रविवार, 18 अक्तूबर 2015

पाकिस्तान से लेंगे आजादी : कांपा पाकिस्तान



पाकिस्तान से लेंगे आजादी : कांपा पाकिस्तान - प्रशान्त वाजपेयी

‘हम सब क्या चाहते -आजादी
पाकिस्तान से लेंगे- आजादी
यलगार से बोलो- आजादी
सब सोच के बोलो-आजादी
है जान हमारी -आजादी
है जान से प्यारी -आजादी ’
पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर, जिसे पाकिस्तान  ‘आजाद कश्मीर’ बोलता है, में हजारों युवकों, महिलाओं और बच्चों की भीड़ पाकिस्तानी फौजियों की संगीनों को मुंह चिढ़ाते हुए आजादी के नारे लगा रही थी। फौज की पिट्ठू स्थानीय पुलिस पंजाब (पाकिस्तानी पंजाब) से आयातित अपने अफसरों के हुक्म पर लोगों पर बर्बरता से लाठियां बरसा रही थी। लोग ये भी जानते थे कि आईएसआई और मिलिटरी इंटेलीजेंस के लोग भीड़ में अपने आगामी शिकारों को चुन रहे हैं, लेकिन आजादी के निर्भीक स्वर वादी में गूंज   रहे थे।
आज पाक कब्जे वाले कश्मीर-गिलगित-बाल्टिस्तान में ऐसे प्रदर्शन आम बात हैं। इस प्रदर्शन के कुछ दिनों बाद ही 30 सितंबर 2015 को नवाज शरीफ संयुक्त राष्टÑसभा में कागज पर आंखें गड़ाए अपना भाषण पढ़ रहे थे, जिसका मजमून रावलपिंडी से स्वीकृत होकर आया था। मुट्ठी भर सुनने वाले ऊबे हुए थे, क्योंकि वे इस सालाना पाकिस्तानी राग के लफ्जों को नवाज के आगे-आगे भी दुहरा सकते थे। मायूस नवाज ने दुनिया में ‘मुस्लिमों की दुर्दशा’ का रोना रोया। कश्मीर की तरफ लोगों का ध्यान खींचने के लिए उन्हें उसकी तुलना फिलिस्तीन से करनी पड़ी। लेकिन हाथ कुछ आया नहीं। शरीफ के भाषण पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की छाया साफ देखी जा सकती थी। चूंकि संयुक्त राष्टÑ की इस सभा में मोदी आतंकवाद और उसके पोषकों की पहचान करने की बात उठा चुके थे इसलिए नवाज को (वास्तव में राहिल शरीफ को) वैश्विक मुस्लिम पीड़ितवाद या ‘मुस्लिमों की दुर्दशा’ का कार्ड खेलना जरूरी हो गया। बोझिल माहौल में हास्य का क्षण तब आया जब शरीफ ने भारत पर पाकिस्तान में आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाया और कश्मीर के ‘असैन्यीकरण’ का प्रस्ताव रखा।
भारत की तरफ से तत्काल उत्तरों की श्रृंखला शुरू हुई। पहली चोट विदेश मंत्रालय ने की। मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने ट्वीट किया-‘समस्या का समाधान कश्मीर के ‘असैन्यीकरण’ में नहीं बल्कि पाकिस्तान के विआतंकीकरण में है।’ शरीफ द्वारा भारत के अंतर्गत कश्मीर को फिलिस्तीन की गाजा पट्टी की तरह कब्जा किया गया क्षेत्र कहने पर स्वरूप का ट्वीट था-‘आपने कब्जे की बात सही कही है। बस कब्जा करने वाले के बारे में आप गलत हैं। हम पाक अधिकृत कश्मीर को शीघ्र खाली (पाकिस्तान द्वारा) करने की मांग करते हैं।’
आतंकवाद के मुद्दे पर घिर रहे पाकिस्तान का बचाव करने की जुगत में शरीफ ने अपने भाषण में चार सूत्रीय प्रस्तावों का वाग्जाल फेंका था, जिसमें पहला था, पाकिस्तान-भारत 2003 के नियंत्रण रेखा पर पूर्ण युद्धविराम समझौते का पालन करें। दूसरा, पाकिस्तान-भारत दोबारा पुष्टि करें कि वे किसी भी परिस्थिति में बल प्रयोग नहीं करेंगे और न ही बल प्रयोग की धमकी देंगे। तीसरा, कश्मीर के असैन्यीकरण के लिए कदम उठाए जाएं। और चौथा, दोनों विश्व के सबसे ऊंचे युद्धस्थल सियाचिन से अपनी सेनाएं हटाने की पहल करें, जैसी कि दोनों देशों के बीच 2005-2006 की बातचीत के बाद इस समझौते पर हस्ताक्षर होने की अपेक्षा की जा रही थी। लेकिन पाकिस्तान के इन दावों और इरादों का दम भारत के आम चुनावों ने पहले ही निकाल दिया था, जब देश की जनता ने एक नौकरशाह के स्थान पर एक जननेता को शासन की बागडोर सौंपी थी। सरकार के बदलते ही पाकिस्तान के लिए भी काफी कुछ बदल गया था। जिसकी बेचैनी पाकिस्तान आज भी छिपा नहीं पा रहा है।
सर्वप्रथम, नवाज शरीफ के चार सूत्रों का सिलसिलेवार विश्लेषण करते हैं। हाल ही में एनएसए स्तर की बातचीत रद्द होने के बाद भारतीय सीमा सुरक्षा बल और पाक रेंजर्स के बीच युद्ध-विराम उल्लंघन को लेकर बातचीत हुई। सीमा पर गोलीबारी रोकने को लेकर सहमति बनी। लेकिन चंद घंटों के अंदर ही पाकिस्तान की तरफ से गोलीबारी शुरू हो गयी। क्योंकि ठण्ड आने वाली है और घाटियों में बर्फ जमने से पहले भाड़े के जिहादियों को भारत में धकेलना जरूरी है। जाहिर है कि युद्धविराम को आतुर पाकिस्तानी फौजियों द्वारा आने वाले दिनों में भी गोलीबारी कर के घुसपैठियों को ‘कवर फायर’ दिया जाता रहेगा। इसी सिलसिले में अगस्त माह में संयुक्त राष्टÑ में पाकिस्तान की राजदूत द्वारा सुरक्षा परिषद को पत्र लिखकर भारत द्वारा दस मीटर ऊंची और 135 फुट चौड़ी दीवार उठाने की तथाकथित योजना पर आपत्ति जताई गयी थी। पाकिस्तान की इस आशंका का आधार हिज्बुल मुजाहिदीन के दुर्दांत आतंकी सैयद सलाहुद्दीन की चिंता थी कि यदि ऐसी कोई दीवार बन गयी तो उसकी आतंक की दुकान का क्या होगा? नवाज के प्रथम सूत्र की यही अंतिम परिणति है।
पाकिस्तान के प्र्रधानमंत्री का दूसरा सूत्र, जिसमें दोनों देशों द्वारा किसी भी सूरत में बल प्रयोग करने अथवा धमकाने से परहेज रखने की बात कही गयी है, भी पूरी तरह अर्थहीन और ऐतिहासिक सच्चाइयों के विपरीत है। जन्म के समय से पाकिस्तान की सारी राजनीति ‘गजवा-ए-हिन्द’ अर्थात ‘काफिर हिन्दुस्तान पर इस्लामी सेनाओं की विजय’ के जुमले के इर्द-गिर्द घूमती रही है। पाकिस्तान की सेना और सियासतदान, दोनों ही भारत विरोध और कश्मीर एजेंडे को लेकर भड़काऊ बयानबाजी करते आये हैं। इसी अक्तूबर के प्रथम सप्ताह में राहिल शरीफ ने बयान दिया है कि ‘कश्मीर पाकिस्तान की रग में है। कश्मीर का मामला सुलझाए बिना भारत के साथ शांति नहीं हो सकती।’ और बात तो इतने पर भी खत्म नहीं होती। पाकिस्तान के जनरल खुले में और अकेले में कहते आये हैं कि केवल कश्मीर नहीं, जब तक पूरा हिंदुस्थान फतह नहीं हो जाता तब तक उसके खिलाफ जिहाद जारी रहेगा। भारत ने जब परमाणु परीक्षण किया, तो अपनी परमाणु नीति में स्पष्ट किया कि भारत के परमाणु हथियार किसी देश विशेष पर केंद्रित नहीं हैं बल्कि उसकी अपनी सुरक्षा के लिए हैं। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान की घोषित परमाणु नीति है कि उसके परमाणु हथियार सिर्फ और सिर्फ भारत के खिलाफ हैं। साथ ही पाकिस्तान अपने परमाणु जखीरे में लगातार बढ़ोत्तरी भी करता जा रहा है, जिससे विश्व समुदाय चिंतित है। आएदिन पाकिस्तान के राजनीतिज्ञ और सुरक्षा संस्थानों से जुड़े लोग भारत को परमाणु हमला करके तहस-नहस करने डींगें हांकते रहते हैं। भारत के साथ हुए सभी युद्धों की शुरुआत भी पाकिस्तान ने ही की है, और पिछले साढ़े तीन दशकों से भारत में आतंक का निर्यात कर रहा है। शरीफ का तीसरा सूत्र, जो अकेले भारत के हिस्से वाले कश्मीर के असैन्यीकरण के बारे में है, वास्तव में पाकिस्तान के खाकी वालों और आईएसआई का पुराना एजेंडा है। इस पर भारत के अंदर भी काफी बहस और राजनीति हो चुकी है, जिसका शिकार कश्मीर के सामान्य नागरिक और निहत्थे गश्त करते अर्धसैनिक बलों के दस्ते हुए हैं।
चौथा प्रस्ताव सियाचिन ग्लेशियर पर भारतीय सेना की मजबूत स्थिति और बढ़त को समाप्त करने की चीन और पाकिस्तान की संयुक्त कूटनीतिक चाल है। विश्व का सबसे ऊंचा युद्धस्थल सियाचिन, भारतीय सेना को बेहद महत्वपूर्ण सामरिक वरीयता दिलाता है। जिस किसी का भी सियाचिन पर नियंत्रण होगा उसकी धाक चीन के कब्जे वाले अक्साई चिन और शक्सगाम घाटी तथा पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान पर बनी रहेगी। कराकोरम राजमार्ग और अक्साई चिन के निकट भारत की ये प्रभावी उपस्थिति चीन और पाकिस्तान की सेनाओं को खटकती रही है।
1972 के शिमला समझौते के बाद पाकिस्तान सियाचिन पर अपना दावा जताता रहा था। 70 और 80 के दशक में अपने इस दावे को मजबूत करने के लिए पाकिस्तान ने विश्व के अनेक पर्वतारोही दलों को पाकिस्तान वाले हिस्से से सियाचिन की चोटियों पर चढ़ने के पास जारी करना शुरू कर दिए। 1978 में भारतीय सेना ने भी ऐसे पास जारी किये। आखिरकार 1983 में पाकिस्तानी जनरलों ने सियाचिन की रणनीतिक चोटियों पर चुपचाप घुसपैठ कर कब्जा जमाने की योजना बनाई। आॅपरेशन की तैयारियां शुरू हो गयीं। लेकिन पाकिस्तानियों की एक चूक से उनका खेल बिगड़ गया। सियाचिन योजना के भावी घुसपैठियों के लिए पाकिस्तानी सेना ने लंदन के एक निर्यातक से बड़ी मात्रा में बर्फीले स्थान पर पहनने वाली पोशाक एवं अन्य सामान खरीदने का आदेश दिया। इसी निर्यातक समूह से भारत भी खरीददारी करता था। भारतीय गुप्तचर तंत्र को भनक लगी और भारतीय सेना के कान खड़े हो गए। सूचना मिली कि पाकिस्तान की सैनिक टुकड़ी 17 अप्रैल 1984 को सियाचिन पर कब्जा करने वाली थी। भारतीय सैनिक टुकड़ी ने 13 अप्रैल को ही सियाचिन अपने कब्जे में ले लिया। अभियान का नाम था आॅपरेशन मेघदूत। चार दिन बाद निश्चिंतता से बढेÞ आ रहे पाकिस्तानी हिन्दुस्थान की सेना को पहले से ही वहां पाकर भौंचक रह गए। युद्ध हुआ। हमलावरों को पीछे हटना पड़ा और भारत द्वारा महत्वहीन समझकर छोड़ दिए गए स्थानों से ही संतोष करना पड़ा। तब से पाकिस्तानी फौज ने सियाचिन पर कब्जा करने के कई असफल प्रयास किये हैं। 1998 में कारगिल दुस्साहस उनकी आखिरी सैन्य कोशिश थी, जब उन्होंने कारगिल की चोटियों पर कब्जा करके सियाचिन को ही शेष भारत से अलग-थलग कर देने का प्रयास किया। लेकिन कारगिल में मुंह की खाने के बाद पाकिस्तानियों ने अपना तरीका बदला और कहना शुरू कर दिया कि इस भयंकर ठंडी, जीवन-रहित जगह पर फौज तैनात करने का कोई मतलब नहीं है और सियाचिन का विसैन्यीकरण कर देना चाहिए। सवाल ये है कि जब सियाचिन इतना ही अर्थहीन था तो पाकिस्तान ने अपने सैकड़ों फौजियों को उसके लिए हलाक क्यों करवाया?
संप्रग सरकार बनने के बाद पाकिस्तान ने सियाचिन पर अपने वाग्जाल को और फैलाना शुरू किया। इसके लिए बाकायदा लॉबिस्ट तैनात किये गए जिन्होंने भारत तथा विश्व मीडिया में विसैन्यीकरण की बात को उछालना शुरू किया। तर्क था कि सियाचिन पर मौसम के कारण जाने वाली जानें और अत्यधिक महंगी तैनाती के चलते दोनों सेनाओं द्वारा सियाचिन को खाली कर देना ही अच्छा होगा। कई शांति के ठेकेदार और पर्यावरणविद भी अपना हुनर बेच रहे थे। गुलयानी टेलोन नामक इटली के एक पर्यावरणविद ने 2003 की डर्बन कांफ्रेंस में सियाचिन शांति पार्क स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। मनमोहन सिंह इस झांसे में आने को तैयार हो गए और इस प्रस्ताव पर आगे बढ़ने की तैयारी करने लगे। मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू ने अपनी किताब ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में इस बात का जिक्र और समर्थन किया है। सरकार की इस पहल से भारतीय सेना में बेचैनी फैल गयी। कहा जाता है कि तब सेना ने अपने पूर्व सेनाध्यक्षों से संपर्क किया और इस गुपचुप ‘शांतिवार्ता’ को सार्वजनिक कर दिया। मनमोहन सिंह को पीछे हटना पड़ा।
सियाचिन को खाली करना भयंकर सैनिक भूल साबित होती। ये ग्लेशियर भारत के लिए सामरिक महत्व का तो है ही, लेकिन इसका अति महंगा और जानलेवा होना भी अब अतीत की बात होती जा रही है। आज भारत ने सियाचिन में अपना अच्छा-खासा आधारभूत सैन्य ढांचा तैयार कर लिया है। मौसम के कारण होने वाली सैनिक मृत्युदर में काफी गिरावट आई है और सैनिकों की तैनाती की कीमत भी जम्मू-कश्मीर के दूसरे पर्वतीय इलाकों में की जाने वाली सैन्य तैनाती जितनी ही हो गयी है। हां, पाकिस्तान के हालात जरूर खराब हैं, जिसके दर्जनों सैनिक हर साल सियाचिन के जानलेवा मौसम का शिकार हो रहे हैं। अप्रैल 2014 के हिमस्खलन में 140 पाकिस्तानी सैनिक जिन्दा दफन हो गए थे। सो अटकी पाकिस्तान की ही है। इसलिए नवाज शरीफ सियाचिन को लेकर शांतिदूत बने हुए हैं। और नवाज के मुंह से राहिल शरीफ ही बोल रहे हैं।
नवाज शरीफ को अगला उत्तर दिया विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने। संयुक्त राष्टÑ में श्रीमती स्वराज ने पाकिस्तान को जवाब देते हुए कहा कि ‘शान्ति की बात करनी है तो चार सूत्रों को छोड़िये। बातचीत सिर्फ एक सूत्र पर ही हो सकती है। आप आतंकवाद का रास्ता छोड़कर वार्ता की मेज पर आ जाइए। जैसा कि दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच जुलाई में उफा में तय हुआ था। सीमा पर शांति के लिए बात कीजिये, और आतंकवादद से जुडेÞ सभी मुद्दों पर एनएसए स्तर की बातचीत कीजिये।’विदेश मंत्री ने अपने भाषण में 2008 के मुंबई हमले में भारत के नागरिकों के अलावा अन्य अनेक देशों के नागरिकों के मारे जाने का भी जिक्र किया। ये एक अक्तूबर की बात है। अगले दिन 2अक्तूबर को लंदन की यात्रा पर गए हुए पाक फौज के प्रमुख राहिल शरीफ ने कश्मीर राग अलापना शुरू कर दिया।
   नवाज शरीफ की चार सूत्रीय पेशकश का तो पर्दाफाश हो गया, लेकिन जम्मू-कश्मीर को लेकर जब भी कूटनीतिक चर्चाएं होती हैं, तो परवेज मुशर्रफ के चार सूत्रीय फार्मूले की भी चर्चा होती है। और भारत के ‘बुद्धिजीवियों’ के एक तबके में बहुत अधिक होती है। इसलिए इस तथाकथित शांति फार्मूले के रणनीतिक आयामों पर चर्चा होना अति आवश्यक है, क्योंकि आज पाकिस्तान के कूटनीतिक प्रयास नाम-रूप बदलकर इसी के इर्द-गिर्द घूमते दिखाई देते हैं। भारत में भी मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग इसे खूब उछालता है। हास्यास्पद बात ये है कि वास्तव में ये फार्मूला क्या है, आज तक स्पष्ट नहीं है। संप्रग सरकार और स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जिसे लेकर आगे बढ़ने का मन बना चुके थे (संजय बारू ने इसके बारे में विस्तार से लिखा है), मुशर्रफ के उस तथाकथित शांति सूत्र के बारे में ये गोपनीयता आश्चर्यजनक और आपत्तिजनक है। छनकर बाहर आई बातों से पता चलता है कि ये फार्मूला प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पर्यटन फंतासी कि वे किसी दिन सुबह का नाश्ता दिल्ली में करने के बाद दोपहर का खाना लाहौर में खा सकें, के रंगों को लेकर बुना गया एक जाल था जिसके माध्यम से आईएसआई के कश्मीर सम्बन्धी सपनों को साकार होना था। मुशर्रफ का प्रस्ताव था कि एलओसी को ही वास्तविक सीमा रेखा मानते हुए, संविधान को यथावत रखते हुए, कश्मीर की सीमाओं को अप्रासंगिक बनाया जाए। अप्रासंगिक से अर्थ था कि कश्मीर घाटी और पाक-अधिकृत कश्मीर के बीच मुक्त आवागमन, व्यापार और पर्यटन के लिए सीमाएं खोली जाएं। इसके लिए जिन बातों को ‘आवश्यक’ माना गया था उनमें हुर्रियत कांफ्रेंस को मुख्यधारा में लाना, आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट को हटाना और तथाकथित मानव अधिकार उल्लंघन मामलों को प्राथमिकता से सुलझाना शामिल था। हमारे कर्णधार इन बातों को स्वीकार करके किस प्रकार भारत का हित साधने जा रहे थे ये आज भी रहस्य का विषय है। विचारणीय बात है कि आतंक को पालने-पोसने वाली जिहादी पाकिस्तानी फौज के एक तानाशाह पर आंख मूंदकर विश्वास करने के लिए भारतीय नेतृत्व कितना लालायित था। ये स्वप्नवादिता की अति थी। लेकिन क्या पाकिस्तान के इरादों को भांपना इतना कठिन था?
स्वयं मुशर्रफ का एक फौजी के रूप में सफर मुशर्रफ की पूरी सोच का खाका खींच देता है। 1964 में पाकिस्तानी फौज के आर्टिलरी विभाग के अफसर के रूप में शुरुआत करने वाले मुशर्रफ पर जिया उल हक की नजरे-इनायत हुई। कारण था इस्लामी कट्टरपंथियों से मुशर्रफ की नजदीकी। जिया उल हक और मुशर्रफ दोनों के जमाते इस्लामी पाकिस्तान से निकट सम्बन्ध थे। जिया ने मुशर्रफ को अफगान मुजाहिदीनों के प्रशिक्षण का काम सौंपा। जिहाद के लिए पैसा उगाहने के लिए मुशर्रफ ने मादक पदार्थ के तस्करों को पाला-पोसा। लादेन के साथ मिलकर काम किया। सितम्बर 1987 में सियाचिन के विला फण्डला में भारतीय सैन्य चौकी पर पाकिस्तानी सेना द्वारा किये गए असफल हमले के पीछे मुशर्रफ का ही दिमाग था। 90 के दशक के अंत में मुशर्रफ ने हरकतुल मुजाहिदीन, लश्करे तोयबा, तब्लीगी जमात जैसी तंजीमों से निकट के सम्बन्ध बनाए। कारगिल घुसपैठ की योजना भी वे लम्बे समय से बना रहे थे। जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज शरीफ के बीच लाहौर में वार्ता जारी थी, ठीक उसी समय परवेज मुशर्रफ अपनी कारगिल दुस्साहस योजना को अंतिम रूप दे रहे थे। इंडियन इंस्टिट्यूट आॅफ टॉपिकल स्टडीज ने कश्मीर मुद्दे पर मुशर्रफ के साक्षात्कारों और घोषणाओं को आधार बनाकर उनकी सोच का खाका खींचा है। कारगिल घटनाक्रम के परिणाम सामने आने से पहले मुशर्रफ के विचार इस प्रकार के थे-‘भाजपा कागजी शेरों की पार्टी है। पाकिस्तान की परमाणु और मिसाइल क्षमता के कारण पाकिस्तान द्वारा कारगिल की चोटियों पर कब्जा करने पर भारत उसका विरोध नहीं करेगा। परमाणु युद्ध का भय पश्चिमी देशों को हस्तक्षेप करने पर मजबूर करेगा, जिससे कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्टÑीयकरण हो जाएगा। और, पाकिस्तान युद्धविराम के लिए तभी तैयार होगा जब उसे भारतीय क्षेत्रों पर अपना कब्जा बनाए रखने की अनुमति दी जाएगी।’
कारगिल में मुंह की खाने के बाद मुशर्रफ के विचार और तरीके बदल गए-‘कश्मीर पर कब्जा बाद में भी किया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि कश्मीर में ठीक उसी प्रकार भारतीय सेना पर हमले किये जाएं जिस प्रकार अफगानिस्तान में मुजाहिदीनों द्वारा सोवियत सेनाओं पर किये गए थे।’ एक और महत्वपूर्ण बात जो मुशर्रफ के शांति प्रस्तावों की पोल खोलती है, वह है उनका खयाल कि-‘यदि कश्मीर मुद्दा सुलझ भी जाए तो भी भारत और पाकिस्तान के सम्बन्ध सामान्य नहीं हो सकते। भारत के एक बड़ी एशियाई शक्ति के रूप में उभरने के इरादे को पाकिस्तान ग्रहण लगाता रहेगा और इसीलिए चीन उसका समर्थन करता रहेगा।’ ये वह बात है जिसे आईएसआई का प्रचार तंत्र, पाकिस्तान की इस्लामी तंजीमें और लखवी तथा हाफिज सईद जैसे फौज के कारिंदे लगातार दुहराते रहते हैं।
   ये सारे खुलासे बताते हैं कि पाकिस्तान का फौजी इस्टैब्लिशमेंट आज भी इन्ही चालों पर कायम है। बीते दशकों में, सीधे संघर्ष में उलझने की भारत की हिचक, आतंकवाद पर लचर रवैया, परमाणु युद्ध का भयादोहन इत्यादि का पाकिस्तान लाभ उठाता आया है। शांति वार्ताओं की पेशकश में भी मुशर्रफ से लेकर राहिल शरीफ और नवाज शरीफ तक कुछ भी नहीं बदला है। बल्कि पाकिस्तान का जिहादी आतंकवाद का निर्माण ढांचा निरंतर मजबूत ही हुआ है। हिन्दू भारत नेस्तोनाबूद करने की पाकिस्तान के सर्वशक्तिमान फौजी इस्टैब्लिशमेंट की प्राथमिकता में भी रत्तीभर परिवर्तन नहीं आया है। अपने पूर्ववर्तियों की तरह ही नवाज शरीफ की हालत भी फौज के सामने पतली है। ऐसे में सियाचिन को खाली करने और कश्मीर की सीमाओं को खोलकर शांति स्थापित करने जैसी छल से भरी पाकिस्तानी बातों की बीन पर तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग को झूमना बंद कर देना चाहिए और वर्तमान सरकार के दृढ़ कदमों का समर्थन करना चाहिए।
अब बात एलओसी के दोनों तरफ बंटे हुए कश्मीर की। भारतीय हिस्से के कश्मीर में कुछ समय पूर्व लोकतांत्रिक तरीके से एक सरकार चुनी गयी। लोगों ने मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। बिना किसी दबाव के वोट डाले।   पिछले वर्ष जब कश्मीर में बाढ़ आई तो भारतीय सेना के जवानों और स्वयंसेवी संगठनों ने अपने राहत कार्यों से कश्मीरियों का दिल जीता। यही कारण है कि अलगाववादी नगर निगम का चुनाव लड़ने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। इन मुट्ठीभर अलगाववादियों, जो आज अप्रासंगिक हो चुके हैं, को भी अपनी बात कहने की छूट मिली हुई है। आज जम्मू-कश्मीर तरक्की की आस लगा रहा है। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर, गिलगित और बाल्टिस्तान में स्थानीय लोगों का आक्रोश चरम पर है। विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। जिन्हें पाकिस्तानी फौज कठोरता से कुचलने में लगी हुई है। निर्वासन में रह रहे यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष सरदार शौकत अली कश्मीरी कहते हैं, ‘पाकिस्तान उसके कब्जे वाले कश्मीर को आजाद कश्मीर कहता है, लेकिन यहां के लोग सिर्फ गुलाम हैं। कहने को पाकिस्तान ने इस इलाके को कुछ स्वायत्तता देकर स्थानीय सरकार का गठन किया है। लेकिन ये सिर्फ दिखावा है। हमारी किस्मतों का फैसला हम पर इस्लामाबाद द्वारा थोपे गए चार गैर कश्मीरी अफसर-आईजी पुलिस, चीफ सेक्रेटरी, फाइनेंस सेक्रेटरी और अकाउंटेंट जनरल-करते हैं। हमारे पास पढ़े-लिखे लोग हैं, लेकिन हम पर शासन करने वाला अधिकारी हमेशा बाहर से आता है। आईएसआई और फौज के लोग इस जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने वालों का अपहरण कर रहे हैं। उन्हें यातनाएं दे रहे हैं और चुन-चुन कर उनकी हत्याएं कर रहे हैं।’ 20 फरवरी को आल पार्टीज नेशनल अलायन्स ने गिलगित में एक सामूहिक रैली करके पाकिस्तान के कब्जे के खिलाफ एक होकर आवाज उठाई। इसी प्रकार संयुक्त राष्टÑ मानव अधिकार परिषद की 27वीं जेनेवा बैठक में भी यहां के निर्वासित नेता पहुंचे और पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर को इस्लामाबाद द्वारा शासित ‘कब्जाया गया क्षेत्र’ कहा। पाकिस्तान द्वारा गिलगित-बाल्टिस्तान को चीन को ‘बेच दिए जाने’ के खिलाफ भी लोगों में खासा गुस्सा है। द इंस्टिट्यूट फॉर गिलगित-बाल्टिस्तान स्टडीज के अध्यक्ष सेंजे एच़ सेरेंग कहते हैं, ‘चीन, ईरान और किर्गिस्तान से गैस-तेल मार्ग बना रहा है, जो गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरेगा। चीन और पाकिस्तान यहां मिलकर यूरेनियम, सोना, तांबा, संगमरमर और रत्नों का खनन कर रहे हैं। लेकिन यहां के लोगों की इस पैसे में कोई हिस्सेदारी नहीं है। चीन यहां राजमार्ग, बांध और सुरंगें बना रहा है। आज चीन और पाकिस्तान के साझे हित हैं। चीन संयुक्त राष्टÑ में पाकिस्तान के लिए बहुत महत्व रखता है। क्योंकि पाकिस्तान अपनी आर्थिक और सैन्य असफलताओं, भयानक होते अलगाववाद और अंतरराष्टÑीय मंचों पर कूटनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ने के भय से परेशान है। वहीं चीन पाकिस्तान का लाभ उठा कर उसे अपना मुहरा बना रहा है।’ एनएसएफ नामक संगठन चीन और पाकिस्तान द्वारा इस क्षेत्र के प्राकृतिक खजाने की लूट का विरोध कर रहा है। पुलिस और प्रशासन बर्बर दमन कर रहे हैं। लेकिन फिर भी नारे लग रहे हैं-‘मिटटी चोरों-पत्थर चोरों, अब हमारा पीछा छोड़ो।’
आर्थिक हालत खराब है। पाकिस्तान द्वारा यहां की बेशकीमती प्राकृतिक सम्पदा का भरपूर दोहन किया जा रहा है लेकिन तीन चौथाई स्थानीय लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं और उनकी आवाज उठाने के लिए कोई अधिकृत प्रामाणिक नेतृत्व नहीं है। आईएसआई और दूसरी खुफिया पाकिस्तानी संस्थाएं चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली करवाती हैं। विगत चुनावों में स्थानीय लोगों के भारी विरोध के बावजूद नवाज शरीफ के पिट्ठू चुनाव जीत गए। बल्वारिस्तान नेशनल फ्रंट के अध्यक्ष अब्दुल हामिद खान कहते हैं-‘यहां दुनिया को दिखाने के लिए चुनावों का तमाशा होता है। लोग किसी को भी वोट दें, जीतने वाले पहले से तय होते हैं। इस्लामाबाद में जिस पार्टी की सरकार होती है, वह अपने लोगों के नाम पहले तय कर देती है। बाद में उन्हें ही विजयी घोषित कर दिया जाता है। यहां इलेक्शन के नाम पर सिलेक्शन होता है।’ वे आगे कहते हैं, ‘पाकिस्तानी फौज और उसकी 22 खुफिया एजेंसियां यहां मौजूद हैं। चुनाव के पहले हमारे उम्मीदवारों का अपहरण कर लिया जाता है। बोलने की आजादी नहीं है, न्याय की आजादी नहीं है। ये कैसा आजाद कश्मीर है? आप आत्म-निर्णय करवाइये, पता चल जाएगा कि कितने लोग पाकिस्तान के साथ हैं और कितने हमारे साथ।’ इस इलाके को लेकर चीन और पाकिस्तान की साठ-गांठ पर अब्दुल कहते हैं, ‘गिलगित-बाल्टिस्तान को लेकर पाकिस्तान ने जो समझौता किया है, वह वास्तव में खुफिया सेल एग्रीमेंट है। जिन लोगों ने इसका विरोध किया और मामले को संयुक्त राष्टÑ के पर्यवेक्षकों तक ले जाने का प्रयास किया, उन्हें जेल में डालकर राजद्रोह की धाराएं लगायी गई हैं। राजद्रोह का कानून देश के नागरिकों के लिए होता है, हम पाकिस्तान के नागरिक नहीं हैं।’
विद्रोह की आशंकाओं से भयभीत पाकिस्तानी इस्टैब्लिशमेंट ने गिलगित-बाल्टिस्तान को टुकड़ों में बांट कर रखा है। इतने सालों बाद भी गिलगित-बाल्टिस्तान और तथाकथित आजाद कश्मीर के बीच सड़क बनाने की अनुमति नहीं दी गयी है, ताकि किसी प्रकार का संगठित विरोध संभव न हो सके। जो कश्मीरी गिलगित-बाल्टिस्तान जाने की कोशिश करते हैं, उन्हें मारा -पीटा जाता है और जेल में ठूंस दिया जाता है। सईद हसद नाम के एक प्रकाशक को ‘आजाद कश्मीर’ और गिलगित-बाल्टिस्तान का संयुक्त नक्शा छापने के जुर्म में अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। चुनावों में धांधली का विरोध करने वाले बाबा जान और उनके साथियों को 40 साल के लिए जेल में फेंक दिया गया है। किसी भी सरकारी नौकरी में जाने से पहले लोगों को कश्मीर पर पाकिस्तानी कब्जे को स्वीकार करने की शपथ लेनी पड़ती है। प्रकाशकों और अखबार मालिकों को भी ऐसा करना पड़ता है। कई पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। जिन लोगों को मारकर अधिकारी स्वयं विवाद में नहीं पड़ना चाहते उन्हें आतंकियों के हाथों सौंप देते हैं। ह्यूमन राइट्स वाच के अनुसार जब इस इलाके में भूकंप आया तो पाकिस्तान की फौज का असली चेहरा सामने आया। मुजफ्फराबाद के एक स्थानीय निवासी ने कहा-‘पाकिस्तान कहता है कि वह हमारा दोस्त है और भारत हमारा दुश्मन, लेकिन पाकिस्तान जैसा दोस्त हो तो के बाद दुश्मन की जरूरत किसे है।’ रिपोर्ट आगे कहती है कि भयंकर भूचाल के कारण आजाद कश्मीर के बड़े शहर और हजारों गांव धूल में मिल गए थे। 8000 लोग मारे गए और 20 लाख लोग बेघर हो गए। लेकिन बचाव कार्यों के लिए आई पाकिस्तानी सेना केवल यहां फंसे फौजियों की मदद कर रही थी। अंतरराष्टÑीय मीडिया ने मदद मांगते स्थानीय जन को दुत्कारते पाकिस्तानी फौजियों को फिल्माया कि उन्हें ऐसा करने के आदेश नहीं हैं। इन खबरों ने दुनिया के सामने ये साफ किया कि पाकिस्तान की इस कालोनी में फौज केवल विद्रोह के दमन और नियंत्रण लिए तैनात है। साल 2006 की मानव अधिकार रिपोर्ट के अनुसार ‘आजाद कश्मीर के एक नेता’ सैयद रजाक ने लिखा कि पाकिस्तान ने इस इलाके को अफगान-तालिबान जैसे आतंकियों की छावनियों में बदल दिया है। मुझे अब उन लोगों पर दया आती है, जिनका ‘ब्रेन वाश’ करके ये सोचने पर मजबूर किया गया है कि ‘एक देश’ उनका दुश्मन है। हर तरफ पहरा है। किसी के विचार की कोई कीमत नहीं है। पता नहीं कौन मूर्ख इसे आजाद कश्मीर कहता है।’दूर क्षितिज में एक तूफान आकार ले रहा है, जिसके बादलों का रंग खून जैसा लाल है। पाकिस्तान दुनिया में तथाकथित ‘गुलाम’ कश्मीर का तमाशा बनाने निकला है लेकिन तमाशा खुद उसका बन रहा है। ‘आजाद कश्मीर’ के लोग अपनी गुलामी के खिलाफ मुट्ठियां भींच रहे हैं। जुल्म और जबरदस्ती के बीच लोग नारे लगा रहे हैं -
 ‘हम लेके रहेंगे आजादी,
पाकिस्तान से लेंगे आजादी,
तेरा बाप भी देगा आजादी’
पाकिस्तान का ये ‘बाप’ खाकी पहनता है और पाकिस्तानियों का खून चूसकर दिन पर दिन तगड़ा होता जाता है। विश्व समुदाय ने यदि गंभीरता से ध्यान नहीं दिया तो गिलगित-बाल्टिस्तान, तथाकथित आजाद कश्मीर और बलूचिस्तान में पाक फौज एक बार फिर वैसी ही खून की होली खेलेगी जैसी कि उसने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में खेली थी। नवाज शरीफ जैसी कठपुतलियां तो आती-जाती रहेंगी।              

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