मंगलवार, 28 जून 2016

संघ प्रचारक : नर करनी करे और नारायण हो जाए


संघ प्रचारक : नर करनी करे और नारायण हो जाए

( संघ के प्रचारकों के प्रति यह मेरा व्यक्तिगत भाव है इसे अन्यथा ना लिया जाये ! )


संघ को अधिक जानने समझनें में यह लिक मददगार होगा 



प्रारंभिक कुछ वर्षों तक संघ में यह प्रचारक शब्द परिचित नहीं था। केवल संघ कार्य का ही अहोरत्रचिंतन करने वाले डॉक्टरजी ही एक मात्र स्वयंसेवक थे। अधिकांश शालेय छात्र किशोर स्वयंसेवक अपने घरों में रहते और कार्यक्रम अथवा बैठक के समय एकत्र आते थे। आयु में कुछ बड़े स्वयंसेवकों में, बाबासाहब आपटे नागपुर की एक बीमा कम्पनी के कार्यालय में टंकलेखन कार्य करते थे। श्री दादाराव परमार्थ ने शालांत परीक्षा उत्तीर्ण करने के अनेक प्रयास किये किन्तु गणित जैसे भयानक विषय के कारण असफल होकर, उसके पीछे लगे रहने की बजाय वे अधिकाधिक समय देकर संघ कार्य करने लगे। उनकी ओजपूर्ण भाषण शैली तथा अंग्रेजी भाषा पर प्रभुत्व के कारण, संघ कार्य करते समय उन्हें कभी भी विद्यालयीन अथवा महाविद्यालयीन उपाधियों की कमी महसूस नहीं हुई। इस समय संघ का कार्य नागपुर के बाहर भी पहुंच चुका था- विदर्भ के वर्धा-भंडारा आदि जिलों में संघ की शाखाएं खुल गई थी। वहां की शाखाओं का संचालन स्थानीय कार्यकर्ता ही किया करते थें ।

    भिन्न भिन्न गांवों में संघ की शाखाएं खुलने के दौर में उन सभी शाखाओं के कार्य में एकसूत्रता लाने की दृष्टि से प्रवास करने वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। हर स्थान पर, चार-छह दिन रहकर, वहां के स्वयंसेवकों के साथ विचार-विनिमय कर उन्हें संघ कार्य से, दृढ़ता से जोड़ने तथा अपने दैनंदिन जीवन में संघ कार्य के लिए अधिकाधिक समय देने हेतु कार्य-प्रवण करने की आवश्यकता भी महसूस होने लगी। शुरु-शुरु में डॉक्टरजी अकेले ही प्रवास किया करते। उत्सव प्रसंगों पर अन्य कार्यकर्ता भी जाते थे। ज्येष्ठ कार्यकर्ताओं को अपने उद्योग व्यवसाय से अवकाश लेकर कुछ दिनों का प्रवास करना ही संभव होता। जिन गांवों में पू. डॉक्टरजी के परिचित अथवा मित्र आदि रहते थे, वहां कार्य प्रारंभ करना आसान होता। किंतु जहां एकाध व्यक्ति ही परिचित होता वहां शाखा प्रारंभ कर संघकार्य स्थायी रूप से संचालित होने तक, बाहर के ही किसी कार्यकर्ता को प्रत्यक्ष वहां रहकर काम करना आवश्यक होता।
शालेय छात्र स्वयंसेवक कार्यकर्ताओं को, वार्षिक परीक्षा के पश्चात ग्रीष्मकालीन छुट्टियों में, 4-6 सप्ताह तक विदर्भ और महाकोशल क्षेत्र में जाकर संघ की नयी शाखाएं खोलने की आवश्यकता डॉक्टरजी द्वारा व्यक्त किये जाने पर उस दिशा में विचार प्रारंभ हुआ। कुछ कार्यकर्ताओं ने इस दृष्टि से आपनी तैयारी भी दर्शायी। बाहर जाकर कार्य करने वाले ऐसे स्वयंसेवकों को “विस्तारक” कहा जाता। प्रतिवर्ष ऐसे विस्तारक कार्यकर्ता ग्रीष्मकालीन छुट्टियों में अन्यतत्र जाकर संघ कार्य का विस्तार करने लगे- नयी शाखाओं की संख्या बढ़ने लगी। डॉक्टरजी के साथ वार्तालाप में विस्तारकों तथा पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता स्वयंसेवकों को भी अनुभव होने लगी। बाहर गांव से डॉक्टरजी के नाम आये, उनके मित्रों के पत्रों को स्वयंसेवकों की बैठकों में पढ़ा जाता। इन पत्रों में लिखा होता- “ हमारे गांव में संघ की शाखा शुरु की जा सकती है। कृपया किसी योग्य कार्यकर्ता को भेजिए। उसके निवास और भोजन आदि की व्यवस्था यहां की जायेगी।“ श्री दादाराव परमार्थ, श्री बाबासाहेब आपटे, श्री रामभाऊ जामगड़े व श्री गोपाळराव येरकुंटवार आदि ज्येष्ठ कार्यकर्ताओं ने, अपने व्यक्तिगत जीवन की आशा- आकांक्षाओं को एक ओर रखकर, संघ कार्य के लिए प्रवास पर जाने की सिध्दता दर्शायी।
1932 के उत्तारार्ध में, डॉक्टरजी ने इन कार्यकर्ताओं को पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में अन्यत्र भेजने की योजना बनाई। संघ कार्य के इस प्रकार होने वाले विस्तार में, डॉक्टरजी को, कभी किसी स्वयंसेवक को इस प्रकार का आदेश देते किसी ने नहीं सुना कि “ तुम अपने व्यक्तिगत जीवन की चिंता छोड़कर पूर्ण कालिक कार्यकर्ता बनकर संघ कार्यार्थ निकलो। “ डॉक्टरजी का स्वयं का जीवन संघ से एक रूप हो गया था। उनके प्रवास और वार्तालाप से संघ कार्य के असाधारण महत्व तथा उसके लिए अपना जीवन समर्पित करने की प्रेरणा ग्रहण कर स्वयंसेवक जब स्वयं अपनी सिध्दता डॉक्टरजी के सामने व्यक्त करते तभी डॉक्टरजी उस कार्यकर्ता की उस प्रकार की योजना करते। इस प्रकार श्री दादाराव परमार्थ को पुणे, श्री गोपाळराव येरकुंटवार को सांगली (महाराष्ट्र) ओर श्री रामभाऊ जामगडे को यवतमाल (विदर्भ) में पूर्णकालिक संघ कार्यकर्ता के रूप में भेजने की योजना बनी। इन सभी पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को सभी स्वयंसेवकों की उपस्थिति में पू. डॉक्टरजी ने भावपूर्ण शब्दों में विदाई दी। इस प्रकार के कार्यकर्ताओ को “प्रचारक“ के नाम से अन्यत्र भेजने की पद्धति संघ में शुरु हुई।
संघ कार्य में वृध्दि की गति बढ़ने लगी। 1937 के आरंभ में विदर्भ व महाराष्ट्र के प्रमुख स्थानों पर, महाकोशल के 4-6 स्थानों पर तथा उत्तर प्रदेश के बनारस में संघ की शाखाएं शुरु हो चुकी थी। किंतु पंजाब, दिल्ली उत्तर प्रदेश के अन्य प्रमुख शहरों में संघ का कार्य शुरु करने की आवश्यकता अनुभव होने लगी। इस कारण, नागपुर के स्वयंसेवकों में से जिन्हें इन प्रांतों के प्रमुख स्थानों पर जाना संभव हो, उन्हें उच्च शिक्षा के लिए वहां के महाविद्यालयों में प्रवेश लेना चाहिए और वहां शिक्षा ग्रहण कर साथ-साथ संघ की शाखाएं खोलने का प्रयास करना चाहिए। वार्तालाप में डॉक्टरजी द्वारा यह विचार व्यक्त किये जाने पर, योजनापूर्वक 1937 के जुलाई माह में श्री भाऊराव देवरस को ठ.ब्वउ व स्ंू करने के लिए लखनऊ, श्री कृष्णा जोशी को महाविद्यालयीन शिक्षा ग्रहण करने सियालकोट (पंजाब), श्री दिगम्बर पातुरकर को लाहौर (पं. पंजाब), श्री मोरेश्वर मुंज को उच्च शिक्षा प्राप्त करने रावलपिंडी में शिक्षा ग्रहण के साथ - साथ संघ कार्य हेतु भेजा गया। इसी प्रकार अपनी महाविद्यालयीन शिक्षा नागपुर में समाप्त करने के बाद श्री वसंतराव ओक को दिल्ली, श्री बापूराव दिवाकर, श्री नरहरि पारखी और मुकुंदराव मुंजे को बिहार के पटना, दानापुर और मुंगेर में प्रचारक के रूप में डॉक्टरजी ने भेजा। श्री नारायण तटें को प्रचारक के रूप में ग्वालियर भेजा गया। 1938 में श्री एकनाथ रानडे ड। होने के बाद प्रचारक के रूप में महाकोशल के जबलपुर में गये- उनके साथ प्रल्हादराव आम्बेकर भी गये। 1939 में श्री विठ्ठलराव पत्की को प्रचारक के रूप में, कलकत्ता भेजा गया। श्री जनार्दन चिंचाळकर की नियुक्ति मद्रास में की गयी। इन सभी पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को प्रचारक नाम से संबोधित किया जाने लगा। इस प्रकार संघ के कार्य में “प्रचारक” शब्द रूढ़ हुआ।
किसी प्रकार का आदेश नहीं, बल्कि स्वयं अपनी इच्छा से, अपने व्यक्तिगत जीवन की चिंता न करते हुए संघ कार्य हेतु प्रचारक निकलने की पध्दति स्वयंसेवकों में अपने आप विकसित होने लगी- यह बात आज आश्यचर्यजनक प्रतीत होती है, क्योंकि प्रचारक बनकर जाने का आदेश कभी डॉक्टरजी ने किसी को नहीं दिया। इसके विपरीत जब कोई स्वयंसेवक प्रचारक के रूप में कार्य करने की सिध्दता प्रकट करता तो डॉक्टरजी पहले उसके घर की परिस्थिति और कार्य सम्बन्धी उसके दृढ़ निश्चय के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा करने के बाद ही उसके बारे में निर्णय लेते। डॉक्टरजी के प्रवास और वार्तालाप में विभिन्न स्थानों से “ कार्य शुरु करने हेतु प्रचारक भेजिये “ इस आशय के आने वाले पत्रों के वाचन के बाद होने वाली चर्चा से स्वयंसेवकों में संघ कार्यार्थ सर्वस्य अर्पण करने की तीव्र भावना अपने आप उत्पन्न होती और स्वयंसेवकों के मन में संघ कार्य के लिए अधिकाधिक समय देने की प्रेरणा जागती। अपने जीवन में करने योग्य सर्वश्रेष्ठ कार्य केवल संघ कार्य ही है, यह अनुभूति स्वयंसेवकों को होने लगी। अपना जीवन पुष्प केवल संघ कार्य करते हुए अपनी मातृभूमि के चरणों में समर्पित करने में ही जीवन की सार्थकता है, यह भावना स्वयंसेवक के हृदय में प्रबल होते ही, वह स्वयंसेवक प्रचारक के रूप में निकलने की सिध्दता स्वयं डॉक्टरजी के समक्ष व्यक्त करता। संघ की कार्य पध्दति की यह अनोखी विशेषता है, जिसे डॉक्टरजी ने बड़ी कुशलता से विकसित किया।
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प्रचारक : समाज की संघ को देन - शिवराय तेलंग


शब्दांकन- मल्हार कृष्ण गोखले



श्री शिवराय तेलंग महाराष्ट्र प्रान्त के ज्येष्ठ प्रचारक हैं। 1942 में बड़ी संख्या में संघ प्रचारक निकले, 1943 में शिवराय जी प्रचारक बने। प.पू. श्रीगुरुजी के निकट रहनें का सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ है। 1948 के संघ बंदी के कालखंड के बाद जिन कार्यकर्ताओं के भरोसे तथा कठोर परिश्रम के आधार पर प.पू. श्री गुरुजी ने संघ को पुनर्जन्म दिया, उनमें बाबाराव भिड़े, वसंतराव भिड़े, गोपाल राव देशपांडे, नाना पालकर, केशवराव केलकर, भैयाराव गौतम, दामुअण्णा दाते, प्रल्हाद अभ्यंकर, नाना ढोलके तथा शिवराय तेलंग प्रमुख थे। यहां प्रस्तुत है एक आजीवन प्रचारक का “प्रचारक” संज्ञा के बारे में विवेचन-

अतिरिक्त उपयोग से शब्द अपना वास्तविक अर्थ खो बैठते हैं। जैसे आज सामाजिक क्रांति, दलित उद्धार, समर्पित जीवन, समाज के सबसे आखिरी व्यक्ति पर निरूस्वार्थ प्रेम आदि शब्द अपना स्वाभाविक अर्थ खो बैठे हैं, केवल भाषा के अलंकार बन चुके हैं। उसी तरह डा. हेडगेवार के समय त्याग, बलिदान, देशभक्ति आदि शब्दों का अवमूल्यन हो गया था। अर्थहीन शब्दों को पुनरू प्राणवान जाग्रत, अर्थपूर्ण करने का कार्य महापुरुष करते हैं। अत्यंत कठिन आर्थिक स्थिति में, कष्टपूर्वक अपनी डाक्टरी का अभ्यास क्रम पूरा करने वाले डा. हेडगेवार ने व्यवसाय किया ही नहीं। उन्होंने रा.स्व.संघ का निर्माण किया और समाज में परिवर्तन लाने के लिए तीन शब्द इस समाज को दिए। हिन्दूराष्ट्र, स्वयंसेवक तथा संगठन। इन तीन शब्दों को अर्थवान, प्राणवान, मंत्रमय बनाने हेतु डा. हेडगेवार ने मानो अति-उग्र तपस्या की। अपने भीमकाय, वज्रसमान शरीर को आखिरी क्षण तक कार्यमग्न रखा। बहुआयामी प्रचंड क्षमता को केवल एक ही कार्य में केन्द्रित किया। परम्परागत क्रोधी स्वभाव को प्रयत्नपूर्वक शांत, संयमित कर विशाल लोकसंग्रह किया।

इस विजयदशमी को संघ अपने अमृत महोत्सवी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। पू. डाक्टर जी के द्वारा प्रस्थापित किए गए वह तीन शब्द आज समाज की सारी समस्याएं सुलझाने के लिए पूर्णतः सिद्ध हो रहे हैं। जब सारा समाज संघ के समकक्ष बनकर खड़ा रहेगा, तब इन तीन शब्दों का कार्य पूर्ण होगा। संघ अपनी शतायु के लिए कदापि उत्सुक नहीं, पर बावनवी सदी में समूचा समाज संघ के समकक्ष बनकर खड़ा हो। यह दृश्य देखने के लिए स्वयंसेवकों को जरूर उत्सुक होना चाहिए।

संघ को स्वयंसेवक का निर्माण करना है  केवल शाखा पर नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में। किसानों में-जवानों में-शिक्षकों में साहित्यकारों में, धर्माचार्यों में- वैज्ञानिकों में, राजकीय पार्टियों में व नेताओं में। इस विशाल कार्य के दायरे में महिलाएं, अभिनेता, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, सज्जन, दुर्जन सारे लोग समाते है। संघ का स्वयंसेवक जहां कहीं भी जाता है, उसकी नम्रता में सामने वाले व्यक्ति को अहंकार छोड़कर अपने जैसा बनने का आह्वान रहता है।

संघ में अर्थात् संघ शाखा में प्रवेश करने वाला बाल हो, तरुण हो, प्रौढ़ हो अथवा वृद्ध, उसे स्वयंसेवक ही कहते है। स्वयंसेवक बनने के लिए शुल्क, फीस नहीं लगती। शाखा में आया तो स्वयंसेवक बन गया। वास्तव में स्वयंसेवक बनने की प्रक्रिया यहां से शुरू हो गई पर स्वयंसेवक बनना इतना आसान नहीं है। अपना “ अहं “ भुलना एक तपस्या है। शाखा पर आने के बाद धीरे-धीरे उस पर छोटी-छोटी जिम्मेदारियां सौंपी जाने लगती हैं। उसे उन्हें गटनायक बताया जाता है। यानी उस स्वयंसेवक से गटनायक बनने का प्रयास करना, गटनायक के आवश्यक गुण आत्मसात करना अपेक्षित होता है।

ऐसी जिम्मेदारियों में ही एक पायदान है - प्रचारक। एक प्रौढ़ संघचालक अपना अनुभव बताते हैं-वे पन्द्रह दिन के लिए विस्तारक निकले। पहले ही दिन सुबह उनके सामने सवाल खड़ा हो गया कि अब इन पन्द्रह दिनों का क्या करूं ? जब वे संघचालक थे तब उनका कार्यक्रम कोई और तय करता था। कार्यक्रम ठीक तरह हो इसलिए कोई और कार्यकर्ता सहायक रहता था? पर अब? अब कोई सहायक नहीं। मेरा कार्यक्रम मुझे ही निश्चित करना है। वैसे इस गांव के सारे लोग मुझे एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में जानते है। खानपान और निवास की व्यवस्था कहीं भी आसानी से हो सकती है। पर सुबह-शाम-दोपहर खानपान और निवास की व्यवस्था कहीं भी आसानी से हो सकती है। पर सुबह-शाम-दोपहर मैं संघ का कार्य क्या करूं ? प्रचारक निकलने के बाद क्या करना है, यह समझने के लिए यह एक उदाहरण पर्याप्त है।

जिस क्षेत्र में हमें प्रचारक बनाकर भेजा जाता है, वहां का समाज जैसा है वैसा ही स्वीकारना होता है। उसके साथ हमें रहना है तो अपना व्यक्तित्व उसके अनुकूल बनाना पड़ता है, तथा इसी के साथ अपने व्यवहार से उस समाज को हिन्दुराष्ट्र और हिन्दू संगठन की अनुभूति मिलती रहे, इस प्रकार से अपना बर्ताव करना पड़ता है। संघ कार्य के इतिहास में 1950 से 1970 तक का समय एक ऐसा कालखंड था, जिसमें संघ कार्य को टिकाना तथा उसको बढ़ावा देने की सारी जिम्मेदारी प्रचारकों पर ही आ पड़ी थी। 1948 में गांधीजी हत्या संघ पर लगी पांबदी, बीस-पच्चीस वर्ष की आयु के प्रचारक उसी आयु के शाखा-उपशाखाओं की जिम्मेदारी संभालने वाले असंख्य कार्यकर्ताय संघ कार्य के साथ-साथ उन पर आ पड़ी पारिवारिक आर्थिक जिम्मेदारी- इन विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए प्राप्त हुई मानसिक अस्वस्थताएं ऐसे दौर से गुजरते-गुजरते संघ कार्य इन बीस वर्षों में बढ़ा, स्थिर हुआ तथा 1970 के बाद से लगातार प्रगति पथ पर अग्रसर रहा। इस कालखंड में संघ कार्य अखंडित रखने की जिम्मेदारी अनिवार्यत - तत्कालीन प्रचारकों को सम्हालनी पड़ी। मेरे विचार से यह एक कठिन दौर था।

संघ और समाज को अगर समकक्ष खड़ा होना है, करना है तो सर्वदूर असंख्य कार्यकर्ताओं को तैयार करने की आवश्यकता है। हमारा समाज हिन्दू समाज है। किसी को मान्य हो या अमान्य हो या समाज की सेवा के लिए घरबार छोड़कर निकलना, यह हमारे समाज की प्राचीन काल से चलती आई परम्परा है। सब छोड़कर निकलने वाले यह कार्यकर्ता संन्यासी ही होंगे, ऐसा भी कोई नियम नहीं। इनमें राजा रन्तिदेव भी हो सकते हैं और दरिद्र नारायण गाडगे महाराज भी हो सकते हैं। स्वामी विवेकानंद और उनके उच्च शिक्षित तरुण संन्यासियों की टोली भी हो सकती है या महिला शिक्षण तथा महिला पुनर्वसिन कार्य में जीवन न्योछावर कर देने वाले अण्णा साहेब कर्वें भी हो सकते हैं। अर्थात् जिन्हें हम “ प्रचारक ” कहेंगे ऐसे व्यक्तियों का मानो एक प्रवाह प्राचीन काल से इस देश में अक्षुण्ण बहता आया है और इसलिए मैं कहता हूं कि प्रचारक हिन्दू समाज की संघ को देन है तथा स्वयंसेवक - यह संघ की हिन्दू समाज को देन है।

महाराष्ट्र प्रान्त में संघ का काम सबसे पहले शुरु हुआ, इसलिए यहां प्रचारकों की संख्या भी अधिक है। 1942 में स्व. बाबासाहब भिडे महाराष्ट्र प्रान्त के प्रमुख प्रचारक थे। वे गृहस्थ थे, वकालत करते थे। उन्होंने महाराष्ट्र प्रान्त के प्रचारकों को “ प्रान्त स्वयंसेवक ” की संज्ञा दी थी। प्रान्त स्वयंसेवक कहीं भी गया तो वह कोई गटनायक नहीं, शिक्षक नहीं, कार्यवाह अधिकारी कुछ भी नहीं, वह तो सारे प्रान्त का है-इसलिए वह है प्रान्त स्वयंसेवक। उस समय स्व. बाबाराव ने किस तर्क का आधार लेकर यह संज्ञा निर्माण की थी, पता नहीं। पर प्रचारक संज्ञा का भावार्थ समझने के लिए मुझे यह संज्ञा अत्यंत सुयोग्य लगती है।

प्रचारक चाहे कश्मीर जाए या कन्याकुमारी, सोमनाथ जाए या जगनन्नाथ या जहां उसकी नियुक्ति की गई है वही उसका गांव है, वहां के लोग उसके अपने लोग हैं। यहीं स्वयंसेवकत्व की सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता है। यह प्राप्त करने, सीखने, अनुभव करने हेतू ही उसे प्रचारक बनना होता है। ऐसा स्वयंसेवक समाज के हर क्षेत्र में पहुंचना, यह भारत के पुनरुस्थान का सूत्रपात है।
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1 टिप्पणी:

  1. आदरणीय सिसौडिया जी ! बहुत सुंदर लिखा है। संघ के प्रत्येक स्वयंसेवक को अवश्य पड़ना चाहिए।

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