शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

शांति, एकता और सद्भाव विकास की पहली शर्त : नरेंद्र मोदी



शांति, एकता और सद्भाव विकास की पहली शर्त : नरेंद्र मोदी

नयी दिल्ली : राष्ट्रीय एकता की खातिर सरदार वल्लभ भाई पटेल के कार्यों का स्मरण करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज कहा कि अगर भारत को आगे बढना है और विकास की नयी ऊंचाइयां हासिल करनी है तो इसके लिए एकता, शांति और सद्भाव पहली शर्त है. दादरी में पिछले दिनों एक व्यक्ति की पीट-पीट कर हत्या किये जाने, गौमांस विवाद और अन्य घटनाओं की पृष्ठभूमि में कथित तौर पर असहिष्णुता में वृद्धि को लेकर कलाकारों, लेखकों और वैज्ञानिकों द्वारा विरोध जाहिर किये जाने की पृष्ठभूमि में मोदी ने देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल की 140वीं जयंती पर अपने संबोधन में कहा ‘एकता हमारी सबसे बडी ताकत है. हमें एकता, शांति और सद्भाव के मंत्र के साथ आगे बढना होगा.'

प्रधानमंत्री ने इस मौके पर वंशवाद की राजनीति पर प्रहार करते हुए कहा कि यह हमारी राजनीति का विष बन गयी है. उन्होंने कहा कि सरदार पटेल ने अपने परिवार के किसी भी सदस्य को राजनीति में आगे नहीं बढाया. सरदार पटेल की जयंती पर राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जा रहा है और इस मौके पर प्रधानमंत्री ने ‘एकता के लिए दौड' (रन फॉर यूनिटी) को झंडी दिखा कर रवाना किया. उन्होंने लोगों से पटेल का यह संदेश प्रचारित करने को कहा कि अपनी एकता की खातिर देश कुछ भी बलिदान दे सकता है.

प्रधानमंत्री ने कहा ‘अगर देश को आगे बढना है और विकास की नयी ऊंचाइयां हासिल करनी है तो पहली गारंटी यह है. हमारी भाषा कोई भी हो, हमारी सोच कोई भी हो और कश्मीर से कन्याकुमारी तथा अटक से कटक तक हमारी प्रेरणा कोई भी हो. अगर हमारा लक्ष्य भारत माता को दुनिया में नयी ऊंचाइयों तक ले जाना है तो इसके लिए पहली शर्त एकता, शांति और सद्भाव है.' उन्होंने कहा ‘अगर 125 करोड भारतीय एकता, शांति और सद्भाव के मंत्र के साथ कंधे से कंधा मिला कर एक कदम बढाएं तो देश एक बार में 125 करोड कदम आगे बढ जाएगा.'

मोदी ने कहा ‘एकता के धागे में देश का बंधा होना हमारी ताकत है और एकता की खातिर कुछ भी बलिदान किया जा सकता है और यही सरदार साहब का संदेश है.' उन्होंने कहा कि सरदार पटेल का जीवन देश की एकता के लिए समर्पित था. उन्होंने यह भी घोषणा की कि ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत' योजना जल्द ही शुरू की जाएगी जिसके तहत कोई भी राज्य हर साल किसी दूसरे राज्य को चुन कर उसकी भाषा और संस्कृति को बढावा दे सकेगा. मोदी ने कहा ‘मैंने एक छोटी समिति बनायी है जो इसके तौर तरीकों पर काम कर रही है.'

अपने संबोधन की शुरुआत में मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी उनकी पुण्यतिथि पर याद किया. उन्होंने कहा कि आज ही के दिन उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दिया था जिसे भुलाया नहीं जा सकता. प्रधानमंत्री ने कहा कि महान लोगों के कार्यों का मूल्यांकन करना हमारा काम नहीं है बल्कि हमें उनके योगदान को याद करना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि आने वाली पीढियों के कल्याण के लिए उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए. उन्होंने कहा कि दार्शनिक एवं न्यायविद चाणक्य के बाद सरदार पटेल को देश की अखंडता की खातिर सतत काम करने का श्रेय दिया जा सकता है.

राजपथ पर आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे मोदी ने कहा कि कई लोग महिलाओं को आरक्षण देने का श्रेय ले सकते हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि 1930 के दशक में जब सरदार पटेल अहमदाबाद नगर निगम के महापौर थे तब उन्होंने महिलाओं को अधिकार संपन्न बनाने के प्रयास के तहत उनके लिए 50 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव किया था. इस अवसर पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह, शहरी विकास मंत्री एम वेंकैया नायडू, दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग और राज्य के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी मंच पर मौजूद थे.

पटेल के योगदान को याद करते हुए मोदी ने कहा कि जब अंग्रेज विभाजन का खेल खेल रहे थे तब आजाद भारत के पहले गृह मंत्री ने रियासतों का भारत संघ में विलय करवाकर राष्ट्रीय एकता की खातिर अथक परिश्रम किया था. मोदी ने कहा ‘उन्हें लौह पुरुष इसलिए नहीं कहा जाता था कि किसी ने उन्हें इसका सर्टिफिकेट दिया था. वह लौह पुरुष इसलिए कहलाते थे क्योंकि उन्होंने कडे फैसले किये थे.' प्रधानमंत्री ने कहा कि सरदार पटेल ने हमें ‘एक भारत' देने के लिए काम किया था और अब इसे ‘श्रेष्ठ भारत' में बदलने की जिम्मेदारी हमारी है.

उन्होंने कहा कि 1920 के दशक में अहमदाबाद के महापौर रहते हुए पटेल ने स्वच्छता के लिए अभियान चलाया था जो 222 दिन तक चला और इसकी तारीफ महात्मा गांधी ने की, जो खुद बेहद सफाई पसंद थे. मोदी ने लोगों को राष्ट्रीय एकता और देश की आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए शपथ भी दिलायी. गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि प्राचीन ग्रंथों में भी राष्ट्रीय एकता की अवधारणा मौजूद है. उन्होंने कहा कि भारत की सीमाएं बहुत पहले परिभाषित की गयी थीं लेकिन सरदार पटेल ने उन्हें निश्चित आकार देने के लिए काम किया.

सरदार पटेल को आधुनिक भारत का निर्माता बताते हुए सिंह ने कहा कि पटेल ने देश की एकता सुनिश्चित की जिससे देश को समृद्ध होने में मदद मिली. ‘अब हमें इसे बनाये रखने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहिए.' नायडू ने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि पटेल को भारतीय इतिहास में वह जगह नहीं मिली जिसके वह हकदार थे, ‘कारण चाहे जो भी रहे हों.' उन्होंने कहा ‘अब हमें उनके एकता और अखंडता के दर्शन को बनाये रखने के लिए काम करना चाहिए.' 

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

संघ समाज में समरसता का भाव जगाने के लिए प्रयासरत – सह-सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी




रांची . अखिल भारतीय कार्यकारी  मंडल की बैठक का विधिवत् उद्घाटन रांची के सरला बिरला स्कूल में पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन राव भागवत जी और सरकार्यवाह सुरेश भय्या जी जोशी ने किया.


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी ने प्रेस वार्ता में संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक के संबंध में जानकारी दी. उन्होंने कहा कि संघ की बैठक वर्ष में दो बार होती है, प्रतिनिधि सभा की बैठक मार्च में, जबकि कार्यकारी मंडल की बैठक विजयादशमी एवं दीपावली के बीच होती है. सामान्यतः इन बैठकों में संघ कार्य के विस्तार, गुणात्मकता की दृष्टि से प्रगति और समाज राष्ट्र जीवन में संघ कार्य के प्रभाव पर चर्चा एवं कार्यनीति की कई बातें तय करते हैं. समाज एवं राष्ट्रजीवन से संबंधित कुछ विषयों पर हिन्दू समाज के विचार एवं मन को व्यक्त करने वाले संघ की नीति और विचार से सुसम्बद्ध प्रस्ताव भी बैठक में पारित करते हैं.

सह सरकार्यवाह जी ने बताया कि 30 अक्टूबर से प्रारंभ तीन दिवसीय अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में 400 के लगभग संघ के अधिकारी भाग ले रहे हैं. इस बैठक में जनसंख्या असंतुलन पर हम लोग चर्चा करने वाले हैं. संघ के विस्तार का कार्य तो प्रतिदिन चलता रहता है, परंतु समय समय पर शाखाओं की संख्या बढ़ाने के लिए विशेष कार्य करते हैं. वर्तमान में देश के सभी खण्डों (प्रखण्डों) में संघ का कार्य चल रहा है. अगले तीन वर्षों में देश के सभी मण्डलों तक पहुंचने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. अभी देश के 32000 स्थानों पर 52000 शाखाएं चल रही हैं. रांची में 75 शाखाएं चल रही है. इसके साथ ही 13620 साप्ताहिक मिलन केन्द्र एवं 8000 स्थानों पर संघ मंडली चल रही है. शाखा में तरूणों की संख्या बढ़ी है, अभी 66 प्रतिशत शाखाएं छात्रों की है, 91 प्रतिशत शाखा 40 वर्ष से कम आयु के तरूणों की है. नए लोग संघ से जुड़ने के लिए उत्साहित हैं.

दत्तात्रेय जी ने कहा कि संघ के विभिन्न आयामों के माध्यम से भी लोग जुड़ रहे हैं. संघ का काम व्यक्ति निर्माण है, यह काम प्रत्येक दिन लगने वाली शाखा पर होता है. देश में 150 ग्राम विकास के केन्द्र चल रहे हैं. इसके प्रभाव से लोगों ने ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर जाना कम कर दिया है. संघ की ओर से गौ सेवा, सामाजिक समरसता व कुटुम्ब प्रबोधन के कार्य चलाए जा रहे हैं. संघ चाहता है कि समाज में समरसता का भाव बना रहे. प्रत्येक गांव एवं शहर में सभी जातियों के लिए एक श्मशान घाट हो, मंदिरों में सभी लोगों का प्रवेश हो, तालाब एवं कुआं में सभी जल ले सकें. इसका प्रभाव भी दिख रहा है. कुटुम्ब प्रबोधन के माध्यम से परिवारों में आत्मीयता हो, बच्चों में संस्कार आए, प्रत्येक घर में सेवा के भाव रहे इसका प्रयास चल रहा है.

आज भारत की गीता, योगदर्शन, तथागत विश्वमान्य हो रहे हैं – परम पूज्य डॉ. मोहन भागवत जी

Thursday, October 22, 2015
आज भारत की गीता, भारत का योगदर्शन, भारत के तथागत विश्वमान्य हो रहे हैं – डॉ. मोहन भागवत जी

परम पूज्य पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत का विजयादशमी उत्सव 2015 (गुरुवार दिनांक 22 अक्तुबर 2015) के अवसर पर दिया उद्बोधन -
नागपुर. कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि आदरणीय डॉ. वीके सारस्वत जी अन्य निमंत्रित अतिथि गण, उपस्थित नागरिक सज्जन, माता भगिनी तथा आत्मीय स्वयंसेवक बन्धु -
विजयादशमी के प्रतिवर्ष संपन्न होने वाले पर्व के निमित्त आज हम यहां एकत्रित हैं. संघ कार्य प्रारम्भ होकर आज 90 वर्ष पूर्ण हुए. यह वर्ष भारतरत्न डॉ. भीमराव जी उपाख्य बाबासाहेब आम्बेडकर की जन्मजयंती का 125वां वर्ष है. सम्पूर्ण देश में सामाजिक विषमता की अन्यायी नागपुर (1कुरीति को चुनौती देते हुए उन्होंने जीवनभर संघर्ष किया. स्वतंत्र भारत के संविधान में आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से उस विषमता को निर्मूल कर समता के मूल्यों की प्रतिष्ठापना करने वाले प्रावधान वे कर गये. संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के शब्दों में आचार्य शंकर की प्रखर बुद्धि व तथागत बुद्ध की असीम करुणा का संगम उनकी प्रतिभा में था.
गत वर्ष संघ के संस्थापक पू. डॉ. हेडगेवार जी की जयंती का भी 125वां वर्ष था. समतायुक्त शोषणमुक्त हिन्दू समाज के सामूहिक उद्यम के आधार पर संपूर्ण विश्व में उदाहरण स्वरूप परमवैभव संपन्न भारत के निर्माण का स्वप्न उन्होंने देखा था. उस लक्ष्य के लिये प्रामाणिकता से, निस्वार्थबुद्धि से व तन-मन-धन पूर्वक सतत् प्रयास करने वाले कार्यकर्ताओं के निर्माण की पद्धति देकर वे गये. उस कार्यपद्धति के जानकार, संघ के तृतीय सरसंघचालक स्व. बालासाहब देवरस का जन्मशती वर्ष प्रारम्भ हो रहा है. संघ की ही कार्यपद्धति में पले बढ़े तथा भारतीय दर्शनों के सनातन मूल्यों के आधार पर, राष्ट्र की व्यवस्था का संपूर्ण व युगानुकूल वैचारिक  दिग्दर्शन करनेवाले ‘एकात्म मानव दर्शन’ को देने वाले स्व. पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय का जन्मशतव्दी वर्ष भी प्रारम्भ हो चुका है.
नागपुर 1सुखद संयोग ऐसा है कि भारत में सुशासन का आदर्श प्रस्थापित कर, दक्षिणपूर्व एशिया महाद्वीप में अपनी सनातन भारतीय संस्कृति की मंगलसूचक पताका फहराने वाले राजराजेश्वर राजेन्द्र चोल महाराजा के राज्यारोहण का भी 1000वां वर्ष मनाया जा रहा है तथा, जाति, मत, पंथ के भेदों को पूर्णतः नकारकर, रूढ़ियों की बेड़ियों को तोड़कर भक्ति मार्ग को समाज के सभी घटकों के लिये खुला करते हुए, सामाजिक समरसता के जागरण का पुनः प्रवर्तन करने वाले श्री रामानुजाचार्य का 1000वीं जयंति का वर्ष भी अगले वर्ष संपन्न करने की तैयारी समाज में हो रही है. जम्मू-कश्मीर में शैव सिद्धान्त के महान आचार्य अभिनव गुप्त का भी यह 1000वीं जयंति का वर्ष चल रहा है. कर्मसु कौशलम् वसमत्व के साथ फलाशारहित निरन्तर विहित कर्म करने का संदेश देनेवाली श्रीमद्भगवद्गीता का 5151वां वर्ष गीता जयंती तक चलेगा.
इस वर्ष हमें छोड़ गये समाज के दो श्रद्धेय धुरीण, नई पीढ़ी में आत्मविश्वास  व देश गौरव जगाकर उन्हें देश के लिये हर क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करने की प्रेरणा देने में ही जीवन लगा देने वाले पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम, व वैदिक शिक्षक बनकर अपने समाज में तथा विश्व में सनातन संस्कृति के विषय में युगानुकूल दृष्टि, गौरव व सक्रियता जगाने वाले स्वामी दयानन्द सरस्वती, इन दोनों का जीवनकार्य व संदेश भी भारत गौरव व सामाजिक एकता ही था. इन सब संयोगों के स्मरण का कारण यही है कि आज भी हमारे आपके परिवारों से लेकर सम्पूर्ण विश्व की समृद्धि, शांति व उन्नति के लिए हमारा कर्तव्य भी हमें समृद्ध, समर्थ व समरस भारत के निर्माण के लिए आह्वान कर रहा है. संपूर्ण समाज की संगठित शक्ति के आधार पर विजय प्राप्त करने का पथ ही आज का विचारणीय विषय है.
नागपुर2जीवन के सब क्षेत्रों में विजिगीषु नीति के आधार पर स्वावलम्बी, सामर्थ्य संपन्न, वैभव संपन्न, पूर्ण सुरक्षित होकर, संपूर्ण विश्व को मंगलप्रद उत्कर्ष कारक नेतृत्व देने वाला भारत खड़ा करना तब सम्भव होगा जब, समतायुक्त, शोषणमुक्त, गौरव संपन्न, संगठित व प्रबुद्ध समाज का उद्यम उन नीतियों के समर्थन में चलेगा तथा ऐसे समाज की दृढ़ इच्छाशक्ति प्रजातांत्रिक व्यवस्था में चलने वाले तंत्र की तथा उसके संवैधानिक चालकों को दिग्दर्शक होगी. सजग, स्पष्ट, अचूक नीतियांतथा स्वार्थ भेदरहित विवेकी समाज यह दोनों कारक देश के भाग्य-परिवर्तन के लिए अनिवार्य है, इसलिए उनका उभयपक्षतः एक दूसरे से पूरक बनकर चलना आवश्यक है.
इस दृष्टि से जब आज के देश के परिदृश्य का विचार करते हैं, तब एक बहुत ही सुखद व आशादायक चित्र सामने आता है. दो वर्ष पूर्व में जो निराशा का, अविश्वास का, वातावरण था, वह अब प्रायः लुप्त हो गया है. अपेक्षाओं का तथा अपेक्षापूर्ति के विश्वास का वातावरण निर्माण हुआ है. उस वातावरण का साक्षात् अनुभव देश के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचे तथा, अपने स्वयं के अनुभव से, अपने व देश के भाग्य परिवर्तन में, समाज के विश्वास की मात्रा निरन्तर बढ़ती रहे, इसका ध्यान रखना होगा.
यह सभी अनुभव कर रहे हैं कि पिछले दो वर्षों में बहुत द्रुतगति से भारत की विश्व में प्रतिष्ठा बढ़ी है. पड़ोसी देशों से संबंध अपने देश का हित ध्यान में रखते हुए सुधारने के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाये गए हैं तथा वे सफल परिणाम भी दे रहे हैं. लगता है कि विश्व को आधुनिक भारत का एक अलग नया परिचय मिल रहा है. स्वगौरव तथा आत्मविश्वास से युक्त होकर, संपूर्ण विश्व के प्रति अपना परंपरागत सद्भावनापूर्ण नागपुर (3)दृष्टिकोण रखते हुए, दृढ़तापूर्वक देशहित की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय राजनय में दो टूक अपनी बात कहने वाला, विश्व के किसी भी देश में निर्माण हुए संकट में अपना मित्रतापूर्ण हाथ बढ़ाने वाला, भारत का नया अनोखा रूप धीरे-धीरे आकार लेता देख, विश्व के देश स्तब्ध, लुब्ध व नई आशा से आशान्वित हैं. भारत की गीता, भारत का योगदर्शन, भारत के तथागत विश्वमान्य हो रहे हैं. भारतीय मानस व परंपरा के श्रद्धा के विषयों पर ध्यान जाना तथा उनकी सुरक्षा व मानरक्षा के लिए नीतिगत पहल भी प्रारम्भ हुई है. तथाकथित महाशक्तियों के अवांच्छनीय प्रभाव जाल से मुक्त होने के लिए छटपटाने वाली विकसनशील दुनिया नेतृत्व के लिए भारत की ओर देख रही है. भारतवर्ष की उन्नत तथा अवनत अवस्था में भी उसने विश्व को अपना कुटुम्ब मानकर अपनी सजगता, दृढ़ता व शक्ति के आधारपर, राष्ट्रहित व विश्वहित, दोनों को प्रामाणिकता से साधने की परंपरा निभायी है. राजनय की उस शैली का थोड़ा-थोड़ा अनुभव पुनः मिलने लगा है. विश्व के सामने व देश के प्रत्येक घटक के अंतःकरण की अनुभूति में, भारत का यह देदीप्यमान स्वरूप पूर्णतः अवतरित हो, यह आवश्यक है. उसके लिए जीवन के सभी अंगों में नये विचार व नये पुरुषार्थ का प्रकटीकरण हमें करना होगा. युगयुग से चलते आये हमारे अक्षुण्ण राष्ट्रजीवन के मूल व सर्वहितकारी सत्य के आधार पर, युगानुकूल नीति, तद्नुकूल व्यवस्थाएं तथा उनको क्षमतापूर्वक धारणा करने वाले समाज का नया रूप गढ़ना पड़ेगा.
नागपुर3“साहेब वाक्यं प्रमाणम् की मानसिक दासता का मन से पूर्ण उच्चाटन करते हुए, भारतीय चित्त व मानस के आधार पर, विश्व से जो अच्छा, उचित व सत्य प्राप्त होता है, उसको देशोपयोगी बनाकर, अपने देश के लिये काल सुसंगत पथ का स्वतंत्र विचार तथा तदनुरुप समाज में, विद्वानों व चिन्तकों में, प्रशासकों व प्रशासनों में तथा शासन व नीतियों में विचार व आचरण का परिवर्तन किए बिना, विश्व को उदाहरण स्वरूप, स्वावलम्बी, समतायुक्त, शोषणमुक्त, सामर्थ्य संपन्न, समृद्ध भारत का निर्माण संभव नहीं. कई शतकों से विश्व का चिन्तन जिस दृष्टि पर आधारित है, उस दृष्टि का अधूरापन अब वैज्ञानिक कसौटियों पर भी सिद्ध हो रहा है तथा उस अधूरे चिन्तन के परिणामों के अनुभव भी उस दृष्टि व चिन्तन के ही पुनर्विचार की आवश्यकता अधोरेखित कर रहे हैं.
1951 में संयुक्त राष्ट्र संघ के सामाजिक व आर्थिक कार्यविभाग ने इस अधूरे चिन्तन का संपूर्ण समर्थन करते हुए यह कहा था – There is a sense in which rapid economic progress is impossible without painful adjustments. Ancient philosophies have to be scrapped; old social institutions have to disintegrate. Bonds of caste, creed and race have to burst and large numbers of persons who cannot keep up with the progress have to have their expectations of a comfortable life frustrated. Very few communities are willing to pay the full price of economic progress.
यह आत्यंतिक तक जडव़ादी, अहकेन्द्रित, मानवीय संवेदनशून्य दृष्टि विश्व पर थोपी गई, उसके सर्वविदित परिणामों के अनुभव जब इसके पुरस्कर्ताओं को भी होने लगे, तब उनकी इस भाषा में एकदम ”घूम जाव“(उलट) परिवर्तन दिखाई दिया. अक्तूबर 2005 में जी 20 राष्ट्रों के केन्द्रीय अधिकोषों के गवर्नरों का सम्मेलन कहता है – We note that development approaches are evolving over time and thus नागपुर (1)need to be updated as economic challenges unfold. —— We recognize there is no uniform development approach that fits all the countries. Each country should be able to choose the development approaches and policies that best suit its specific characteristics while benefitting from their accumulated experience in policy making over last decades, including the importance of strong macroeconomic policies for sustained growth.
बाद में 2008 में और अधिक स्पष्टता के साथ इसी बात को दोहराते हुए विश्व बैंक का समाचार बुलेटिन यह कहता है – In our work across the world we have learnt the hard way that there is no one model that fits all. Development is all about transformation. It means taking the best ideas, testing them in new situations and throwing away what doesn’t work. It means, above all, having the ability to recognize when we have failed. This is never an easy thing to do. It is ever more difficult for an organization to do so, be it the government or the World Bank, which constantly need to adapt to the changing nature of developmental challenge.
नागपुर (2)इस स्वानुभूति के बाद विष्व में विकास को लक्षित कर चलने वाले संवादों में ‘‘समग्र’’ (Holostic) ‘‘धारणक्षम विकास’’ (Sustainable development) आदि वाक् प्रयोगों का सुनाई देना प्रारंभ हुआ है तथा पर्यावरण की भी थोड़ी-थोड़ी चिंता होने लगी है. इसलिए प्रयोग-अनुभव-परिवर्तन के चक्र में से गुजरती हुई इस अधूरी दृष्टि को ध्रुव सत्य मानने के भ्रमजाल से मुक्त होकर, हमें अपनी स्वयं की समयसिद्ध शाश्वत दृष्टि के आधार पर ही चलना उपयुक्त होगा. वह दृष्टि समन्वय व सहयोग पर आधारित है. जीवन को अर्थ-काम प्रधान नहीं, धर्म व संस्कार प्रधान मानती है. धारणक्षम विकास के लिये कम से कम ऊर्जा व्यय, अधिकतम रोजगार, पर्यावरण, नैतिकता व कृषि के प्रति पूरकता तथा स्वावलम्बन व विकेन्द्रित अर्थतन्त्र का पुरस्कार करने वाले उद्योग तंत्र को मानती है. कौशल विकास तथा उत्पादन में वृद्धि पर उसका जोर रहता है. देश के सबसे अंतिम व्यक्ति की अभाव, अशिक्षा व अपमान से मुक्ति तथा ऐसे वर्ग का विकास इस अपनी दृष्टि में राष्ट्रीय विकास का आधार व विकास का प्रमाण माना जाता है. इसके लिए कृषि व किसान, लघु, मध्यम व कुटीर उद्योग; छोटे व्यापारी व कारीगर इनका अधिक ध्यान रखना पड़ेगा. आर्थिक, सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले सभी संगठनों, चिन्तकों कार्यकर्ताओं को, नीतिकारों को, शासन, प्रशासन सभी को यह दिशा ध्यान में रखना आवश्यक है.
आनन्द की बात है कि नीति आयोग के घोषणापत्र में इस दिशा के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं. स्पष्ट है कि यह परिवर्तन एकदम नहीं होगा. विरासत में मिली आर्थिक स्थिति के तल से सामान्य धरातल पर आना, अनेक राजनीतिक संतुलनों को तथा प्रशासकीय अनिवार्यताओं को साधने-पाटने की कसरत कर, देश के सामान्य वर्गों तक विकास का अनुभव पहुंचाना तथा उनका भी सहभाग प्राप्त करते हुए सबके विश्वास की स्थिरता व वृद्धि होती रहे यह देखना, धैर्यपूर्वक परिणामों की प्रतीक्षा करना यह सभी को करना पड़ता है. मुद्रा बैंक, जन-धन योजना, गैस सब्सिडी को छोड़ देने का आह्वान, स्वच्छ भारत अभियान, कौशल विकास, ऐसी कुछ उपयोगी पहल इस दृष्टि से सरकार के द्वारा की गयी हैं. विकास नीतियों के जमीन पर दिखने वाले परिणामों की यथातथ्य जानकारी मिलना तथा विकास में सभी को सहभागी बनाने की दृष्टि से सार्थक संवाद व क्रियान्वयन की गति को बढ़ाने की आवश्यकता लगती है.
देश के भाग्य परिवर्तन में सब प्रकार की नीतियों की सफलता सम्पूर्ण समाज के उद्यम, सहयोग क्षमता तथा समझदारी पर निर्भर करती है. समाज का प्रबोधन व प्रशिक्षण उसके लिए अनिवार्य शर्त है. आजकल विकास का विचार करते समय देश की जनसंख्या भी एक विचार का विषय बनता है. हमारे देश की जनसंख्या नियंत्रण नीति विचारपूर्वक बनानी पड़ेगी. जनसंख्या बोझ है या साधन है? दोनों प्रकार से विचार कर देखना चाहिए. 50 वर्षों के पश्चात् हमारे देश के संसाधन तथा व्यवस्थाएं कितने लोगों को पोषण रोजगार व जीवन विषयक अवसर तथा सुविधाएं दे सकेंगे? 50 वर्षों के पश्चात् हमारे देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए कितने हाथों की आवश्यकता रहेगी? सन्तान वृद्धि का कष्ट व उनके मन संस्कारित करने का कार्य माताओं को करना पड़ता है.
उनका पोषण, स्वास्थ्यरक्षण, मानमर्यादा का संरक्षण, उनका सशक्तिकरण, उनका प्रबोधन, उनके लिए अवसर तथा उसका लाभ ले सकने की स्वतंत्रता इन सबकी कैसी व्यवस्था है, वह कैसी होनी पड़ेगी? 50 वर्ष के बाद हमारे देश की पर्यावरण स्थिति की हमारी कल्पना क्या है? पिछले दो जनगणनाओं के आंकड़े प्रसिद्ध होने के पश्चात् जनसंख्या का स्वरूप व उसमें उत्पन्न हुआ, असंतुलन आदि की भी पर्याप्त चर्चा हो रही है. देश के वर्तमान तथा भविष्य पर उसके भी परिणाम होते हैं, हो रहे हैं. वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर इन सब बातों का समग्र विचार कर संपूर्ण देश की प्रजा के लिए समान जनसंख्या नीति बनाने की आवश्यकता है. वह नीति मात्र शासन तथा कानून के बल से लागू नहीं होती. उसके स्वीकार करने के लिए समाज का मन बनाने के प्रयास भी पर्याप्त मात्रा में करने पड़ते हैं. उनका भी विचार नीति बनाते समय ही कर लेना उचित रहेगा. मनुष्य की सहज प्रवृत्तियां, पंथ-संप्रदायों की आचरण परम्पराएं, समाज में चलती आई सांस्कृतिक परम्पराएं ये ऐसे विषय हैं, जिनमें, यदि देश काल परिस्थिति के अनुसार आवश्यक व उचित हो तो भी, वैसा परिवर्तन केवल कानून के परिवर्तन से, अथवा उसके पीछे खड़े किये शासन के दण्ड के बलमात्र से न कभी हुआ है, न कभी होगा. ऐसे परिवर्तनों के पहले व बाद में भी, समाज प्रबोधन द्वारा मन बनाने का सौहार्दपूर्ण प्रयास शासन, प्रशासन, माध्यम, तथा समाज के धुरीण व सज्जनों को सतत् करना पड़ता है. सस्ती लोकप्रियता अथवा राजनीतिक लाभ लेने के मोह से दूर रहते हुए, सत्य के ही दिग्दर्शन में, समाज के सभी वर्गों के प्रति आत्मीयतापूर्ण भाव रखकर ही, समाज का मन प्रबोधन के द्वारा बदला जा सकता है. हाल ही के दिनों में ऐसे कुछ निर्णय आये, जिससे संबंधित वर्गों में जो वेदना के भाव उभरे उनसे बचा जा सकता था.
उदाहरण के लिए जैन मतानुयायी वर्ग में संथारा, दिगंबर आचार्यों का विशिष्ट जीवनक्रम, बालदीक्षा आदि पद्धतियां पुराने समय से चली आ रही हैं. उन परम्पराओं के कारण, महत्व, तथा उनके पीछे का चिन्तन आदि को, पंथ-सम्प्रदायों के आचार्यों के साथ चर्चा कर गहराई के साथ समझे बिना उनसे छेड़छाड़ का परिणाम समाज के स्वास्थ्य, सौहार्द व अंततोगत्वा देश के लिए घातक होगा. प्रत्येक पंथसम्प्रदाय अपनी मान्यताओं एवं परम्पराओं का समय पर विश्लेषण कर, देश-काल-परिस्थिति के अनुसार उनमें बदल कर, मूल्यों के कालसुसंगत आचरण का रूप खड़ा करता जाता है, यह भी हमारे देश की ही परंपरा है. उसके अनुसार परम्पराओं का पुनर्विचार व परिवर्तन भी होना अच्छा है. परन्तु यह कार्य उस समूह के अंदर से ही हर बार किया गया है, बाहर से थोपने का प्रयास केवल विवादों को ही जन्म देता आ रहा है. कोई भी व्यवस्था परिवर्तन समाजमन परिवर्तन के बलपर ही यशस्वी हुआ है.
परिवर्तन के लिए समाज में एक महत्वपूर्ण साधन होता है शिक्षा की व्यवस्था. हाल के वर्षों में वह व्यापार का साधन बनती जा रही है. इसीलिए वह महंगी होकर सर्वसामान्य व्यक्ति की पहुंच के बाहर भी होती जा रही है. स्वाभाविक ही शिक्षा के उद्देश्य पूरे होते हुए समाज में दिखाई नहीं दे रहे हैं. शिक्षा का उद्देश्य विद्या दान के साथ-साथ, विवेक, आत्मभान व आत्मगौरव से परिपूर्ण, संवेदनशील, सक्षम, सुसंस्कृत मनुष्य  का निर्माण यह होना चाहिए. इस दृष्टि से समग्रता के साथ शिक्षापद्धति के अनेक प्रयोग विश्व में व देश में भी
चल रहे हैं. उन सारे प्रयोगों का ठीक से संज्ञान लेना चाहिए. उनके निष्कर्ष व अब तक शिक्षा के बारे में अनेक तज्ञों, संगठनों तथा आयोगों के द्वारा दिये गये उपयुक्त सुझावों का अध्ययन कर, पाठ्यक्रमों से लेकर शिक्षा संचालन, शुल्क व्यवस्था आदि शिक्षा पद्धति के सब अंगों तक में कुछ मूलभूत परिवर्तन लाने का विचार करना होगा. शिक्षा समाजाधारित होनी चाहिए. शिक्षा की दिशा उसके उद्देश्य व आज के समय की आवश्यकता दोनों की पूर्ति करने वाली हो, इतनी परिधि में पद्धति की स्वतन्त्रता भी देनी चाहिए. शिक्षा व्यापारीकृत न हो, इसलिए शासन को भी सभी स्तरों पर शिक्षा संस्थान अच्छी तरह चलाने चाहिए. सारी प्रक्रिया का प्रारम्भ शिक्षकों के स्तर की तथा उनमें दायित्वबोध की चिन्ता, उनके परिणामकारक प्रशिक्षण तथा मानकीकरण के द्वारा करने से होना पड़ेगा. परन्तु इन सबके साथ-साथ हम अभिभावकों, यानी समाज का भी दायित्व, इस प्रक्रिया में बहुत महत्व रखता है. क्या हम अपने घर के बालकों को अपने उदाहरण से व संवाद से यह सिखाते हैं कि जीवन में सफलता के साथ, किंबहुना उससे अधिक, महत्व सार्थकता का है? क्या हम अपने आचरण से सत्य, न्याय, करुणा, त्याग, संयम, सदाचार आदि का महत्व नई पीढ़ी के मन में उतारने में सफल हो रहे हैं? क्या हमारी पीढ़ी इस प्रकार के व्यवहार का आचरण हमारे सामाजिक व व्यावसायिक क्रियाकलापों में छोटे-मोटे लाभ-हानि की परवाह किये बिना आग्रहपूर्वक व सजगता के साथ कर रही है? हमारे करने, बोलने, लिखने से समाज विशेषकर नई पीढ़ी एकात्मता, समरसता व नैतिकता की ओर बढ़ रही है या नहीं इसका भान हम- समाज का प्रबोधन करने वाला नेतृवर्ग तथा माध्यम-रख रहे हैं क्या?
राज्यव्यवस्था, अर्थव्यवस्था आदि व्यवस्थाएं मनुष्यों के आचरण को नियंत्रित करती हैं, ”यथा राजा तथा प्रजा“; यह सत्य का एक पहलू है. इसलिए नीतियां समाज को जोड़ने वाली, दुर्बलतम घटक की उन्नति की चिन्ता करते हुए समाज के सभी घटकों की उन्नति का समन्वय साधने वाली होनी ही चाहिए. अपने देश का चुनाव तंत्र, प्रशासन, कर व्यवस्था, उद्योग नीति, शिक्षा नीति, कृषिनीति, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं आदि में अनेक मूलभूत सुधार कर उनको अधिक व्यवस्थित व लोकोपयोगी बनाने की आवश्यकता है, यह बात सही है.
पाकिस्तान की शत्रुता बुद्धि, चीन का विस्तारवाद, विश्व में बढ़ती हुई कट्टरता व अहंकार तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति की शतरंज में चली गई कूटनीतिक कुचालों के कारण उत्पन्न हुआ आतंकवादी ISIS का संकट, इन सबके परिणामस्वरुप अपने देश के सामने पहले से खड़ी सीमा सुरक्षा की व अतंर्गत सुरक्षा की समस्या और जटिल व गंभीर बनती जा रही है. बाहरी सत्ता से समर्थित अथवा बाहरी विचार से प्रेरित आतंकवाद के कारण गुमराह होकर उस गलत राह पर अग्रसर होने वाले कुछ लोग अपने देश में भी मिल जाते है.
हमारे विविधतापूर्ण समाज को संगठित कर सकने वाला सूत्र कौन सा है? (1) निश्चित ही वह, सब विविधताओं का स्वीकार व सम्मान करने वाली हमारी सनातन संस्कृति-हिन्दू संस्कृति है. वही सब भारतीयों का स्वभाव, उनकी मूल्य परंपरा है. (2) उस संस्कृति के आचरण को ही जिन हमारे पूर्वज महापुरुषों ने अपना जीवन बनाया, उसके पोषण संवर्धन के लिए अथक परिश्रम किया, उसकी सुरक्षा प्रतिष्ठा के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया, उनका गौरव हमारे लिए आज भी प्रेरणा व आदर्श बना हुआ है. (3) जिस सुजल-सुफल चैतन्यमयी मातृभूमि में हमें उस संस्कृति के आधारभूत सत्य का तथा तद्भूत धर्म का साक्षात्कार हुआ, जिसकी दिव्य समृद्धि व पोषण ने हमें उदारचेता व सत्प्रवृत्त बनाया, उसकी प्रेमभक्ति उन पूर्वजों से ही विरासत में हमें मिली. वह आज भी देश के प्रत्येक व्यक्ति के पुरुषार्थ जागृति का सामर्थ्य रखती है. इन तीनों सूत्रों से अपनी भाषा, प्रान्त, पंथ, पक्ष आदि की विविधता को सुरक्षित रखकर भी व्यक्ति सहज ही मनःपूर्वक जुड़ता है. अपनी छोटी पहचान सुरक्षित रखकर समाज की विशाल पहचान का अंग बन जाता है. इन तीनों सूत्रों के आधार पर विकसित मानवतापूर्ण पुरुषार्थ, दृष्टि, चिन्तन व तदनुरूप निर्णय, अविरोधी आचरण को ही हम हिन्दुत्व कहते हैं. ऐसे इस हिन्दू समाज का जीवन सनातन समय से – ”हिन्दू“ शब्द के उत्पन्न होने के बहुत पहले से – इसी त्रिसूत्री के आधार पर समयानुकूल रूपों को धारण करते चलता आया है. इस देश के हिताहित का दायित्व केवल और केवल उसका है. इस अपने हिन्दुस्थान देश का भाग्य और भवितव्य, हिंदू समाज के साथ एकरूप है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गत 90 वर्षों से देश के भाग्यविधाता हिन्दूसमाज को, देश के लिए उद्यम करने योग्य बनाने का अविरत प्रयत्न कर रहा है. संघ निर्माता डॉ. हेडगेवार जी ने यह अच्छी तरह समझ लिया था, कि देशहित, राष्ट्रहित, समाजहित के काम किसी को भी ठेके पर नहीं दिए जा सकते. समाज को ही संगठित व योग्य बनकर दीर्घकाल उद्यम करना पड़ता है, तब देश वैभव सम्पन्न बनता है. समाज की यह तैयारी कराने वाले कार्यकर्ताओं को गढ़ने का कार्य ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. संघ की सरल साद्गीपूर्ण कार्यपद्धति से तैयार होकर निकले स्वयंसेवकों का कर्तृत्व आज सबके सामने है, वे आज समाज के स्नेह विश्वास के कृतज्ञ भागी हैं, भारत के लिए जगन्मान्यता भी प्राप्त कर रहे हैं. आईये, हम सब इस पवित्र कार्य के सहयोगी कार्यकर्ता स्वयंसेवक बनें. क्योंकि दुनिया को आवश्यक प्रतीत होती हुई नई राह देने वाला भारत बनाने का एकमात्र पथ यही है. भारतीय समाज को अपनी सनातन पहचान के आधार पर दोषरहित व संगठित होना ही पड़ेगा. निःशंक, निर्भय होकर सब प्रकार के भेदों को समाप्त करने वाले व मनुष्य मात्र को वास्तविक स्वतंत्रता देकर उसमें मानवता व बंधुभाव भरने वाले धर्ममूल्यों के अमृत से सिंचित अपने व्यक्तिगत तथा सामूहिक आचरण से मानव समाज को सुख शांति व मुक्ति देनी होगी. यही उपाय है, यही करना है.
हिन्दू हिन्दू एक रहें, भेदभाव को नहीं सहें, संघर्षों से दुःखी जगत को, मानवता की शिक्षा दें..
”भारत माता की जय“

शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

शक्तिशाली समाज ही विजयशाली होती है : मा. क्षेत्र संघचालक डॉ. दर्शनलाल जी अरोड़ा


शक्तिशाली समाज ही विजयशाली होती है – डॉ. दर्शन लाल जी

मेरठ (विसंकें). मा. क्षेत्र संघचालक डॉ. दर्शन लाल अरोड़ा ने कहा कि जिस प्रकार भगवान राम ने साधारण जनजातियों का संगठन कर दुष्ट महाबली रावण व उसकी शक्तिशाली सेना पर विजय प्राप्त की. उसी प्रकार डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने हिन्दू समाज को संगठित करने का कार्य शरू किया. समाज को विस्मृति, जड़ता, दीनता से मुक्त कराने तथा अपनी शक्ति की पहचान कराने लिये 1925 में विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. क्षेत्र संघचालक जी त्यागी छात्रावास के मैदान में विजयादशमी के उपलक्ष्य में आयोजित शस्त्र पूजन कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि पूर्व में भारत एक वैभवशाली, शक्ति सम्पन्न राष्ट्र था. सिकन्दर की विशाल सेना को भी हमारे एक छोटे राज्य की सेना ने परास्त किया. इतनी धन सम्पदा थी कि विदेशियों की गिद्ध दृष्टि लगी रहती थी. हमारे पास विश्व को ज्ञान देने के लिये नालन्दा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय थे. लेकिन हम सैकड़ों वर्षों तक आक्रांताओं की दासता में रहे और संघर्ष करते रहना पड़ा. हमारी इस स्थिति का कारण था, एक राष्ट्र, एक समाज की भावना का पतन होना है. उन्होंने कहा कि असंगठित समाज, दुर्बल व पराधीन हो जाता है. जबकि शक्तिशाली समाज विजयशाली होता है. हमारे राष्ट्र की अधोगति का मुख्य कारण असंगठित हिन्दू समाज ही था. विगत 90 वर्षों के लगातार परिश्रम एवं प्रयासों से हिन्दू समाज में नव चेतना जगी है. उत्साह, विजयी भाव का संचार हुआ है. अनुकूल परिस्थितियों में कार्य की गति बढ़ रही है.

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रान्त संघचालक सूर्यप्रकाश जी ने की. इस अवसर पर सर्वप्रथम शस्त्र पूजन हुआ. तत्पश्चात पथ संचलन निकाला गया. पथसंचलन का स्थान-स्थान पर विजयी नारों एवं पुष्पवर्षा द्वारा भव्य स्वागत किया गया. कार्यक्रम में वरिष्ठ स्वयंसेवक, गणमान्यजन उपस्थित थे. बालकृष्ण नायक (अन्तर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, विश्व हिन्दू परिषद्), सोनपाल (संगठन मंत्री किसान संघ), अनिल जी (सेवा भारती), वरिष्ठ स्वयंसेवक रणजीत सिंह (95वर्ष) शामिल थे.

मानव कल्याण ही अंतिम उद्देश्य : माननीय सरकार्यवाह श्री सुरेश भय्या जी जोशी



मानव कल्याण ही हमारा अंतिम उद्देश्य – माननीय श्री  सुरेश भय्या जी जोशी
ठाणे (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह माननीय श्री सुरेश भय्या जी जोशी ने कहा कि नैतिक, धार्मिक, तथा मानव कल्याण के लिए भारत को विश्व का नेतृत्व करना आवश्यक है. जिसके लिए समाज का नेतृत्व करने वाले सामर्थ्यवान व्यक्तियों का निर्माण करने, तथा जागृत, निस्वार्थ, संगठित समाज खड़ा करने के लिए संघ निरंतर प्रयास कर रहा है. विश्व गुरू के पद पर विराजमान होने के लिए भारत को अभी बहुत मार्ग तय करना है. जिसके लिए संघ का प्रयास सही दिशा में आगे बढ़ रहा है, ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं. हमारे भारत देश को परम वैभव तक ले जाकर मानव कल्याण करना, यही हमारा अंतिम उद्देश्य है. सरकार्यवाह ठाणे में विजयादशमी के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में स्वयंसेवकों को संबोधित कर रहे थे. मंच पर उनके साथ जैनाचार्य सुरेश्वर मुनि, विभाग संघचालक मधुकर बापट, जिला संघचालक विवेकानंद जी, ह.भ.प. सद्गिर महाराज, इस्कॉन संस्था, चिन्मय मिशन तथा ज्यू समाज के प्रतिनिधि उपस्थित थे.

उन्होंने कहा कि संघ स्थापना की 90वीं सालगिरह यह कोई छोटा या बड़ी कालावधि नहीं है. अभी भी मंजिल तक पहुंचने के लिए लंबा रास्ता तय करना है. लेकिन अब संघ कार्य योग्य पथ पर है, ऐसे संकेत मिलने शुरू हुए हैं. कई देशों में संस्कृत श्लोक उद्घृत कर कार्यक्रमों का शुभारंभ करना, विश्व के 180 देशों का योग दिवस मनाना, भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को विश्व भर में मान्यता मिलना, यह एक अनूठी पहल है. वर्चस्ववादी मानसिकता के राष्ट्रों से अपने बचाव के लिए विश्व के कई देश भारत की ओर बड़ी आशा से देख रहे हैं. प्रकृति के साथ अनुकूल व्यवहार यह हमारी सभ्यता है, भारत देने वालों का देश है, न कि लेने वालों का. हमने अपने देश की सीमाओं के विस्तार के लिए कभी भी किसी पर आक्रमण नहीं किया. और इसीलिए अपनी और दूसरो की स्वतंत्रता का सम्मान भी हिन्दुत्व ही कर सकता है. हमारी हिंदू परंपरा और संस्कृति हजारों साल में विकसित हुई है. इस परिवर्तनकारी प्रक्रिया से दूर हमारी संस्कृति में कुछ दोष भी आए हैं, इस प्रक्रिया को कुछ अवांछनीय अभ्यास ने कुछ समय के लिए बाधित किया था. उन्होंने कहा कि सब जाति भेद मिटें, एक प्रांत खड़ा हो. धार्मिक समुदाय के बीच अंतर नहीं होना चाहिए. इसके लिए समाज सुधारकों को पहल करनी चाहिए. समाज से दोषों को दूर करने के लिए पहल करनी चाहिए. डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर,बालासाहेब देवरस, पं. दीनदयाल उपाध्याय, एकनाथ रानाडे,नानाजी देशमुख और अन्य हस्तियों के वैचारिक मार्गदर्शन पर अपना देश खड़ा है.

जैनाचार्य सुरेश्वर मुनि जी ने कहा कि हमारे देश में बहादुरी और वीरता की कमी है. लेकिन समाज बंटा होने के कारण विदेशी आक्रामक हमारी स्वतंत्रता छीन सके. आज भी भाषा और प्रांत भेद की आड़ में समाज को विघटित करने का प्रयास जारी है. लेकिन समग्र हिन्दू समाज के संगठन के लिए तथा भारत मां की सेवा के लिए संघ कार्य कर रहा है और इसीलिए यह विशेष कार्य है.

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2015

हिन्दू हिन्दू एक रहें : प.पू. सरसंघचालक भागवत जी




सरसंघचालक डॉ श्री मोहन जी भागवत द्वारा विजयादशमी उत्सव (गुरुवार दिनांक 22 अक्तुबर 2015) के अवसर पर दिये गये उद्बोधन का सारांश

कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि आदरणीय डॉ. वी. के. सारस्वत जी अन्य निमंत्रित अतिथि गण, उपस्थित नागरिक सज्जन, माता भगिनी तथा आत्मीय स्वयंसेवक बन्धु:-

श्री विजयादशमी के प्रतिवर्ष संपन्न होनेवाले पर्व के निमित्त आज हम यहाँ एकत्रित हैं। संघ कार्य प्रारम्भ होकर आज 90 वर्ष पूर्ण हुए। यह वर्ष भारतरत्न डॉ. भीमराव रामजी उपाख्य बाबासाहेब आम्बेडकर की जन्मजयंती का 125 वाँ वर्ष है। सम्पूर्ण देश में सामाजिक विषमता की अन्यायी कुरीति को चुनौति देते हुए उन्होंने जीवनभर संघर्ष किया। स्वतंत्र भारत के संविधान में आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से उस विषमता को निर्मूल कर समता के मूल्यों की प्रतिष्ठापना करनेवाले प्रावधान कर वे गये। संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के शब्दों में आचार्य शंकर की प्रखर बुद्धि व तथागत बुद्ध की असीम करुणा का संगम उनकी प्रतिभा में था।

गत वर्ष संघ के संस्थापक पू. डॉ. हेडगेवार जी की जयंती का भी 125 वाँ वर्ष था। समतायुक्त शोषणमुक्त हिन्दू समाज के सामूहिक उद्यम के आधार पर संपूर्ण विश्व में उदाहरणस्वरूप परमवैभव संपन्न भारत के निर्माण का स्वप्न उन्होंने देखा था। उस लक्ष्य के लिये प्रामाणिकता से, निस्वार्थबुद्धि से व तन-मन-धन पूर्वक सतत् प्रयास करनेवाले कार्यकर्ताओं के निर्माण की पद्धति देकर वे गये। उस कार्यपद्धति के जानकार, संघ के तृतीय सरसंघचालक स्व. बालासाहब देवरस का जन्मशती वर्ष प्रारम्भ हो रहा है। संघ की ही कार्यपद्धति में पले बढ़े तथा भारतीय दर्शनों के सनातन मूल्यों के आधार पर, राष्ट्र की व्यवस्था का संपूर्ण व युगानुकूल वैचारिक दिग्दर्शन करनेवाले ‘एकात्म मानव दर्शन’ को देनेवाले स्व. पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय का जन्मशताब्दि वर्ष भी प्रारम्भ हो चुका है।

सुखद संयोग ऐसा है कि भारत में सुशासन का आदर्श प्रस्थापित कर, दक्षिणपूर्व एशिया महाद्वीप में अपनी सनातन भारतीय संस्कृति की मंगलसूचक पताका फहरानेवाले राजराजेश्वर राजेन्द्र चोल महाराजा के राज्यारोहण का भी 1000 वाँ वर्ष मनाया जा रहा है तथा, जाति, मत, पंथ के भेदों को पूर्णतः नकारकर, रूढ़ियों की बेडियों को तोड़कर भक्ति मार्ग को समाज के सभी घटकों के लिये खुला करते हुए, सामाजिक समरसता के जागरण का पुनः प्रवर्तन करनेवाले श्री रामानुजाचार्य का 1000 वीं जयंति का वर्ष भी अगले वर्ष संपन्न करने की तैयारी समाज में हो रही है। जम्मू-कश्मीर में शैव सिद्धान्त के महान आचार्य अभिनव गुप्त का भी यह 1000 वीं जयंति का वर्ष चल रहा है। ”कर्मसु कौशलम्” व “समत्व“ के साथ फलाशारहित निरन्तर विहित कर्म करने का संदेश देनेवाली श्रीमद्भगवद्गीता का 5151 वाँ वर्ष गीता जयंती तक चलेगा।

इस वर्ष हमें छोड़ गये समाज के दो श्रद्धेय धुरीण, नई पीढ़ी में आत्मविश्वास व देशगौरव जगाकर उन्हें देश के लिये हर क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करने की प्रेरणा देने में ही जीवन लगा देने वाले पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम, व वैदिक शिक्षक बनकर अपने समाज में तथा विश्व में सनातन संस्कृति के विषय में युगानुकूल दृष्टि, गौरव व सक्रियता जगानेवाले स्वामी दयानन्द सरस्वती, इन दोनों का जीवनकार्य व संदेश भी भारत गौरव व सामाजिक एकता ही था।

इन सब संयोगों के स्मरण का कारण यही है कि आज भी हमारे आपके परिवारों से लेकर सम्पूर्ण विश्व की समृद्धि, शांति व उन्नति के लिए हमारा कर्तव्य भी हमें समृद्ध, समर्थ व समरस भारत के निर्माण के लिए आह्वान कर रहा है। संपूर्ण समाज की संगठित शक्ति के आधार पर विजय प्राप्त करने का पथ ही आज का विचारणीय विषय है।

जीवन के सब क्षेत्रों में विजिगीषु नीति के आधार पर स्वावलम्बी, सामर्थ्यसंपन्न, वैभवसंपन्न, पूर्ण सुरक्षित होकर, संपूर्ण विश्व को मंगलप्रद उत्कर्षकारक नेतृत्व देनेवाला भारत खड़ा करना तब सम्भव होगा जब, समतायुक्त, शोषणमुक्त, गौरवसंपन्न, संगठित व प्रबुद्ध समाज का उद्यम उन नीतियों के समर्थन में चलेगा; तथा ऐसे समाज की दृढ़ इच्छाशक्ति प्रजातांत्रिक व्यवस्था में चलनेवाले तंत्र की तथा उसके संवैधानिक चालकों को दिग्दर्शक होगी। सजग, स्पष्ट, अचूक नीतियाँ तथा स्वार्थभेदरहित विवेकी समाज यह दोनों कारक देश के भाग्य-परिवर्तन के लिए अनिवार्य है, इसलिए उनका उभयपक्षतः एक दूसरे से पूरक बनकर चलना आवश्यक है।

इस दृष्टि से जब आज के देश के परिदृश्य का विचार करते हैं तब एक बहुत ही सुखद व आशादायक चित्र सामने आता है। दो वर्ष पूर्व में जो निराशा का, अविश्वास का, वातावरण था वह अब प्रायः लुप्त हो गया है। अपेक्षाओं का तथा अपेक्षापूर्ति के विश्वास का वातावरण निर्माण हुआ है। उस वातावरण का साक्षात् अनुभव देश के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुँचे तथा, अपने स्वयं के अनुभव से, अपने व देश के भाग्य परिवर्तन में, समाज के विश्वास की मात्रा निरन्तर बढ़ती रहे, इसका ध्यान रखना होगा।

यह सभी अनुभव कर रहे हैं कि पिछले दो वर्षों में बहुत द्रुतगति से भारत की विश्व में प्रतिष्ठा बढ़ी है। पडोसी देशों से संबंध अपने देश का हित ध्यान में रखते हुए सुधारने के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाये गये हैं तथा वे सफल परिणाम भी दे रहे हैं। लगता है कि विश्व को आधुनिक भारत का एक अलग नया परिचय मिल रहा है। स्वगौरव तथा आत्मविश्वास से युक्त होकर, संपूर्ण विश्व के प्रति अपना परंपरागत सद्भावनापूर्ण दृष्टिकोण रखते हुए, दृढ़तापूर्वक देशहित की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय राजनय में दो टूक अपनी बात कहनेवाला, विश्व के किसी भी देश में निर्माण हुए संकट में अपना मित्रतापूर्ण हाथ बढ़ानेवाला, भारत का नया अनोखा रूप धीरे-धीरे आकार लेता देख, विश्व के देश स्तब्ध, लुब्ध व नई आशा से आशान्वित हैं। भारत की गीता, भारत का योगदर्शन, भारत के तथागत विश्वमान्य हो रहे हैं। भारतीय मानस व परंपरा के श्रद्धा के विषयों पर ध्यान जाना तथा उनकी सुरक्षा व मानरक्षा के लिए नीतिगत पहल भी प्रारम्भ हुई है। तथाकथित महाशक्तियों के अवांच्छनीय प्रभाव जाल से मुक्त होने के लिए छटपटानेवाली विकसनशील दुनिया नेतृत्व के लिए भारत की ओर देख रही है। भारतवर्ष की उन्नत तथा अवनत अवस्था में भी उसने विश्व को अपना कुटुम्ब मानकर अपनी सजगता, दृढ़ता व शक्ति के आधारपर, राष्ट्रहित व विश्वहित, दोनों को प्रामाणिकता से साधने की परंपरा निभायी है। राजनय की उस शैली का थोड़ा-थोड़ा अनुभव पुनः मिलने लगा है। विश्व के सामने व देश के प्रत्येक घटक के अंतःकरण की अनुभूति में, भारत का यह देदीप्यमान स्वरूप पूर्णतः अवतरित हो, यह आवश्यक है। उसके लिए जीवन के सभी अंगों में नये विचार व नये पुरुषार्थ का प्रकटीकरण हमें करना होगा। युगयुग से चलते आये हमारे अक्षुण्ण राष्ट्रजीवन के मूल व सर्वहितकारी सत्य के आधार पर, युगानुकूल नीति, तद्नुकूल व्यवस्थाएँ तथा उनको क्षमतापूर्वक धारणा करनेवाले समाज का नया रूप गढ़ना पड़ेगा।

“साहेब वाक्यं प्रमाणम्“ की मानसिक दासता का मन से पूर्ण उच्चाटन करते हुए, भारतीय चित्त व मानस के आधार पर, विश्व से जो अच्छा, उचित व सत्य प्राप्त होता है उसको देशोपयोगी बनाकर, अपने देश के लिये काल सुसंगत पथ का स्वतंत्र विचार तथा तदनुरुप समाज में, विद्वानों व चिन्तकों में, प्रशासकों व प्रशासनों में तथा शासन व नीतियों में विचार व आचरण का परिवर्तन किए बिना, विश्व को उदाहरणस्वरूप, स्वावलम्बी, समतायुक्त, शोषणमुक्त, सामर्थ्यसंपन्न, समृद्ध भारत का निर्माण संभव नहीं। कई शतकों से विश्व का चिन्तन जिस दृष्टि पर आधारित है उस दृष्टि का अधूरापन अब वैज्ञानिक कसौटियों पर भी सिद्ध हो रहा है तथा उस अधूरे चिन्तन के परिणामों के अनुभव भी उस दृष्टि व चिन्तन के ही पुनर्विचार की आवश्यकता अधोरेखित कर रहे हैं।

1951 में संयुक्त राष्ट्र संघ के सामाजिक व आर्थिक कार्यविभाग ने इस अधूरे चिन्तन का संपूर्ण समर्थन करते हुए यह कहा था - There is a sense in which rapid economic progress is impossible without painful adjustments. Ancient philosophies have to be scrapped; old social institutions have to disintegrate. Bonds of caste, creed and race have to burst and large numbers of persons who cannot keep up with the progress have to have their expectations of a comfortable life frustrated. Very few communities are willing to pay the full price of economic progress.

यह आत्यंतिक जड़वादी, अहंकेन्द्रित, मानवीय संवेदनशून्य दृष्टि विश्व पर थोपी गई, उसके सर्वविदित परिणामों के अनुभव जब इसके पुरस्कर्ताओं को भी होने लगे तब उनकी इस भाषा में एकदम घूम जाव (U turn) परिवर्तन दिखाई दिया। अक्तूबर 2005 में जी 20 राष्ट्रों के केन्द्रीय अधिकोषों के गवर्नरों का सम्मेलन कहता है:- We note that development approaches are evolving over time and thus need to be updated as economic challenges unfold. ------ We recognize there is no uniform development approach that fits all the countries. Each country should be able to choose the development approaches and policies that best suit its specific characteristics while benefitting from their accumulated experience in policy making over last decades, including the importance of strong macroeconomic policies for sustained growth.

बाद में 2008 में और अधिक स्पष्टता के साथ इसी बात को दोहराते हुए विश्व बैंक का समाचार बुलेटिन यह कहता है - In our work across the world we have learnt the hard way that there is no one model that fits all. Development is all about transformation. It means taking the best ideas, testing them in new situations and throwing away what doesn’t work. It means, above all, having the ability to recognize when we have failed. This is never an easy thing to do. It is ever more difficult for an organization to do so, be it the government or the World Bank, which constantly need to adapt to the changing nature of developmental challenge.

इस स्वानुभूति के बाद विश्व में विकास को लक्षित कर चलने वाले संवादों में ‘‘समग्र’’ (Holistic) “धारणक्षम विकास” (Sustainable development) आदि वाक् प्रयोगों का सुनाई देना प्रारंभ हुआ है तथा पर्यावरण की भी थोड़ी-थोड़ी चिंता होने लगी है। इसलिए प्रयोग-अनुभव-परिवर्तन के चक्र में से गुजरती हुई इस अधूरी दृष्टि को धृव सत्य मानने के भ्रमजाल से मुक्त होकर,  हमें अपनी स्वयं की समयसिद्ध शाश्वत दृष्टि के आधार पर ही चलना उपयुक्त होगा। वह दृष्टि समन्वय व सहयोग पर आधारित है। जीवन को अर्थ-काम प्रधान नहीं, धर्म व संस्कार प्रधान मानती है। धारणक्षम विकास के लिये कम से कम ऊर्जाव्यय, अधिकतम रोजगार, पर्यावरण, नैतिकता व कृषि के प्रति पूरकता तथा स्वावलम्बन व विकेन्द्रित अर्थतन्त्र का पुरस्कार करनेवाले उद्योग तंत्र को मानती है। कौशल विकास तथा उत्पादन में वृद्धि पर उसका जोर रहता है। देश के सबसे अंतिम व्यक्ति की अभाव, अशिक्षा व अपमान से मुक्ति तथा ऐसे वर्ग का विकास इस अपनी दृष्टि में राष्ट्रीय विकास का आधार व विकास का प्रमाण माना जाता है। इसके लिए कृषि व किसान, लघु, मध्यम व कुटीर उद्योग, छोटे व्यापारी व कारीगर इनका अधिक ध्यान रखना पड़ेगा। आर्थिक, सामाजिक क्षेत्र में काम करनेवाले सभी संगठनों, चिन्तकों कार्यकर्ताओं को, नीतिकारों को, शासन, प्रशासन सभी को यह दिशा ध्यान में रखना आवश्यक है।

आनन्द की बात है कि नीति आयोग के घोषणापत्र में इस दिशा के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। स्पष्ट है कि यह परिवर्तन एकदम नहीं होगा। विरासत में मिली आर्थिक स्थिति के तल से सामान्य धरातल पर आना, अनेक राजनीतिक संतुलनों को तथा प्रशासकीय अनिवार्यताओं को साधने-पाटने की कसरत कर, देश के सामान्य वर्गों तक विकास का अनुभव पहुँचाना तथा उनका भी सहभाग प्राप्त करते हुए सबके विश्वास की स्थिरता व वृद्धि होती रहे यह देखना, धैर्यपूर्वक परिणामों की प्रतीक्षा करना यह सभी को करना पड़ता है। मुद्रा बैंक, जन-धन योजना, गैस सब्सिडी को छोड़ देने का आवाहन, स्वच्छ भारत अभियान, कौशल विकास, ऐसी कुछ उपयोगी पहल इस दृष्टि से सरकार के द्वारा की गयी हैं। विकासनीतियों के जमीन पर दिखनेवाले परिणामों की यथातथ्य जानकारी मिलना तथा विकास में सभी को सहभागी बनाने की दृष्टि से सार्थक संवाद व क्रियान्वयन की गति को बढ़ाने की आवश्यकता लगती है।

देश के भाग्य परिवर्तन में सब प्रकार की नीतियों की सफलता सम्पूर्ण समाज के उद्यम, सहयोग क्षमता तथा समझदारी पर निर्भर करती है। समाज का प्रबोधन व प्रशिक्षण उसके लिए अनिवार्य शर्त है। आजकल विकास का विचार करते समय देश की जनसंख्या भी एक विचार का विषय बनता है। हमारे देश की जनसंख्या नियंत्रण नीति विचारपूर्वक बनानी पड़ेगी। जनसंख्या बोझ है या साधन है? दोनों प्रकार से विचार कर देखना चाहिए। 50 वर्षों के पश्चात् हमारे देश के संसाधन तथा व्यवस्थाएँ कितने लोगों को पोषण रोजगार व जीवनविषयक अवसर तथा सुविधाएँ दे सकेगें? 50 वर्षों के पश्चात् हमारे देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए कितने हाथों की आवश्यकता रहेगी? सन्तान वृद्धि का कष्ट व उनके मन संस्कारित करने का कार्य माताओं को करना पड़ता है। उनका पोषण, स्वास्थ्यरक्षण, मानमर्यादा का संरक्षण, उनका सशक्तिकरण, उनका प्रबोधन, उनके लिए अवसर तथा उसका लाभ ले सकने की स्वतंत्रता इन सबकी कैसी व्यवस्था है वह कैसी होनी पड़ेगी? 50 वर्ष के बाद हमारे देश की पर्यावरण स्थिति की हमारी कल्पना क्या है? पिछले दो जनगणनाओं के आँकड़े प्रसिद्ध होने के पश्चात् जनसंख्या का स्वरूप व उसमें उत्पन्न हुआ असंतुलन आदि की भी पर्याप्त चर्चा हो रही है। देश के वर्तमान तथा भविष्य पर उसके भी परिणाम होते हैं, हो रहे हैं। वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर इन सब बातों का समग्र विचार कर संपूर्ण देश की प्रजा के लिए समान जनसंख्या नीति बनने की आवश्यकता है। वह नीति मात्र शासन तथा कानून के बल से लागू नहीं होती। उसके स्वीकार करने के लिए समाज का मन बनाने के प्रयास भी पर्याप्त मात्रा में करने पड़ते हैं। उनका भी विचार नीति बनाते समय ही कर लेना उचित रहेगा।

मनुष्य की सहज प्रवृत्तियाँ, पंथ-संप्रदायों की आचरण परम्पराएँ, समाज में चलती आई सांस्कृतिक परम्पराएँ ये ऐसे विषय हैं जिनमें, यदि देश काल परिस्थिति के अनुसार आवश्यक व उचित हो तो भी, वैसा परिवर्तन केवल कानून के परिवर्तन से, अथवा उसके पीछे खड़े किये शासन के दण्ड के बलमात्र से न कभी हुआ है, न कभी होगा। ऐसे परिवर्तनों के पहले व बाद में भी, समाज प्रबोधन द्वारा मन बनाने का सौहार्दपूर्ण प्रयास शासन, प्रशासन, माध्यम, तथा समाज के धुरीण व सज्जनों को सतत् करना पड़ता है। सस्ती लोकप्रियता अथवा राजनीतिक लाभ लेने के मोह से दूर रहते हुए, सत्य के ही दिग्दर्शन में, समाज के सभी वर्गों के प्रति आत्मीयतापूर्ण भाव रखकर ही, समाज का मन प्रबोधन के द्वारा बदला जा सकता है। हाल ही के दिनों में ऐसे कुछ निर्णय आये जिससे संबंधित वर्गों में जो वेदना के भाव उभरे उनसे बचा जा सकता था। उदाहरण के लिए जैन मतानुयायी वर्ग में संथारा, दिगंबर आचार्यों का विशिष्ट जीवनक्रम, बालदीक्षा आदि पद्धतियाँ पुराने समय से चली आ रही हैं। उन परम्पराओं के कारण, महत्व, तथा उनके पीछे का चिन्तन आदि को, पंथ-सम्प्रदायों के आचार्यों के साथ चर्चा कर गहराई के साथ समझे बिना उनसे छेड़छाड़ का परिणाम समाज के स्वास्थ्य, सौहार्द व अंततो गत्वा देश के लिए घातक होगा। प्रत्येक पंथसम्प्रदाय अपनी मान्यताओं एवं परम्पराओं का समय-समय पर विश्लेषण कर, देश-काल-परिस्थिति के अनुसार उनमें बदल कर, मूल्यों के कालसुसंगत आचरण का रूप खड़ा करता जाता है यह भी हमारे देश की ही परंपरा है। उसके अनुसार परम्पराओं का पुनर्विचार व परिवर्तन भी होना अच्छा है। परन्तु यह कार्य उस समूह के अंदर से ही हर बार किया गया है, बाहर से थोपने का प्रयास केवल विवादों को ही जन्म देता आ रहा है। कोई भी व्यवस्था परिवर्तन समाजमन परिवर्तन के बलपर ही यशस्वी हुआ है।

परिवर्तन के लिए समाज में एक महत्वपूर्ण साधन होता है शिक्षा की व्यवस्था। हाल के वर्षों में वह व्यापार का साधन बनती जा रही है। इसीलिए वह महंगी होकर सर्वसामान्य व्यक्ति की पहुँच के बाहर भी होती जा रही है। स्वाभाविक ही शिक्षा के उद्देश्य पूरे होते हुए समाज में दिखाई नहीं दे रहे हैं। शिक्षा का उद्देश्य विद्यादान के साथ-साथ, विवेक, आत्मभान व आत्मगौरव से परिपूर्ण, संवेदनशील, सक्षम, सुसंस्कृत मनुष्य का निर्माण यह होना चाहिए। इस दृष्टि से समग्रता के साथ शिक्षापद्धति के अनेक प्रयोग विश्व में व देश में भी चल रहे हैं। उन सारे प्रयोगों का ठीक से संज्ञान लेना चाहिए। उनके निष्कर्ष व अबतक शिक्षा के बारे में अनेक तज्ञों, संगठनों तथा आयोगों के द्वारा दिये गये उपयुक्त सुझावों का अध्ययन कर, पाठ्यक्रमों से लेकर शिक्षा संचालन, शुल्क व्यवस्था आदि शिक्षा पद्धति के सब अंगों तक में कुछ मूलभूत परिवर्तन लाने का विचार करना होगा। शिक्षा समाजाधारित होनी चाहिए। शिक्षा की दिशा उसके उद्देश्य व आज के समय की आवश्यकता दोनों की पूर्ति करनेवाली हो, इतनी परिधि में पद्धति की स्वतन्त्रता भी देनी चाहिए। शिक्षा व्यापारीकृत न हो इसलिए शासन को भी सभी स्तरों पर शिक्षा संस्थान अच्छी तरह चलाने चाहिए। सारी प्रक्रिया का प्रारम्भ शिक्षकों के स्तर की तथा उनमें दायित्वबोध की चिन्ता, उनके परिणामकारक प्रशिक्षण तथा मानकीकरण के द्वारा करने से होना पड़ेगा।

परन्तु इन सबके साथ-साथ हम अभिभावकों, यानी समाज का भी दायित्व, इस प्रक्रिया में बहुत महत्व रखता है। क्या हम अपने घर के बालकों को अपने उदाहरण से व संवाद से यह सिखाते हैं कि जीवन में सफलता के साथ, किंबहुना उससे अधिक, महत्त्व सार्थकता का है? क्या हम अपने आचरण से सत्य, न्याय, करुणा, त्याग, संयम, सदाचार आदि का महत्व नई पीढ़ी के मन में उतारने में सफल हो रहे हैं? क्या हमारी पीढ़ी इस प्रकार के व्यवहार का आचरण हमारे सामाजिक व व्यावसायिक क्रियाकलापों में छोटे-मोटे लाभ-हानि की परवाह किये बिना आग्रहपूर्वक व सजगता के साथ कर रही है? हमारे करने, बोलने, लिखने से समाज विशेषकर नई पीढ़ी एकात्मता, समरसता व नैतिकता की ओर बढ़ रही है या नहीं इसका भान हम- समाज का प्रबोधन करनेवाला नेतृवर्ग तथा माध्यम-रख रहे हैं क्या?

राज्यव्यवस्था, अर्थव्यवस्था आदि व्यवस्थाएँ मनुष्यों के आचरण को नियंत्रित करती हैं, ”यथा राजा तथा प्रजा“, यह सत्य का एक पहलू है। इसलिए नीतियाँ समाज को जोड़नेवाली, दुर्बलतम घटक की उन्नति की चिन्ता करते हुए समाज के सभी घटकों की उन्नति का समन्वय साधनेवाली होनी ही चाहिए। अपने देश का चुनावतंत्र, प्रशासन, कर व्यवस्था, उद्योग नीति, शिक्षा नीति, कृषिनीति, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएँ आदि में अनेक मूलभूत सुधार कर उनको अधिक व्यवस्थित व लोकोपयोगी बनाने की आवश्यकता है, यह बात सही है। पाकिस्तान की शत्रुता बुद्धि, चीन का विस्तारवाद, विश्व में बढ़ती हुई कट्टरता व अहंकार तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति की शतरंज में चली गई कूटनीतिक कुचालों के कारण उत्पन्न हुआ आतंकवादी ISIS का संकट, इन सबके परिणामस्वरुप अपने देश के सामने पहले से खड़ी सीमा सुरक्षा की व अतंर्गत सुरक्षा की समस्या और जटिल व गंभीर बनती जा रही है। बाहरी सत्ता से समर्थित अथवा बाहरी विचार से प्रेरित आतंकवाद के कारण गुमराह होकर उस गलत राह पर अग्रेसर होने वाले कुछ लोग अपने देश में भी मिल जाते है। एक समग्र नीति बनाकर दृढतापूर्वक इन सब समस्याओं का पूर्ण निरसन करना शासन का कर्तव्य है यह बात सभी मानते है। सामाजिक, सांस्कृतिक जीवनमूल्यों का पोषण हो, उसके क्षरण का चला हुआ क्रम बंद हो इसलिये नैतिक शिक्षा का सुयोग्य प्रावधान शिक्षा नीति में लाना, संवाद माध्यमों के द्वारा जाने अनजाने कोई कुप्रभाव निर्माण न हो ऐसा उनकी स्वतंत्रता को कायम रखते हुए नियंत्रण भी शासन के विचार में आना चाहिये ऐसा भी अनेक लोग सोचते है। बनी हुई इन आशा एवं अपेक्षाओं के अनुरूप काम हों, जहाँ हो रहा है वहाँ गति बढ़े यह सोचना ठीक ही है। परन्तु इस सत्य का उतना ही प्रभावकारी दूसरा पहलू है कि दुनिया में व अपने देश में भी समाज की इच्छा, गुणवत्ता तथा संगठित अवस्था के संयोग से व्यवस्था व शासन नियंत्रित होते हैं। अपने स्वत्व की पहचान कर, अपने स्वगौरव के आधार पर, स्वार्थ व भेदों को मन से मिटाकर समाज जब देश के भाग्यपरिवर्तन के लिए खड़ा होकर चलना प्रारम्भ करता है तब व्यवस्थाएँ उसको सहायक होती हैं, परिवर्तन के पथ पर अग्रसर होती हैं तथा परिवर्तन में पूर्ण सहायक होती हैं। शासन, प्रशासन व प्रजा, तीनों के मन में स्वराष्ट्रस्वरूप की पूर्ण स्पष्टता, उसके प्रति गौरवबोध, प्रामाणिक राष्ट्रनिष्ठा, सुसंगठित अवस्था व उनके आधार पर सदिश चिन्तन तथा दीर्घोद्योग की क्षमता होती है तब ही कोई राष्ट्र सुरक्षित, प्रतिष्ठित, सम्पन्न व सुखी बनता है।

हमारे विविधतापूर्ण समाज को संगठित कर सकनेवाला सूत्र कौन सा है? (1) निश्चित ही वह, सब विविधताओं का स्वीकार व सम्मान करनेवाली हमारी सनातन संस्कृति-हिन्दू संस्कृति है। वही सब भारतीयों का स्वभाव, उनकी मूल्यपरंपरा है। (2) उस संस्कृति के आचरण को ही जिन हमारे पूर्वज महापुरुषों ने अपना जीवन बनाया, उसके पोषण संवर्धन के लिए अथक परिश्रम किया, उसकी सुरक्षा प्रतिष्ठा के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया, उनका गौरव हमारे लिए आज भी प्रेरणा व आदर्श बना हुआ है। (3) जिस सुजल-सुफल चैतन्यमयी मातृभूमि में हमें उस संस्कृति के आधारभूत सत्य का तथा तद्भूत धर्म का साक्षात्कार हुआ, जिसकी दिव्य समृद्धि व पोषण ने हमें उदारचेता व सत्प्रवृत्त बनाया, उसकी प्रेमभक्ति उन पूर्वजों से ही विरासत में हमें मिली। वह आज भी देश के प्रत्येक व्यक्ति के पुरुषार्थ जागृति का सामर्थ्य रखती है। इन तीनों सूत्रों से अपनी भाषा, प्रान्त, पंथ, पक्ष आदि की विविधता को सुरक्षित रखकर भी व्यक्ति सहज ही मनःपूर्वक जुड़ता है। अपनी छोटी पहचान सुरक्षित रखकर समाज की विशाल पहचान का अंग बन जाता है। इन तीनों सूत्रों के आधारपर विकसित मानवतापूर्ण पुरुषार्थ, दृष्टि, चिन्तन व तदनुरूप निर्णय, अविरोधी आचरण को ही हम हिन्दुत्व कहते हैं।

ऐसे इस हिन्दुसमाज का जीवन सनातन समय से - ”हिन्दू“ शब्द के उत्पन्न होने के बहुत पहले से - इसी त्रिसूत्री के आधार पर समयानुकूल रूपों को धारण करते चलता आया है। इस देश के हिताहित का दायित्व केवल और केवल उसका है। इस अपने हिन्दुस्थान देश का भाग्य और भवितव्य, हिंदू समाज के साथ एकरूप है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गत 90 वर्षों से देश के भाग्यविधाता हिन्दूसमाज को, देश के लिए उद्यम करनेयोग्य बनाने का अविरत प्रयत्न कर रहा है। संघ निर्माता डॉ. हेडगेवार जी ने यह अच्छी तरह समझ लिया था, कि देशहित, राष्ट्रहित, समाजहित के काम किसी को भी ठेके पर नहीं दिए जा सकते। समाज को ही संगठित व योग्य बनकर दीर्घकाल उद्यम करना पड़ता है तब देश वैभवसम्पन्न बनता है। समाज की यह तैयारी करानेवाले कार्यकर्ताओं को गढ़ने का कार्य ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। संघ की सरल साद्गीपूर्ण कार्यपद्धति से तैयार होकर निकले स्वयंसेवकों का कर्तृत्व आज सबके सामने है, वे आज समाज के स्नेह विश्वास के कृतज्ञ भागी हैं, भारत के लिए जगन्मान्यता भी प्राप्त कर रहे हैं।

आईये, हम सब इस पवित्र कार्य के सहयोगी कार्यकर्ता स्वयंसेवक बनें। क्योंकि दुनिया को आवश्यक प्रतीत होती हुई नई राह देनेवाला भारत बनाने का एकमात्र पथ यही है। भारतीय समाज को अपनी सनातन पहचान के आधार पर दोषरहित व संगठित होना ही पड़ेगा। निःशंक, निर्भय होकर सब प्रकार के भेदों को समाप्त करनेवाले व मनुष्य मात्र को वास्तविक स्वतंत्रता देकर उसमें मानवता व बंधुभाव भरनेवाले धर्ममूल्यों के अमृत से सिंचित अपने व्यक्तिगत तथा सामूहिक आचरण से मानव समाज को सुख शांति व मुक्ति देनी होगी।
यही उपाय है, यही करना है-
हिन्दू हिन्दू एक रहें
भेदभाव को नहीं सहे
संघर्षों से दुःखी जगत को
मानवता की शिक्षा दें।।
भारत माता की जय

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

विजयादशमी - परंपरा शक्ति पूजन की






विजयादशमी - परंपरा शक्ति पूजन की
-प्रो. योगेश चन्द्र शर्मा

शक्ति की कामना और तदनुसार उसकी उपासना, आदिकाल से ही मनुष्य की सहज स्वाभाविक प्रवृत्ति रही है। प्रारंभ में शक्ति-प्राप्ति का उद्देश्य केवल शिकार करना और उससे अपना पेट भरना था। इसलिए उस आदिम काल में पत्थरों के अनगढ़ से और बेडौल सी आकृति वाले हथियार ही पर्याप्त समझे जाते थे। उदरपूर्ति के इस उद्देश्य के साथ, आत्मसुरक्षा की भावना भी सहज रूप से जुड़ी हुई थी। धीरे-धीरे इन उद्देश्यों के साथ अन्य बातें भी जुड़तीं चली गईं जैसे विरोधियों को परास्त करना, उनकी सम्पत्ति (पशु, दास आदि) छीनना तथा अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाना आदि। ज्यों-ज्यों समाज का स्वरूप विकसित होता चला गया, त्यों-त्यों उसकी उलझने भी बढ़ती चली गईं और उसके साथ हथियारों का स्वरूप भी भयानक से भयानकतर बनता चला गया। पत्थरों के स्थान पर धाुत के हथियार बनने लगे। उनके आकार प्रकार में परिवर्तन हुए। बारुद के आविष्कार ने उन्हें एक नया मोड़ दिया। युद्ध का क्षेत्र जब भूमि से आगे समुद्र और आकाश तक बढ़ गया तो हथियारों की प्रहार क्षमता भी काफी बढ़ गई। आणविक शक्ति के आविष्कार ने हथियारों को एक क्रांतिकारी और खतरनाक मोड़ दिया। शक्ति की कामना, अब शक्ति-संचय की उग्र भावना के रूप में बदल गई तथा उसका उद्देश्य भी बहुमुखी हो गया। आत्मसुरक्षा तथा शत्रुओं को समाप्त करने की भावना के साथ राजनीतिक प्रभाव में वृद्धि की कामना और हथियारों का व्यापार करके धन कमाने की दुकानदारी लालसा भी काफी बड़ी मात्रा में इसके साथ जुड़ गई।
19वीं शताब्दी के मध्य में जब कुछ खतरनाक हथियार बनाये गए तो फ्रांस के एक युद्ध विशेषज्ञ ज्योमिनी ने घोषणा की थी कि उनसे अधिक खतरनाक बन ही नहीं सकते। किन्तु केवल एक शताब्दी के उपरान्त अगस्त 1945 में, जब परमाणु बमों ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी, दो हंसते चहकते शहरों को जलते शोलों के रूप में बदल दिया तो संपूर्ण विश्व आतंक से कांप उठा। ज्योमिनी की भविष्यवाणी गलत सिद्ध हो गई और संपूर्ण सृष्टि के भावी अस्तित्व के सामने एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लग गया। भविष्य से अज्ञात अमरीका अपनी इस अप्रत्याशित सफलता पर प्रसन्न हुआ। तत्कालीन राजनीति पर उसकी गहरी धाक जम गई, किन्तु दूसरी ओर अन्य देशों में इस बात के लिए प्रयत्न भी किये जाने लगे कि वे अमरीका के इस नए हथियार का कोई उचित उत्तर ढूंढें। तदनुसार अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में हथियारों की नये सिरे से होड़ शुरू हो गई। इस होड़ का ही परिणाम यह रहा कि केवल चार वर्ष बाद 1949 में सोवियत संघ ने अपना प्रथम परमाणु विस्फोट करके इस क्षेत्र में अमरीका के एकाधिकार को समाप्त कर दिया। इसके उपरान्त 1952 में इंग्लैंड, 1960 में फ्रांस तथा 1964 में चीन भी परमाणु शक्ति संपन्न देशों की बिरादरी में सम्मिलित हो गए। 1974 में भारत ने भी पोखरण में परमाणु विस्फोट करके इस क्षेत्र में अपनी पर्याप्त जानकारी का परिचय दे दिया। इसके 24 वर्ष बाद मई 1998 में भारत ने एक हाइड्रोजन सहित कुल पांच परमाणु बमों का विस्फोट करके अपने को परमाणु श्िाक्त संपन्न राष्ट्र प्रमाणित कर दिया। इसके केवल 15 दिन बाद 28 और 30 मई को पाकिस्तान ने भी परमाणु विस्फोट कर दिये। अन्य अनेक देश भी परमाणु शक्ति के क्षेत्र में आगे बढ़ने का प्रयत्न करते रहे। इस समय लगभग एक दर्जन ऐसे देश हैं, जिन्हें पर्याप्त आणविक ज्ञान प्राप्त है तथा जो कभी भी परमाणु बम बना सकने में सक्षम हैं।
वैसे परमाणु बम बनाने की तकनीक अब न तो गोपनीय ही रह पायी है और न अत्यधिक उलझनपूर्ण। कुछ वर्ष पूर्व अमरीका के एक छात्र एरिस्टोटल फिलिप्स ने केवल बाजार में उपलब्ध पुस्तकों के आधार पर परमाणु बम बनाने का पूरा और सही तरीका अपने शोधग्रंथ में लिखकर दे दिया था। यह घटना परमाणु बम संबंधी ज्ञान के सहज सुलभ स्वरूप को प्रमाणित करती है। परमाणु बम बनाने में यदि कुछ कठिनाई है तो केवल कच्चे सामान और कुछ यंत्रों की ही। आये दिन हमें यूरेनियम तथा परमाणु बम के लिए आवश्यक अन्य वस्तुओं की चोरी के भी समाचार पढ़ने और सुनने को मिलते हैं। ऐसी स्थिति में यदि किसी दिन कोई समाजविरोधी आतंकवादी तत्व इन वस्तुओं और यंत्रों को हथियाकर परमाणु बम बना ले और उसके बल पर संपूर्ण विश्व को कोई धमकी दे डाले तो वह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं होगी।
अन्तरिक्ष से पृथ्वी पर या पृथ्वी से अंतरिक्ष में आक्रमण करने के लिए अमरीका और रूस में लेजर हथियारों पर भी काफी काम किया गया। 1980-81 में अमरीकी सरकार ने इस क्षेत्र में अनुसंधान कार्य पर 20 करोड़ डॉलर व्यय किए थे। 1983 में वह व्यय बढ़कर 40 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। इसके बाद भी इस पर अरबों डॉलर व्यय किये गए। विभिन्न प्रकार के रोगाणुओं को शत्रु सेना में फैलाने की तकनीक पर भी नये-नये प्रयोग किये गए हैं और उनमें सफलता प्राप्त की गईं है। इस दिशा में कुछ खतरनाक प्रयोग भी किये जा रहे हैं।
आणविक हथियारों को नियंत्रित करने के संदर्भ में अणु परीक्षण-निरोध-संधि की भी चर्चा की जा सकती है, जिसे वर्ष 1995 में स्थायी कर दिया गया। मगर यह संधि वर्तमान परमाणु शक्ति संपन्न देशों पर कोई विशेष प्रतिबंध नहीं लगाती, इसलिए पर्याप्त प्रचार के बावजूद इसका विशेष महत्व नहीं है। यह भी द्रष्टव्य है कि आणविक हथियारों को नियंत्रित करने वाली संभावित संधियों के पूरी तरह लागू होने के बाद भी परमाणु हथियारों का ज्ञान यथावत् सुरक्षित रहेगा और इसलिए आवश्यकता पड़ने पर इन हथियारों के पुनर्निमाण की आशंका को नहीं टाला जा सकता। वैसे भी युद्ध के समय किसी संधि का कोई नियंत्रण नहीं रह पाता। ऐसी स्थिति में परमाणु शस्त्रों की होड़ के समाप्त होने की कोई संभावना नहीं है। जहां तक पारंपरिक हथियारों की होड़ का प्रश्न हैं, उसमें भी कहीं कोई कमी नहीं। वह तो निरंतर वृद्धि की ओर ही है।
बड़ी शक्तियों के बीच हथियारों के लिए बढ़ती होड़ का स्वाभाविक परिणाम यह होता है कि उनके पास बच रहे पुराने हथियार व्यर्थ हो जाते हैं, किन्तु वही पुराने हथियार उन छोटे देशों के लिए बड़े उपयोगी होते हैं, जिनके पास खतरनाक और अधुनातन हथियार नहीं हैं या अपेक्षाकृत कम मात्रा में हैं। इससे बड़ी शक्तियां अपने पुराने हथियार उन्हें बेचकर हथियारों का व्यापार करने लगती हैं। वैसे तो हथियारों का अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर यह व्यापार चौदहवीं शताब्दी से ही उस समय प्रारंभ हो गया था, जब बारूद का आविष्कार हुआ था और उसके लिए बेल्जियम ने अपनी तोपों का विदेशों में निर्यात करना शुरू कर दिया था। किन्तु बड़े पैमाने पर व्यापार चमका द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ही। शस्त्रविक्रेता विभिन्न छोटे देशों के बीच हथियारों की होड़ शुरू करते हैं तथा अवसर मिलने पर उन्हें युद्ध के लिए भी उकसाते हैं, ताकि उनके हथियारों का परीक्षण हो जाए और तदनुसार गुणों के आधार पर उनका प्रचार हो सके। अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर ये शस्त्र विक्रेता विभिन्न देशों में विद्रोहियों को उभारने और उन्हें हथियार बेचने में भी संकोच नहीं करते। हथियारों का सबसे बड़ा व्यापारी-देश है अमरीका, जिसने केवल द्वितीय विश्वयुद्ध में 3637 अरब रुपए का सामान विदेशों को बेचा। इसके बाद भी 1955 तक उसका यह व्यापार 3000 अरब रुपए का रहा तथा अब इसमें कई गुणा वृद्धि हो चुकी है। दूसरा क्रम इंग्लैंड का है, जिसका इस अवधि में हथियारों का यह व्यापार 150 अरब रुपए का रहा तथा अब उसका भी यह व्यापार कई गुणा बढ़ चुका है। 1955 से तत्कालीन सोवियत संघ तथा फ्रांस भी इस व्यापारिक प्रतियोगिता में शामिल हो गए। फिर भी शीर्ष पर अमरीका ही रहा, जिसने 1967 से अब तक लगभग 1000 अरब डॉलर की धनराशि इस मद में केवल तीसरी दुनिया के देशों से कमायी। दूसरे नंबर के व्यापारी देश- पूर्व सोवियत संघ और अब रूस की यह आमदनी लगभग 700 अरब डॉलर रही। हथियारों के इस व्यापार और उसके फलस्वरूप निरंतर बढ़ रही हथियारों की होड़ ने गरीब और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को बिलकुल चौपट कर दिया।
द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति से अब तक संपूर्ण विश्व में लगभग एक लाख खरब डॉलर हथियारों पर व्यय किये जा चुके हैं। यदि इस धनराशि को विश्व के जनसमुदाय में बांटा जाता तो गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी जैसी समस्याएं सदैव के लिए समाप्त हो चुकी होतीं। इस तथ्य के बावजूद बड़ी शक्तियां हथियारों की अंधी दौड़ में निरंतर लिप्त हैं तथा संपूर्ण विश्व को विनाश की ओर ठेलती जा रही है।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आधुनिक शक्तिपूजा अपनी सामान्य स्थिति में न रहकर निरंतर भयानक बनती जा रही है। निश्चित ही शक्ति के प्रति मनुष्य की लालसा का मूलोच्छेदन नहीं किया जा सकता, मगर उसे नियंत्रित और मर्यादित अवश्य किया जा सकता है। संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए यह नियंत्रण आवश्यक है, मगर यह नियंत्रण सभी छोटे-बड़े देशों पर समान रूप से लागू हो, तभी सफलता की आशा की जा सकती है।  

विजय का प्रतीक विजयादशमी - डॉ़0 मनमोहन वैद्य





साधना और विजय का प्रतीक विजयादशमी

- डॉ़0  मनमोहन वैद्य
लेखक- रा.स्व.संघ के अ़ भा़ प्रचार प्रमुख  हैं  

विजयादशमी विजय का उत्सव मनाने का पर्व है। यह असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की, दुराचार पर सदाचार की, तमोगुण पर दैवीगुण की, दुष्टता पर सुष्टता की,भोग पर योग की, असुरत्व पर देवत्व की विजय का उत्सव है।
भारतीय संस्कृति में त्योहारों की रंगीन श्रृंखला गुंथी हुई है। प्रत्येक त्यौहार किसी न किसी रूप में कोई संदेश लेकर आता है। लोग त्योहार तो हषार्ेल्लास सहित उत्साहपूर्वक मनाते हैं किंतु उसमें निहित संदेश के प्रति उदासीन रहते हैं। विजयादशमी उत्सव यानी कि दशहरा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान श्रीराम के द्वारा दैत्यराज रावण का अंत किये जाने की प्रसन्नता व्यक्त करने के रूप में और मां दुर्गा द्वारा आतंकी महिषासुर का मर्दन करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इसके साथ इस पर्व का सन्देश क्या है इसके विषय में भी विचार करने की आज आवश्यकता है।
भारतीय संस्कृति हमेशा से ही वीरता की पूजक एवं शक्ति की उपासक रही है। शक्ति के बिना विजय संभव नहीं है। इसीलिए हिन्दुओं के सभी देवता कोई न कोई शस्त्र धारण किये हुए दिखाई देते हैं। इस शक्ति का उपयोग आवश्यकता पड़ने पर ही, आसुरी शक्ति या दुष्टता का विनाश कर धर्म की स्थापना के लिए किया गया है। इसलिए सुशील शक्ति की उपासना सतत् करते रहने की आवश्यकता है। यह सन्देश देने के लिए स्थान-स्थान पर शक्ति के प्रतीक के  रूप में विजयादशमी के निमित्त शस्त्र पूजन करने की परंपरा भारत में है।  
एक पुरुष कितना उत्तम हो सकता है, इसका आदर्श उदाहरण 'राम' हैं। वे सत्य, मर्यादा, विवेक, प्रेम व त्याग की पराकाष्ठा हंै। मानव से महामानव तक की संपूर्ण यात्रा हैं। इन गुणों के कारण ही भारतीय जनमानस आज सदियों के पश्चात् भी उनके आगे नतमस्तक है, उनके गुणगान सतत् कर रहा है। वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। दूसरी ओर रावण प्रतीक है अहंकार का, दुष्टता का, आत्मकेंद्रितता का, अभद्र सम्पन्नता का, उद्दंड भौतिकता का व अत्याचार का।
हमारे सभी के अन्दर राम और रावण दोनों विद्यमान होते हैं। उनका आपस में सतत् संघर्ष चलता रहता है। विजयादशमी के पर्व पर हमें संकल्प लेने चाहिए एवं प्रयास करना चाहिए कि हमारे अन्दर का राम शक्तिशाली हो, उस उद्दंड रावण को परास्त कर विवेकी राम की विजय हो।
हमारे राष्ट्र जीवन में भी राम एवं रावण दोनों विद्यमान हैं। कभी वह मारीच के समान सुवर्णमृग का लुभावना रूप लेकर आता है, या शूर्पनखा के रूप में झूठा आकर्षण लेकर आता है, या कभी खर दूषण के रूप में आतंकवादी बनकर अपनी प्राचीन संस्कृति पर खुला आक्रमण करता दिखता है, या अपने सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण का निमित्त बन रहा है या संस्कृति के प्रतीक एवं रक्षक ऐसे लोगों पर आक्रमण करते दिख रहा है। भगवान राम ने ऐसी राक्षसी राष्ट्र घातक वृत्ति एवं शक्ति को परास्त करने के लिए सभी राष्ट्रवादी, धर्मप्रेमी संस्कृति रक्षकों को एकत्र कर संगठित किया था और इस संगठित शक्ति के आधार पर रावण को तथा उसकी आसुरी शक्ति को परास्त किया था। श्रीराम की विजय में संगठित राष्ट्रीय शक्ति का जितना महत्व था उतना ही या उससे भी अधिक महत्व श्रीराम के शुद्घ आचरण एवं विशुद्घ चरित्र का था। इसलिए हिन्दू जीवन मूल्यों के प्रकाश में चरित्रवान लोगों के आचरण के द्वारा निर्माण होने वाली विजयशालिनी संगठित शक्ति के द्वारा ही समाज के रावण और आसुरी शक्ति को हम परास्त करने में सफल होंगे। ये रावण और उसके अनुचर सुदूर किसी एक विशिष्ट प्रदेश में नहीं हैं बल्कि समाजजीवन में जगह-जगह अपने उन्मादी अत्याचार एवं हिंसा करते दिखते हंै। इसलिए सारे देश में जागृत जनता के संगठित केंद्र जगह-जगह खड़े करने होंगे। ग्राम-ग्राम  तक ऐसी रामसेना खड़ी करने का उद्यम करना पड़ेगा। यह ग्राम-ग्राम की रामसेना अपनी संगठित शक्ति से तथा अपने विशुद्घ राष्ट्रीय आचरण द्वारा धमंर् एवं अपनी सनातन संस्कृति का रक्षण करने के राष्ट्रीय कार्य में सक्रिय हो। यही इस विजय पर्व का सन्देश है।
अलग-अलग युगों में रावण के भिन्न भिन्न चेहरे रहे हैं। आधुनिक परिवेश में विश्व के प्रत्येक राष्ट्र के समक्ष आतंकवाद का असुर सुरसा की भांति मुंह बाये खड़ा है। इसके साथ-साथ मंहगाई, बेरोजगारी, सामाजिक विषमता, जातिवाद, मजहबी अलगाववाद जैसी अनेकानेक समस्याएं आज हमारे अपने राष्ट्र के लिए चुनौती बनी हुई हैं। इनका समाधान करने के लिए निश्चित रूप से लोकनायक राम की भांति सीमित साधनों का विवेकपूर्ण रीति से उपयोग करके, शक्ति का उपयोग करना होगा। आज के संदर्भ में सभी समस्याओं का समाधान करने के लिए किसी का वध करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि रावण होने का अर्थ किसी व्यक्ति विशेष से नहीं है बल्कि उसकी सोच रावण है, उसके दृष्टिकोण में रावण है, उसकी मानसिकता में रावण है जो किसी दूसरे की प्रसन्नता और उन्नति देख द्वेष से भर उठती है। उनकी भावनाओं में रावण है जो अपने राष्ट्र एवं समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को विस्मृत कर देते हैं। उनके ज्ञान में रावण है जो मात्र धन के लिए अपने पद प्रतिष्ठा का दुरुपयोग करते हैं। हर व्यक्ति के अन्दर किसी न किसी रूप में एक रावण छिपा है। किंतु किसी व्यक्ति को मारने से रावण नहीं मरेगा अपितु उसके बुरे विचारों,  संकीर्ण मानसिकता, दृष्टिकोण आदि का सही ढंग से उपचार करना होगा। यह कार्य कठिन है किंतु असंभव नहीं। विजयादशमी का दिन ही विजय का है। यह विश्वास पुरातनकाल से चला आ रहा है। कहते हैं कि इस दिन ग्रह नक्षत्रों की स्थिति भी ऐसी होती है जिससे किए हुए कार्य में विजय निश्चित होती है। मां भगवती को इस दिन विजया के रूप में पूजा जाता है। विजयादशमी संकल्प लेने का, संकल्पित हो देश सेवा का व्रत लेने का पर्व है। अपने अंदर चरित्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण का व्रत लेने का पर्व है। लाखों संकट क्यों न आ जायें धैर्य नहीं खोना है। राम की भांति अटल रहेंगे तो विजय अवश्य ही होगी। समस्याओं का हल साधनों में नहीं साधना में निहित है। समाज परिवर्तन का संकल्प लेना होगा। मात्र अंधकार को कोसने से अंधकार नहीं मिटेगा। दीया जलाकर प्रकाश फैलाना होगा। चरैवेति-चरैवेति के अनुसार अपने कार्य में लगे रहकर लक्ष्य प्राप्ति तक,  विजय प्राप्ति तक पीछे मुड़कर नहीं देखना है।
इसी संकल्प को मन में सुदृढ़ता से धारण कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम सरसंघचालक परम पूज्य डा. हेडगेवार जी ने भारतमाता को परम् वैभव के स्थान पर प्रतिष्ठित करने के लिए सन् 1925 में विजयादशमी के दिन ही इस संगठन की स्थापना की थी जो कि आज एक सुदृढ़ वट वृक्ष का रूप धारण कर चुका है और अपनी जड़ें चारों दिशाओं में जमाये विश्व का सबसे बड़ा और मजबूत स्वयंसेवी संगठन है जोकि इस वर्ष विजयादशमी के दिन गौरवमयी 90 वर्ष पूर्ण करने जा रहा है। कितने विघ्न आये, बाधाएं आयीं किन्तु सभी स्वयंसेवक संगठित हैं, अटल हैं, ध्येय मार्ग पर अनवरत बढ़ते जा रहे हैं। हर हाल में राष्ट्र की रक्षा एवं उन्नति के लिए कृतसंकल्प हैं और निरंतर कार्यरत हैं और विजय की आशा में कर्तव्य पथ पर अग्रसर हैं । तो आइये, हम सब राष्ट्रभक्त इस विजय उत्सव पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी के जीवन से सात्विकता, आत्मीयता, निर्भीकता एवं राष्ट्र रक्षा की प्रेरणा लें तथा राष्ट्र विरोधी प्रच्छन्न तत्वों से संघर्ष करने के साहस का परिचय दें तो भारतवर्ष की एकता, अखंडता, नैतिकता तथा चारित्रिक सौम्यता के निर्माण के क्षेत्र में अद्भुत सराहनीय प्रयास होगा। यही हमारी विजय होगी, यही राष्ट्र के प्रति हमारी सवार्ेत्तम भेंट होगी।  

रविवार, 18 अक्तूबर 2015

पाकिस्तान से लेंगे आजादी : कांपा पाकिस्तान



पाकिस्तान से लेंगे आजादी : कांपा पाकिस्तान - प्रशान्त वाजपेयी

‘हम सब क्या चाहते -आजादी
पाकिस्तान से लेंगे- आजादी
यलगार से बोलो- आजादी
सब सोच के बोलो-आजादी
है जान हमारी -आजादी
है जान से प्यारी -आजादी ’
पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर, जिसे पाकिस्तान  ‘आजाद कश्मीर’ बोलता है, में हजारों युवकों, महिलाओं और बच्चों की भीड़ पाकिस्तानी फौजियों की संगीनों को मुंह चिढ़ाते हुए आजादी के नारे लगा रही थी। फौज की पिट्ठू स्थानीय पुलिस पंजाब (पाकिस्तानी पंजाब) से आयातित अपने अफसरों के हुक्म पर लोगों पर बर्बरता से लाठियां बरसा रही थी। लोग ये भी जानते थे कि आईएसआई और मिलिटरी इंटेलीजेंस के लोग भीड़ में अपने आगामी शिकारों को चुन रहे हैं, लेकिन आजादी के निर्भीक स्वर वादी में गूंज   रहे थे।
आज पाक कब्जे वाले कश्मीर-गिलगित-बाल्टिस्तान में ऐसे प्रदर्शन आम बात हैं। इस प्रदर्शन के कुछ दिनों बाद ही 30 सितंबर 2015 को नवाज शरीफ संयुक्त राष्टÑसभा में कागज पर आंखें गड़ाए अपना भाषण पढ़ रहे थे, जिसका मजमून रावलपिंडी से स्वीकृत होकर आया था। मुट्ठी भर सुनने वाले ऊबे हुए थे, क्योंकि वे इस सालाना पाकिस्तानी राग के लफ्जों को नवाज के आगे-आगे भी दुहरा सकते थे। मायूस नवाज ने दुनिया में ‘मुस्लिमों की दुर्दशा’ का रोना रोया। कश्मीर की तरफ लोगों का ध्यान खींचने के लिए उन्हें उसकी तुलना फिलिस्तीन से करनी पड़ी। लेकिन हाथ कुछ आया नहीं। शरीफ के भाषण पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की छाया साफ देखी जा सकती थी। चूंकि संयुक्त राष्टÑ की इस सभा में मोदी आतंकवाद और उसके पोषकों की पहचान करने की बात उठा चुके थे इसलिए नवाज को (वास्तव में राहिल शरीफ को) वैश्विक मुस्लिम पीड़ितवाद या ‘मुस्लिमों की दुर्दशा’ का कार्ड खेलना जरूरी हो गया। बोझिल माहौल में हास्य का क्षण तब आया जब शरीफ ने भारत पर पाकिस्तान में आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाया और कश्मीर के ‘असैन्यीकरण’ का प्रस्ताव रखा।
भारत की तरफ से तत्काल उत्तरों की श्रृंखला शुरू हुई। पहली चोट विदेश मंत्रालय ने की। मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने ट्वीट किया-‘समस्या का समाधान कश्मीर के ‘असैन्यीकरण’ में नहीं बल्कि पाकिस्तान के विआतंकीकरण में है।’ शरीफ द्वारा भारत के अंतर्गत कश्मीर को फिलिस्तीन की गाजा पट्टी की तरह कब्जा किया गया क्षेत्र कहने पर स्वरूप का ट्वीट था-‘आपने कब्जे की बात सही कही है। बस कब्जा करने वाले के बारे में आप गलत हैं। हम पाक अधिकृत कश्मीर को शीघ्र खाली (पाकिस्तान द्वारा) करने की मांग करते हैं।’
आतंकवाद के मुद्दे पर घिर रहे पाकिस्तान का बचाव करने की जुगत में शरीफ ने अपने भाषण में चार सूत्रीय प्रस्तावों का वाग्जाल फेंका था, जिसमें पहला था, पाकिस्तान-भारत 2003 के नियंत्रण रेखा पर पूर्ण युद्धविराम समझौते का पालन करें। दूसरा, पाकिस्तान-भारत दोबारा पुष्टि करें कि वे किसी भी परिस्थिति में बल प्रयोग नहीं करेंगे और न ही बल प्रयोग की धमकी देंगे। तीसरा, कश्मीर के असैन्यीकरण के लिए कदम उठाए जाएं। और चौथा, दोनों विश्व के सबसे ऊंचे युद्धस्थल सियाचिन से अपनी सेनाएं हटाने की पहल करें, जैसी कि दोनों देशों के बीच 2005-2006 की बातचीत के बाद इस समझौते पर हस्ताक्षर होने की अपेक्षा की जा रही थी। लेकिन पाकिस्तान के इन दावों और इरादों का दम भारत के आम चुनावों ने पहले ही निकाल दिया था, जब देश की जनता ने एक नौकरशाह के स्थान पर एक जननेता को शासन की बागडोर सौंपी थी। सरकार के बदलते ही पाकिस्तान के लिए भी काफी कुछ बदल गया था। जिसकी बेचैनी पाकिस्तान आज भी छिपा नहीं पा रहा है।
सर्वप्रथम, नवाज शरीफ के चार सूत्रों का सिलसिलेवार विश्लेषण करते हैं। हाल ही में एनएसए स्तर की बातचीत रद्द होने के बाद भारतीय सीमा सुरक्षा बल और पाक रेंजर्स के बीच युद्ध-विराम उल्लंघन को लेकर बातचीत हुई। सीमा पर गोलीबारी रोकने को लेकर सहमति बनी। लेकिन चंद घंटों के अंदर ही पाकिस्तान की तरफ से गोलीबारी शुरू हो गयी। क्योंकि ठण्ड आने वाली है और घाटियों में बर्फ जमने से पहले भाड़े के जिहादियों को भारत में धकेलना जरूरी है। जाहिर है कि युद्धविराम को आतुर पाकिस्तानी फौजियों द्वारा आने वाले दिनों में भी गोलीबारी कर के घुसपैठियों को ‘कवर फायर’ दिया जाता रहेगा। इसी सिलसिले में अगस्त माह में संयुक्त राष्टÑ में पाकिस्तान की राजदूत द्वारा सुरक्षा परिषद को पत्र लिखकर भारत द्वारा दस मीटर ऊंची और 135 फुट चौड़ी दीवार उठाने की तथाकथित योजना पर आपत्ति जताई गयी थी। पाकिस्तान की इस आशंका का आधार हिज्बुल मुजाहिदीन के दुर्दांत आतंकी सैयद सलाहुद्दीन की चिंता थी कि यदि ऐसी कोई दीवार बन गयी तो उसकी आतंक की दुकान का क्या होगा? नवाज के प्रथम सूत्र की यही अंतिम परिणति है।
पाकिस्तान के प्र्रधानमंत्री का दूसरा सूत्र, जिसमें दोनों देशों द्वारा किसी भी सूरत में बल प्रयोग करने अथवा धमकाने से परहेज रखने की बात कही गयी है, भी पूरी तरह अर्थहीन और ऐतिहासिक सच्चाइयों के विपरीत है। जन्म के समय से पाकिस्तान की सारी राजनीति ‘गजवा-ए-हिन्द’ अर्थात ‘काफिर हिन्दुस्तान पर इस्लामी सेनाओं की विजय’ के जुमले के इर्द-गिर्द घूमती रही है। पाकिस्तान की सेना और सियासतदान, दोनों ही भारत विरोध और कश्मीर एजेंडे को लेकर भड़काऊ बयानबाजी करते आये हैं। इसी अक्तूबर के प्रथम सप्ताह में राहिल शरीफ ने बयान दिया है कि ‘कश्मीर पाकिस्तान की रग में है। कश्मीर का मामला सुलझाए बिना भारत के साथ शांति नहीं हो सकती।’ और बात तो इतने पर भी खत्म नहीं होती। पाकिस्तान के जनरल खुले में और अकेले में कहते आये हैं कि केवल कश्मीर नहीं, जब तक पूरा हिंदुस्थान फतह नहीं हो जाता तब तक उसके खिलाफ जिहाद जारी रहेगा। भारत ने जब परमाणु परीक्षण किया, तो अपनी परमाणु नीति में स्पष्ट किया कि भारत के परमाणु हथियार किसी देश विशेष पर केंद्रित नहीं हैं बल्कि उसकी अपनी सुरक्षा के लिए हैं। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान की घोषित परमाणु नीति है कि उसके परमाणु हथियार सिर्फ और सिर्फ भारत के खिलाफ हैं। साथ ही पाकिस्तान अपने परमाणु जखीरे में लगातार बढ़ोत्तरी भी करता जा रहा है, जिससे विश्व समुदाय चिंतित है। आएदिन पाकिस्तान के राजनीतिज्ञ और सुरक्षा संस्थानों से जुड़े लोग भारत को परमाणु हमला करके तहस-नहस करने डींगें हांकते रहते हैं। भारत के साथ हुए सभी युद्धों की शुरुआत भी पाकिस्तान ने ही की है, और पिछले साढ़े तीन दशकों से भारत में आतंक का निर्यात कर रहा है। शरीफ का तीसरा सूत्र, जो अकेले भारत के हिस्से वाले कश्मीर के असैन्यीकरण के बारे में है, वास्तव में पाकिस्तान के खाकी वालों और आईएसआई का पुराना एजेंडा है। इस पर भारत के अंदर भी काफी बहस और राजनीति हो चुकी है, जिसका शिकार कश्मीर के सामान्य नागरिक और निहत्थे गश्त करते अर्धसैनिक बलों के दस्ते हुए हैं।
चौथा प्रस्ताव सियाचिन ग्लेशियर पर भारतीय सेना की मजबूत स्थिति और बढ़त को समाप्त करने की चीन और पाकिस्तान की संयुक्त कूटनीतिक चाल है। विश्व का सबसे ऊंचा युद्धस्थल सियाचिन, भारतीय सेना को बेहद महत्वपूर्ण सामरिक वरीयता दिलाता है। जिस किसी का भी सियाचिन पर नियंत्रण होगा उसकी धाक चीन के कब्जे वाले अक्साई चिन और शक्सगाम घाटी तथा पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान पर बनी रहेगी। कराकोरम राजमार्ग और अक्साई चिन के निकट भारत की ये प्रभावी उपस्थिति चीन और पाकिस्तान की सेनाओं को खटकती रही है।
1972 के शिमला समझौते के बाद पाकिस्तान सियाचिन पर अपना दावा जताता रहा था। 70 और 80 के दशक में अपने इस दावे को मजबूत करने के लिए पाकिस्तान ने विश्व के अनेक पर्वतारोही दलों को पाकिस्तान वाले हिस्से से सियाचिन की चोटियों पर चढ़ने के पास जारी करना शुरू कर दिए। 1978 में भारतीय सेना ने भी ऐसे पास जारी किये। आखिरकार 1983 में पाकिस्तानी जनरलों ने सियाचिन की रणनीतिक चोटियों पर चुपचाप घुसपैठ कर कब्जा जमाने की योजना बनाई। आॅपरेशन की तैयारियां शुरू हो गयीं। लेकिन पाकिस्तानियों की एक चूक से उनका खेल बिगड़ गया। सियाचिन योजना के भावी घुसपैठियों के लिए पाकिस्तानी सेना ने लंदन के एक निर्यातक से बड़ी मात्रा में बर्फीले स्थान पर पहनने वाली पोशाक एवं अन्य सामान खरीदने का आदेश दिया। इसी निर्यातक समूह से भारत भी खरीददारी करता था। भारतीय गुप्तचर तंत्र को भनक लगी और भारतीय सेना के कान खड़े हो गए। सूचना मिली कि पाकिस्तान की सैनिक टुकड़ी 17 अप्रैल 1984 को सियाचिन पर कब्जा करने वाली थी। भारतीय सैनिक टुकड़ी ने 13 अप्रैल को ही सियाचिन अपने कब्जे में ले लिया। अभियान का नाम था आॅपरेशन मेघदूत। चार दिन बाद निश्चिंतता से बढेÞ आ रहे पाकिस्तानी हिन्दुस्थान की सेना को पहले से ही वहां पाकर भौंचक रह गए। युद्ध हुआ। हमलावरों को पीछे हटना पड़ा और भारत द्वारा महत्वहीन समझकर छोड़ दिए गए स्थानों से ही संतोष करना पड़ा। तब से पाकिस्तानी फौज ने सियाचिन पर कब्जा करने के कई असफल प्रयास किये हैं। 1998 में कारगिल दुस्साहस उनकी आखिरी सैन्य कोशिश थी, जब उन्होंने कारगिल की चोटियों पर कब्जा करके सियाचिन को ही शेष भारत से अलग-थलग कर देने का प्रयास किया। लेकिन कारगिल में मुंह की खाने के बाद पाकिस्तानियों ने अपना तरीका बदला और कहना शुरू कर दिया कि इस भयंकर ठंडी, जीवन-रहित जगह पर फौज तैनात करने का कोई मतलब नहीं है और सियाचिन का विसैन्यीकरण कर देना चाहिए। सवाल ये है कि जब सियाचिन इतना ही अर्थहीन था तो पाकिस्तान ने अपने सैकड़ों फौजियों को उसके लिए हलाक क्यों करवाया?
संप्रग सरकार बनने के बाद पाकिस्तान ने सियाचिन पर अपने वाग्जाल को और फैलाना शुरू किया। इसके लिए बाकायदा लॉबिस्ट तैनात किये गए जिन्होंने भारत तथा विश्व मीडिया में विसैन्यीकरण की बात को उछालना शुरू किया। तर्क था कि सियाचिन पर मौसम के कारण जाने वाली जानें और अत्यधिक महंगी तैनाती के चलते दोनों सेनाओं द्वारा सियाचिन को खाली कर देना ही अच्छा होगा। कई शांति के ठेकेदार और पर्यावरणविद भी अपना हुनर बेच रहे थे। गुलयानी टेलोन नामक इटली के एक पर्यावरणविद ने 2003 की डर्बन कांफ्रेंस में सियाचिन शांति पार्क स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। मनमोहन सिंह इस झांसे में आने को तैयार हो गए और इस प्रस्ताव पर आगे बढ़ने की तैयारी करने लगे। मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू ने अपनी किताब ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में इस बात का जिक्र और समर्थन किया है। सरकार की इस पहल से भारतीय सेना में बेचैनी फैल गयी। कहा जाता है कि तब सेना ने अपने पूर्व सेनाध्यक्षों से संपर्क किया और इस गुपचुप ‘शांतिवार्ता’ को सार्वजनिक कर दिया। मनमोहन सिंह को पीछे हटना पड़ा।
सियाचिन को खाली करना भयंकर सैनिक भूल साबित होती। ये ग्लेशियर भारत के लिए सामरिक महत्व का तो है ही, लेकिन इसका अति महंगा और जानलेवा होना भी अब अतीत की बात होती जा रही है। आज भारत ने सियाचिन में अपना अच्छा-खासा आधारभूत सैन्य ढांचा तैयार कर लिया है। मौसम के कारण होने वाली सैनिक मृत्युदर में काफी गिरावट आई है और सैनिकों की तैनाती की कीमत भी जम्मू-कश्मीर के दूसरे पर्वतीय इलाकों में की जाने वाली सैन्य तैनाती जितनी ही हो गयी है। हां, पाकिस्तान के हालात जरूर खराब हैं, जिसके दर्जनों सैनिक हर साल सियाचिन के जानलेवा मौसम का शिकार हो रहे हैं। अप्रैल 2014 के हिमस्खलन में 140 पाकिस्तानी सैनिक जिन्दा दफन हो गए थे। सो अटकी पाकिस्तान की ही है। इसलिए नवाज शरीफ सियाचिन को लेकर शांतिदूत बने हुए हैं। और नवाज के मुंह से राहिल शरीफ ही बोल रहे हैं।
नवाज शरीफ को अगला उत्तर दिया विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने। संयुक्त राष्टÑ में श्रीमती स्वराज ने पाकिस्तान को जवाब देते हुए कहा कि ‘शान्ति की बात करनी है तो चार सूत्रों को छोड़िये। बातचीत सिर्फ एक सूत्र पर ही हो सकती है। आप आतंकवाद का रास्ता छोड़कर वार्ता की मेज पर आ जाइए। जैसा कि दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच जुलाई में उफा में तय हुआ था। सीमा पर शांति के लिए बात कीजिये, और आतंकवादद से जुडेÞ सभी मुद्दों पर एनएसए स्तर की बातचीत कीजिये।’विदेश मंत्री ने अपने भाषण में 2008 के मुंबई हमले में भारत के नागरिकों के अलावा अन्य अनेक देशों के नागरिकों के मारे जाने का भी जिक्र किया। ये एक अक्तूबर की बात है। अगले दिन 2अक्तूबर को लंदन की यात्रा पर गए हुए पाक फौज के प्रमुख राहिल शरीफ ने कश्मीर राग अलापना शुरू कर दिया।
   नवाज शरीफ की चार सूत्रीय पेशकश का तो पर्दाफाश हो गया, लेकिन जम्मू-कश्मीर को लेकर जब भी कूटनीतिक चर्चाएं होती हैं, तो परवेज मुशर्रफ के चार सूत्रीय फार्मूले की भी चर्चा होती है। और भारत के ‘बुद्धिजीवियों’ के एक तबके में बहुत अधिक होती है। इसलिए इस तथाकथित शांति फार्मूले के रणनीतिक आयामों पर चर्चा होना अति आवश्यक है, क्योंकि आज पाकिस्तान के कूटनीतिक प्रयास नाम-रूप बदलकर इसी के इर्द-गिर्द घूमते दिखाई देते हैं। भारत में भी मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग इसे खूब उछालता है। हास्यास्पद बात ये है कि वास्तव में ये फार्मूला क्या है, आज तक स्पष्ट नहीं है। संप्रग सरकार और स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जिसे लेकर आगे बढ़ने का मन बना चुके थे (संजय बारू ने इसके बारे में विस्तार से लिखा है), मुशर्रफ के उस तथाकथित शांति सूत्र के बारे में ये गोपनीयता आश्चर्यजनक और आपत्तिजनक है। छनकर बाहर आई बातों से पता चलता है कि ये फार्मूला प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पर्यटन फंतासी कि वे किसी दिन सुबह का नाश्ता दिल्ली में करने के बाद दोपहर का खाना लाहौर में खा सकें, के रंगों को लेकर बुना गया एक जाल था जिसके माध्यम से आईएसआई के कश्मीर सम्बन्धी सपनों को साकार होना था। मुशर्रफ का प्रस्ताव था कि एलओसी को ही वास्तविक सीमा रेखा मानते हुए, संविधान को यथावत रखते हुए, कश्मीर की सीमाओं को अप्रासंगिक बनाया जाए। अप्रासंगिक से अर्थ था कि कश्मीर घाटी और पाक-अधिकृत कश्मीर के बीच मुक्त आवागमन, व्यापार और पर्यटन के लिए सीमाएं खोली जाएं। इसके लिए जिन बातों को ‘आवश्यक’ माना गया था उनमें हुर्रियत कांफ्रेंस को मुख्यधारा में लाना, आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट को हटाना और तथाकथित मानव अधिकार उल्लंघन मामलों को प्राथमिकता से सुलझाना शामिल था। हमारे कर्णधार इन बातों को स्वीकार करके किस प्रकार भारत का हित साधने जा रहे थे ये आज भी रहस्य का विषय है। विचारणीय बात है कि आतंक को पालने-पोसने वाली जिहादी पाकिस्तानी फौज के एक तानाशाह पर आंख मूंदकर विश्वास करने के लिए भारतीय नेतृत्व कितना लालायित था। ये स्वप्नवादिता की अति थी। लेकिन क्या पाकिस्तान के इरादों को भांपना इतना कठिन था?
स्वयं मुशर्रफ का एक फौजी के रूप में सफर मुशर्रफ की पूरी सोच का खाका खींच देता है। 1964 में पाकिस्तानी फौज के आर्टिलरी विभाग के अफसर के रूप में शुरुआत करने वाले मुशर्रफ पर जिया उल हक की नजरे-इनायत हुई। कारण था इस्लामी कट्टरपंथियों से मुशर्रफ की नजदीकी। जिया उल हक और मुशर्रफ दोनों के जमाते इस्लामी पाकिस्तान से निकट सम्बन्ध थे। जिया ने मुशर्रफ को अफगान मुजाहिदीनों के प्रशिक्षण का काम सौंपा। जिहाद के लिए पैसा उगाहने के लिए मुशर्रफ ने मादक पदार्थ के तस्करों को पाला-पोसा। लादेन के साथ मिलकर काम किया। सितम्बर 1987 में सियाचिन के विला फण्डला में भारतीय सैन्य चौकी पर पाकिस्तानी सेना द्वारा किये गए असफल हमले के पीछे मुशर्रफ का ही दिमाग था। 90 के दशक के अंत में मुशर्रफ ने हरकतुल मुजाहिदीन, लश्करे तोयबा, तब्लीगी जमात जैसी तंजीमों से निकट के सम्बन्ध बनाए। कारगिल घुसपैठ की योजना भी वे लम्बे समय से बना रहे थे। जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज शरीफ के बीच लाहौर में वार्ता जारी थी, ठीक उसी समय परवेज मुशर्रफ अपनी कारगिल दुस्साहस योजना को अंतिम रूप दे रहे थे। इंडियन इंस्टिट्यूट आॅफ टॉपिकल स्टडीज ने कश्मीर मुद्दे पर मुशर्रफ के साक्षात्कारों और घोषणाओं को आधार बनाकर उनकी सोच का खाका खींचा है। कारगिल घटनाक्रम के परिणाम सामने आने से पहले मुशर्रफ के विचार इस प्रकार के थे-‘भाजपा कागजी शेरों की पार्टी है। पाकिस्तान की परमाणु और मिसाइल क्षमता के कारण पाकिस्तान द्वारा कारगिल की चोटियों पर कब्जा करने पर भारत उसका विरोध नहीं करेगा। परमाणु युद्ध का भय पश्चिमी देशों को हस्तक्षेप करने पर मजबूर करेगा, जिससे कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्टÑीयकरण हो जाएगा। और, पाकिस्तान युद्धविराम के लिए तभी तैयार होगा जब उसे भारतीय क्षेत्रों पर अपना कब्जा बनाए रखने की अनुमति दी जाएगी।’
कारगिल में मुंह की खाने के बाद मुशर्रफ के विचार और तरीके बदल गए-‘कश्मीर पर कब्जा बाद में भी किया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि कश्मीर में ठीक उसी प्रकार भारतीय सेना पर हमले किये जाएं जिस प्रकार अफगानिस्तान में मुजाहिदीनों द्वारा सोवियत सेनाओं पर किये गए थे।’ एक और महत्वपूर्ण बात जो मुशर्रफ के शांति प्रस्तावों की पोल खोलती है, वह है उनका खयाल कि-‘यदि कश्मीर मुद्दा सुलझ भी जाए तो भी भारत और पाकिस्तान के सम्बन्ध सामान्य नहीं हो सकते। भारत के एक बड़ी एशियाई शक्ति के रूप में उभरने के इरादे को पाकिस्तान ग्रहण लगाता रहेगा और इसीलिए चीन उसका समर्थन करता रहेगा।’ ये वह बात है जिसे आईएसआई का प्रचार तंत्र, पाकिस्तान की इस्लामी तंजीमें और लखवी तथा हाफिज सईद जैसे फौज के कारिंदे लगातार दुहराते रहते हैं।
   ये सारे खुलासे बताते हैं कि पाकिस्तान का फौजी इस्टैब्लिशमेंट आज भी इन्ही चालों पर कायम है। बीते दशकों में, सीधे संघर्ष में उलझने की भारत की हिचक, आतंकवाद पर लचर रवैया, परमाणु युद्ध का भयादोहन इत्यादि का पाकिस्तान लाभ उठाता आया है। शांति वार्ताओं की पेशकश में भी मुशर्रफ से लेकर राहिल शरीफ और नवाज शरीफ तक कुछ भी नहीं बदला है। बल्कि पाकिस्तान का जिहादी आतंकवाद का निर्माण ढांचा निरंतर मजबूत ही हुआ है। हिन्दू भारत नेस्तोनाबूद करने की पाकिस्तान के सर्वशक्तिमान फौजी इस्टैब्लिशमेंट की प्राथमिकता में भी रत्तीभर परिवर्तन नहीं आया है। अपने पूर्ववर्तियों की तरह ही नवाज शरीफ की हालत भी फौज के सामने पतली है। ऐसे में सियाचिन को खाली करने और कश्मीर की सीमाओं को खोलकर शांति स्थापित करने जैसी छल से भरी पाकिस्तानी बातों की बीन पर तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग को झूमना बंद कर देना चाहिए और वर्तमान सरकार के दृढ़ कदमों का समर्थन करना चाहिए।
अब बात एलओसी के दोनों तरफ बंटे हुए कश्मीर की। भारतीय हिस्से के कश्मीर में कुछ समय पूर्व लोकतांत्रिक तरीके से एक सरकार चुनी गयी। लोगों ने मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। बिना किसी दबाव के वोट डाले।   पिछले वर्ष जब कश्मीर में बाढ़ आई तो भारतीय सेना के जवानों और स्वयंसेवी संगठनों ने अपने राहत कार्यों से कश्मीरियों का दिल जीता। यही कारण है कि अलगाववादी नगर निगम का चुनाव लड़ने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। इन मुट्ठीभर अलगाववादियों, जो आज अप्रासंगिक हो चुके हैं, को भी अपनी बात कहने की छूट मिली हुई है। आज जम्मू-कश्मीर तरक्की की आस लगा रहा है। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर, गिलगित और बाल्टिस्तान में स्थानीय लोगों का आक्रोश चरम पर है। विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। जिन्हें पाकिस्तानी फौज कठोरता से कुचलने में लगी हुई है। निर्वासन में रह रहे यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष सरदार शौकत अली कश्मीरी कहते हैं, ‘पाकिस्तान उसके कब्जे वाले कश्मीर को आजाद कश्मीर कहता है, लेकिन यहां के लोग सिर्फ गुलाम हैं। कहने को पाकिस्तान ने इस इलाके को कुछ स्वायत्तता देकर स्थानीय सरकार का गठन किया है। लेकिन ये सिर्फ दिखावा है। हमारी किस्मतों का फैसला हम पर इस्लामाबाद द्वारा थोपे गए चार गैर कश्मीरी अफसर-आईजी पुलिस, चीफ सेक्रेटरी, फाइनेंस सेक्रेटरी और अकाउंटेंट जनरल-करते हैं। हमारे पास पढ़े-लिखे लोग हैं, लेकिन हम पर शासन करने वाला अधिकारी हमेशा बाहर से आता है। आईएसआई और फौज के लोग इस जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने वालों का अपहरण कर रहे हैं। उन्हें यातनाएं दे रहे हैं और चुन-चुन कर उनकी हत्याएं कर रहे हैं।’ 20 फरवरी को आल पार्टीज नेशनल अलायन्स ने गिलगित में एक सामूहिक रैली करके पाकिस्तान के कब्जे के खिलाफ एक होकर आवाज उठाई। इसी प्रकार संयुक्त राष्टÑ मानव अधिकार परिषद की 27वीं जेनेवा बैठक में भी यहां के निर्वासित नेता पहुंचे और पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर को इस्लामाबाद द्वारा शासित ‘कब्जाया गया क्षेत्र’ कहा। पाकिस्तान द्वारा गिलगित-बाल्टिस्तान को चीन को ‘बेच दिए जाने’ के खिलाफ भी लोगों में खासा गुस्सा है। द इंस्टिट्यूट फॉर गिलगित-बाल्टिस्तान स्टडीज के अध्यक्ष सेंजे एच़ सेरेंग कहते हैं, ‘चीन, ईरान और किर्गिस्तान से गैस-तेल मार्ग बना रहा है, जो गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरेगा। चीन और पाकिस्तान यहां मिलकर यूरेनियम, सोना, तांबा, संगमरमर और रत्नों का खनन कर रहे हैं। लेकिन यहां के लोगों की इस पैसे में कोई हिस्सेदारी नहीं है। चीन यहां राजमार्ग, बांध और सुरंगें बना रहा है। आज चीन और पाकिस्तान के साझे हित हैं। चीन संयुक्त राष्टÑ में पाकिस्तान के लिए बहुत महत्व रखता है। क्योंकि पाकिस्तान अपनी आर्थिक और सैन्य असफलताओं, भयानक होते अलगाववाद और अंतरराष्टÑीय मंचों पर कूटनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ने के भय से परेशान है। वहीं चीन पाकिस्तान का लाभ उठा कर उसे अपना मुहरा बना रहा है।’ एनएसएफ नामक संगठन चीन और पाकिस्तान द्वारा इस क्षेत्र के प्राकृतिक खजाने की लूट का विरोध कर रहा है। पुलिस और प्रशासन बर्बर दमन कर रहे हैं। लेकिन फिर भी नारे लग रहे हैं-‘मिटटी चोरों-पत्थर चोरों, अब हमारा पीछा छोड़ो।’
आर्थिक हालत खराब है। पाकिस्तान द्वारा यहां की बेशकीमती प्राकृतिक सम्पदा का भरपूर दोहन किया जा रहा है लेकिन तीन चौथाई स्थानीय लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं और उनकी आवाज उठाने के लिए कोई अधिकृत प्रामाणिक नेतृत्व नहीं है। आईएसआई और दूसरी खुफिया पाकिस्तानी संस्थाएं चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली करवाती हैं। विगत चुनावों में स्थानीय लोगों के भारी विरोध के बावजूद नवाज शरीफ के पिट्ठू चुनाव जीत गए। बल्वारिस्तान नेशनल फ्रंट के अध्यक्ष अब्दुल हामिद खान कहते हैं-‘यहां दुनिया को दिखाने के लिए चुनावों का तमाशा होता है। लोग किसी को भी वोट दें, जीतने वाले पहले से तय होते हैं। इस्लामाबाद में जिस पार्टी की सरकार होती है, वह अपने लोगों के नाम पहले तय कर देती है। बाद में उन्हें ही विजयी घोषित कर दिया जाता है। यहां इलेक्शन के नाम पर सिलेक्शन होता है।’ वे आगे कहते हैं, ‘पाकिस्तानी फौज और उसकी 22 खुफिया एजेंसियां यहां मौजूद हैं। चुनाव के पहले हमारे उम्मीदवारों का अपहरण कर लिया जाता है। बोलने की आजादी नहीं है, न्याय की आजादी नहीं है। ये कैसा आजाद कश्मीर है? आप आत्म-निर्णय करवाइये, पता चल जाएगा कि कितने लोग पाकिस्तान के साथ हैं और कितने हमारे साथ।’ इस इलाके को लेकर चीन और पाकिस्तान की साठ-गांठ पर अब्दुल कहते हैं, ‘गिलगित-बाल्टिस्तान को लेकर पाकिस्तान ने जो समझौता किया है, वह वास्तव में खुफिया सेल एग्रीमेंट है। जिन लोगों ने इसका विरोध किया और मामले को संयुक्त राष्टÑ के पर्यवेक्षकों तक ले जाने का प्रयास किया, उन्हें जेल में डालकर राजद्रोह की धाराएं लगायी गई हैं। राजद्रोह का कानून देश के नागरिकों के लिए होता है, हम पाकिस्तान के नागरिक नहीं हैं।’
विद्रोह की आशंकाओं से भयभीत पाकिस्तानी इस्टैब्लिशमेंट ने गिलगित-बाल्टिस्तान को टुकड़ों में बांट कर रखा है। इतने सालों बाद भी गिलगित-बाल्टिस्तान और तथाकथित आजाद कश्मीर के बीच सड़क बनाने की अनुमति नहीं दी गयी है, ताकि किसी प्रकार का संगठित विरोध संभव न हो सके। जो कश्मीरी गिलगित-बाल्टिस्तान जाने की कोशिश करते हैं, उन्हें मारा -पीटा जाता है और जेल में ठूंस दिया जाता है। सईद हसद नाम के एक प्रकाशक को ‘आजाद कश्मीर’ और गिलगित-बाल्टिस्तान का संयुक्त नक्शा छापने के जुर्म में अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। चुनावों में धांधली का विरोध करने वाले बाबा जान और उनके साथियों को 40 साल के लिए जेल में फेंक दिया गया है। किसी भी सरकारी नौकरी में जाने से पहले लोगों को कश्मीर पर पाकिस्तानी कब्जे को स्वीकार करने की शपथ लेनी पड़ती है। प्रकाशकों और अखबार मालिकों को भी ऐसा करना पड़ता है। कई पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। जिन लोगों को मारकर अधिकारी स्वयं विवाद में नहीं पड़ना चाहते उन्हें आतंकियों के हाथों सौंप देते हैं। ह्यूमन राइट्स वाच के अनुसार जब इस इलाके में भूकंप आया तो पाकिस्तान की फौज का असली चेहरा सामने आया। मुजफ्फराबाद के एक स्थानीय निवासी ने कहा-‘पाकिस्तान कहता है कि वह हमारा दोस्त है और भारत हमारा दुश्मन, लेकिन पाकिस्तान जैसा दोस्त हो तो के बाद दुश्मन की जरूरत किसे है।’ रिपोर्ट आगे कहती है कि भयंकर भूचाल के कारण आजाद कश्मीर के बड़े शहर और हजारों गांव धूल में मिल गए थे। 8000 लोग मारे गए और 20 लाख लोग बेघर हो गए। लेकिन बचाव कार्यों के लिए आई पाकिस्तानी सेना केवल यहां फंसे फौजियों की मदद कर रही थी। अंतरराष्टÑीय मीडिया ने मदद मांगते स्थानीय जन को दुत्कारते पाकिस्तानी फौजियों को फिल्माया कि उन्हें ऐसा करने के आदेश नहीं हैं। इन खबरों ने दुनिया के सामने ये साफ किया कि पाकिस्तान की इस कालोनी में फौज केवल विद्रोह के दमन और नियंत्रण लिए तैनात है। साल 2006 की मानव अधिकार रिपोर्ट के अनुसार ‘आजाद कश्मीर के एक नेता’ सैयद रजाक ने लिखा कि पाकिस्तान ने इस इलाके को अफगान-तालिबान जैसे आतंकियों की छावनियों में बदल दिया है। मुझे अब उन लोगों पर दया आती है, जिनका ‘ब्रेन वाश’ करके ये सोचने पर मजबूर किया गया है कि ‘एक देश’ उनका दुश्मन है। हर तरफ पहरा है। किसी के विचार की कोई कीमत नहीं है। पता नहीं कौन मूर्ख इसे आजाद कश्मीर कहता है।’दूर क्षितिज में एक तूफान आकार ले रहा है, जिसके बादलों का रंग खून जैसा लाल है। पाकिस्तान दुनिया में तथाकथित ‘गुलाम’ कश्मीर का तमाशा बनाने निकला है लेकिन तमाशा खुद उसका बन रहा है। ‘आजाद कश्मीर’ के लोग अपनी गुलामी के खिलाफ मुट्ठियां भींच रहे हैं। जुल्म और जबरदस्ती के बीच लोग नारे लगा रहे हैं -
 ‘हम लेके रहेंगे आजादी,
पाकिस्तान से लेंगे आजादी,
तेरा बाप भी देगा आजादी’
पाकिस्तान का ये ‘बाप’ खाकी पहनता है और पाकिस्तानियों का खून चूसकर दिन पर दिन तगड़ा होता जाता है। विश्व समुदाय ने यदि गंभीरता से ध्यान नहीं दिया तो गिलगित-बाल्टिस्तान, तथाकथित आजाद कश्मीर और बलूचिस्तान में पाक फौज एक बार फिर वैसी ही खून की होली खेलेगी जैसी कि उसने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में खेली थी। नवाज शरीफ जैसी कठपुतलियां तो आती-जाती रहेंगी।              

९ औषधियों में विराजती है नवदुर्गा

९ औषधियों में विराजती है नवदुर्गा
- अरविन्द कौशल कोटा





🌹मां दुर्गा नौ रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर उनके सारे संकट हर लेती हैं। इस बात का जीता जागता प्रमाण है, संसार में उपलब्ध वे औषधियां,
जिन्हें मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के रूप में जाना जाता है।
नवदुर्गा के नौ औषधि स्वरूपों को सर्वप्रथम मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया गया और चिकित्सा प्रणाली के इस रहस्य को ब्रह्माजी
द्वारा उपदेश में दुर्गाकवच कहा गया है।
ऐसा माना जाता है कि यह औषधियां समस्त प्राणियों के रोगों को हरने वाली और और उनसे बचा रखने के लिए एक कवच का कार्य करती हैं, इसलिए इसे दुर्गाकवच कहा गया। इनके प्रयोग से
मनुष्य अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष जीवन जी सकता है।
आइए जानते हैं दिव्य गुणों वाली नौ औषधियों को जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है।
🍁१ प्रथम शैलपुत्री यानि हरड़ - नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। कई
प्रकारकी समस्याओं में काम आने वाली औषधि हरड़, हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है, जो सात प्रकार
की होती है। इसमें हरीतिका (हरी) भय को हरने वाली है।
पथया - जो हित करने वाली है।
कायस्थ - जो शरीर को बनाए रखने वाली है।
अमृता - अमृत के समान
हेमवती - हिमालय पर होने वाली।
चेतकी -चित्त को प्रसन्न करने वाली है।
श्रेयसी (यशदाता)- शिवा कल्याण करने वाली।
🍁२ द्वितीय ब्रह्मचारिणी यानि ब्राह्मी -
ब्राह्मी, नवदुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। यह आयु और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रूधिर विकारों का नाश करने वालीऔर स्वर को मधुर करने वाली है। इसलिए ब्राह्मी को सरस्वती भी कहा
जाता है। यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है और गैस व मूत्र संबंधी रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ
औषधि है। अत: इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति को ब्रह्मचारिणी कीआराधना करना चाहिए।
🍁३ तृतीय चंद्रघंटा यानि चन्दुसूर-
नवदुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, इसे चन्दुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है, जो लाभदायक होती है।
यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है, इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं। शक्ति को बढ़ाने वाली, हृदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है।
अत: इस बीमारी से संबंधित रोगी को चंद्रघंटा की पूजा करना चाहिए।
🍁४ चतुर्थ कुष्माण्डा यानि पेठा -
नवदुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा है। इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है, इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक व रक्त के विकार को ठीक कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिकरूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान है। यह शरीर के समस्त दोषों को दूर कर हृदय रोग को ठीक करता है।
कुम्हड़ा रक्त पित्त एवं गैस को दूर करता है। इन बीमारी से पीड़ितव्यक्ति को पेठा का उपयोग के साथ कुष्माण्डादेवी की आराधना करना चाहिए।
🍁५ पंचम स्कंदमाता यानि अलसी -
नवदुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता है जिन्हें पार्वती एवं उमा भी कहते हैं। यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक
औषधि है।
अलसी नीलपुष्पी पावर्तती स्यादुमा क्षुमा।
अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके कदुर्गरु:।।
उष्णा दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।
इस रोग से पीड़ित व्यक्ति ने स्कंदमाता की
आराधना करना चाहिए।
🍁६ षष्ठम कात्यायनी यानि मोइया -
नवदुर्गा काछठा रूप कात्यायनी है। इसे आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका। इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ, पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है।
इससे पीड़ित रोगी को इसका सेवन व कात्यायनी की आराधना करना चाहिए।
सप्तमं कालरात्री ति महागौरीति चाष्टम।
🍁७ सप्तम कालरात्रि यानि नागदौन-
दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है जिसे
महायोगिनी, महायोगीश्वरी कहा गया है। यह नागदौन औषधि केरूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर
करने वालीऔषधि है।
इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगाने पर घर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह सुख देने वाली एवं सभी विषों का नाश करने वाली औषधि है। इस कालरात्रि की आराधना प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए।
🍁८ अष्टम महागौरी यानि तुलसी -
नवदुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधि नाम तुलसी है जो प्रत्येक घर में लगाई जाती है। तुलसी सात प्रकार की होती है- सफेद तुलसी,
काली तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है एवं हृदय रोग का नाश करती है।
तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी।
अपेतराक्षसी महागौरी शूलघ्नी देवदुन्दुभि: तुलसी कटुका तिक्ता हुध उष्णाहाहपित्तकृत् ।
मरुदनिप्रदो हध तीक्षणाष्ण: पित्तलो लघु:।
इस देवी की आराधना हर सामान्य एवं रोगी व्यक्ति को करना चाहिए।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिता
🍁९ नवम सिद्धिदात्री यानि शतावरी -
नवदुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिसे
नारायणी याशतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। यह रक्त विकार एवं वात पित्त शोध नाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है। सिद्धिदात्री का जो मनुष्य
नियमपूर्वक सेवन करता है। उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना चाहिए।
🌞इस प्रकार प्रत्येक देवी आयुर्वेद की भाषा में मार्कण्डेय पुराण के अनुसार नौ औषधि के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक कर रक्त का संचालन
उचित एवं साफ कर मनुष्य कोस्वस्थ करती है।
अत: मनुष्य को इनकी आराधना एवं सेवन करना चाहिए।