शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

खेतड़ी रियासत की संपत्ति सरकारी




जयपुर. खेतड़ी रियासत जिला मजिस्ट्रेट कृष्ण कुणाल के बड़े फैसले के बाद सुर्खियों में है। कोर्ट ने खेतड़ी रियासत का कोई वारिस नहीं होने कारण संपत्ति को सरकारी घोषित कर दिया है। फैसला लागू होने पर करीब 2,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की संपत्ति सरकारी का होगी।
कौन था खेतड़ी रियासत का राजा...
- 1742 में खेतड़ी रियासत की खोज ठाकुर किशन सिंह ने की।
- 1870 से 1901 के बीच खेतड़ी रियासत पर अजित सिंह का राज था।
- अजित सिंह बहादुर स्वामी विवेकानंद के शिष्य थे।
- शिकागो धर्म संसद में भाग लेने के बाद स्वामी विवेकानंद सबसे पहले खेतड़ी आए थे।
- बताया जाता है कि खेतड़ी के राजा अजित सिंह ने ही नरेंद्रनाथ दत्त ( स्वामी बिबिदिशानंद) को स्वामी विवेकानंद नाम सुझाया था।
नेहरू खानदान का भी है खेतड़ी से संबंध
- बताया जाता है कि खेतड़ी से नेहरू खानदान का भी ताल्लुक रहा है।
- मोतीलाल नेहरू के बड़े भाई नंदलाल उन्हें लेकर खेतड़ी आए थे। वे खेतड़ी के तत्कालीन राजा फतेह सिंह के दीवान थे।
- राजा फतेह सिंह की 1870 में मृत्यु होने के बाद अलसीसर से अजित सिंह को गोद लेकर उत्तराधिकारी बनवाया था।
- इस मामले को लेकर दीवान नंदलाल नेहरू विवाद में रहे। बाद में नंदलाल आगरा चले गए तथा वकालत करने के लिए इलाहाबाद में बस गए।
यह है मामला
खेतड़ी राजघराने में एक तीन सितारा हेरिटेज होटल, जयपुर का खेतड़ी हाउस और गोपालगढ़ का किला है। ये सारी प्रॉपर्टी 1987 में खेतड़ी के आखिरी शासक राय बहादुर सरदार सिंह की मौत के बाद से राज्य सरकार के संरक्षण में है। सरदार सिंह के उत्तराधिकारी नहीं होने से सरकार को सारी प्रॉपर्टी पर कब्जा लेना पड़ा। राजस्थान एस्चीट्स रेग्युलेशन एक्ट के तहत सरकार ने अपनी प्रॉपर्टी माना। उत्तराधिकारी के अभाव में सरकार को सारी प्रॉपर्टी पर कब्जा लेना पड़ा। इसके बाद खेतड़ी ट्रस्ट, सरदार सिंह के परिजनों व सरकार के बीच प्रॉपर्टी पर कब्जे की लड़ाई चली।
दिल्ली व मुंबई स्थित प्रॉपर्टी पर नजर
कोर्ट का फैसला आने के बाद सरकार की नजर खेतड़ी रियासत की दिल्ली व मुंबई में स्थित प्रॉपर्टी पर है। दिल्ली के सरदार पटेल मार्ग पर करोड़ों की संपत्ति है। वहीं मुंबई में भी करोड़ों मूल्य की कई जगह जमीन व भवन है।

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ढहती विरासत के लिए लड़ता खेतड़ी
रोहित परिहार | इंडिया टुडे  28 जनवरी 2015

बहुत-से लोगों ने दिल्ली के दक्षिण पश्चिम में 170 किमी दूर और जयपुर से उत्तर-पूर्वी दिशा में 150 किमी दूर स्थित खेतड़ी के बारे में सुना भी नहीं होगा. यह मनोरम स्थान राजपूत गौरव का इतिहास-स्थल है जो आज अतीत की लोक कथाओं और किस्सों में सिमट कर रह गया है.

यह वही खेतड़ी है जिसकी ओर कभी नरेंद्रनाथ दत्त नाम का शख्स (उसे उस समय स्वामी बिबिदिशानंद के नाम से जाना जाता था) आर्थिक मदद के लिए बार-बार रुख करता और तात्कालिक शासक अजित सिंह बहादुर को लंबे-लंबे पत्र लिखकर अपने विचारों से रू-ब-रू कराता था. अजित सिंह स्वामी के शिष्य थे और उन्होंने ही विवेकानंद नाम सुझाया था. शिकागो में सितंबर 1893 में विश्व धर्म संसद में अपना मशहूर व्याख्यान देने के बाद स्वामी विवेकानंद लौटकर सबसे पहले खेतड़ी ही आए थे.

खेतड़ी ही वह जगह है जहां बचपन में मोतीलाल नेहरू को लेकर उनके बड़े भाई नंदलाल आए थे. नंदलाल वहां के राजा फतेह सिंह के दीवान बनने से पहले शिक्षक थे. इसी खेतड़ी में नंदलाल ने 1870 में फतेह सिंह की मौत की खबर को छिपा लिया था और पास स्थित अलसीसर से अजित सिंह को नौ साल की उम्र में गोद लेकर उनका उत्तराधिकारी बनवाया था. बाद में नंदलाल आगरा चले गए और अंत में वकालत करने के लिए इलाहाबाद में बस गए, जिनकी विरासत को उनके छोटे भाई मोतीलाल और फिर बाद में मोतीलाल के बेटे जवाहरलाल ने आगे बढ़ाया.

आज करीब 150 साल बाद भी खेतड़ी उत्तराधिकार के मुकदमों का गवाह बना हुआ है जहां अंदाजन 2,000 करोड़ रु. से ज्यादा कीमत की संपत्ति के मालिकाना हक पर जंग छिड़ी हुई है, जिनमें एक तीन सितारा हेरिटेज होटल है, जयपुर का खेतड़ी हाउस है और शहर में पहाड़ी पर स्थित गोपालगढ़ का किला है जो लावारिस पड़ा हुआ है (शाही संपत्ति की सूची के लिए देखें बॉक्स). यह सारी संपत्ति 1987 में खेतड़ी के आखिरी शासक राय बहादुर सरदार सिंह की मौत के बाद से राज्य के संरक्षण में है. सरदार सिंह तलाकशुदा थे जिनका कोई बच्चा नहीं था, जिसकी वजह से उनके निधन के बाद राज्य सरकार को 1956 में बनाया गया लेकिन शायद ही कभी इस्तेमाल किया कानून राजस्थान एस्चीट्स रेगुलेशन ऐक्ट लागू करना पड़ा और उत्तराधिकारी के अभाव में सारी प्रॉपर्टी पर कब्जा लेना पड़ा.

तब से कानूनी जंग चली आ रही है. यह लड़ाई तीन पक्षों के बीच है— एक खेतड़ी ट्रस्ट है जिसे सरदार सिंह के वसीयतनामे के हिसाब से बनाया गया था और ट्रस्ट की वेबसाइट के मुताबिक शिक्षा और अनुसंधान कार्यों के लिए सारी प्रॉपर्टी वसीयत में उसे दे दी गई थी. दूसरा पक्ष कानूनी उत्तराधिकारी न होने की स्थिति में सरदार सिंह के परिजनों का है और तीसरा पक्ष राज्य का है.

इस रियासत से अपनी निकटता का दावा करने वालों को हालांकि अदालतों में बहुत कामयाबी नहीं मिली है. दिल्ली हाइकोर्ट ने 2012 में खेतड़ी ट्रस्ट को बड़ा झटका देते हुए 1987 की उसकी याचिका के खिलाफ  फैसला सुनाया, जिसमें सारी शाही संपत्ति को सरकार की ओर से उसे दिए जाने की बात कही गई थी. याचिका पर 30 साल के दौरान 25 जजों ने सुनवाई की और अंत में सरदार सिंह के 1985 के वसीयतनामे की कानूनी वैधता पर फैसला देते हुए अदालत ने कहा कि उसे वसीयतनामे की असलियत पर शक है. इस फैसले के खिलाफ ट्रस्ट की अपील को एक खंडपीठ ने मंजूर कर लिया था लेकिन उस पर फैसला आने में अभी कई और साल लग जाएंगे.
नवंबर 2012 में राजस्थान हाइकोर्ट ने अलसीसर के गज सिंह की याचिका को खारिज कर दिया था, जिन्होंने दावा किया था कि वे सरदार सिंह के दत्तक पुत्र होने के नाते उत्तराधिकारी हैं. उन्होंने तो यहां तक दावा किया था कि सरदार सिंह की मौत के बाद अप्रैल, 1987 में उन्होंने ही पारंपरिक ‘पाग दस्तूर’ (उत्तराधिकारियों मनोनीत करने की परंपरा) की रस्म निभाई थी. हाइकोर्ट के दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने हालांकि अगले साल इसमें संशोधन कर डाला, जिसके बाद जुलाई 2014 में जयपुर के कलेक्टर कृष्ण कुणाल ने खेतड़ी की संपत्ति पर कानूनी उत्तराधिकारियों के दावों को दाखिल किए जाने के लिए उन्हें नोटिस जारी किया.

मुकदमों की इस फेहरिस्त से रामकृष्ण आश्रम भी अछूता नहीं रह सका, जिसे 1958 में सरदार सिंह ने अपने दादा अजित सिंह बहादुर और स्वामी विवेकानंद की स्मृति में एक भव्य भवन और कई अन्य सुविधाएं दान में दी थीं ताकि राजस्थान में आश्रम का पहला केंद्र वहां खोला जा सके. बीते जून में खेतड़ी ट्रस्ट ने रामकृष्ण मिशन के सचिव स्वामी आत्मनिष्ठानंद के खिलाफ  एफआइआर दर्ज करवाते हुए उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने वहां से ट्रस्ट का दफ्तर खाली करवाया है. बाद में ट्रस्ट को उसका दफ्तर सारे सामान के साथ वापस लौटा दिया गया.

इस मुकदमेबाजी का जहां कोई अंत होता नहीं दिखता, वहीं गज सिंह कहते हैं कि अगर खेतड़ी की शाही संपत्ति ट्रस्ट को दे दी जाए तो उन्हें इसमें कोई दिक्कत नहीं होगी. लेकिन वे यह जरूर कहते हैं, “अगर अन्य दावेदार या सरकार अपने मालिकाना हक का दावा करती है तब मैं भी अपनी दावेदारी पेश कर दूंगा.” अदालती फैसले से लगे झटके से ट्रस्टी अब भी उबर नहीं पाए हैं.

मैनेजिंग ट्रस्टी पृथ्वीराज सिंह कहते हैं, “वसीयतनामे पर फैसला देने में अदालत ने बहुत समय लगा दिया और फिर दो साल तक उसे सुरक्षित रखा. इसके बावजूद उसने इस तथ्य की उपेक्षा कर दी कि ट्रस्टी, जो स्थायी नहीं है, उन्हें खुद कुछ नहीं मिलेगा सिवाए इसके कि वे संपत्ति का इस्तेमाल शिक्षा और अनुसंधान के प्रसार के लिए कर सकेंगे.” वे इस ओर संकेत करते हैं कि उनको तो वैसे भी इससे कोई वित्तीय या अन्य किस्म का लाभ नहीं होने वाला. वे कहते हैं कि दिक्कत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि तत्कालीन शाही परिवार के मालिकाना हक वाली विभिन्न चल संपत्ति की सूची नदारद है. इसका अपवाद जयपुर का खेतड़ी हाउस है जहां वैसे भी ज्यादातर दरवाजे और खिड़कियां गायब हो चुके हैं और अनदेखी तथा लापरवाही ने उसकी सारी चमक-दमक को छीन लिया है.

ट्रस्टी लंबे समय से सरकार से शिकायत करते आ रहे हैं कि ऐसा लगता है, ज्यादातर चल संपत्ति चुरा ली गई है लेकिन उनकी शिकायतों पर किसी ने कान नहीं दिया. तत्कालीन शाही परिवार के एक सदस्य ने इंडिया टुडे को बताया कि कुछ साल पहले उनके पास खेतड़ी रियासत की बहुमूल्य तलवार को खरीदने का प्रस्ताव आया था.

सरकारी अफसरों का कहना है कि मामला अदालत में विचाराधीन है इसलिए परिसंपत्ति के रख-रखाव के लिए कोई बजट आवंटित नहीं किया गया है. दूसरी ओर हालत यह है कि गोपालगढ़ का भव्य किला रख-रखाव के अभाव में तकरीबन नष्ट होने के कगार पर है. यहां आने वाले सैलानी इसके चित्रों, शिल्पों और कांच के काम के साथ छेड़छाड़ करते हैं. दीवारों पर चित्र बनाकर उन्हें बदरंग बना दिया गया है. कई दीवारें इसलिए काली पड़ गई हैं क्योंकि लोग वहां खाना पकाने के लिए लकड़ी जलाते हैं जबकि इसे हेरिटेज प्रॉपर्टी होना चाहिए था.

खेतड़ी हाउस को फर्जी हलफनामों के रास्ते कई बार बेचा गया है. एक बार तो महाराष्ट्र के एक कारोबारी नेता ने सार्वजनिक विज्ञापन देकर उसे बेच डाला था जिसका दावा है कि वह विवादित संपत्ति के कारोबार में है. विडंबना ही है कि यह संपत्ति आधिकारिक तौर से सरकार की हिफाजत में है.

सेमिनार पत्रिका के संपादक और पूर्व ट्रस्टी तेजबीर सिंह बताते हैं कि कुछ दावेदारों ने उनके साथ बदसलूकी की थी और उनके खिलाफ एफआइआर दर्ज करवाकर उन्हें प्रताड़ित किया था. फर्जीवाड़े के आरोप में उन्हें बाद में गिरफ्तार कर लिया गया. तेजबीर कहते हैं, “सब गड़बड़झला था; अतिक्रमणकारियों ने संपत्ति पर कब्जा कर लिया और हमारे ऊपर मुकदमे ठोक दिए. इसीलिए मैंने मामले से बाहर निकलने का फैसला किया.” कुछ दूसरे पुराने लोग भी ऐसा ही कर चुके हैं.

फिलहाल मौजूदा ट्रस्टियों में जोधपुर के तत्कालीन महाराजा गज सिंह, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अजित सिंह शेखावत और पृथ्वीराज सिंह अपेक्षाकृत ज्यादा प्रभावशाली लोग हैं लेकिन यह विवाद जितना बड़ा है, उस लिहाज से ये लोग भी खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं. इसके अलावा, इन संपत्ति पर इनका कोई आधिकारिक हक नहीं है, इसलिए गज सिंह के मुताबिक, उन्होंने फर्जी खरीदारों, बेचने वालों और अतिक्रमण-कारियों के खिलाफ 10 एफआइआर दर्ज करवाई हैं और वे मानते हैं कि सिर्फ ट्रस्ट ही इनका ख्याल रख सकता है ताकि शिक्षा के प्रसार में इनका इस्तेमाल किया जा सके.

पहले विश्व युद्ध में खेतड़ी से 14,000 सैनिकों को लडऩे के लिए भेजा गया था, जिनमें 2,000 ने अपनी जान दे दी थी. आज वही खेतड़ी लापरवाही, भ्रम, छल-कपट और अंतहीन मुकदमों की चपेट में अपनी ढह रही शाही विरासत को बचाने की जंग लड़ रहा है.
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खेतड़ी महल : झुंझुनूं
June 21, 2013 By ashishmishr

झुंझुनू राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र का मुख्य जिला है। यह इस क्षेत्र का मुख्यालय भी है। झुंझुनू से लगभग 180 किलोमीटर की दूरी पर है। यह देश की राजधानी दिल्ली से 245 किमी की दूरी पर है। झुंझुनूं की स्थापना 15 वीं सदी में खेमखाणी नवाबों ने की थी। खेतड़ी झुंझुनूं सीकर इलाके का प्रमुख्य शहर है। खेतड़ी और झुंझुनूं शेखावत राजपूतों के प्रमुख ठिकाने रहे हैं। वर्तमान में खेतड़ी की राष्ट्रीय पहचान तांबे की खानों के कारण है। खेतड़ी में राष्ट्रीय संयंत्र ’हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड’ भी इस शहर को अलग और समृद्ध पहचान देता है। खेतड़ी शहर अरावली की कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों के बीच बसा हुआ है।

खेतड़ी : इतिहास

खेतड़ी रियासत की स्थापना निरबान चौहान वंश के राजपूत शासक खेतसिंह निरबान ने की थी। उन्हीं के नाम पर इस शहर का नाम खेतड़ी रखा गया। लेकिन शीघ्र ही इस रियासत पर शेखावत राजपूतों ने कब्जा कर लिया और यह नगर महाराव सार्दुल सिंह ने अपने पुत्र ठाकुर किशनसिंह को ईनाम में दे दिया। खेतड़ी पंचपना रियासत का उपखंड था। क्षेत्र के राजा ठाकुर अजीत सिंह शेखावत एक वीर योद्धा और चतुर शासक थे। उन्होंने क्षेत्र में कई महलों, मंदिरों और किलों की स्थापना की। उल्लेखनीय है कि भारत के महान हिन्दू उपदेशक स्वामी विवेकानंद ठाकुर अजीत सिंह से प्रभावित थे और उनके गहरे मित्र भी थे। खेतड़ी में आज भी स्वामी विवेकानंद की विशाल मूर्ति और शिलालेख देखा जा सकता है। यह खेतड़ी के प्रमुख स्मारकों में से एक है। ठाकुर सरदार सिंह खेतड़ी के आखिरी राजा थे। उनके राज के बाद देश में लोकतंत्र की स्थापना हुई।

नेहरू परिवार से भी खेतड़ी नरेशों के संबंध अच्छे रहे। खेतड़ी राजपरिवार के नेहरू परिवार से दोस्ताना ताल्लुकात थे। खेतड़ी नरेश को जवाहरलाल नेहरू के परिवार में सदस्य की भांति दर्जा मिला हुआ था। जवाहर लाल नेहरू के चाचा नंदलाल नेहरू को खेतड़ी दरबार में प्रमुख ओहदा भी दिया गया था। वे नरेश के करीबी मंत्रियों में शामिल थे। जवाहर लाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू भी अपने जीवन के प्रारंभिक दौर में खेतड़ी रहे थे।

खेतड़ी दुर्ग

खेतड़ी के करिश्माई प्रजापालक राजा अजीत सिंह शेखावत ने यहां एक दुर्ग का निर्माण भी कराया था। अरावली की एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित इस भव्य दुर्ग से खेतड़ी शहर का विहंगम नजारा देखा जा सकता है। दुर्ग के भित्तिचित्र लुप्तप्राय हो गए हैं लेकिन दुर्ग में मूर्तिकला को देखकर यहां के स्थापत्य की समृद्धि का अंदाजा लगाया जा सकता है। खेतड़ी दुर्ग का भ्रमण करना एक सुखद अनुभूति होती है। इस दुर्ग में संगमरमर पत्थर से बने छोटे छोटे मंदिर दर्शनीय हैं।

खेतड़ी महल की वास्तुकला

खेतड़ी महल शेखावाटी क्षेत्र की पारंपरिक स्थापत्य और भवन निर्माण कला का सबसे खूबसूरत उदाहरण है। इस महल को खेतड़ी का हवामहल भी कहा जाता है। इस महल का निर्माण 1770 में खेतड़ी के तत्कालीन ठाकुर राजा भोपाल सिंह ने कराया था। यह महल अपने संकीर्ण गलियारों के कारण विख्यात है। ये कीर्ण गलियारे भूलभुलैया जैसे लगते हैं। यह आश्चर्य की बात है कि महल में ज्यादा खिड़कियां या दरवाजे नहीं है फिर भी इसे खेतड़ी का हवामहल कहा गया है। वर्तमान में खेतड़ी महल उपेक्षित है और सुनसान रहता है। उपेक्षा का शिकार होने बावजूद आज भी महल की बेहतरीन स्थापत्य, निर्माण कला, गलियारे, बरामदे, दीवारें और छतें दर्शनीय हैं और अपने मूल रूप में स्थित हैं। यह खूबसूरत महल भोपालगढ़ के रूप में भी जाना जाता है और रघुनाथ मंदिर के कारण भी महल में पर्यटन की संभावनाएं हैं। अपने खूबसूरत नैसर्गिक दृश्यों से यह महल सभी को प्रभावित करता है।

खेतड़ी का हवामहल

खेतड़ी महल में हवा की निर्बाध धारा बनाए रखने के लिए यहां का ढांचा बहुत ही अद्वितीय तरीके से बनाया गया है। गर्मियों में भीषण धूप और गर्मी से बचने के लिए कई सघन इमारतों को निर्माण किया गया है किसी भी तरह से बहती हुई हवा की अवरोधक नहीं बनतीं। यही कारण है कि इस महल को हवामहल भी कहा जाता है। महल में जहां तक हो सका स्तंभों का सहारा लिया गया है और दीवारों को कम रखा गया। इससे महल के हर हिस्से में निर्बाध रूप से हवा की ताजगी और ठंडक महसूस की जाती थी। महल को विभिन्न स्तरों पर बनाने के बजाए एक सीधी सरल श्रंख्ला में बनाया गया। इस भव्य समानुपातिक प्रणाली से निर्मित होने के कारण सभी मेहराब भी एक श्रंख्ला के रूप में ही दिखाई देते हैं।
इसके अलावा महल में एक विशाल सभाकक्ष भी है जिसकी दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से सुंदर चित्र बनाए गए थे। लेकिन इन चित्रों पर समय की गर्त साफ देखी जा सकती है और कहीं कहीं से ये लुप्त भी हो गए हैं। सभाकक्ष के साथ दो छोटी कोठरियां बनी हुई हैं। अलंकृत मेहराबों और सुंदर कारीगरी युक्त निर्माण को देखकर पर्यटक अभिभूत हो जाते हैं। यह देखना वाकई एक अलग अनुभव है कि महल के सभी कक्ष आपस में स्तंभों की बनावट के द्वारा ही एक दूसरे से जुड़े हैं और खिड़की दरवाजों का प्रयोग नगण्य रहा है। कहीं अन्यत्र इस तरह का अनिर्माण नहीं देखा गया है। शेखावाटी जैसे शुष्क प्रदेश में इतनी सुंदर कला वाकई दिल की गहराईयों में बस जाती है।
खेतड़ी महल की बनावट और स्थापत्य इसलिए भी अन्य महलों से अलग है क्योंकि संपूर्ण महल एक रैंपनुमा धरातल से जुड़ा हुआ है। इसका कारण ठाकुरों को घोड़ों समेत महल के

अनोखे रैंप

हर हिस्से का दौरा करने की सुविधा को ध्यान में रखकर किया गया होगा। यहां तक कि महल की छत तक जाने के लिए इन रैंप का प्रयोग किया जाता था और शहर से आने वाला घुड़सवार यदि घोड़े सहित महल के सर्वोच्च स्तर या छत पर जाना चाहे तो वह जा सकता था। इस तरह के अनोखे रैंप महलों में देखने को मिलते हैं लेकिन इस तरह पूरा महल ही रैंप से जुड़ा हो यह अनोखी बात है।

खेतड़ी का महल अपने समय के बने तमाम महलों से अलग और अनोखा है। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि सरकारी और प्रशासनिक उपेक्षाओं के कारण अब यह महल अपनी पहचान खोता जा रहा है। इतने खूबसूरत स्थापत्य को बचाने के प्रयास किए जाने चाहिए। धीरे धीरे खंडहर में तब्दील होता यह महल दयनीयता से सार संभाल की मांग कर रहा है। खेतड़ी महल भारतीय पर्यटन उद्योग की बड़ी संपत्ति सबित हो सकता है। इस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।

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