगली पकड़कर चलना भी नहीं सीखा था। इनके बलिदान के कारण ही आज भारत दुनिया में सर उठाकर बात कर पाता है। और इसलिए, आज कारगिल विजय दिवस पर इन सभी हमारे सेनानियों को मेरा शत-शत प्रणाम।
26 जुलाई, एक और दृष्टि से भी मैं जरा महत्वपूर्ण मानता हूं, क्योंकि, 2014 में हमारी सरकार बनने के बाद, कुछ ही महीनों में 26 जुलाई को हमने MyGov को प्रारंभ किया था। लोकतंत्र में जन-भागीदारी बढ़ाने का हमारा संकल्प, जन-जन को विकास के कार्य में जोड़ना, और मुझे आज एक साल के बाद यह कहते हुए यह ख़ुशी है, करीब दो करोड़ लोगों ने MyGov को देखा।  करीब-करीब साढ़े पांच लाख लोगों ने कमेंट्स किए और सबसे ज्यादा खुशी की बात तो ये है कि पचास हजार से ज़्यादा लोगों ने पीएमओ पर सुझाव दिए, उन्होंने समय निकाला,  इस काम को महत्वपूर्ण माना।
और कैसे महत्वपूर्ण सुझाव आये! कानपुर से अखिलेश वाजपेयी जी ने एक अच्छा सुझाव भेजा था, कि विकलांग व्यक्तियों को रेलवे के अंदर ।RCTC Website के माध्यम से कोटा वाला टिकट क्यों नहीं दिया जाना चाहिये? अगर विकलांग को भी टिकट पाने के लिए वही कठिनाइयां झेलनी पड़े, कितना उचित है? अब यूं तो बात छोटी है, लेकिन न कभी सरकार में किसी को ये ध्यान आया, न कभी इस पर सोचा गया। लेकिन भाई अखिलेश वाजपेयी के सुझाव पर सरकार ने गंभीरता से विचार किया, और आज हमारे विकलांग भाइयों-बहनों के लिए, इस व्यवस्था को लागू कर दिया गया। आज जो लोगों बनते हैं, टैग लाइन बनते हैं, कार्यक्रम की रचना होती है, पॉलिसी बनती है, MyGov पर बहुत ही सकारात्मक सुझाव आते हैं। शासन व्यवस्था में एक नई हवा का अनुभव होता है। एक नई चेतना का अनुभव होता है। इन दिनों मुझे MyGov पर ये भी सुझाव आने लगे हैं, कि मुझे 15 अगस्त को क्या बोलना चाहिेए।
चेन्नई से सुचित्रा राघवाचारी, उन्होंने काफ़ी कुछ सुझाव भेजे हैं। बेटी-बचाओ, बेटी-पढ़ाओ पर बोलिए, क्लीन गंगा पर बोलिे, स्वच्छ भारत पर बोलिए, लेकिन इससे मुझे एक विचार आया, क्या इस बार 15 अगस्त को मुझे क्या बोलना चाहिए। क्या आप मुझे सुझाव भेज सकते हैं? MyGov पर भेज सकते हैं, आकाशवाणी पर चिठ्ठी लिख सकते हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय में चिठ्ठी लिख सकते हैं।
देखें! मैं मानता हूं, शायद ये एक अच्छा विचार है कि 15 अगस्त के मेरे भाषण को, जनता जनार्दन से सुझाव लिए जाएं। मुझे विश्वास है कि आप जरूर अच्छे सुझाव भेजेंगे। एक बात की ओर मैं अपनी चिंता जताना चाहता हूं। मैं कोई उपदेश नहीं देना चाहता हूं और न ही मैं राज्य सरकार, केंद्र सरकार या स्थानीय स्वराज की संस्थाओं की इकाइयों की ज़िम्मेवारियों से बचने का रास्ता खोज रहा हूं।
अभी दो दिन पहले, दिल्ली की एक दुर्घटना के दृश्य पर मेरी नजर पड़ी। और दुर्घटना के बाद वो स्कूटर चालक 10 मिनट तक तड़पता रहा। उसे कोई मदद नहीं मिली। वैसे भी मैंने देखा है कि मुझे कई लोग लगातार इस बात पर लिखते रहते हैं कि भई आप रोड सेफ्टी पर कुछ बोलिये। लोगों को सचेत कीजिए। बेंगलूरु के होशा कोटे अक्षय हों, पुणे के अमेय जोशी हों, कर्नाटक के मुरबिदरी के प्रसन्ना काकुंजे हों। इन सबने, यानि काफ़ी लोगों के हैं नाम, मैं सबके नाम तो नहीं बता रहा हूं - इस विषय पर चिंता जताई है और कहा। है आप सबकी चिंता सही है। और जब आंकड़ों की तरफ देखते हैं तो हृदय हिल जाता है।

हमारे देश में हर मिनट एक दुर्घटना होती है। दुर्घटना के कारण, रोड एक्सीडेंट के कारण, हर 4 मिनट में एक मृत्यु होती है। और सबसे बड़ी चिंता का विषय ये भी है, करीब-करीब एक तिहाई मरने वालों में 15 से 25 साल की उम्र के नौजवान होते हैं और एक मृत्यु पूरे परिवार को हिला देती है। शासन को तो जो काम करने चाहिए वो करने ही चाहिए, लेकिन मैं मां-बाप से गुज़ारिश करता हूं, अपने बच्चों को - चाहे दो पहिया चलाते हों या चार पहिया चलाते हों - सेफ्टी की जितनी बातें है, उस पर जरूर ध्यान देने का माहौल परिवार में भी बढाना चाहिए। कभी-कभी हम ऑटो-रिक्शा पर देखते हैं, पीछे लिखा होता है ‘पापा जल्दी घर आ जाना’, पढते हैं तो कितना टचिंग लगता है, और इसलिए मैं कहता हूं, ये बात सही है कि सरकार ने इस दिशा में काफी नए इनिशिएटिव लिए हैं। रोड सेफ्टी के लिए चाहे एजुकेश का मामला हो, रोड की रचना का इंजीनियरिगं हो, क़ानून को लागू करने की बात हो - या एक्सीडेंट के बाद घायल लोगों को इमरजेंसी केयर की बात हो, इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए रोड ट्रांसपोर्ट एंड सेफ्टी बिल  हम लाने जा रहे हैं। आने वाले दिनों में नेशनल रोड सेफ्टी पॉलिसी और रोड सेफ्टी एक्शन प्लान का अमल करने की दिशा में भी हम कई महत्वपूर्ण कदम उठाने के लिए सोच रहे हैं।

एक और प्रोजेक्ट हमारे लिए है, आगे चलकर इसका विस्तार भी होने वाला है, कैशलेश ट्रीटमेंट गुडगांव, जयपुर और वड़ोदरा वहां से लेकर के मुंबई, रांची, रणगांव, मौंडिया राजमार्गों के लिए, हम एक कैशलेश ट्रीटमेंट और उसका अर्थ है कि पहले पचास घंटे - पैसे हैं कि नहीं, पैसे कौन देगा, कौन नहीं देगा, इन सारी चिंता छोड़कर के - एक बार रोड एक्सीडेंट में जो घायल है, उसको उत्तम से उत्तम सेवा कैसे मिले, सारवार कैसे मिले, उसको हम प्राथमिकता दे रहे हैं। देशभर में हादसों के संबंध में जानकारी देने के लिए टोल-फ्री 1033 नंबर, एंबुलेंस की व्यवस्था, ये सारी बातें,  लेकिन ये सारी चीजें एक्सीडेंट के बाद की हैं। एक्सीडेंट न हो इसके लिए तो हम सबने सचमुच में... एक-एक जान बहुत प्यारी होती है, एक-एक जीवन बहुत प्यारा होता है, उस रूप में उसको देखने की आवश्यकता है।
कभी-कभी मैं कहता हूं, कर्मचारी कर्मयोगी बनें। पिछले दिनों कुछ घटनाएं मेरे ध्यान में आई, मुझे अच्छा लगा कि मैं आपसे बात करूं, कभी-कभार नौकरी करते-करते इंसान थक जाता है, और कुछ सालों की बात तो “ठीक है, तनख़्वाह मिल जाती है, काम कर लेंगे”, यही भाव होता है, लेकिन मुझे पिछले दिनों, रेलवे के कर्मचारी के विषय में एक जानकारी मिली, नागपुर डिवीजन में विजय बिस्वाल करके एक टीटीई हैं, अब उनको पेंटिंग का शौक है, अब वो कहीं पर भी जाके पेंटिग कर सकते थे, लेकिन उन्होंने रेलवे को ही अपना आराध्य माना और वे रेलवे में नौकरी करते हैं और रेलवे के ही संबंधित भिन्न-भिन्न दृश्यों का पेंटिग करते रहते हैं, उनको एक आनंद भी मिलता है और उस काम के अंदर इतनी रूचि बढ़ जाती है। मुझे बड़ा ये उदाहरण देख कर के अच्छा लगा कि अपने काम में भी कैसे प्राणतत्व लाया जा सकता है। अपनी रुचि, अपनी कला, अपनी क्षमता को अपने कार्य के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है, ये विजय बिस्वाल ने बताया है। हो सकता है अब विजय बिस्वाल के पेंटिंग की चर्चा आने वाले दिनों में  जरुर होगी।
और भी मेरे ध्यान में एक बात आई - मध्य प्रदेश के हरदा ज़िले के सरकारी अधिकारियों की पूरी टीम, पूरी टोली ने एक ऐसा काम शुरू किया जो मेरे मन को छू गया और मुझे बहुत पसंद है उनका ये कामI उन्होंने शुरु किया “ऑपरेशन मलयुद्ध” - अब ये कोई, इसका सुनते हुए लगेगा कुछ और ही बात होगीI लेकिन मूल बात ये है उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान को नया मोड़ दिया है और उन्होंने पूरे जिले में एक अभियान चलाया है ‘ब्रदर नंबर वन’, यानि वो सबसे उत्तम भाई जो अपनी बहन को रक्षाबंधन पर एक शौचालय भेंट करे, और उन्होंने बीड़ा उठाया है कि ऐसे सभी भाइयों को प्रेरित करके उनकी बहनों को टॉयलेट देंगे और पूरे जिले में खुले में कहीं माताओं-बहनों को शौच ना जाना पड़े, ये काम रक्षाबंधन के पर्व पर वो कर रहे हैं। देखिए रक्षाबंधन का अर्थ कैसा बदल गया, मैं हरदा जिले के सरकारी अधिकारियों की पूरी टीम को बहुत-बहुत बधाई देता हूं।
अभी एक समाचार मेरे कान पे आए थे, कभी-कभी ये छोटी-छोटी चीजें बहुत मेरे मन को आनंद देती हैं। इसलिए मैं आपसे शेयर कर रहा हूं। छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव में केश्ला करके एक छोटा सा गांव है। उस गांव के लोगों ने पिछले कुछ महीनों से कोशिश करके शाैचालय  बनाने का अभियान चलाया। और अब उस गांव में किसी भी व्यक्ति को खुले में शौच नहीं जाना पड़ता है। ये तो उन्होंने किया, लेकिन, जब पूरा काम पूरा हुआ तो पूरे गांव ने जैसे कोई बहुत बड़ा उत्सव मनाया जाता है वैसा उत्सव मनाया। गांव ने ये सिद्धि प्राप्त की। केश्ला गांव समस्त ने मिलकर के एक बहुत बड़ा आनंदोत्सव मनाया। समाज जीवन में मूल्य कैसे बदल रहे हैं, जन-मन कैसे बदल रहा है और देश का नागरिक देश को कैसे आगे ले जा रहा है इसके ये उत्तम उदाहरण मेरे सामने आ रहे हैं।
मुझे भावेश डेका, गुवाहाटी से लिख रहे हैं, नॉर्थ-ईस्ट के सवालों के संबंध में। वैसे नॉर्थ-ईस्ट के लोग एक्टिव भी बहुत हैं। वो काफी कुछ लिखते रहते हैं, अच्छी बात है। लेकिन मैं आज ख़ुशी से उनको कहना चाहता हूं कि नॉर्थ-ईस्ट के लिए एक अलग मिनिस्ट्री बनी हुई है। जब अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे तब एक डोनियर मिनिस्ट्री बनी थी ‘Development of North-East Region’. हमारी सरकार बनने के बाद, हमारे इस विभाग में बड़ा महत्वपूर्ण निर्णय किया है कि नॉर्थ-ईस्ट का भला दिल्ली में बैठकर के हो जाएगा क्या? और सबने मिलकर के तय किया कि भारत सरकार के अधिकारियों की टीम नॉर्थ-ईस्ट के उन राज्यों में जाएगी।  नागालैंड हो, मणिपुर हो, अरुणाचल हो, त्रिपुरा हो, असम हो, सिक्किम हो और सात दिन वहां कैंप करेंगे। जिलों में जाएंगे, गांवों में जाएंगे, वहां के स्थानीय सरकार के अधिकारियों से मिलेंगे, जनप्रतिनिधियों से बातें करेंगे, नागरिकों से बातें करेंगे। समस्याओं को सुनेंगे, समस्याओं का समाधान करने की दिशा में भारत सरकार को जो करना है, उसको भी करेंगे। ये प्रयास आने वाले दिनों में बहुत अच्छे परिणाम लाएगा। और जो अधिकारी जा कर के आते हैं, उनको भी लगता है कितना सुंदर प्रदेश, कितने अच्छे लोग, अब इस इलाके को विकसित करके ही रहना है, उनकी समस्याओं का समाधान करके ही रहना है। इस संकल्प के साथ लौटते हैं तो दिल्ली आने के बाद भी अब उनको वहां की समस्याओं को समझना भी बहुत सरल हो गया है। तो एक अच्छा प्रयास, दिल्ली से दूर-दूर पूरब तक जाने का प्रयास, जो मैं ‘ एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ कह रहा हूं ना, यही तो एक्ट है।
मेरे प्यारे देशवासियो, हम सब इस बात के लिए गर्व करते हैं कि ‘मार्स मिशन’ की सफलता का हमें आनंद होता है। अभी पिछले दिनों भारत के PSLV C-28 ने UK के पांच सेटेलाइट लॉन्च किए। भारत ने अब तक लॉन्च किए हुए ये सबसे ज़्यादा हैवी वेट सैटेलाइट लॉन्च किए हैं। ये खबरें ऐसी होती है कि कुछ पल के लिए आती हैं, चली जाती हैं, इस पर हमारा ध्यान नहीं जाता। लेकिन ये बहुत बड़ा अचीवमेंट है। लेकिन कभी-कभी ये भी विचार आता है, आज हम युवा पीढ़ी से अगर बात करते हैं और उनको पूछें कि आप आगे क्या बनना चाहते हो, तो 100 में से बड़ी मुश्किल से एक-आध कोई छात्र मिल जाएगा जो ये कहेगा कि मुझे साइंटिस्ट बनना है। साइंस के प्रति रुझान कम होना ये बहुत चिंता का विषय है।
साइंस और टेक्नोलॉजी एक प्रकार से विकास का डीएनए है। हमारी नई पीढ़ी साइंटिस्ट बनने के सपने देखे, उनको प्रोत्साहन मिले, उनकी क्षमताओं को जाना जाए, एक बहुत बड़ी आवश्यकता है। अभी भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने एक राष्ट्रीय आविष्कार अभियान शुरु किया है। हमारे राष्ट्र के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम जी ने इसका आरम्भ किया है। इस अभियान के तहत IIT, NIT, Central और State Universities एक मेंटर के तौर पर, जहां-जहां इस प्रकार की संभावनाएं हैं, वहां उन बालकों को प्रोत्साहित करना, उनको मार्गदर्शन करना, उनको मदद करना, उस पर ध्यान केंद्रित करने वाले हैं। मैं तो सरकार के IAS अफसरों को भी कहता रहता हूं कि आप इतना पढ़ लिखकर आगे बढ़े हो तो आप भी तो कभी सप्ताह में दो चार घंटे अपने नजदीक के किसी स्कूल-कॉलेज में जा करके बच्चों से जरुर बात कीजिए। आपका जो अनुभव है, आपकी जो शक्ति है वो जरुर इस नई पीढ़ी के काम आएगी।
हमने एक बहुत बड़ा बीड़ा उठाया हुआ है, क्या हमारे देश के गांवों को 24 घंटे बिजली मिलनी चाहिए कि नहीं मिलनी चाहिए? काम कठिन है, लेकिन करना है। हमने इसका शुभारम्भ कर दिया है। और आने वाले वर्षों में, हम गांवों को 24 घंटे बिजली प्राप्त हो। गांव के बच्चों को भी, परीक्षा के दिनों में पढ़ना हो तो बिजली की तकलीफ न हो। गांव में भी छोटे-मोटे उद्योग लगाने हों तो बिजली प्राप्त हो। आज तो मोबाइल चार्ज करना हो तो भी दूसरे गांव जाना पड़ता है। जो लाभ शहरों को मिलता है वो गांवों को मिलना चाहिए। गरीब के घर तक जाना चाहिए। और इसीलिए हमने प्रारंभ किया है ‘दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति कार्यक्रम’। मैं जानता हूं इतना बड़ा देश, लाखों गांव, दूर-दूर तक पहुंचना है, घर-घर पहुंचना है। लेकिन, ग़रीब के लिए ही तो दौड़ना है। हम इसको करेंगे, आरम्भ कर दिया है। जरुर करेंगे। आज मन की बात में भांति-भांति की बातें करने का मन कर गया।
एक प्रकार से हमारे देश में अगस्त महीना, सितंबर महीना, त्योहारों का ही अवसर रहता है। ढेर सारे त्यौहार रहते हैं। मेरी आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं। 15 अगस्त के लिए मुझे ज़रुर सुझाव भेजिये। आपके विचार मेरे बहुत काम आएंगे।
बहुत-बहुत धन्यवाद।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

72 फीसदी लोग मोदी सरकार के कामकाज से संतुष्ट: सर्वे




72 फीसदी लोग मोदी सरकार के कामकाज से संतुष्ट: सर्वे
May 23, 2015 सुमित अवस्थी आईबीएन-7

नई दिल्ली। केंद्र की मोदी सरकार ने अपने एक साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है। इस दौरान कितने बदले देश के हालात? महंगाई, भ्रष्टाचार बढ़ा या कमी आई? रोजगार के मौकों में क्या बदलाव आया? विदेशों में भारत की छवि कितनी निखरी? ये और ऐसे कई सवालों के जवाब जानने के लिए आईबीएन7 ने कराया एक व्यापक सर्वे।

एक्सिस एपीएम द्वारा किए गए इस सर्वे में 23 राज्यों के 20 हजार लोगों की राय जानी गई। 153 शहरों में हुए इस सर्वे में शहरी और ग्रामीण, महिला और पुरुष तथा हर आयुवर्ग की आबादी शामिल थी। सर्वे में पूछे गए सवाल और उनके जवाब नीचे दिए गए हैं।

सवालः क्या आप मोदी सरकार के पिछले एक साल के कामकाज से संतुष्ट हैं?

जवाब: हां 72.26%

नहीं     21.85%

कोई राय नहीं      05.89%

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सवालः सरकार से संतुष्ट या असंतुष्ट होने के कारण क्या हैं?

जवाब: विकास हुआ  30.22%

विकास नहीं हुआ   26.41%

कीमतें बढ़ीं        14.71%

कीमतें कम हुईं     05.18%

समझदार सरकार    05.13%

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सवालः संतुष्ट होने के बड़े कारण?

जवाब: विकास हुआ 30.22%

कीमतें कम हुईं     05.18%

समझदार सरकार    05.13%

अन्य कारण       06.46%

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सवालः असंतुष्ट होने के बड़े कारण?

जवाब: विकास नहीं हुआ 26.41%

कीमतें बढ़ीं                14.71%

मजबूर सरकार     01.42%

अन्य कारण       05.71%

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सवालः कैसे प्रधानमंत्री हैं नरेंद्र मोदी?

जवाब: प्रभावी और तेज 56.58%

अप्रभावी और धीमे 15.20%

इच्छाशक्ति नहीं 02.60%

ज्यादा कड़क नहीं 03.72%

साफ छवि लेकिन अच्छे प्रशासक नहीं 06.12%

काम कम-बातें ज्यादा 13.50%

अन्य 02.29%

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सवालः कितने बदले आम लोगों के आर्थिक हालात?

जवाब: बेहतर      61.17%

जस के तस       31.69%

खराब हुए 05.51%

कोई राय नहीं      01.63%

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सवालः बीते एक साल में देश के आर्थिक हालात?

जवाब: बेहतर हुए         63.08%

जस के तस                      30.11%

खराब हुए   05.09%

कोई राय नहीं 01.72%

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सवालः बीते एक साल में रोजगार के मौके?

जवाब: बढ़े                        27.62%

जस के तस                      34.90%

कम हुए              22.85%

कोई राय नहीं      01.34%

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सवालः बीते एक साल में महंगाई?

जवाब: बढ़ी                       41.95%

जस का तस                    26.06%

कम हुई               21.47%

कोई राय नहीं      01.09%

--------------------- ( उत्तर भारत के लोगों की राय)

सवालः क्या आप मोदी सरकार के पिछले एक साल के कामकाज से संतुष्ट हैं?

जवाब: संतुष्ट              71.73%

संतुष्ट नहीं        20.90%

कोई राय नहीं              07.37%

सवालः सरकार से संतुष्ट या असंतुष्ट होने का कारण क्या हैं?

जवाब: विकास हुआ                 29.38%

विकास नहीं हुआ          24.60%

कीमतें बढ़ीं                                14.31%

कीमतें कम हुईं     04.32%

समझदार सरकार           04.92%

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सवालः संतुष्ट होने के बड़े कारण?

जवाब: विकास हुआ                 29.38%

कीमतें कम हुईं                      04.32%

समझदार सरकार    04.92%

अन्य कारण               03.58%

---------------------

सवालः असंतुष्ट होने के बड़े कारण?

जवाब: विकास नहीं हुआ      24.60%

कीमतें बढ़ीं                 14.31%

मजबूर सरकार               00.35%

अन्य कारण       13.90%

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सवालः कैसे प्रधानमंत्री हैं नरेंद्र मोदी?

जवाब: प्रभावी और तेज 58.00%

अप्रभावी और धीमे 12.09%

इच्छा शक्ति नहीं 02.45%

ज्यादा कड़क नहीं 02.73%

साफ छवि लेकिन अच्छे प्रशासक नहीं 06.68%

काम कम बातें ज्यादा 15.72%

अन्य 02.33%

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सवालः कितने बदले आम लोगों के आर्थिक हालात?

जवाब: बेहतर      62.66%

जस के तस       31.60%

खराब हुए 04.92%

कोई राय नहीं      00.82%

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सवालः बीते एक साल में देश के आर्थिक हालात?

जवाब: बेहतर हुए         66.36%

जस के तस       28.94%

खराब हुए 03.84%

कोई राय नहीं      01.86%

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सवालः बीते एक साल में रोजगार के मौके?

जवाब: बढ़े        21.71%

जस के तस       37.82%

कम हुए          26.10%

कोई राय नहीं      14.37%

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सवालः बीते एक साल में महंगाई?

जवाब: बढ़ी                               30.33%

जस का तस                    29.96%

कम हुई               28.64%

कोई राय नहीं                  11.07%



बुधवार, 22 जुलाई 2015

Patwon ki Magnificent Haveli : Jaisalmer Rajasthan





Location: Jaisalmer Rajasthan 
Founded In: About 300 years ago

Rajasthan is home to some of the most magnificent havelis (mansions) in the whole of India. One such haveli is the Patwon ki Haveli, or Salim Singh ki Haveli, situated in the city of Jaisalmer. Infact, it is considered to be the one of the largest as well as the finest haveli of Rajasthan. The haveli has been named after Salim Singh, the prime minister of the erstwhile state of Jaisalmer. Patwon ki Haveli is beautifully constructed and stands covered with an arched roof. Exquisitely carved brackets, in the shape of peacocks, adorn its roof. Salim Singh ki Haveli comprises of five stories presently. However, it is said that initially, the haveli was seven stories high. The two additional wooden stories made the haveli as high as the palace of the Maharaja of Jaisalmer. Upset by this fact, the Maharaja ordered the demolition of the two topmost stories. Located just below the hill, Patwon ki haveli has been separated into six apartments that are decorated with wonderful carvings. Two of these have been converted into the office of the Archaeological Survey of India (ASI). The owners of the Patwon ki haveli still occupy some of its apartments. Beautiful paintings and dazzling mirror work festoon some of the inner walls of the haveli. Then, we have the delicately carved pillars that add to the magnificence of the haveli. One of the apartments also has gorgeous friezes painted on its walls. The corridors of Salim Singh ki Haveli are huge, its rooms massive and its hallways fascinating. Its gateways are guarded by real-looking tuskers, which have been made of sand stones. There are a large number of balconies in the Patwon ki haveli, numbering somewhere around thirty-eight. The most interesting feature is that all the thirty-eight balconies have different designs. The frontal facade of the haveli looks very much ship-stern, which has resulted in it being referred to as the Jahaz Mahal (Ship Palace) also. The spectacular blue cupola roof dazzling with exquisite stone carvings, screen windows and magnificent murals of the Patwon ki haveli definitely make it a place worth visiting 
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Jaisalmer portrays itself as a mysterious story amidst the gorgeous Thar Desert. And Patwon ki Haweli complements the grace and valor of this city. A cluster of five small havelis, Patwon ki Haveli is also the first Haveli that was ever constructed in Jaisalmer.Every inch of yellow sandstone used in the Heveli’s construction has been ostentatiously chiseled to impress, captivate and influence all. Beautiful frescoes, murals, mirror-works and paintings on every section of the Haveli speak of elegance and grace. Even the latticed arches and gateways are ornamented and designed beautifully. Large, breezy corridors, grand pillars and intricately detailed walls showcase the Haveli as an exquisite example of art and creativity. Every wing or section of Patwon ki Haveli is perfectly symmetrical and is owned by the Government and localities for accommodation and commercial purposes in parts.You may consider Patwon ki Haveli on your itinerary for your visit to the golden Jaisalmer.


धारा ३७० मात्र एक अंतरिम व्यवस्था : अरुणकुमार



धारा ३७० मात्र एक अंतरिम व्यवस्था, कोई विशेष दर्जा या शक्ति नहीं : अरुणकुमार


नागपुर, दि. ३० जून.धारा ३७० द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा या शक्ति प्राप्त है, यह मात्र एक भ्रम है. वास्तव में धारा ३७० उस समय की राज्य की स्थिति को देखते हुए की गई अंतरिम व्यवस्था है, ऐेसा प्रतिपादन जम्मू-कश्मीर स्टडी सेंटर के निदेशक अरुणकुमार ने किया. वे आर. एस. मुंडले धरमपेठ कला-वाणिज्य महाविद्यालय एवं जम्मू-कश्मीर स्टडी सेंटर नागपुर द्वारा महाविद्यालय के वेलणकर सभागृह में ‘जम्मू-कश्मीर : तथ्य और विपर्यास’ इस विषय पर आयोजित कार्यशाला में बोल रहे थे.

अपना मुद्दा स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि, जम्मू-कश्मीर का जब भारत में विलय हुआ, तब वहॉं युद्ध चल रहा था. उस समय की व्यवस्था के अनुसार वहॉं  संविधान सभा बन नहीं सकती थी. १९५१ में वहॉं संविधान सभा का निर्वाचन हुआ और इस संविधान सभा ने ६ फरवरी १९५४ को राज्य के भारत में विलय की पुष्टी की. १४ मई १९५४ को भारत के राष्ट्रपति ने संविधान के अस्थायी अनुच्छेद (धारा) ३७० के अंतर्गत संविधान आदेश जारी किया और वहॉं कुछ अपवादों और सुधारों के साथ भारत का संविधान लागू हुआ.

इसके बाद यह धारा समाप्त कर जम्मू-कश्मीर में भी भारत का सामान्य संविधान लागू होना अपेक्षित था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. क्योंकि, धारा ३७० के कुछ प्रावधान अन्य राज्यों के नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का हनन करनेवाले है लेकिन जम्मू-कश्मीर के राजनेताओं के राजनितिक लाभ लिए लाभकारी है. अत: उनका धारा ३७० कायम रखने का आग्रह है.

लेकिन इस धारा ३७० के कारण, १९४७ में पाकिस्तान से राज्य में आए हिंदू शरणार्थी तथा भारत के अन्य राज्यों से वहॉं जाकर वर्षों से रहनेवाले लाखों नागरिक राजनितिक, आर्थिक और शिक्षा से संबंधि अधिकारों से वंचित है. वहॉं अनुसूचित जनजाति के नागरिकों को भी राजनितिक आरक्षण नहीं मिलता. आज भी वहॉं भारतीय संविधान की १३५ धाराऐं लागू नहीं है.

जम्मू-कश्मीर स्टडी सेंटर के सचिव आषुतोष भटनागर ने राज्य के स्थिति की जानकारी देते हुए बताया कि, ८० के दशक के अंत में जम्मू-कश्मीर में शुरु हुआ हिंसाचार अब बहुत कम हुआ है. राज्य का करगिल, लेह, लद्दाख, जम्मू यह बहुत बड़ा क्षेत्र अलगाववाद से दूर और शांत है. श्रीनगर और घाटी के कुछ क्षेत्र में अलगाववादी कुछ सक्रिय है. लेकिन उनकी गतिविधियों को मीडिया में अतिरंजित प्रसिद्धि मिलती है, इस कारण पूरे राज्य में अशांति है, ऐसा गलत चित्र निर्माण होता है, यह वहॉं के वास्तव के विपरित है.

दोनों ही वक्ताओं ने नागरिकों से आवाहन किया है कि, लोग जम्मू-कश्मीर की वास्तविक स्थिति को जाने और वहॉं संपूर्ण सामान्य स्थिति निर्माण करने में सहयोग दे.

धरमपेठ शिक्षण संस्था के उपाध्यक्ष रत्नाकर केकतपुरे की अध्यक्षता में हुई इस कार्यशाला में अतिथियों का स्वागत प्रा. संध्या नायर और मीरा खडक्कार इन्होंने किया, कार्यक्रम का संचालन पत्रकार चारुदत्त कहू ने और आभार प्रदर्शन डॉ. अवतार कृशन रैना ने किया. इस कार्यशाला में शहर के गणमान्य पत्रकार, शिक्षाविध, राज्यशास्त्र के अभ्यासक और विधि शाखा के जानकार उपस्थित थे

दिशा संकेतक, बोध कराने वाला गुरु : जे. कृष्णमूर्ति



दिशा संकेतक, बोध कराने वाला गुरु : जे. कृष्णमूर्ति


सबसे पहली बात तो यह है कि हम गुरु चाहते ही क्यों हैं? हम कहते हैं कि हमें एक गुरु की आवश्यकता है। क्योंकि हम भ्रांति में हैं और गुरु मददगार होता है। वह बताएगा कि सत्य क्या है। वह समझने में हमारी सहायता करेगा। वह जीवन के बारे में हमसे कहीं अधिक जानता है। वह एक पिता की तरह, एक अध्यापक की तरह जीवन में हमारा मार्गदर्शन करेगा। उसका अनुभव व्यापक है और हमारा बहुत कम है। वह अपने अधिक अनुभव के द्वारा हमारी सहायता करेगा आदि-आदि।

सबसे पहले हम इस विचार की परीक्षा करें कि क्या कोई गुरु हमारी अस्त-व्यस्तता को, भीतरी गड़बड़ी को समाप्त कर सकता है? क्या कोई भी दूसरा व्यक्ति हमारी दुविधा को दूर कर सकता है? दुविधा, जो कि हमारी ही क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं का फल है। हम ने ही उसे रचा है। अंदर और बाहर, अस्तित्व के सभी स्तरों पर होने वाले इस क्लेश को, इस संघर्ष को, आप क्या समझते हैं कि इसे किसी और ने उत्पन्न किया है? यह हमारे ही अपने आपको न जानने का नतीजा है। हम अपने को गहराई से नहीं समझते। अपने द्वंद्व, अपनी प्रतिक्रियाएं, अपनी पीड़ाएं इन सब को नहीं समझ पाते। और इसलिए हम किसी गुरु के पास जाते हैं, यह सोचकर कि वह इस दुविधा, इस अस्त-व्यस्तता से बाहर निकलने में हमारी सहायता करेगा। वर्तमान से अपने संबंध में ही हम स्वयं को समझ सकते हैं और संबंध ही गुरु है, न कि बाहर कोई व्यक्ति। यदि हम संबंध को नहीं समझते, तो गुरु चाहे जो भी कहता रहे व्यर्थ है। क्योंकि यदि मैं इस संबंध को नहीं समझ पाता हूं, संपत्ति के साथ अपने संबंध को, व्यक्तियों और विचारों के साथ अपने संबंध को, तो मेरे भीतर के द्वंद्व को दूसरा और कौन सुलझा सकता है? इस द्वंद्व को, इस अस्पष्टता को दूर करने के लिए आवश्यक है कि मैं स्वयं इसे जानूं-समझूं, जिसका अर्थ है कि संबंधों में स्वयं के प्रति जागरूक रहूं और जागरूक रहने के लिए किसी गुरु की आवश्यकता नहीं है।

यदि मैं स्वयं को नहीं जानता, तो गुरु किस काम का! जिस तरह एक राजनीतिक नेता का चुनाव उन लोगों के द्वारा किया जाता है जो भ्रांत हैं और इसीलिए उनका चुनाव भी भ्रांतिपूर्ण होता है। उसी तरह मैं गुरु चुन लिया करता हूं। मैं केवल अपने विभ्रम के तहत उसका चयन करता हूं। अत: राजनीतिक नेता की तरह, गुरु भी भ्रांत    होता है। क्या सत्य दूसरे के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है? कुछ कहते हैं कि किया जा सकता है और कुछ कहते हैं कि नहीं किया जा सकता। हम इसकी सच्चाई को जानना चाहते हैं, यह नहीं कि किसी दूसरे की तुलना में मेरा मत क्या है। इस विषय में मेरा कोई मत नहीं है। या तो गुरु आवश्यक है, या फिर नहीं है। अत: आपके लिए गुरु स्वीकार करना आवश्यक है या नहीं, यह कोई आपकी या मेरी राय का प्रश्न नहीं है। किसी भी बात की सच्चाई किसी की राय पर निर्भर नहीं करती, चाहे वह राय कितनी भी गंभीर, विद्वत्तापूर्ण, लोकप्रिय और सार्वभौमिक क्यों न हो।

सच्चाई को तो वास्तव में ढूंढ निकालना होता है। महत्त्व इस बात का नहीं कि सही कौन है। मैं ठीक हूं या वे व्यक्ति जो कहते हैं कि गुरु आवश्यक हैं। महत्त्वपूर्ण यह पता लगाना है कि आपको गुरु की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है। तमाम तरह के शोषण के लिए गुरु हुआ करते हैं, लेकिन यहां वह मुद्दा अप्रासंगिक है। यदि आपको कोई बताए कि आप उन्नति कर रहे हैं, तो आपको बड़ा संतोष होता है। परंतु यह पता लगाना कि आपको गुरु की दरकार क्यों होती है, वही असली बात है। कोई आपको दिशा-संकेत दे सकता है, पर काम तो सारा आपको खुद ही करना होता है, भले ही आपका कोई गुरु भी हो। चूंकि आप यह सब नहीं करना चाहते, आप इसकी जिम्मेदारी गुरु पर छोड़ देते हैं। जब स्व का अंशमात्र भी बोध होने लगे, गुरु का उपयोग नहीं रह जाता। कोई गुरु, कोई पुस्तक अथवा शास्त्र आपको स्वबोध नहीं दे सकता। यह तभी आता है जब आप संबंधों के बीच स्वयं के प्रति सजग होते हैं। होने का अर्थ ही है संबंधित होना। संबंध को न समझना क्लेश है, कलह है। अपनी संपत्ति के साथ अपने संबंध के प्रति जागरूक न होना विभ्रम के, दुविधा के अनेक कारणों में से एक है। यदि आप संपत्ति के साथ अपने सही संबंध को नहीं जानते, तो द्वंद्व अनिवार्य है, जो कि समाज के द्वंद्व को भी बढ़ाएगा। यदि आप अपने और अपनी पत्नी के बीच, अपने और अपने पुत्र के बीच संबंध को नहीं समझते, तो उस संबंध से पैदा होने वाले द्वंद्व का निराकरण कोई दूसरा कैसे कर सकता है? यही बात विचारों, विश्वासों आदि पर लागू होती है।

व्यक्तियों के साथ, संपत्ति के साथ, विचारों के साथ अपने संबंध के बारे में स्पष्टता न होने के कारण आप गुरु खोजते हैं। यदि वह वस्तुत: गुरु है, तो वह आपको स्वयं को समझने के लिए कहेगा। सारी गलतफहमी तथा उलझन की वजह आप ही हैं, और आप इस द्वंद्व का समाधान तभी कर पाएंगे जब  आप स्वयं को पारस्परिक संबंध के बीच समझ लें।

आप किसी दूसरे के माध्यम से सत्य को नहीं पा सकते। ऐसा आप कैसे कर सकते हैं? सत्य कोई स्थैतिक तत्व,
जड़ चीज नहीं है। उसका कोई निश्चित स्थान नहीं है। वह कोई साध्य, कोई लक्ष्य नहीं है, बल्कि वह तो सजीव, गतिशील, सतर्क, जीवंत है। वह कोई साध्य कैसे हो सकता है? यदि सत्य कोई निश्चित बिंदु है, तो वह सत्य नहीं है, तब वह मात्र एक विचार या मत है। सत्य अज्ञात है और सत्य को खोजने वाला मन उसे कभी न पा सकेगा, क्योंकि मन ज्ञात से बना है। यह अतीत का, समय का परिणाम है। इसका आप स्वयं निरीक्षण कर सकते हैं। मन ज्ञात का उपकरण है। अत: वह अज्ञात को प्राप्त नहीं कर सकता। उसकी गति केवल ज्ञात से ज्ञात की ओर है।
जब मन सत्य को खोजता है, वह सत्य, जिसके विषय में उसने पुस्तकों में पढ़ा है, तो वह 'सत्य' आत्म-प्रक्षिप्त होता है। क्योंकि तब मन किसी ज्ञात का, पहले की अपेक्षा अधिक संतोषजनक ज्ञात का अनुसरण मात्र करता है। जब मन सत्य खोजता है, तो वह अपने ही प्रक्षेपण खोज रहा होता है, सत्य नहीं। अंतत: आदर्श हमारा ही प्रक्षेपण होता है, वह काल्पनिक, अयथार्थ होता है। 'जो है' वही यथार्थ है, उसका विपरीत नहीं। परंतु वह मन जो यथार्थ को खोज रहा है, ईश्वर को खोज रहा है, वह ज्ञात को ही खोज रहा है। जब आप ईश्वर के बारे में सोचते हैं, आपका ईश्वर आपके अपने विचार का प्रक्षेपण होता है। सामाजिक प्रभावों का परिणाम होता है। आप केवल ज्ञात के विषय में ही सोच सकते हैं।

अज्ञात के विषय में नहीं, आप सत्य पर एकाग्रता नहीं साध सकते। जैसे ही आप अज्ञात के बारे में सोचते हैं, वह केवल आत्म-प्रक्षिप्त ज्ञात ही होता है। ईश्वर या सत्य के बारे में सोचा नहीं जा सकता। यदि आप उसके बारे में सोच लेते हैं, तो वह सत्य नहीं है। सत्य को खोजा नहीं जा सकता। वह आप तक आता है। आप केवल उसी के पीछे दौड़ सकते हैं, जो ज्ञात है। जब मन ज्ञात के परिणामों से उत्पीडि़त नहीं होता, केवल तभी सत्य स्वयं को प्रकट कर सकता है। सत्य तो हर पत्ते में, हर आंसू में है। उसे क्षण-क्षण में जाना जाता है। सत्य तक आपको कोई नहीं ले जा सकता, और यदि कोई आपको ले भी जाए, तो वह यात्रा केवल ज्ञात की ओर ही होगी।
सत्य का आगमन केवल उसी मन में होता है, जो ज्ञात से रिक्त है। वह उस अवस्था में आता है, जब ज्ञात अनुपस्थित है, कार्यरत नहीं है। मन ज्ञात का भंडार है, वह ज्ञात का अवशेष है। उस अवस्था में होने के लिए, जिसमें अज्ञात अस्तित्व में आता है, मन को अपने प्रति, अपने चेतन तथा अचेतन अतीत के अनुभवों के प्रति, अपने प्रत्युत्तरों, अपनी प्रतिक्रियाओं एवं संरचना के प्रति जागरूक होना होगा। स्वयं को पूरी तरह से जान लेने पर ज्ञात का अंत हो जाता है, मन ज्ञात से पूर्णतया रिक्त हो जाता है। केवल तभी, अनामंत्रित ही, सत्य आप तक आ सकता है। सत्य न तो आपका है, न मेरा। आप इसकी उपासना नहीं कर सकते। जिस क्षण यह ज्ञात होता है, अयथार्थ ही होता है। प्रतीक यथार्थ नहीं है, छवि या प्रतिमा यथार्थ नहीं है; किंतु जब स्व की समझ होती है, स्व का अंत होता है, तब शाश्वत का आविर्भाव होता है।

अत: मूल बात यह है कि आप किसी गुरु के निकट जाते ही इसलिए हैं क्योंकि आप भ्रांत होते हैं। अगर आप अपने आप में स्पष्ट होते, तो आप किसी गुरु के पास न जाते। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि आप अपने रोम-रोम में खुश होते, यदि समस्याएं न होतीं, यदि आपने जीवन को पूर्णतया समझ लिया होता, तो आप किसी गुरु के पास न जाते। मुझे उम्मीद है कि आप इसके तात्पर्य को देख पा रहे हैं। चूंकि आप भ्रांत हैं, आप गुरु की खोज में हैं। आप उसके पास जाते हैं, इस उम्मीद के साथ कि वह आपको जीने की राह बताएगा, आपकी उलझनों को दूर कर देगा और आपको सत्य की पहचान कराएगा। आप किसी गुरु का चयन करते हैं क्योंकि आप भ्रांत हैं और आस लगाते हैं कि आप जो चाहते हैं वह गुरु आपको देगा। आप एक ऐसे गुरु को स्वीकार करते हैं जो आपकी मांग को पूरा करे। गुरु से मिलने वाली परितुष्टि के आधार पर ही आप गुरु को चुनते हैं और आपका यह चुनाव आप की तुष्टि पर ही आधारित होता है। आप ऐसे गुरु को नहीं स्वीकार करते जो कहता है, 'आत्म-निर्भर बनें'। अपने पूर्वग्रहों के अनुसार ही आप उसे चुनते हैं। चूंकि आप गुरु का चयन उस परितुष्टि के आधार पर करते हैं जो वह आपको प्रदान करता है, तो आप सत्य की खोज नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपनी दुविधा से बाहर निकलने का उपाय ढूंढ रहे हैं, और दुविधा से बाहर निकलने के उस उपाय को ही गलती से सत्य कह दिया जाता है।

संघ की स्वीकार्यता बढ़ी : मनमोहन वैद्य




संघ के प्रति समाज की स्वीकार्यता बढ़ी : मनमोहन वैद्य


नैनीताल/देहरादून 22 जुलाई (विसंके)। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रति देश में समर्थन बढ़ने के साथ ही संगठन की स्वीकार्यता में इजाफा हुआ है। संघ हर तीन साल में संघ शिक्षा वर्ग के पाठ्यक्रम की समीक्षा करेगा। परम पूजनीय सर संघचालक मोहन जी भागवत की मौजूदगी में शीर्षस्थ पदाधिकारियों की  संघ के विस्तार के लिए प्रचारकों के साथ बैठक चल रही है। बुधवार को संघ प्रमुख प्रांत प्रचारकों के साथ तीन दिनी बैठक करेंगे। इस अहम बैठक में आनुषांगिक संगठनों के क्रियाकलापों की समीक्षा करने के साथ ही भावी कार्यक्रम तय किए जाएंगे।
मंगलवार को पार्वती प्रेमा जगाती विद्यालय में पत्रकारों से बातचीत में संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन जी वैद्य ने कहा कि संघ के प्राथमिक शिक्षा वर्ग में पिछले साल 80 हजार लोग शामिल हुए थे, यह संख्या इस बार बढ़कर सवा लाख तक पहुंचने की पूरी उम्मीद है, जबकि संघ शिक्षा वर्ग में पिछली संख्या 17 हजार से बढ़कर 19 हजार हो जाएगी। उन्होंने कहा कि हर तीन साल में संघ शिक्षा वर्ग के पाठ्यक्रम की समीक्षा की जाती रही है।

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

एक शिक्षक की दृष्टि में गुरुपूर्णिमा : डॉ. संतोष कुमार तिवारी



बूंद का सागर हो जाना
श्री श्री रविशंकर
तारीख: 18 Jul 2015 11:55:49
 गुरु रु, आत्मा और ईश्वर में कोई अंतर नहीं है। ये तीनों एक ही हैं- आपकी आत्मा, गुरु तत्व और ईश्वर। और ये तीनों ही शरीर नहीं हैं। उनका रूप कैसा है? आकाश जैसा है।
व्योमवाद व्याप्त देहाय (व्योम=आकाश, देह=शरीर, व्याप्त=समाना)
आप शरीर नहीं हैं, आप आत्मा हैं, और आत्मा का स्वरुप आकाश जैसा है। यह गुरु के लिए भी समान है। गुरु को एक सीमित शरीर के रूप में मत देखिए। गुरु एक तरंग है, एक ऊर्जा है, जो सर्वव्यापी है, आत्मा की तरह। और गुरु का सम्मान करना अर्थात अपनी आत्मा का सम्मान करना।
इसलिए हम जब समर्पण करते हैं तो वह गुरु को करें, ईश्वर को करें या अपनी आत्मा को करें, एक ही बात है। समर्पण कुछ खोना नहीं है, रूपान्तरण है। वह वैसा ही है कि एक बूंद का महासागर में मिल जाना। बूंद फिर बूंद नहीं रहती, महासागर हो जाती है। समर्पण के बिना न हम गुरु को महसूस कर पाते हैं, न ईश्वर को और न अपनी आत्मा को। समर्पण से गांठ खुलती है... बाधाएं हटती हैं... रास्ता बनता है... नाता जुड़ता है। और तुम वही हो जाते हो, जो मूल स्वरूप में तुम हो। यदि तुम गुरु के निकट अनुभव नहीं कर पा रहे हो तो यह तुम्हारे ही कारण है, तुम्हारे मन, तुम्हारी धारणा, तुम्हारे अहंकार के कारण।
यदि तुम गुरु के साथ निकटता का अनुभव नहीं कर रहे, तो गुरु की आवश्यकता ही क्या है? वह तुम्हारे लिए एक और बोझ है। तुम्हारे पास पहले ही बहुत बोझ हैं। बस, अलविदा कह दो।
तुम गुरु के साथ हो ताकि तुम गुरु के आनंद में सहभागी हो, उसकी चेतना के सहभागी। इसके लिए, पहले तुम्हें अपने आप को खाली करना है, जो पहले से है, उसे गुरु को दे देना है। जो भी है गुरु को व्यक्त करो और यह मत सोचो कि 'यह तो कूड़ा है'। मन में जितना भी कूड़ा हो, जितने भी प्रकार का, गुरु उसे लेने के लिए तैयार हैं। तुम जैसे भी हो, गुरु तुम्हें स्वीकार कर लेंगे। अपनी ओर से वे बांटने को तैयार हैं- तुम्हें केवल अपनी ओर से बांटने के लिए तैयार होना है।
कृष्ण अर्जुन को कहते हैं, 'तुम मुझे बहुत प्रिय हो।' फिर कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि उसे समर्पण करना होगा। समर्पण की शुरुआत एक धारणा से होती है। पहले तुम्हें यह मानना होगा कि तुम ईश्वर (गुरु) को अत्यंत प्रिय हो। तब समर्पण स्वत: ही होता है।
समर्पण कोई कृत्य नहीं, एक धारणा है। समर्पण न करना अज्ञानता है, एक भ्रम। समर्पण की शुरुआत एक धारणा से होती है, फिर यह वास्तविकता में व्यक्त होती है। और आखिरकार यह एक भ्रम के रूप में अभिव्यक्त होती है, क्योंकि 'दो' तो हैं ही नहीं, कोई द्वैत नहीं। किसी का भी व्यक्तिगत रूप से स्वतंत्र अस्तित्व नहीं, तो समर्पण करने को कुछ नहीं, और न कोई है जिसे समर्पण करना है। यह जानने के लिए कि समर्पण भ्रम है, समर्पण से गुजरना जरूरी है। चुनाव तुम्हारी नियति है। कृष्ण आरंभ में अर्जुन को नहीं कहते कि उसे समर्पण करना है। पहले वे कहते हैं, 'तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो।' बाद में वे उससे कहते हैं, 'तुम्हारे पास और कोई उपाय नहीं... तुम्हें समर्पण करना ही है। या तो अभी करो, वरना बाद में करोगे ही।' यही प्रेम का पथ है।
आत्मनिर्भरता और समर्पण
आत्मनिर्भरता को अपार साहस की आवश्यकता है, समर्पण के लिए कम साहस चाहिए। जो व्यक्ति समर्पित नहीं हो सकता, वह आत्मनिर्भर भी नहीं बन सकता। जैसे पचास रुपए में दस रुपए निहित हैं, वैसे ही आत्मनिर्भरता में समर्पण निहित है। यदि तुम्हारे पास सौ रुपए नहीं हैं तो तुम्हारे पास एक हजार  रुपए भी नहीं हो सकते हैं। यदि तुममें समर्पण के लिए साहस नहीं, तब तुम्हारे लिए आत्मनिर्भर होना भी संभव नहीं। जो व्यक्ति समर्पण से डरते हैं, वे अपने आप को धोखा दे रहे हैं, क्योंकि लेशमात्र भय भी आत्मनिर्भरता में बाधक है।
प्राय: लोग समर्पण को जिम्मेदारियों से बचने का रास्ता मानते हैं और अन्त में वे अपनी सभी समस्याओं के लिए ईश्वर/गुरु को दोषी ठहराते हैं। वास्तव में, सच्चा समर्पण है सम्पूर्ण जिम्मेदारी लेना। कैसे? जिम्मेदारी लो, और सहायता के लिए प्रार्थना करो।
समर्पण ही अंतत: तुम्हें आत्म-निर्भरता की ओर अग्रसर करता है क्योंकि आत्मा के सिवाय कुछ है ही नहीं।
गुरुपूर्णिमा के दिन शिष्य अपनी पूर्णता में जागृत होता है, और इस जागृत अवस्था में वह आभार प्रकट किये बिना रह ही नहीं सकता। ये आभार द्वैत का न होकर, अद्वैत का है। गुरु कोई देह नहीं है। यह एक नदी नहीं है जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रही है, यह एक सागर है जो अपने भीतर ही रमण करता है। कृतज्ञता, गुरुपूर्णिमा पर पूर्णता की अभिव्यक्ति है। समर्पण पहली शर्त है कि गुरु तत्व को आप अपने भीतर आसन दे सकें, ताकि वह आपको ज्ञान से प्रकाशित कर सके, पूर्ण कर सके।    

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एक शिक्षक की दृष्टि में गुरुपूर्णिमा
डॉ. संतोष कुमार तिवारी
तारीख: 18 Jul 2015

मोटे तौर पर शिक्षक और गुरु दोनों ही 'रोल मॉडल्स' का काम करते हैं। परंतु आम तौर से उनमें एक खास भिन्नता यह है कि शिक्षक होना एक तरह की रोजी रोटी है, जबकि गुरु पूर्णत: नि:स्वार्थ होता है।
लोग अक्सर शिक्षक को गुरु मान लेते हैं जो कि मेरी समझ में पूर्णत: उचित नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि सही गुरु मिलना बडे़ भाग्य की बात होती है। हमलोग किसी व्यक्ति को गुरु मान लेते हैं। फिर बाद में यह पता चलता है कि वह गुरु तो अपने ही किसी स्वार्थ में लगा हुआ था। इस पर मन दु:खी हो जाता है। फिर हम हर गुरु पर शक करने लगते हैं।
व्यक्तिगत तौर से मेरा मानना यह है कि पृथ्वी को गुरु माना जाय। सूर्य को गुरु माना जाय। वायु को गुरु माना जाय। गंगा को गुरु माना जाय। आदि-आदि। पृथ्वी सिखाती है सहनशीलता। चाहे उस पर कितनी भी चोट करो। वह सहन करती है और फिर भी हमको आजीवन सहारा देती है।
सूर्य हमको रोशनी देता है। बदले में हमसे कुछ मांगता नहीं है। अगर सूर्य दो दिन दर्शन न दे तो उसका बेताबी से इंतजार करते हैं।
इसी प्रकार चंद्रमा हमें शीतलता देता है।
वायु तो दिखाई भी नहीं पड़ती है, परंतु उसके बगैर हम जी भी नहीं सकते हैं। वह किसी तरह का कोई दिखावा नहीं करती।
गंगा बहती है तो हम उसकी ओर ध्यान नहीं देते। उसमें सारा कचड़ा फेंकते हैं। पर एक दिन वह बहना बंद कर दे तो त्राहि-त्राहि मच जाए।
ये सब चीजें वे हैं जो कि हमको ईश्वर की कृपा से नि:शुल्क मिली हुई हैं। इसलिए आम तौर से हमलोग इन पर ध्यान नहीं देते हैं। जबकि मुझे लगता है कि वास्तविक गुरु यही हैं। इनको गुरु मानकर हम कभी धोखा नहीं खाएंगे।
भगवान दत्तात्रेय के चौबीस गुरु थे। उनके गुरुओं में कीट, पक्षी, जानवर, पृथ्वी, सूर्य, वायु,आदि थे। दत्तात्रेय भगवान थे, तो भी उन्हें गुरु की जरूरत हुई। वह ब्रह्माजी के मानसपुत्र ऋषि अत्रि के बेटे थे। अनुसूया उनकी मां थीं। दत्तात्रेय को भगवान विष्णु का अवतार भी माना  जाता है।  दत्तात्रेय का एक गुरु समुद्र भी था।
रामचरितमानस के बालकांड में गोस्वामी तुलसीदासजी समुद्र के बारे में कहते हैं-
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़ई जोई।।
गोस्वामीजी कहते हैं कि (आम तौर पर लोग अपनी ही उन्नति से प्रसन्न होते हैं) परंतु समुद्र सा तो कोई बिरला ही सज्जन होता है जो चंद्रमा को पूर्ण देखकर (दूसरों का उत्कर्ष देखकर) प्रसन्नता से उमड़ पड़ता है।
बहुत से प्रण न करो
एक शिक्षक होने के नाते मैं आम तौर से छात्रों को यह राय देता हूं कि जीवन में बहुत से प्रण न करो। सिर्फ एक प्रण करो और अगर वही पूरा हो जाए तो आपको आनंद आ जाएगा। जैसे कि मैंने प्रण किया कि न मैं किसी को घूस दूंगा और न लूंगा। परंतु ऐसी स्थितियां भी आईं जबकि रेलवे में टीसी मुझसे घूस ले गया तो मैंने टीसी को बुलाकर ये कहा कि मेरे जीवन का प्रण है कि न घूस दो और न लो तो आपके इस व्यवहार से मेरा प्रण टूटता है। ऐसा कहने पर टीसी ने मुझसे ली हुई घूस वापस कर दी और कहा कि आप अपना प्रण संभाल कर रखें। ऐसे अन्य कई अनुभव भी मेरे जीवन में हुए हैं।
इसी तरह से एक प्रण यह किया जा सकता है कि हम हर दिन कोई न कोई अच्छा काम जरूर करेंगे। साधु वासवानी जी कहते हैं- 'वन गुड वर्क ए डे।' चाहे हम हर दिन गाय को रोटी खिलाएं, चिडि़यों को दाना डालें या चींटियों को कुछ खाने को दें। इस सबसे कोई फायदा हो या न हो, पर जीवन में यह संतोष हमेशा रहेगा कि आप प्रतिदिन कोई न कोई अच्छा कार्य अवश्य करते हैं। इस फार्मूले को भी मैंने अपने जीवन में आजमाया है।
ऐसे ही एक प्रण यह भी हो सकता है कि हम ऑफिस समय से पहुंचेंगे। इसका कोई प्रचार करने की जरूरत नहीं है। परंतु इससे आपको आत्मसंतोष मिलेगा।
ऐसे ही एक प्रण यह भी हो सकता है कि हम एक हफ्ते या एक महीने किसी  पर हृदय से भी क्रोध नहीं करेंगे, इसके भी आपको सुखद नतीजे  मिलंेगे। ऐेसा प्रयोग करके देख लंे। फिर हो सकता है कि आप इस प्रयोग को आजीवन करें।
इस जीवन में छोटे-छोटे कामों को करने से ही प्रसन्नता मिलती है।
अगर रामायण में गुरु को ढूंढा जाए, तो मैं हनुमानजी को गुरु मानूंगा। वह संजीवनी बूटी लाने के लिए पूरा पर्वत ही उठाकर ले आए। परंतु उन्होंने जरा भी अहंकार न किया। हनुमानजी के कुल बारह नाम हैं। उनमें से एक है पवनपुत्र अर्थात वायुपुत्र। उनमें वायु की तरह बड़े-बड़े पेड़ों और पर्वतों को उखाड़ने की क्षमता रही है और सामान्य परिस्थितियों में वायु की तरह लोगों को ऑक्सीजन प्रदान करने का विनीत भाव भी रहा है।
ा है।
मेरा एक और अनुभव रहा है कि ज्यादातर लोग इसलिए दु:खी रहते हैं कि वे यह समझते हैं कि वे अच्छे हैं और बाकी लोग खराब हैं। जिस दिन ये ख्याल आ जाए कि आप अच्छे हैं और बाकी लोग खराब हैं, बस जानिए कि उसी दिन आप दु:ख के कुएं में गिरने जा रहे हैं।
इन सभी बातों को जीवन में मैंने स्वयं अनुभव किया है। इसलिए मेरा अनुरोध यही रहा है कि ज्यादा प्रण न करें। सिर्फ एक प्रण करें और वही अगर पूरा कर लेंगे तो आत्मसंतुष्टि होगी। और जब तक कि कोई सही गुरु न मिले, तो पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, वायु, आदि को ही गुरु मानें। इससे जीवन सरलता से कट जाएगा।  होता यह है कि लोग उसको गुरु समझ लेते हैं जिससे कोई आर्थिक या व्यक्तिगत लाभ हो। परंतु ऐसे गुरु जीवन में कोई सही राह नहीं दिखा पाते।
देश के कई शहरों में बड़े-बड़े प्रबंधन संस्थान खुल गए हैं। ये गर्व से प्रचार करते हैं कि इनके यहां के छात्रों को लाखों रुपए के पैकेज वाली नौकरी मिली। यह व्यवसायपरक शिक्षा है।
आजकल कई शिक्षक राजनेता भी हो गए हैं। इन सबको हम उस गुरु की श्रेणी में नहीं रख सकते हैं, जिसके बारे में कहा गया है कि-
गुरु: ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुदेवो महेश्वर:।
गुरु: साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:।।
बालकांड में गोस्वामी तुलसीदासजी गुरु के बारे में कहते हैं-
श्री गुर पद नख मनि गन जोती।
सुमरति दिव्य दृष्टि हियं होती।।
दलन मोह तम सो प्रकासू।
बड़े भाग उर आवइ जासू।।
गोस्वामीजी कहते हैं कि श्री गुरु महाराज के चरण नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है, जिसके स्मरण करते ही दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करने वाला है। वह जिसके हृदय में आ जाता है, वह बड़ा भाग्यशाली है।
गुरु वह है जो आपको छल-कपट से दूर रखे। आपके मन, हृदय और व्यवहार को सरल और निर्मल करे।
यहां यह बात भी स्पष्ट कर देनी जरूरी है कि गुरु का महत्व सिर्फ गुरुपूर्णिमा पर ही नहीं होता। उनको तो प्रतिदिन, प्रतिक्षण हमें अंतरात्मा से नमन करना होता है।
ऐसा जरूरी नहीं है कि गुरु हमेशा सशरीर हमारे सामने आए। महाभारत में नीच जाति के एकलव्य ने तो अपनी प्रबल इच्छाशक्ति के जरिए गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति से वर्चुअल वार्तालाप करके धनुर्विद्या सीखी थी।
महाभारत में ही आरुणि अपने गुरु धौम्य ऋषि  के वास्ते जाड़े की सारी रात बाढ़ का पानी रोकने के लिए खेत की मेड़ पर लेटे रहे थे।
अगर सच्चे गुरु मुश्किल से मिलते हंै, तो एकलव्य और आरुणि जैसे सच्चे शिष्य भी मुश्किल से मिलते हैं। इतिहास में ऐसा संयोग बहुत कम होता है जब सच्चे गुरु को सच्चा शिष्य मिल जाए। जैसा कि रामकृष्ण परमहंस को नरेन अर्थात् विवेकानन्द मिल गए। ऐसा संयोग पूरे विश्व को प्रभावित करता है।
महात्मा गांधी हेनरी डेविड थोरो की पुस्तक 'वाल्डेन' से बहुत प्रभावित थे। थोरो ने सादा जीवन जिया। 'वाल्डेन' को सादा जीवन जीने की कला में एक मील का पत्थर यानी 'लैण्डमार्क माना जाता है। थोरो महात्मा गांधी के लिए एक रोल मॉडल' की तरह थे। परन्तु गांधीजी थोरो से भी बहुत आगे निकल गए।
यहां जो मैंने लिखा कि ज्यादा प्रण न करें, एक ही प्रण काफी है- यह मैंने महान रोमन सम्राट मार्क्स आर्लियस (वर्ष 121 से 180 तक) के लेखन 'चिन्तन' में पढ़ा था। फिर इसका प्रयोग मैंने अपने जीवन में किया। मार्क्स आर्लियस ने यह लेखन अपने आत्मसुधार के लिए किया था, दूसरों को सुधारने के लिए नहीं। बाद में उसका अनुवाद प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने तमिल में किया था और तमिल से हिन्दी में अनुवाद उनकी बेटी लक्ष्मी देवदास गांधी ने किया था। लक्ष्मीजी महात्मा गांधी के पुत्र देवदास गांधी कीे  पत्नी थीं। उनका हिन्दी अनुवाद 'आत्म चिन्तन' नामक पतली सी पुस्तक में उपलब्ध है। यह पुस्तक सस्ता साहित्य मंडल के सभी बुक स्टॉल्स पर बहुत कम कीमत में मिलती है। येे बुक स्टॉल्स कई बड़े रेलवे स्टेशनों पर हंै।
इस पुस्तक में मार्क्स आर्लियस ने यह भी लिखा है कि हो सकता है कि मुझे कोई यु़द्ध में हरा दे। हो सकता है कि मुझे कोई धन दौलत में पराजित कर दे। परंतु मुझे एक बात हमेशा ध्यान रखनी है कि कोई मुझे शालीनता और शील व्यवहार में कभी न हरा पाए। इस प्रकार से मैं यह भी कह सकता हूं कि अच्छी पुस्तकें भी हमारे लिए गुरु का काम कर सकती हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि किसे अच्छी पुस्तक कहा जाए।
मैंने विश्व के सारे ग्रंथ नहीं पढ़े हैं, परंतु जो थोड़ा-बहुत पढ़ा है, उनमें से तीन-चार अच्छी पुस्तकों का संदर्भ प्रासंगिक है।
हमारा शरीर रोज गंदा होता है, इसलिए हम रोज नहाते हंै। कभी-कभी तो दो बार नहाते हंै। इसी प्रकार से हमारा मस्तिष्क रोज राग द्वेष जैसी वासनाओं से गंदा होता है। मस्तिष्क  की सफाई के लिए हमें गुरुतुल्य पुस्तकें रोज पढ़नी होंगी।
दो शब्दों में बात की जाए, तो सारे गुरु-ज्ञान का निचोड़ यह है कि बस राग द्वेष छोड़ दें। ऐसा प्रयास नित्य निरंतर करने से काम, क्रोध, मोह, लोभ सब धीरे-धीरे कम होने लगते हंै। ऐसा आप स्वयं भी अनुभव करके देख सकते हंै। ऐसा ही अष्टावक्र गीता और श्रीकृष्ण गीता में भी लिखा है। और ऐसा ही स्वर्गीय स्वामी रामसुखदासजी भी बताते थे। स्वामीजी कहते थे कि भगवान को दीखने में राग द्वेष ही बाधक हंै।
(लेखक जनसंचार केन्द्र, झारखंड केन्द्रीय विश्वविद्यालय, ब्राम्बे, रांची में प्रोफेसर हैं)

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रविवार, 19 जुलाई 2015

सफलता के सूत्र : स्वामी विवेकानंद

सफलता के सूत्र : स्वामी विवेकानंद
14 Jan, 2013


सफलता के सूत्र उत्तिष्ठत ! जाग्रत ! प्राप्य वरान्निबोधत!
हे युवाओं , उठो ! जागो !
लक्ष्य प्राप्ति तक रुको नहीं

पीछे मत देखो, आगे देखो, अनंत ऊर्जा, अनंत उत्‍साह, अनंत साहस और अनंत धैर्य तभी महान कार्य, किये जा सकते हैं ।
आज मैं तुम्हें भी अपने जीवन का मूल मंत्र बताता हूँ ,  वह यह है कि -
प्रयत्न करते रहो, जब तुम्हें अपने चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार दिखता हो, तब भी मैं कहता हूँ कि प्रयत्न करते रहो !  किसी भी परिस्थिति में तुम हारो मत,  बस प्रयत्न करते रहो!   तुम्हें तुम्हारा लक्ष्य जरूर मिलेगा ,  इसमें जरा भी संदेह नहीं ! - विवेकानन्द
सफलता के सूत्र
कभी मत सोचिये कि आत्मा के लिए कुछ असंभव  है ऐसा  सोचना  सबसे  बड़ा  विधर्म है. अगर  कोई   पाप  है,  तो  ये  कहना कि तुम निर्बल  हो या  अन्य  निर्बल हैं…. ब्रह्माण्ड  की   सारी  शक्तियां  पहले से  हमारी हैं. वो हम ही हैं  जो अपनी आँखों  पर हाथ रख लेते  हैं  और  फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है! – विवेकानन्द
यदि जीवन में सफल होना है; जीवन में कुछ पाना है; महान बनना है; तो स्वामी विवेकानन्द के दर्शन और विचारों को जीवन में अपनाना चाहिये।
वर्तमान समय में युवाओं के सम्मुख अनेक चुनौतियाँ हैं। हर व्यक्ति प्रयत्नशील है; बेहतर भविष्य के लिए, सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए एवं अच्छे जीवन के लिए। ऐसे समय में युवाओं के आदर्श स्वामी विवेकानन्द के संदेश व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
लक्ष्य निर्धारण :
सर्वप्रथम हमें अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। स्वामी जी कहा करते थे, ‘जिसके जीवन में ध्येय नहीं है, जिसके जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है, उसका जीवन व्यर्थ है’। लेकिन हमें एक बात का ध्यान रखना चाहिये कि हमारे लक्ष्य एवं कार्यों के पीछे शुभ उद्देश्य होना चाहिए।
जिसने निश्चय कर लिया, उसके लिए केवल करना शेष रह जाता है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था – जीवन में एक ही लक्ष्य साधो और दिन- रात उस लक्ष्य के बारे में सोचो और फिर जुट जाओ उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए। हमें किसी भी परिस्थिति में अपने लक्ष्य से भटकना नहीं चाहिए। स्वामी विवेकानन्द जी कहा करते थे, आदर्श को पकड़ने के लिए सहस्‍त्र बार आगे बढ़ो और यदि फिर भी असफल हो जाओ तो एक बार नया प्रयास अवश्‍य करो। इस आधार पर सफलता सहज ही निश्चित हो जाती है।
आत्मविश्वास :
जीवन में जो तय किया है या जो लक्ष्य निर्धारित किया है, उसे प्राप्त करने के लिये आवश्यक है- अपने आप में विश्वास।  आत्मविश्वास, सफलता का रहस्य है। यदि हमें अपने आप पर ही विश्वास नही है तो हमारा कार्य किस प्रकार सफल होगा? जो भी कार्य करो, आस्था और विश्वास के साथ।
स्वामी विवेकानन्द जी कहा करते थे कि आत्मविश्वास – वीरता का सार है। सफलता के लिए जरूरी है – अपने आप पर मान करना, अभिमान करना, विश्वास और लगन के साथ जुटे रहना। धीरज और स्थिरता से काम करना – यही एक मार्ग है। यदि तुममें विश्वास है, तब प्रत्येक कार्य में तुम्हें सफलता मिलेगी। फिर तुम्हारे सामने कैसी भी बाधाएँ क्यों न हों, कुछ समय बाद संसार तुमको मानेगा ही। जब तक तुम पवित्र होकर अपने उद्देश्य पर डटे रहोगे, तब तक तुम कभी निष्फल नहीं होओगे। तभी महान कार्य किये जा सकते हैं।
समर्पण :
समर्पण का अर्थ है – अपने लक्ष्य के प्रति सदैव जागरूक रहना और जीवन के प्रत्येक क्षण में उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयास करते रहना। किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए समर्पण अनिवार्य है।
दृढ़ निश्चय ही विजय है। युवाओं से उनका सम्बोधन था, ‘ध्येय के प्रति पूर्ण संकल्प व समर्पण रखो’। इस संसार में प्रत्येक वस्तु संकल्प शक्ति पर निर्भर है। शुभ उद्देश्य के लिए  सच्ची लगन से किया हुआ प्रयत्न कभी निष्फल नहीं होता।
समर्पण से कार्य को पूर्ण करने की लगन ही युवाओं को सफलता प्रदान कर सकती है। स्वामी विवेकानन्द जी अक्सर कहते थे, जीवन में नैतिकता, तेजस्विता और कर्मण्यता का अभाव नहीं होना चाहिये। इसमें कोई सन्देह नहीं कि सभी महान कार्य धीरे धीरे होते हैं परन्तु पवित्रता, धैर्य तथा प्रयत्न के द्वारा सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं।
चरित्र र्निर्माण :
संस्कार, सुविचार, संकल्प,  समर्पण व सिद्धता इस पंचामृत के ‍सम्मिलित स्वरूप का नाम है -  सफलता।  स्वामी जी ने युवावर्ग का आह्वान करते हुए कहा था कि वही समाज उन्नति और उपलब्धियों के चरम शिखर पर पहुंच सकता है जहां व्यक्ति में चरित्र होता है।
भारत की सत्य-सनातन संस्कृति, व्यक्ति के चरित्र के निर्माण में सहायक बनती है। आवश्यक है कि आप चरित्र व आचरण की महत्ता को समझें, सभ्यता, शालीनता, विनम्रता को अपनाएँ। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्ति के लिए  आवश्यक है; सद्‍गुण, सद्‍व्यवहार, सदाचार, सद्‍ संकल्प।
स्वामी विवेकानन्द जी ने युवा वर्ग को चरित्र निर्माण के पांच सूत्र दिए। आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, आत्मज्ञान, आत्मसंयम और आत्मत्याग। उपयुक्त पांच तत्वों के अनुशीलन से व्यक्ति स्वयं के व्यक्तित्व तथा देश और समाज का पुनर्निर्माण कर सकता है।
संगठन :
वर्तमान युग संगठन का युग है। व्यक्तिगत स्वार्थों का उत्सर्ग सामाजिक प्रगति के लिए कार्य करने की परम्परा जब तक प्रचलित नहीं होगी, तब तक कोई राष्ट्र सच्चे अर्थों में सार्मथ्यवान् नहीं बन सकता है। वर्तमान समय में सामूहिक आत्मविश्वास के जागरण की अत्यन्त आवश्यकता है। उदात्त ध्येय के लिये संगठित शक्ति का समर्पित होना अनिवार्य है।
स्वामी विवेकानन्द जी अमरिका में संगठित कार्य के चमत्कार से प्रभावित हुए थे। उन्होंने ठान लिया था कि भारत में भी संगठन कौशल को पुनर्जिवित करना चाहिये। उन्होंने स्वयं रामकृष्ण मिशन की स्थापना कर सन्यासियों तक को संगठित कर समूह में काम करने का प्रशिक्षण दिया।
इस बात पर संदेह नहीं करना चाहिये कि विचारवान और उत्साही व्यक्तियों का एक छोटा सा समूह इस संसार को बदल सकता है। वास्तव मे इस संसार को संगठित शक्ति ने ही बदला है।
स्वामी विवेकानन्द हमें यह प्रेरणा प्रदान करते हैं कि जीवन में सतत आगे बढते रहना हमारा कर्त्तव्य है। जीवन पथ में अनेक बाधाएँ आती हैं परन्तु , क्रमशः समस्त प्रकार की बाधाओं को दूर  कर करके, उससे ऊपर उठकर, असम्भव को भी संभव किया जा सकता है। जब-जब मानवता निराश एवं हताश होगी, तब-तब स्वामी विवेकानंद जी के उत्साही, ओजस्वी एवं अनंत ऊर्जा से भरपूर विचार और दर्शन जन-जन को प्रेरणा देते रहेंगे।
आगे बढो और याद रखो….
धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म सफलता के माध्यम हैं।
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युवा प्रेरक के रूप में स्‍वामी विवेकानंद की प्रासंगिकता

Written by  आलोक देशवाल  13 January 2015

भारत विश्व में सबसे ज्यादा युवाओं का देश है जिसकी लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या की आयु 35 वर्ष से कम है। उम्मीद की जाती है कि वर्ष 2020 तक भारत की आबादी की औसत आयु 28 वर्ष होगी जबकि अमेरिका की 35, चीन की 42 और जापान की औसत आयु 48 वर्ष होगी। वास्तव में युवा किसी भी देश की जनसंख्या में सबसे गतिशील और जीवंत हिस्सा होते हैं।
एक बार स्वामी विवेकानंद ने कहा था, "आप जैसा सोचते हैं, आप वैसे ही बनेंगे। अगर आप खुद को कमजोर सोचते हैं तो आप कमजोर बनेंगे; यदि आप खुद को शक्तिशाली सोचते हैं तो आप शक्तिशाली होंगे।" उन्होंने यह भी कहा था, "शिखर पर नजर रखो, शिखर पर लक्ष्य करो और आप शिखर पर पहुंच जाएंगे"। उनका संदेश सामान्य लेकिन कारगर था। विवेकानंद ने अपने विचारों को लोगों खासकर युवाओं तक सीधे पहुंचाया। उन्होंने धर्म और जाति के बंधनों को तोड़ते हुए विश्व बंधुत्व का संदेश दिया। उन्होंने जो कुछ कहा उसमें उनके विचारों की महानता समाहित है और आज भी वह देश के युवाओं के लिए आदर्श हैं। उन्होंने युवाओं की उन्नत ऊर्जा और सत्य की खोज के लिए उनकी बेचैनी को साकार किया।
लेकिन, मौजूदा बदलाव के दौर में युवाओं को स्वामी विवेकानंद की प्रासंगिकता का अहसास कैसे कराया जाए, जबकि एक तरफ लोग और राष्ट्र युवाओं को राष्ट्र निर्माण के कामों में लगाकर युवाओं के व्यक्तित्व और नेतृत्व कौशल को विकसित करने का महान काम कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ भूख, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आतंकवाद जैसी चुनौतियां हैं।
स्वामी विवेकानंद ने भारतीय समाज के पुनर्निमाण के लिए जो सुझाव दिए हैं उनमें शिक्षा लोगों को सश्क्त करने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने एक बार कहा था, "ऐसी शिक्षा जो साधारण लोगों को जीवन के संघर्ष के योग्य नहीं बनाती है, जो चरित्र निर्माण की शक्ति, परोपकार की भावना और शेर की तरह साहस का विकास नहीं करती है वह केवल नाम के लिए है। वास्तव में शिक्षा वह है जो किसी को आत्मनर्भर बनाती है।" उनके लिए शिक्षा का मतलब ऐसे चिरकालिक अध्ययन से था जिससे छात्रों का चरित्र और मानवीय भावनाओं का निर्माण होता है।
भारत सरकार ने स्‍वामी विवेकानंद की 150वीं जयन्‍ती मनाते समय रामकृष्‍ण मिशन की मूल्‍य–आधारित शिक्षा परियोजना को मंजूरी दी, ताकि बच्‍चों में नैतिकता प्रत्‍यारोपित होने के साथ–साथ हमारे समाज में बढ़ते वाणिज्‍यवाद और उपभोक्‍तावाद के विरूद्ध एक मूल्‍य प्रणाली विकसित करने में मदद मिले। रामकृष्‍ण मिशन स्‍वामी विवेकानन्‍द द्वारा स्‍थापित एक संगठन है, जो मूल्‍य-आधारित शिक्षा, संस्‍कृति, स्‍वास्‍थ्‍य, महिला सशक्तिकरण, युवा और जनजातीय कल्‍याण तथा राहत और पुनर्वास के क्षेत्र में सराहनीय कार्य के लिए व्‍यापक रूप से जाना जाता है ।
स्वामी विवेकानंद पीठ स्थापित करने के लिए इसने शिकागो विश्वविद्यालय को 15 लाख अमरीकी डालर की धनराशि भी उपलब्ध कराई, ताकि व्याख्यानों, विचारगोष्ठियों और भारतीय संस्कृति तथा भारतीय अध्ययनों पर आधारित शैक्षिक गतिविधियों के अनुकूल गतिविधियों द्वारा विवेकानंद के विचारों पर जोर दिया जा सके। प्रत्येक विद्वान द्वारा दो वर्षों की अवधि के लिए इस पीठ का आयोजन किया जाएगा। शिकागो विश्वविद्यालय भी शिकागो विश्वविद्यालय और भारत सरकार के बीच अनुसंधान क्षेत्र के विद्वानों के आदान-प्रदान की सुविधा उपलब्ध कराएगा। इस स्थायी धनराशि से राष्ट्रों के बीच धार्मिक सदभाव का संदेश फैलाने और आपसी समझ कायम करने के साथ ही मानवता की आध्यात्मिक एकरूपता कायम करने में मदद मिलेगी, जिसके लिए स्वामी विवेकानंद काम किया था।
स्वामी विवेकानंद के अनुसार, "अपने आप को शिक्षित करो, प्रत्येक व्यक्ति को उसकी वास्तविक प्रकृति के बारे में शिक्षित करो, सुसुप्त आत्मा को पुकारो और देखो कि वह कैसे जागती है। जब यह सोयी हुई आत्मा जागकर आत्मचेतना की ओर प्रवृत्त होगी तब शक्ति मिलेगी, गौरव प्राप्त होगा, अच्छाई आएगी, शुद्धता आएगी और वे सभी चीजें आएंगी जो विशिष्ट हैं।"
सरकार वर्तमान संदर्भ में स्वामी विवेकानंद के उपदेशों को व्यवहार में लाने के लिए भी प्रयास में जुटी है। एक अरब से भी अधिक लोगों की जरूरतों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना कोई आसान कार्य तब तक नहीं है, जब तक कि देश के उन क्षेत्रों में कुछ समन्वित कार्य न किए जाएं जहां क्षमता का केन्द्र है। देश के सभी हिस्से में कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, व्यावहारिक और गुणवत्तापूर्ण बिजली, भूतल परिवहन तथा बुनियादी सुविधाएं, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी तथा सामरिक क्षेत्र आपस में निकटतापूर्वक जुड़े हैं। यदि इन क्षेत्रों में समन्वित कार्य शुरू किया जाए तो इससे भारत की खाद्य और आर्थिक सुरक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा भी मजबूत होगी।
सरकार ने एकजुट, सशक्त और आधुनिक भारत के निर्माण के काम पर जोर दिया है ताकि विवेकानंद जैसे महान चिंतकों के सपने के पूरा किया जा सके। ''एक भारत, श्रेष्ठ भारत'' के बाद "सबका साथ, सबका विकास" के सिद्धांत का स्थान है। ये महज नारे नहीं हैं, बल्कि जनता, विशेषकर युवाओं की प्रति एक संकल्प है, जो राष्ट्र को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए हैं। हाल में कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं। एक वैश्विक निर्माण केन्द्र के रूप में भारत को विकसित करने के उद्देश्य से "मेक इन इंडिया" अभियान शुरू किया गया है। "डिजिटल इंडिया" नामक पहल में भारत को डिजिटल रूप से एक सशक्त समाज और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में परिणत करने पर जोर दिया गया। भारतीय लोगों को भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ-साथ विश्वभर में मिलने वाले अवसरों के लिए तैयार करने के उद्देश्य से आवश्यक कौशल प्रदान करने के लिए "कुशल भारत" की शुरुआत की जा रही है। बुनियादी सुविधाएं विकसित करने के उद्देश्य से स्मार्ट सिटी परियोजना सहित कई प्रयास किए गए हैं। इन सबमें "स्वच्छ भारत अभियान" और "स्वच्छ गंगा" अभियान एक स्वच्छ और हरित भारत के निर्माण के लिए शुरू किए गए हैं।
सरकार की इन सभी पहलों के लिए युवाओं की सक्रिय भागीदारी और उनका समर्थन आवश्यक है, क्योंकि वे इस देश के भविष्य के प्रमुख हितधारक हैं। कौशल विकास और उद्यमिता विकास ऐसे फ्लैगशिप कार्यक्रम हैं जो भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए शुरू किए गए हैं। सरकार देश के युवाओं में सभी शक्तियां सन्निहित करने के लिए हर संभव प्रयास में जुटी है, क्योंकि एक आधुनिक और समृद्ध भारत के निर्माण के महत्वाकांक्षी कार्य के लिए यह आवश्यक है। जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने एक बार आह्वान किया था, "जागो, उठो और मंजिल तक पहुंचने से पहले मत रुको", हम सभी एकजुट हों और शुद्धता, धैर्य और दृढ़ता के साथ देश के लिए काम करें, क्योंकि स्वामी विवेकानंद ने काफी पहले इस महसूस किया था कि ये तीनों सफलता के लिए अनिवार्य हैं।
(लेखक पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्‍ली में उप-निदेशक - मीडिया और संचार हैं)