मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

आतंकवादी की बरसी बनाम मौलिक कर्तव्य Fundamental Duties


- अरविन्द सिसोदिया, जिला महामंत्री,  भाजपा, कोटा, राजस्थान ।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो कुछ हुआ वह आतंकवाद की पाठशाला से कम नहीं , आश्चर्य ही है कि विश्वविद्यालय प्रशासन भारत की संसद पर आतंकी हमले के लिये जिम्मेदार आतंकवादी की बरसी मनाने की इजाजत कैस दे देता हे। यह कृत्य भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्यों  का उल्लंघन तो है ही। अन्य कानून की बहुत सी धाराओं के अनुसार अपराध भी है।

एक बहुत ही सामन्य सी बात है, जो भी नागरिक संविधान के मूल कर्तव्यों की पालना नहीं करता , वह संविधान विरोधी तो हो ही गया। जो संविधान विरोधी है उसे भारत में रहने का हक क्या हे। 

 मेरा बहुत स्पष्टमत है कि धार्मिक , सरकारी और गैर सरकारी तथा व्यक्तिगत तक की शिक्षाओं में कोई भी भारत विरोधी शिक्षा भारत में देता है या इस तरह के कृत्य के अवसर प्रदान करता है। तो उसकी मान्यता तत्काल निरस्त की जाये और उन चिन्हित व्यक्तियों के विरूद्ध प्रभावी आपराधिक कार्यवाही की जाये।

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मौलिक कर्तव्य Fundamental Duties


सामान्य परिचय
अनुच्छेद 51 (क) के अंतर्गत व्यवस्था है कि, प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि,
वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शोँ, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज तथा राष्ट्र गान का आदर करे।
स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले आदर्शोँ को ह्रदय मेँ संजोए तथा उनका अनुपालन करे।
भारत की संप्रभुता एकता, तथा अखंडता की रक्षा करे तथा उसे बनाए रखे।
देश की रक्षा करे तथा बुलाये पर राष्ट्र की सेवा करे।
मूल कर्तव्य 42वेँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा डॉ. स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर संविधान मेँ शामिल किए गए।
धर्म, भाषा और प्रबंध या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे भारत के लोगोँ मेँ समरसता और समान भातृत्व की भावनाओं का निर्माण करे, स्त्रियोँ के सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करेँ।
हमारी सामूहिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझेँ और उसका परिक्षण करे।
प्राणिमात्र के लिए दयाभाव रखे तथा प्रकृति पर्यावरण जिसके अंतर्गत झील, वन, नदी और वन्य जीव हैं, की रक्षा का संवर्धन करे।
मानववाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा ज्ञानार्जन एवं सुधार की भावना का विकास करे।
हिंसा से दूर रहें तथा सार्वजनिक संपत्ति सुरक्षित रखेँ।
सामूहिक तथा व्यक्तिगत गतिविधियो के सभी क्षेत्रोँ मेँ उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत् प्रयास करे, जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न तथा उपलब्धियों की नई ऊंचाइयोँ को छू ले।

आवश्यक तथ्य
1976 मेँ किए गए 42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पहली बार भारतीय संविधान मेँ एक नया अध्याय 4(क) मूल कर्तव्य शीर्षक के अधीन छोडा गया है, जिसमें नागरिकोँ के 10 मूल कर्तव्योँ का उल्लेख किया गया है।

मौलिक कर्तव्योँ मेँ वृद्धि
86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संविधान के अनुछेद 51ए मेँ संशोधन करके (ट) के बाद नया अनुक्षेद (उ) जोड़ा गया है, “जिसमेँ 14 साल तक के बच्चे के माता-पिता को अपने बच्चे को शिक्षा दिलाने के लिए अवसर उपलब्ध कराने का प्रावधान है।

मूल कर्तव्योँ का समावेश डॉ. स्वर्ण सिंह समिति (1974) की सिफारिशों के आधार पर किया गया था।
भारतीय संविधान मेँ नागरिकोँ के लिए मूल कर्तव्योँ की प्रेरणा पूर्व सोवियत संघ के संविधान से मिली थी।
मूल कर्तव्यों के पालन न किए जाने पर दंड की कोई व्यवस्था न होने पर मूल कर्तव्योँ को न्यायालय मेँ वाद योग्य नहीँ बनाया जा सकता है।
मूल कर्तव्यों को भंग करने के लिए यद्यपि संविधान में कोई व्यवस्था नहीं की गयी है लेकिन संसद को यह शक्ति प्राप्त है की वह कानून बनाकर मूल कर्तव्यों के उल्लंघन की दशा मेँ दोषी व्यक्तियो के लिए दंड की व्यवस्था करे।
मूल कर्तव्य सभी कम्युनिस्ट देशों विशेषकर चीन, रुस के संविधान मेँ मिलता है।
भारत के अतिरिक्त दूसरा प्रजातांत्रिक देश जापान है, जहाँ मूल कर्तव्यों को संविधान मेँ उल्लेखित किया गया है।
राष्ट्र गान मेँ प्रयुक्त शब्द सिंध पर विवाद
एशियाई खेलोँ मेँ भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले एथलीट संजीव भटनागर की याचिका मेँ उन्होंने तर्क दिया की देश के बंटवारे के बाद जब सिंध प्रांत पाकिस्तान का हिस्सा हो चुका है तो इस शब्द को राष्ट्रगान से हटा देना चाहिए। उनका कहना था कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों मेँ परिवर्तन होने पर दुनिया के कई देशोँ ने अपने राष्ट्रगान मे परिवर्तन कर नए राष्ट्रगान अपनाए हैं। सोवियत संघ का राष्ट्रगान इसका ज्वलंत उदाहरण है। सर्वोच्च यायालय ने इस जनहित याचिका को खारिज करते हुए वादी को केंद्र सरकार से संपर्क करने को कहा, जिसमें बाद मेँ गृहमंत्रालय ने संजीव भटनागर को भेजे गए पत्र मेँ बताया कि आधुनिक भारत के निर्माण मेँ सिंधी समुदाय के योगदान को देखते हुए सिंध शब्द को राष्ट्र गान से निकालना उचित नहीँ है। राष्ट्रगान के किसी भी शब्द मेँ बदलाव के प्रयास के बाद इसमें विभिन्न धर्म, संस्कृति अथवा ऐसे अन्य हितों के आधार पर नए शब्दोँ के शामिल करने तथा कुछ को इससे निकालने की मांग उठ सकती है, जो उचित नहीँ होगा।

झंडा विवाद तथा नवीन ध्वज संहिता
पुरानी ध्वज संहिता, जिसमें प्राचीन कालीन प्रावधानोँ की एक लंबी सूची थी, मेँ झंडा फहराने का अधिकार कुछ ही व्यक्तियोँ का विशेषाधिकार था।
वर्ष 2002 मेँ जिंदल समूह के उपाध्यक्ष नवीन जिंदल ने झंडा फहराने के अपने अधिकार पर प्रतिबंध को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च यायालय मेँ जनहित याचिका दायर की।
दिल्ली उच्च यायालय के आदेश की तिरंगा फहराना मौलिक अधिकार है तथा इसके बाद ध्वज संहिता के उदारीकरण के प्रश्नोँ के परिरक्षण हेतु समिति गठित करने के सर्वोच्च नयायालय की अनुशंसा के पश्चात सरकार ने समिति गठित की। समिति की अनुशंसा के आधार पर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तिरंगा फहराने से संबंधित अनावश्यक कठोर नियमो मेँ छूट देने का निर्णय लिया है।

नवीन ध्वज संहिता
कोई भी व्यक्ति केवल सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही झंडा फहरा सकता है।
झंडे की चौड़ाई व लम्बाई का अनुपात 2:3 होना चाहिए।
इसे वस्त्र गद्दे या नैपकिन पर प्रिंट नहीँ करना चाहिए।
अंत्येष्टि के कफन के रुप मेँ इसका प्रयोग न करेँ। वाहनों पर झंडा न लपेटें।
इसका उपरी भाग नीचे (अर्थात उल्टा) करके न फहराएँ व इसे जमीं से स्पर्श नहीं करना चाहिए।
सयुंक राष्ट्र व अन्य देशों के झंडों को छोड कर इसे सभी झंडो से ऊंचा फहराना चाहिए।
क्षतिग्रस्त झंडे को न फहराएं।
संशोधित संहिता 26 जनवरी, 2003 से लागू की गई।

कर्तव्यों का क्रियान्वयन
42वेँ संविधान संशोधन द्वारा संविधान मेँ जिन कर्तव्यों को सम्मिलित किया गया है, सांविधिक कर्तव्य (statutory duties) हैं और वे विधि द्वारा (enforceable law) होंगे।
उन कर्तव्योँ के अनुपालन मेँ विफल होने पर दंड का आरोपण करने के लिए संसद विधि द्वारा दंड विधान करेगी।
हालांकि इस प्रावधान की सफलता बहुत हद तक उस तरीके पर निर्भर करेगी, जिस पर तथा जिन व्यक्तियोँ के ऊपर इन कर्तव्योँ को लागू किया गया है।
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संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 6 तरह के प्रतिबंध लगाता है! 
आप किसे मूर्ख बना रहे रवीश-राजदीप?                                              

मैं कल संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी की व्याख्या पढ़ रहा था। अनुच्छेद 19(2) में स्पष्ट तौर पर 6 बाध्यताएं आरोपित की गई हैं, जो अभिव्यक्ति की आजादी को प्रतिबंधित करती हैं।
जेएनयू के देशद्रोहियों द्वारा लगाए गए नारे अभिव्यक्ति की आजादी के तहत नहीं आते हैं, यह संविधान में स्पष्ट है।
अनुच्छेद 19(2) साफ कहता है राष्ट्र की सुरक्षा को जिस भाषण से खतरा हो।
अब सुनिए- ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी’,  ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह’। क्या इस भाषण में देश को नष्ट करने की गूंज नहीं है?
अनुच्छेद 19(2) साफ कहता है उच्च व सर्वोच्च अदालत की अवमानना।
अब सुनिए- ‘अफजल हम शर्मिन्दा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं’। अब बताइए अफजल को फांसी की सजा देने वाला सुप्रीम कोर्ट कातिल बताया जा रहा है, अफजल को क्षमादान न देने वाले राष्ट्रपति को कातिल बताया जा रहा है और यह पूरी कानूनी प्रक्रिया जिस संविधान पर टिका है, उसे भी कातिल कहा जा रहा है!
क्या यह देश की कानूनी प्रक्रिया को खुली चुनौती नहीं है? उमर खालिद ने तो टीवी स्टूडियो में बैठ कर सुप्रीम कोर्ट को चुनौती देते हुए कहा है- कुछ जज मिलकर कोई फैसला नहीं कर सकते! यह साफ तौर पर देश के कानून का मजाक उड़ाया जा रहा है!
अनुच्छेद 19(2) साफ कहता है राष्ट्र की अखंडता और संप्रभुता पर हमला। अब सुनिए- ‘कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी’, ‘केरल की आजादी तक, जंग रहेगी’। क्या यह भारत के टुकड़े करने की सोच देश की संप्रभुता पर प्रहार नहीं है?
अब बताइए क्या राहुल गांधी, अरविन्द केजरीवाल, सीताराम येचुरी, डी राजा, केसी त्यागी, रवीश कुमार, राजदीप सरदेसाई आदि देशद्रोहियों के ये साथी क्या संविधान से अनभिज्ञ हैं?
जी नहीं, ये संविधान से अनभिज्ञ नहीं हैं, बल्कि देश की सरकार और कानून व्यवस्था को बंधक बनाने के लिए दबाव की राजनीति कर रहे हैं, जिसमें वो काफी हद तक सफल हो चुके हैं! आप देखिए जेएनयू को उमर खालिद व उसके साथी एक आतंक स्थल के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं और देश की कानून व्यवस्था को खुली चुनौती दे रहे हैं!

न ये लोग अफजल पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को मानने को तैयार हैं और न भारत की कानून व्यवस्था के सम्मुख प्रस्तुत हो खुद को निर्दोष साबित करने को तैयार हैं! उल्टा कह रहे हैं कि हमलोगों से पंगा लेना इन्हें महंगा पड़ेगा! देश को खुली चुनौती और किसे कहते हैं?
भिंडरावाले से ये किस प्रकार अलग हैं?
रवीश कुमार और राजदीप सरदेसाई जैसे वामपंथी पत्रकारों ने जनता को देशद्रोह जैसे मूल मुद्दे से भटकाने का प्रयास किया है!
आप देखिए मूढमति लोग आज क्या बात करने लगे हैं- पटियाला हाउस के वकीलों की गुंडागर्दी, भाषण के वीडियो से छेड़छाड़, कश्मीर में भाजपा-पीडीपी सरकार, संघ की साजिश? इनसे पूछिए क्या सारा देश भाजपा या संघ है?
देशद्रोहियों का विरोध क्या इस देश की स्वतंत्र जनता नहीं कर सकती है?
कमाल है! इससे बड़ी फासिस्ट सोच और क्या होगी कि जनता की स्वतंत्र सोच को किसी पार्टी व संगठन की सोच से जोड़ दिया जाए ताकि देशद्रोहियों पर जनता बात करना ही बंद कर दे?
आप देखिए ये ‘लाल सलाम‘ वाले लोग देशद्रोहियों के लिए तो कह रहे हैं कि देशद्रोह के मामले इनसे हटाया जाए( बिना न्यायिक प्रक्रिया से गुजरे) और पटियाला हाउस के वकीलों व वीडियो टेप को लेकर ये सीधे जजमेंटल होकर निर्णय सुना रहे हैं!

देश के कानून और संविधान को जिस तरह से उमर व उसके साथी चुनौती दे रहे हैं, रवीश व राजदीप जैसे वामपंथी भी बौद्धिक चासनी में लपेट कर उसी तरह संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं! दोगलपन-पाखंड और किसे कहते हैं?  जरा वामपंथी हिप्पोक्रेट मुझे समझा दें!

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