रविवार, 18 अक्तूबर 2015

नवरात्र : सर्व मंगल मांगल्ये

सर्व मंगल मांगल्ये
तारीख: 12 Oct 2015



वर्ष में दो बार शारदीय नवरात्र और वासन्तिक नवरात्र में शक्ति की पूजा की जाती है। यह शक्ति दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी आदि के रूप में पूजी जाती है। ये शक्तियां निर्माण भी करती हैं और संहार भी। जब निर्माण करती हैं तो मनुष्य में देवत्व का गुण बढ़ जाता है, धरा पर स्वर्ग उतर आता है। लेकिन जब विनाश करती हैं तो दैत्य समाज में हाहाकार मचा देती हैं। यह शक्ति जय है, कल्याण है, शान्ति है, सुन्दरता है, सर्व मंगल मांगल्ये.. है। सबके हित को साधने वाली है। यह शक्ति हम सबके अन्दर भी है। बस, इसको जगाने की आवश्यकता है। इसको जगाए बिना हमारा जीवन सार्थक नहीं है। अत: अपने भीतर छिपी 'परम शक्ति' को जानना, समझना, उसके अनुरूप व्यवहार करना हमारा प्रथम कर्तव्य है। यदि ऐसा होगा तभी हम अपनी नई पीढ़ी को राम और रावण के चरित्र का अन्तर समझा पाएंगे। हमें सबका उत्पीड़न करने वाले रावण जैसा बनना है या भगवान राम जैसा सबकी संभाल करने वाला, सबसे प्रेम करने वाला, सबकी पीड़ा हरने वाला व्यक्तित्व उभारना है। नई पीढ़ी को यह अन्तर हम केवल कथा-कहानी सुनाकर नहीं बता पाएंगे। इसके लिए हमें स्वयं का आदर्श प्रस्तुत करना होगा। एक ओर हम शक्ति की पूजा करें, श्रीराम के गुण गाएं, तो दूसरी ओर रावण जैसे पीड़ादायक आचरण करें, इससे काम नहीं चलेगा। श्रीराम वनवासियों को गले लगाते हैं, उन्हें जगाते हैं, दुखियों के दु:ख हरते हैं, देश और समाज के लिए अपने सुख का त्याग करते हैं, शबरी के जूठे बेर खाते हैं, पर हम वनवासियों को दुत्कारते हैं, दूसरे के दु:ख में प्रसन्न होते हैं, अपने स्वार्थ के लिए समाज को तोड़ते हैं, अपने सुख के लिए देशहित तक की बलि दे देते हैं। इन बुराइयों को छोड़ना होगा। अपने हर कर्म से आदर्श प्रस्तुत करना होगा। तभी शक्ति की आराधना फलीभूत होगी।    प्रस्तुति : अरुण कुमार सिंह

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