गुरुवार, 26 मई 2016

मोदी सरकार 2 साल : भारतीयों की जिंदगी बदलने की कोशिश

भारतीयों की जिंदगी बदलने की कोशिश 

मोदी सरकार 2 साल: इन योजनाओं से बदली आम भारतीय की ज़िन्दगी
उद्योग संघ एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने मोदी सरकार के कामकाज 10 में से सात अंक दिए है
By Abdulkadir on May 25, 2016

सबका साथ सबका विकास यह वादा कर नरेंद्र मोदी सत्ता में आये थे। 26 मई 2016 को नरेंद्र मोदी की सरकार को दो साल पुरे हो जाएंगे। बीते दो साल में प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार ने आम जनता की भलाई के लिए कई बड़े फैसले लिए। उद्योग संघ एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने मोदी सरकार के कामकाज 10 में से सात अंक दिए है।

एसोचैम ने कहा कि देश की आर्थिक स्थिति निश्चित रूप से संभली है और सड़क, राजमार्ग, रेलवे तथा ऊर्जा क्षेत्रों में कुछ साहसिक कदम उठाए गए हैं। एसोचैम ने हालांकि कृषि और ग्रामीण आबादी की दशा में सुधार के लिए आक्राम पहल की जरूरत पर बल दिया। स्किल इंडिया, स्टार्ट-अप इंडिया और जन धन की सराहना करते हुए बयान में कहा गया है, “समुचित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए काफी कुछ करने की जरूरत है।”
अपने कार्यकाल के दौरान मोदी सरकार ने कई ऐसी योजना बनाई है जिससे आम इंसान को फायदा हुआ है। आइये नज़र डाल लेते है ऐसी की कुछ योजनाओं पर

जन धन योजना:
28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जन धन योजना की शुरुवात की। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2016 तक  20 करोड़ अतिरिक्त परिवार बैंकिंग प्रणाली से जोड़े गए। इसके अलावा सरकार ने 9.39 करोड़ जन धन खातों को आधार संख्या से जोड़ दिया है। इस योजना के अनुसार कोई भी व्यक्ति शून्य बैलेंस राशि के साथ खाता खोल सकता है।

स्वच्छ भारत अभियान:
साल 2014 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिन के अवसर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुवात की थी। इस अभियान के तहत सरकार साल 2019 तक ज़्यादा से ज़्यादा सौचालय बनाना चाहती है ताकि खुले में किसी को सौच ना करना पड़े। इसके अलावा सरकार महात्मा गांधी की 150वीं जयंती तक भारत को स्वच्छ बनाना चाहती है। इस साल 31 मार्च को 42.05 प्रतिशत की तुलना में ग्रामीण स्वच्छता दायरे में 51.53 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। केंद्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्री बीरेन्द्र सिंह ने  बताया की इस अभियान के शुभारंभ के बाद से स्वच्छता में प्रगति हई है और 31 मार्च को मनरेगा के अंतर्गत 10.72 लाख सहित करीब 182.62 लाख शौचालयों का निर्माण पहले से ही किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि 31 मार्च को 13 जिले, 161 ब्लॉक, 22,513 ग्राम पंचायतें और 53,973 ग्रामों को खुले में शौच से मुक्त किए जाने की घोषणा की  है।

डिजिटल इंडिया:
मोदी सरकार ने अपनी ज़्यादातर योजनाएं युवाओं को ध्यान में रखते हुए बनाई है। ऐसी ही एक योजना है डिजिटल इंडिया। भारत सरकार ने डिजिटल इंडिया कार्यक्रम की शुरूआत सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग के माध्यम से सार्वजनिक सेवाओं के पूरे परितंत्र को बदलने के लिए और भारत को डिजिटल सशक्त समाज और सूचना अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए की है। इस योजना का मुख्य उद्देश सरकारी विभागों को देश की जनता से जोड़ना है। सभी गांवों और ग्रामीण इलाकों को इंटरनेट नेटवर्क से भी जोड़ने की योजना है। उम्मीद है की 2019 तक डिजिटल भारत परियोजना पूरी तरह से काम करने में सक्षम हो जाएगी।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ:
22 जनवरी 2015 को नरेंद्र मोदी ने देश में विषम लैंगिक अनुपात की समस्या से लड़ने के अपने दृढ़ प्रयास के तहत हरियाणा के पानीपत से ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत की। अभियान की शुरुआत के दौरान इसकी ब्रांड एंबेसडर माधुरी दीक्षित और केंद्रीय मंत्री-जे.पी.नड्डा, मेनका गांधी, रवि शंकर प्रसाद, वीरेंद्र सिंह, स्मृति ईरानी, कृष्ण पाल गुर्जर और राव इंद्रजीत सिंह के अतिरिक्त हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और अन्य नेता भी मौजूद थे। इस योजना का हेतु लड़कियों को पढ़ाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है।

अटल पेंशन योजना:
यह योजना मोदी सरकार ने असंघटित कामगारों को ध्यान में रखकर लॉन्च की है। इस योजना के तहत 60 साल की उम्र के बाद उन्हें 5,000 रुपये तक पेंशन मिलेगी। यह उन कर्मचारियों के लिए काफी कारगर साबित हो सकती है। इससे उनका भविष्य सुरक्षित हो सकता है।

मेक इन इंडिया:
देशी-विदेशी निवेशकों के लिए लाल कालीन बिछाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को ‘मेक इन इंडिया वीक’ की शुरुआत 13 फरवरी को की थी।  मेक इन इंडिया केंद्र देश के सबसे नवीन और उत्कृष्ट उत्पादों का प्रदर्शन और निर्माण करेगा। मेक इन इंडिया पहल की वैश्विक शुरुआत सितम्बर 2014 में हुई थी। इस योजना के ज़रिये देश में विदेशी निवेश आयेगा और लाखों युवकों को रोज़गार मिलेगा।

डिजिटल इंडिया:
मोदी सरकार ने अपनी ज़्यादातर योजनाएं युवाओं को ध्यान में रखते हुए बनाई है। ऐसी ही एक योजना है डिजिटल इंडिया। भारत सरकार ने डिजिटल इंडिया कार्यक्रम की शुरूआत सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग के माध्यम से सार्वजनिक सेवाओं के पूरे परितंत्र को बदलने के लिए और भारत को डिजिटल सशक्त समाज और सूचना अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए की है। इस योजना का मुख्य उद्देश सरकारी विभागों को देश की जनता से जोड़ना है। सभी गांवों और ग्रामीण इलाकों को इंटरनेट नेटवर्क से भी जोड़ने की योजना है। उम्मीद है की 2019 तक डिजिटल भारत परियोजना पूरी तरह से काम करने में सक्षम हो जाएगी।

रविवार, 15 मई 2016

संघ बाबासाहब के ही देखे हुए सपने को पूरा करने में लगा है

बाबा साहब के जीवन को, उनके मूल्यों को जीवन में उतारने की आवश्यकता है - दुर्गादास जी
संघ बाबासाहब के ही देखे हुए सपने को पूरा करने में लगा है - डाॅ. अमीलाल भाट

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के  क्षेत्रीय प्रचारक  माननीय  दुर्गादास जी उध्बोधन देते हुए

जोधपुर १४ अप्रैल २०१६। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जोधपुर महानगर द्वारा श्रद्धेय बाबा साहब डाॅ. भीमराव अम्बेडकर जी का 125वां जयंती समारोह  मेडीकल काॅलेज सभागार में आयोजित हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डाॅ. एस.एन. मेडीकल काॅलेज के प्राचार्य एवं नियंत्रक डाॅ. अमीलाल भाट  ने कहा कि संघ को लेकर समाज में अनेक भ्रांत धारणाएँ फैलायी जाती है जबकि संघ को समझने वाला व्यक्ति जानता है कि संघ बाबासाहब के ही देखे हुए सपने को पूरा करने में लगा है। इस भ्रांत धारणा को समाज से दूर करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हिन्दू धर्म सर्व समावेशी है। इस दर्शन में विश्व के सभी धर्मों और तत्वों का सार निहित है। बाबासाहब भारत रत्न नहीं वरन विश्व के रत्न है।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के  क्षेत्रीय प्रचारक  माननीय  दुर्गादास जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि श्रद्धेय बाबासाहब संपूर्ण समाज के पथ प्रदर्शक थे, किसी वर्ग, दल या जाति तक सीमित नहीं थे। किंतु यह विडम्बना है कि उनका मूल्यांकन सही नहीं हो पाया। वे एक विश्वविभूति थे जिनका जन्म दैवीय योग से विशेष प्रयोजना हेतु हुआ था।

माननीय  दुर्गादास जी ने उध्बोधन देते हुए बताया  कि तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों ने डॉ. आंबेडकर के हृदय पर गहरा आघात किया और समाज में व्याप्त विषमताओं को दूर करने हेतु वे कृतसंकल्प हो उठे। वे समाज में व्याप्त दोषों के, विषमता के विरोधी थे। किसी जाति विशेष या वर्ग विशेष के नहीं। बाबा साहब एक दूर दृष्टा थे जिन्होंने तत्कालीन विदेश नीति और विभाजन के संबंध में खुल कर विचार दिये और धारा 370 को देश के लिए खतरा बताया एवं पूर्ण जनसंख्या विनिमय को विभाजन की समस्या का एक मात्र हल बताया।

बाबा साहब संघ के सम्पर्क में आये और संघ के कार्य और लक्ष्य की मुक्त कंठ से प्रशंसा की, किंतु उनका कहना था कि संघ की कार्यगति थोड़ी धीमी है और मेरे पास इतना समय नहीं है। 1949 में संघ पर लगे प्रतिबंध को हटाने हेतु भी उन्होंने सरकार के समक्ष अपनी बात रखी। बाबा साहब कम्युनिज्म के घोर विरोधी थे और उनका कहना था कि दलित वर्ग और कम्युनिज्म के बीच मैं एक दीवार हूॅ। हिन्दू धर्म छोड़ने की घोषणा के पश्चात् ईसाइ व इस्लाम मतावलम्बियों ने उनसे खूब सम्पर्क किया किंतु उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया एवं हिन्दू धर्म के ही निकट बौद्ध धर्म को स्वीकार किया।

दुर्गादास जी ने जोर देकर कहा कि आज बाबा साहब के जीवन को, उनके मूल्यों को जीवन में उतारने की आवश्यकता है। समरस समाज के बाबा साहब के सपने को पूरा करने के लिए हम अपने-अपने स्तर पर प्रयास कर इसे मूर्त रूप अवश्य देंगे यही उनके जयंती समारोह को मनाने का सच्चा उद्देश्य होगा।

मंच पर प्रांत संघचालक श्री ललित जी शर्मा एवं विभाग संघचालक डाॅ. शान्तिलालजी चौपड़ा भी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अभिनव पुरोहित ने किया

आयकर दाताओं की कुल संख्या सिर्फ 1.25 करोड़


बड़ी आबादी और आयकर दाता
May 4, 2016
http://www.4pm.co.in/archives/16434
हमारी सरकार सालाना करीब 5.6 लाख करोड़ के घाटे में जा रही है। इस वजह से सरकार पर कुल कर्ज करीब 70 लाख करोड़ रुपए हो चुका है। इस कर्ज पर सालाना 4.6 लाख करोड़ रुपये ब्याज चुकाना होता है। इस कठिन वित्तीय स्थिति के बाद देश में जीडीपी में टैक्स का अनुपात सिर्फ 16-17 फीसदी है, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन आदि में करीब 29 फीसदी है।

देश में अमीरों को ढूंढऩा कोई ज्यादा मुश्किल भरा काम नहीं है। बढ़ते होटलों, मॉल्स और ज्वैलर्स की चमचमाती दुकानें देश में प्रगति की गवाही देती हैं। लाखों-करोड़ों रुपये के घर धड़ल्ले से खरीदे और बेचे जा रहे हैं, सडक़ों पर तेज रफ्तार और नई गाडिय़ों की भरमार है। ऐसे में इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि देश में आयकर देनेवालों की संख्या कुल आबादी का सिर्फ एक फीसदी है। हालांकि, इनमें से 5,430 लोग हर साल एक करोड़ रुपये से अधिक आयकर देते हैं। लेकिन आबादी का एक बड़ा हिस्सा आयकर देने में लापरवाही बरत रहा है।
आयकर से जुड़ा आंकड़ा चौंकाने वाला है। यह देश में कर प्रणाली की खामियों की तरफ भी इशारा करता है। यह आर्थिक समृद्धि से जुड़े दोहरेपन को दिखाता है। केंद्र सरकार ने बीते 15 वर्षों के प्रत्यक्ष कर आंकड़ों को जनता के बीच रखा है। आकलन वर्ष 2012-13 में कुल 2.87 करोड़ लोगों ने आयकर रिटर्न दाखिल किया, जिनमें 1.62 करोड़ ने कोई टैक्स नहीं दिया। इस तरह करदाताओं की कुल संख्या सिर्फ 1.25 करोड़ रही। इनमें बड़ी संख्या वेतनभोगी कर्मचारियों की है, जिनकी कंपनियां उनके वेतन से टैक्स का हिस्सा काट सरकारी खजाने में जमा कर देती है। पर, नौकरी से इतर काम करने वाले लोग अपनी आय को छिपाने के लिए कई तरह के हथकंडे इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग कर भले न चुकाते हों, विभिन्न तरीकों से अपनी अमीरी का प्रदर्शन करने से नहीं हिचकते। दूसरी तरफ इन पर निगरानी रखने वालों की संपत्ति खूब फल रही है। मौजूदा वित्त वर्ष के शुरुआत का बजट पेश होने से ऐन पहले केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने कहा था कि केंद्र सरकार की तमाम करों से कमाई करीब 12 लाख करोड़ रुपए और जबकि खर्च 18 लाख करोड़ है।
इस तरह हमारी सरकार सालाना करीब 5.6 लाख करोड़ के घाटे में जा रही है। इस वजह से सरकार पर कुल कर्ज करीब 70 लाख करोड़ रुपए हो चुका है। इस कर्ज पर सालाना 4.6 लाख करोड़ रुपये ब्याज चुकाना होता है। इस कठिन वित्तीय स्थिति के बाद देश में जीडीपी में टैक्स का अनुपात सिर्फ 16-17 फीसदी है, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन आदि में करीब 29 फीसदी है।
कर चोरी जैसे मामलों से निपटने और सतत विकास के लिए आयकर संग्रह के लिए कड़े नियमों की जरूरत है। इसके लिए अधिक से अधिक लोगों को कर के दायरे में लाना जरूरी है। इतना ही निगरानी तंत्र को भी मजबूत करने जरूरत है। लेकिन, ऐसी कोई व्यवस्था तभी मुमकिन हकीकत हो सकती है जब आयकर विभाग अपने तंत्र को ईमानदारी के साथ सही तौर पर स्थापित करे।

शनिवार, 7 मई 2016

देवर्षि नारद : कल्याणकारी पत्रकारिता की राह - लोकेन्द्र सिंह

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार देवर्षि नारद ब्रह्मा के सात मानस पुत्रो मे से एक हैं। उन्होंने अति कठोर तपस्या करके ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया। नारद भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते है। देवर्षि नारद धर्म प्रचार व लोक-कल्याण हेतु सदैव तत्पर रहते हैं।
नारद देवताओं व दानवों ने में एक-समान आदरणीय माने जाते हैं।

देवर्षि नारद को ब्रह्माण्ड के प्रथम पत्रकार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। पिछले कुछ समय से इस दिन पत्रकारों को सम्मानित करने का चलन भी बढ़ रहा है।
प्रस्तुत है नारद मुनि से संबंधित कुछ सामग्री ।#


नारद दिखाते हैं कल्याणकारी पत्रकारिता की राह
- लोकेन्द्र सिंह

पत्रकारिता की तीन प्रमुख भूमिकाएं हैं- सूचना देना, शिक्षित करना और मनोरंजन करना। महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में पत्रकारिता की इन तीनों भूमिकाओं को और अधिक विस्तार दिया है- लोगों की भावनाएं जानना और उन्हें जाहिर करना, लोगों में जरूरी भावनाएं पैदा करना, यदि लोगों में दोष है तो किसी भी कीमत पर बेधड़क होकर उनको दिखाना। भारतीय परम्पराओं में भरोसा करने वाले विद्वान मानते हैं कि देवर्षि नारद की पत्रकारिता ऐसी ही थी। देवर्षि नारद सम्पूर्ण और आदर्श पत्रकारिता के संवाहक थे। वे महज सूचनाएं देने का ही कार्य नहीं बल्कि सार्थक संवाद का सृजन करते थे। देवताओं, दानवों और मनुष्यों, सबकी भावनाएं जानने का उपक्रम किया करते थे। जिन भावनाओं से लोकमंगल होता हो, ऐसी ही भावनाओं को जगजाहिर किया करते थे। इससे भी आगे बढ़कर देवर्षि नारद घोर उदासीन वातावरण में भी लोगों को सद्कार्य के लिए उत्प्रेरित करने वाली भावनाएं जागृत करने का अनूठा कार्य किया करते थे। दादा माखनलाल चतुर्वेदी के उपन्यास 'कृष्णार्जुन युद्ध' को पढऩे पर ज्ञात होता है कि किसी निर्दोष के खिलाफ अन्याय हो रहा हो तो फिर वे अपने आराध्य भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण और उनके प्रिय अर्जुन के बीच भी युद्ध की स्थिति निर्मित कराने से नहीं चूकते। उनके इस प्रयास से एक निर्दोष यक्ष के प्राण बच गए। यानी पत्रकारिता के सबसे बड़े धर्म और साहसिक कार्य, किसी भी कीमत पर समाज को सच से रू-ब-रू कराने से वे भी पीछे नहीं हटते थे। सच का साथ उन्होंने अपने आराध्य के विरुद्ध जाकर भी दिया। यही तो है सच्ची पत्रकारिता, निष्पक्ष पत्रकारिता, किसी के दबाव या प्रभाव में न आकर अपनी बात कहना। मनोरंजन उद्योग ने भले ही फिल्मों और नाटकों के माध्यम से उन्हें विदूषक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया हो लेकिन देवर्षि नारद के चरित्र का बारीकी से अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होता है कि उनका प्रत्येक संवाद लोक कल्याण के लिए था। मूर्ख उन्हें कलहप्रिय कह सकते हैं। लेकिन, नारद तो धर्माचरण की स्थापना के लिए सभी लोकों में विचरण करते थे। उनसे जुड़े सभी प्रसंगों के अंत में शांति, सत्य और धर्म की स्थापना का जिक्र आता है। स्वयं के सुख और आनंद के लिए वे सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं करते थे, बल्कि वे तो प्राणी-मात्र के आनंद का ध्यान रखते थे।

भारतीय परम्पराओं में भरोसा नहीं करने वाले 'बुद्धिजीवी' भले ही देवर्षि नारद को प्रथम पत्रकार, संवाददाता या संचारक न मानें। लेकिन, पथ से भटक गई भारतीय पत्रकारिता के लिए आज नारद ही सही मायने में आदर्श हो सकते हैं। भारतीय पत्रकारिता और पत्रकारों को अपने आदर्श के रूप में नारद को देखना चाहिए, उनसे मार्गदर्शन लेना चाहिए। मिशन से प्रोफेशन बनने पर पत्रकारिता को इतना नुकसान नहीं हुआ था जितना कॉरपोरेट कल्चर के आने से हुआ है। पश्चिम की पत्रकारिता का असर भी भारतीय मीडिया पर चढऩे के कारण समस्याएं आई हैं। स्वतंत्रता आंदोलन में जिस पत्रकारिता ने 'एक स्वतंत्रता सेनानी' की भूमिका निभाई थी, वह पत्रकारिता अब धन्ना सेठों के कारोबारों की चौकीदार बनकर रह गई है। पत्रकार इन धन्ना सेठों के इशारे पर कलम घसीटने को मजबूर, महज मजदूर हैं। संपादक प्रबंधक हो गए हैं। उनसे लेखनी छीनकर, लॉबिंग की जिम्मेदारी पकड़ा दी गई है। आज कितने संपादक और प्रधान संपादक हैं जो नियमित लेखन कार्य कर रहे हैं? कितने संपादक हैं, जिनकी लेखनी की धमक है? कितने संपादक हैं, जिन्हें समाज में मान्यता है? 'जो हुक्म सरकारी, वही पकेगी तरकारी' की कहावत को पत्रकारों ने जीवन में उतार लिया है। मालिक जो हुक्म संपादकों को देता है, संपादक उसे अपनी टीम तक पहुंचा देता है। तयशुदा ढांचे में पत्रकार अपनी लेखनी चलाता है। अब तो किसी भी खबर को छापने से पहले संपादक ही मालिक से पूछ लेते हैं- 'ये खबर छापने से आपके व्यावसायिक हित प्रभावित तो नहीं होंगे।' खबरें, खबरें कम विज्ञापन अधिक हैं। 'लक्षित समूहों' को ध्यान में रखकर खबरें लिखी और रची जा रही हैं। मोटी पगार की खातिर संपादक सत्ता ने मालिकों के आगे घुटने टेक दिए हैं। आम आदमी के लिए अखबारों और टीवी चैनल्स पर कहीं जगह नहीं है। एक किसान की 'पॉलिटिकल आत्महत्या' होती है तो वह खबरों की सुर्खी बनती है। पहले पन्ने पर लगातार जगह पाती है। चैनल्स के प्राइम टाइम पर किसान की चर्चा होती है। लेकिन, इससे पहले बरसों से आत्महत्या कर रहे किसानों की सुध कभी मीडिया ने नहीं ली। जबकि भारतीय पत्रकारिता की चिंता होना चाहिए- अंतिम व्यक्ति। आखिरी आदमी की आवाज दूर तक नहीं जाती, उसकी आवाज को बुलंद करना पत्रकारिता का धर्म होना चाहिए, जो है तो, लेकिन व्यवहार में दिखता नहीं है। पत्रकारिता के आसपास अविश्वसनीयता का धुंध गहराता जा रहा है। पत्रकारिता की इस स्थिति के लिए कॉरपोरेट कल्चर ही एकमात्र दोषी नहीं है। बल्कि पत्रकार बंधु भी कहीं न कहीं दोषी हैं। जिस उमंग के साथ वे पत्रकारिता में आए थे, उसे उन्होंने खो दिया। 'समाज के लिए कुछ अलग' और 'कुछ अच्छा' करने की इच्छा के साथ पत्रकारिता में आए युवा ने भी कॉरपोरेट कल्चर के साथ सामंजस्य बिठा लिया है।

बहरहाल, भारतीय पत्रकारिता की स्थिति पूरी तरह खराब भी नहीं हैं। बहुत-से संपादक-पत्रकार आज भी उसूलों के पक्के हैं। उनकी पत्रकारिता खरी है। उनकी कलम बिकी नहीं है। उनकी कलम झुकी भी नहीं है। आज भी उनकी लेखनी आम आदमी के लिए है। लेकिन, यह भी कड़वा सच है कि ऐसे 'नारद पत्रकारों' की संख्या बेहद कम है। यह संख्या बढ़ सकती है। क्योंकि सब अपनी इच्छा से बेईमान नहीं हैं। सबने अपनी मर्जी से अपनी कलम की धार को कुंद नहीं किया है। सबके मन में अब भी 'कुछ' करने का माद्दा है। वे आम आदमी, समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए लिखना चाहते हैं लेकिन राह नहीं मिल रही है। ऐसी स्थिति में देवर्षि नारद उनके आदर्श हो सकते हैं। आज की पत्रकारिता और पत्रकार नारद से सीख सकते हैं कि तमाम विपरीत परिस्थितियां होने के बाद भी कैसे प्रभावी ढंग से लोक कल्याण की बात कही जाए। पत्रकारिता का एक धर्म है-निष्पक्षता। आपकी लेखनी तब ही प्रभावी हो सकती है जब आप निष्पक्ष होकर पत्रकारिता करें। पत्रकारिता में आप पक्ष नहीं बन सकते। हां, पक्ष बन सकते हो लेकिन केवल सत्य का पक्ष। भले ही नारद देवर्षि थे लेकिन वे देवताओं के पक्ष में नहीं थे। वे प्राणी मात्र की चिंता करते थे। देवताओं की तरफ से भी कभी अन्याय होता दिखता तो राक्षसों को आगाह कर देते थे। देवता होने के बाद भी नारद बड़ी चतुराई से देवताओं की अधार्मिक गतिविधियों पर कटाक्ष करते थे, उन्हें धर्म के रास्ते पर वापस लाने के लिए प्रयत्न करते थे। नारद घटनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं, प्रत्येक घटना को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं, इसके बाद निष्कर्ष निकाल कर सत्य की स्थापना के लिए संवाद सृजन करते हैं। आज की पत्रकारिता में इसकी बहुत आवश्यकता है। जल्दबाजी में घटना का सम्पूर्ण विश्लेषण न करने के कारण गलत समाचार जनता में चला जाता है। बाद में या तो खण्डन प्रकाशित करना पड़ता है या फिर जबरन गलत बात को सत्य सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है। आज के पत्रकारों को इस जल्दबाजी से ऊपर उठना होगा। कॉपी-पेस्ट कर्म से बचना होगा। जब तक घटना की सत्यता और सम्पूर्ण सत्य प्राप्त न हो जाए, तब तक समाचार बहुत सावधानी से बनाया जाना चाहिए। कहते हैं कि देवर्षि नारद एक जगह टिकते नहीं थे। वे सब लोकों में निरंतर भ्रमण पर रहते थे। आज के पत्रकारों में एक बड़ा दुर्गुण आ गया है, वे अपनी 'बीट' में लगातार संपर्क नहीं करते हैं। आज पत्रकार ऑफिस में बैठकर, फोन पर ही खबर प्राप्त कर लेता है। इस तरह की टेबल न्यूज अकसर पत्रकार की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न खड़ा करवा देती हैं। नारद की तरह पत्रकार के पांव में भी चक्कर होना चाहिए। सकारात्मक और सृजनात्मक पत्रकारिता के पुरोधा देवर्षि नारद को आज की मीडिया अपना आदर्श मान ले और उनसे प्रेरणा ले तो अनेक विपरीत परिस्थितियों के बाद भी श्रेष्ठ पत्रकारिता संभव है। आदि पत्रकार देवर्षि नारद ऐसी पत्रकारिता की राह दिखाते हैं, जिसमें समाज के सभी वर्गों का कल्याण निहित है।
- लोकेन्द्र सिंह
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लेखक परिचय : युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पदस्थ हैं। वे स्वदेश ग्वालियर, दैनिक भास्कर, पत्रिका और नईदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसामयिक विषयों पर आलेख, कहानी, कविता और यात्रा वृतांत प्रकाशित। उनके राजनीतिक आलेखों का संग्रह 'देश कठपुतलियों के हाथ में' और काव्य संग्रह 'मैं भारत हूं' प्रकाशित हो चुका है।

शुक्रवार, 6 मई 2016

देश की सिर्फ एक प्रतिशत आबादी करती है आयकर देने लायक



देश की सिर्फ एक प्रतिशत आबादी करती है आयकर का भुगतान


नई दिल्ली |   देश की कुल आबादी में आयकर दाताओं की संख्या सिर्फ एक प्रतिशत हैं। हालांकि, 5,430 लोग ऐसे हैं जो सालाना एक करोड़ रुपये से अधिक का कर देते हैं। सरकार के आकलन वर्ष 2012-13 के आंकड़ों से यह जानकारी मिली है।
पारदर्शिता अभियान के तहत सरकार ने पिछले 15 साल के प्रत्यक्ष कर आंकड़ों को सार्वजनिक किया है। आकलन वर्ष 2012-13 के लिए लोगों के आंकड़ों को प्रकाशित किया गया है। इसमें 31 मार्च, 2012 को समाप्त वित्त वर्ष के आयकर आंकड़े दिए गए हैं। कुल मिलाकर 2.87 करोड़ लोगों ने वित्त वर्ष के लिए आयकर रिटर्न दाखिल किया। इनमें से 1.62 करोड़ ने कोई कर नहीं दिया। इस तरह करदाताओं की कुल संख्या 1.25 करोड़ रही, जो उस समय देश की 123 करोड़ की आबादी का लगभग एक प्रतिशत बैठता है।
आंकड़ों के अनुसार ज्यादातर यानी 89 प्रतिशत या 1.11 करोड़ लोगों ने 1.5 लाख रुपये से कम का कर दिया। इस दौरान औसत कर भुगतान 21,000 रुपये रहा। कुल कर संग्रहण 23,000 करोड़ रुपये रहा। 100 से 500 करोड़ रुपये के दायरे में तीन लोगों ने 437 करोड़ रुपये का कर दिया। इस तरह औसत कर भुगतान 145.80 करोड़ रुपये रहा।
कुल मिलाकर 5,430 लोगों ने एक करोड़ रुपये से अधिक का आयकर अदा किया। इनमें से 5,000 लोगों का कर भुगतान एक से पांच करोड़ रुपये के दायरे में रहा। इन लोगों का कुल कर भुगतान 8,907 करोड़ रुपये रहा। कुल आंकड़ों के अनुसार 2015-16 में कुल आयकर संग्रहण नौ गुना बढ़कर 2.86 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। यह 2000-01 में 31,764 करोड़ रुपये था।

नरेन्द्र मोदी सरकार के दो वर्ष

मोदी सरकार के दो वर्ष

मोदी सरकार आगामी 26 मई को अपने दो वर्ष पूरे करने जा रही है। अब तक सरकार ने जो भी काम किए हैं उन्हें देखकर कहा जा सकता है कि वह अब तक लोगों की आशाओं पर खरी उतरी है। फिर चाहे वह जन-धन योजना हो, एलपीजी कवरेज में वृद्धि, गांवों में विद्युतीकरण, सस्ता एलईडी बल्ब उपलब्ध कराने सम्बन्धी योजनाओं का लाभ जनता को मिल रहा है। हालांकि अभी भी कई योजनाओं के अपेक्षित लाभ सामने आना है। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस नीत यूपीए सरकार से मायूस होकर लोगों ने भाजपा को अपार जनसमर्थन देकर केन्द्र की सत्ता सौंपी थी जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र भाई मोदी कर रहे हैं।


उनके नेतृत्व में जहां विदेशों में भारत की छवि में सुधार आया है। वहीं आर्थिक गति भी मिली है। कुल मिलाकर जोरदार बहुमत और जनता की उम्मीदों का दामन थामकर सत्तासीन हुई मोदी सरकार ने पिछले लगभग दो साल में पुरानी जड़ता खत्म करने और विकास को गति देने और आमजन को विकास प्रक्रिया का हिस्सा बनाने का प्रयास किया है। आमतौर पर यह माना जाता है कि लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना प्रत्येक सरकार के लिए चुनौतीभरा होता है, लेकिन यदि पिछले दो वर्ष की बात करें तो केन्द्र सरकार की योजनाओं ने लोगों को आकर्षित किया है लोग उनसे जुड़े हैं और यह हकीकत योजनाओं की सफलता में साफ दिखाई देती है। वास्तविकता यह है कि पार्टियां सत्ता में आने के लिए अगले पांच साल में बहुत से कार्य करने के दावे करती हैं लेकिन सच्चाई यह है कि जनता इंतजार नहीं करती और उसे तुरंत परिणाम की आकांक्षा रहती है। प्रधानमंत्री मोदी भी यह जानते हैं कि जनादेश उनके नाम पर मिला है। यदि जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं 

रविवार, 1 मई 2016

भारतीय मुस्लिमों के पूर्वज हैं राम : मोहम्मद अफजाल





भारतीय मुस्लिमों के पूर्वज हैं राम, जल्द बनेगा मंदिरः अफजाल
Published 24-Apr-2016

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक मोहम्मद अफजाल,

नई दिल्ली। राम मन्दिर के मुद्दे पर सिर्फ वीएचपी ही आवाज नहीं उठा रही है बल्कि अब मुस्लिम राष्ट्रीय मंच भी अदालत के बाहर राम मंदिर के मुद्दे को सुलझाने की तैयारी में है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए व्यापक सहमति बनाने की तैयारी कर ली है।

मंच इसके लिए बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी से भी बातचीत की तैयारी कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक मंच की इसी हफ्ते नागपुर में हुई तीन दिन की मीटिंग में भी यह मसला उठा।

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक मोहम्मद अफजाल ने ईनाडु इंडिया से बातचीत में कहा कि अब वक्त आ गया है कि मुस्लिम समुदाय को अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए हिंदू समाज का समर्थन करना चाहिए। अफजाल ने कहा कि असली  असहिष्णुता तो ये है कि बहुसंख्यक हिंदुओं के आराध्य रामलला अयोध्या में तिरपाल में हैं।

उन्होंने कहा कि भारत का मुस्लिम समाज कोई बाहर से नहीं आया है और ना ही हमारे पूर्वज अरब या बाबर हैं। अफजाल ने कहा कि भारत के मुसलमानों के पूर्वज सिर्फ भगवान राम ही हो सकते हैं। अफजाल ने यहां तक कहा कि अयोध्या में करीब 20 और मस्जिदें हैं जहां नमाज पढ़ी जाती है वहां कई मजार भी हैं लेकिन हिंदू समाज मस्जिद या मजार पर तो दावा नहीं करता। वह बस एक ही जगह दावा कर रहे हैं। इसलिए हमें इसमें सहमति से राम मंदिर बनने देना चाहिए।

मंच नेता ने कहा कि मजहब-ए-इस्लाम के अंदर अगर मस्जिद बनाना चाहते हैं तो जमीन की मलकियत मुस्लिम समाज में किसी की या वक्फ की होनी चाहिए। लेकिन अयोध्या की उस जगह की मलकियत न तो मुस्लिम समाज के पास है न वक्फ बोर्ड के पास है।

उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज का अधिकार उस जमीन पर नहीं है जहां गर्भगृह है। अफजाल ने कहा कि हम नहीं चाहते कि राम के नाम पर इंसानियत का खून बहे इसलिए इसका फैसला जितनी जल्दी हो उतना अच्छा है।

मोहम्मद अफजाल ने ईनाडु से बातचीत में कहा कि हम कोर्ट का फैसला आने से पहले ही इस मसले का समाधान चाहते हैं। इसलिए मंच अब बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी से भी बातचीत की पहल कर रहा है। हम चाहते हैं कि हम हिंदू समाज के साथ मिलकर आगे बढ़े।

उन्होंने कहा कि आज भी अयोध्या में रामलला की पूजा हो ही रही है तो इस मसले को और ज्यादा क्यों खींचना चाहिए। हम फसाद नहीं चाहते और मुस्लिम समाज को तरक्की की दरकार है। इसके लिए विवाद न करते हुए मुस्लिम समाज को अयोध्या में  राम मंदिर बनाने में सहयोग कर

70 प्रतिशत लोग चाहते हैं नरेन्द्र मोदीे पांच साल के पहले कार्यकाल के बाद भी प्रधानमंत्री बने रहें



70 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि नरेन्द्र मोदीे पांच साल के पहले कार्यकाल के बाद भी प्रधानमंत्री बने रहें

- भाषा

मीडिया अध्ययन केंद्र (सीएमएस) के सर्वेक्षण में नरेन्द्र मोदी सरकार के दो साल के कामकाज प्रदर्शन का आकलन करने पर पता चला कि प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के कामकाज को बड़ी संख्या में लोगों ने पसंद किया है जिनकी संख्या 62 फीसदी है और करीब 70 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि वे पांच साल के पहले कार्यकाल के बाद भी प्रधानमंत्री बने रहें।

सर्वेक्षण में गिनाई गयीं बड़ी उपलब्धियों में जन धन योजना (36 प्रतिशत), स्वच्छ भारत मिशन (32 प्रतिशत) और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश लाने के प्रयास (23 प्रतिशत) का जिक्र हुआ। अलग अलग मंत्रालयों के आकलन में रेल मंत्रालय सर्वश्रेष्ठ आंका गया। प्रतिभागियों ने इसके बाद वित्त और विदेश मंत्रालय के कामकाज पर संतोष प्रकट किया। केंद्रीय मंत्रियों को पसंद करने के मामले में सबसे ज्यादा मत श्रीमती सुषमा स्वराज को मिले। इसके बाद राजनाथ सिंह, सुरेश प्रभु, मनोहर पर्रिकर और अरूण जेटली को लोगों ने पसंदीदा मंत्री बताया।


एक संवाददाता सम्मेलन में सर्वेक्षण के नतीजे घोषित करते हुए लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष सी. कश्यप ने कहा कि प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि उजली बनी हुई और बड़ी संख्या में लोग उनके कामकाज को पसंद कर रहे हैं। दुनियाभर में भारत की स्थिति सुधारने और घरेलू स्तर पर प्रशासन सुधारने में मोदी के प्रयासों को सर्वेक्षण में शामिल अधिकतर लोगों ने पसंद किया।

सीएमएस के महानिदेशक पी.एन. वसंती ने कहा, 15 राज्यों के शहरी और ग्रामीण इलाकों में करीब 4000 प्रतिभागियों के बीच सर्वेक्षण कराया गया जिसमें यह बात सामने आई है। ‘राजग सरकार की योजनाओं की सामान्य तौर पर जहां सराहना की गयी, वहीं बढ़ती कीमतें और बेरोजगारी को लेकर जमीनी स्तर पर चिंता बनी हुई है।’ केंद्र सरकार की जो नाकामियां इस सर्वेक्षण में गिनाई गयीं उनमें 32 प्रतिशत ने महंगाई का जिक्र किया, उसके बाद 29 फीसदी लोग रोजगार नहीं दे पाने से नाखुश दिखे और काला धन वापस नहीं ला पाने की बात पर 26 प्रतिशत ने अपनी बात रखी।