मंगलवार, 21 जुलाई 2015

एक शिक्षक की दृष्टि में गुरुपूर्णिमा : डॉ. संतोष कुमार तिवारी



बूंद का सागर हो जाना
श्री श्री रविशंकर
तारीख: 18 Jul 2015 11:55:49
 गुरु रु, आत्मा और ईश्वर में कोई अंतर नहीं है। ये तीनों एक ही हैं- आपकी आत्मा, गुरु तत्व और ईश्वर। और ये तीनों ही शरीर नहीं हैं। उनका रूप कैसा है? आकाश जैसा है।
व्योमवाद व्याप्त देहाय (व्योम=आकाश, देह=शरीर, व्याप्त=समाना)
आप शरीर नहीं हैं, आप आत्मा हैं, और आत्मा का स्वरुप आकाश जैसा है। यह गुरु के लिए भी समान है। गुरु को एक सीमित शरीर के रूप में मत देखिए। गुरु एक तरंग है, एक ऊर्जा है, जो सर्वव्यापी है, आत्मा की तरह। और गुरु का सम्मान करना अर्थात अपनी आत्मा का सम्मान करना।
इसलिए हम जब समर्पण करते हैं तो वह गुरु को करें, ईश्वर को करें या अपनी आत्मा को करें, एक ही बात है। समर्पण कुछ खोना नहीं है, रूपान्तरण है। वह वैसा ही है कि एक बूंद का महासागर में मिल जाना। बूंद फिर बूंद नहीं रहती, महासागर हो जाती है। समर्पण के बिना न हम गुरु को महसूस कर पाते हैं, न ईश्वर को और न अपनी आत्मा को। समर्पण से गांठ खुलती है... बाधाएं हटती हैं... रास्ता बनता है... नाता जुड़ता है। और तुम वही हो जाते हो, जो मूल स्वरूप में तुम हो। यदि तुम गुरु के निकट अनुभव नहीं कर पा रहे हो तो यह तुम्हारे ही कारण है, तुम्हारे मन, तुम्हारी धारणा, तुम्हारे अहंकार के कारण।
यदि तुम गुरु के साथ निकटता का अनुभव नहीं कर रहे, तो गुरु की आवश्यकता ही क्या है? वह तुम्हारे लिए एक और बोझ है। तुम्हारे पास पहले ही बहुत बोझ हैं। बस, अलविदा कह दो।
तुम गुरु के साथ हो ताकि तुम गुरु के आनंद में सहभागी हो, उसकी चेतना के सहभागी। इसके लिए, पहले तुम्हें अपने आप को खाली करना है, जो पहले से है, उसे गुरु को दे देना है। जो भी है गुरु को व्यक्त करो और यह मत सोचो कि 'यह तो कूड़ा है'। मन में जितना भी कूड़ा हो, जितने भी प्रकार का, गुरु उसे लेने के लिए तैयार हैं। तुम जैसे भी हो, गुरु तुम्हें स्वीकार कर लेंगे। अपनी ओर से वे बांटने को तैयार हैं- तुम्हें केवल अपनी ओर से बांटने के लिए तैयार होना है।
कृष्ण अर्जुन को कहते हैं, 'तुम मुझे बहुत प्रिय हो।' फिर कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि उसे समर्पण करना होगा। समर्पण की शुरुआत एक धारणा से होती है। पहले तुम्हें यह मानना होगा कि तुम ईश्वर (गुरु) को अत्यंत प्रिय हो। तब समर्पण स्वत: ही होता है।
समर्पण कोई कृत्य नहीं, एक धारणा है। समर्पण न करना अज्ञानता है, एक भ्रम। समर्पण की शुरुआत एक धारणा से होती है, फिर यह वास्तविकता में व्यक्त होती है। और आखिरकार यह एक भ्रम के रूप में अभिव्यक्त होती है, क्योंकि 'दो' तो हैं ही नहीं, कोई द्वैत नहीं। किसी का भी व्यक्तिगत रूप से स्वतंत्र अस्तित्व नहीं, तो समर्पण करने को कुछ नहीं, और न कोई है जिसे समर्पण करना है। यह जानने के लिए कि समर्पण भ्रम है, समर्पण से गुजरना जरूरी है। चुनाव तुम्हारी नियति है। कृष्ण आरंभ में अर्जुन को नहीं कहते कि उसे समर्पण करना है। पहले वे कहते हैं, 'तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो।' बाद में वे उससे कहते हैं, 'तुम्हारे पास और कोई उपाय नहीं... तुम्हें समर्पण करना ही है। या तो अभी करो, वरना बाद में करोगे ही।' यही प्रेम का पथ है।
आत्मनिर्भरता और समर्पण
आत्मनिर्भरता को अपार साहस की आवश्यकता है, समर्पण के लिए कम साहस चाहिए। जो व्यक्ति समर्पित नहीं हो सकता, वह आत्मनिर्भर भी नहीं बन सकता। जैसे पचास रुपए में दस रुपए निहित हैं, वैसे ही आत्मनिर्भरता में समर्पण निहित है। यदि तुम्हारे पास सौ रुपए नहीं हैं तो तुम्हारे पास एक हजार  रुपए भी नहीं हो सकते हैं। यदि तुममें समर्पण के लिए साहस नहीं, तब तुम्हारे लिए आत्मनिर्भर होना भी संभव नहीं। जो व्यक्ति समर्पण से डरते हैं, वे अपने आप को धोखा दे रहे हैं, क्योंकि लेशमात्र भय भी आत्मनिर्भरता में बाधक है।
प्राय: लोग समर्पण को जिम्मेदारियों से बचने का रास्ता मानते हैं और अन्त में वे अपनी सभी समस्याओं के लिए ईश्वर/गुरु को दोषी ठहराते हैं। वास्तव में, सच्चा समर्पण है सम्पूर्ण जिम्मेदारी लेना। कैसे? जिम्मेदारी लो, और सहायता के लिए प्रार्थना करो।
समर्पण ही अंतत: तुम्हें आत्म-निर्भरता की ओर अग्रसर करता है क्योंकि आत्मा के सिवाय कुछ है ही नहीं।
गुरुपूर्णिमा के दिन शिष्य अपनी पूर्णता में जागृत होता है, और इस जागृत अवस्था में वह आभार प्रकट किये बिना रह ही नहीं सकता। ये आभार द्वैत का न होकर, अद्वैत का है। गुरु कोई देह नहीं है। यह एक नदी नहीं है जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रही है, यह एक सागर है जो अपने भीतर ही रमण करता है। कृतज्ञता, गुरुपूर्णिमा पर पूर्णता की अभिव्यक्ति है। समर्पण पहली शर्त है कि गुरु तत्व को आप अपने भीतर आसन दे सकें, ताकि वह आपको ज्ञान से प्रकाशित कर सके, पूर्ण कर सके।    

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एक शिक्षक की दृष्टि में गुरुपूर्णिमा
डॉ. संतोष कुमार तिवारी
तारीख: 18 Jul 2015

मोटे तौर पर शिक्षक और गुरु दोनों ही 'रोल मॉडल्स' का काम करते हैं। परंतु आम तौर से उनमें एक खास भिन्नता यह है कि शिक्षक होना एक तरह की रोजी रोटी है, जबकि गुरु पूर्णत: नि:स्वार्थ होता है।
लोग अक्सर शिक्षक को गुरु मान लेते हैं जो कि मेरी समझ में पूर्णत: उचित नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि सही गुरु मिलना बडे़ भाग्य की बात होती है। हमलोग किसी व्यक्ति को गुरु मान लेते हैं। फिर बाद में यह पता चलता है कि वह गुरु तो अपने ही किसी स्वार्थ में लगा हुआ था। इस पर मन दु:खी हो जाता है। फिर हम हर गुरु पर शक करने लगते हैं।
व्यक्तिगत तौर से मेरा मानना यह है कि पृथ्वी को गुरु माना जाय। सूर्य को गुरु माना जाय। वायु को गुरु माना जाय। गंगा को गुरु माना जाय। आदि-आदि। पृथ्वी सिखाती है सहनशीलता। चाहे उस पर कितनी भी चोट करो। वह सहन करती है और फिर भी हमको आजीवन सहारा देती है।
सूर्य हमको रोशनी देता है। बदले में हमसे कुछ मांगता नहीं है। अगर सूर्य दो दिन दर्शन न दे तो उसका बेताबी से इंतजार करते हैं।
इसी प्रकार चंद्रमा हमें शीतलता देता है।
वायु तो दिखाई भी नहीं पड़ती है, परंतु उसके बगैर हम जी भी नहीं सकते हैं। वह किसी तरह का कोई दिखावा नहीं करती।
गंगा बहती है तो हम उसकी ओर ध्यान नहीं देते। उसमें सारा कचड़ा फेंकते हैं। पर एक दिन वह बहना बंद कर दे तो त्राहि-त्राहि मच जाए।
ये सब चीजें वे हैं जो कि हमको ईश्वर की कृपा से नि:शुल्क मिली हुई हैं। इसलिए आम तौर से हमलोग इन पर ध्यान नहीं देते हैं। जबकि मुझे लगता है कि वास्तविक गुरु यही हैं। इनको गुरु मानकर हम कभी धोखा नहीं खाएंगे।
भगवान दत्तात्रेय के चौबीस गुरु थे। उनके गुरुओं में कीट, पक्षी, जानवर, पृथ्वी, सूर्य, वायु,आदि थे। दत्तात्रेय भगवान थे, तो भी उन्हें गुरु की जरूरत हुई। वह ब्रह्माजी के मानसपुत्र ऋषि अत्रि के बेटे थे। अनुसूया उनकी मां थीं। दत्तात्रेय को भगवान विष्णु का अवतार भी माना  जाता है।  दत्तात्रेय का एक गुरु समुद्र भी था।
रामचरितमानस के बालकांड में गोस्वामी तुलसीदासजी समुद्र के बारे में कहते हैं-
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़ई जोई।।
गोस्वामीजी कहते हैं कि (आम तौर पर लोग अपनी ही उन्नति से प्रसन्न होते हैं) परंतु समुद्र सा तो कोई बिरला ही सज्जन होता है जो चंद्रमा को पूर्ण देखकर (दूसरों का उत्कर्ष देखकर) प्रसन्नता से उमड़ पड़ता है।
बहुत से प्रण न करो
एक शिक्षक होने के नाते मैं आम तौर से छात्रों को यह राय देता हूं कि जीवन में बहुत से प्रण न करो। सिर्फ एक प्रण करो और अगर वही पूरा हो जाए तो आपको आनंद आ जाएगा। जैसे कि मैंने प्रण किया कि न मैं किसी को घूस दूंगा और न लूंगा। परंतु ऐसी स्थितियां भी आईं जबकि रेलवे में टीसी मुझसे घूस ले गया तो मैंने टीसी को बुलाकर ये कहा कि मेरे जीवन का प्रण है कि न घूस दो और न लो तो आपके इस व्यवहार से मेरा प्रण टूटता है। ऐसा कहने पर टीसी ने मुझसे ली हुई घूस वापस कर दी और कहा कि आप अपना प्रण संभाल कर रखें। ऐसे अन्य कई अनुभव भी मेरे जीवन में हुए हैं।
इसी तरह से एक प्रण यह किया जा सकता है कि हम हर दिन कोई न कोई अच्छा काम जरूर करेंगे। साधु वासवानी जी कहते हैं- 'वन गुड वर्क ए डे।' चाहे हम हर दिन गाय को रोटी खिलाएं, चिडि़यों को दाना डालें या चींटियों को कुछ खाने को दें। इस सबसे कोई फायदा हो या न हो, पर जीवन में यह संतोष हमेशा रहेगा कि आप प्रतिदिन कोई न कोई अच्छा कार्य अवश्य करते हैं। इस फार्मूले को भी मैंने अपने जीवन में आजमाया है।
ऐसे ही एक प्रण यह भी हो सकता है कि हम ऑफिस समय से पहुंचेंगे। इसका कोई प्रचार करने की जरूरत नहीं है। परंतु इससे आपको आत्मसंतोष मिलेगा।
ऐसे ही एक प्रण यह भी हो सकता है कि हम एक हफ्ते या एक महीने किसी  पर हृदय से भी क्रोध नहीं करेंगे, इसके भी आपको सुखद नतीजे  मिलंेगे। ऐेसा प्रयोग करके देख लंे। फिर हो सकता है कि आप इस प्रयोग को आजीवन करें।
इस जीवन में छोटे-छोटे कामों को करने से ही प्रसन्नता मिलती है।
अगर रामायण में गुरु को ढूंढा जाए, तो मैं हनुमानजी को गुरु मानूंगा। वह संजीवनी बूटी लाने के लिए पूरा पर्वत ही उठाकर ले आए। परंतु उन्होंने जरा भी अहंकार न किया। हनुमानजी के कुल बारह नाम हैं। उनमें से एक है पवनपुत्र अर्थात वायुपुत्र। उनमें वायु की तरह बड़े-बड़े पेड़ों और पर्वतों को उखाड़ने की क्षमता रही है और सामान्य परिस्थितियों में वायु की तरह लोगों को ऑक्सीजन प्रदान करने का विनीत भाव भी रहा है।
ा है।
मेरा एक और अनुभव रहा है कि ज्यादातर लोग इसलिए दु:खी रहते हैं कि वे यह समझते हैं कि वे अच्छे हैं और बाकी लोग खराब हैं। जिस दिन ये ख्याल आ जाए कि आप अच्छे हैं और बाकी लोग खराब हैं, बस जानिए कि उसी दिन आप दु:ख के कुएं में गिरने जा रहे हैं।
इन सभी बातों को जीवन में मैंने स्वयं अनुभव किया है। इसलिए मेरा अनुरोध यही रहा है कि ज्यादा प्रण न करें। सिर्फ एक प्रण करें और वही अगर पूरा कर लेंगे तो आत्मसंतुष्टि होगी। और जब तक कि कोई सही गुरु न मिले, तो पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, वायु, आदि को ही गुरु मानें। इससे जीवन सरलता से कट जाएगा।  होता यह है कि लोग उसको गुरु समझ लेते हैं जिससे कोई आर्थिक या व्यक्तिगत लाभ हो। परंतु ऐसे गुरु जीवन में कोई सही राह नहीं दिखा पाते।
देश के कई शहरों में बड़े-बड़े प्रबंधन संस्थान खुल गए हैं। ये गर्व से प्रचार करते हैं कि इनके यहां के छात्रों को लाखों रुपए के पैकेज वाली नौकरी मिली। यह व्यवसायपरक शिक्षा है।
आजकल कई शिक्षक राजनेता भी हो गए हैं। इन सबको हम उस गुरु की श्रेणी में नहीं रख सकते हैं, जिसके बारे में कहा गया है कि-
गुरु: ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुदेवो महेश्वर:।
गुरु: साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:।।
बालकांड में गोस्वामी तुलसीदासजी गुरु के बारे में कहते हैं-
श्री गुर पद नख मनि गन जोती।
सुमरति दिव्य दृष्टि हियं होती।।
दलन मोह तम सो प्रकासू।
बड़े भाग उर आवइ जासू।।
गोस्वामीजी कहते हैं कि श्री गुरु महाराज के चरण नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है, जिसके स्मरण करते ही दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करने वाला है। वह जिसके हृदय में आ जाता है, वह बड़ा भाग्यशाली है।
गुरु वह है जो आपको छल-कपट से दूर रखे। आपके मन, हृदय और व्यवहार को सरल और निर्मल करे।
यहां यह बात भी स्पष्ट कर देनी जरूरी है कि गुरु का महत्व सिर्फ गुरुपूर्णिमा पर ही नहीं होता। उनको तो प्रतिदिन, प्रतिक्षण हमें अंतरात्मा से नमन करना होता है।
ऐसा जरूरी नहीं है कि गुरु हमेशा सशरीर हमारे सामने आए। महाभारत में नीच जाति के एकलव्य ने तो अपनी प्रबल इच्छाशक्ति के जरिए गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति से वर्चुअल वार्तालाप करके धनुर्विद्या सीखी थी।
महाभारत में ही आरुणि अपने गुरु धौम्य ऋषि  के वास्ते जाड़े की सारी रात बाढ़ का पानी रोकने के लिए खेत की मेड़ पर लेटे रहे थे।
अगर सच्चे गुरु मुश्किल से मिलते हंै, तो एकलव्य और आरुणि जैसे सच्चे शिष्य भी मुश्किल से मिलते हैं। इतिहास में ऐसा संयोग बहुत कम होता है जब सच्चे गुरु को सच्चा शिष्य मिल जाए। जैसा कि रामकृष्ण परमहंस को नरेन अर्थात् विवेकानन्द मिल गए। ऐसा संयोग पूरे विश्व को प्रभावित करता है।
महात्मा गांधी हेनरी डेविड थोरो की पुस्तक 'वाल्डेन' से बहुत प्रभावित थे। थोरो ने सादा जीवन जिया। 'वाल्डेन' को सादा जीवन जीने की कला में एक मील का पत्थर यानी 'लैण्डमार्क माना जाता है। थोरो महात्मा गांधी के लिए एक रोल मॉडल' की तरह थे। परन्तु गांधीजी थोरो से भी बहुत आगे निकल गए।
यहां जो मैंने लिखा कि ज्यादा प्रण न करें, एक ही प्रण काफी है- यह मैंने महान रोमन सम्राट मार्क्स आर्लियस (वर्ष 121 से 180 तक) के लेखन 'चिन्तन' में पढ़ा था। फिर इसका प्रयोग मैंने अपने जीवन में किया। मार्क्स आर्लियस ने यह लेखन अपने आत्मसुधार के लिए किया था, दूसरों को सुधारने के लिए नहीं। बाद में उसका अनुवाद प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने तमिल में किया था और तमिल से हिन्दी में अनुवाद उनकी बेटी लक्ष्मी देवदास गांधी ने किया था। लक्ष्मीजी महात्मा गांधी के पुत्र देवदास गांधी कीे  पत्नी थीं। उनका हिन्दी अनुवाद 'आत्म चिन्तन' नामक पतली सी पुस्तक में उपलब्ध है। यह पुस्तक सस्ता साहित्य मंडल के सभी बुक स्टॉल्स पर बहुत कम कीमत में मिलती है। येे बुक स्टॉल्स कई बड़े रेलवे स्टेशनों पर हंै।
इस पुस्तक में मार्क्स आर्लियस ने यह भी लिखा है कि हो सकता है कि मुझे कोई यु़द्ध में हरा दे। हो सकता है कि मुझे कोई धन दौलत में पराजित कर दे। परंतु मुझे एक बात हमेशा ध्यान रखनी है कि कोई मुझे शालीनता और शील व्यवहार में कभी न हरा पाए। इस प्रकार से मैं यह भी कह सकता हूं कि अच्छी पुस्तकें भी हमारे लिए गुरु का काम कर सकती हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि किसे अच्छी पुस्तक कहा जाए।
मैंने विश्व के सारे ग्रंथ नहीं पढ़े हैं, परंतु जो थोड़ा-बहुत पढ़ा है, उनमें से तीन-चार अच्छी पुस्तकों का संदर्भ प्रासंगिक है।
हमारा शरीर रोज गंदा होता है, इसलिए हम रोज नहाते हंै। कभी-कभी तो दो बार नहाते हंै। इसी प्रकार से हमारा मस्तिष्क रोज राग द्वेष जैसी वासनाओं से गंदा होता है। मस्तिष्क  की सफाई के लिए हमें गुरुतुल्य पुस्तकें रोज पढ़नी होंगी।
दो शब्दों में बात की जाए, तो सारे गुरु-ज्ञान का निचोड़ यह है कि बस राग द्वेष छोड़ दें। ऐसा प्रयास नित्य निरंतर करने से काम, क्रोध, मोह, लोभ सब धीरे-धीरे कम होने लगते हंै। ऐसा आप स्वयं भी अनुभव करके देख सकते हंै। ऐसा ही अष्टावक्र गीता और श्रीकृष्ण गीता में भी लिखा है। और ऐसा ही स्वर्गीय स्वामी रामसुखदासजी भी बताते थे। स्वामीजी कहते थे कि भगवान को दीखने में राग द्वेष ही बाधक हंै।
(लेखक जनसंचार केन्द्र, झारखंड केन्द्रीय विश्वविद्यालय, ब्राम्बे, रांची में प्रोफेसर हैं)

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