बुधवार, 30 सितंबर 2015

चीन : 6 लोगों की मौत, पार्सल बमों से किए गए ब्लास्ट




15 सीरियल धमाकों से दहला चीन, 6 लोगों की मौत, पार्सल बमों से किए गए ब्लास्ट
aajtak.in [Edited By: स्वपनल सोनल] | नई दिल्ली, 30 सितम्बर 2015


चीन के गुआंग्शी इलाके में बुधवार को हुए 15 सीरियल धमाकों में कम से कम छह लोगों की मौत हो गई है, जबकि 15 से अधि‍क घायल हो गए हैं. हमलावरों ने अलग-अलग ठिकानों पर पार्सल बम रखे थे. इस हमले की अभी तक किसी ने जिम्मेदारी नहीं ली है.
चीन की मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक, पहला धमाका स्थानीय समयानुसार करीब 3 बजकर 50 मिनट पर हुआ. इसके बाद शाम के 5 बजते-बजते 15 धमाकों की आवाज से पूरा गुआंग्शी इलाका थर्रा गया. धमाके में एक इमारत के ढहने की भी खबर है. चीन में बुधवार को शहीदी दिवस भी मनाया जा रहा है.

शिन्हुआ न्यूज एजेंसी के मुताबिक, ज्यादातर धमाके लियुझोउ शहर के पास के इलाकों में हुए हैं. इसमें बसअड्डा, अस्पताल, जेल, सुपर मार्केट, सब्जी बाजार और हॉस्टल को निशाना बनाया गया. धमाकों के लिए पार्सल बम का इस्तेमाल किया गया, जिसके बाद स्थानीय प्रशासन ने आम लोगों से लावारिस पार्सल से दूर रहने को कहा है.

शिन्हुआ के अनुसार, हमलावरों ने धमाके के लिए एक एक्सप्रेस डिलिवरी कंपनी का इस्तेमाल किया. पार्सल बमों को पहले से तय पतों पर पहुंचाया गया, जिसके बाद इनमें धमाका किया गया.

मजहब परस्ती से ऊपर हो वतनपरस्ती - साकेन्द्र प्रताप वर्मा


सेकुलरवाद बनाम राष्ट्रवाद -
मजहब परस्ती से ऊपर हो वतनपरस्ती
-साकेन्द्र प्रताप वर्मा
तारीख: 28 Sep 2015
देश की छद्म सेकुलर राजनीति ने भारतीय मुस्लिम मानस को देश के लिए उपयोगी न बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। सन् 1905 में अंग्रेजी हुकूमत ने हिन्दू और मुसलमान के नाम पर बंगाल का विभाजन किया था, किंतु अंग्रेजों का षड्यंत्र सफल नहीं हुआ और हिन्दू-मुस्लिम एकता नहीं टूटी। दोनों ने डटकर मुकाबला किया। विभाजन समाप्त हुआ। उसके बाद अंग्रेजों के प्रयास, लोकमान्य तिलक के बजाय गांधी के हाथों में कांग्रेस का नेतृत्व तथा इकबाल द्वारा जिन्ना को उकसाने के षड्यंत्रों ने भारत को विभाजन तक लाकर खड़ा कर दिया। आज भी मुसलमानों को सच समझाने के बजाय वोट बैंक के रूप में एकत्र करने के ही प्रयास अधिकांश राजनेताओं द्वारा किये जा रहे हैं। 
इस देश में रहीम, रसखान, मलिक मोहम्मद जायसी, अश्फाक उल्ला खान, बहादुरशाह जफर ने अपने-अपने तरीके से राष्ट्रवाद से मुस्लिम समुदाय को जुड़ने की प्रेरणा दी है। बहादुरशाह जफर के दो बेटों का सिर कलम करके उनके सामने पेश किया गया और अंग्रेजी हुक्मरानों ने कहा कि आत्मसमर्पण करो तथा समझ लो-
दमदमे में दम नहीं है, खैर मांगो जान की!
ए जफर अब सो चुकी शमशीर हिंदुस्थान की!!
तब बहादुरशाह ने दृढ़तापूर्वक अपनी देशभक्ति से भरा उत्तर दिया था-
गाजियों में बू रहेगी, जब तलक ईमान की।
तख्ते लंदन तक चलेगी, तेग हिंदुस्थान की।।
परंतु आज की राजनीति ने इस तेग को लंदन तक चलने के बजाय अपने देश में अपने ही भाइयों के खिलाफ चलने की राह तक क्यों पहुंचा दिया? मजहब बदलने मात्र से पुरखे, बाप-दादे नहीं बदलते फिर सामाजिक परिवेश में अंतर क्यों? इसके लिये केवल कुछ राजनीतिक नेताओं का व्यवहार ही दोषी है, जिसके कारण अलगाववाद पनप रहा है। न जाने समझने में कहां से गलती हो रही है अथवा तो भारत के बहुसंख्यक मुसलमानों का इस देश की माटी के साथ वैसा ही रिश्ता है जैसा हिन्दुओं का। परिस्थितिवश उन्होंने अपनी पूजा पद्धति बदल दी परंतु पूर्वज तो सांझे ही हैं, सांस्कृतिक विरासत भी सांझी ही है इसलिए परंपराएं भी सांझी ही होनी चाहिए थीं। किंतु आजाद भारत में वोट बैंक के नाते समय-समय पर मुस्लिम समाज को बरगलाने की कोशिश की गयी। सत्य तो यह है कि हिन्दू समाज में भी तमाम ऐसे लोग हैं जो देवी-देवताओं को अवतार नहीं मानते। कुछ ऐसे भी हैं जो किसी एक देवता को मानते हैं, शेष को नहीं मानते। परंतु पूर्वज तो सभी के एक ही हैं। यही स्थिति ईसाई या मुस्लिम समाज को माननी चाहिए। पाकिस्तान ने प्रसिद्ध संस्कृत व्याकरणाचार्य पाणिनि की पांच हजारवीं जयंती मनायी। यदि पाणिनि उनके पूर्वज हो सकते हैं तो भारत के मुसलमानों के पूर्वज राम, कृष्ण, व्यास, वाल्मीकि क्यों नहीं? बाबर, औरंगजब, अकबर, गजनी, गोरी, शाहजहां आदि विदेशी आक्रांता भारत के मुसलमानों के पूर्वज नहीं हो सकते। ये तो वे आक्रमणकारी हैं जिन्होंने भय, दबाव या लालच देकर आज के मुसलमानों (जो पहले हिन्दू ही थे) का कन्वर्जन किया। इनकी पूजा पद्धति बदली, इनकी परंपराओं को नष्ट किया। इसलिए जरूरत तो यह थी कि यह सत्य आम मुसलमान को बताया जाय। लेकिन इसमें भी बाधक है अशिक्षा। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलाधिपति ए. एम. खुसरो ने कहा था कि मुस्लिम समाज की अनेक समस्याओं का कारण उनकी अशिक्षा है। भारत में नालंदा और तक्षशिला तो पहले से ही ज्ञान का भण्डार थे, किंतु मजहब बदलने के बाद उनके प्रति नफरत के बीज बोये गये।
आधुनिककाल में कोई भी राष्ट्र तभी उन्नति कर सकता है जब उसके सभी नागरिक अपना योगदान दें। दुर्भाग्य से आज समान नागरिक बनने के बजाय विशेष वर्ग बनने की होड़ लगी है। आज मुस्लिम समाज तीन वर्गों में बंटा है। पहला मुल्ला, मौलवी और उलेमा, दूसरा कट्टरपंथी, तीसरा अमन पसंद आम आदमी। तीसरे वर्ग पर पहले का प्रभाव है तथा दूसरे का दबाव है। डॉ. राम मनोहर लोहिया कहते थे कि हिन्दू इस देश में शक्तिशाली हो, यही मुस्लिमों के हित में है, क्योंकि हिन्दू धर्म सब मत-पंथों का आदर करने का आदेश देता है। मुसलमानों की मजहबी पहचान तो अलग है किन्तु उनकी राष्ट्रीय पहचान और हिन्दुओं की राष्ट्रीय पहचान एक होनी चाहिए, इसी में दोनों का लाभ है।
इंडोनेशिया मुस्लिम बहुसंख्या वाला देश है। आकाश में उड़ने वाली उनकी हवाई सेवा का नाम है 'गरुड़ एयरवेज'। उनके यहां रामलीला और महाभारत का मंचन होता है, पात्र सभी मुसलमान रहते हैं। उनके चौराहों पर राम, कृष्ण, हनुमान की प्रतिमाएं हैं। उनकी मुद्रा पर गणेशजी का चित्र छपा है। उनके राष्ट्रपति रह चुके हैं सुकर्ण, जिनकी पत्नी थीं रत्ना देवी। दोनों ही मुसलमान थे। बाद में उनकी पुत्री मेघवती सुकर्णपुत्री राष्ट्रपति बनीं। जब इंडोनेशिया के मुसलमान से यह प्रश्न होता है कि आप के रीति-रिवाज, पूर्वज तो हिन्दुओं जैसे हैं। तो उनका उत्तर होता है कि हमने उपासना पद्धति बदली है पूर्वज नहीं। कुछ दिन पहले चित्रकूट में इंडोनेशिया के रामलीला खेलने वालों का 269 सदस्यीय एक दल आया। सभी मुसलमान थे, किन्तु रामलीला में अभिनय देखने लायक था।
भारतवर्ष एक विशाल देश है जिसमें विविध भाषा, जाति और मजहब या पंथ के लोग रहते हैं। यह ऋषि, मुनियों और फकीरों का देश है। यहां देवताओं का वास है। यहां की माटी ने उन सभी मजहबों को आदर दिया है जो विश्व में कहीं भी उपजे हैं। भारत ने हमेशा 'धर्म की जय हो-अधर्म का नाश हो- प्राणियों में सद्भावना हो-विश्व का कल्याण हो- सर्वेभवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया- सर्व पंथ समभाव- एकं सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति' आदि का संदेश दिया है। इस भूमि ने पूरे विश्व में शांति, प्यार, अहिंसा व भाईचारे का संदेश भी दिया है। आज वही भूमि भयानक आतंकवाद, घुसपैठ, अलगाववाद, जनसंख्या की बाढ़, भ्रष्टाचार, आंतरिक कलह आदि की चपेट में है। दुनिया के देशों में हमारी पहचान जाति या मजहब से नहीं होती बल्कि वतन से होती है, इसीलिए राष्ट्रीयता का आधार मजहब के बजाय वतन होता है। जब-जब- हमारी आंखों के सामने वतन से ऊपर मजहब हो जाता है, तब-तब हिंसा और टकराव जन्म लेता है। जैसे-जैसे हमारी वतन परस्ती मजहब से ऊपर बढ़ती जाती है वैसे-वैसे प्यार, मोहब्बत और अमन का पैगाम समूचे मुल्क में जाता है। जरूरत इस बात की है कि तथाकथित सेकुलर राजनेता भारत के मुसलमानों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने के लिए उनको गुमराह करने के स्थान पर वतनपरस्ती का संदेश दें। इसमें ही पूरे देश का भला होगा।  

राष्ट्रवाद के सारथी : संघ के विचार

शनिवार, 26 सितंबर 2015


व्यक्ति विशेष: मोहन भागवत कैसे बनें मोदी के 'कृष्ण'

 सबसे तकतवर हस्ती हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. लोकसभा चुनाव में जीत के बाद से ही राजनीतिक के आसमान पर सबसे चमकदार चेहरा बन कर चमक रहे हैं नरेंद्र मोदी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि राजनीति की दुनिया से अलग देश में दूसरा सबसे ताकतवर शख्स कौन हैं? दरअसल मोहन भागवत वो शख्स भी है जिन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में सबसे अहम रोल निभाया है.

देश के सबसे बड़े संगठन, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ को चलाते हैं. उनका संगठन, आरएसएस यूं तो जाहिरी तौर पर राजनीतिक गतिविधियों से परहेज करता है लेकिन बीजेपी को चुनावी जंग जिताने में पर्दे के पीछे आऱएसएस औऱ उसके प्रमुख मोहन भागवत का सबसे अहम योगदान माना जाता है. मोहन भागवत का नाम यूं तो मीडिया में कभी-कभार ही चमकता है लेकिन केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से वो अक्सर अपने बयानों को लेकर विवादों में घिरते रहे हैं. पिछले दिनों आरक्षण के मुद्दे पर उनके ताजा बयान ने एक बार फिर देश में राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया है.

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ यानी आरएसएस को देश के सबसे बड़े संगठनों में से एक माना जाता है. आरएसएस की कमान संघ प्रमुख मोहन भागवत के हाथों में हैं. भागवत साल 2009 में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रमुख बने थे लेकिन संघ प्रमुख बनने के बाद से ही वो अपने बयानों को लेकर ही ज्यादा चर्चा में रहे हैं. केंद्र में बीजेपी सरकार बनने के बाद हिंदुत्व पर दिए उनके बयान को लेकर भी हंगामा खड़ा हो गया था और अब आरक्षण के मुद्दे पर उनके बयान ने देश की राजनीति को गर्मा दिया है.

गुजरात में पटेल समुदाय को आरक्षण देने के लिए शुरु हुए आंदोलन का नाम लिए बगैर भागवत ने आरक्षण नीति की समीक्षा की मांग उठाई है. आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर को इंटरव्यू देते हुए मोहन भागवत ने कहा है कि आरक्षण को हमेशा राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया गया है. लोग अपनी सुविधा के मुताबिक अपने समुदाय या वर्ग का ग्रुप बनाते हैं और आरक्षण की मांग करने लगते हैं. लोकतंत्र में कई नेता उनका समर्थन भी करते हैं. एक गैर राजनीतिक समिति का गठन होना चाहिए जो समीक्षा करे कि किसे आरक्षण की ज़रूरत है और कब तक?

बिहार चुनाव से पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत के इस बयान को लेकर आरोप प्रत्यारोप का एक नया दौर शुरु हो गया है. आरक्षण के मुद्दे पर राजनीतिक दलों में तलवारें खिंचती रही हैं और आरक्षण की ये बहस आजादी के वक्त से ही चलती रही है. दरअसल आजादी के बाद जब भारत का संविधान बना तो दलितों और आदिवासियों को मुख्य धारा में लाने के लिए संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गई थी.

आजाद भारत का संविधान लागू होते ही एससी यानि अनुसूचित जाति के लिए 15 फीसदी और एसटी यानि अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई थी. 1990 में मंडल कमीशन की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग यानि ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई. इस हिसाब से देश में आरक्षण 49.5 फीसदी हो गया और सामान्य वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में 50.5 का हिस्सा रह गया.

लेकिन आजादी के 60 साल बाद आज भी देश में अलग-अलग समुदाय के लोग आरक्षण की मांग का झंडा बुलंद किए हुए हैं. इन दिनों आरक्षण की ताजा आग गुजरात में लगी है जहां हार्दिक पटेल की अगुवाई में पाटीदार समाज खुद को ओबीसी वर्ग में शामिल कराना चाहता है ताकि कॉलेज और सरकारी नौकरियों में उन्हें कोटा मिल सके.


गुजरात में पटेल तो राजस्थान में गुर्जर भी लंबे वक्त से आरक्षण की मांग करते रहे हैं. राजस्थान में बीजेपी की सरकार ने पिछले दिनों गुर्जरों को 5 फीसदी और अगड़ों में आर्थिक रूप से पिछड़ों को 14 फीसदी का आरक्षण देने के लिए दो बिल भी पास कर दिए हैं. खास बात ये है कि इन बिलों के पास होने के बाद अब राजस्थान में 68 फीसदी आऱक्षण हो गया है. जो सुप्रीम कोर्ट की 50 फीसदी आरक्षण देने की सीमा को पार कर गया है और यही वजह है कि देश में आरक्षण के मुद्दे पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है.


गुजरात में पटेल समाज से पहले भी आरक्षण की मांग पर आंदोलन होते रहे हैं और सरकारें इन मांगों के सामने झुकती भी रही हैं. महाराष्ट्र में शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मराठा समुदाय को 16 फीसदी आरक्षण देने का फैसला हुआ था लेकिन हाईकोर्ट ने मराठों को आरक्षण के फैसले पर रोक लगा रखी है. सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार के उस फैसले को निरस्त कर दिया था जिसमें जाट समुदाय को ओबीसी में शामिल किया जाना था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “जाति एक महत्वपूर्ण वजह है लेकिन सिर्फ जाति पिछड़ापन तय करने का मानक नहीं हो सकती. पिछड़ापन सामाजिक होना चाहिए, सिर्फ शैक्षिक और आर्थिक नहीं.“लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दखल और फैसले के बाद भी आरक्षण का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ चुका है और आरक्षण नीति की समीक्षा की बात कह कर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इस मुद्दे को एक बार फिर हवा दे दी है.

कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला नरेंद्र मोद जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे. उस समय गुजरता के अंदर एक नई आरक्षण की नीति लाए जहां आरक्षण को जिला स्तर तक उन्होंने सीमित कर दिया. और उन पदों को इंटरचेंजजेबल बनाने से इंकार कर दिया. और यहां तक कि गुजरात में ग्राम पंचायतों में भी अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्गों के लोगों को उन्होने आरक्षण से महरुम कर दिया. तो जो देश के भाजपा के सबसे अग्रिम नेता हैं अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गो को जिस पक्ष का वो होने का दम भरते हैं. ये उनका रवैया था. और शायद आज भी है. और यही रवैया उनके मार्गदर्शक आरएसएस के सरसंघचालक का भी है.

आरक्षण के मुद्दे पर संघ प्रमुख मोहन भागवत विवादों में है लेकिन उनको लेकर विवाद पहली बार नहीं छिड़ा है उनके विवादों की ये कहानी भी हम आपको सुनाएंगे आपको आगे लेकिन उससे पहले देखिए देश की मौजूदा राजनीति में मोहन भागवत होने का क्या है मतलब.

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है. जिससे करीब तीन दर्जन छोटे बडे संगठन जुड़े हुए हैं इन संगठनों का दायरा पूरे देश में फैला हुआ है. देश के सबसे बड़े ट्रेड यूनियन में से एक भारतीय मजदूर संघ, जिसके करीब दस लाख सदस्य हैं. देश का सबसे बडा विद्यार्थी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और देश की रूलिंग पार्टी भारतीय जनता पार्टी जैसे संघ के कई और संगठन है. जिन्हें संघ परिवार कहा जाता है. संघ परिवार देश भर में शिक्षा, जनकल्याण और हिंदू धर्म से जुड़े कार्यक्रमों समेत कई क्षेत्रों में हजारों प्रोजेक्ट चला रहा है. और संघ परिवार के इन सारे कार्यक्रमों औऱ उद्देश्यों के लिए दिशा निर्देश देना और उनका वैचारिक मार्गदर्शन करने का काम राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के सरसंघचालक का होता है.


मोहन भागवत साल 2009 में जब सरसंघचालक बने थे उस वक्त बीजेपी लोकसभा चुनाव हार चुकी थी. लेकिन भागवत ने हार नहीं मानी वो ना सिर्फ बीजेपी में जबरदस्त बदलाए लाए बल्कि उन्होंने संघ परिवार को चुनावी जंग में बीजेपी की मदद के लिए तैयार भी किया गया. मोहन भागवत कैसे बने संघ के सरताज और कैसे उन्होंने हारी और थकी हुई बीजेपी में फूंक दी एक नई जान?

दरअसल मोहन भागवत ने भारत को हिंदू राष्ट्र बोल कर नए विवाद को जन्म दे दिया था. उन्होंने कहा कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और हिंदुत्व उसकी पहचान है और यह अन्य (धर्मों) को स्वंय में समाहित कर सकता है. पिछले साल अगस्त 2014 में मोहन भागवत ने कटक में कथित तौर पर कहा था कि सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व है और देश के वर्तमान निवासी इसी महान संस्कृति की संतान हैं. उन्होंने सवाल किया था कि यदि इंगलैंड के लोग इंग्लिश हैं, जर्मनी के लोग जर्मन हैं, अमेरिका के लोग अमेरिकी हैं तो हिंदुस्तान के सभी लोग हिंदू के रुप में क्यों नहीं जाने जाते? हिंदू राष्ट्र, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का सबसे बडा एजेंडा रहा है. ऐसे में हिंदुत्व पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के इस बयान पर भी घमासान मच गया था.

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का प्रमुख बनने के बाद से ही भागवत अपने बयानों को लेकर विवादों में घिरते रहे हैं लेकिन 2014 के चुनाव से पहले जब उन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए खुद मोर्चा संभाला तो वो और ज्यादा लाइमलाइट में आ गए थे.

ये धुआं उगलती चिमनियों का शहर है जो महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा बिजली पैदा करने के लिए भी पहचाना जाता है और ये शहर चंद्रपुर, संघ प्रमुख मोहन भागवत का भी शहर है. मोहन भागवत का जन्म तो 11 सितंबर 1950 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ था लेकिन चंद्रपुर की गलियों में ही खेलते- कूदते हुए उनका बचपन गुजरा है. क्योंकि मोहन भागवत के दादा नारायण भागवत महाराष्ट्र के सतारा से चंद्रपुर में आकर बस गए थे. मोहन भागवत के दादा नारायण भागवत राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार के स्कूल के दिनों के दोस्त भी थे यही वजह है कि मोहन भागवत का संघ से पुराना नाता रहा है. उनका संघ से ये तीन पीढ़ियों पुराना कनेक्शन है.

चंद्रपुर के लोकमान्य तिलक विद्यालय से मोहन भागवत ने स्कूल की पढाई पूरी की थी. स्कूल के उनके टीचर आज भी उन्हें एक ऐसे विद्यार्थी के तौर पर याद करते हैं जिससे इतनी कामयाबी की उम्मीद उन्हें भी नहीं थी.

चंद्रपुर से स्कूल की पढाई पास करने के बाद उन्हें शहर के ही जनता कॉलेज में बीएससी में एडमीशन ले लिया था लेकिन उन्होंने ग्रेजुएशन की ये पढाई बीच में ही छोड दी और एक साल बाद ही मोहन भागवत ने चंद्रपुर शहर को भी छोड़ दिया. उनकी जिंदगी का पहला अहम पड़ाव बना महाराष्ट्र का शहर आकोला.

मोहन भागवत ने बीएससी की पढाई छोड़कर अकोला के इसी पंजाबराव कृषि विद्यापीठ में वेटनिरी साइंसेज एंड एनीमल हस्जबेंडरी के कोर्स में दाखिला ले लिया था. स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने आगे पोस्ट ग्रेजुएशन की पढाई के लिए इसी कॉलेज में एडमीशन ले लिया था लेकिन 1975 में उन्होंने ये पढाई बीच में ही अधूरी छोड़ दी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दामन थाम लिया.


मोहन भागवत की तीन पीढ़ियां संघ से जुडी रही है. मोहन भागवत के दादा नारायण भागवत संघ के स्वयं सेवक थे और उनके पिता मधुकर राव भागवत भी राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रचारक रहें है उन्होंने गुजरात में प्रांत प्रचारक के तौर पर भी काम किया है. आम तौर पर संघ के प्रचारक शादी नहीं करते हैं लेकिन जब मधुकर राव भागवत ने शादी करने का फैसला किया तो वह वापस चंद्रपुर आ गए और चंद्रुपर क्षेत्र के कार्यवाह सचिव पद पर रहे. मोहन भागवत की मां मलातीबाई भी संघ की महिला शाखा सेविका समिति की सदस्य थी. खास बात ये भी है कि मुधकर राव भागवत ने ही बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी को संघ में दीक्षित किया था. ये है मोहन भागवत की तीन पीढियों की राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से कनेक्शन की कहानी लेकिन अब सुनिए मोहन भागवत के नरेंद्र मोदी से कनेक्शन की ये कहानी. दरअसल जिन दिनों मोहन भागवत के पिता मुधकर राव भागवत गुजरात में संघ के प्रांत प्रचारक हुआ करते थे तब उनके संपर्क में पहली बार आए थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

आकोला कें पंजाबराव कृषि विद्यापीठ से एनीमल हसबेंड्री में ग्रेजुएशन करने के बाद मोहन भागवत ने कुछ महीनों के लिए चंद्रपुर में ही एनीमल हसबेंड्री डिपार्टमेंट में नौकरी कर ली थी. क्योंकि ग्रेजुएशन के बाद ये दो साल की इंटर्नशिप जरुरी होती थी. लेकिन जब मोहन भागवत एमएससी की पढ़ाई कर रहे थे तब 1975 में उन्होंने अचानक बीच में ही पढाई अधूरी छोड़ी दी. ये वो दौर था जब देश में आपातकाल लगाया गया. ऐसे हालात के बीच मोहन भागवत पढ़ाई छोड़ने के बाद फुल टाइम संघ के प्रचारक बन गए.

आपात काल के दौरान मोहन भागवत ने संघ के लिए भूमिग होकर काम किया. 1977 में उन्हें अकोला में ही संघ का प्रचारक बना दिया गया और बाद में उन्हें नागपुर और विदर्भ क्षेत्रों का प्रचारक भी बनाया गया.

1991 में मोहन भागवत संघ कार्यकर्ताओं के शारीरिक प्रशिक्षण के लिए अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख भी बनाए गए और वे इस पद पर 1999 तक रहे. इसी साल उन्हें सारे देश में पूर्णकालिक काम करने वाले संघ कार्यकर्ताओं का प्रभारी, अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख, बना दिया गया इस तरह मोहन भागवत संघ में तेजी से तरक्की की सीढ़ियां चढते गए.

मोहन भागवत संघ के प्रचारक है और संघ की परंपरा के मुताबिक उन्होनें शादी भी नहीं की है. साल 2000 में जब राजेंद्र सिंह ऊर्फ रज्जू भय्या और एच पी शेषाद्रि ने सरसंघचालक और संघ सरकार्यवाहक के पद से इस्तीफा दिया तो के एस सुदर्शन संघ के नए सरसंघचालक बने और मोहन भागवत सरकार्यवाहक. और आखिरकार साल 21 मार्च 2009 को भागवत संघ के सरसंघचालक बना दिए गए.

मोहन भागवत को करीब से जानने वाले उन्हें एक विनम्र औऱ व्यावहारिक शख्स के तौर पर पहचानते हैं जो संघ को राजनीति से दूर रखने का नजरिया रखता हैं लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में जिस तरह उन्होंने बीजेपी को जिताने और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए खुल कर बैटिंग की उसने संघ के राजनीति से दूर रहने के दावे को चर्चा में ला दिया है. भागवत ने कैसे दूर की मोदी के प्रधानमंत्री बनने की राह में आने वाली रुकावटें?

2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बुरी हार हुई थी. हार से बीजेपी और संघ में निराशा का माहौल था तो वही गुजरात में लगातार दो चुनावों में जीत के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली की दावेदारी के लिए अपनी तैयारी भी तेज कर दी थी. इसीलिए उस वक्त चुनाव नतीजों के बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी प्रेस कांफ्रेस करके अपने इरादे जता दिए थे कि वो बीजेपी में बड़े परिवर्तन चाहते हैं दरअसल हार के बाद संघ के निशाने पर खास तौर पर लाल कृष्ण आडवाणी और उनकी टीम के वो केंद्रीय नेता थे जिन्होंने इन चुनावों की रणनीति बनाई थी.

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि भाजपा के काम आज के नहीं है, लाखों कार्यकर्ता उनके देश भर में हैं और उन्होंने तपस्या की है इसके चलते उनके पुण्य काम आएंगे ऐसे होता नहीं है. इतने नीचे तक गहराई तक वो काम किया गया है, गांव गांव में लोग मिलते हैं अब अगर गांव में कोई व्यक्ति भाजपा के लिए आखों में आंसू लेकर खड़ा है तो उस पार्टी का पतन नहीं हो सकता जितना होना है.

बीजेपी की हार के बाद ये भी तय किया गया था कि अब पार्टी की कमान लालकृष्ण आडवाणी नहीं बल्कि कोई और संभालेगा लेकिन तब संघ के आगे भी ये सवाल खड़ा था की आडवाणी के बाद आखिर किसे बीजेपी की कमान सौंपी जाए.

वरिष्ठ पत्रकार जयंतो घोषाल बताते हैं कि नरेंद्र मोदी का ब्रांड इक्युटी जो है वो ब्रैड इक्युटी के सामने ना राजनाथ है ना नितिन गडकरी है. बीजेपी का जो अपना संविधान है उसमें तो नरेंद्र मोदी नंबर 1 ब्रैंड है. तो इसलिए आरएसएस ने भी काम्प्रोमाइज किया. उनके जो इएस मैन रोयलिस्ट को छोड़ के एसे एक बन्दे का जिसका एक ब्रैंड है जिसके साथ वर्किग रिलेशनशिप को सुधारा और आगे बढ़ाया तो इसमें मुझे लगता है कि आरएसएस ने सोचा कि नरेंद्र मोदी एक सर्वश्रेष्ठ बेट हैं.

गुजरात में जीत की हैट्रिक लगाने के बाद नरेंद्र मोदी ने 6 फरवरी 2013 को पहली बार दिल्ली के दरवाजे पर दस्तक दी थी. दिल्ली के श्री राम कॉलेज में जब मोदी बोले तो साफ हो गया की अब उनकी अगली मंजिल दिल्ली ही है. लेकिन नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की राह में अभी कई रोड़े बाकी थे और सबसे बडी दीवार बन कर खड़े थे खुद बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी. लेकिन मोदी को लेकर संघ में फैसला हो चुका था. इसीलिए बीजेपी ने भी जून 2013 में उन्हें केंद्रीय चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना कर अपना संदेश साफ कर दिया था.

गुजरात से निकलकर नरेंद्र मोदी चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनने में तो कामयाब रहे थे लेकिन मोदी के विरोध में आडवाणी रुके नहीं बल्कि 10 जून को उन्होंने पार्टी के सभी अहम पदों से इस्तीफा भी दे दिया था. औऱ ये पहला मौका था जब संघ ने सीधे तौर पर खुल कर बीजेपी के मामले में दखल दिया. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आडवाणी को समझाने औऱ मनाने के लिए खुद मोर्चा संभाला.

संघ प्रमुख मोहन भागवत का पहला बडा एक्शन तब हुआ था जब नितिन गड़करी को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था और उनका दूसरा बड़ा एक्शन था नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना. यहीं नहीं उन्होंने बीजेपी और संघ के अंदर नरेंद्र मोदी की राह की हर रुकावट को साफ करने में अहम भूमिका निभाई. ये मोहन भागवत की ही रणनीति थी कि संघ कार्यकर्ताओं ने चुनाव में सौ फीसदी वोटिंग का लक्ष्य बनाया औऱ उसे काफी हद तक हासिल भी किया. जिसका नतीजा चुनाव में  बीजेपी की बडी जीत के तौर पर सामने आया है औऱ बीजेपी की इस जीत का सबसे चमकदार चेहरा  बनकर उभरे हैं नरेंद्र मोदी लेकिन पर्दे के पीछे इस जीत का हकदार एक चेहरा और भी है.

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

'जिएंगे तो देश के लिए, मरेंगे तो देश के लिए।'- मोदी


सैन होज़े: अमेरिका के सैन होज़े शहर में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस को निशाना बनाने से नहीं चुके, यहां तक की उन्होंने 'दामाद' एंगल को भी छू ही दिया है।

सैन होज़े, कैलिफोर्निया के ठसाठस भरे सैप सेंटर में पीएम मोदी ने कहा 'हमारे देश में राजनेताओं के खिलाफ आरोप लगने में वक्त नहीं लगता। उसने 50 करोड़ कमा लिए, उसके बेटे ने 250 करोड़, उसकी बेटी ने 500 करोड़, किसी के दामाद ने 1000 करोड़।' दामाद वाली टिप्पणी को सुनकर दर्शक भी अपनी हंसी नहीं रोक पाए।

'जीना सिर्फ देश के लिए'

हालांकि प्रधानमंत्री इससे पहले भी इस शब्द का इस्तेमाल कर चुके हैं जिसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रोबर्ट वाड्रा और उनके विवादित भूमि सौदे के संदर्भ में लिया जाता है।

इसके बाद पीएम मोदी ने सभागार में बैठे 18 हज़ार दर्शकों से पूछा क्या आप इन सबसे थक नहीं गए हैं? क्या आपको गुस्सा नहीं आता? मेरे देशवासियों मैं आप सबके बीच में खड़ा हूं। क्या ऐसा कोई इलज़ाम मुझ पर लगा है?

इस सवाल पर दर्शकों की तरफ से 'नहीं' का जवाब सुनाई दिया। इसके साथ ही 65 साल के प्रधानमंत्री ने कहा 'जिएंगे तो देश के लिए, मरेंगे तो देश के लिए।'

सोमवार, 28 सितंबर 2015

किसानों की दुर्दशा और कांग्रेस


किसान भी जानता है कि कांग्रेस नौटंकी कर रही है - सिसोदिया
मोदी सरकार की नई फसल बीमा योजना से कांग्रेस में घबराहट - भाजपा

कोटा, 28 सितम्बर। भाजपा जिला महामंत्री अरविन्द सिसोदिया ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुये कहा “किसान भी जानते हैं कि जनाधार खो चुकी कांग्रेस नौटंकी कर रही है।” उन्होने दावा किया कि “ किसानों की असली चिंता ही भाजपा ने की है, किसान क्रेडिट कार्ड योजना, फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, सहायता नियमों का सरलीकरण भाजपा की ही देन है।” सीसोदिया ने दावा किया “नरेन्द्र मोदी सरकार किसानों के हित के लिये नई फसल बीमा योजना तैयार कर रही है, जिसमें किसानों को न्यूनतम आमदनी की गारंटी देने पर भी विचार हो रहा है। इससे कांग्रेस में घबराहट है और वह छदम किसान हित चिन्तक की नौटंकी कर रही है।”
सिसोदिया ने कहा “केन्द्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने हाल ही में जून में भोपाल में, घोषणा की है कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार को देश के गांव, गरीब और किसानों की चिंता है तथा वह किसानों के लिये नई फसल बीमा योजना लाने वाली है। इस योजना में किसानों को न्यूनतम आमदनी की गारंटी भी दी जायेगी।“
भाजपा नेता अरविन्द सिसोदिया ने बताया कि “केन्द्र में कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार लगातार 10 साल फसल बीमा योजना पर मूक दर्शक बनीं रही और नरेन्द्र मोदी सरकार ने आते ही फसल बीमा में किसानों को 50 फीसदी फसल की बर्बादी पर ही मुआवजा सीमा को घटाकर 33 फीसदी किया और मुआबजा राशि भी डेढ गुणा कर दी। यह है भाजपा का किसान हित चिन्तक चेहरा।“

अरविन्द सिसोदिया ,
जिला महामंत्री भाजपा कोटा,
9414180151


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भारत में किसान आत्महत्या
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भारत में किसान आत्महत्या १९९० के बाद पैदा हुई स्थिति है जिसमें प्रतिवर्ष दस हज़ार से अधिक किसानों के द्वारा आत्महत्या की रपटें दर्ज की गई है। १९९७ से २००६ के बीच १,६६,३०४ किसानों ने आत्महत्या की। भारतीय कृषि बहुत हद तक मानसून पर निर्भर है तथा मानसून की असफलता के कारण नकदी फसलें नष्ट होना किसानों द्वारा की गई आत्महत्याअों का मुख्य कारण माना जाता रहा है। मानसून की विफलता, सूखा, कीमतों में वृद्धि, ऋण का अत्यधिक बोझ आदि परिस्तिथियाँ, समस्याओं के एक चक्र की शुरुआत करती हैं। बैंकों, महाजनों, बिचौलियों आदि के चक्र में फँसकर भारत के विभिन्न हिस्सों के किसानों ने आत्महत्याएं की है।
अनुक्रम : -
1 इतिहास
2 आंकड़े
3 कारण
4 संदर्भ
5 बाहरी कड़ियाँ
इतिहास
१९९० ई. में प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार द हिंदू के ग्रामीण मामलों के संवाददाता पी. साईंनाथ ने किसानों द्वारा नियमित आत्महत्याअों की सूचना दी। आरंभ में ये रपटें महाराष्ट्र से आईं। जल्दी ही आंध्रप्रदेश से भी आत्महत्याअों की खबरें आने लगी। शुरुआत में लगा की अधिकांश आत्महत्याएं महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के कपास उत्पादक किसानों ने की है। लेकिन महाराष्ट्र के राज्य अपराध लेखा कार्ययालय से प्राप्त आंकड़ों को देखने से स्पष्ट हो गया कि पूरे महाराष्ट्र में कपास सहित अन्य नकदी फसलों के किसानों की आत्महत्याअों की दर बहुत अधिक रही है। आत्महत्या करने वाले केवल छोटी जोत वाले किसान नहीं थे बल्कि मध्यम और बड़े जोतों वाले किसानों भी थे। राज्य सरकार ने इस समस्या पर विचार करने के लिए कई जाँच समितियाँ बनाईं। भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्य सरकार द्वारा विदर्भ के किसानों पर व्यय करने के लिए ११० अरब रूपए के अनुदान की घोषणा की। बाद के वर्षों में कृषि संकट के कारण महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, आंध्रप्रदेश, पंजाब, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी किसानों ने आत्महत्याएं की। इस दृष्टि से २००९ अब तक का सबसे खराब वर्ष था जब भारत के राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय ने सर्वाधिक १७,३६८ किसानों के आत्महत्या की रपटें दर्ज की। सबसे ज़्यादा आत्महत्याएं महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुई थी। इन ५ राज्यों में १०७६५ यानी ६२% आत्महत्याएं दर्ज हुई।

आंकड़े
राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार भारत भर में २००८ ई. में १६,१९६ किसानों ने आत्महत्याएं की थी। २००९ ई. में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या में १,१७२ की वृद्धि हुई। 2009 के दौरान 17368 किसानों द्वारा आत्महत्या की आधिकारिक रपट दर्ज हुई।[4]"राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय" द्वारा प्रस्तुत किये गए आंकड़ों के अनुसार १९९५ से २०११ के बीच १७ वर्ष में ७ लाख, ५० हजार, ८६० किसानों ने आत्महत्या की है। भारत में धनी और विकसित कहे जाने वाले महाराष्ट्र में अब तक आत्महत्याअों का आंकड़ा ५० हजार ८६० तक पहुँच चुका है। २०११ में मराठवाड़ा में ४३५, विदर्भ में २२६ और खानदेश (जलगांव क्षेत्र) में १३३ किसानों ने आत्महत्याएं की है। आंकड़े बताते हैं कि २००४ के पश्चात् स्थिति बद से बदतर होती चली गई। १९९१ और २००१ की जनगणना के आंकड़ों को तुलनात्मक देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि किसानों की संख्या कम होती चली जा रही है। २००१ की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस वर्षों में ७० लाख किसानों ने खेती करना बंद कर दिया। २०११ के आंकड़े बताते हैं कि पांच राज्यों क्रमश: महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कुल १५३४ किसान अपने प्राणों का अंत कर चुके हैं।

सरकार की तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की आत्महत्या का सिलसिला नहीं रूक रहा। देश में हर महीने ७० से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं।

कारण
किसानों को आत्महत्या की दशा तक पहुँचा देने के मुख्य कारणों में खेती का हानिप्रद होना या किसानों के भरण-पोषण में असमर्थ होना है। कृषि की अनुपयोगिता के मुख्य कारण हैं-

कृषि जोतों का लघुतर होते जाना - १९६०-६१ ई. में भूस्वामित्व की इकाई का औसत आकार २.३ हेक्टेयर था जो २००२-०३ ई. में घटकर १. ०६ हेक्टेयर रह गया।
भारत में उदारीकरण की नीतियों के बाद खेती (खासकर नकदी खेती) का पैटर्न बदल चुका है। सामाजिक-आर्थिक बाधाओं के कारण “नीची जाति” के किसानों के पास नकदी फसल उगाने लायक तकनीकी जानकारी का अक्सर अभाव होता है और बहुत संभव है कि ऐसे किसानों पर बीटी-कॉटन आधारित कपास या फिर अन्य पूंजी-प्रधान नकदी फसलों की खेती से जुड़ी कर्जदारी का असर बाकियों की तुलना में कहीं ज्यादा होता हो।
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किसानों की आत्महत्या के कारण विदर्भ में दिनों दिन विधवाओं की संख्या में होती जा रही है बढ़ोतरी।

इन दिनों देश में किसानों की आत्महत्या का विषय पुन : चर्चा में है। वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने कपास के निर्यात पर प्रतिबंध के मात्र 120 घंटों के बाद ही रोक हटाकर पुन: निर्यात करने की घोषणा क्यों कर दी, इस पर शंका की सुई उनकी तरफ उठना स्वाभाविक था। लोकसभा में महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाले शिवसेना के सदस्यों ने इस पर भारी क्षोभ व्यक्त किया। महाराष्ट्र देश का एक बड़ा कपास उत्पादक प्रदेश है। कपास उत्पादक किसान आत्महत्या के लिए क्यों मजबूर होते हैं? इसकी जांच-पड़ताल की बातें तो होती हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय देश के सामने नहीं आया है। शिवसेना के प्रयासों से इस बार इस ज्वलंत प्रश्न पर डेढ़ घंटे की चर्चा का समय लोकसभा में निश्चित किया गया है। जब इस पर चर्चा होगी तो महाराष्ट्र की तरह देश में अन्य प्रदेशों के किसानों की आत्महत्या का मामला भी अवश्य उठेगा। कृषि राज्य क्षेत्र के अन्तर्गत आती है, लेकिन इसके आयात-निर्यात और ऋण संबंधी मामलों में केन्द्र सरकार का दखल निश्चित रूप से होता है। जब आत्महत्या का मामला सामने आता है तो यह कानून और व्यवस्था का भी एक अंग है। इसलिए केन्द्र सरकार अपनी इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती है।

सिर्फ चिंता : "नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो" द्वारा प्रस्तुत किये गए आंकड़ों के अनुसार 1995 से 2011 के बीच 17 वर्ष में 7 लाख, 50 हजार, 860 किसानों ने आत्महत्या की है। महाराष्ट्र के किसानों ने सबसे अधिक आत्महत्या की। भारत में धनी और विकसित कहे जाने वाले महाराष्ट्र में अब तक आत्महत्या का आंकड़ा 50 हजार 860 तक पहुंच चुका है। 2011 में मराठवाड़ा में 435, विदर्भ में 226 और खानदेश (जलगांव क्षेत्र) में 133 किसानों ने आत्महत्याएं की है। महाराष्ट्र के पश्चात् कर्नाटक, आंध्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का नम्बर आता है। आंकड़े बताते हैं कि 2004 के पश्चात् स्थिति बद से बदतर होती चली गई। 1991 और 2001 की जनगणना के आंकड़ों को तुलनात्मक देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि किसानों की संख्या कम होती चली जा रही है। 2001 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस वर्षों में 70 लाख किसानों ने खेती करना बंद कर दिया। 2011 के आंकड़े बताते हैं कि उपरोक्त पांच राज्यों में कुल 1534 किसान अपने प्राणों का अंत कर चुके हैं। प्रत्येक किसान समय पर अपना कर्ज खत्म करने का प्रयास करता है, किंतु फसलों की बर्बादी से वह ऐसा नहीं कर पाता है। इस चिंता में वह भीतर से टूट जाता है और अंतत: आत्महत्या का मार्ग चुन लेता है। कृषक बंधु अब खेती को घाटे का धंधा मानते हैं। इसलिए उनकी आने वाली पीढ़ी अपने मां-बाप की तरह कर्ज में न तो मरना चाहती है और न ही आत्महत्या करना चाहती है।

सूखे और बाढ़ का प्रकोप : किसान के सिर पर सूखे और बाढ़ का प्रकोप तो तलवार बन कर लटकता ही रहता है, लेकिन इसके साथ-साथ कभी फसल अच्छी हो गई तो पैदावार का सही मूल्य दिलाने में सरकार उत्साहित नहीं होती। खराब और घटिया प्रकार का बीज उसका दुर्भाग्य बन जाता है। लागत की तुलना में जब आय ठीक नहीं होती है तो वह सरकारी कर्ज चुकाने में असफल रहता है। किसानों की आत्महत्या के कारण विदर्भ में दिनों दिन विधवाओं की संख्या में बढ़ोतरी होती जा रही है। केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने इस बात का दावा किया था कि वर्ष 2010 में 365 किसानों ने आत्महत्या की थी। यानी एक दिन में एक, इनमें से मात्र 65 ने कर्ज के कारण आत्महत्या की थी। लेकिन राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो इस दावे की पूरी तरह से पोल खोल देता है। अब सवाल यह है कि जब सरकार लागत के अनुसार कपास की कीमत नहीं देती है तो फिर उसके निर्यात पर प्रतिबंध क्यों लगाती है? इस बात को समझने के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। पिछले दिनों यह घटना घटी। 120 घंटे तक सरकार ने कपास के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए रखा। लेकिन न जाने क्या बात है कि हड़बड़ी में लगाए गए इस प्रतिबंध को सरकार ने कुछ शर्तों के साथ रद्द कर दिया। केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार का तो कहना है कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है। लेकिन आनंद शर्मा ने इसका लूला-लंगड़ा बचाव किया। किन मिल मालिकों एवं धन्ना सेठों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से उन्होंने यह निर्णय लिया ये तो वे ही जानें। लेकिन जो समाचार मिल रहे हैं उनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार ने कुछ शक्तिशाली लोगों के लिए यह निर्णय लिया। उसके समाचार सारे देश में पहुंचे और सरकार आलोचना का शिकार बने इससे पहले ही अपने पाप को छिपाने का भरपूर प्रयास किया। निर्यात पर प्रतिबंध लगते ही भाव घटे जिसमें दलालों और पूंजीपतियों की चांदी हो गई। पिछले वर्ष भी ऐसा ही नाटक खेला गया था, जिसमें गुजरात के ही किसानों को 14 हजार करोड़ का नुकसान हुआ था। इस बार कितना हुआ इसके आंकड़े अब तक उपलब्ध नहीं हुए हैं।

दूरदर्शिता की कमी : पिछली बार जब यह घटना घटी थी उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा था कि जब हमने प्रतिबंध लगाया उस समय चीन ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने कपास का भारी जत्था बेचने के लिए निकाला उससे चीन को भारी आय हुई। भारत सरकार में तनिक भी दूरदर्शिता होती तो इसका लाभ भारतीय किसान को मिलता। इस प्रकार का लाभ पहुंचाकर क्या भारत सरकार ने चीन के हौसले बुलंद नहीं किये? सरकार की इस अपरिपक्वता के रहते कोई किस प्रकार विश्वास कर सकता है कि हम चीन से आगे निकलेंगे और एक दिन महाशक्ति के पद पर प्रतिष्ठित हो जाएंगे। भारत में हर समय चीन की बात होती है। दुनिया में महाशक्ति बनने के लिए सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा चीन से है। चीन दुनिया में सबसे अधिक कपास पैदा करता है। विश्व में जितने हेक्टेयर पर कपास पैदा की जाती है उनमें हर चार में एक हेक्टेयर भारत के हिस्से में आता है। भारत में कुल 90 लाख हेक्टेयर जमीन पर कपास की खेती होती है। चीनी किसान का कपास पैदा कर के वारा-न्यारा हो जाता है, लेकिन भारतीय किसान के भाग्य में तो कपास के नाम पर आत्महत्या ही लिखी हुई है। 13 राज्यों के 40 लाख से अधिक किसान कपास की खेती करते हैं। 2009 में भारत के कुल निर्यात में 38 प्रतिशत कपास था, जिससे देश को 80 करोड़ रु. की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई थी। इसकी खेती के लिए मात्र कृषि मंत्रालय ही उत्तरदायी नहीं है, बल्कि वस्त्र और वाणिज्य मंत्रालया भी उत्तरदायी हैं। कॉटन कारपोरेशन आफ इंडिया की स्थापना 1970 में की गई, जो किसानों से कपास की खरीदी करती है। बेचारा किसान खुले बाजार में इसे नहीं बेच सकता है। इसलिए सरकार ही उसकी भाग्य विधाता बनकर उसका मूल्य तय करती है।

पशुपालन का सत्यानाश : भारत सरकार को क्या यह पता नहीं है कि सदियों से कृषि के साथ-साथ किसान कोई न कोई अन्य सहायक व्यवसाय भी करता रहा है। इसमें पशुपालन और मुर्गीपालन प्रमुख रूप से रहे हैं। भारत के असंख्य कुटीर उद्योग खेती पर ही निर्भर रहे हैं। लेकिन बड़े उद्योग लगाकर सरकार ने उन सबको किसान से छीन लिया है। दूध की डेरियां स्थापित करके पशुपालन का सत्यानाश कर दिया है। इसमें जो गाय और बैल का महत्व था उसे भुला दिया गया। महाराष्ट्र में पुणे के निकट तलेगांव के चंद्रकांत पाटिल का कहना है कि भारत में लगभग आठ करोड़ बैल हैं। एक बैल आधा हॉर्स पावर बिजली का काम कर सकता है। पाटिल ने खेती और रोजमर्रा के काम आने वाली वस्तुओं के उत्पादन में बैल का उपयोग करके एक क्रांति पैदा की है। भारत सरकार बिजली तो दे नहीं सकती लेकिन इन बैलों से चार करोड़ होर्स पावर बिजली बचाने पर भी विचार नहीं कर सकती।

महाराष्ट्र में जब शिवसेना-भाजपा की सरकार थी, उस समय राज्य योजना आयोग में नियुक्त वरिष्ठ प्राध्यापक सरोजराव ठुमरे ने एक रपट पेश की थी जिसमें महाराष्ट्र के 20 जिलों का अध्ययन कर उन्होंने यह सुझाव दिया था कि जिस जिले में जिस चीज का उत्पादन होता है उसके आधार पर वहां लघु एवं कुटीर उद्योग की स्थापना की जा सकती है। सूरत के नौसारी कृषि विश्वविद्यालय में एक प्राध्यापक ने केले के तने और पत्ते के रेशों से उच्चकोटि का कागज बनाने की खोज की है। केले की खेती करने वाले कुछ देशों में इस कागज के नोट छापे जाते हैं। इससे दोहरा लाभ है। एक तो यह अपने देश की उपज से बनने के कारण सस्ता होता है और दूसरा उसकी नकल नहीं की जा सकती है। भारत सरकार किसानों को "आर्थिक पैकेज" का नाटक बंद करके वहां की स्थानीय खेती पर आधारित वस्तुओं का उत्पादन करने का मन बना ले तो किसानों की मौत का यह तांडव बंद हो सकता है।

मुजफ्फर हुसैन
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Monday, October 29, 2012
भारत में कृषि की दुर्दशा के कारण
विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बनने के बाद भारत के किसानों की दशा और अधिक दयनीय हुई है। मुट्ठी भर किसानों एवं व्यापारियों के हितों के आगे बहुसंख्यक गरीब और छोटे किसानों के हितों की बलि दे दी गई। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि देश भर में हजारों किसान आत्महत्या कर चुके हैं और यदि सरकार ने रास्ते नहीं तलाशे तो आने वाले दिनों में इनकी संख्या लाखों में पहुंच सकती है।
इससे पहले कभी भी भारत के किसानों की इतनी दुर्दशा नहीं हुई थी। भारत के किसान स्वयं खुशहाल थे एवं अन्नदाता के रूप में पूरे देश का पालन- पोषण करने में सक्षम थे लेकिन सरकार के गलत निर्णयों एवं चंद पैसों के लालच में भारत के सनातनी और ऋषि कृषि परम्परा को बाजारू कृषि बना दिया गया। दरअसल भारतीय कृषि की इस दारुण कथा की लम्बी दास्तान है।
विकासशील देशों के साथ भारत के किसानों की दुर्दशा की कहानी उन दिनों शुरू हुई जब भारत ने 1995 में विश्व व्यापार संगठन के तहत कृषि समझौते पर अपने हस्ताक्षर किए। यहां उल्लेख करना आवश्यक होगा कि जब तत्कालीन सरकार ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए उस समय कृषि से जुड़े संबंध पक्षों को विश्वास में नहीं लिया गया। उरुग्वे दौर की वार्ता के क्रम में जब कृषि समझौता दस्तावेज बनने की प्रक्रिया में था विकसित देश इसका विरोध करते थे।
बाद में अचानक उन्होंने इसे स्वीकार किया और विकासशील देशों को भी इस सहमति के लिए बाध्य किया। 1994 के अप्रैल में मराकेश समझौता के अंग के रूप कृषि समझौता भी स्वीकृत हुआ और 1 जनवरी 1995 से सभी देशों के लिए यह समझौता बाध्यकारी हो गया।
यहां यह प्रश्न उठना स्वभाविक है कि आखिर डब्ल्यूटीओ के अन्तर्गत कृषि समझौते में आखिर कौन-कौन सी बातें हैं जो आज देश के लिए परेशानी का कारण बन गई हैं

कृषि समझौते के अनुसार सभी सदस्य देशों को तीन प्रमुख मुद्दों पर अपने-अपने देशों में अमल करना था। वे मुद्दे इस प्रकार हैं-
1 .  बाजार पहुंच
2.   घरेलू सहायता
3.   निर्यात अर्थ सहायता (सब्सिडी)
ये तीनों ऐसे मुद्दे हैं जिस पर दोहा में यह तय हुआ था कि विकसित देश तय समय सीमा के भीतर अपने बाजारों को गरीब देशों के किसानों के उत्पादों के लिए खोलेंगे। अमीर देश इनके उत्पादों पर लगने वाले सभी गैर व्यापार अवरोधों को समाप्त करेंगे। सभी देश इस बात पर भी सहमत हुए थे कि मात्रात्मक प्रतिबंध भी उठा लिया जाएगा। इन सबके बदले केवल प्रशुल्क की व्यवस्था रहेगी। जिसे समय-समय पर बातचीत के द्वारा सर्वमान्य स्तर पर ले आया जाएगा।
विकासशील देशों को इस बात की छूट मिली थी कि अपना बाजार बचाने के लिए वे गैर शुल्क अवरोध भी लगा सकते हैं। भारत ने समय से पूर्व ही सभी मात्रात्मक प्रतिबंध उठा लिए। परिणाम यह हुआ कि भारत में संवेदनशील वस्तुओं का आयात कई गुना बढ़ गया और उस क्षेत्र के उत्पादक की रोजी-रोटी समाप्त हो गयी। इसी प्रकार विकसित देशों से उनके यहां जारी घरेलू सहायता एवं निर्यात सहायता को कम करने का समझौता दोहा में हुआ था। तय समय सीमा के बाद भी ये देश निर्यात एवं घरेलू सहायता कम करने के बजाए बढ़ाते ही रहे।
इसका दुष्परिणाम भारत जैसे गरीब देशों को उठाना पड़ा। हांगकांग मंत्रिस्तरीय सम्मेलन आते-आते विकसित देशों ने अब अपनी सब्सिडी हटाने के एवज में  विकासशील देशों के ऊपर मनमानी शर्तें शुरू कर दी हैं।
डब्ल्यूटीओ में कृषि पर बातचीत की शुरुआत वर्ष 2000 से शुरू हुई। दोहा में 2001 के नवम्बर में कृषि वार्ता हेतु एक मार्गदर्शक रूपरेखा तय की गई। दोहा में ही कृषि वार्ता हेतु एक निश्चित समय सीमा 1 जनवरी 2005 तय की गई। जब तक कृषि पर होनेवाली बातचीत समाप्त हो जानी चाहिए थी। इससे पूर्व सभी देशों ने अपनी कृषि नीति-व्यापार से जुड़े दस्तावेज बनाए और एक दूसरे को सौंपी। इस आधार पर एक विस्तृत प्रारूप बनाया गया।
लेकिन सभी देशों के बीच असहमति के बाद वर्ष 2003 में यह वार्ता असफल हुई। इसका कारण था विकसित देशों द्वारा कृषि से अनेक मुद्दों को जोड़ना। लेन-देन के इस फेर में विकासशील देशों ने दोहा जैसी एकजुटता दिखायी और अपने हितों की रक्षा की। जबसे कृषि का मुद्दा विश्व व्यापार संगठन में प्रमुखता से उभरा है, इसकी मंत्रिस्तरीय वार्ताएं एक-एक कर असफल होने लगी हैं। बावजूद इसके भारत की सभी सरकारें इस संस्था एवं इसको चलाने वाले पश्चिमी देशों के सामने हमेशा नतमस्तक होती आई हैं। उनकी दब्बू एवं रीढ़विहीन गति विधियों से भारतीय संप्रभुता एवं सम्मान की पगड़ी तो नीचे हुई ही भारतीय किसानों की दुर्दशा भी बढ़ती गई।
वैसे तो आर्थिक उदारीकरण के दुष्परिणाम भारत के सभी क्षेत्रों में दिखाई देते हैं लेकिन कृषि पर इसका दुष्प्रभाव गंभीर है। कृषि की दयनीय दशा होने के कारण ही गरीबी निवारण अभियान अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल रहा। ज्ञातव्य हो कि भारत में 70 प्रतिशत जनसंख्या अभी भी कृषि से ही अपना भरण-पोषण करती है। लेकिन विश्व व्यापार संगठन के दबाव में भारत सरकार द्वारा समय-समय पर ऐसे निर्णय लिये गये जिनके कारण भारत की खाद्य सुरक्षा, किसानों का हित एवं राष्ट्र की सम्प्रभुता खतरे में पड़ गयी है।
किसानों में बढ़ती आत्महत्या:
उदारीकरण के एक दशक से अधिक बीत जाने के बाद देश में किसानों की आत्महत्या बड़े पैमाने पर होने लगी है। किसानों ने लोभ में आकर अधिक पैसे कमाने के चक्कर में परम्परागत खेती को छोड़कर नकदी खेती करनी शुरू कर दी। सरकार द्वारा निर्यात केन्द्रित खेती को बढ़ावा देने के कारण किसानों का लोभ दुगुना हुआ। बाजार में निरवंश बीज और महंगे उत्पादक समान से कृषि लागत कई गुना बढ़ गयी।
फसल होने के बाद बाजार में समर्थन मूल्यों का अभाव एवं घर में सामाजिक सुरक्षा के  अभाव में जी रहे किसानों के ऊपर बैंक वालों ने कृषि ऋण वापसी के लिए जब शिकंजा कसना शुरू किया तो बेचारे गरीब किसानों को आत्महत्या के अलावा कोई दूसरा मार्ग दिखाई नहीं दिया। आत्महत्या आज भी जारी है। आर्थिक विशेषज्ञ प्रधानमंत्री क्या जानें किसानों के दु:ख दर्द को। निर्लज्जता की सीमा राजनेताओं ने किस हद तक लांघ ली है, इसकी मिसाल संसद में बहस के दौरान कृषि मंत्री शरद पवार के बयान से झलकती है, जिसमें उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार के समय एनडीए सरकार की तुलना में कम किसानों ने आत्महत्या की है।
खेती छोड़ने को मजबूर:
खेती अब किसानों के लिए आजीविका चलाने लायक रोजगार नहीं रह गई। कृषि लागत बढ़ गई है। देशी बीज पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्जा है। सरकार द्वारा किसी प्रकार की सब्सिडी या अन्य सुविधाएं विश्व व्यापार संगठन के दबाव के तहत या तो बंद कर दी गई है या कम की जा रही हैं। हताश-निराश किसान खेती को छोड़कर जीविका के अन्य साधनों की तलाश में हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकीय सर्वेक्षण का मानना है कि देश के 40 प्रतिशत किसान खेती छोड़ने का मन बना चुके हैं। एक कृषि प्रधान देश के लिए इससे बढ़कर और दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि उसके यहां किसानों को उसका सम्मान नहीं मिल रहा।
व्यापार के नाम पर बेईमानी:
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के समय किया गया यह दावा कि मुक्त व्यापार से गरीब देशों के किसानों को लाभ मिलेगा, गलत साबित हुआ है। विकासशील और गरीब देशों के लगभग 30 करोड़ किसानों की आजीविका खतरे में पड़ी है। दबाव में गरीब देशों को आयात हेतु अपना बाजार खोलना पड़ा है। सस्ती आयातित वस्तुओं से बाजार में स्थानीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ गई है। विकासशील देशों के बाजार ऐसे सस्ते कृषि उत्पादों से पटे पड़े हैं।
विकसित देश अपने यहां उत्पादन लागत को कम नहीं कर पाते लेकिन अपने व्यापारी एवं निर्यातकों को इतनी अधिक मात्रा में आर्थिक सहायता उपलब्ध कराते हैं जिनके कारण उनके कृषि मूल्य विकासशील देशों की तुलना में काफी कम हो जाते हैं।
दूसरी तरफ जब विकासशील देशों के उत्पाद विदेशों में जाते हैं तो उनको नये-नये व्यापार अवरोध बनाकर वहां बिकने से रोका जाता है। व्यापार के नाम पर इस तरह की बेईमानी विकसित देशों द्वारा बड़े पैमाने पर अपनाई जा रही है। भारत जैसे विकासशील देशों के मंत्री इन विकसित देशों के सामने दास भाव से खड़े होते हैं। वे व्यापार के नाम पर होने वाली इन गलत हरकतों से देश के किसानों की रक्षा करने के लिए वे अवाज भी नहीं उठा पाते।
खाद्यान्न असुरक्षा:
डब्ल्यूटीओ के दबाव में सरकार द्वारा उदारीकरण के जो निर्णय लिये गये उससे कृषि सुधार पर ज्यादा बल दिया गया। परिणाम यह हुआ कि देश की वर्तमान एवं भविष्य के कुछ वर्षों के लिए प्रमुख खाद्यान्नों की उपलब्धता, जिसे खाद्य सुरक्षा भी कहा जाता है, पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। विशेषज्ञ एवं नौकरशाह और राजनेता मिलकर लोगों को यह बताकर भ्रमित करते हैं कि आयात के द्वारा देश की खाद्य सुरक्षा को पूरा कर लिया जाएगा। लेकिन ऐसा उदाहरणों से स्पष्ट नहीं है।
गरीब अफ्रीकी देशों में खाद्यान्न के अभाव के कारण लाखों लोग भूख से मर रहे हैं फिर भी उन्हें कोई खाद्यान्न उपलब्ध नहीं करा रहा। यदि कोई देश तैयार भी होता है तो उसकी शर्तें इतनी महंगी होती हैं कि उन पर अमल करना संभव नहीं होता। अभी तक माना जाता है कि हरित क्रांति के बाद खाद्यान्न के मामले में भारत आत्मनिर्भर देश हो गया है।
लेकिन वर्तमान सरकार द्वारा जिस प्रकार गेहूं की बड़ी मात्रा में आयात का निर्णय लिया गया है, उससे पता चलता है कि हमारी खाद्य सुरक्षा का दावा खोखला है। साथ ही इससे यह भी स्पष्ट है कि विकसित देशों का भारत के ऊपर इतना दबाव है कि हम अपने किसानों के हितों को ताक पर रखकर उनके दबाव में गेहूं का आयात कर रहे हैं। भारत जैसे देशों में गेहूं, चावल, दालें खाद्य सुरक्षा के प्रारम्भिक चक्र हैं। इसमें एक चक्र तो टूट गया है। आर्थिक दस्तावेज बताते हैं कि चावल और दलहन में भी हमारी स्थिति कमजोर है। इस प्रकार हमारी खाद्य सुरक्षा फिर खतरे में आ गई है।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का बोलबाला:
विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से पश्चिमी देशों की विशालकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियां कृषि उत्पादों को अपना निशाना बना रही हैं। ये कम्पनियां इतनी बड़ी हैं कि भारत जैसे कई देशों के बजट के कुल खर्चे से अधिक का इनका कारोबार होता है। इनके मुकाबले देश के छोटे उद्योग या व्यापारी या दुकानदार टिक ही नहीं सकते।
पहले तो ये कम्पनियां सस्ती दरों पर अपना माल बेचकर बाजार में प्रवेश करती हैं। बाद में छोटी-छोटी कम्पनियों को खरीद कर बाजार में अपना एकाधिकार बना लेती हैं। फिर इनके हाथ में होता है बाजार, मूल्य, उपभोक्ता एवं वहां की स्थानीय निकाय और सरकार। ये कम्पनियां सभी को खरीदने की क्षमता रखती हैं। इस देश में उदारीकरण के बाद ऐसी कई कम्पनियां आई हैं, जिन्होंने बाजार में अपना वर्चस्व स्थापित किया। उन्होंने बीज पर कब्जा किया।
इसके बाद तकनीकी पर कब्जा किया और यहीं के उत्पाद को खरीदकर उसे दुगुने-तिगुने दाम पर बेचकर भरपूर मुनाफा कमाया। अभी इन कम्पनियों ने भारत सरकार के ऊपर खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को अनुमति देने के लिए दबाव बनाया हुआ है। खुदरा व्यापार में कृषि उत्पाद की बहुत सारी वस्तुएं आ गयी हैं। ये कम्पनियां इस माध्यम से भी देश के करोड़ों लोगों को रोजगार देने वाले क्षेत्र पर कब्जा करने का षडयंत्र रच चुकी है। दुर्भाग्य से देश के राजनेता हकीकत को नजरअंदाज कर उन कम्पनियों को देश में बुलाने के लिए पलक पांवड़े बिछाए रहते हैं।
पेटेंट और बौद्धिक सम्पदा:
विश्व व्यापार संगठन के सबसे विवादास्पद नियमों में बौद्धिक संपदा का कानून है जिसके दबाव में भारत को 1970 के पेटेंट कानून में विकसित देशों एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को लाभ पहुंचाने के लिए संशोधन करने पड़े हैं। ज्ञातव्य हो कि भारत का 1970 का पेटेंट कानून देश की भौगोलिक सीमा के अधीन उपलब्ध सभी प्राकृतिक संसाधनों एवं आविष्कारों की रक्षा करने में सक्षम था।
चूंकि यह कानून विदेशी कम्पनियों को यहां के बाजार का लाभ उठाने से रोकता था। इसलिए उनके दबाव में इसमें परिवर्तन किया गया। अब परिवर्तित पेटेंट कानून के तहत भारत के सामने दिन प्रतिदिन अनेक चुनौतियां आ रही हैं। पेटेंट प्राप्त बीज, अनाज, फल, दूध, दवा एवं अन्य समानों के मूल्य आसमान को छू रहे हैं। आम आदमी इसे खरीद पाने में अक्षम है।
इतना ही नहीं विदेशी कम्पनियां इस मामले में भी बेईमानी करने से बाज नहीं आतीं। भारतीय बासमती चावल, करेला, नीम जैसे प्रमुख खाद्य पदार्थो का उन्होंने बेईमानी से अपने यहां पेटेंट करा लिया था। भारत के लोगों को इसके खिलाफ लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ी, तब जाकर इसे मुक्त कराया जा सका।
निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता प्राप्त करने के बाद भारत के किसानों, गरीबों एवं व्यापारियों की स्थिति दिन-प्रतिदिन बदतर हुई है। वे अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई में पिछड़ रहे हैं। उनके प्रति सरकार का सौतेला व्यवहार उनकी दशा को और भी दयनीय बना रहा है।
दूसरी तरफ विदेशों में ऐसे-ऐसे कानून वहां के किसानों की रक्षा के लिए बनाए जा रहे हैं, जिनके विरुद्ध आवाज बुलन्द करना समय की आवश्यकता होते हुए भी सरकारी कमजोरी के कारण सम्भव नहीं हो पा रहा है। हालात यदि ऐसे ही रहे तो किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं की घटना आगे चलकर सामूहिक आत्महत्या का स्वरूप ग्रहण कर लेगी।
साभार विद्यानंद आचार्य
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रविवार, 27 सितंबर 2015

समाज के अंतिम व्यक्ति तक समरसता की अनुभूति हो – परम पूज्य डॉ. मोहनराव भागवत जी


समाज के अंतिम व्यक्ति तक समरसता की अनुभूति हो – डॉ. मोहनराव भागवत जी

शिमला, 24 सितम्बर, 2015 (विसंकें) – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक परम पूज्य डॉ. मोहन राव भागवत ने सामाजिक समरसता पर बल दिया है. उन्होंने कहा है कि समाज यदि एकमत होकर चलेगा तो इससे सामाजिक एकता को बल मिलेगा. उन्होंने कहा कि सबको मन्दिर में प्रवेश, पानी का सामूहिक स्रोत तथा अंतिम संस्कार के लिए समान श्मशान स्थल की व्यवस्था हो. समाज के अंतिम व्यक्ति तक समरसता की अनुभूति हो इस ओर सबके प्रयास रहने चाहिए. यदि ऐसा नहीं हुआ तो समाज को तोड़ने वाली ताकतें अधिक प्रभावी होंगी. इसके लिए जाति बिरादरी के प्रमुखों तथा संत समाज को अधिक प्रयत्न करने होंगे. समाज में सद्भाव बढाने के लिए सभी सामाजिक, धार्मिक संगठनों को आपस में संवाद बढ़ाकर मिलकर प्रयास करने चाहिए. उन्होंने कहा कि हमारा विचार तो एकात्मता का है लेकिन यह हमारे आचरण में भी आना चाहिए इसी में इसकी सार्थकता है. डॉ. मोहन भागवत कुल्लू के देव सदन में कुल्लू जिला के देव प्रतिनिधियों (कारदार, पुजारी तथा गुरों) की सगोष्ठी को सम्बोधित कर रहे थे. इस संगोष्ठी का आयोजन सत्संग सभा कुल्लू ने किया था. इस कार्यक्रम में कुल्लू जिला के लगभग 200 देव प्रतिनिधियों ने भाग लिया.

देव प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि देव संस्कृति ही हिन्दू संस्कृति है. जब देव संस्कृति प्रभावी थी तब विश्व में कोई युद्ध नहीं थे, पर्यावरण भी शुद्ध था, हमने अपनी संस्कृति को छोड़ा इसीलिए समस्याएं बढी. हमारी संस्कृति तो मानवता की भलाई के लिए काम करती है, इसमें कट्टरता के लिए कोई स्थान नहीं है. मतान्तरण के कारण देश में ऐसे राष्ट्र विरोधी तत्व खड़े हो गए जो देश को हानि पहुंचा रहे हैं. उन्होंने आह्वान किया कि सभी मत-पंथ सम्प्रदाय एकजुट होकर चलें तभी भारत सुरक्षित रहेगा.

परिवार व्यवस्था में क्षरण और पारिवारिक मूल्यों में आ रही गिरावट पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि परिवार व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रत्येक परिवार ने सप्ताह में एक बार सामूहिक भोजन व सामूहिक भजन और खुलकर चर्चा करनी चाहिए. बच्चों को अपनी संस्कृति का ज्ञान और गौरव बताएँगे तो वह कभी भटकेंगे नहीं और देश के अच्छे नागरिक बनेंगे. अपने उत्सवों का उपयोग समाज प्रबोधन के लिए करें.

इस अवसर पर देव प्रतिनिधियों ने परिचर्चा में भाग लिया और देव संस्कृति के संरक्षण के लिए अनेक उपयोगी सुझाव भी दिए.

इससे पूर्व कुल्लू पधारने पर सरसंघचालक का स्थानीय परम्परा के अनुसार भव्य स्वागत किया गया.  सत्संग सभा के अध्यक्ष श्री राकेश कोहली ने सबका धन्यवाद किया. इस अवसर पर संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य जी, उत्तर क्षेत्र कार्यवाह श्री सीताराम व्यास जी, प्रान्त संघचालक कर्नल (सेनि.) रूप चंद जी, सह प्रान्त संघचालक डॉ. वीरसिंह रांगडा जी, जिला संघचालक श्री राजीव करीर भी उपस्थित थे.

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

पंडित दीनदयाल उपाध्याय : जीवन परिचय


दीनदयाल उपाध्याय
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पूरा नामपंडित दीनदयाल उपाध्याय
अन्य नामदीना
जन्म25 सितंबर, सन् 1916 ई.
जन्म भूमिनगला चंद्रभान, मथुरा
मृत्यु11 फ़रवरी, सन् 1968 ई.
मृत्यु स्थानमुग़लसराय
अभिभावकभगवती प्रसाद उपाध्याय, रामप्यारी
पार्टीभारतीय जनता पार्टी
पदअध्यक्ष
कार्य कालसन 1953 से 1968 ई.
शिक्षाबी. ए
विद्यालयबिड़ला कॉलेज, एस.डी. कॉलेज,कानपुर
भाषाहिन्दी
रचनाएँराष्ट्र धर्म, पांचजन्य, स्वदेश, एकात्म मानववाद, लोकमान्य तिलक की राजनीति
अन्य जानकारीदीनदयाल उपाध्याय की पुस्तक 'एकात्म मानववाद' (इंटीग्रल ह्यूमेनिज़्म) है जिसमें साम्यवाद और पूंजीवाद, दोनों की समालोचना की गई है।
बाहरी कड़ियाँदीनदयाल उपाध्याय

पंडित दीनदयाल उपाध्याय (जन्म:25 सितंबर1916 - मृत्यु: 11 फ़रवरी 1968)भारतीय जनसंघ के नेता थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक प्रखर विचारक, उत्कृष्ट संगठनकर्ता तथा एक ऐसे नेता थे जिन्होंने जीवनपर्यंन्त अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी व सत्यनिष्ठा को महत्त्व दिया। वे भारतीय जनता पार्टी के लिए वैचारिक मार्गदर्शन और नैतिक प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय मज़हब और संप्रदाय के आधार पर भारतीय संस्कृति का विभाजन करने वालों को देश के विभाजन का ज़िम्मेदार मानते थे। वह हिन्दू राष्ट्रवादी तो थे ही, इसके साथ ही साथ भारतीय राजनीति के पुरोधा भी थे। दीनदयाल की मान्यता थी कि हिन्दू कोई धर्म या संप्रदाय नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय संस्कृति हैं। दीनदयाल उपाध्याय की पुस्तक एकात्म मानववाद (इंटीगरल ह्यूमेनिज्म) है जिसमें साम्यवाद और पूंजीवाद, दोनों की समालोचना की गई है। एकात्म मानववाद में मानव जाति की मूलभूत आवश्यकताओं और सृजित क़ानूनों के अनुरुप राजनीतिक कार्रवाई हेतु एक वैकल्पिक सन्दर्भ दिया गया है।[1]

जीवन परिचय

दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर, 1916 को दीनदयाल जी की माता श्रीमती रामप्यारी देवी, श्री चुन्नीलाल शुक्ल, स्टेशन मास्टर धानकिया रेल्वे स्टेशन, जयपुर- अजमेर रेल मार्ग, जयपुर की पुत्री थीं, दीनदयाल जी का जन्म भी नानाजी के यहां धानकिया, जिला जयपुर, राजस्थान में रेल्वे के क्वार्टर में ही हुआ था। वे 25 सितम्बर 1916 में जन्में थे। जब वे मात्र 3 वर्ष के थे तब उनके पिताजी का तथा 8 वर्ष के थे तब माताजी का एवं जब वे 16 वर्ष के थे तब छोटे भाई का निधन हो गया। 
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का पैतृक गांव नंगला - चन्द्रभान, मथुरा जिले में है, उनके दादाजी वहां के सुप्रसिद्ध ज्योतिषी पं. हरीरामजी शास्त्री थे,  पिता श्री भगवती प्रसाद उपाध्याय, रेल्वे स्टेशन मास्टर, जलेसर रोड़, उ.प्र. और माता श्रीमती रामप्यारी देवी थीं। उनकी प्रथम संतान दीनदयाल एवं द्वितीय संतान शिवदयाल जी थे। पिता भगवती प्रसाद ने अपनी पत्नी व बच्चों को मायके भेज दिया। उस समय दीनदयाल के नाना चुन्नीलाल शुक्ल धनकिया में स्टेशन मास्टर थे। मामा का परिवार बहुत बड़ा था। दीनदयाल अपने ममेरे भाइयों के साथ खाते-खेलते बड़े हुए। वे दोनों ही रामप्यारी और दोनों बच्चों का ख़ास ध्यान रखते थे।
वर्ष की मासूम उम्र में दीनदयाल पिता के प्यार से वंचित हो गये। पति की मृत्यु से माँ रामप्यारी को अपना जीवन अंधकारमय लगने लगा। वे अत्यधिक बीमार रहने लगीं। उन्हें क्षय रोग हो गया। 8 अगस्त सन् 1924 को रामप्यारी बच्चों को अकेला छोड़ ईश्वर को प्यारी हो गयीं। 7 वर्ष की कोमल अवस्था में दीनदयाल माता-पिता के प्यार से वंचित हो गये। सन् 1934 में बीमारी के कारण दीनदयाल के भाई का देहान्त हो गया।
दीनदयाल उपाध्याय
Deendayal Upadhyay

शिक्षा

गंगापुर में दीनदयाल के मामा 'राधारमण' रहते थे। उनका परिवार उनके साथ ही था। गाँव में पढ़ाई का अच्छा प्रबन्ध नहीं था, इसलिए नाना चुन्नीलाल ने दीनदयाल और शिबु को पढ़ाई के लिए मामा के पास गंगापुर भेज दिया। गंगापुर में दीना की प्राथमिक शिक्षा का शुभारम्भ हुआ। मामा राधारमण की भी आय कम और खर्चा अधिक था। उनके अपने बच्चों का खर्च और साथ में दीना और शिबु का रहन-सहन और पढ़ाई का खर्च करनी पड़ती थी।

शिक्षा में कठिनाई

सन 1926 के सितम्बर माह में नाना चुन्नीलाल के स्वर्गवास की दुखद सूचना मिली। दीना के मन पर गहरी चोट लगी। इस दुख से उभर भी नहीं पाए थे कि मामा राधारमण बीमार पड़ गए। वैद्यों ने बताया कि उन्हें टी.बी. की बीमारी हो गई है। उनका बचना कठिन है। वैद्यों ने औषधि देने से मना कर दिया। ऐसी स्थिति में क्या किया जाए, यही समस्या थी। लखनऊ में उनके एक सम्बन्धी रहते थे। उनके पास से राधारमण का बुलावा आया। लखनऊ में इलाज की अच्छी व्यवस्था थी। किन्तु उन्हें वहाँ कौन ले जाए, यही समस्या थी। कहीं यह छूत की बीमारी किसी और को न लग जाए, इसी से सब उनके पास जाने से भी डरते थे। दीना बराबर मामा की सेवा में लगा रहता था। मामा के मना करने पर भी वह नहीं मानता था। मामा का लड़का बनवारीलाल भी दीना के साथ पढ़ता था, किन्तु अपने पिता के पास जाने में वह भी छूत की बीमारी से डरता था। दीना की आयु इस समय ग्यारह-बारह वर्ष की थी। वह अपने मामा को लखनऊ ले जाने के लिए तैयार हुआ। मामा ने बहुत मना किया। दीना नहीं माना। अन्त में मामा को दीना की बात माननी ही पड़ी। लखनऊ में मामा का उपचार आरम्भ हुआ। दीना ने डटकर मामा की सेवा की। उसकी परीक्षा भी पास आ रही थी। किन्तु उसे मामा की सेवा के अलावा और कोई ध्यान नहीं था। परीक्षा का ध्यान आते ही मामा ने दीना को गंगापुर भेज दिया। दीना पढ़ भी नहीं सका था। किन्तु होनहार बिरवान के होत चीकने पात वाली कहावत को उसने चरितार्थ कर दिया। दीना ने परीक्षा में सर्वोच्च अंक पाकर प्रथम स्थान प्राप्त किया। यह सभी के लिए आश्चर्य और प्रसन्नता की बात थी।
दीनदयाल उपाध्याय
Deendayal Upadhyay
दीना को कोट गाँव जाना पड़ा। गंगापुर में आगे की पढ़ाई की व्यवस्था नहीं थी। कोट गाँव में उसने पाँचवीं कक्षा में प्रवेश लिया। वहाँ भी वह पढ़ाई में प्रथम ही रहता था। राजघर जाकर आठवीं और नवीं कक्षा पास की। दीना के पास पढ़ने के लिए पुस्तकें नहीं थीं। दीनदयाल के मामा का लड़का भी उसके साथ पढ़ता था। जब ममेरा भाई सो जाता या पढ़ाई नहीं करता था। तब दीना उसकी पुस्तकों से पढ़ लेता था। अब दीना नवीं कक्षा में था। दीनदयाल को फिर भारी दुःख का सामना करना पड़ा। उसका छोटा भाई शिबु भी टाइफाइड होने से चल बसा। दीना को गहरा दुःख हुआ। दोनों भाइयों में बहुत अधिक प्यार था। नवीं कक्षा पास करने के बाद दीना राजघर से सीकर गया। वहाँ भी उसने अपने अध्यापकों पर अपनी बुद्धि, लगन और परिश्रम की धाक जमा दी। सभी उसे बहुत प्यार करते थे। हाईस्कूल की परीक्षा से कुछ माह पूर्व दीना बीमार पड़ गया। हाईस्कूल की परीक्षा आरम्भ हो गई। दीना ने अच्छी तरह अपने प्रश्नपत्र किए। दीनदयाल न केवल परीक्षा में प्रथम आया बल्कि कई विषयों में एक नया रिकार्ड भी बनाया। उसकी रेखागणित की उत्तर-पुस्तिका कितने ही वर्षों तक नमूने के रूप में रखी गई।

पढ़ाई में प्रशंसा

दीनदयाल जी का प्रिय विषय गणित था। वह गणित में हमेशा अव्वल अंक प्राप्त करते थे। सीकर के महाराज को इस मेधावी छात्र के विषय में खबर मिली। उन्होंने एक दिन दीना को बुलाया। उन्होंने कहा, ‘'बेटा, तुमने बहुत ही अच्छे अंक प्राप्त किए हैं। बताओ, तुम्हें पारितोषिक के रूप में क्या चाहिए?' दीना ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया, 'केवल आपका आशीर्वाद।' महाराज उस उत्तर से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने दीना को एक स्वर्ण पदक, पुस्तकों के लिए 250 रुपये और 10 रुपये प्रतिमाह विद्यार्थी-वेतन देकर आशीर्वाद दिया। इसके बाद दीनदयाल जी कॉलेज में पढ़ने के लिए पिलानी चले गए। वहाँ भी सभी अध्यापक उनके विनम्र स्वभाव, लगन और प्रखर बुद्धि से बड़े प्रभावित थे। पढ़ाई में पिछड़े छात्र दीनदयाल से पढ़ते थे और मार्गदर्शन पाते थे। दीनदयाल जी इन सबको बड़े प्यार से पढ़ाते और समझाते थे। ऐसे कई छात्र हर समय उन्हीं के पास बैठे रहते थे।

स्वर्ण पदक

सन 1937 में इण्टरमीडिएट की परीक्षा दी । इस परीक्षा में भी दीनदयाल जी ने सर्वाधिक अंक प्राप्त कर एक कीर्तिमान स्थापित किया। बिड़ला कॉलेज में इससे पूर्व किसी भी छात्र के इतने अंक नहीं आए थे। जब इस बात की सूचना घनश्याम दास बिड़ला तक पहुँची तो वे बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने दीनदयाल जी को एक स्वर्ण पदक प्रदान किया। उन्होंने दीनदयाल जी को अपनी संस्था में एक नौकरी देने की बात कही। दीनदयाल जी ने विनम्रता के साथ धन्यवाद देते हुए आगे पढ़ने की इच्छा व्यक्त की। बिड़ला जी इस उत्तर से बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, 'आगे पढ़ना चाहते हो, बड़ी अच्छी बात है। हमारे यहाँ तुम्हारे लिए एक नौकरी हमेशा ख़ाली रहेगी। जब चाहो आ सकते हो।' धन्यवाद देकर दीनदयाल जी चले गए। बिड़ला जी ने उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की।

कॉलेज में प्रवेश

दीनदयाल जी को बी.ए. करना था। इसके लिए एस.डी. कॉलेज, कानपुर में प्रवेश लिया। मन लगाकर अध्ययन किया। छात्रावास में रहते थे। वहाँ उनका सम्पर्क श्री सुन्दरसिंह भण्डारी, बलवंत महासिंघे जैसे कई लोगों से हुआ। राजनीतिक चर्चाएँ काफ़ी-काफ़ी देर तक चलती थीं।
Blockquote-open.gif हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारतमाता है, केवल भारत ही नहीं। माता शब्द हटा दीजिए तो भारत केवल ज़मीन का टुकड़ा मात्र बनकर रह जाएगा Blockquote-close.gif
- पं. दीनदयाल उपाध्याय
यहाँ दीनदयाल में राष्ट्र की सेवा के बीज का स्फुरण हुआ। बलवंत महासिंघे के सम्पर्क के कारण दीनदयाल जी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रमों में रुचि लेने लगे। इन सब व्यस्तताओं के बाद भी उन्होंने सन् 1939 में प्रथम श्रेणी में बी.ए. की परीक्षा पास की। पंडित जी एम.ए. करने के लिए आगराचले गये। वे यहाँ पर श्री नानाजी देशमुख और श्री भाऊ जुगाडे के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे। इसी बीच दीनदयाल जी की चचेरी बहन रमा देवी बीमार पड़ गयीं और वे इलाज कराने के लिए आगरा चली गयीं, जहाँ उनकी मृत्यु हो गयी। दीनदयालजी इस घटना से बहुत उदास रहने लगे और एम.ए. की परीक्षा नहीं दे सके। सीकर के महाराजा और श्री बिड़ला से मिलने वाली छात्रवृत्ति बन्द कर दी गई।[3]

राष्ट्र धर्म प्रकाशन

दीनदयाल ने लखनऊ में राष्ट्र धर्म प्रकाशन नामक प्रकाशन संस्थान की स्थापना की और अपने विचारों को प्रस्तुत करने के लिए एक मासिक पत्रिका राष्ट्र धर्म शुरू की। बाद में उन्होंने 'पांचजन्य' (साप्ताहिक) तथा 'स्वदेश' (दैनिक) की शुरुआत की। सन् 1950 में केन्द्र में पूर्व मंत्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 'नेहरू - लियाकत समझौते' का विरोध किया और मंत्रिमंड़ल के अपने पद से त्यागपत्र दे दिया तथा लोकतांत्रिक ताकतों का एक साझा मंच बनाने के लिए वे विरोधी पक्ष में शामिल हो गए। डॉ. मुकर्जी ने राजनीतिक स्तर पर कार्य को आगे बढ़ाने के लिए निष्ठावान युवाओ को संगठित करने में श्री गुरु जी से मदद मांगी।

राजनीतिक सम्मेलन

पंडित दीनदयाल जी ने 21 सितम्बर1951 को उत्तर प्रदेश का एक राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किया और नई पार्टी की राज्य इकाई,भारतीय जनसंघ की नींव डाली। पंडित दीनदयाल जी इसके पीछे की सक्रिय शक्ति थे और डॉ. मुखर्जी ने 21 अक्तूबर, 1951 को आयोजित पहले 'अखिल भारतीय सम्मेलन' की अध्यक्षता की। पंडित दीनदयाल जी की संगठनात्मक कुशलता बेजोड़ थी।
दीनदयाल उपाध्याय प्रतिमा
Deendayal Upadhyay Statue

संघर्ष

पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपनी चाची के कहने पर धोती तथा कुर्ते में और अपने सिर पर टोपी लगाकर सरकार द्वारा संचालित प्रतियोगी परीक्षा दी जबकि दूसरे उम्मीदवार पश्चिमी सूट पहने हुए थे। उम्मीदवारों ने मज़ाक में उन्हें 'पंडितजी' कहकर पुकारा - यह एक उपनाम था जिसे लाखों लोग बाद के वर्षों में उनके लिए सम्मान और प्यार से इस्तेमाल किया करते थे। इस परीक्षा में वे चयनित उम्मीदवारों में सबसे ऊपर रहे। वे अपने चाचा की अनुमति लेकर 'बेसिक ट्रेनिंग' (बी.टी.) करने के लिए प्रयाग चले गए और प्रयाग में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों में भाग लेना जारी रखा। बेसिक ट्रेनिंग (बी.टी.) पूरी करने के बाद वे पूरी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों में जुट गए और प्रचारक के रूप में ज़िला लखीमपुर (उत्तर प्रदेश) चले गए। सन् 1955 में दीनदयाल उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांतीय प्रचारक बन गए।
दीनदयाल उपाध्याय
Deendayal Upadhyay

सर्वोच्च अध्यक्ष

पंडित दीनदयाल जी की संगठनात्मक कुशलता बेजोड़ थी। आख़िर में जनसंघ के इतिहास में चिरस्मरणीय दिन आ गया जब पार्टी के इस अत्यधिक सरल तथा विनीत नेता को सन् 1968 में पार्टी के सर्वोच्च अध्यक्ष पद पर बिठाया गया। दीनदयाल जी इस महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारी को संभालने के पश्चात जनसंघ का संदेश लेकर दक्षिण भारत गए।

देश सेवा

पंडित जी घर गृहस्थी की तुलना में देश की सेवा को अधिक श्रेष्ठ मानते थे। दीनदयाल देश सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उन्होंने कहा था कि 'हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारतमाता है, केवल भारत ही नहीं। माता शब्द हटा दीजिए तो भारत केवल ज़मीन का टुकड़ा मात्र बनकर रह जाएगा। पंडित जी ने अपने जीवन के एक-एक क्षण को पूरी रचनात्मकता और विश्लेषणात्मक गहराई से जिया है। पत्रकारिता जीवन के दौरान उनके लिखे शब्द आज भी उपयोगी हैं। प्रारम्भ में समसामयिक विषयों पर वह 'पॉलिटिकल डायरी‘ नामक स्तम्भ लिखा करते थे। पंडित जी ने राजनीतिक लेखन को भी दीर्घकालिक विषयों से जोडकर रचना कार्य को सदा के लिए उपयोगी बनाया है।

लेखन

पंडित जी ने बहुत कुछ लिखा है। जिनमें एकात्म मानववाद, लोकमान्य तिलक की राजनीति, जनसंघ का सिद्धांत और नीति, जीवन का ध्येय राष्ट्र जीवन की समस्यायें, राष्ट्रीय अनुभूति, कश्मीर, अखंड भारत, भारतीय राष्ट्रधारा का पुनः प्रवाह, भारतीय संविधान, इनको भी आज़ादी चाहिए, अमेरिकी अनाज, भारतीय अर्थनीति, विकास की एक दिशा, बेकारी समस्या और हल, टैक्स या लूट, विश्वासघात, द ट्रू प्लान्स, डिवैलुएशन ए, ग्रेटकाल आदि हैं। उनके लेखन का केवल एक ही लक्ष्य था भारत की विश्व पटल पर लगातार पुनर्प्रतिष्ठा और विश्व विजय।[4]

मृत्यु

विलक्षण बुद्धि, सरल व्यक्तित्व एवं नेतृत्व के अनगिनत गुणों के स्वामी, पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की हत्या सिर्फ़ 52 वर्ष की आयु में 11 फ़रवरी 1968 को मुग़लसराय के पास रेलगाड़ी में यात्रा करते समय हुई थी। उनका पार्थिव शरीर मुग़लसराय स्टेशन के वार्ड में पड़ा पाया गया। भारतीय राजनीतिक क्षितिज के इस प्रकाशमान सूर्य ने भारतवर्ष में सभ्यतामूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार एवं प्रोत्साहन करते हुए अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिया।