मंगलवार, 28 जून 2016

संघ प्रचारक : नर करनी करे और नारायण हो जाए


संघ प्रचारक : नर करनी करे और नारायण हो जाए

( संघ के प्रचारकों के प्रति यह मेरा व्यक्तिगत भाव है इसे अन्यथा ना लिया जाये ! )


संघ को अधिक जानने समझनें में यह लिक मददगार होगा 



प्रारंभिक कुछ वर्षों तक संघ में यह प्रचारक शब्द परिचित नहीं था। केवल संघ कार्य का ही अहोरत्रचिंतन करने वाले डॉक्टरजी ही एक मात्र स्वयंसेवक थे। अधिकांश शालेय छात्र किशोर स्वयंसेवक अपने घरों में रहते और कार्यक्रम अथवा बैठक के समय एकत्र आते थे। आयु में कुछ बड़े स्वयंसेवकों में, बाबासाहब आपटे नागपुर की एक बीमा कम्पनी के कार्यालय में टंकलेखन कार्य करते थे। श्री दादाराव परमार्थ ने शालांत परीक्षा उत्तीर्ण करने के अनेक प्रयास किये किन्तु गणित जैसे भयानक विषय के कारण असफल होकर, उसके पीछे लगे रहने की बजाय वे अधिकाधिक समय देकर संघ कार्य करने लगे। उनकी ओजपूर्ण भाषण शैली तथा अंग्रेजी भाषा पर प्रभुत्व के कारण, संघ कार्य करते समय उन्हें कभी भी विद्यालयीन अथवा महाविद्यालयीन उपाधियों की कमी महसूस नहीं हुई। इस समय संघ का कार्य नागपुर के बाहर भी पहुंच चुका था- विदर्भ के वर्धा-भंडारा आदि जिलों में संघ की शाखाएं खुल गई थी। वहां की शाखाओं का संचालन स्थानीय कार्यकर्ता ही किया करते थें ।

    भिन्न भिन्न गांवों में संघ की शाखाएं खुलने के दौर में उन सभी शाखाओं के कार्य में एकसूत्रता लाने की दृष्टि से प्रवास करने वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। हर स्थान पर, चार-छह दिन रहकर, वहां के स्वयंसेवकों के साथ विचार-विनिमय कर उन्हें संघ कार्य से, दृढ़ता से जोड़ने तथा अपने दैनंदिन जीवन में संघ कार्य के लिए अधिकाधिक समय देने हेतु कार्य-प्रवण करने की आवश्यकता भी महसूस होने लगी। शुरु-शुरु में डॉक्टरजी अकेले ही प्रवास किया करते। उत्सव प्रसंगों पर अन्य कार्यकर्ता भी जाते थे। ज्येष्ठ कार्यकर्ताओं को अपने उद्योग व्यवसाय से अवकाश लेकर कुछ दिनों का प्रवास करना ही संभव होता। जिन गांवों में पू. डॉक्टरजी के परिचित अथवा मित्र आदि रहते थे, वहां कार्य प्रारंभ करना आसान होता। किंतु जहां एकाध व्यक्ति ही परिचित होता वहां शाखा प्रारंभ कर संघकार्य स्थायी रूप से संचालित होने तक, बाहर के ही किसी कार्यकर्ता को प्रत्यक्ष वहां रहकर काम करना आवश्यक होता।
शालेय छात्र स्वयंसेवक कार्यकर्ताओं को, वार्षिक परीक्षा के पश्चात ग्रीष्मकालीन छुट्टियों में, 4-6 सप्ताह तक विदर्भ और महाकोशल क्षेत्र में जाकर संघ की नयी शाखाएं खोलने की आवश्यकता डॉक्टरजी द्वारा व्यक्त किये जाने पर उस दिशा में विचार प्रारंभ हुआ। कुछ कार्यकर्ताओं ने इस दृष्टि से आपनी तैयारी भी दर्शायी। बाहर जाकर कार्य करने वाले ऐसे स्वयंसेवकों को “विस्तारक” कहा जाता। प्रतिवर्ष ऐसे विस्तारक कार्यकर्ता ग्रीष्मकालीन छुट्टियों में अन्यतत्र जाकर संघ कार्य का विस्तार करने लगे- नयी शाखाओं की संख्या बढ़ने लगी। डॉक्टरजी के साथ वार्तालाप में विस्तारकों तथा पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता स्वयंसेवकों को भी अनुभव होने लगी। बाहर गांव से डॉक्टरजी के नाम आये, उनके मित्रों के पत्रों को स्वयंसेवकों की बैठकों में पढ़ा जाता। इन पत्रों में लिखा होता- “ हमारे गांव में संघ की शाखा शुरु की जा सकती है। कृपया किसी योग्य कार्यकर्ता को भेजिए। उसके निवास और भोजन आदि की व्यवस्था यहां की जायेगी।“ श्री दादाराव परमार्थ, श्री बाबासाहेब आपटे, श्री रामभाऊ जामगड़े व श्री गोपाळराव येरकुंटवार आदि ज्येष्ठ कार्यकर्ताओं ने, अपने व्यक्तिगत जीवन की आशा- आकांक्षाओं को एक ओर रखकर, संघ कार्य के लिए प्रवास पर जाने की सिध्दता दर्शायी।
1932 के उत्तारार्ध में, डॉक्टरजी ने इन कार्यकर्ताओं को पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में अन्यत्र भेजने की योजना बनाई। संघ कार्य के इस प्रकार होने वाले विस्तार में, डॉक्टरजी को, कभी किसी स्वयंसेवक को इस प्रकार का आदेश देते किसी ने नहीं सुना कि “ तुम अपने व्यक्तिगत जीवन की चिंता छोड़कर पूर्ण कालिक कार्यकर्ता बनकर संघ कार्यार्थ निकलो। “ डॉक्टरजी का स्वयं का जीवन संघ से एक रूप हो गया था। उनके प्रवास और वार्तालाप से संघ कार्य के असाधारण महत्व तथा उसके लिए अपना जीवन समर्पित करने की प्रेरणा ग्रहण कर स्वयंसेवक जब स्वयं अपनी सिध्दता डॉक्टरजी के सामने व्यक्त करते तभी डॉक्टरजी उस कार्यकर्ता की उस प्रकार की योजना करते। इस प्रकार श्री दादाराव परमार्थ को पुणे, श्री गोपाळराव येरकुंटवार को सांगली (महाराष्ट्र) ओर श्री रामभाऊ जामगडे को यवतमाल (विदर्भ) में पूर्णकालिक संघ कार्यकर्ता के रूप में भेजने की योजना बनी। इन सभी पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को सभी स्वयंसेवकों की उपस्थिति में पू. डॉक्टरजी ने भावपूर्ण शब्दों में विदाई दी। इस प्रकार के कार्यकर्ताओ को “प्रचारक“ के नाम से अन्यत्र भेजने की पद्धति संघ में शुरु हुई।
संघ कार्य में वृध्दि की गति बढ़ने लगी। 1937 के आरंभ में विदर्भ व महाराष्ट्र के प्रमुख स्थानों पर, महाकोशल के 4-6 स्थानों पर तथा उत्तर प्रदेश के बनारस में संघ की शाखाएं शुरु हो चुकी थी। किंतु पंजाब, दिल्ली उत्तर प्रदेश के अन्य प्रमुख शहरों में संघ का कार्य शुरु करने की आवश्यकता अनुभव होने लगी। इस कारण, नागपुर के स्वयंसेवकों में से जिन्हें इन प्रांतों के प्रमुख स्थानों पर जाना संभव हो, उन्हें उच्च शिक्षा के लिए वहां के महाविद्यालयों में प्रवेश लेना चाहिए और वहां शिक्षा ग्रहण कर साथ-साथ संघ की शाखाएं खोलने का प्रयास करना चाहिए। वार्तालाप में डॉक्टरजी द्वारा यह विचार व्यक्त किये जाने पर, योजनापूर्वक 1937 के जुलाई माह में श्री भाऊराव देवरस को ठ.ब्वउ व स्ंू करने के लिए लखनऊ, श्री कृष्णा जोशी को महाविद्यालयीन शिक्षा ग्रहण करने सियालकोट (पंजाब), श्री दिगम्बर पातुरकर को लाहौर (पं. पंजाब), श्री मोरेश्वर मुंज को उच्च शिक्षा प्राप्त करने रावलपिंडी में शिक्षा ग्रहण के साथ - साथ संघ कार्य हेतु भेजा गया। इसी प्रकार अपनी महाविद्यालयीन शिक्षा नागपुर में समाप्त करने के बाद श्री वसंतराव ओक को दिल्ली, श्री बापूराव दिवाकर, श्री नरहरि पारखी और मुकुंदराव मुंजे को बिहार के पटना, दानापुर और मुंगेर में प्रचारक के रूप में डॉक्टरजी ने भेजा। श्री नारायण तटें को प्रचारक के रूप में ग्वालियर भेजा गया। 1938 में श्री एकनाथ रानडे ड। होने के बाद प्रचारक के रूप में महाकोशल के जबलपुर में गये- उनके साथ प्रल्हादराव आम्बेकर भी गये। 1939 में श्री विठ्ठलराव पत्की को प्रचारक के रूप में, कलकत्ता भेजा गया। श्री जनार्दन चिंचाळकर की नियुक्ति मद्रास में की गयी। इन सभी पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को प्रचारक नाम से संबोधित किया जाने लगा। इस प्रकार संघ के कार्य में “प्रचारक” शब्द रूढ़ हुआ।
किसी प्रकार का आदेश नहीं, बल्कि स्वयं अपनी इच्छा से, अपने व्यक्तिगत जीवन की चिंता न करते हुए संघ कार्य हेतु प्रचारक निकलने की पध्दति स्वयंसेवकों में अपने आप विकसित होने लगी- यह बात आज आश्यचर्यजनक प्रतीत होती है, क्योंकि प्रचारक बनकर जाने का आदेश कभी डॉक्टरजी ने किसी को नहीं दिया। इसके विपरीत जब कोई स्वयंसेवक प्रचारक के रूप में कार्य करने की सिध्दता प्रकट करता तो डॉक्टरजी पहले उसके घर की परिस्थिति और कार्य सम्बन्धी उसके दृढ़ निश्चय के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा करने के बाद ही उसके बारे में निर्णय लेते। डॉक्टरजी के प्रवास और वार्तालाप में विभिन्न स्थानों से “ कार्य शुरु करने हेतु प्रचारक भेजिये “ इस आशय के आने वाले पत्रों के वाचन के बाद होने वाली चर्चा से स्वयंसेवकों में संघ कार्यार्थ सर्वस्य अर्पण करने की तीव्र भावना अपने आप उत्पन्न होती और स्वयंसेवकों के मन में संघ कार्य के लिए अधिकाधिक समय देने की प्रेरणा जागती। अपने जीवन में करने योग्य सर्वश्रेष्ठ कार्य केवल संघ कार्य ही है, यह अनुभूति स्वयंसेवकों को होने लगी। अपना जीवन पुष्प केवल संघ कार्य करते हुए अपनी मातृभूमि के चरणों में समर्पित करने में ही जीवन की सार्थकता है, यह भावना स्वयंसेवक के हृदय में प्रबल होते ही, वह स्वयंसेवक प्रचारक के रूप में निकलने की सिध्दता स्वयं डॉक्टरजी के समक्ष व्यक्त करता। संघ की कार्य पध्दति की यह अनोखी विशेषता है, जिसे डॉक्टरजी ने बड़ी कुशलता से विकसित किया।
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प्रचारक : समाज की संघ को देन - शिवराय तेलंग


शब्दांकन- मल्हार कृष्ण गोखले



श्री शिवराय तेलंग महाराष्ट्र प्रान्त के ज्येष्ठ प्रचारक हैं। 1942 में बड़ी संख्या में संघ प्रचारक निकले, 1943 में शिवराय जी प्रचारक बने। प.पू. श्रीगुरुजी के निकट रहनें का सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ है। 1948 के संघ बंदी के कालखंड के बाद जिन कार्यकर्ताओं के भरोसे तथा कठोर परिश्रम के आधार पर प.पू. श्री गुरुजी ने संघ को पुनर्जन्म दिया, उनमें बाबाराव भिड़े, वसंतराव भिड़े, गोपाल राव देशपांडे, नाना पालकर, केशवराव केलकर, भैयाराव गौतम, दामुअण्णा दाते, प्रल्हाद अभ्यंकर, नाना ढोलके तथा शिवराय तेलंग प्रमुख थे। यहां प्रस्तुत है एक आजीवन प्रचारक का “प्रचारक” संज्ञा के बारे में विवेचन-

अतिरिक्त उपयोग से शब्द अपना वास्तविक अर्थ खो बैठते हैं। जैसे आज सामाजिक क्रांति, दलित उद्धार, समर्पित जीवन, समाज के सबसे आखिरी व्यक्ति पर निरूस्वार्थ प्रेम आदि शब्द अपना स्वाभाविक अर्थ खो बैठे हैं, केवल भाषा के अलंकार बन चुके हैं। उसी तरह डा. हेडगेवार के समय त्याग, बलिदान, देशभक्ति आदि शब्दों का अवमूल्यन हो गया था। अर्थहीन शब्दों को पुनरू प्राणवान जाग्रत, अर्थपूर्ण करने का कार्य महापुरुष करते हैं। अत्यंत कठिन आर्थिक स्थिति में, कष्टपूर्वक अपनी डाक्टरी का अभ्यास क्रम पूरा करने वाले डा. हेडगेवार ने व्यवसाय किया ही नहीं। उन्होंने रा.स्व.संघ का निर्माण किया और समाज में परिवर्तन लाने के लिए तीन शब्द इस समाज को दिए। हिन्दूराष्ट्र, स्वयंसेवक तथा संगठन। इन तीन शब्दों को अर्थवान, प्राणवान, मंत्रमय बनाने हेतु डा. हेडगेवार ने मानो अति-उग्र तपस्या की। अपने भीमकाय, वज्रसमान शरीर को आखिरी क्षण तक कार्यमग्न रखा। बहुआयामी प्रचंड क्षमता को केवल एक ही कार्य में केन्द्रित किया। परम्परागत क्रोधी स्वभाव को प्रयत्नपूर्वक शांत, संयमित कर विशाल लोकसंग्रह किया।

इस विजयदशमी को संघ अपने अमृत महोत्सवी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। पू. डाक्टर जी के द्वारा प्रस्थापित किए गए वह तीन शब्द आज समाज की सारी समस्याएं सुलझाने के लिए पूर्णतः सिद्ध हो रहे हैं। जब सारा समाज संघ के समकक्ष बनकर खड़ा रहेगा, तब इन तीन शब्दों का कार्य पूर्ण होगा। संघ अपनी शतायु के लिए कदापि उत्सुक नहीं, पर बावनवी सदी में समूचा समाज संघ के समकक्ष बनकर खड़ा हो। यह दृश्य देखने के लिए स्वयंसेवकों को जरूर उत्सुक होना चाहिए।

संघ को स्वयंसेवक का निर्माण करना है  केवल शाखा पर नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में। किसानों में-जवानों में-शिक्षकों में साहित्यकारों में, धर्माचार्यों में- वैज्ञानिकों में, राजकीय पार्टियों में व नेताओं में। इस विशाल कार्य के दायरे में महिलाएं, अभिनेता, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, सज्जन, दुर्जन सारे लोग समाते है। संघ का स्वयंसेवक जहां कहीं भी जाता है, उसकी नम्रता में सामने वाले व्यक्ति को अहंकार छोड़कर अपने जैसा बनने का आह्वान रहता है।

संघ में अर्थात् संघ शाखा में प्रवेश करने वाला बाल हो, तरुण हो, प्रौढ़ हो अथवा वृद्ध, उसे स्वयंसेवक ही कहते है। स्वयंसेवक बनने के लिए शुल्क, फीस नहीं लगती। शाखा में आया तो स्वयंसेवक बन गया। वास्तव में स्वयंसेवक बनने की प्रक्रिया यहां से शुरू हो गई पर स्वयंसेवक बनना इतना आसान नहीं है। अपना “ अहं “ भुलना एक तपस्या है। शाखा पर आने के बाद धीरे-धीरे उस पर छोटी-छोटी जिम्मेदारियां सौंपी जाने लगती हैं। उसे उन्हें गटनायक बताया जाता है। यानी उस स्वयंसेवक से गटनायक बनने का प्रयास करना, गटनायक के आवश्यक गुण आत्मसात करना अपेक्षित होता है।

ऐसी जिम्मेदारियों में ही एक पायदान है - प्रचारक। एक प्रौढ़ संघचालक अपना अनुभव बताते हैं-वे पन्द्रह दिन के लिए विस्तारक निकले। पहले ही दिन सुबह उनके सामने सवाल खड़ा हो गया कि अब इन पन्द्रह दिनों का क्या करूं ? जब वे संघचालक थे तब उनका कार्यक्रम कोई और तय करता था। कार्यक्रम ठीक तरह हो इसलिए कोई और कार्यकर्ता सहायक रहता था? पर अब? अब कोई सहायक नहीं। मेरा कार्यक्रम मुझे ही निश्चित करना है। वैसे इस गांव के सारे लोग मुझे एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में जानते है। खानपान और निवास की व्यवस्था कहीं भी आसानी से हो सकती है। पर सुबह-शाम-दोपहर खानपान और निवास की व्यवस्था कहीं भी आसानी से हो सकती है। पर सुबह-शाम-दोपहर मैं संघ का कार्य क्या करूं ? प्रचारक निकलने के बाद क्या करना है, यह समझने के लिए यह एक उदाहरण पर्याप्त है।

जिस क्षेत्र में हमें प्रचारक बनाकर भेजा जाता है, वहां का समाज जैसा है वैसा ही स्वीकारना होता है। उसके साथ हमें रहना है तो अपना व्यक्तित्व उसके अनुकूल बनाना पड़ता है, तथा इसी के साथ अपने व्यवहार से उस समाज को हिन्दुराष्ट्र और हिन्दू संगठन की अनुभूति मिलती रहे, इस प्रकार से अपना बर्ताव करना पड़ता है। संघ कार्य के इतिहास में 1950 से 1970 तक का समय एक ऐसा कालखंड था, जिसमें संघ कार्य को टिकाना तथा उसको बढ़ावा देने की सारी जिम्मेदारी प्रचारकों पर ही आ पड़ी थी। 1948 में गांधीजी हत्या संघ पर लगी पांबदी, बीस-पच्चीस वर्ष की आयु के प्रचारक उसी आयु के शाखा-उपशाखाओं की जिम्मेदारी संभालने वाले असंख्य कार्यकर्ताय संघ कार्य के साथ-साथ उन पर आ पड़ी पारिवारिक आर्थिक जिम्मेदारी- इन विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए प्राप्त हुई मानसिक अस्वस्थताएं ऐसे दौर से गुजरते-गुजरते संघ कार्य इन बीस वर्षों में बढ़ा, स्थिर हुआ तथा 1970 के बाद से लगातार प्रगति पथ पर अग्रसर रहा। इस कालखंड में संघ कार्य अखंडित रखने की जिम्मेदारी अनिवार्यत - तत्कालीन प्रचारकों को सम्हालनी पड़ी। मेरे विचार से यह एक कठिन दौर था।

संघ और समाज को अगर समकक्ष खड़ा होना है, करना है तो सर्वदूर असंख्य कार्यकर्ताओं को तैयार करने की आवश्यकता है। हमारा समाज हिन्दू समाज है। किसी को मान्य हो या अमान्य हो या समाज की सेवा के लिए घरबार छोड़कर निकलना, यह हमारे समाज की प्राचीन काल से चलती आई परम्परा है। सब छोड़कर निकलने वाले यह कार्यकर्ता संन्यासी ही होंगे, ऐसा भी कोई नियम नहीं। इनमें राजा रन्तिदेव भी हो सकते हैं और दरिद्र नारायण गाडगे महाराज भी हो सकते हैं। स्वामी विवेकानंद और उनके उच्च शिक्षित तरुण संन्यासियों की टोली भी हो सकती है या महिला शिक्षण तथा महिला पुनर्वसिन कार्य में जीवन न्योछावर कर देने वाले अण्णा साहेब कर्वें भी हो सकते हैं। अर्थात् जिन्हें हम “ प्रचारक ” कहेंगे ऐसे व्यक्तियों का मानो एक प्रवाह प्राचीन काल से इस देश में अक्षुण्ण बहता आया है और इसलिए मैं कहता हूं कि प्रचारक हिन्दू समाज की संघ को देन है तथा स्वयंसेवक - यह संघ की हिन्दू समाज को देन है।

महाराष्ट्र प्रान्त में संघ का काम सबसे पहले शुरु हुआ, इसलिए यहां प्रचारकों की संख्या भी अधिक है। 1942 में स्व. बाबासाहब भिडे महाराष्ट्र प्रान्त के प्रमुख प्रचारक थे। वे गृहस्थ थे, वकालत करते थे। उन्होंने महाराष्ट्र प्रान्त के प्रचारकों को “ प्रान्त स्वयंसेवक ” की संज्ञा दी थी। प्रान्त स्वयंसेवक कहीं भी गया तो वह कोई गटनायक नहीं, शिक्षक नहीं, कार्यवाह अधिकारी कुछ भी नहीं, वह तो सारे प्रान्त का है-इसलिए वह है प्रान्त स्वयंसेवक। उस समय स्व. बाबाराव ने किस तर्क का आधार लेकर यह संज्ञा निर्माण की थी, पता नहीं। पर प्रचारक संज्ञा का भावार्थ समझने के लिए मुझे यह संज्ञा अत्यंत सुयोग्य लगती है।

प्रचारक चाहे कश्मीर जाए या कन्याकुमारी, सोमनाथ जाए या जगनन्नाथ या जहां उसकी नियुक्ति की गई है वही उसका गांव है, वहां के लोग उसके अपने लोग हैं। यहीं स्वयंसेवकत्व की सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता है। यह प्राप्त करने, सीखने, अनुभव करने हेतू ही उसे प्रचारक बनना होता है। ऐसा स्वयंसेवक समाज के हर क्षेत्र में पहुंचना, यह भारत के पुनरुस्थान का सूत्रपात है।
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रविवार, 26 जून 2016

कांग्रेस का आपातकाल : जनता पर 10 तरह के अत्याचार

आपातकाल की मार, सरकार ने जनता पर किए ये 10 वार
Posted on: June 24, 2015
25 जून 1975 वो तारीख है जब भारतीय लोकतंत्र को 28 साल की भरी जवानी में इमरजेंसी के चाकू से हलाक कर दिया गया। ये चाकू किसी सैन्य जनरल के नहीं, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथ में था।

नई दिल्ली। 25 जून 1975 वो तारीख है जब भारतीय लोकतंत्र को 28 साल की भरी जवानी में इमरजेंसी के चाकू से हलाक कर दिया गया। ये चाकू किसी सैन्य जनरल के नहीं, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथ में था। 1971 में बांग्लादेश बनवाकर शोहरत के शिखर पर पहुंचीं इंदिरा को अब अपने खिलाफ उठी हर आवाज एक साजिश लग रही थी। लाखों लोग जेल में डाल दिए गए। लिखने-बोलने पर पाबंदी लग गई।
मीडिया पर सेंसरशिपः आपातकाल में सरकार विरोधी लेखों की वजह से कई पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया। उस समय कई अखबारों ने मीडिया पर सेंसरशिप के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की, पर उन्हें बलपूर्वक कुचल दिया गया। आपातकाल की घोषणा के बाद एक प्रमुख अखबार ने अपने पहले पन्ने पर पूरी तरह से कालिख पोतकर आपातकाल का विरोध किया। आपातकाल के दौर पर जेल में भेजे जाने वाले पत्रकारों में केवल रतन मलकानी, कुलदीप नैयर, दीनानाथ मिश्र,वीरेंद्र कपूर और विक्रमराव जैसे नाम प्रमुख थे। उस समय देश के 50 जाने माने पत्रकारों को नौकरी से निकलवाया गया, तो अनगिनत पत्रकारों को जेलों में ठूंस दिया गया।

जमकर हुई दादागीरी: आपातकाल से पहले विद्याचरण शुक्ल रक्षा राज्यमंत्री थे। इंद्र कुमार गुजराल सूचना मंत्री थे। 20 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने दिल्ली के बोट क्लब पर रैली की। दूरदर्शन पर उसका लाइव कवरेज नहीं हो पाया। दिल्ली के अखबारों और मीडिया में रैली की कम कवरेज से इंदिरा गांधी गुजराल से गुस्सा हो गईं। पांच दिन के अंदर उन्हें राजदूत बनाकर मॉस्को भेज दिया गया। इंद्र कुमार गुजराल की जगह पर वीसी शुक्ल को सूचना प्रसारण मंत्री बनाया गया। मीडिया उनके नाम से कांपता था। शुक्ल कहते थे कि अब पुरानी आजादी फिर से नहीं मिलने वाली। कुछ अखबारों ने इसके विरोध में संपादकीय की जगह खाली छोड़नी शुरू कर दी। इसपर शुक्ला ने संपादकों की बैठक बुलाकर धमकाते हुए चेतावनी दी कि अगर संपादकीय की जगह खाली छोड़ी तो इसे अपराध माना जाएगा और इसके परिणाम भुगतने के लिए संपादकों को तैयार रहना होगा। यही नहीं, सरकार ने किसी भी खबर को बिना सूचित किए छापने पर प्रतिबंध लगा दिया। मीडिया को खबरों को छापने से पहले सरकारी अधिकारी को दिखाना पड़ता था।

मीसा कानूनः आपातकाल लागू होते ही आंतरिक सुरक्षा कानून (Maintenance of Internal Security Act) यानी मीसा के तहत धड़ाधड़ गिरफ्तारियां की गईं। मीसा के तहत पुलिस द्वारा कैद में लिए गए लोगों को न्यायालय में पेश करने की जरूरत नहीं थी, न ही जमानत की कोई व्यवस्था थी। आपातकाल के दौरान एक लाख से ज्यादा लोगों को जेलों में डाला गया। सही संख्या एक लाख 10 हजार 806 थी। इनमें से 34 हजार 988 को मीसा कानून के तहत बंदी बनाया गया जिसमें उन्हें यह भी नहीं बताया गया कि बंदी बनाने के कारण क्या हैं। इन कैदियों में लगभग सभी राज्यों की नुमांइदगी थी। आंध्र प्रदेश से 1078, बिहार से 2360, उत्तर प्रदेश से 7049, पश्चिम बंगाल से 5320 राजनीतिक जेलों में बंद थे। सरकार ने जिनपर थोड़ी रियायत की उन्हें डीआईआर. (Defence of India Rule) के तहत गिरफ़्तार किया गया। यह थोड़ा नरम कानून था। इसके तहत गिरफ़्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश किया जाता था।
 विपक्ष की आवाज बंदः आपातकाल की घोषणा हुई और पौ फटने के पूर्व सभी विरोधी दलों (सीपीआई को छोड़कर) के नेता जेलों में ठूंस दिए गए। न उम्र का लिहाज रखा गया, न स्वास्थ्य का। 100 से अधिक बड़े नेताओं की गिरफ्तारी हुई,जिनमें जयप्रकाश नारायण, विजयाराजे सिंधिया, राजनारायण, मुरारजी देसाई, चरण सिंह कृपलानी,अटल बिहारी वाजपेयी,लालकृष्ण आडवाणी,सत्येंद्र नारायण सिन्हा, जार्ज फर्नांडीस,मधु लिमये,ज्योति बसु,समर गुहा, चंद्रशेखर बालासाहेब देवरस और बड़ी संख्या में सांसद, विधायक शामिल थे। राष्ट्रीय स्तर के नेता आतंकवादियों की तरह रात के अंधेरे में घर से उठा लिए गए और मीसा के तहत अनजाने स्थान पर कैद कर किए गए।
पुलिस बनी खलनायक: पूरे देश में जिस पर भी इंदिरा के विरोधी विचार रखने का शक था वह सींखचों के पीछे कर दिया गया। इन कैदियों को कोई राजनीतिक दर्जा भी नहीं दिया गया था। उन्हें चोर, उठाईगीरों और गुंडों की तरह बस जेल में डाल दिया गया। जयपुर की राजमाता गायत्री सिंह और ग्वालियर की राजमाता विजया राजे सिंधिया तक को गिरफ्तार कर अत्यंत अस्वास्थ्यकर दशाओं में रखा गया। सरकार ने चंडीगढ़ में नजरबंद जेपी को उनके मनपसंद सहयोगी के साथ रहने से मना कर दिया था जबकि अंग्रेजीराज में भी सरकार ने उनकी राममनोहर लोहिया के साथ रहने की इच्छा पूरी की थी।
बॉलीवुड में खौफः आपातकाल के समय सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाए गए वीसी शुक्ला ने बॉलीवुड में एक खौफ का माहौल बना दिया था। फिल्मी गीतकारों और अभिनेताओं से इंदिरा और केंद्र सरकार की प्रशंसा के गीत गाने और इसी तरह की फिल्म बनाने के लिए दबाव डाला गया। मशहूर गायक किशोर कुमार ने जब मना कर दिया तो वीसी शुक्ला ने इसे व्यक्तिगत खुन्नस मानकर पहले तो रेडियो से उनके गानों का प्रसारण बंद करा दिया और फिर उनके घर पर इनकम टैक्स के छापे डलवाए। उन्हें रोज धमकियां दी जाने लगीं। अंत में परेशान होकर उन्होंने सरकार के आगे हार मान ली। इससे वीसी शुक्ला की हिम्मत और बढ़ गई।
किस्सा कुर्सी का और आंधीः आपातकाल के दौरान बनी अमृत नाहटा की फिल्म किस्सा कुर्सी का पर प्रतिबंध लगा दिया गया। फिल्म रिलीज होने से पहले इसके सारे प्रिंट जला दिए गए। प्रिंट की खोज के लिए कई स्थानों पर छापे डाले गए। अमृत नाहटा को जमकर प्रताड़ित किया गया। वीसी के इस कारनामे के बाद बॉलीवुड में एक अलग तरह का माहौल बन गया। कई फिल्म निर्माताओं ने अपने नए प्रोजेक्ट टाल दिए। कुछ ने अपनी फिल्मों का निर्माण धीमा कर दिया। मशहूर गीतकार गुलजार की फिल्म आंधी पर भी पाबंदी लगा दी गई। फिल्म धर्मवीर को रिलीज होने में पांच महीने लग गए। बताया जाता है कि इस फिल्म में जहां-जहां जनता शब्द का उपयोग संवादों में आया था उसे एडिट कराया गया। इसकी जगह प्रजा शब्द का उपयोग कराया गया। जब एडिटिंग हो गई तो वीसी के लिए विशेष शो का आयोजन किया गया। वीसी के ओके कहने के बाद फिल्म रिलीज हो सकी। वीसी शुक्ला के बंगले पर फिल्मी सितारों को विशेष कार्यक्रम पेश करने के लिए मजबूर किया जाने लगा। जो कार्यक्रम वीसी के बंगले पर होते उनमें संजय गांधी प्रमुखता से रहते।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूर्ण दमनः आपातकाल में अगर किसी एक संगठन का सबसे अधिक दमन हुआ तो वह था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। संघ के स्वयंसेवक, कार्यकर्ता और प्रचारक गिरफ्तार किए गए। पुलिस ने गिरफ्तार करने में उम्र का भी ख्याल नहीं रखा। आपातकाल के दौरान गिरफ्तार और प्रताड़ित होने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्धता ही काफी थी। एक अनुमान के मुताबिक आपातकाल का विरोध कर रहे 90 फीसदी लोग किसी न किसी तरह से संघ से जुड़े थे। वाराणसी के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ पर उस समय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का कब्जा था। पुलिस ने आपातकाल की घोषणा होते ही सभी पदाधिकारियों को बंदी बना लिया। यही नहीं, पंडित मदन मोहन मालवीय ने आरएसएस को लॉ कालेज के परिसर में दो कमरों का एक भवन कार्यालय के लिए दिया था। पर प्रशासन ने उसे एक ही रात में बुलडोज़र लगा कर ध्वस्त कर दिया।
नसबंदीः आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने नसबंदी अभियान चलाया। शहर से लेकर गांव-गांव तक नसबंदी शिविर लगाकर लोगों के ऑपरेशन कर दिए गए। कई बार तो चलती बसों को रास्ते में रोककर नौजवानों की भी नसबंदी कर दी गई, यहां तक कि अविवाहित युवकों की भी। जबरन नसबंदी की वजह से पूरे देश में भय का माहौल हो गया। कई परिवारों पर नसबंदी कांड ने पूर्ण विराम लगा दिया।
अनुशासन का डंडाः इंदिरा गांधी की अगुवाई में सरकार ने अपने कर्मचारियों पर कठोरता से अंकुश लगाए रखा। उन्हें समय पर कार्यालय न पहुंचने पर दंडित किया गया। हालांकि ये एक तरह से अच्छा ही था कि पहले जहां सरकारी कर्मचारी कुर्सियां तोड़ने के लिए बदनाम थे, वो समय पर आकर काम करने लगे और तमाम नियमों का पालन होने लगा। ये आपातकाल का ही डर था, कि जो ट्रेनें हमेशा देरी से चलती थीं, वो समय पर एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन का फासला तय करने लगीं। ऐसा पहली बार हुआ था कि देश की ट्रेनें समय पर चलीं।

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शक्तिशाली संघ के रहते ‘आपातकाल’ कैसे टिक सकता था?
- लखेश्वर चंद्रवंशी 'लखेश'

25 जून, 1975 की काली रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘आपातकाल’ (Emergency) लगाकर देश को लगभग 21 माह के लिए अराजकता और अत्याचार के घोर अंधकार में धकेल दिया। 21 मार्च, 1977 तक भारतीय लोकतंत्र ‘इंदिरा निरंकुश तंत्र’ बनकर रह गया। उस समय जिन्होंने आपातकाल की यातनाओं को सहा, उनकी वेदनाओं और अनुभवों को जब हम पढ़ते हैं या सुनते हैं तो बड़ी हैरत होती है। आपातकाल के दौरान समाचार-पत्रों पर तालाबंदी, मनमानी ढंग से जिसे चाहें उसे कैद कर लेना और उन्हें तरह-तरह की यातनाएं देना, न्यायालयों पर नियंत्रण, ‘न वकील न दलील’ जैसी स्थिति लगभग 21 माह तक बनी रही। आज की पीढ़ी ‘आपातकाल की स्थिति’ से अनभिज्ञ है, वह ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं कर सकती। क्योंकि हम लोग जो 80 के दशक के बाद पैदा हुए, हमें ‘इंदिरा के निरंकुश शासन’ के तथ्यों से दूर रखा गया। यही कारण है कि हमारी पीढ़ी ‘आपातकाल’ की जानकारी से सरोकार नहीं रख सके।

हम तो बचपन से एक ही बात सुनते आए हैं कि इंदिरा गांधी बहुत सक्षम और सुदृढ़ प्रधानमंत्री थीं। वे बहुत गरीब हितैषी, राष्ट्रीय सुरक्षा और बल इच्छाशक्ति वाली नारी थीं। ऐसे अनेक प्रशंसा के बोल अक्सर सुनने को मिलते रहे हैं। पर आज देश में भाजपानीत ‘एनडीए’ की मोदी सरकार का शासन है। यही कारण है तथ्यों से परदा उठना शुरू हो गया है। अब पता चल रहा है कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं ने किस तरह इंदिरा का महिमामंडन कर ‘आपातकाल’ के निरंकुश शासन के तथ्यों से देश को वंचित रखा।

आपातकाल लगाना जरुरी था या मज़बूरी?

कांग्रेस के नेता यह दलील देते हैं कि उस समय ‘आपातकाल’ लगाना बहुत जरुरी था, इसके आभाव में शासन करना कठिन हो गया था। पर तथ्य कुछ और है? कांग्रेस के कुशासन और भ्रष्टाचार से तंग आकर जनता ने भूराजस्व भी देना बंद कर दिया था। जनता ने अवैध सरकार के आदेशों की अवहेलना शुरू कर दी थी। पूरे देश में इन्दिरा सरकार इतनी अलोकप्रिय हो चुकी थी कि चारों ओर से बस एक ही आवाज़ आ रही थी - इन्दिरा गद्दी छोड़ो। इधर लोकनायक जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन अपने चरम पर था। बिहार में प्रत्येक कस्बे, तहसील, जिला और राजधानी में भी जनता सरकारों का गठन हो चुका था। जनता सरकार के प्रतिनिधियों की बात मानने के लिए ज़िला प्रशासन भी विवश था। ऐसे में इंदिरा गांधी के लिए शासन करना कठिन हो गया।

दूसरी ओर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जब इन्दिरा गांधी के रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से चुनाव को अवैध ठहराने तथा उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया तो इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता से बेदखल होने का दर सताने लगा। न्यायालय के इस निर्णय के बाद नैतिकता के आधार पर इंदिरा गांधी को इस्तीफा देना चाहिए था, लेकिन सत्ता के मोह ने उन्हें जकड लिया। सभी को किसी अनहोनी की आशंका तो थी ही, लेकिन इंदिरा ऐसी निरंकुश हो जाएंगी, इसका किसी को अंदाजा नहीं था। उन्होंने इस्तीफ़ा नहीं दिया, बल्कि लोकतंत्र का गला घोंटना ही उचित समझा।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी से 25 जून, 1975 की रात को ‘आपातकाल (इमर्जेन्सी) की घोषणा कर दी और भोर होने से पूर्व ही सीपीआई को छोड़कर सभी विरोधी दलों के नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया। इस अराजक कार्रवाई में न किसी की उम्र का लिहाज किया गया और न किसी के स्वास्थ्य की फ़िक्र ही की गई, बस जिसे चाहा उसे कारावास में डाल दिया गया। आपातकाल के दौरान लोकनायक जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जार्ज फर्नांडिस जैसे नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के तत्कालीन सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस सहित हजारों स्वयंसेवकों को कैद कर लिया गया। देश के इन राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को मीसा (Maintenance of Internal Security Act) के तहत अनजाने स्थान पर कैद कर रखा गया। मीसा वह काला कानून था जिसके तहत कैदी को कोर्ट में पेश करना आवश्यक नहीं था। इसमें ज़मानत का भी प्राविधान नहीं था। सरकार ने जिनपर थोड़ी रियायत की उन्हें डीआईआर (Defence of India Rule) के तहत गिरफ़्तार किया गया। यह थोड़ा नरम कानून था। इसके तहत गिरफ़्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश किया जाता था।

आपातकाल और मीडिया

उस समय शहरों को छोड़कर दूरदर्शन की सुविधा कहीं थी नहीं। समाचारों के लिए सभी को आकाशवाणी तथा समाचार पत्रों पर ही निर्भर रहना पड़ता था। 25 जून, 1975 को आकाशवाणी ने रात के अपने समाचार बुलेटिन में यह समाचार प्रसारित किया कि अनियंत्रित आन्तरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपातकाल (Emergency) की घोषणा कर दी है। बुलेटिन में कहा गया कि आपातकाल के दौरान जनता के मौलिक अधिकार स्थगित रहेंगे और सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। समाचार पत्र विशेष आचार संहिता का पालन करेंगे जिसके तहत प्रकाशन के पूर्व सभी समाचारों और लेखों को सरकारी सेन्सर से गुजरना होगा।

आपातकाल के दौरान 250 भारतीय पत्रकारों को बंदी बनाया गया, वहीं 51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता ही रद्द कर दी गई। इंदिरा गांधी के इस तानाशाही के आगे अधिकांश पत्रकारों ने घुटने ही टेक दिए, इतना ही नहीं तो पत्रकारों ने ‘आप जैसा कहें, वैसा लिखेंगे’ की तर्ज पर काम करने को राजी हो गए। उस दौरान ‘दी इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपना सम्पादकीय कॉलम कोरा प्रकाशित किया और ‘जनसत्ता’ ने प्रथम पृष्ठ पर कोई समाचार न छापकर पूरे पृष्ठ को काली स्याही से रंग कर ‘आपातकाल’ के खिलाफ अपना विरोध जताया था।

आपातकाल का उद्देश्य

- कांग्रेस विरोधी दलों को समाप्त करना।

- देश में भय का वातावरण निर्माण करना।

- प्रसार माध्यमों पर नियंत्रण रखना।

- ‘इंदिरा विरोधी शक्तियों को विदेशी शक्तियों के साथ सम्बन्ध’ की झूठी अफवाहों से जनता को भ्रमित करना, तथा इस आधार पर उन्हें कारागार में डालना।

- लोक लुभावन घोषणा देकर जनमत को अपनी ओर खींचना।

- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समाप्त कर संगठित विरोध को पूरी तरह समाप्त करने का षड़यंत्र।

आपातकाल की समाप्ति में संघ की भूमिका

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने ‘आपातकाल’ के विरुद्ध देश में भूमिगत आन्दोलन, सत्याग्रह और सत्याग्रहियों के निर्माण के लिए एक व्यापक योजना बनाई। संघ की प्रेरणा से चलाया गया भूमिगत आन्दोलन अहिंसक था। जिसका उद्देश्य देश में लोकतंत्र को बहाल करना था, जिसका आधार मानवीय सभ्यता की रक्षा, लोकतंत्र की विजय, पूंजीवाद व अधिनायकवाद का पराभव, गुलामी और शोषण का नाश, वैश्विक बंधुभाव जैसे उदात्त भाव समाहित था। आपातकाल के दौरान संघ ने भूमिगत संगठन और प्रचार की यंत्रणा स्थापित की, जिसके अंतर्गत सही जानकारी और समाचार गुप्त रूप से जनता तक पहुंचाने के लिए सम्पादन, प्रकाशन और वितरण की प्रभावी व्यवस्था बनाई गई। साथ ही जेलों में बंद व्यक्तियों के परिवारजनों की सहायता के लिए भी व्यवस्थाएं विकसित की। संघ ने जनता के मनोधैर्य बना रहे, इसके लिए व्यापक कार्य किया। इस दौरान आपातकाल की सही जानकारी विदेशों में प्रसारित करने की भी योजना बनाई गई, इस कार्य के लिए सुब्रह्मण्यम स्वामी, मकरंद देसाई जैसे सक्षम लोग प्रयासरत थे।

आपातकाल के विरुद्ध सत्याग्रह

आपातकाल के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जन आन्दोलन को सफल बनाने के लिए बहुत बहुत बड़ी भूमिका निभाई। 14 नवम्बर, 1975 से 14 जनवरी, 1976 तक पूरे देश में हजारों स्थानों पर सत्याग्रह हुए। तथ्यों के अनुसार देश में कुल 5349 स्थानों पर सत्याग्रह हुए, जिसमें 1,54,860 सत्याग्रही शामिल हुए। इन सत्याग्रहियों में 80 हजार संघ के स्वयंसेवकों का समावेश था। सत्याग्रह के दौरान कुल 44,965 संघ से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 35,310 स्वयंसेवक थे तथा 9,655 संघ प्रेरित अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं का समावेश था।

संघ ने सत्याग्रहियों के निर्माण के लिए व्यापक अभियान चलाया। संघ समर्थक शक्तियों से सम्पर्क की यंत्रणा बनाई और सांकेतिक भाषा का उपयोग किया। देशभर में मनोधैर्य बनाए रखने तथा जागरूकता बहाल करने के लिए अनेक पत्रक बांटे गए। सारे देश में जन चेतना जाग्रत होने लगी। इसका ही परिणाम था कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मन में जन विरोध का भय सताने लगा। अचानक तानाशाही बंद  हो गईं, गिरफ़्तारियां थम गईं। पर लोकतंत्र को कुचलने के वे काले दिन इतिहास के पन्नों में अंकित हो गया, पर ‘आपातकाल’ का इतिहास विद्यार्थियों तक पहुंच न सका। ऐसी आपातकाल देश में दुबारा न आए, पर पाठ्यक्रम में जरुर आना चाहिए जिससे इस पीढ़ी को जानकारी मिल सके।



बुधवार, 22 जून 2016

योग दिवस : 135 राष्ट्रों के लोगों ने लिया हिस्सा





 योग दिवस : 135 राष्ट्रों के लोगों ने लिया हिस्सा 

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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर संयुक्त राष्ट्र में संयुक्त राष्ट्र सचिवालय भवन के सामने 135 राष्ट्रों के लोग एकत्र हुए.
संरा महासचिव बान की मून ने कहा कि योग का संदेश सौहार्द बढ़ाना है और उन्होंने लोगों से जाति और पंथ से ऊपर उठते हुए एकजुट होने की अपील की.
इस मौके पर महासभा के अध्यक्ष मोगेंस लायकेटोफ्ट ने सतत विकास लक्ष्य हासिल करने के लिए योग के महत्व का जिक्र किया.
घंटे भर चले कार्यक्र म में प्रख्यात आध्यात्मिक नेता सदगुरू ने एक योग सत्र का नेतृत्व किया. इस कार्यक्र म का आयोजन संरा में भारत के स्थायी दूतावास ने किया था और इसमें संरा के शीर्ष अधिकारी, दूत, राजनयिक तथा योग करने वाले लोग शरीक हुए.
ईसा फाउंडेशन के संस्थापक सदगुरू जग्गी वासुदेव ने कहा कि योग दुनिया को भारत का उपहार है.
उन्होंने कहा, ‘‘हमें यह समझना चाहिए कि योग कोई भारतीय :चीज: नहीं है. अगर आप योग को भारतीय कहना चाहते हैं तो फिर गुरूत्वाकषर्ण को यूरोपीय कहिए.’’
सदगुरू ने कहा, ‘‘हां योग की उत्पत्ति भारत से हुई और भारतीय के तौर पर हमें इस पर गर्व है, परंतु यह भारत का नहीं है.’’
संरा में भारत के दूत सैयद अकबरूद्दीन ने कहा कि रिकार्ड 135 देशों के लोग दूसरे अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मनाने के लिए यहां एकत्र हुए.
बान ने उल्लेख किया कि योग का संदेश ‘सद्भावना को बढ़ावा देना’ है. उन्होंने सभी देशों के नागरिकों से कहा कि वे नस्ल, आस्था, लिंग और यौन रूझान से ऊपर उठकर एकता का संकल्प लें.
बान ने दूसरे अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर अपने संदेश में कहा, ‘‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर मैं हर किसी से आग्रह करता हूं कि सेहतमंद जीवनशैली अपनाएं तथा नस्ल, आस्था, उम्र, लिंग और लैगिंक पहचान अथवा यौन रूझान से ऊपर उठकर सभी इंसानों के साथ एकता का संकल्प लें. इस दिन और हर दिन को समान मानव परिवार के सदस्य के तौर पर मनाएं.’’
उन्होंने नागरिकता और यौन रूझान से इतर इंसानों के बीच समानता का आह्वान किया जिसका पिछले सप्ताह अमेरिका ओरलैंडो के एक गे क्लब में हुई गोलीबारी की घटना के मद्देनजर खासा महत्व है. अफगान मूल के युवक उमर मतीन ने ओरलैंडे के क्लब में गोलीबारी की थी जिसमें 49 लोग मारे गए थे और 50 से अधिक घायल हो गए थे.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव का योग दिवस पर संदेश यहां योग दिवस की पूर्व संध्या पर भारत के स्थायी दूतावास में आयोजित एक विशेष परिचर्चा के दौरान पढ़ा गया. वरिष्ठ राजनयिक और म्यामांर मामले पर बान के विशेष सलाहकार विजय नाम्बियार ने यह संदेश पढ़ा.
बान ने कहा कि योग की प्राचीन शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्रि या भारत से पैदा हुई और अब इसे पूरी दुनिया में किया जा रहा है.
बान ने कहा, ‘‘योग शरीर और आत्मा, शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य को संतुलित करता है. यह लोगों के बीच सद्भाव बढ़ाता है.’’
उन्होंने कहा कि दूसरा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाना सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में स्वस्थ जीवन की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है.
संरा महासचिव ने कहा, ‘‘योग करने से हमें इस ग्रह के संस्थानों के उपभोक्ता के तौर पर अपनी भूमिका के बारे में जागरूकता बढ़ाने और अपने पड़ोसियों का सम्मान करने एवं उनके साथ शांति के साथ रहने में मदद मिलती है.’’

रविवार, 19 जून 2016

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून : भारतीय संस्कृति का गौरवशाली दिन




अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 

भारतीय संस्कृति का गौरवशाली दिन 



अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को मनाया जाता है। पहली बार यह दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया जिसकी पहल भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण से की थी जिसमें उन्होंने कहा:-
"योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक हैं; मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है; विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवन शैली में यह चेतना बनाकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता हैं। तो आयें एक अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को गोद लेने की दिशा में काम करते हैं।"
—नरेंद्र मोदी, संयुक्त राष्ट्र महासभा
जिसके बाद 21 जून को " अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस" घोषित किया गया। 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्यों द्वारा 21 जून को " अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस" को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है।

रविवार, 12 जून 2016

आकाशीय उल्का पिंड की झील 'लोनार'


यह दुनिया की सबसे बड़ी कटोरे के आकार में बनी झील है। इस खूबसूरत झील का नज़ारा आपको महाराष्ट्र में देखने के लिए मिलेगा। क्रैटर एक ऐसा गड्ढा होता है जो आंतरिक विस्फोट से बन जाता है। यह लोनर क्रैटर लेक 50,000 साल पुरानी है। यह झील उल्कापिंड के टकराने से बनी थी। झील के चारों तरफ हरी घास होने की वजह से यह जगह शांत और मन को सुकुन देने वाली लगती है। यह आकाशीय उल्का पिंड की टक्कर से निर्मित पहली झील है। इसका खारा पानी इस बात का प्रतीक है कि कभी यहां समुद्र था। इसके बनते वक्त क़रीब दस लाख टन के उल्का पिंड की टकराहट हुई। क़रीब 1.8 किलोमीटर व्यास की इस उल्कीय झील की गहराई लगभग पांच सौ मीटर है।आज भी वैज्ञानिकों में इस विषय पर गहन शोध जारी है कि लोनार में जो टक्कर हुई,वो उल्का पिंड और पृथ्वी के बीच हुई या फिर कोई ग्रह पृथ्वी से टकराया था। उस वक्त वो तीन हिस्सों में टूट चुका था और उसने लोनार के अलावा अन्य दो जगहों  पर भी झील बना दी, हालांकि पूरी तरह सूख चुकी अम्बर और गणेश नामक इन झीलों का कोई विशेष महत्व नहीं रहा है।


लोनार झील 
बुढ़ाना ज़िला महाराष्ट्र 


यहाँ एक खारे पानी की झील प्रकृति की एक घटना से जुड़ी है जिसका निर्माण एक १,८ लाख टन उल्का पिन्ड के पृथ्वी से टकराने से हुई है बेसाल्टिक चट्टानों से निर्मित यह झील वैसी है जैसी मंगल ग्रह के सतह मे पाई जाती है । समुद्र तल से १२०० मीटर ऊँची सतह पर १०० मीटर वृत्त मे फैली हुई है , झील का व्यास १० लाख वर्ग मीटर है ५ से ८ मीटर खारा पानी भरा हुआ है । जो की मंगल ग्रह की झीलों के पानी के समान रासायनिक गुण वाला है ।







लोनार झील  


http://bharatdiscovery.org

लोनार झील (अंग्रेजी: Lonar Crater Lake) महाराष्ट्र के बुलढ़ाणा ज़िले में स्थित एक खारे पानी की झील है। इसका निर्माण एक उल्का पिंड के पृथ्वी से टकराने के कारण हुआ था। महाराष्ट्र के लोनार शहर में समुद्र तल से 1,200 मीटर ऊँची सतह पर लगभग 100 मीटर के वृत्त में फैली हुई है। वैसे इस झील का व्यास दस लाख वर्ग मीटर है। इस झील का मुहाना गोलाई लिए एकदम गहरा है, जो बहाव में 100 मीटर की गहराई तक है। मौसम से प्रभावित 50 मीटर की गहराई गर्द से भरी है। लोनार झील 5 से 8 मीटर तक खारे पानी से भरी हुई है। इस झील का उद्गम संभवतः लावा के ऊबड़-खाबड़ बहने और उसके रुकने से हुआ है। यह भी संभव है कि बुझे हुए (मृत) ज्वालामुखी के गर्त से इस झील की उत्पत्ति हुई है।

अद्भुत झील 'लोनार'
आकाशीय उल्का पिंड की टक्कर से निर्मित खारे पानी की दुनिया की पहली झील है लोनार। इसका खारा पानी इस बात का प्रतीक है कि कभी यहाँ समुद्र था। इसके बनते वक्त क़रीब दस लाख टन के उल्का पिंड की टकराहट हुई। क़रीब 1.8 किलोमीटर व्यास की इस उल्कीय झील की गहराई लगभग पांच सौ मीटर है। आज भी वैज्ञानिकों में इस विषय पर गहन शोध जारी है कि लोनार में जो टक्कर हुई, वो उल्का पिंड और पृथ्वी के बीच हुई या फिर कोई ग्रह पृथ्वी से टकराया था। उस वक्त वो तीन हिस्सों में टूट चुका था और उसने लोनार के अलावा अन्य दो जगहों पर भी झील बना दी, हालांकि पूरी तरह सूख चुकी अम्बर और गणेश नामक इन झीलों का कोई विशेष महत्व नहीं रहा है।

और यूनाईटेड स्टेट जिओलोजिकल सर्वे ने लगभग 20 वर्ष पहले किए गए एक साझा अध्ययन में इस बात के वैज्ञानिक प्रमाण मिले थे कि लोनर कैटर का निर्माण पृथ्वी पर उल्का पिंड के टकराने से ही हुआ था। मंगल ग्रह सरीखे दृश्य दिखाने वाली यह झील अन्तरिक्ष विज्ञान की उन्नत प्रयोगशाला भी है, जिस पर समूचे विश्व की निगाह है। अमरीकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा का मानना है कि बेसाल्टिक चट्टानों से बनी यह झील बिलकुल वैसी ही है, जैसी झील मंगल की सतह पर पायी जाती है, यहाँ तक कि इसके जल के रासायनिक गुण भी मंगल पर पायी गयी झीलों के रासायनिक गुणों से मिलते जुलते हैं। ऊँची पहाड़ियों के बीच लोनार के शांत पानी को देखने पर यहाँ घटी किसी बड़ी प्राकृतिक घटना का एहसास होने लगता है।

कुछ अज़ीब वाक्या
लगभग वर्ष 2006 के आस पास लोनर झील में अजीब-सी चीज़ देखने को मिली, झील का पानी अचानक वाष्पीकृत होकर समाप्त हो गया। गांव वालों ने पानी की जगह झील में नमक और अन्य खनिजों के छोटे-बड़े चमकते हुए क्रिस्टल देखे। ऐसी परिस्थिति में कोई भी जीवन की कल्पना नहीं कर सकता, लेकिन आश्चर्यजनक ढंग से झील में तमाम तरह के सूक्ष्म जीव पाए गए हैं। झील के बाहरी किनारे के पानी की प्रकृति उदासीन है, तो अन्दर जाने पर बेहद क्षारीय जल मिलता है। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ख़ास तौर से कर्नल मैकेंजी, डॉ आईबी लायन आदि का कहना था कि झील में पानी की ऊपरी सतह पर जमी नमक की परत बेहद अनूठी है, झील के पानी के लगातार वाष्पीकरण के बावजूद नमक की मात्रा का कम न होना अजीबोगरीब है। ये भी आश्चर्यजनक है कि सिर्फ लोनार झील का पानी ही खारा है, जबकि आस-पास के जल स्त्रोतों से निकलने वाला पानी मीठा है। भूमि के जिस स्त्रोत से झील में जल आ रहा है, झील के बाहर किसी भी दूसरे जल स्त्रोत से नहीं जुड़ा है। अगर ऐसा होता तो आस पास के इलाकों की फसल पूरी तरह से नष्ट हो गयी होती जबकि इसके उलट आस-पास के इलाकों की खेती काफ़ी उन्नत है। यहाँ झील के पानी में नमक की अलग-अलग किस्में पायी जाती है जिनके नाम डाला, खुप्पल, पपरी, भुसकी आदि है। निजाम के शासन-काल में 1843 से 1903 तक लोनार झील के नमक का व्यावसायिक उपयोग किया जाता रहा। ये भी कहा जाता है कि अकबर के शासनकाल में यहाँ पर नमक की एक फैक्टरी भी थी।

पौराणिक संदर्भ
लोनार झील के सन्दर्भ में स्कन्द पुराण में बहुत रोचक कहानी है। बताते हैं कि इस इलाके में लोनासुर नामक एक दानव रहा करता था। उसने आस-पास के देशों को तो अपने कब्जे में ले ही लिया था, देवताओं को भी युद्ध की खुली चुनौती दे दी थी। उसके आतंक से त्रस्त होकर मनुष्य तो मनुष्य, देवताओं ने भी विष्णु से लोनासुर से रक्षा करने की अपील की। भगवान विष्णु ने आनन-फानन में एक ख़ूबसूरत युवक को तैयार किया, जिसका नाम दैत्यसुदन रखा गया। दैत्यसुदन ने पहले लोनासुर की दोनों बहनों को अपने मोहपाश में बांधा फिर एक दिन उनकी मदद से उस एक मांद का मुख्यद्वार खोल दिया, जिसमें लोनासुर छिपा बैठा था। महीनों तक दैत्यसुदन और लोनासुर में युद्ध चलता रहा और अंत में लोनासुर मारा गया। मौजूदा लोनार झील लोनासुर की मांद है और लोनार से लगभग 36 किमी दूर स्थित दातेफाल की पहाड़ी में उस मांद का ढक्कन मौजूद है। पुराण में झील के पानी को लोनासुर का रक्त और उसमें मौजूद नमक को लोनासुर का मांस बताया गया है।

शिव बेसिन क्रेटर

माना जाता है कि साढे छह करोड़ साल पहले अंतरिक्ष से 40 कि.मी. से अधिक चौड़ाई वाला एक विशालकाय उल्कापिंड 58 हज़ार मील प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी पर गिरा था और उसने डायनासोर प्रजाति को विलुप्त कर दिया था। कहा जाता है ये घटना भी हिंदुस्तान में ही घटी थी। भारतीय मूल के 'टेक्सास टेक. यूनिवर्सिटी' के प्रोफेसर शंकर चटर्जी ने अपने ताज़ा अध्ययन में दावा किया गया है कि यह घटना भारत के पश्चिमी तट पर हुई थी। ओरेगन में 'जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ़ अमरीका' के सम्मेलन में शोध-पत्र पेश करते हुए चटर्जी ने कहा कि भारत के पश्चिम में स्थित जलमग्न शिव बेसिन हमारे पृथ्वी पर स्थित सबसे बडा क्रेटर है। शिव बेसिन में ही बॉम्बे हाई स्थित है, जो खनिज तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के उत्खनन का बड़ा केन्द्र है। भारत के पश्चिमी तट पर स्थित 40 कि.मी. व्यास वाला शिव बेसिन क्रेटर इतने ही चौड़े उल्कापिंड के क़रीब 58 हज़ार मील प्रति घंटा की रफ्तार से पृथ्वी के साथ टकराने से बना है। ग्रेनाइट की मोटी परत को फोड़कर बने इस क्रेटर का बाहरी दायरा 500 कि.मी. चौड़ाई में फैला है।