सोमवार, 21 मार्च 2016

अफजल की जगह शहीदों का नाम लेते तो गर्व होता

संसद हमले की पीड़िता बोलीं- अफजल के बेटे पर सुर्खियां, मेरी बेटी का जिक्र भी नहीं
उपमिता वाजपेयी  March 20, 2016

नई दिल्ली |
अफजल पर हो रहे हंगामे पर संसद हमले के शहीदों के फैमिली मेंबर्स ने नाराजगी जताई है। हमले में मारे गए कैमरामैन की पत्नी का कहना है कि संसद पर हमले के दोषी अफजल के बेटे को 95% मार्क्स आते हैं तो सुर्खियां बनती हैं, मेरी बेटी टॉप करती है तो कोई नहीं पूछता?

नेता JNU जाते हैं लेकिन हमसे मिलने कोई नहीं आता...
इनसेट में शहीद विजेंद्र सिंह और उनकी पत्नी जयावती। (फाइल)
- हरियाणा-दिल्ली की सीमा पर मोहड़बंद गांव में शहीद विजेंद्र सिंह का घर है।
- उनकी पत्नी जयावती ने कहा- 'संसद पर हमले में शहीद हुए लोगों के तो नाम तक किसी को याद नहीं। उन राजनेताओं को भी नहीं जिनकी जान शहीदों ने बचाई थी।'
- 'सारे नेता जेएनयू जाकर बातें करते हैं लेकिन हमसे मिलने कोई नहीं आता।'
- संसद हमले के दौरान विजेंद्र सिंह संसद में ड्यूटी पर थे।
- जयावती के मुताबिक, 13 दिसंबर 2001 की सुबह 12 बजे के आसपास उनकी बेटी ने जब टीवी पर देखा तो मुझे बताने आई।
- 'मैंने उससे कहा- अरे, जहां तेरे पापा की ड्यूटी है, वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता। विजेंद्र के शहीद होने के बाद पांच बच्चों की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई।'
पिता दस साल हमारे घर में रहे
- 'हमारे यहां लड़की का बाप कभी बेटी के ससुराल नहीं रुकता। लेकिन मेरे पिता दस सालों तक हमारे घर में रहे।'
- 'हम बाप बेटी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रहे। बच्चों को घर में बंद कर के जाना पड़ता। थक गए हम।'
- 'उस पर भी जब अफजल की फांसी की बारी आई तो राजनीति करने लगे।'
- 'हमने तो अपने मेडल तक लौटा दिए थे। वो कहते थे मेडल मत लौटाओ। अरे मेडल मतलब जीत, सम्मान। तो जब गुनहगार को फांसी नहीं दे रहे थे तो कैसा सम्मान।'
हर साल आती है सिर्फ चिट्ठी
-जयावती कहती हैं- साल में सिर्फ एक चिट्‌ठी आती है। संसद के ऑफिस से।
- 'बोलते हैं 13 दिसंबर को आ जाओ और फूल चढ़ाकर श्रद्धांजलि दे दो। बाकी दिनों में कोई उनकी खोज-खबर नहीं लेता।'
- वो पिछले आठ सालों से आ रही चिट्‌टठियां निकालकर दिखाती भी हैं।

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शहीद कमलेश कुमारी। (फाइल)
अफजल की जगह शहीदों का नाम लेते तो गर्व होता
- कमलेश कुमारी के पति अवधेश कुमार का कहना है कि ये कहानी किसी एक शहीद के परिवार की नहीं है।
- उन्होंने बताया कि हमले की दिन कमलेश संसद के गेट पर थी। दुश्मन की गोली की परवाह किए बिना उन्होंने गोलियों के बीच संसद का गेट बंद कर दिया था। उनके इस साहस के लिए उन्हें अशोक चक्र दिया गया था। ये सम्मान पाने वाली वो देश की इकलौती महिला सोल्जर हैं।
- अवधेश ने बताया कि उनकी दो बेटियां हैं। ज्योति और श्वेता।
- कमलेश चाहती थी हमारी बेटियों की पढ़ाई अच्छे से हो इसलिए हम दिल्ली में रहते थे।
- 'मेरी बेटियां भी अपनी मां की तरह बहादुर हैं। देश सेवा करना चाहती हैं। लोग जितनी बार अफजल और आजादी का नाम लेते हैं उतनी बार शहीदों का लेते तो हमें गर्व होता कि कोई याद तो करता है।'
- 'अफजल को ऐसे बनाया जैसे कारगिल वॉर जीतकर आया हो। घर में तलवार चला रहे हैं। चलो पाकिस्तान के बॉर्डर पर।'
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शहीद मातबर सिंह की पत्नी। (फाइल)
शहीदों के घर कोई नहीं जाता
- शहीद मातबर सिंह नेगी के बेटे गौतम नेगी ने कहा कि उन्होंने पिता की मौत से पहले कभी घर में बिजली का बिल भी नहीं भरा था। सारी जिम्मेदारी पापा ने निभाई थी।
- मातबर सिंह संसद की सिक्युरिटी में थे। अब गौतम उन्हीं की जगह नौकरी करता है।
- गौतम के मुताबिक, कोई शहीद होता है तो उसके घर एक दिन नेता जाते हैं। बाकी दिन परिवार उन नेताओं और सरकारी अधिकारियों के चक्कर काटता है।
- 'नेता जानते हैं वोट बैंक कन्हैया और अफजल हैं।'
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विक्रम बिष्ट की पत्नी सुनीता। (फाइल)

अफजल के नाम पर जलसे क्यों ?
- सुनीता के पति विक्रम बिष्ट एएनआई न्यूज एजेंसी के कैमरामैन थे।
- वो कहती हैं कि मेरे पति हमला हुआ तो भागे नहीं, रिकॉर्डिंग करते रहे। पेट में गोली लगी थी।
- 'जब हमला हुआ मेरी बेटी तीन महीने की थी। वो भी बहुत अच्छा पढ़ती है। स्कूल में अच्छे नंबर लाती है। उसको भी मैं डॉक्टर बनाऊंगी। लेकिन उसके नंबर तो कोई नहीं पूछता।
- 'वो आतंकवादी अफजल का बेटा 95 फीसदी ले आया तो बड़ी तारीफें हुई उसकी।'
- 'अफजल के नाम पर जलसे हो रहे हैं। कश्मीर से लेकर दिल्ली तक बरसी मनाई जाती है।'
- सुनीता कहती हैं, मैं पहली बार दिल्ली आई थी तो सारे मकान एक से दिखते थे। नहीं जानती थी कि शहर में रहते कैसे हैं।
- 'हमले के बाद पति का एम्स में एक साल इलाज चला। फिर उनकी मौत हो गई।'
- 'मैं दसवीं पास थी। फिर बच्चों के लिए नौकरी करनी पड़ी। बेटा पूछता था सबके पापा हैं तो मेरे क्यों नहीं। मैं कहती थी वो ऊपर हैं जब तुम बड़े हो जाओगे तो वो आ जाएंगे।'

गुरुवार, 17 मार्च 2016

देशहित के लिऐ भाजपा कार्यकर्ता निरंतर पार्टी को मजबूत करते रहें - नारायण पंचारिया






देशहित के लिऐ भाजपा कार्यकर्ता निरंतर पार्टी को मजबूत करते रहें - नारायण पंचारिया


17 मार्च कोटा । भाजपा के प्रदेश महामंत्री एवं राज्यसभा सांसद नारायण पंचारिया ने गुरूवार को कोटा सर्किट हाउस में प्रातः 11 बजे भाजपा शहर जिला कोटा की बैठक ली तथा पार्टी को निंरंतर मजबूत करने का आव्हान किया। अध्यक्षता जिला अध्यक्ष हेमन्त विजयवर्गीय ने की तथा संचालन जिला महामंत्री अरविन्द सिसोदिया ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन जिला महामंत्री अमित शर्मा ने किया।
उन्होने कहा “ कार्यकर्ताओं के त्याग तपस्या और बलिदान से अपनी भाजपा ग्राम पंचायत के पंच से लेकर प्रधानमंत्री तक है। केन्द्र की सत्ता में आने के बाद देश का सभी स्तरों पर मान सम्मान स्वाभिमान बढ़ा है। विकास के कार्यों ने गति पकड़ी है, रूके पडे कार्यों को पूर्ण करने की दिशा में देश चल पडा है। हर क्षैत्र में हर वर्ग में मोदी सरकार की सराहना हो रही है। भाजपा की राज्य सरकारें विकास की कल्याणकारी नीतियां बना कर काम कर रहीं हैं। ”
उन्होने कहा ” देश की सरकार क्यों चल रही है, उसका मान सम्मान क्यों बड रहा है, विजन बना कर काम क्यों हो रहे हैं, कांग्रेस और कम्युनिष्टों को भा नहीं रहा हे। वे राजनैतिक द्वेषता एवं निहित स्वार्थ की राजनीती के लिये निरंतर बाधा उत्पन्न कर रहे है। मोदी सरकार के विरूद्ध , धुर विरोधी रहे कांग्रेस और कम्युनिष्ट अब आपस में समझोता कर राह रोकनें के प्रयत्नों में रत हैं।“
पंचारिया ने कहा ” देश विरोधी ताकतों एवं विपक्ष की राजनैतिक स्वार्थ से उत्पन्न स्थिती में कार्यकर्ता की भूमिका ओर भी बढ़ जाती है। कार्यकर्ता सिर्फ सत्ता के सिंहासन तक लानें वाला ही नहीं होता बल्कि वह सुशासन की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ जनता को दिलानें में सहायक की भूमिका निभानें वाला भी बनें और भ्रम पूर्वक फैलाये जा रहे झूठ के बादलों को छांटने वाला भी बनें।“ उन्होने कहा “ भाजपा का जन्म ही देशहित के लिये हुआ है उसे देशहित से कोई रोक नहीं सकता, कार्यकर्ता सरकार के कार्यों को जन जन में लेजाकर सरकार को शक्ति प्रदान करें , उसे मजबूती दें।”
भाजपा के जिला अध्यक्ष हेमन्त विजयवर्गीय ने कहा भाजपा शहर जिला कोटा केन्द्र एवं राज्य सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं की जानकारीयां पत्रक के द्वारा जन जन तक पहुंचायेगी।
भाजपा के जिला अध्यक्ष हेमन्त विजयवर्गीय ने पार्टी के कार्यकर्ताओं का परिचय करवाया तथा पंचारिया ने कार्यकर्ताओं से बातचीत की । इस दौरान प्रमुख रूप से पूर्व मंत्री मदन दिलावर, उप महापौर श्रीमती सुनीता व्यास, महामंत्री जनजाती मोर्चा प्रहलाद पंवार, प्रदेश कार्यकारणी सदस्य हनुमान शर्मा, वरिष्ठ भाजपा नेता जटाशंकर शर्मा, पूर्व जिला अध्यक्ष महेश विजयवर्गीय, पूर्व जिला अध्यक्ष मनमोहन जोशी, पूर्व प्रदेश मंत्री हीरेन्द्र शर्मा, कोर कमेटी सदस्य महेश वर्मा, जिला उपाध्यक्ष कृष्णकुमार रामबाबू सोनी, विशाल जोशी, अशोक चौधरी, लक्ष्मणसिंह खीची, त्रिलोक सिंह, जिला मंत्री मुकेश विजय,राकेश मिश्रा,राजेन्द्र अग्रवाल,कैलाश गौतम, अशोक जैन, अमित दाधीच,अर्थपाल सिंह,कोषध्यक्ष कपिल जैन,एस सी मोर्चा जिला अध्यक्ष अशोक बादल, किसान मोर्चा जिला अध्यक्ष गिरिराज गौतम , पूर्व महामंत्री नेता खण्डेलवाल, पूर्व महामंत्री दिनेश सोनी, रविन्द्रसिंह सोलंकी, किशन पाठक, पार्षद कृष्णमुरारी सांवरिया, महिला मोर्चा की श्रीमती कृष्णा खण्डेलवाल, श्रीमती प्रभा तंवर, श्रीमती संगीता महेश्वरी, रेखा खेलवाल, राधारानी श्रीवास्तव, युवा मोर्चा से प्रद्युमन सिंह पौमी, प्रखर कौशल, सचिन मिश्रा,देबू राही, गोपालकृष्ण सोनी सहित बडी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता उपस्थित थे।
अरविन्द सिसोदिया
जिला महामंत्री
9414180151

बुधवार, 16 मार्च 2016

भारत में अनिवार्य हो सैन्य प्रशिक्षण

भारत में अनिवार्य हो सैन्य प्रशिक्षण
(7 Feb)
अजीत शर्मा लेखक,
विहार विधानसभा के सदस्य हैं

 भारतीय सुरक्षा परिवेश पर नजर डाली जाए तो यह तथ्य उभर कर सामने आता है कि न तो हमारी सीमाएं सुरक्षित हैं और न ही सीमा के अंदर का कोई क्षेत्र। आज भारत के समक्ष सुरक्षा चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं। ऐसे में अधिक सजग रहने की आवश्यकता है। यह जरूरत तब तक बनी रहेगी जब तक कि दक्षिण एशिया में भारत के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी पड़ोसी देशों पाकिस्तान व चीन हथियारों की प्रतिस्पर्धा समाप्त नहीं करते, या फिर इन देशों के साथ भारत के आपसी संबंध मधुर नहीं बनते। दूसरी तरफ, देश के अंदर फैला आतंकवाद जन-जन की सुरक्षा के लिए खतरा बना हुआ है। कहने का तात्पर्य यह कि भारत का प्रत्येक नागरिक असुरक्षा की परिधि में आ चुका है और असुरक्षा की यह परिधि तभी समाप्त हो सकती है, जब भारत का हर नवयुवक सुरक्षा के लिए न सिर्फ कुशल तरीके से प्रशिक्षित हों, बल्कि अपनी व अपने देश की सुरक्षा करने में सक्षम हो। फिलहाल, सरकार इसके लिए तैयार होती दिखाई नहीं पड़ रही। विदित हो कि कुछ दिन पहले राज्य सभा सांसद अविनाश राय खन्ना ने निजी विधेयक के जरिए कहा था कि रूस और इजरायल की तर्ज पर भारत के किशोरों व युवाओं को भी अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। साथ ही, स्कूल में 10वीं के स्तर तक के पाठ्यक्रम में भी सैन्य प्रशिक्षण को शामिल किया जाना चाहिए। इस विधेयक के जवाब में रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने कहा कि यह योजना अच्छी है, लेकिन फिलहाल इस पर अमल करना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि आर्थिक कारणों से देश के तकरीबन 16 करोड़ किशोरों को अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण देने की योजना को अमल में नहीं लाया जा सकेगा। हां, उन्होंने यह जरूर कहा कि सीमावर्ती इलाकों के किशोरों को सैन्य प्रशिक्षण देने का प्रयोग जरूर किया जा सकता है। वर्तमान में संसार के सभी देश अपनी सजगता का परिचय देते हुए अपनी सजगता का परिचय देते हुए अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निरंतर युद्ध की तैयारियों में प्रयत्नशील हैं और कई देशों ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति के कारण ऐसे महाविनाशक हथियारों का निर्माण कर लिया है, जिनकी मदद से समस्त धरा को क्षण भर में ही ध्वस्त किया जा सकता है। वहीं, दूसरी तरफ भारत समेत विश्व भर में आतंकवाद और अलगाववाद की जड़ें इतनी गहराई तक पहुंच चुकी हैं कि उन्हें उखाड़ फेंकना मुश्किल दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, चीन की बढ़ती सैन्य ताकत एवं बांग्लादेश में बढ़तीं भारत विरोधी गतिवधियां भारतीय सुरक्षा व्यवस्था को अधिक मजबूत बनाने की चेतावनी दे रही है। देश में फैले आतंकवाद एवं अलगाववाद से निपटने तथा भारत की आंतरिक व बाहरी सुरक्षा के लिए जरूरी यह है कि सैन्य अध्ययन एवं प्रशिक्षण को अनिवार्य करते हुए युद्धों तथा उनके परिणामों के बारे में प्रत्येक नागरिक को जानकारी होनी चाहिए। तभी मानवीय मूल्यों की रक्षा हो सकेगी और मानवता के खिलाफ जारी संघर्ष को समाप्त किया जा सकेगा। इसके लिए देश की युवा शक्ति को जागरूक व सक्रिय होने की जरूरत है, परंतु दु:ख इस बात का है कि भारत की नई पीढ़ी का एक हिस्सा दिशाहीन व दिग्भ्रमित है। इसलिए ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में सुरक्षा से जुड़ीं मुख्य बातों, युद्ध के परिणामों की जानकारी तथा विश्व शांति स्थापना में सक्रिय सहयोग देने हेतु युवाओं के लिए सैन्य प्रशिक्षण की अनिवार्यता महसूस की जाने लगी है। इन चुनौतियों एवं स्थितियों के मद्देनजर सरकार को चाहिए कि देश के समस्त महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में सैनिक प्रशिक्षण को अनिवार्य किए जाने की योजना को मूर्त रूप प्रदान करे। युवाओं को कम से कम दो साल का सैनिक प्रशिक्षण अवश्य रूप से दिया जाना चाहिए। यदि इसे संवैधानिक रूप से देखा जाए तो संविधान में उल्लेख है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है कि वह राष्ट्र सेवा व रक्षा के लिए तत्पर रहे। इस मुद्दे पर चिंतन मनन किया जाए तो यह निर्णय भारतीय सुरक्षा परिवेश को काफी मजबूत बनाएगा। वर्तमान समय में विश्व के तकरीबन सात दर्जन देशों में सैन्य अध्ययन एवं प्रशिक्षण अनिवार्य है, जिनमें ईरान, इराक, इजरायल, मिस्त्र, ताइवान, रूस, जर्मनी, सूडान, कोरिया, अंगोला एवं अल्जीरिया आदि प्रमुख हैं। सैनिक प्रतिभा के धनी, महान सैन्य विचारक, दुर्दमनीय योद्धा व महान शासक नैपोलियन ने अनिवार्य सैनिक सेवा योजना लागू करके ही अपनी सैन्य शक्ति को कई गुना ज्यादा बढ़ाकर विभिन्न प्रकार की जीतें हासिल की थीं। यही नहीं, स्वीडन के सम्राट गुस्टावस एडाल्फस ने भी अनिवार्य सैनिक भर्ती योजना लागू करके अनेक सफलताएं अर्जित कीं और सत्रहवीं शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ सैनिक अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध हुए। अब सवाल उठता है कि इस प्रशिक्षण का प्रारूप किस तरह का होना चाहिए। वितद हो कि भारत के अनेक विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में इस समय रक्षा अध्ययन, सुरक्षा अध्ययन, युद्ध अध्ययन, स्त्रातजित अध्ययन, सैन्य अध्ययन एवं सैन्य विज्ञान आदि नामों से एक ही पाठ्यक्रम की पढ़ाई जारी है। इन सभी का पाठ्यक्रम सैन्य संगठनों, शस्त्रास्त्रों के विकास, विशेषताओं व प्रयोग के अध्ययन के साथ-साथ युद्ध कला, युद्ध कौशल एवं प्रशासन से संबंधित जानकारी प्रदान करता है। इसके अलावा, इनके अध्ययन में सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, भौतिक, मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक, औद्योगिक व सांस्कृतिक आदि सभी तत्व आते हैं, और यही तत्व राष्ट्रीय चेतना व जागरूकता के मूल आधार है। इन्हीं तत्वों व मूल आधारों से युवाओं में कर्तव्य निष्ठास, नि:स्वार्थ राष्ट्र सेवा, राष्ट्र के लिए त्याग व सर्वोच्च बलिदान भावना, सामाजिक हित व प्रतिबद्धता अनुशासन, राष्ट्रीय एकता व अखंडता जेसे मूल गुणों का विकास होता है। इनसे ही राष्ट्रीय कूटयोजना व समरतंत्र सशक्त बनता है। अपने विभिन्न प्रकार के पाठ्यक्रमों के तहत इस अध्ययन में नवयुवक व युवतियां इतिहास के आरंभ से अब तक के क्रम में वैदिक, रामायण, महाभारत, मौर्य, राजपूत मुगल, मराठा, सिख, तथा ब्रिटिशकालीन सैन्य व्यवस्था की जानकारी के साथ-साथ स्वतंत्र भारत के रक्षा संगठन एवं शस्त्रास्त्रों की जानकारी हासिल करते हैं। इसके अतिरिक्त, विश्व प्रसिद्ध अन्य सैन्य व्यवस्थाओं व युद्धों के अध्ययन से प्राप्त सैन्य शिक्षाओं व अनुभवों से भिज्ञ होते हैं। यही नहीं, युद्ध की परिभाषा, क्षेत्र विशेषताओं, कमियों, युद्ध के सिद्धांत, कूटयोजना, समरतंत्र आदि के अलावा भारत की रक्षा नीति, परमाणु नीति, विदेश नीति, पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की ििसति, युद्धकालीन वित्त व्यवस्था व लागत, रक्षा बजट, नागरिक-सैनिक संबंध व नागरिक प्रशासन में सैनिक सहयोग आदि की जानकारी हासिल करते हैं। इस विषय का दूसरा हिस्सा, जिसे युवा वर्ग प्रयोगात्मक रूप में पढ़ता है, भी सैन्य प्रशिक्षण ही है। शांति एवं युद्धकाल के लिए एक कमांडर व उसके दल के सैनिक अपनी क्षमता-दक्षता विकसित करने के लिए कुछ खास चीजें भी सीखते हैं। इनमें वे सैनिक सांकेतिक चिह्नों की जानकारी, मानचित्र अध्ययन, दिशाओं का विस्तृत ज्ञान, दिक्मान परिवर्तन, कम्पास व सर्विस प्रोटेक्टर के उपयोग के अलावा अंत:दृष्टि गोचरता, ढालांश, प्रावण्य, प्लाटून संगठन बटालियन सहित व उनके हथियार, फायर प्रयोग, फायर आदेश क्रम, फायर नियंत्रण आदेश, मौखिक आदेश, क्षेत्र कला, गश्ती दल व उसके कार्य, आक्रमण व प्रतिरक्षा की स्थिति में संग्राम कार्यविधि, संदेश भेजने व लिखने के तरीके, प्लाटून व सेक्शन की सामरिक संरचनाओं के साथ-साथ विभिन्न प्रकार की युद्ध व शांतिकालीन जानकारी हासिल करते हैं। इस तरह के अध्ययन के बाद नवयुवक सैन्य गुणों से परिपूर्ण व समस्त सुरक्षा चुनौतियों को समझने में सक्षम हो जाता है। यदि सरकार उपर्युक्त विषय की अध्ययनवस्तु पर गंभीरतापूर्वक विचार करे तो अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण योजना को लागू किया जा सकता है। इसके लागू हो जाने से भारत विश्व के उन देशों की सूची में सम्मिलित हो जाएगी जिनमें युवाओं के लिए सैन्य प्रशिक्षण अनिवार्य है।वैसे, रक्षा की द्वितीय पंक्ति के रूप में युवाओं के लिए नेशनल कैडेट कोर ऐच्छिक कार्यक्रम पहले से ही चल रहा है, लेकिन इसमें छात्र-छात्राएं सीमित संख्या में होते हैं, और यह खचीर्ला होने के साथ ही सीमित पाठ्यक्रम वाला कार्यक्रम है। इसलिए अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण के लिए इसकी अनिवार्यता में सफलता के अवसर कम दिखाई देते हैं। जहां तक राष्ट्रीय सेवा योजना क बात है, तो वह समाज सेवा से जुड़ा कार्यक्रम है। ऐसे में भारत के युवाओं के लिए उचित यही होगा कि सैन्य प्रशिक्षण की अनिवार्यता के लिए कम खर्चे वाले तथा आसानी से लागू हो जाने वाले विषय पर फैसला किया जाए जिससे रक्षा व अन्य चुनौतियों से निपटने वाली युवा पीढ़ी शीघ्र तैयार हो सके। ( सोमनाथ आर्य से बातचीत पर आधारित )

मंगलवार, 15 मार्च 2016

'तब कहां थे अभिव्यक्ति के पैरोकार' : तरुण विजय


'तब कहां थे अभिव्यक्ति के पैरोकार'

तारीख: 14 Mar 2016  अतिथि लेखक - तरुण विजय
http://panchjanya.com

कोई आजादी संपूर्ण नहीं होती, परंतु इस संपूर्णता का अनुभव सबसे अधिक उसी भूमि पर हो सकता है जहां हिंदू बहुसंख्यक हो। यह इस देश में ही संभव है कि आप मूर्ति पूजक हैं या मूर्तिपूजा का खंडन करते हैं, आस्तिक हैं, नास्तिक हैं या स्वयं को ही भगवान घोषित करते हों तब  भी.. कोई आपत्ति नहीं करेगा। न ही आपको काफिर घोषित कर दंडित करेगा। लेकिन कोई भी स्वतंत्रता अमर्यादित, निस्सीम और संविधान-निरपेक्ष नहीं हो सकती। आज संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोगकर मुक्त विचारों के हिंसक प्रतिरोधी गुट उसी संविधान और लोकतंत्र पर हमला कर रहे हैं।
जिस देश ने पृथ्वी पर सहिष्णुता और भिन्न मत के प्रति आदर के कीर्तिमान स्थापित किए उस माटी के पुत्रों को वे लोग सहिष्णुता का ककहरा समझा रहे हैं जिनके हाथ असहिष्णु, बर्बर व्यवहार के इतिहास में रंगे हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे संगठनों को धन्यवाद देना चाहिये जिसने जेएनयू के देश विरोधी वगार्ें को भी जय हिंद बोलना और तिरंगा लहराना सिखा दिया और सिद्ध कर दिया कि भारत में केवल तिरंगे के लिए जीने-मरने वालों की विजय हो सकती है, न कि तिरंगा जलाने वालों की। दुर्भाग्यवश आज सहिष्णुता और विभिन्न मतों के प्रति आदर को उन विचारधाराओं से खतरा है जिन्होंने दुनिया भर में दूसरों के विचारों का दमन किया। चीन में माओ की सांस्कृतिक क्रांति के कारण चार करोड़ से अधिक लोगों का समूल नाश हुआ। कंबोडिया के कम्युनिस्ट शासक पोल पॉट की क्रूरता का शिकार एक-तिहाई जनता बनी। और इन सबसे कहीं पहले, कम्युनिस्ट रूस में गुलाग और साइबेरिया के शिविरोंं में उन लोगों की सामूहिक हत्याएं हुईं जो बोल्शोविक क्रांतिकारियों से भिन्न विचार रखते थे। भारत में ही केरल के मुख्यमंत्री ईएमएस नम्बूदरीपाद ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि उन्होंने संविधान की शपथ तो ली है, परंतु वे उसे अंदर से तोड़ने का काम करेंगे। ('एंथरो महानुभावुलु' द ऑटोबायोग्राफी ऑफ सी़पी़ नायर, पूर्व मुख्य सचिव, केरल)।
संविधान को तोड़ने की घोषणा करने वाले वही लोग आज अपनी कमियां छुपाने के लिए 'सहिष्णुता' और 'अभिव्यक्ति की आजादी' का शोर मचा रहे हैं, जिसके तहत वे कभी इसी संविधान और अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी देने वाली न्यायपालिका से नाखुशी जताते थे।
जेएनयू की दीवारों पर वाम संगठनों ने ऐसे पोस्टर चिपकाए जिसमें याकूब मेमन को फांसी सुनाने वाले सवार्ेच्च न्यायालय के जज को 'मनुवादी' घोषित किया गया। इनकी नजर में 900 भारतीयों की जानें लेने वाला याकूब 'निदार्ेष'और देर रात तक सुनवाई कर प्रमाणों के आधार पर सजा सुनाने वाला जज पक्षपातपूर्ण था।
दरअसल, यह विरासत उनकी है जो अपनी राष्ट्र-विरोधी हरकतें छुपाने के लिए अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार बन बैठे हैं। इन तत्वों की अभिव्यक्ति तब खामोश हो जाती है, जब दिल्ली में 3,000 से अधिक सिखों का नरसंहार होता है, जब लाखों कश्मीरी हिंदुओं को घर-बार छोड़कर घाटी से भागने को विवश कर दिया जाता है, जब नंदीग्राम हत्याकांड होता है! लेकिन जब पता लगता है कि इशरत जहां लश्कर आतंकी थी तो वे आतंकी के बचाव में मुखर हो उठते हैं। जो सियाचिन में (-)चालीस डिग्री तापमान में सरहद के रखवाले जवान के प्रति सम्मान नहीं रखते, जो किसानों की भलाई के लिए सर्वाधिक लाभकारी योजनाएं बनाने वाले प्रधानमंत्री के विरुद्ध घटिया वाक्य प्रहार करते हैं, क्या अब उनसे सीखना होगा कि देश को कैसे सहिष्णु-लोकतांत्रिक बनाया जाए? 
वास्तव में जिन तत्वों ने पिछले बारह वर्ष लगातार एक विचारधारा और उसके श्रेष्ठ शासक के विरुद्ध तर्कहीन आरोपण किया, वे उसी नायक को अभूतपूर्व बहुमत के साथ विजयी होते देख सहन नहीं कर पाये। अब ऐसे लोग झूठे मुद्दे गढ़कर मीडिया के एक वर्ग के कंधों पर चढ़कर जनादेश पर आघात करना अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मान रहे हैं। भारत के गरीब, किसान, मजदूरों को इन्हीं वामपंथी गुटों के कारण अथाह अंधकार का युग झेलना पड़ा। ये वह निर्दयी और संवेदनहीन लोग हैं जिन्हें कन्हैया की माताजी का उल्लेख कर आंसू बहाने का तो ख्याल आता है लेकिन झारखंड की बहादुर बेटी संजीता कुमारी की मां का ध्यान नहीं आता जिन्होंने अपनी बीस साल की होनहार बेटी को माओवादियों की क्रूरता का शिकार होते देखा क्योंकि संजीता ने शिक्षा को बर्बर माओवादियों की राह से बेहतर माना था। क्या अभिव्यक्ति की आजादी वालों, जेएनयू के लाल सलाम वालों को संजीता का दु:ख, दु:ख नहीं लगता? इसलिए कि संजीता को मारने वाले जेएनयू के वामपंथियों के सहोदर, वैचारिक भाई हैं?
(लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं)

सोमवार, 14 मार्च 2016

देश में 58477 स्थानों पर संघ की शाखाएं लगती हैं

नागौर में हुई संघ की अ.भा.प्रतिनिधि सभा बैठक में
अनुकूल परिस्थिति का लाभ उठाने का आह्वान

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वीर भूमि राजस्थान के इतिहास में 36 राजवंशों का उल्लेख मिलता है। इनमें मेवाड़ का सीसोदिया वंश तो विश्व-विख्यात है, किन्तु साहस, शौर्य और पराक्रम में चौहानों का भी कोई सानी नहीं रहा। दिल्ली और अजमेर के सम्राट पृथ्वीराज चौहान अपने समय के अग्रणी योद्धा थे। पुराणों में बताया गया है कि ॠषियों ने दैत्यों का सामना करने के लिये एक यज्ञ कुण्ड निर्मित किया। उसमें बारी-बारी से चार योद्धा प्रकट हुए। पहले तीन तो दैत्यों से पराजित हुए। चौथे योद्धा का नाम चौहान (चाह-मान अर्थात् चार भुजाओं वाला) रखा गया और उसने दैत्यों को पराजित किया। ऐसे महा-पराक्रमी चौहानों की एक शाखा नाडौल में थी। नाडौल में तैनात वीरवर पज्जूनराय ने मोहम्मद गोरी को धूल चटाई थी।

यही नाडौल आज-कल नागौर के नाम से प्रसिद्ध है। इस ऐतिहासिक नगरी में 11,12 तथा 13 मार्च को रा.स्व.संघ की अ.भा.प्रतिनिधि सभा की बैठक हुई। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा संघ की सर्वोच्च नीति-नियामक इकाई है। तीन साल में एक बार होने वाले चुनावों में चुने गये प्रतिनिधि इसमें आते है। उनके अतिरिक्त देश के सभी प्रांतों व क्षेत्रों की कार्यकारिणी तथा समान विचार वाले संगठनों के प्रमुख राष्ट्रीय पदाधिकारी भी इसमें रहते हैं। संघ की रीति-नीति सम्बन्धी सभी निर्णय तीन दिनों की इस बैठक में होते है। नागौर की इस बैठक में देश के कोने-कोने से आये लगभग बारह सौ कार्यकर्ता सम्मिलित हुये।
11 मार्च को प्रातःकाल इस बैठक की विधिवत् शुरुआत हुई, जिसमें सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ने गत एक वर्ष की गतिविधियों का विवरण प्रतिवेदन के रुप में प्रस्तुत किया। इसमें संगठन की एक वर्ष में हुई प्रगति, प्रमुख कार्यक्रम एवं वर्तमान परिस्थितियों का उल्लेख था। प्रारम्भ में गत एक वर्ष में दिवंगत हुए जाने-माने महानुभावों को श्रद्धांजलि दी गई। संघ एवं समान विचार वाले अन्य संगठनों के प्रमुख कार्यकर्ता तथा राजनीति, कला साहित्य आदि से जुड़े दिवंगत महानुभावों का आदर पूर्वक स्मरण किया गया । जयपुर प्रांत के पूर्व संघ-चालक श्री बीरेन्द्र प्रसाद अग्रवाल, भारतीय मजदूर संघ-राजस्थान के संगठन मंत्री रामदौर सिंह तथा विहिप के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष श्री जगन्नाथ गुप्ता को भी भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। बाढ़ में अकाल काल-कलवित हुए चेन्नई-वासियों तथा सियाचिन में ग्लेसियर की आपदा का शिकार बने सुरक्षा-बल के जवानों को भी श्रद्धा-सुमन अर्पित किये गये।

सरकार्यवाह भैय्या जी जोशी ने प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि पठानकोट स्थित वायु-सेना की छावनी पर हुआ आतंकी हमला चिंताजनक है तथा सीमाओं की सुरक्षा में अधिक सावधानी की आवश्यकता है। माल्दा में दिखे साम्प्रदायिक उन्माद पर भी उन्होंने चिन्ता जताई और राजनैतिक पार्टियों से तुष्टीकरण की नीति त्यागने का आग्रह किया। कतिपय विश्वविद्यालयों में बढ़ती राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों और कुछ राजनैतिक दलों का इनको समर्थन को भैय्याजी ने अनुचित बताया और ऐसे तत्वों पर कड़ी कार्रवाई किये जाने की जरूरत बताई।

महिलाओं के मन्दिर प्रवेश को लेकर उठे विवादों को सरकार्यवाह ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया और ऐसे मामलों का राजनीति-करण न करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामले आपसी बात-चीत से हल किये जाने चाहिये। इसी प्रकार आरक्षण की माँग के समर्थन में होने वाले हिंसक आन्दोलनों को उन्होंने सामाजिक सौहार्द्र में बाधक बताया। इसी के साथ उन्होंने देश के उज्ज्वल भविष्य की ओर भी संकेत किया। उन्होंने कहा-
“वैश्विक स्तर पर बहुसंख्य देशों द्वारा ‘योग-दिवस’ की स्वीकार्यता भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन एवं जीवन शैली की स्वीकार्यता ही प्रकट करती है।” देश में संघ-कार्य के प्रति बढ़ती अनुकूलता का लाभ उठाने का आह्वान भी उन्होंने किया।
तीन दिन की बैठक में शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सामाजिक समरसता पर विस्तार से चर्चा हुई तथा तीन प्रस्ताव भी पारित किये गये।
इस बार 1 लाख 37 हजार को प्रशिक्षण
वर्ष 2015 में पूरे देश में 1 लाख 37 हजार 351 स्वयंसेवकों ने विभिन्न प्रशिक्षण वर्गों में संघ की रीति-नीति का शिक्षण प्राप्त किया। इनमें से 1 लाख 12 हजार 520 स्वयंसेवकों ने सात दिनों के प्राथमिक वर्ग में शिक्षण लिया तथा 24 हजार 831 कार्यकर्ताओं ने प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त किया। संघ-शिक्षण लेने वाले उक्त कार्यकर्ताओं में केवल 2400 कार्यकर्ता ही 45वर्ष से अधिक की आयु के थे।
देश में अट्ठावन हजार स्थानों पर संघ की शाखा
प्रतिनिधि सभा की बैठक में एकत्रित हुए आँकड़ों के अनुसार इस समय देश के 36867 नगरों, कस्बों एवं ग्रामों में 56859 शाखाएं लग रही हैं। इनके अतिरिक्त लगभग 14 हजार स्थानों पर साप्ताहिक शाखा लगती है तथा आठ हजार ग्रामों में महीनें में एक-दो बार हिन्दुत्व के विचार से प्रभावित लोगों की बैठकें होती हैं। इस प्रकार इस समय देश में 58477 स्थानों पर संघ की शाखाएं लगती हैं।

राष्ट्रीय परिदृश्य

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा 2016, नागौर

-: राष्ट्रीय परिदृश्य :-


1) महिला और मंदिर प्रवेश :- गत कुछ दिनों से महिलाओं के मंदिर प्रवेश को लेकर कुछ समूहों द्वारा विवाद का मुद्दा बनाया जा रहा है। भारत में प्राचीन काल से ही धार्मिक, आध्यात्मिक क्षेत्र में पूजा-पाठ की दृष्टि से महिला-पुरुषों की सहभागिता सहजता से रही है, यह अपनी श्रेष्ठ परम्परा है। सामान्यतः सभी मंदिरों में महिला-पुरुष भेद न रखते हुए सहजता से प्रवेश होता ही है। महिलाओं द्वारा वेदाध्ययन, पौरोहित्य के कार्य भी सहजता से संपन्न हो रहे हैं। अनुचित रुढ़ी परंपरा के कारण कुछ स्थानों पर मंदिर प्रवेश को लेकर असहमति दिखाई देती है। जहां पर यह विवाद है संबंधित बंधुओं से चर्चा हो एवं मानसिकता में परिवर्तन लाने का प्रयास हो। इस प्रकार के विषयों का राजनीतिकरण न हो एवं ऐसे संवेदनशील विषयों का समाधान संवाद, चर्चा से ही हो नहीं कि आंदोलन से। इसे भी ध्यान में रखना आवश्यक है। सामाजिक, धार्मिक क्षेत्र का नेतृत्व, मंदिर व्यवस्थापन आदि के समन्वित प्रयासों से सभी स्तर पर मानसिकता में परिवर्तन के प्रयास सामाजिक स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक है।
2) सुरक्षा संस्थान, देश विरोधी शक्तियों का लक्ष्य :- गत कुछ दशकों से बार-बार सुरक्षा संस्थानों को लक्ष्य बनाकर किए गए हमले देश की सुरक्षा व्यवस्था के सामने एक आह्वान है। सुरक्षा बल के जवानों द्वारा पूरे साहस के साथ संघर्ष करते हुए देश विरोधी शक्तियों के प्रयासों को विफल करने में अच्छी सफलता पायी है। अभी-अभी पठानकोट स्थित वायुसेना के मुख्य शिविर पर किया गया आक्रमण तजा उदाहरण है। इस प्रकार के घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो इस दृष्टि से सुरक्षा व्यवस्थाओं को अधिक सक्षम बनाने की आवश्यकता है। सुरक्षाबलों की कार्यक्षमता, साधन एवं नियुक्त अधिकारियों की समुचित समीक्षा करते हुए आवश्यक सुधारों पर भी अधिक ध्यान देना होगा। सीमाओं से अवैध नागरिकों का प्रवेश, होनेवाली तस्करी तथा पाक प्रेरित आतंकवादी तत्वों के गतिविधियों की और अधिक कड़ी निगरानी आवश्यक है। इस दृष्टि से समय-समय पर सीमावर्ती क्षेत्र का विकास, सीमा सुरक्षा एवं सुरक्षा संसाधनों की ढांचागत व्यवस्थाओं की समीक्षा भी आवश्यक है। ऐसा लगता है कि भारत के संदर्भ में पाकिस्तान की नीति चयनीत सरकार नहीं तो वहां की सेना तय करती है। मुंबई में हुए हमले से लेकर पठानकोट की घटना इस बात की पुष्टि करती है। आज सारा विश्व समूह बढ़ती आतंकवादी घटनाओं से चिंतित है।
3) देश में बढ़ता साम्प्रदायिक उन्माद :- देश में विभिन्न स्थानों पर घटित हिंसक उग्र घटनायें, देशभक्त, शांतिप्रिय जन एवं कानून व्यवस्था के सम्मुख गंभीर संकट का रूप ले रही हैं। छोटी-मोटी घटनाओं को कारण बनाकर शस्त्र सहित विशाल समूह में सड़कों पर उतरकर भय-तनाव का वातावरण निर्माण किए जाने की मालदा जैसी घटनाएं विविध स्थानों पर गत कुछ दिनों में हुई हैं। सार्वजनिक तथा निजी संपत्ति का नुकसान, कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाकर पुलिस दल पर हमले की घटनाएं और विशेषतः हिन्दू बंधुओं के व्यावसायिक केन्द्र, सभी लूटपाट-आगजनी के भक्ष बनते हैं। राजनीतिक दलों ने तुष्टिकरण की नीति छोड़कर ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए, कानून-प्रशासन व्यवस्था को शांति बनाई रखने में सहयोगी बनने की आवश्यकता है। यह तभी संभव है जब राजनीतिक दल, सत्ता दल संकुचित ओछी राजनीति से मुक्त होकर सामूहिक प्रयास करेंगे। देश की सुरक्षा से महत्वपूर्ण कोई राजनीतिक दल अथवा कोई व्यक्ति नहीं हो सकता। प्रशासनों का कर्तव्य है कि कानून एवं व्यवस्था बनाए रखे और सुरक्षा की दृष्टि से देशवासियों को आश्वस्त करें।
4) विश्वविद्यालय परिसर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के केन्द्र :- विगत कुछ महिनों से, देश के कुछ विश्वविद्यालयों में, अराष्ट्रीय और देश विघातक गतिविधियों के जो समाचार मिल रहे हैं वे चिंताजनक हैं। देश के प्रतिष्ठित एवं प्रमुख विश्वविद्यालयों से तो यह अपेक्षा थी कि वे देश की एकता, अखण्डता की शिक्षा देकर देशभक्त नागरिकों का निर्माण करेंगे, किन्तु जब वहां पर देश को तोड़नेवाले और देश की बर्बादी का आवाहन देनेवाले नारे लगते हैं तब देशभक्त लोगों का चिंतित होना स्वाभाविक है। यह चिन्ता तब और भी बढ़ जाती है जब यह देखने को मिलता है कि कुछ राजनीतिक दल ऐसे देशद्रोही तत्वों के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर यह कैसे स्वीकार किया जा सकता है कि देश को तोड़नेवाले और देश को बर्बाद करनेवाले नारे लगाए जाए तथा देश की संसद को उड़ाने की साजिश करनेवाले अपराधियों को शहीद का दर्जा देकर सम्मानित किया जाए। ऐसे कृत्य करनेवालों का देश के संविधान, न्यायालय तथा देश की संसद आदि में कोई विश्वास नहीं है। इन देश विघातक शक्तियों ने लम्बे समय से इन विश्वविद्यालयों को अपनी गतिविधियों का केन्द्र बनाकर रखा है। संतोष की बात यह भी है कि जैसे ही इन गतिविधियों के बारे में समाचार सार्वजनिक हुए देश में सर्वदूर इसका व्यापक विरोध हुआ है। केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों से यह अपेक्षा है कि ऐसे राष्ट्र, समाज विरोधी तत्वों के साथ कठोरता से कारवाई करते हुए कोई भी शैक्षिक संस्थान राजनीतिक गतिविधि के केन्द्र न बने और उनमें पवित्रता, संस्कारक्षम वातावरण बना रहे यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। सामाजिक वातावरण प्रदूषित करनेवाली उपरोक्त घटनाओं से समाज जीवन प्रभावित होता है।
गत वर्ष राजनीतिक क्षेत्र में आए परिवर्तन से जन सामान्य और भारत के बाहर अन्य देशों में रह रहे भारतवासी संतोष और गर्व का अनुभव कर रहे हैं। भारत बाहरी देशों में विविध स्थानों पर आयोजित भारत मूल समूहों के सम्मेलनों से यही मनोभाव प्रकट हुआ है। वैश्विक स्तर पर बहुसंख्य देशों द्वारा ‘‘योग दिन’’ की स्वीकार्यता भारतीय आध्यात्मिक चिंतन एवं जीवन शैली की स्वीकार्यता ही प्रकट करती है। स्वाभाविक रूप से सभी देशवासियों की अपेक्षाएं बढ़ी है। एकता का वातावरण बना हुआ है। अतः सत्ता संचालक उस विश्वास को बनाए रखने की दिशा में उचित हो रही पहल अधिक प्रभावी एवं गतिमान करें, यही अपेक्षा है।
राष्ट्रीय विचारधारा को प्राप्त हो रही स्वीकृति से अराष्ट्रीय, असामाजिक तत्वों की अस्वस्थता गत कुछ दिनों में घटित घटनाओं से प्रकट हो रही है। भाग्यनगर (हैदराबाद) विश्वविद्यालय और जे.एन.यू. परिसर में नियोजित देशविरोधी घटनाओं ने इन षड्यंत्रकारी तत्वों को ही उजागर किया है। गुजरात, हरियाणा राज्यों में आरक्षण की मांग को लेकर किया गया हिंसक आंदोलन समस्त प्रशासन व्यवस्था के सम्मुख चुनौतियों के रूप में खड़ा होता ही है परंतु सामाजिक सौहार्द्र और विश्वास में भी दरार निर्माण करता है। सामाजिक जीवन निश्चित ही ऐसी घटनाओं से प्रभावित होता है। यह सबके लिए गंभीर चिंता का विषय है। किसी के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय, अत्याचार न हो लेकिन योजनापूर्वक देश विरोधी गतिविधि चलानेवाले व्यक्ति एवं संस्थाओं के प्रति समाज सजग हो और प्रशासन कठोर कार्रवाई करें। ऐसी विभिन्न समस्याओं का समाधान सुसंगठित समाज में ही है। अपने विभिन्न कार्यक्रमों में बढ़ती सहभागिता, शाखाओं में निरंतर हो रही वृद्धि यह हम सभी के लिए समाधान का विषय है। आज सर्वत्र अनुकूलता अनुभव कर रहे हैं। सुनियोजित प्रयास और परिश्रमपूर्वक, व्याप्त अनुकूलता को कार्यरूप में परिवर्तित किया जा सकता है। एक दृढ़ संकल्प लेकर हम बढ़ेंगे तो आनेवाला समय अपना है, यह विश्वास ही अपनी शक्ति है।
विजय इच्छा चिर सनातन नित्य अभिनव, 
आज की शत व्याधियों का श्रेष्ठतम उपचार है,
चिर विजय की कामना ही राष्ट्र का आधार है।।

सोमवार, 7 मार्च 2016

राजस्थान की मुख्यमंत्री : माननीया श्रीमती वसुंधरा राजे जी








सन्देश
 
 

"मेरी सुराज संकल्प यात्रा के दौरान मैंने राज्य भर में 14,000 किलोमीटर से अधिक की यात्रा की और राजस्थान की जनता को मूलभूत सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करते देखा और उनकी हताशा को करीब से महसूस किया । 

मुझे राजस्थान की जनता से अभूतपूर्व समर्थन, प्यार और स्नेह प्राप्त हुआ है जिसके लिए मैं सदैव ऋणी रहूंगी । यही समर्थन मुझे अधिक से अधिक श्रम और बेहतर कार्य करने का उत्साह देता है ।

एक नए राजस्थान के हमारे सपने को साकार करने के लिए सरकार, समाज और आप - 'टीम राजस्थान' का तालमेल अपेक्षित है । 

मैं एक स्वाभिमानी राजस्थान का हिस्सा रही हूँ जिसका मुझे सदैव गर्व है ।
राजस्थान की जनता को विचारशील, संवेदनशील और प्रभावी प्रशासन प्रदान करने के लिए हम दृढ़-संकल्प हैं । हम एक खुशहाल, शिक्षित, संवेदनशील और समृद्ध राजस्थान की कामना करते हैं । 

जब समाज के सभी वर्ग सौहार्दपूर्वक इस दिशा मैं प्रयासरत होंगे तभी हम एक सशक्त राजस्थान का नवनिर्माण कर पाएंगे । हम सुनिश्चित करते हैं कि समाज के सभी वर्गों के साथ बेहतर तालमेल के साथ कार्य हो । 

राजस्थान को विकास के स्वर्ण - युग में सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने विजन-2020 का लक्ष्य निर्धारित किया है । विजन दस्तावेज में पाँच मुख्य क्षेत्रों की पहचान की गयी है - जिनमें निवेश को बढ़ावा, बेरोजगारी को कम करना, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और कौशल विकास में सुधार शामिल हैं ।

मैं आप सभी का आह्वान करती हूँ - राजस्थान के समग्र विकास, शान्ति और आपसी सौहार्द के लिए - आओ साथ चलें ।"
भवदीया, 
वसुंधरा राजे


राजस्थान की मुख्यमंत्री : माननीया श्रीमती वसुंधरा राजे



नामश्रीमती वसुंधरा राजे
पिता का नामस्व. श्री जीवाजी राव सिंधिया
माता का नामश्रीमती विजया राजे सिंधिया, राजमाता
जन्म दिनांक8 मार्च, 1953
जन्म स्थानमुंबई (महाराष्ट्र)
वैवाहिक स्थितिशादीशुदा
विवाह दिनांक17 नवंबर, 1972
पति का नामश्री हेमंत सिंह
संततिएक पुत्र
शैक्षणिक योग्यताबी.ए. (ऑनर्स) (अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान), सोफिया कॉलेज, मुंबई विश्वविद्यालय, (महाराष्ट्र) में शिक्षित
व्यवसायराजनीतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता
निर्वाचन क्षेत्रझालरापाटन (झालावाड़)
राजनीतिक दलभारतीय जनता पार्टी (भाजपा)
विधानमंडल की सदस्यता
1985 - 1989सदस्य, 8 वीं राजस्थान विधान सभा
2003 - 2008सदस्य, 12 वीं राजस्थान विधान सभा
2008 - 2013सदस्य, 13 वीं राजस्थान विधान सभा
2013 से अब तकसदस्य, 14 वीं राजस्थान विधान सभा

संसद की सदस्यता
1989 - 1991सदस्य, 9 वीं लोकसभा
1991 - 1996सदस्य, 10 वीं लोकसभा
1996-98सदस्य, 11 वीं लोकसभा
1998-99सदस्य, 12 वीं लोकसभा
1999-18/12/2003सदस्य, 13 वीं लोकसभा
पदों पर कार्य
1984सदस्य, राष्ट्रीय कार्यकारिणी, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)
1985-87 उपाध्यक्षा, युवा मोर्चा, भाजपा, राजस्थान
1987उपाध्यक्षा, भाजपा, राजस्थान
1990-1991सदस्य, पुस्तकालय समिति 
सदस्य, सलाहकार समिति, वाणिज्य और पर्यटन मंत्रालय
1991-1996
सदस्य, परामर्शदात्री समिति, ऊर्जा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और पर्यटन मंत्रालय
1996-1997
सदस्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और वन संबंधी समिति 
सदस्य, परामर्शदात्री समिति, ऊर्जा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी और पर्यटन मंत्रालय
1997-1998संयुक्त सचिव, भाजपा संसदीय दल
1998-1999विदेश राज्य मंत्री
13 अक्टूबर 1999 - 31 अगस्त 2001
केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), लघु उद्योग और कृषि एवं ग्रामीण उद्योग; कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग, पेंशन और पेंशनर्स लाभार्थ विभाग, लोक शिकायत और पेंशन विभाग; परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष विभाग
1 सितम्बर 2001-1 नवंबर 2001
केंद्रीय राज्य मंत्री, लघु उद्योग, कार्मिक, प्रशिक्षण, पेंशन, प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत, परमाणु ऊर्जा विभाग, और अंतरिक्ष विभाग (स्वतंत्र प्रभार)
2 नवंबर 2001-29 जनवरी 2003
केंद्रीय राज्य मंत्री, लघु उद्योग, कार्मिक, प्रशिक्षण, पेंशन, प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत, परमाणु ऊर्जा विभाग, और अंतरिक्ष विभाग (स्वतंत्र प्रभार)
14 नवंबर 2002-14 दिसंबर 2003अध्यक्षा, भाजपा, राजस्थान
8 दिसंबर 2003 to 13 दिसंबर 2008मुख्यमंत्री, राजस्थान
2 जनवरी, 2009 to 25 फ़रवरी, 2010
9 मार्च, 2011 to 20 फ़रवरी, 2013
नेता प्रतिपक्ष, राजस्थान विधान सभा
13 दिसंबर 2013 से अब तकमुख्यमंत्री, राजस्थान

पसंदपढ़ना, संगीत एवं बाग़वानी
स्थायी निवाससिटी पैलेस, धौलपुर (राजस्थान)
वर्तमान निवास13, सिविल लाइन्स, जयपुर - 302 006
दूरभाष2229900, 2224400 (नि.)

शनिवार, 5 मार्च 2016

सावधान - सावधान : योजनापूर्वक झूठ फैलाया जा रहा !!

कांग्रेस और साम्यवादी दलों का सफाया देश की जनता ने कर दिया , ऐतिहासिक हार से तिलमिलाये ये दल राष्ट्रभक्त नरेंद्र मोदी सरकार को काम नहीं करने दो, के एजेंडे पर रोज रोज षडयंत्रों के द्वारा बाधा  उत्पन्न कर रहे हैं !




JNU का कन्हैया कुमार कैसे करता है झूठ और मक्कारी की बातें

4th March 2016 सावधान सावधान

New Delhi: कल दिल्ली की जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी का छात्र संघ का अध्यक्ष कन्हैया कुमार 14 दिन की न्यायिक हिरासत के बाद तिहाड़ जेल से रिहा हो गया। रिहाई के बाद कन्हैया कुमार ने शाम को सभी JNU छात्रों को इकठ्ठा करके लम्बा चौड़ा भाषण दिया लेकिन भाषण के दौरान उसने प्रधानमंत्री मोदी को जमकर निशाना बनाया। उसने केवल दो  साल पुरानी सरकार को देश की सभी समस्याओं के लिए जिम्मेदार बताकर JNU के एंटी मोदी अजेंडे को खुद ही एक्सपोज्ड कर दिया। खासतौर से छात्रों से राजनीतिक बयानबाजी की अपेक्षा नहीं की जाती लेकिन कन्हैया कुमार ने देश को भ्रमित करने वाली बयानबाजी करने के साथ साथ झूठ और मक्कारी का भी सहारा लिया और मोदी सरकार को पांच वर्ष में उखाड़ फेंकने की कसम खायी।

कन्हैया कुमार ने फिर से अपने पिछले भाषण को दोहराते हुए कहा की उन्हें गरीबी, भुखमरी और जातिवाद से आजादी चाहिए। कन्हैया कुमार की इस बात से देश के सभी लोग सहमत हो सकते हैं क्यूंकि ये सभी समस्याएं इस देश की सबसे बड़ी समस्याएँ हैं लेकिन कन्हैया कुमार ने अपने भाषण में यह नहीं बताया की इन समस्याओं का जिम्मेदार कौन है, किसने देश पर सबसे अधिक समय तक राज किया है। क्या वे लोग देश की गरीबी, भुखमरी और जातिवाद के जिम्मेदार नहीं हैं।

मोदी सरकार को देश में आये 2 साल भी नहीं हुए हैं। क्या देश की सभी समस्याओं के लिए मोदी सरकार ही जिम्मेदार है, इससे पहले कांग्रेस ने 10 वर्ष तक शासन किया और उसके पांच वर्ष पहले भी देश पर कांग्रेस पार्टी का ही शासन था। क्या कन्हैया कुमार और JNU के वामपंथी छात्रों की नजर में कांग्रेस इन समस्याओं की जिम्मेदार नहीं है।

ज्यादातर लोगों को पता होगा की कांग्रेस के शाशन के समय में (60-90 के दशक) देश में ब्राह्मणवाद का बोलबाला, ब्राह्मणों को चुन चुन कर नौकरी पर रखा जाता था। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु खुद अपने नाम के आगे पंडित लगाते थे, उनके राज में पंडितों को चुन चुन कर नौकरियां बांटी गयीं। इससे ना सिर्फ सामाजिक भेदभाव फैला, समाज में एक निराशात्मक माहौल भी फैला और खासकर दलितों के साथ बहुत अन्याय हुआ। उस समय में ज्यादातर नौकरियों पर ऊँची जाती वालों को रखा गया और पिछड़ी जातियों को इग्नोर किया गया, इसके बाद पिछड़ी जातियों को आरक्षण की जरूरत हुई लेकिन उन्हें आज तक सही रूप से आरक्षण नहीं मिला। आज भी कुछ राजनीतिक पार्टियाँ उन्हें आरक्षण का सपना दिखाकर सरकार चला रही हैं लेकिन ना तो गरीबों और पिछड़ों को आरक्षण दे रही हैं और ना ही राज्य से गरीबी मिटने का नाम ले रही हैं, बिहार इसका जीता जागता उदाहरण है। बिहार आज भी सबसे अधिक पिछड़ा हुआ माना जाता है और वहां की सरकारें अभी भी आरक्षण देने का सपना दिखा कर राज्य कर रही हैं अगर उन्हें सच में आरक्षण दे दिया जाता तो वहां पर इतनी गरीबी ना होती और नौजवानों को रोजगार के लिए दूसरे शहरों में भटकना ना पड़ता।

कल कन्हैया कुमार ने खुद कहा कि वह सबसे पिछड़े राज्य बिहार से आता है। क्या कन्हैया कुमार को जानकारी नहीं है की बिहार के पिछड़े होने का कारण क्या है। क्या बिहार के पिछड़े होने का कारण जातिवाद नहीं है। बिहार में 35 वर्ष तक राज करने वाले लालू यादव और नीतीश कुमार ने गरीबों और पिछड़ों को आरक्षण क्यूँ नहीं दिया और क्यूँ एक जाति को दूसरी जाति से लड़ाते रहे। बिहार में क्यूँ दलित को महादलित बना दिया गया। दलित आज भी बिहार के सबसे बड़े वोटबैंक क्यूँ हैं। क्या मोदी सरकार बिहार की गरीबी के लिए जिम्मेदार है। बीजेपी और मोदी ने तो वहां पर राज भी नहीं किया। क्या कन्हैया कुमार बिहार सरकार या वहां पर जातिवाद ख़त्म करने के लिए बिगुल छेड़ेगा? नहीं छेड़ेगा। क्यूंकि नीतीश कुमार ने कन्हैया कुमार को बिहार का बेटा बताया है और बेटा अपने बाप के खिलाफ कैसे बोल सकता है।

कल कन्हैया कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी के बारे में एक झूठ बोला। उसने कहा की मोदी ने कालाधन लाकर देश के सभी लोगों के बैंक अकाउंट में 15 लाख जमा कराने का वादा किया है। वैसे तो मोदी के बारे में यही बात मोदी विरोधी नेता नीतीश कुमार, लालू यादव, राहुल गाँधी और केजरीवाल भी कहते हैं लेकिन एक छात्र होने के नाते कन्हैया कुमार से ऐसी झूठ और मक्कारी की बातें शोभा नहीं देतीं। सच यह है कि मोदी ने कभी नहीं कहा की कालेधन में से 15 लाख रुपये सभी देशवासियों के बैंक अकाउंट में डाले जाएंगे। उन्होंने कालेधन की अधिकता का अहसास कराने के लिए कहा था की विदेशों में इतना ज्यादा कालाधन है की अगर देश में वापस आ जाय तो सभी लोगों को 15-15 लाख मिल सकता है। मोदी ने पैसे देने के लिए नहीं बोला था और ना ही वादा किया था। उन्होंने ये जरूर कहा था की नौकरीपेशा लोगों को उसका कुछ भाग जरूर मिलेगा। मोदी के कहने का मतलब ये था की पैसा आने के बाद उसे देश के विकास और गरीबों के कल्याण में लगाया जाएगा लेकिन उनकी बातों को नीतीश कुमार, लालू यादव, राहुल गाँधी और केजरीवाल ने गलत प्रचारित किया और राजनीतिक फायदा लेने के लिए देशवासियों को भ्रमित किया। यही बात JNU छात्र संघ का अध्यक्ष कन्हैया कुमार कह रहा है जो उसकी झूठ और मक्कारी को दर्शाता है। अगर यह बात सच होती को आखिर 15 लाख किसे नहीं चाहिए, मुझे भी चाहिए, आपको भी चाहिए और देश के सभी गरीबों को चाहिए। लेकिन एक देशभक्त नागरिक फ्री के 15 लाख नहीं चाहता बल्कि उस पैसे को देश के विकास पर खर्च करना चाहता है।

कन्हैया कुमार समानता की बातें करता है। क्या समानता यही है की सभी लोगों को 15-15 लाख रुपये मिल जाएँ। देश में बहुत सारे अमीर हैं और बहुत सारे गरीब हैं क्या कन्हैया कुमार अमीरों को भी 15 लाख देना चाहता है। यह कैसी समानता हुई भाई। अगर गरीबों को देने की बात करो तो कुछ सही भी हो सकती है लेकिन आप तो सभी देशवासियों को 15-15 लाख देना चाहते हो। समानता यह है की कालाधन आये और योजनायें बनाकर उसे गरीबों पर खर्च किया जाय ताकि गरीबों की हालत में सुधार हो, उनके बच्चें अच्छे स्कूलों में पढ़ाई करें, उनके साथ भेदभाव ना हो और वे भी सबके बराबर में खड़े हो सकें।

प्रधानमंत्री मोदी ने गैस सब्सिडी छोडो योजना के तहत लाखों अमीरों से सब्सिडी छुडवा दी, आज उसी का नतीजा है की जो गैस सिलेंडर पहले 1300 रुपये में मिलता था आज केवल 500-600 रुपये में मिल रहा है। पहले गरीबों के पास राशन कार्ड नहीं होता था और उन्हें 1300 के अलावा भी 2-3 सौ रुपये फ़ालतू देकर 1500 रुपये में गैस सिलेंडर खरीदते पड़ते थे। आज हालत यह है की कोई भी गरीब या सामान्य आदमी केवल 500-600 रुपये में सिलेंडर खरीद सकता है, सब्सिडी के साथ यह सिलेंडर 420 के आसपास मिलता है। आज गरीब यहाँ तक कह देते हैं की कोई बात नहीं हमें बिना सब्सिडी वाला सिलेंडर ही दे दो, 100-150 से क्या फर्क पड़ जाएगा। पहले उन्हें बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर 1500 में मिलते थे और उनकी हालत पतली हो जाती है लेकिन आज उन्हें 500-600 ही सिलेंडर मिल रहे हैं।

इसके अलवा मौजूदा बजट में करीब 5 करोड़ BPL परिवारों को फ्री गैस कनेक्शन देने की बात की गयी है और उसके लिए लम्बे चौड़े बजट की भी घोषणा की गयी है। क्या इससे करीबों का कल्याण नहीं होगा।

इसके अलावा भी अभी तक देश के 18 हजार गाँवों तक बिजली नहीं पहुँच पायी है। जहाँ बिजली पहुँच भी गयी है वहां बिजली आती ही नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2019 तक सभी 18 हजार गाँवों में बिजली पहुँचाने का वादा किया है और काम भी बहुत तेजी के साथ हो रहा है और जिस तेजी से काम हो रहा है, यह काम पूरा भी हो जाएगा और सभी देशवासियों को बिजली मिलने भी लगेगी। क्या इससे देश के गरीबों का भला नहीं होगा। क्या बिजली पहुँचने से पढने लिखने वाले छात्रों को फायदा नहीं मिलेगा। क्या बिजली आने से नौजवान अपने गाँवों में ही कोई रोजगार नहीं शुरू कर सकेंगे। आज जिस भी गाँव में बिजली है वहां दुकाने ही दुकाने खुल जाती हैं और लोग अपने गाँव में ही रोजगार खोलकर पैसे कमाते हैं।

मोदी सरकार को देश में आए केवल डेढ़ साल हुए हैं। देश में किसानों की हालत बहुत ख़राब है, बहुत सारे किसान आत्महत्या भी कर रहे है, बहुत सारे किसानों के खेतों में सिंचाई की सुविधा नहीं है। प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल खराब होने के बाद उन्हें समय से मुआवजा नहीं मिलता और उन्हें आत्महत्या करनी पड़ती है। क्या मोदी सरकार ही किसानो की हालत के लिए जिम्मेदार है जबकि उसे आये केवल डेढ़ साल हुए हैं। क्या कांग्रेस पार्टी किसानों की हालत की जिम्मेदार नहीं है।

प्रधानमंत्री मोदी कृषि सिंचाई योजना के तहत सभी किसानों के लिए सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराना चाहते हैं ताकि किसानों को खेती करना सस्ता हो सके। मनरेगा योजना के तहत सभी गाँवों में सिंचाई के लिए तालाब और कुंवे बनाने की घोषणा हुई है ताकि पानी को बर्बाद होने से बचाया जा सके और पानी को सिंचाई के लिए उपयोग किया जा सके। नयी नहरों को बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है और नदियों को जोड़कर पानी के सही इस्तेमाल की घोषणा हुई है। क्या इससे देश के किसानों का भला नहीं होगा। क्या उनके खेतों में पानी पहुँचने से खेती करना सस्ता नहीं होगा। इसके अलावा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत सभी किसानों को सस्ते बीमे की सुविधा दी जा रही है ताकि फसलों की बर्बादी के बाद उन्हें समय से और जल्दी मुआवजा मिल सके। किसानों के लिए सस्ते लोन की भी घोषणा हुई है।

मोदी भी देश से गरीबी और भुखमरी दूर करना चाहते हैं। इनके लिए उन्होंने योजनायें भी शुरू कर दी हैं लेकिन कन्हैया कुमार ने मोदी सरकार को जनविरोधी बताते हुए उन्हें पांच साल में उखाड़ फेंकने की कसम खायी। जो सरकार गरीबों और किसानों के लिए काम कर रही है कन्हैया कुमार और JNU यूनिवर्सिटी के वामपंथी छात्र उस सरकार को जन विरोधी बताकर उसे उखाड़कर वापस उसी सरकार को लाना चाहते हैं जो वास्तव में जातिवाद, गरीबी, भुखमरी और किसानों की बदहाली के लिए जिम्मेदार है।

कोई भी सरकार अगर बुरा काम कर रही है तो इसके लिए उसका विरोध करना सभी का हक है लेकिन कोई भी काम अगर सही है तो उसकी तारीफ भी करनी चाहिए। कन्हैया कुमार ने मोदी की किसी भी योजना की तारीफ नहीं की उल्टा उन्होंने मोदी सरकार को जनविरोधी बताया। क्या 5 करोड़ गरीब महिलाओं को फ्री गैस कनेक्शन देना जन विरोध है, क्या किसानो को सस्ती फसल बीमा योजना का लाभ देना जन विरोध है, क्या किसानों के खेतों में पानी पहुँचाना जन विरोध है, क्या 1300 रुपये वाले सिलेंडर को 500 रुपये में देना जन विरोध है, क्या अँधेरे गाँवों में बिजली पहुँचाना जन विरोध है, क्या पूरे देश वासियों को 24 घंटे बिजली देना और उसके लिए मिशन के तहत काम करना जन विरोध है, क्या सभी गाँवों में पक्की, अच्छी और मजबूत सड़कों का जाल बिछाना जन विरोध है।

कन्हैया कुमार ने इन योजनाओं के लिए प्रधानमंत्री मोदी की एक बार भी तारीफ नहीं की क्यूंकि उसका अजेंडा गरीबी और भुखमरी नहीं बल्कि इन्हें दूर करने की कोशिश करने वाली मोदी सरकार को उखाड़ फेंकना और वापस उसी पार्टी की सरकार बनाना है जो वास्तव में देश में भुखमरी, गरीबी और जातिवाद के लिए जिम्मेदार है।

कन्हैया कुमार कहता है की उसके पिता गरीब किसान हैं और केवल 300 हजार रुपये में उनका घर चलता है। नीतीश कुमार कहते हैं की कन्हैया कुमार बिहार का बेटा है। कन्हैया कुमार बताएं कि बिहार में उनके परिवार की गरीबी और बदहाली के लिए कौन जिम्मेदार है। वहां तो बीजेपी और मोदी की सरकार भी नहीं है, 15 साल लालू परिवार ने और 10 साल नीतीश कुमार ने राज किया है। आज तक बिहार के गरीबों और किसानों की हालत में सुधार क्यूँ नहीं हुआ। क्यूँ मात्र 3000 रुपये में उनके परिवार को गुजर बसर करना पड़ता है। क्या कन्हैया कुमार लालू यादव या नीतीश कुमार को बिहार की गरीबी और अपने परिवार की बदहाली के लिए जिम्मेदार बताने की हिम्मत करेगा? नहीं करेगा। क्यूंकि उसका अजेंडा मोदी को रोकना है जबकि उसके गरीब किसान पिता की बदहाली के लिए मोदी कतई भी जिम्मेदार नहीं हैं।

कन्हैया कुमार को सन्देश

एक संपादक होने के नाते मै भी ये मानता हूँ देश में गरीबी, भुखमरी और जातिवाद है, इसके अलावा किसानों की हालत भी बहुत खराब है लेकिन इसके लिए केवल मोदी सरकार जिम्मेदार नहीं है, मोदी सरकार को आये हुए केवल डेढ़ साल हुए हैं, इससे पहले अगर कांग्रेस सरकार से इन समस्याओं पर ध्यान दिया होता तो अब तक देश से ये सभी समस्याएँ ख़त्म हो चुकी होतीं। कोई भी काम जादू से नहीं होता बल्कि इसके लिए योजनायें बनाकर उन्हें लागू करना होता है। आप मोदी सरकार का पांच साल भी इन्तजार नहीं कर सकते और बिना उन्हें मौका दिए उन्हें उखाड़ फेंकने की बात करते हो।

आप झूठे, दोगले और मक्कार हो क्यूंकि –

*आपने उस पार्टी को इन सब समस्याओं के लिए जिम्मेदार नहीं बताया जिस पार्टी ने देश पर 60 साल तक शासन किया।
*आप भ्रस्टाचार की बातें करते हो लेकिन उस पार्टी के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलते जिसने भ्रस्टाचार को जन्म दिया है
*आप सिस्टम को खराब बताते हो लेकिन उस पार्टी के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलते जिसने पूरा सिस्टम खराब कर दिया
*आपमें हिम्मत नहीं है की बिहार में फैले जातिवाद पर एक शब्द भी बोल सको।
*आप में हिम्मत नहीं है की आप जातिवाद पर आधारित आरक्षण ख़त्म करने पर एक शब्द भी बोल सको
*आपमें हिम्मत नहीं है कि आप अपने परिवार की गरीबी और केवल 3 हजार रुपये में गुजर बसर करने के हालात पैदा करने के जिम्मेदार नेताओं यानी नीतीश कुमार और लालू यादव के खिलाफ एक शब्द भी बोल सको
*आप 15 लाख रुपये बैंक अकाउंट में आने की बात को गलत तरीके से प्रचारित करते हो
*आप एक छात्र होकर झूठ और मक्कारी और दोगलेपन पर उतर आये हो
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो किसानों की हालत सुधारने का प्रयास कर रही है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो गरीबी ख़त्म करने का प्रयास कर रही है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो जातिवाद ख़त्म करने का प्रयास कर रही है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो सभी गाँवों में बिजली पहुँचाना चाहती है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो पूरे देश को 24 घंटे बिजली देना चाहती है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो सभी गाँवों तक मजबूत सड़कों का जाल बिछाकर किसानों की फसलों को आसाने से शहरों तक बेचने की सुविधा देना चाहती है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो किसानों को जागरूक करने का काम कर रही है
*आप उस सरकार को जन विरोधी बता रहे हो जो किसानों की आमदनी को डबल करने का सपना देख रही है
*आप सैनिकों को सोल्युट करते हो, उन्हें किसान का बेटा और अपना भाई बताते हो और नक्सलियों द्वारा उनकी हत्या पर मिठाई बांटते हो
*आप कहते हो की सैनिकों की शहादत के लिए सरकार जिम्मेदार है क्यूंकि उन्होंने युद्ध के हालात पैदा किये हैं
*आप चाहते हो की हमारे सैनिक बॉर्डर से हट जायं और पाकिस्तान हमारे ऊपर हमला कर दे
*आप चाहते हो कि भारत कश्मीर को आजाद करके युद्ध जैसे हालातों को बदल दे
*क्या गारंटी है कि कश्मीर आजाद होने के बाद युद्ध नहीं होंगे
*क्या गारंटी है की कश्मीर से आतंकवाद ख़त्म हो जाएगा
*आतंकवाद तो पाकिस्तान में भी है जो भारत से आजाद हो चुका है
*अगर कश्मीर पाकिस्तान को देने के बाद उसकी नजर पंजाब पर पड़ गयी और फिर से युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए तो क्या आप कहोगे की पंजाब को भी पाकिस्तान को दे दो और युद्ध के हालत पैदा ही मत होने दो
अगर उसके बाद पाकिस्तान की नजर दिल्ली पर पड़ गई तो आप कहोगे की दिल्ली भी पाकिस्तान को दे दो और युद्ध के हालत पैदा ही मत होने दो
*अगर कश्मीर और पाकिस्तान की तरह देश से हिन्दुओं को मारकर भगाया जाने लगेगा तो आप कहोगे की भाग जाओ और मर जाओ, युद्ध के हालत पैदा ही मत होने दो
*मै आपको यही सुझाव दूंगा की आप कम से कम पांच साल तक इन्तजार तो कर लो, अगर सरकार ने अपने वादों को पूरा नहीं किया तो हम भी आपके साथ विरोध में शामिल हैं लेकिन अभी से झूठी, दोगली और मक्कारी वाली बातें मत करो। देश में नकारात्मकता मत फैलाओं, देश के विकास की गति मत रोको।

आत्मगौरव का प्रतीक भारतीय नव वर्ष



आइये अपने पर गर्व करें, नव विक्रमी संवत की शुभकामनाएं दें

यह नव संवत् ही मेरा नववर्ष ! आपका नववर्ष !! प्रत्येक भारतीय का नववर्ष !!!
साकेन्द्र प्रताप वर्मा
http://www.vicharvimarsh.com
सोचिए 1 जनवरी तो अंग्रेजों का नववर्ष अथवा उनका नववर्ष जो अंग्रेजियत में जी रहे हैं.

जिन्हें न गुलामी का दंश पता है, न स्वतंत्रता की कीमत, जिन्हें गीता और रामायण का ध्यान  नहीं है, जिन्हें न तो हस्तिनापुर याद है, न ही दुष्यंत पुत्र भरत याद है, जिन्हें राम, कृष्ण, शिवाजी, राणाप्रताप, चन्द्रगुप्त, बुद्ध, महावीर याद नहीं तथा जिन्हें गुरू गोविन्द सिंह, शेखर, सुभाष, भगत सिंह और रानी लक्ष्मीबाई की बलिदानी परम्परा याद नहीं. उनको ही भारत याद नहीं-अपना नववर्श याद नहीं. याद है केवल इण्डिया और उसका न्यू ईयर. न्यू ईयर का अर्थ है जश्न, नृत्य, शराब से मनाया जाने वाला रात्रिकालीन हुड़दंग.

आत्मगौरव का प्रतीक भारतीय नव वर्ष
भारतीय नव वर्ष जैसा दुनिया के किसी नव वर्ष का आनन्दोत्सव न तो देखा गया न ही सुना गया, परन्तु अंग्रेजों की गुलामी से पनपी आत्मविस्मृति के कारण हम अनुभव ही नहीं करते कि यह आनन्द का पर्व हमारे नव वर्ष का शुभारम्भ है. विचार करने पर प्रश्न उठता है कि होली से राम नवमी तक भारत में जो आनन्द का उत्सव होता है उसका मर्म क्या है? रंग-गुलाल, हंसी-मजाक, नये वस़्त्रों को पहनकर नव सम्वत् का सुनना, 15 दिनों तक एक दूसरे से गले मिलना, मिठाई खाना और खिलाना भारतीय नव वर्ष के शुभारम्भ से पहले ही होली के पर्व के रूप में शुरू हो जाता है. नव वर्ष के पहले दिन से 9दिनों तक नवरात्रि का विशेष पूजन शक्ति अर्जन के लिए किया जाता है. प्रकृति भी इन 20-25 दिनों में आनन्द मनाती है,पौधों में नई-नई कोपलें और पत्तियां निकलती हैं तथा बसन्त का आनन्द होता है. भारतीय नव वर्ष का लगभग चार सप्ताह  तक चलने वाला पूजनयुक्त आनन्द पर्व हमारी श्रेष्ठता और गौरव का प्रतीक है, फिर भी भारत का दुर्भाग्य है कि अपने नव वर्ष पर गर्व करने में हमें संकोच लगता है. परन्तु एक जनवरी आते ही नाच-गाना, शराब परोसना, जश्न के आधुनिक तरीकों का वीभत्स प्रदर्शन करना तथा शुभकामनाएं भेजने का दौर शुरू हो जाता है.

भारतीय काल गणना का विश्व में कोई मुकाबला नहीं है क्योंकि यह काल गणना ग्रह नक्षत्रों की गति पर आधारित है.  यहां तो प्रत्येक मास की पूर्णिमा को जो नक्षत्र होता है, उसी नक्षत्र के नाम पर महीने का नाम रखा जाता है.  चित्रा नक्षत्र के आधार पर चैत्र, विशाखा नक्षत्र के आधार पर बैसाख, ज्येष्ठा नक्षत्र के आधार पर ज्येष्ठ, उत्तराषाढा नक्षत्र के आधार पर  आषाढ़, श्रवण नक्षत्र के आधार पर श्रावण, उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र के आधार पर भाद्रपद, अश्विनी नक्षत्र के आधार पर अश्विनि,कृतिका नक्षत्र के आधार पर कार्तिक, मृगशिरा नक्षत्र के आधार पर मार्गशीर्ष, पुष्य नक्षत्र के आधार पर पौष, मघा पक्षत्र के आधार पर माघ एवं उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र के आधार पर फाल्गुन मास निर्धारित है.  चन्द्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण की वर्षों पूर्व की काल गणना भारतीय पंचांग में है फिर भी विक्रमी संवत् पर गर्व करने में संकोच होता है.  कुछ वर्ष पूर्व शताब्दी का सबसे बड़ा सूर्यग्रहण हुआ.  भारतीय ज्योतिष के विद्वानों ने बहुत पहले से बताना प्रारम्भ कर दिया कि अमुक दिन, अमुक समय से सूर्यग्रहण होगा,  किन्तु यूरोपीय विद्वानों ने अविश्वास का वातारण बनाना प्रारम्भ कर दिया. नासा ने 120 करोड़ रूपये खर्च करके पता किया कि भारतीय ज्योतिष में जो कहा गया है, वही ठीक है किन्तु आगे की गणनाएं भारतीय ज्योतिष के अनुसार ठीक होंगी या नहीं इस पर अविश्वास की रेखा फिर से खींच दी.

अपनी कालगणना का हम सदैव स्मरण करते हैं, परन्तु इसका हमें ध्यान नहीं रहता है. अपने घर परिवार के समस्त शुभकार्य पंचांग की तिथि से ही देखकर आयोजित करने का स्वभाव हम सभी का है. जब हम किसी नये व्यक्ति से मिलते हैं तो उसे अपना परिचय देते हैं कि हम अमुक देश, प्रदेश या गांव के निवासी हैं तथा अमुक पिता की संतान हैं. इसी प्रकार जब हम किसी शुभ कार्य को सम्पन्न करने के लिए किसी देव शक्ति का आवाहन करते हैं तो संकल्प करते समय उसे भी अपना परिचय बताते हैं. संकल्प के समय पुरोहितगण एक मंत्र बोलते हैं, जिस पर हम ध्यान तो नहीं देते परन्तु उस संकल्प मंत्र में हमारी कालगणना का वर्णन है.  मंत्रोच्चार कुछ इस प्रकार है – ऊॅं अस्य श्री विष्णु राज्ञया प्रवत्र्य मानस व्रहमणो द्वितीय पराद्र्धे, श्वेतवाराह कल्पे, वैवस्वत मनवन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलि प्रथम चरणे, जम्बूद्वीपे भरतखण्डे अमुक नाम, अमुकगोत्र आदि….. पूजनं/आवाहनम् करिष्यामऽहे.

मंत्र में स्पष्ट है कि ब्रम्हा जी की आयु के दो परार्द्धों में से यह द्वितीय परार्द्ध है, इस समय श्वेत बाराह कल्प चल रहा है,  कल्प को ब्रम्हा जी की आयु का एक दिन माना गया है, परन्तु यह कालगणना की इकाई भी है. एक कल्प में 14 मनवन्तर, एक मनवन्तर में 71 चर्तुयुग तथा एक चर्तुयुग में 43 लाख 20 हजार वर्ष होते हैं. जिसका  भाग सतयुग, भाग त्रेता, भाग द्वापर तथा भाग कलियुग होता है.  इस समय वैवस्वत् नामक मनवन्तर का 28वां कलियुग है.  हमें स्मरण होगा कि महाभारत  का युद्ध समाप्त होने के 36 वर्षों बाद भगवान श्रीकृष्ण ने महाप्रयाण किया था. उस समय द्वापर युग समाप्त हुआ था. यह घटना ईस्वीय सन् प्रारम्भ होने से 3102 वर्ष पहले की है. मान्यता है कि श्रीकृष्ण भगवान के दिवंगत होते ही कलियुग प्रारम्भ हो गया था, इसी कारण ईस्वीय सन् में 3102 वर्ष जोड़ने पर कलि संवत् या युगाब्द की गणना होती है.

बृह्मपुराण में यह भी लिखा गया है कि बृह्माजी ने सृष्टि की रचना भी इसी दिन की है –

“चैत्रमासे जगदब्रह्मा ससर्ज पृथमेऽहनि, शुक्ल पक्षे समग्रन्तु तदा सूर्योदये गति”

इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने श्रेष्ठ राज्य की स्थापना की थी. जिनके कारण न्याय के आसन को आज भी विक्रमादित्य का सिंहासन कहा जाता है.  विक्रम संवत् भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही प्रारम्भ होता है. इसी की भारत में सर्वाधिक स्वीकार्यता है . चैत्रशुक्ल प्रतिपदा जिस दिन (वार) को होती है. वही संवत् का राजा होता है तथा जिस वार को सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, वह संवत् का मंत्री होता है. सूर्य की अन्य संक्रान्तियों द्वारा वर्ष की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक स्थितियों का निर्धारण होता है.  भारत में होली के बाद संवत् सुनने की परम्परा को गंगा स्नान  के समान फलदायी माना गया है. इसी कारण यह संवत् भारतीय समाज व्यवस्था में समस्त संस्कारों, पर्वों एवं त्योहारों की रीढ़ है.  विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या अन्य किसी कालगणना में इतनी सूक्ष्म व्याख्या है? सारी श्रेष्ठताओं के बाद भी विक्रमी संवत् भारत का राष्ट्रीय पंचांग नहीं बना यह स्वाभाविक कौतूहल का विषय है. आजादी के बाद पंडित नेहरू के द्वारा बनायी गयी पंचांग सुधार समिति इसके लिये जिम्मेदार मानी जा सकती है, परन्तु आजादी के सात दशक भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं.

अपना देश 1947 में अंग्रेजों की गुलामी से एक सीमा तक मुक्त हुआ.  स्वाधीनता के बाद हमने देश से अंग्रेजियत के सारे प्रतीक मिटाने का संकल्प लिया.  कुछ भवनों और सड़कों के नाम भी बदले गये परन्तु आधुनिक समय में किंगजार्ज मेडिकल कालेज का नाम बदलने पर एक नई बहस शुरू हो गयी. यह सब कुछ इस कारण हुआ कि संविधान की प्रथम पंक्ति में हमने अंग्रेजियत को स्वीकार करके ’’इण्डिया दैट इज भारत’’ का शब्द प्रयोग करके भारतीयता को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया. वैसे तो अंग्रेजों ने बड़ी चतुराई से हमसे यह काम करवा लिया, जिसे हम समझ भी नहीं पाये. इसके पीछे वही भावना काम कर रही थी, जिसका उल्लेख मैकाले ने 12 अक्तूबर 1836 को अपने पिता को लिखे एक पत्र में किया था कि आगामी 100 साल बाद भारत के लोग रूप और रंग में तो भारतीय दिखेंगे, किन्तु वाणी, विचार और व्यवहार  में अंग्रेज हो जायेंगे.  सचमुच ही आज के समाज जीवन में वेशभूषा और भाषा ही नहीं जन्मदिन, पर्व-त्योहार, विवाह संस्कार आदि समारोहों को मनाने के तौर तरीकों में भारतीयता पर अंग्रेजियत हावी हो गयी.  अपने वित्तीय वर्ष के प्रथम दिन 0 1 अप्रैल को हम मूर्ख दिवस मानने लगे,  ईसा के जन्मदिन को बड़ा दिन मानने लगे, वैलेन्टाइन डे और शादी की वर्षगांठ हमारे जीवन में उतर आये, परन्तु श्राद्ध पर्व भूल गया.  इसी का परिणाम है कि अंग्रेजी नववर्ष तो याद रहा, परन्तु अपना नववर्ष भी भूल गये.

गुलामी की मानसिकता से हम कहां तक दबे रहे कि सन् 1996 तक संसद में आम बजट भी अंग्रेजों की घड़ी के अनुसार प्रस्तुत करते थे.  सरकारी कार्यालय बन्द होने के लिये निर्धारित  सायं 5 बजे के समय पर बजट इसलिए प्रस्तुत किया जाता था कि इंग्लैण्ड में उस समय दिन के साढ़े ग्यारह बजे होते थे. ऐतिहासिक शब्दावली में ईसा से पूर्व (बीसी) तथा ईसा के बाद (एडी) जैसे शब्दों का प्रयोग  किया जाने लगा अर्थात् हमारी कालगणना के आधार भी ईसामसीह बन गये.   आजादी के प्रथम दिन से राष्ट्रभक्ति के भाव में कुछ कमी होने के कारण हमने स्वतंत्र भारत का पहला गर्वनर जनरल माउण्टवेटेन को बना दिया. उन्होंने ही हमारी ओर से प्रथम राष्ट्राध्यक्ष के रूप में किंगजार्ज के प्रति वफादारी की शपथ ली, इसी कारण14/15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को असंख्य शहीदों के बलिदानों को धूलधूसरित करके व्रिटिश झण्डा सलामी देकर सम्मान पूर्वक उतारा गया.  अंग्रेजियत में रचे बसे और माउण्टवेटेन के प्रिय पात्र जवाहर लाल नेहरू के हाथ में देश की बागडोर तो आ गयी, किन्तु इण्डियावादी दृष्टि से भारत को मुक्ति नहीं मिल सकी. उसी का परिणाम था कि जब 1952 में प्रो मेघनाद साहा की अध्यक्षता में पंचांग सुधार समिति बनी तो उसने भी भारतीयता को आगे बढ़ने से रोक दिया.  भले ही प्रो साहा ने पंचांग का निर्धारण करते समय कहा था कि वर्ष का आरम्भ किसी खगोलीय घटना से होना चाहिए. उन्होंने ग्रेगेरियन कैलेण्डर के विभिन्न महीनों में दिनों की संख्या में असंगतता पर सवाल भी उठाये थे, किन्तु जब पंचांग सुधार समिति की रिपोर्ट देश के सामने आयी तो पता चला कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उपयुक्त मानकर नितांन्त  अवैज्ञानिक शकसंवत को राष्ट्रीय पंचांग तथा ग्रेगेरियन कैलेण्डर को अन्तर्राराष्ट्रीय कैलेण्डर की मान्यता दे दी गयी.  वस्तुतः यह सब कुछ अंग्रेजो को बड़ा दिखाने  के लिए किया गया, क्योंकि शकसंवत् ग्रेगेरियन कैलेण्डर से 79 वर्ष छोटा है, जबकि विक्रम संवत्  57 वर्ष बड़ा है.  ऐसी स्थिति में यदि विक्रमी संवत् को समिति राष्ट्रीय पंचांग बना देती तो अंग्रेज आकाओं के नाराज होने का खतरा था.

कितना हास्यास्पद है कि शकसंवत् में प्रथम दिन का निर्धारण करने के लिए ही ग्रेगेरियन कैलेण्डर का सहारा लिया गया है, क्योंकि शकसंवत् में वर्ष का आरम्भ ही 22 मार्च से होता है, परन्तु लीप वर्ष में वर्ष का आरम्भ 21 मार्च से ही माना जाता है.  वर्ष में कुल 365 दिन होते हैं, जबकि लीप ईयर में 366 दिन होते हैं .यही व्यवस्था ग्रेगेरियन कैलेण्डर में भी है .  शकसंवत् में चैत्र 30 दिन तथा उसके बाद के 5 महीने 31 दिन और अन्त के 6 महीने 30-30 दिनों के होते हैं, जबकि लीप वर्ष में चैत्र भी31 दिन का ही होता है. लगभग यही स्थित ग्रेगेरियन कैलेण्डर की है. इन दोनों पंचांगों में 365 दिन 6 घण्टे का हिसाब तो है जबकि पृथ्वी अपनी धुरी पर 365 दिन 6 घंण्टे 9 मिनट और 11 सेकेण्ड में सूर्य का एक चक्कर लगाती है यही वास्तविक वर्ष होता है. इन पंचांगों में 9 मिनट 11 सेकेण्ड को कोई हिसाब नहीं है. ग्रेगेरियन कैलेण्डर इससे भी अधिक हास्यास्पद है उसका मुख्य आधार रोमन कैलेण्डर है जो ईसा से 753 साल पहले प्रारम्भ हुआ था. उसमें 10 माह तथा 304 दिन थे उसी के आधार पर सितम्बर सातवां, अक्तूबर 8वां, नवम्बर 9वां तथा दिसम्बर 10वां महीना था. 53 साल बाद वहां के शासक नूमापाम्पीसियस ने जनवरी और फरवरी जोड़कर 12 महीने तथा 355 दिनों का रोमन वर्ष बना दिया.  जिसमें सितम्बर 9वां,अक्तूबर 10वां, नवम्बर 11वां, और दिसम्बर 12वां महीना हो गया.  ईसा के जन्म से 46 साल पहले जूलियस सीजर ने रोमन वर्ष 365 दिनों का कर दिया. 1582 ई0 में पोपग्रेगरी ने आदेश करके 4 अक्तूबर को 14 अक्तूबर कर दिया.  मासों में दिनों का निर्धारण भी मनमाने तरीके से बिना किसी क्रमवद्धता का ध्यान रखते हुए कर दिया गया, किन्तु इन सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन्हीं पंचांगों को हमने स्वतंत्र भारत में गणना का आधार मानकर भारतीय पंचांग की उपेक्षा कर डाली.

जरूरत इस बात की है कि भारत अपने आत्मगौरव को पहचाने तथा अपने नववर्ष को धूमधाम से सामाजिक और राजकीय स्तर पर मनाये जाने का प्रबन्ध हो.  यह सीधे-सीधे राष्ट्र की अस्मिता   से जुड़ा हुआ प्रश्न है.  हमें ध्यान रखना चाहिए कि 2001 में कुछ लोगों ने ईरान में अंग्रेजी नववर्ष मनाने का प्रयास किया था, जिसके कारण उन्हें 50-50 कोड़े मारने की सजा दी गयी थी.  भारत इस प्रकार का देश तो नहीं है कि किसी को कोड़े मारकर ठीक किया जा सके.  परन्तु चेतना का जागरण आवश्यक है. दुनिया के देश अपने-अपने नववर्ष पर गर्व करते हैं फिर हम उधार के नववर्ष पर क्यों गर्व करें इसका विचार करने की जरूरत है.

आइये अपने पर गर्व करें – नवरात्रि के प्रथम दिन नववर्ष की शुभकामनाएं दें.

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)