शनिवार, 30 जुलाई 2016

हमारा अधिकाशं व्यापार घाटा चीन से वस्तुओं आयात के कारण - कश्मीरी लाल जी



वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में स्वदेशी ही एक मात्र विकल्प 
हमारा अधिकाशं व्यापार घाटा चीन से वस्तुओं आयात के कारण - कश्मीरी लाल जी
शुक्रवार, 29 जुलाई 2016
शहीद बाबू गेनू स्मृति स्वदेशी विचार व्याख्यान माला


http://vskjodhpur.blogspot.in/2016/07/blog-post_29.html
जोधपुर 28 जुलाई 2016 . स्वदेशी आन्दोलन  भारत के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के समय से ही जुड़ा हुआ है। भारत को पुनः सोने की चिड़िया का गौरव प्राप्त करने के लिए क्रांतिकारियों ने स्वदेशी अपनाओं का नारा दिया था। 12 दिसम्बर 1930 को बाबू गेनू स्वदेशी के लिए शहीद होने वाले प्रथम व्यक्ति थें। उन्होंने इस बात को समझा कि विदेशी वस्तुओं का भारत में व्यापार हमारे लिए आर्थिक नुकसान एवं राष्ट्रीय दासता के लिए जिम्मेदार तत्व है। उपरोक्त कथन स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संगठक कश्मीरीलाल जी ने शहीद बाबू गेनू स्मृति स्वदेशी विचार व्याख्यान माला में “वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में स्वदेशी ही एक मात्र विकल्प" विषय पर बोलते हुए मोटर मर्चेन्ट एसोसिएशन सभागार में कहें।

उन्होंने आगे कहा कि स्वदेशी जागरण मंच चीन द्वारा भारत की एन.एस.जी. में सदस्यता के विरोध को लेकर क्षोभ प्रकट करता है क्योंकि हमारा अधिकाशं व्यापार घाटा चीन से वस्तुओं आयात के कारण ही हैं। अजहर मसूद हो या महमूद लखवी जैसे आतंकवादी, चीन उनके समर्थन में खड़ा हो कर भारत के प्रति अपनी शत्रुता हर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रकट करता है। ऐसे में चीनी वस्तुओं का आयात करना व इनका उपयोग करना शत्रु राष्ट्र का आर्थिक पोषण करना है। इसलिए स्वदेशी जागरण मंच राष्ट्रव्यापी अभियान चला कर चीनी वस्तुओं के बहिष्कार करने का सरकार व जनता का आहवान करता है। मंच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का सदा से विरोध कर रहा है। एफ.डी.आई. से रोजगार बढने कि जो बात की जा रही है, आकंडे़ बताते है कि इससे रोजगार बढ़ने की जगह घटा है और बेरोजगारी में वृद्धि हुई है। बहुर्राष्ट्रीय कम्पनीयां स्वचालित प्रणाली द्वारा निर्माण व उत्पादन करती है जिससे केवल कुछ प्रशिक्षित व्यक्तियों को ही रोजगार प्राप्त होता है। मंच का मानना है कि एफ.डी.आई. नीति से भारत को लाभ कि जगह नुकसान ही हो रहा है। 9 अगस्त से “एफ.डी.आई. वापस जाओं“ उद्घोष के साथ पूरे देश में प्रत्येक जिला स्तर पर मंच द्वारा इसका विरोध शुरू होगा। आगामी 3 व 4 सितम्बर 2016 को दिल्ली में मंच के सभी पदाधिकारी एकत्र होकर आगे की रणनिति तय करेंगें।


व्याख्यान माला कि अध्यक्षता करतेें हुए डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन आयुर्वेद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राधेश्याम शर्मा ने कहा कि आज हमें पुनः एक नये स्वतंत्रता आन्दोलन की जरूरत है जिसमें हम विदेशी कम्पनीयों के सामानों का पूर्णतः बहिष्कार करे तभी हम वास्तविक रूप से स्वतंत्र होंगे। मैं मंच के कार्यकर्ताओं का साधुवाद देता है कि वे सम्पूर्ण भारत में इस पुनित कार्य को निस्वार्थ भाव से पूर्ण कर रहे है। उन्होनंे आगे कहा कि प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद एक बार पुनः पुरे विश्व में प्रतिष्ठित हो रही है। सभी जगह योग का डंका बज रहा है। भारतीय संस्कृति व पारिवारिक मूल्यों को पुनः प्रतिष्ठा बढ़ रही है।

व्याख्यानमाला के मुख्य अतिथि उत्कर्ष संस्थान के निदेशक निर्मलजी गहलोत ने कहा कि वर्तमान समय भौतिकवाद का है। हमारी युवा पीढ़ी तेजी से विदेशी संस्कृति, विदेशीब्रांड, विदेशी खान-पान की ओर आकर्षित हो रही है। जिससे देश की प्रतिभा व धन का पलायन हो रहा है और देश को प्रतिवर्ष अरबो डाॅलर का नुकसान हो रहा हैं। मैं मुक्त कंठ से मंच को धन्यवाद देता है कि मंच इस नुकसान को निस्वार्थ भाव से रोकने में लगा हुआ है। हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि हम सम्मिलित रूप से मंच के साथ कंधा से कंधा से मिलाकर इस परोपकारी कार्यो को गति प्रदान करें।

व्याख्यानमाला के विशिष्ट अतिथि मोटर मर्चेन्ट एसोसिएशन जोधपुर के अध्यक्ष सोहनलाल मंत्री ने कहा कि आज देश की आर्थिक नीतियाँ विदेशी ताकतों से प्रभावित हो रही हैं। इसमें हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि हम देश की आर्थिक हितो को देखते हुए नीतियों का चयन करे और आर्थिक विषमनता को दूर करें।

 मंच के प्रांत संयोजक धर्मेन्द्र दूबे ने कहा कि वर्तमान समय में देश के 388 जिलो में स्वदेशी जागरण मंत्र की ईकाईयां सक्रिय है। दुनिया के 124 देशों के 1112 शहरों में मंच की वेबसाइट नियमित रूप से देखी जाती है।

मंच के मीडिया प्रमुख मिथिलेश झा ने बताया कि व्याख्यनमाला के मंच का संचालन विभाग संयोजक अनिल वर्मा ने किया तथा राष्ट्रीय परिषद के सदस्य देवेन्द्र डागा ने धन्यवाद दिया। इस अवसर पर शहर के गणमान्य लोग व मंच के दायित्वान कार्यकर्ता उपस्थित थे।

सोमवार, 25 जुलाई 2016

'मोदी के नेतृत्व में सुरक्षित है भारत' : परम पूज्य मोहन जी भागवत


कानपुर : राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख परम पूज्य मोहन जी भागवत ने नरेंद्र मोदी सरकार की प्रशंसा करते हुए कहा कि भारत मोदी के नेतृत्व में सुरक्षित है. कानपुर में संघ की बैठक को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर स्वयं सेवक बैठे हैं इसलिए देश सुरक्षित हाथों में है. संघ प्रमुख की यह प्रशंसा ऐसे समय आई है जब यह बात चल रही है कि एफडीआई पर मोदी सरकार की सक्रियता स्वदेशी की विचारधारा से विपरीत जा रही है. बैठक में एक व्यवसायी के सवाल पर भागवत ने कहा सरकार में बैठे स्वयं सेवकों पर हमें पूरा भरोसा है धैर्य रखिए, जल्द ही परिणाम देखने को मिलेंगे.

भागवत जी  ने आगे कहा कि वे मोदी से बहुत प्रभावित है. मोदी छोटे बच्चों में भी लोकप्रिय हैं. संघ प्रमुख ने वंचित वर्ग के लिए सेवा भारती के प्रसार पर भी जोर दिया. एक प्रश्न के उत्तर में भागवत पाठ्य पुस्तकों में बदलाव पर भी सहमत दिखे.उनके अनुसार बहुत समय से इस सुधार की जरूरत महसूस हो रही है.

एनडीए सरकार की नीतियों का पूरी तरह से समर्थन करते हुए राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि इस समय भारत सुरक्षित हाथों में है। केंद्र सरकार में कई स्वयंसेवक बेहतर पदों पर काम कर रहे हैं।

भागवत कानपुर में आयोजिस संघ की बैठक में बोल रहे थे। संघ प्रमुख, मोदी सरकार के एफडीआई के मुद्दे पर लिए गए फैसलों के समर्थन में पूरी तरह से साथ खड़े दिखाई दिए। एफडीआई के मुद्दे पर मोदी सरकार द्वारा सुविधा देने और संघ के स्वदेशी एजेंडे में उस तरह का व्यवहार ना करने पर संघ ने पीएम मोदी का भरपूर बचाव किया।

शिक्षा के साथ विद्या का समन्वय लेकर चलें शिक्षक : परम पूज्य डॉ. मोहन जी भागवत





नई दिल्ली, 24 जुलाई (इंविसंके)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के  परमपूज्य  सरसंघचालक डॉ . मोहन भागवत ने सिविक सेंटर स्थिति केदारनाथ साहनी आडिटोरियम में अखिल भारतीय ‘ शिक्षा भूषण ’ शिक्षक सम्मान समारोह में शिक्षकों को सम्बोधित करते हुए कहा कि शिक्षा में परम्परा चलनी चाहिए , शिक्षक को शिक्षा व्यवस्था के साथ विद्या और संस्कारों की परम्परा को भी साथ लेकर चलना चाहिए। सभी विद्यालय अच्छी ही शिक्षा छात्रों को देते हैं फिर भी चोरी डकैती , अपराध आदि के समाचार आज टीवी और अखबारों में देखने को मिल रहे है। तो कमी कहां है ? सर्वप्रथम बच्चे मां फिर पिता बाद में अध्यापक के पास सीखते हैं। बच्चों के माता पिता के साथ अधिक समय रहने के कारण माता - पिता की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसके लिए पहले माता - पिता को शिक्षक की तरह बनना पड़ेगा साथ ही शिक्षक को भी छात्र की माता तथा पिता का भाव अंगीकार करना चाहिए। शिक्षा जगत में जो शिक्षा मिलती है उसको तय करने का विवेक शिक्षक में रहता है। शिक्षक को चली आ रही शिक्षा व्यवस्था के अतिरिक्त अपनी ओर से अलग से चरित्र निर्माण के संस्कार छात्रों में डालने पड़ेंगे। लेकिन यह भी सत्य है कि हम जो सुनते हैं वह नहीं सीखते और जो दिखता है वह शीघ्र सीख जाते हैं। आज सिखाने वालों में जो दिखना चाहिए वह नहीं दिखता और जो नहीं दिखना चाहिए वह दिख रहा है। इसलिए शिक्षकों को स्वयं अपने कृतत्व का उदाहरण बनकर दिखाना चाहिए तभी वह छात्रों को सही दिषा दे सकेंगे। हमारे सम्मुख ऐसे शिक्षा भूषण पुरस्कार से पुरस्कृत तीन उदाहरण यहां है , आज के कार्यक्रम का उद्देष्य भी यही है कि ऐसे श्री दीनानाथ बतरा जी , डॉ . प्रभाकर भानू दास जी और सुश्री मंजू बलवंत बहालकर जैसे शिक्षकों से प्रेरणा लेकर और शिक्षक भी ऐसे उदाहरण बन कर समाज को संस्कारित कर फिर से चरित्रवान समाज खड़ा करें।

कार्यक्रम के विशेष अतिथि देव संस्कृति विष्वविद्यालय के कुलपति तथा गायत्री परिवार के अंतर्राष्ट्रीय प्रमुख डॉ . प्रणव पांड्या ने बताया कि हर व्यक्ति को जीवन भर सीखना और सिखाना चाहिए। शिक्षा जीवन के मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए। शिक्षा एक एकांगी चीज है जब तक उसमें विद्या न जुड़ी हो। आज शिक्षा अच्छा पैकेज देने का माध्यम बन गई है। पैसे के बल पर डिग्रियां बांटने वाले संस्थानों की बाढ़ आ गई है। 1991 के बाद उदारीकरण की नीति बनाते समय हमने शिक्षा नीति के बारे में कुछ सोचा नहीं। इसका परिणाम आज अपने ही देष के विरुद्ध नारे लगाते हुए छात्रों के रूप में दिख रहा है। हम क्या पहनते हैं इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता फर्क पड़ता है हमारा चिंतन कैसा है। शिक्षक ही बच्चों का भाग्य विधाता होता है , शिक्षा व्यवस्था जैसी भी चलती रहे , लेकिन शिक्षक को अपना कर्तव्य बोध नहीं छोड़ना चाहिए।

अखिल भारतीय शैक्षिक महासंघ द्वारा आयोजित ‘ शिक्षा भूषण ’ शिक्षक सम्मान समारोह में शिक्षा बचाओ आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ शिक्षाविद् श्री दीनानाथ बतरा , डॉ . प्रभाकर भानूदास मांडे , सुश्री मंजू बलवंत राव महालकर को शिक्षा डॉ . मोहन भागवत तथा डॉ . प्रणव पांड्या ने ‘ शिक्षा भूषण ’ सम्मान से सम्मानित किया। मंचस्थ अतिथियों में उनके साथ श्री महेन्द्र कपूर , के . नरहरि , प्रोफेसर जे . पी . सिंहल , श्री जयभगवान गोयल उपस्थित थे।

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

भगवान विष्णुजी

भगवान विष्णुजी





हिन्दू धर्म के अनुसार विष्णु 'परमेश्वर' के तीन मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। भगवान विष्णु सृष्टि के पालनहार हैं। संपूर्ण विश्व श्रीविष्णु की शक्ति से ही संचालित है। वे निर्गुण, निराकार तथा सगुण साकार सभी रूपों में व्याप्त हैं।ईश्वर के ताप के बाद जब जल की उत्पत्ति हुई तो सर्वप्रथम भगवान विष्णु का सगुण रूप प्रकट हुआ। विष्णु की सहचारिणी लक्ष्मी है। विष्णु की नाभी से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। आदित्य वर्ग के देवताओं में विष्णु श्रेष्ठ हैं। और भी कई विष्णु हैं।
विष्णु जी का अर्थ- विष्णु के दो अर्थ है- पहला विश्व का अणु और दूसरा जो विश्व के कण-कण में व्याप्त है।
विष्णु जी की लीला : भगवान विष्णु के वैसे तो 24 अवतार है किंतु मुख्यत: 10 अवतार को मान्यता है। विष्णु ने मधु केटभ का वध किया था। सागर मंथन के दौरान उन्होंने ही मोहिनी का रूप धरा था। विष्णु द्वारा असुरेन्द्र जालन्धर की स्त्री वृन्दा का सतीत्व अपहरण किया गया था।
विष्णु जी का स्वरूप : क्षीर सागर में शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु अपने चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए होते हैं। उनके शंख को 'पाञ्चजन्य' कहा जाता है। चक्र को 'सुदर्शन', गदा को 'कौमोदकी' और मणि को 'कौस्तुभ' कहते हैं। किरीट, कुण्डलों से विभूषित, वनमाला तथा कौस्तुभमणि को धारण करने वाले, कमल नेत्र वाले भगवान श्रीविष्णु देवी लक्ष्मी के साथ निवास करते हैं।
विष्णु जी के  मंत्र : पहला मंत्र- ॐ नमो नारायण। श्री मन नारायण नारायण हरि हरि। दूसरा मंत्र- ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि। ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।
विष्णु जी का निवास : क्षीर सागर में। विष्णु पुराण के अनुसार यह पृथ्वी सात द्वीपों में बंटी हुई है- जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्करद्वीप। ये सातों द्वीप चारों ओर से सात समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं, और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। दुग्ध का सागर या क्षीर सागर शाकद्वीप को घेरे हुए है। इस सागर को पुष्करद्वीप घेरे हुए है।
भगवान विष्णु जी  के नाम : भगवान श्रीविष्णु ही नारायण कहे जाते हैं। वे ही श्रीहरि, गरुड़ध्वज, पीताम्बर, विष्वक्सेन, जनार्दन, उपेन्द्र, इन्द्रावरज, चक्रपाणि, चतुर्भुज, लक्ष्मीकांत, पद्मनाभ, मधुरिपु, त्रिविक्रम,शौरि, श्रीपति, पुरुषोत्तम, विश्वम्भर, कैटभजित, विधु, केशव, शालीग्राम आदि नामों से भी जाना जाता है।
विष्णु जी  के अवतार : शास्त्रों में विष्णु के 24 अवतार बताए हैं, लेकिन प्रमुख दस अवतार माने जाते हैं- मतस्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बु‍द्ध और कल्कि। 24 अवतारों का क्रम निम्न है-1.आदि परषु, 2.चार सनतकुमार, 3.वराह, 4.नारद, 5.नर-नारायण, 6.कपिल, 7दत्तात्रेय, 8.याज्ञ, 9.ऋषभ, 10.पृथु, 11.मतस्य, 12.कच्छप, 13.धनवंतरी, 14.मोहिनी, 15.नृसिंह, 16.हयग्रीव, 17.वामन, 18.परशुराम, 19.व्यास, 20.राम, 21.बलराम, 22.कृष्ण, 23.बुद्ध और 24.कल्कि।

विष्णु जी  के 24 अवातारों को जानिए....
*वैष्णव संप्रदाय के उप संप्रदाय : वैष्णव के बहुत से उप संप्रदाय है- जैसे बैरागी, दास, रामानंद, वल्लभ, निम्बार्क, माध्व, राधावल्लभ, सखी, गौड़ीय आदि। वैष्णव का मूलरूप आदित्य (वेदों के जन्मदाता चार ईशदूतों में से एक) की आराधना में मिलता है। भगवान विष्णु का वर्णन भी वेदों में मिलता है। पुराणों में विष्णु पुराण प्रमुख से प्रसिद्ध है। विष्णु का निवास समुद्र के भीतर माना गया है।

वैष्णव ग्रंथ : ऋग्वेद में वैष्णव विचारधारा का उल्लेख मिलता है। ईश्वर संहिता, पाद्मतन्त, विष्णुसंहिता,

शतपथ ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण, महाभारत, रामायण, विष्णु पुराण आदि।

वैष्णव तीर्थ : बद्रीधाम, मथुरा, अयोध्या, तिरुपति बालाजी, श्रीनाथ, द्वारकाधीश।

वैष्णव संस्कार : 1.वैष्णव मंदिर में विष्णु, राम और कृष्ण की मूर्तियाँ होती हैं। एकेश्‍वरवाद के प्रति कट्टर नहीं है।, 2.इसके संन्यासी सिर मुंडाकर चोटी रखते हैं।, 3.इसके अनुयायी दशाकर्म के दौरान सिर मुंडाते वक्त चोटी रखते हैं।, 4.ये सभी अनुष्ठान दिन में करते हैं।, 5.यह सात्विक मंत्रों को महत्व देते हैं।, 6.जनेऊ धारण कर पितांबरी वस्त्र पहनते हैं और हाथ में कमंडल तथा दंडी रखते हैं।, 7.वैष्णव सूर्य पर आधारित व्रत उपवास करते हैं।, 8.वैष्णवों में दाह संस्कार की रीति हैं। 10.यह चंदन का तीलक खड़ा लगाते हैं।
वैष्णव साधु-संत : वैष्णव साधुओं को आचार्य, संत, स्वामी आदि कहा जाता है।



विष्णु भगवान का भजन
ॐ जय लक्ष्मी रमना, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा
सत्य नारायण स्वामी, जन पातक हरणा, ॐ जय लक्ष्मी रमना...
रतन जड़ित सिंहासन अद्भुत छवि राजे
नारद करत निरंतर, घंटा ध्वनि बाजे, ॐ जय लक्ष्मी रमना...
प्रगट भए कलि कारण, द्विज को दरश दियो
बूढो ब्राह्मण बनकर कंचन महल कियो, ॐ जय लक्ष्मी रमना...
दुर्बल भील कराल जिन पर कृपा करी
चंद्रचूड़ एक राजा जिनकी विपति हरी, ॐ जय लक्ष्मी रमना...
वैश्य मनोरथ पायो श्रद्धा तज दिनी
सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति किन्ही, ॐ जय लक्ष्मी रमना...
भाव भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धरयो
श्रद्धा धारण किन्ही तिनको काज सरयो, ॐ जय लक्ष्मी रमना...
ग्वाल बाल संग राजा वन में भक्ति करी
मन वांछित फल दीन्हो, दीन दयाल हरी, ॐ जय लक्ष्मी रमना...
चढ़त प्रसाद सवायो कदली फल मेवा
धूप दीप तुलसी से राजी सत्यदेव, ॐ जय लक्ष्मी रमना...
श्री सत्यनारायण जी की आरती जो कोई नर गावे
तन मन सुख सम्पति, मन वांक्षित फल पावे, ॐ जय लक्ष्मी रमना

रविवार, 17 जुलाई 2016

सदगुरु : अंधकारमय गलियों से बाहर निकालकर लक्ष्य तक पहुँचाने वाला


देवी देवताओं संतो और धर्म में बड़ी शक्ति है।
जो इसे सच्चे मन से ध्याते हैं वे ही इसको समझ पाते हें।
*** ‘‘तमसो मा ज्योतिगर्मय’’ ****
परम पूज्य गोमतीदासजी महाराज,जिनके स्मरण मात्र से,
समस्यायें हल हो जाती हें। शत शत नमन् !



सदगुरु महिमा 
श्री रामचरितमानस में आता है:-
गुरू बिन भवनिधि तरहिं न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई।।
भले ही कोई भगवान शंकर या ब्रह्मा जी के समान ही क्यों न हो किन्तु गुरू के बिना भवसागर नहीं तर सकता। सदगुरू का अर्थ शिक्षक या आचार्य नहीं है। शिक्षक अथवा आचार्य हमें थोड़ा बहुत एहिक ज्ञान देते हैं लेकिन सदगुरू तो हमें निजस्वरूप का ज्ञान दे देते हैं। जिस ज्ञान की प्राप्ति से मोह पैदा न हो, दुःख का प्रभाव न पड़े एवं परब्रह्म की प्राप्ति हो जाय । ऐसा ज्ञान गुरूकृपा से ही मिलता है। उसे प्राप्त करने की भूख जगानी चाहिए।

इसीलिए कहा गया है:-
गुरू गोविंद दोनों खड़े, किसको लागूँ पाय।
बलिहारी गुरू आपकी, जो गोविंद दियो मिलाय।।

गुरू और सदगुरू में भी बड़ा अंतर है। सदगुरू अर्थात् जिनके दर्शन और सान्निध्य मात्र से हमें भूले हुए शिवस्वरूप परमात्मा की याद आ जाय, जिनकी आँखों में हमें करूणा, प्रेम एवं निश्चिंतता छलकती दिखे, जिनकी वाणी हमारे हृदय में उतर जाय, जिनकी उपस्थिति में हमारा जीवत्व मिटने लगे और हमारे भीतर सोई हुई विराट संभावना जग उठे, जिनकी शरण में जाकर हम अपना अहं मिटाने को तैयार हो जायें, ऐसे सदगुरू हममें हिम्मत और साहस भर देते हैं, आत्मविश्वास जगा देते हैं और फिर मार्ग बताते हैं जिससे हम उस मार्ग पर चलने में सफल हो जायें, अंतर्मुख होकर अनंत की यात्रा करने चल पड़ें और शाश्वत शांति के, परम निर्भयता के मालिक बन जायें।

जिन सदगुरू मिल जाय, तिन भगवान मिलो न मिलो।
जिन सदगरु की पूजा कियो, तिन औरों की पूजा कियो न कियो।
जिन सदगुरू की सेवा कियो, तिन तिरथ-व्रत कियो न कियो।
जिन सदगुरू को प्यार कियो, तिन प्रभु को !! 

“ जिसके पास गुरूकृपा रूपी धन है वह सम्राटों का सम्राट है। जो गुरूदेव की छत्रछाया के नीचे आ गये हैं, उनके जीवन चमक उठते हैं। गुरूदेव ऐसे साथी हैं जो शिष्य के आत्मज्ञान के पथ पर आनेवाली तमाम बाधाओं को काट-छाँट कर उसे ऐसे पद पर पहुँचा देते हैं जहाँ पहुँचकर फिर वह विचलित नहीं होता।
गुरू ज्ञान देते हैं, प्रसन्नता देते हैं.... साहस, सुख, बल और जीवन की दिशा देते हैं। हारे हुए को हिम्मत से भर दें, हताश में आशा-उत्साह का संचार कर दें, मनमुख को मधुर मुस्कान से मुदित बना दें, उलझे हुए को सुलझा दें एवं जन्म-मरण के चक्कर में फँसे हुए मानव को मुक्ति का अनुभव करा दें वे ही सच्चे सदगुरू हैं।

सदगुरू की वाणी अमृत है। उनकी पूजा ईश्वर की पूजा है। उनके आशीर्वाद में वह ताकत होती है कि.....
जो बात दवा भी न कर सके, वह बात दुआ से होती है।

मानव तो आते वक्त भी रोता है, जाते वक्त भी रोता है। 
जब रोने का वक्त नहीं होता तब भी रोता रहता है। 
एक सदगुरू में ही वह ताकत है कि, जो जन्म-मरण के मूल अज्ञान को काटकर मनुष्य को रोने से बचा सकते हैं।

वे ही गुरू हैं जो आसूदा-ए-मंजिल कर दें।
वरना रास्ता तो हर शख्श बता देता है।।

उँगली पकड़कर, कदम-से-कदम मिलाकर, अंधकारमय गलियों से बाहर निकालकर लक्ष्य तक पहुँचाने वाले सदगुरू ही होते हैं। “

ब्रह्माजी जैसा सृष्टि सर्जन का सामर्थ्य हो, शंकरजी जैसा प्रलय करने का सामर्थ्य हो फिर भी जब तक सदगुरु तत्त्व की कृपा नहीं होती तब तक आवरण भंग नहीं होता, आत्म-साक्षात्कार नहीं होता। दिल में छुपा हुआ दिलबर करोड़ों युगों से है, अभी भी है फिर भी दिखता नहीं।

आदमी अपने को आँखवाला समझता है। वास्तव में वह आँख है ही नहीं। बाहर की आँख चर्म की आँख है। वह तुम्हारी आँख नहीं है, तुम्हारे शरीर की आँख है। तुम्हारी आँख अगर एक बार खुल जाय तो सुख ब्रह्माजी को मिलता है, जिसमें भगवान शिव रमण करते हैं, जिसमें आदि नारायण भगवान विष्णु विश्राम पाते हैं, जिसमें प्रतिष्ठित रहकर भगवान श्रीकृष्ण लीला करते हैं, जिसमें ब्रह्मवेत्ता सत्पुरुष मस्त रहते हैं वह परम सुख - स्वरूप आत्मा - परमात्मा तुम्हारा अपना आपा है।

आदमी को अपने उस दिव्य स्वरूप का पता नहीं और कहता रहता हैः- “मैं सब जानता हूँ। “

अरे नादान ! चाहे सारी दुनिया की जानकारी इकट्ठी कर लो लेकिन अपने आपको नहीं जानते तो क्या खाक जानते हो ? आत्मवेत्ता महापुरुषों के पास बैठकर अपने आपको जानने के लिए तत्पर बनो। अपने ज्ञानचक्षु खुलवाओ। तब पता चलेगा कि वास्तव में तुम कौन हो। तभी तुम्हारे लिए भवनिधि तरना संभव होगा।

हिन्दू हैं हम युगों युगों से - युगों युगों तक






हिन्दू हें हम
- अरविन्द सिसोदिया कोटा 95095 59131
हम शब्दों के पुजारी , भावनाओं के संवेदक ,
मानवता के उत्पादक, व्यवस्थाओं के निर्माता!
आनंद की सिद्धी, उत्सवों की संस्कृति ,
प्रेम की पराकाष्ठा, अपनत्व का अनंत आकाश,
पुरूषार्थ के परमार्थी,, वीरता के व्योम हम,
जौहर में राख करके, करते पवित्रता की आरती,
शीश चढ़ा  लेते  मातृभूमि किं बलिहारी  ।
हिन्दू हैं हम युगों युगों से युगों युगों तक !
सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन हैं हम,
अनवरत जीवन यात्रा के संवाहक,
नर से नारायण तक हैं हम ।।
हिन्दू थे हिन्दू हैं हिन्दू ही रहेंगें युगों युगों तक ।

भाजपा राजस्थान आई टी सेल : बूथ -बूथ तक होगा सक्रीय

प्रस्तुति - अरविन्द सिसोदिया , 
भा ज पा  जिला महामंत्री , कोटा शहर जिला 
(95095 59131 WhatsApp)


बधाई अविनाश जोशी जी !!
सोसल मीडिया अब मीडिया में ही नहीं समाज में भी अपनी क्रांतिकारी भूमिका निभा रहा है। इसमें स्वंय पत्रकार, स्वंय प्रकाशक और स्वंय पाठक की भूमिका में हम आ गये है। भाजपा की ओर से आई टी सेल यह विषय देखता है। इसके राजस्थान प्रदेश संयोजक अविनाश जोशी जी ने अपनी प्रदेश टीम के गठन के साथ साथ सभी जिलों में संयोजक नियुक्त कर दिये हे। प्रदेश टीम की सफल प्रदेशस्तरीय बैठक भी सम्पन्न हो गई। भाजपा में सोसल मीडिया मण्डल और वार्ड से होता हुआ, बूथ -बूथ तक फैला हुआ है । बहुत जल्द यह व्यवस्थित स्वरूप में दिखने लगेगा। अविनाशजी बहुत ही मेहनती कार्यकर्ता हे। भाजपा का परिवार भी बहुत व्यापक है। सफलता की कामनाओं सहित हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें !!  

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जयपुर। 16 जुलाई 2016 शनिवार को भारतीय जनता पार्टी प्रदेश कार्यालय में आई.टी. विभाग की कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यशाला का आयोजन करते हुए आज के युग में सोशल मीडिया की बहुत उपयोगिता है, इससे युवा और हर वर्ग के लोग जुड रहे हैं। पार्टी में आई.टी. विभाग की टीम का गठन हो चुका है, इस के माध्यम से पार्टी के कार्यक्रमों, केन्द्र व राज्य सरकार के विकास कार्यो तथा पार्टी की रीति नीति के बारे में आमजन को सूचित किया जाएगा।
वर्तमान में आई.टी. विभाग के प्रदेश स्तर एवं जिला स्तर पर संयोजक बनाए है, इसे हम मण्डल व बूथ स्तर तक गठित करेंगे, भविष्य में होने वाले चुनावों में सोशल मीडिया की अहम भूमिका रहेगी। प्रधानमंत्री जी के नरेन्द्र मोदी एप से आम आदमी जुड गया है। उनकी हर योजना की जानकारी इस एप के द्वारा मिलती रहेगी। बहुत शीघ्र ही माननीय मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे जी का एप भी आपके बीच आ जाएगा जिससे आम जन का उनसे जुडाव हो जाएगा।
इस अवसर पर राजस्थान वित आयोग की अध्यक्षा डॉ ज्योति किरण शुक्ल, आई.टी. विभाग के संयोजक अविनाश जोशी जी, भाजपा महामंत्री कुलदीप धनकड जी, महिला मोर्चा अध्यक्ष मधु शर्मा, भाजपा देहात के अध्यक्ष दीनदयाल कुमावत जी, मीडिया संयोजक पिंकेश पोरवाल जी, प्रदेश के नवनियुक्त पदाधिकारी एवं जिलों के संयोजक उपस्थित रहे।
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                                                राजस्थान प्रदेश संयोजक अविनाश जोशी जी 
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जेठाराम पचार लोहारवा
आज भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की आईटी विंग की मिटिंग हुई जिसे प्रदेश अध्यक्ष अशोक जी परनामी ने संबोधित किया और महिला मोर्चा अध्यक्ष श्रीमती मधु शर्मा और आईटी प्रदेश संयोजक अविनाश जी ने भी संबोधित किया।

प्रदेश बैठक के उल्लेखनीय बिंदु निम्न हैं :-

1. आईटी भाजपा की रीड की हड्डी हैं और इसका नाम टेक्नो पॉलिटिक्स भी हैं । आगामी चुनाव अब टेक्नोलॉजी और आईटी के माध्यम से लड़े जायेगे जिसका महत्वपूर्ण उदाहरण केंद्रीय सरकार हैं।

2. जिलाध्यक्ष एवम् आईटी संयोजक का फेसबुक पेज और भाजपा का जिले का फेसबुक पेज और ट्विटर अकाउंट होना चाहिए  और ये बनाकर प्रदेश कार्यालय में लिंक भेज देवे !

3.सभी मण्डल अध्यक्षो की बैठक लेकर आईटी संयोजक नियुक्त करे एवम् हर मण्डल का अपना व्हाट्स एप ग्रुप हो और व्हाट्स एप पेज हो एवम् मण्डल के ग्रुप में बूथ अध्यक्ष अवश्य हो ।

4. मण्डल अध्यक्ष जनप्रतिनिधियो, सरकारी कर्मचारियों जैसे क्षेत्र के मुख्य अभियंता किसी भी विभाग के, क्षेत्र के पालिका/निगम के ईओ, मुख्य विभाग अघिकारी , भाजपा पार्षद एवम् क्षेत्रीय विधायक और जिलाध्यक्ष और आईटी संयोजक का एक ग्रुप अलग बनाये जिसमे बूथ अध्यक्ष द्वारा जो भी समस्या बताई गई हो वो फॉरवर्ड करे जिससे प्रशासनिक कार्य शीघ्र हो सके और ताकि ध्यान रहे की सब कुछ जिलाध्यक्ष आईटी संयोजक और क्षेत्रीय विधायक के सामने हो रहा हैं जिससे आम कार्यकर्त्ताओ के काम हो सके।

5. अगर फिर भी काम नही हो पाया तो जिलाध्यक्ष/आईटी संयोजक को मण्डल अध्यक्ष शिकायत प्रेषित करे और वो शिकायत आईटी संयोजक प्रदेश में प्रेषित करे ईमेल के माध्यम से और व्हाट्स एप के माध्यम से।

6. रोज की राजनैतिक गतिविधिया , सांसद, विधायको के कार्यक्रम एवम् गतिविधिया और क्षेत्रीय लीडर्स के अपडेट्स और कॉंग्रेस या अन्य विपक्षी पार्टी द्वारा मुख्य रूप से किये जाने वाले कार्यो को आईटी मण्डल अध्यक्ष आईटी जिला संयोजक को भेजे और जिला संयोजक प्रदेश कार्यालय भेजे और ये 8 बजे प्रातः तक प्रदेश कार्यालय पहुँच जानी चाहिए।

7. केंद्रीय और राज्य की योजनाओ को सभी ग्रुपो में एवम् फेसबुक पेज और ट्विटर पर प्रसारित करे।

8. भाजपा की जिला टीम के सभी पदाधिकारियो को फेसबुक पेज और ट्विटर से जोड़े और उन्हें भाजपा राजस्थान और केंद्रीय भाजपा के औफिसियली पेज से जोड़े और अपडेट्स दे।

9. सभी जिला पदाधिकारियो और मण्डल अध्यक्षो का एक व्हाट्स एप ग्रुप बनाये जिसमे सभी भाजपा के विधायक एवम् जिले से प्रतिनिधित्व करने वाले प्रदेश पदाधिकारियो को भी जोड़े और भाजपा से जुड़े कार्य विधियों एवम् जनप्रतिनिधियो से संवाद रखे । इसमें केवल पार्टी के ही मेसेज हो अन्य कोई नही हो । गुड मॉर्निंग और अन्य अन वांटेड मेसेज कोई नही करे ।

15 दिन में सभी कार्य हो जाने चाहिए और आईटी संयोजक मण्डल स्तर तक बन जाने चाहिए।
टीम में मेंबर को आई टी सेल जिला संयोजक पूर्ण जानकारी लेकर ही सलेक्ट करे।जो डेटाबेस का जानकर हो।और सोशल साइट्स पर पुर्ण समय दे सके।

शनिवार, 16 जुलाई 2016

मीठी रस से भरी राधा रानी लागे


मीठी रस से भरी राधा रानी लागे,
मने करो करो जमुनाजी को पानी लागे...

जमनाजी तो कारी कारी ,राधा गोरी गोरी,
वृन्दावन धूम मचाये ,बरसाने की छोरी,
बृजधाम राधाजी की जिंदगानी लागे,
मने करो करो ................

काना नित मुरली में टेरे सुमिरे बारम्बार,
कोटिन्ह रूप धरे मन मोहन तरु न पावे पार,
रूप रंग की छबीली पटरानी लागे,
मने करो करो...........

न भावे मन माखन मिसरी, अब न कोई मिठाई,
म्हारी जिभड़ली ने भावे, राधा नाम मलाई
वृषभान की लली तो गुड धानी लागे,
मने करो करो..............

राधा राधा नाम रटत है, जे नर आगे पाप,
तिनकी बाधा दूर करत है, राधा राधा नाम,
राधा नाम में सफल जिंदगानी लागे,
मने करो करो...........................

श्री वृन्दावन धाम अपार रटे जा राधे-राधे


श्रीवृन्दावन-धाम अपार रटे जा राधे-राधे।
भजे जा राधे-राधे! कहे जा राधे-राधे॥१॥

वृन्दावन गलियाँ डोले, श्रीराधे-राधे बोले।
वाको जनम सफल हो जाय, रटे जा राधे-राधे॥२॥
या ब्रज की रज सुन्दर है, देवनको भी दुर्लभ है।
मुक्ता रज शीश चढ़ाय, रटे जा राधे-राधे॥३॥
ये वृन्दावन की लीला, नहीं जाने गुरु या चेला।
ऋषि-मुनि गये सब हार, रटे जा राधे-राधे॥४॥
वृन्दावन रास रचायो, शिव गोपी रुप बनायो।
सब देवन करें विचार, रटे जा राधे-राधे॥५॥
जो राधे-राधे रटतो, दु:ख जनम-जनम को कटतो।
तेरो बेड़ो होतो पार, रटे जा राधे-राधे॥६॥
जो राधे-राधे गावे, सो प्रेम पदारथ पावे।
भव-सागर होवें पर, रटे जा राधे-राधे॥७॥
जो राधा नाम न गयो, सो विरथा जन्म गँवायो।
वाको जीवन है धिक्कार, रटे जा राधे-राधे॥८॥
जो राधा-जन्म न होतो, रसराज विचारो रोतो।
होतो न कृष्ण अवतार, रटे जा राधे-राधे॥९॥
मंदिर की शोभा न्यारी, यामें राजत राजदुलारी।
डयौढ़ी पर ब्रह्मा राजे, रटे जा राधे-राधे॥१०॥
जेहि वेद पुराण बखाने, निगमागम पार न पाने।
खड़े वे राधे के दरबार, रटे जा राधे-राधे॥११॥
तू माया देख भुलाया, वृथा ही जनम गँवाया।
फिर भटकैगो संसार, रटे जा राधे-राधे॥१२॥

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

परमपवित्र भगवा ध्वज और समर्पण -रमेशभाई मेहता

परमपवित्र भगवा ध्वज और समर्पण
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ – भाग ११
-रमेशभाई मेहता


संघ की स्थापना हो गयी। संघकार्य को आगे कैसे बढ़ाना है, इस बारे में डॉक्टरसाहब ( संघ संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक परमपूज्य डॉ0 केशव बलीराम हेडगेवार ) स्वयंसेवकों के अभिप्राय लेते रहते थे। ‘हमें सप्ताह में एक बार नहीं, बल्कि प्रतिदिन मिलना चाहिए’ ऐसा स्वयंसेवकों का ही आग्रह था। ‘यह मुलाकात कहाँ पर और किस प्रकार करनी हैं, यहाँ पर कौन-सा कार्यक्रम करना है’ इस बारे में विचारमंथन शुरू हो गया। शुरू-शुरू में सभी स्वयंसेवक डॉक्टरसाहब के घर में ही आया करते थे। यदि इनमें कुछ लोग पढ़ाई या किसी अन्य काम के सिलसिले में अन्यत्र जाते थे, तो वहाँ पर भी संघ का कार्य शुरू कर देते थे। ‘अप्पाजी जोशी’ ये इस प्रकार से कार्य करनेवाले स्वयंसेवक थे। आप्पाजी जोशी ने १८ फ़रवरी १९२६ के दिन वर्धा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली शाखा शुरू की।

संघ की स्थापना सन १९२५ में नागपुर में हुई और एक साल के बाद संघ की जो पहली शाखा शुरू हो गयी, वह वर्धा में थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि डॉक्टरसाब कितने बड़े संघटक थे। उन्होंने आप्पाजी का अभिनंदन करके स्वयंसेवकों को संदेश दिया, ‘इसी प्रकार हमें संघकार्य को आगे बढ़ाना है।’ संघ की स्थापना से पहले डॉक्टरसाहब का स्वभाव एकदम उग्र था। कलकत्ता की सभा में टिळकजी के विरोध में बोलनेवाले वक्ता को थप्पड़ मारने वाले डॉक्टरसाहब, संघ की स्थापना के बाद एकदम मृदु स्वभाव के बन गये। संपर्क में आने वाले हर किसी को डॉक्टरसाहब आत्मीयता से, प्रेम से अपना बना लेते थे। इसलिए महज़ बुज़ुर्ग ही नहीं, बल्कि बच्चों, किशोरों एवं युवा उम्रवालों के साथ भी डॉक्टरसाहब प्रेम से बोलते थे। डॉक्टरसाहब सर्वप्रिय बन गये थे और संघ के विस्तार के लिए इन बातों का काफ़ी फ़ायदा मिला।

हर संघटना का ध्येय-नीति, तत्त्वज्ञान अभिव्यक्त करनेवाला ध्वज तो होता ही है। संघ की शाखा शुरू हो गयी, परन्तु ध्वज के बारे में कोई निर्णय नहीं हुआ था। डॉक्टरसाहब इस बारे में हर किसी से विचार-विमर्श करने लगे, हर किसी के मन की बात जानने का प्रयास करने लगे। कुछ लोगों ने ‘मठों-मंदिरों पर रहनेवाला लाल रंग का ध्वज ही ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ का ध्वज होना चाहिये’ ऐसा विचार व्यक्त किया। देश के मठ-मंदिरों ने ही प्राचीन काल से हमारा धर्म, हमारी अस्मिता संभालकर रखी है। इसीलिए यह ध्वज संघ के लिये उचित होगा, ऐसा उनका मानना था। शिवाजीमहाराज के स्वराज्य में लहराया जानेवाला ‘जरीपटका’ (जिसकी क़िनार पर ज़र है ऐसा भगवा ध्वज) यह संघ का ध्वज हो सकता है, ऐसा कुछ लोगों का कहना था। वहीं, महाराणा प्रताप को प्रिय रहनेवाले भगवे ध्वज का संघ स्वीकार करें, ऐसी कुछ लोगों की राय थी।

सभी के विचारों को ध्यानपूर्वक सुनने के बाद डॉक्टरसाहब ने इस विषय में अपना मत व्यक्त किया। भगवे ध्वज में सूर्य का तेज समाया हुआ है। यह भगवा रंग त्याग, शौर्य, आध्यात्मिकता का प्रतीक है। भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा सारथ्य किये गये अर्जुन के रथ पर भगवा ध्वज ही विराजमान था। इन सब बातों पर ग़ौर करके हम इस परमपवित्र भगवे ध्वज का ही स्वीकार करेंगें, ऐसा डॉक्टरसाहब ने सूचित किया। उनके इन विचारों का सभी लोगों ने एकमत से स्वीकार कर लिया।

संघकार्य का अधिक जोश के साथ विस्तार करने के लिए डॉक्टरसाहब ने ‘प्रचारक’ व्यवस्था शुरू की। ‘संघ के लिए अर्थात राष्ट्र के लिए जीवन समर्पित करो, उसके लिए घरगृहस्थी का त्याग करो’ ऐसा आवाहन डॉक्टरसाहब ने युवावर्ग से किया। संघ का प्रचारक बनने के लिए यह प्रमुख शर्त थी। डॉक्टरसाहब के आवाहन के बाद कई युवक ‘प्रचारक’ बनने के लिए आगे आये। ‘संघ के कार्य के लिए डॉक्टरसाहब जहाँ कहाँ भेजेंगे, वहाँ जाना है और वे जो आदेश देंगें, उसका पालन करना है’ यही इन युवकों का दृढ़निश्च य था। इसी दौरान, डॉक्टरसाहब ने देश के कुछ युवकों को साथ लेकर विभिन्न प्रांतों में प्रवास किया। यह प्रवास यानी स्वयंसेवकों के लिए मार्गदर्शन ही था। डॉक्टरसाहब ने देश की परिस्थिति उन्हें दिखायी और हिन्दू समाज को संघटित करने की आवश्यकता प्रत्यक्ष उदाहरण देकर समझा दी।

जब संघ का कार्य बढ़ रहा था, तब कई समस्याएँ भी सामने आ रही थीं। संघकार्य के लिये आवश्यक रहनेवाला चंदा कैसे इकट्ठा किया जाये, यह एक प्रश्नन ही था। इसके लिए डॉक्टरसाहब ने स्वयंसेवकों को मार्गदर्शन किया – ‘हर वर्ष गुरुपूर्णिमा के अवसर पर हम अपने गुरु को वंदन करेंगें और समर्पण के प्रतीक के तौर पर यथाशक्ति निधि अर्पण करेंगें। इस प्रकार प्राप्त होनेवाली निधि से संघ के कार्य को आगे बढ़ाया जा सकता है। हमें समाज से कुछ भी नहीं लेना है, बल्कि समाज को ही देना है, यह हमेशा ध्यान में रखो।’ डॉक्टरसाहब के ये विचार सभी स्वयंसेवकों को मन:पूर्वक मान्य हो गये। इसी के अनुसार सन १९२८ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ‘गुरुपूजन’ और ‘गुरुदक्षिणा’ उत्सव शुरू हो गया। संघ के द्वारा मनाये जाने वाले छ: प्रमुख उत्सवों में यह एक महत्त्वपूर्ण उत्सव है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टरसाहब केशव बळिराम हेडगेवार को स्वयंसेवक गुरु के समान ही मानते थे। हमें डॉक्टरसाहब का पूजन करना चाहिये, ऐसा स्वयंसेवकों को लगा होगा और डॉक्टरसाहब इसके लिये सर्वथा योग्य हैं, ऐसी उनकी धारणा रही होगी। इस उत्सव के एक दिन पहले डॉक्टरसाहब ने स्वयंसेवकों से कहा कि ‘हम कल गुरुपूजन करनेवाले हैं’। दूसरे दिन शाखा में सभी स्वयंसेवक जमा हो गये। ‘सरसंघचालक की हैसियत से मैं सर्वप्रथम गुरुपूजन करूँगा, मेरी तरह तुम्हें भी गुरुपूजन करना है’ ऐसा डॉक्टरसाहब ने घोषित किया। ‘हम गुरुस्थान पर रहनेवाले डॉक्टरसाहब की पूजा करेंगें, लेकिन डॉक्टरसाहब किसकी पूजा करेंगें? उनके गुरु कौन हैं?’ ऐसे सवाल स्वयंसेवकों के मन में उठ रहे थे।

सभी स्वयंसेवक उत्सुकतापूर्वक देख ही रहे थे कि तभी डॉक्टरसाहब शांति से अपने स्थान से उठे। परमपवित्र भगवे ध्वज के सामने आए और प्रणाम करके उन्होंने इस ध्वज का पूजन किया। उसके बाद दाहिने हाथ से सम्मानपूर्वक लिफ़ाफ़ा निकालकर इस भगवे ध्वज के सामने रख दिया। यह पहली गुरुदक्षिणा थी। उसके बाद डॉक्टरसाहब ने पुन: भगवे ध्वज को आदरपूर्वक प्रणाम किया और वे अपने स्थान पर आकर बै़ठ गये। ‘मेरी तरह ही तुम भी अपने गुरु की पूजा करो। यह परमपवित्र भगवा ध्वज ही हम सभी स्वयंसेवकों का गुरु है।’ ऐसा डॉक्टरसाहब ने कहा। यह सुनकर अचंभित हुए स्वयंसेवकों ने बहुत ही उत्साह के साथ डॉक्टरसाहब का अनुकरण करते हुए भगवे ध्वज का पूजन किया और यथाशक्ति गुरुदक्षिणा अर्पण की।

इसके बाद संपन्न हुए बौद्धिक में डॉक्टरसाहब ने संघ की भूमिका प्रस्तुत की। ‘संघकार्य को बढ़ाने के लिए हमें साल में एक बार गुरुदक्षिणा देनी है और इसमें से ही संघकार्य के लिए आवश्यक खर्च करना है। यह गुरुदक्षिणा कितनी होनी चाहिए यह तो हर एक को व्यक्तिगत रूप से तय करना है। परन्तु अपनी क्षमता के अनुसार गुरुदक्षिणा देते समय; हम यदि अपनी आय का उतना हिस्सा गुरुदक्षिणा के रूप में देते हैं, जिससे कि अपनी गृहस्थी चलाने मे थोड़ी तकलीफ़ महसूस हों, तो उसे त्याग के अधिष़्ठान का लाभ होगा’ ऐसा डॉक्टरसाहब का कहना था। आज नहीं तो कल, हमारा कार्य यक़ीनन बढ़ने ही वाला है। ऐसी परिस्थिति में, स्वयंसेवकों को अपनी विवेकबुद्धि का उपयोग करके संघ के लिए तन, मन, धन समर्पित करना चाहिये, ऐसा डॉक्टरसाहब का संदेश था।

‘यह परमपवित्र भगवा ध्वज ही हमारा गुरु है। किसी भी व्यक्ति को इस स्थान पर बिठाने की अपेक्षा, अनादि काल से धर्म, संस्कृति, परंपरा, त्याग एवं संन्यस्तवृत्ति का प्रतिबिंब रहनेवाले भगवे ध्वज को ही हम हमारे गुरु के रूप में स्वीकार करेंगे। यह भगवा ध्वज ही हमें सर्वोच्च प्रेरणा देगा।’ ऐसा डॉक्टरसाहब ने कहा। व्यक्ति तो आते हैं और जाते हैं, परन्तु यह ध्वज अखंडित रूप से भारतवर्ष का प्रेरणास्रोत बनकर रहा है। भविष्य में भी यह ध्वज भारतवर्ष को प्रेरणा देता रहेगा, ऐसा डॉक्टरसाहब को विश्वाोस था।

इस एक बात से डॉक्टरसाहब का गगनस्पर्शी व्यक्तित्त्व हमारे सामने पूरी तरह अभिव्यक्त होता है। डॉक्टरसाहब ने संघ की स्थापना की और उन्हें गुरुस्थान पर मानकर, उनके आदेशानुसार स्वयंसेवक, उनके द्वारा बताया गया कोई भी कार्य करने के लिए तैयार थे। ऐसा होने के बावजूद भी डॉक्टरसाहब ने, ‘यह परमपवित्र भगवा ध्वज ही स्वयंसेवकों का गुरु होगा’ ऐसा घोषित किया। अर्थात इस देश की अनादि काल से चली आ रही धार्मिक, सांस्कृतिक परंपरा को डॉक्टरसाहब ने अपनी नज़र के सामने रखा था। गुरुस्थान पर भगवे ध्वज को चुनकर डॉक्टरसाहब ने एक साथ कई उद्देश्यों को प्राप्त कर लिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक के ध्येय-नीतियाँ, तत्त्वज्ञान, राष्ट्रीयता इत्यादि सारी बातें भगवे ध्वज से व्यक्त होती हैं।

‘प्रचारक व्यवस्था’ के अनुसार डॉक्टरसाहब ने कुछ स्वयंसेवकों को देश के विभिन्न भागों में भेजना शुरू किया। प्रचारक के रूप में भेजते समय डॉक्टरसाहब ने स्वयंसेवकों को एक महत्त्वपूर्ण सूचना की- ‘तुम्हारी मातृभाषा चाहे जो भी हो, लेकिन इस देश में बोली जानेवाली हर एक भाषा हमारी मातृभाषा ही होती है। अत: तुम जिस प्रांत में जा रहे हो, वहाँ की भाषा को ही मातृभाषा के रूप में स्वीकार कर लो। वहाँ की जीवनशैली आत्मसात कर लो।’

डॉक्टरसाहब के द्वारा की गयी इस सूचना का सभी स्वयंसेवकों ने हूबहू पालन किया। कोकण में जन्मे और पले-बढ़े माधवराव मुळे को डॉक्टरसाहब ने ‘प्रचारक’ के रूप में लाहोर भेजा। पंजाब के राजपाल पुरी को सिंध प्रांत में भेजा। नागपूर के बाळासाहब देवरस को बंगाल में और उनके भाई भाऊराव देवरस को लखनऊ भेजा। महाराष्ट्र के यादवराव जोशी को डॉक्टरसाहब ने दक्षिण की ज़िम्मेदारी सौंपी।

इस तरह अनेक प्रचारक विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने लगे। इनमें एकनाथजी रानडे, दत्तोपंत ठेंगडी, भास्करराव कळंबी, लक्ष्मणराव भिडे, लक्ष्मणराव इनामदार, मोरोपंत पिंगळे, वसंतराव ओक इन जैसे अनेक प्रचारक महाराष्ट्र से थे। परन्तु आगे चलकर देश के विभिन्न प्रांतो से प्रचारक आने लगे। संघ के लिए यानी देश के लिए संपूर्ण जीवन समर्पित करनेवाले इन लोगों का स्मरण होते ही आज भी मेरी आँखों में आँसू भर आते हैं। इन सबके प्रत्यक्ष मार्गदर्शन और स्नेह को मैं, मेरे जीवन में मुझे प्राप्त हुई अत्यंत अनमोल चीज़ मानता हूँ।

संघ का यह काम शुरू हुआ ही था कि तभी एक दिन डॉक्टरसाहब को नागपुर में ‘माधव’ मिले – ‘अरे, माधव! तुम कब आये? मैं कबसे तुम्हारी राह देख रहा हूँ।’

‘मैं आज ही आया हूँ। माँ की तबियत ठीक नहीं है। इसलिए उससे मिलने आया हूँ’ – माधव ने कहा।

’अब कुछ समय तक यहीं पर हो ना! तुमसे बहुत सारी बातें करनी हैं। आज शाम को शाखा में आ जाओ, शाखा का कामकाज़ ख़त्म हो जाने के बाद हम मेरे घर पर बैठेंगें।’

माधव ने डॉक्टरसाहब का कहना मान लिया। यह संघ के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना साबित हुई। क्योंकि यहीं से संघ के विस्तार एवं विकास का दूसरा पर्व आरंभ होनेवाला था।
(क्रमश:……………….)


रविवार, 10 जुलाई 2016

संघ : राष्ट्र रक्षा का शुभ संकल्प लेने का दिन गुरु पूर्णिमा



राष्ट्र रक्षा का शुभ संकल्प लेने का दिन गुरु पूर्णिमा
तरुण विजय

भारतीय इतिहास गुरु-शिष्य संबंधों की गाथाओं से भरा पड़ा है. समय-समय पर गुरुओं ने जन-कल्याण के लिये मंत्र दिया, जिसे उनके शिष्यों ने दूर-दूर तक प्रसारित एवं प्रचारित किया इस संबंध की स्मृति में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व अनादिकाल से मनाया जाता रहा है. परंतु इसे महर्षि व्यास ने अधिक व्यापक बनाया. इस कारण इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं. प्राचीन काल में गुरु दीक्षा और गुरु दक्षिणा के लिये जो दिन नियत था, उसे ही गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता था. किंतु आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु समाधि लेते हैं और महात्मा आ भी चातुर्मास्य व्रत करते और एक स्थान पर रहकर उसे सम्पन्न करते हैं. इसी दिन सरस्वती पूजा भी की जाती है, स कारण यह पर्व आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाने लगा. इसके पीछे यह भी भावना है कि पूर्णिमा को किया गया व्रत-अनुष्ठान पूर्णता एवं सर्वसिद्धि प्रदान करता है. निश्चत ही, यह वर्ष में एक बार हमें कल्याणकारी दिशा में अग्रसर होने की प्रेरणा देता है.

मगध  के छिन्न-भिन्न हो रहे साम्राज्य को कौन बचाता अगर चन्द्रगुप्त के चाणक्य ना होते? बर्बर मुस्लिम आक्रमणकारियों से हिन्दू राष्ट्र की रक्षा कौन करता अगर छत्रपति शिवाजी के समर्थ गुरु रामदास ना होते? गुरू गोदिं सिंह का खालसा पंथ कैसे सिरजा जाता तथा भारत और समाज की रक्षा कैसे होती अगर गुरु ग्रंथ साहिब की अमर वाणी ना होती? वर्तमान भारतवर्ष की पराधीनता की बेडि़यां तोड़कर स्वतंत्रता और हिन्दू स्वाभिमान की क्रांति कैसे प्रारंभ होती अगर डा. हेडगेवार के साथ भगवा ध्वज की शाश्वत बलिदानी परम्परा का गुरु-बल ना होता?

भारत के प्राण सभ्यतामूलक संस्थाओं में बसे हैं. माता, पिता और गुरु-ये वे संस्थान हैं जिन्होंने इस देश की हवा, पानी और मिट्टी को बचाया. रामचरित मानस में श्रीराम के बाल्यकाल के गुणों में सबसे प्रमुख है मात-पिता गुरु नाविही माथा. वे माता-पिता और गुरु के आदेश से बंधे थे और जो भी धर्म तथा देश के हित में हो, वही आदेश उन्हें माता-पिता और गुरु से प्राप्त होता था. जब वे किशोरवय के ही थे और उनकी मसें भी नहीं भीगी थीं तभी गुरु वशिष्ठ उन्हें देश, धर्म और समाज की रक्षा के लिये उनके पिता दशरथ से मांग कर ले गये. जब देश संकट में हो और धर्म पर मर्दायाहीनता का आक्रमण हो तो समाज के तरुण और युवा शक्ति क्या सिर्फ अपना कैरियर और भविष्य को बनाने में लगी रहे? यह गुरू का ही प्रताप और मार्गदर्शन होता है कि वह समाज को राष्ट्र तथा धर्म की रक्षा के लिये जागृत और चैतन्य करे.

जब कश्मीर के हिन्दू पंडितों पर संकट आया और इस्लाम के आक्रमणकारियों ने उन्हें घाटी से बाहर खदेड़ दिया तो कश्मीर से 11 पंडित गुरु तेग बहादुर साहिब के पास आये. उनकी व्यथा सुनकर गुरु तेग बहादुर साहिब बहुत पीडि़त हुये. उनके मुंह से शब्द निकले कि आपकी रक्षा के लिये तो किसी महापुरुष को बलिदान देना होगा. उस समय नन्हें बालक गोविंद राय, जो कालांतर में गुरु गोविंद कहलाये, हाथ जोड़कर बोले, हे सच्चे पातशाह, आपसे बढ़कर महापुरुष कौन हो सकता है? गुरु तेग बहादुर साहिब ने गोविंद राय को आशीर्वाद दिया और कश्मीरी पंडितों की रक्षा की. यह गुरु तेग बहादुर साहिब का बलिदान ही था कि उन्हें हिन्द की चादर कहा गया. गुरु तेग बहादुर के बलिदान के बाद गुरु गोविंद सिंह जी के दोनों साहिबजादे, जोरावर सिंह और फतेह सिंह सरहिंद के किले में काजी के द्वारा जिंदा दीवार में चिनवा दिये गये. वीर हकीकत राय ने धर्म के लिये प्राण दे दिये लेकिन धर्म नहीं छोड़ा. यह कौन सी शक्ति थी जो उनके पीछे काम कर रही थी? वह कौन सा ज्ञान धन था कि जिसने इन वीरों के हृदय में राष्ट्रधर्म की रक्षा के लिये आत्मोत्सर्ग करने की हिम्मत भर दी?

आचार्य बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपनी अमरकृति आनंद मठ में उन्हीं महान आचार्यों की खड्गधारी परम्परा का अद्भुत और आग्नेय वर्णन किया है जो भवानी भारती की रक्षा के लिये शत्रु दल का वैसे ही संहार करते गये जैसे महिषासुर मर्दिनी शत्रुओं का दलन करती है. वंदेमातरम् के जयघोष के साथ जब संन्यासी योद्धा अश्व पर सवार होकर शत्रुओं पर वार करते थे तो अरिदल संख्या में अधिक होते हुए भी काई की तरह फटता जाता था. वंदेमातरम् से विजयी आकाश नादित हो उठता था.

डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की तो परम पवित्र भगवा ध्वज को अपना गुरू मानने के पीछे यही कारण था कि वे शताब्दियों से सिंचित सभ्यता और संस्कृति के बल से हिन्दू राष्ट्र को जीवंत करना चाहते थे. यदि राष्ट्र के घटकों की स्मृति में त्याग, तप और बलिदान की विजयशाली परम्परा जीवित है तो दुनिया की कोई शक्ति ना उन्हें परास्त कर सकती है और ना ही पराधीन बना सकती है. भगवा ध्वज रामकृष्ण, दक्षिण के चोल राजाओं, सम्राट कृष्णदेव राय, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह और महाराजा रणजीत सिंह की पराक्रमी परम्परा और सदा विजयी भाव का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है. इसमें यदि सम्राट हर्ष और विक्रमादित्य का प्रजा वत्सल राज्य अभिव्यक्त होता है तो व्यास, दधीचि और समर्थ गुरु रामदास से लेकर स्वामी रामतीर्थ, स्वामी दयानंद, महर्षि अरविंद, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद तक का वह आध्यात्मिक तेज भी प्रकट होता है, जिसने राष्ट्र और धर्म को संयुक्त किया तथा आदिशंकर की वाणी से यह घोषित करवाया कि राष्ट्र को जोड़ते हुए ही धर्म प्रतिष्ठित हो सकता है. जो धर्म साधना राष्ट्र और जन से विमुख हो, केवल अपने मोक्ष के लिये कामना करे, वह धर्म साधना भारत के गुरुओं ने कभी प्रतिष्ठित नहीं की. स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना करते हुए उसका उद्देश्य ‘आत्मनो मोक्षार्थ जगद् हिताय च’ रखा. अर्थात मनुष्यों के कल्याण में ही मेरा मोक्ष है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का रक्षा कवच बना और उसके स्वयंसेवक प्रधानमंत्री पद से लेकर देश के सीमावर्ती गांवों तक में भारत के नये अभ्युदय के लिये कार्य कर रहे हैं और इसके पीछे भारत की सभ्यता और संस्कृति का तपोमय बल है जो गुरु परम्परा से ही जीवित रहा है. इसलिये गुरु पूर्णिमा के अवसर पर देश भर में करोड़ों स्वयंसेवक भगवा ध्वज के समक्ष प्रणाम निवेदित करते हुए शुद्ध समर्पण भाव से गुरु-दक्षिणा अर्पित करते हैं. यह न तो शुल्क है और न ही चंदा. यह राष्ट्र के लिए बलिदानी भाव से ओत-प्रोत स्वयंसेवकों का श्रद्धामय प्रणाम ही होता है जो दक्षिणा राष्ट्र रक्षा करते हुए शिवाजी ने समर्थ गुरु रामदास को दी. राष्ट्र रक्षा का वही संकल्प संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज को अर्पित करते हैं.-

गुरुपूर्णिमा और संघ : भगवा ध्वज है गुरु हमारा


संघ में अत्यंत महत्वपूर्ण है "गुरू दक्षिणा उत्सव"



संघ शाखा प्रारम्भ होने के बाद प्रारंभिक दो वर्षों तक तो धन की कोई आवश्यकता महसूस नहीं हुई। कार्यक्रम भी सामान्य और छोटे स्वरूप के होते थे, इसलिए खर्चा भी विशेष नहीं होता था। जो कुछ थोड़ा बहुत खर्च होता उसकी पूर्ति डॉक्टरजी ( संघ संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक परमपूज्य डॉ0 केशव बलीराम हेडगेवार )  का मित्र-परिवार करता। उनके मित्रों को यह पूरा विश्वास था कि डॉक्टरजी निरपेक्ष देश सेवा का कार्य कर रहे हैं। इसलिए वर्ष भर में एक या दो बार वे बड़ी खुशी से संघ कार्य के लिए आर्थिक मदद देते थे। 1927 तक संघ के जिम्मेदार स्वयंसेवक डॉक्टरजी के इन विश्वासपात्र मित्रों के यहां जाकर धन ले आते थे। द्रुत गति से बढ़ने वाले संघ कार्य के लिए, कार्यक्रमों तथा प्रवास हेतु जब अधिक खर्च करना अपरिहार्य हो गया तब डॉक्टरजी ने इस संबंध में स्वयंसेवकों के साथ विचार-विमर्श प्रारंभ किया। आज तक तो धनराशि एकत्रित होती उसका पाई - पाई का हिसाब डॉक्टरजी स्वयं रखते थे और यही आदत उन्होंने स्वयंसेवकों में भी डाली। परिणाम  स्वरूप स्वयंसेवकों को अपने सारे कार्यक्रम सादगीपूर्ण ढंग से, कम खर्च में करने की आदत हो गई। शाखाएं तेजी से खुलने लगीं थी। नागपुर के पड़ोसी वर्धा और भंडारा जिलों में नयी शाखाएं खुलीं। इस कारण आवश्यक खर्च भी बढ़ने लगा। कुछ दिनों तक मित्रों से उधार लेने का क्रम चला। मित्र भी बड़ी आस्था से रकम उधार देते और वापसी की कोई जल्दबाजी नहीं की जाती, फिर भी उधार ली गई रकम आखिर कभी न कभी वापस करनी है - यह चिंता उन्हें अवश्य होती। फिर इस तरह उधार लेकर काम करने का क्रम आखिर कब तक चलेगा, यह चिंता स्वयंसेवकों के मन में भी उत्पन्न होने लगी और इसका कोई निदान ढूंढा जाने लगा।

एक स्वयंसेवक ने कहा, संघ कार्य हिन्दूसमाज का कार्य है। इसलिए जो आर्थिक मदद दे सकते हैं, ऐसे संघ से सहानुभूति रखने वाले लोगों से धन एकत्रित किया जाए। अन्य स्वयंसेवक ने भी इस सुझाव का समर्थन करते हुए कहा कि समाज जीवन की उन्नति हेतु चलने वाले सभी प्रकार के कार्य आखिर लोगों द्वारा दिए गए दान, अनुदान और चंदे की रकम से ही चलते हैं- अत: हमें भी इसी तरीके से धन जुटाना चाहिए। एक और स्वयंसेवक ने इस पर आपत्ति उठाते हुए कहा कि हमारा कार्य सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय कार्य है इसका लोगों का बोध कराना होगा, किंतु इसके लिए उनसे आर्थिक मदद मांगना उचित नहीं होगा। इसी बात को आगे  बढ़ाते हुए अन्य स्वयंसेवक ने कहा कि यदि हम इसे अपना ही कार्य कहते हैं तो संघ जैसे उदात्ता कार्य हेतु हम स्वयं ही अपना धन लगाकर खर्च की व्यवस्था क्यों न करें? डॉक्टरजी ने उसे अपना विचार अधिक स्पष्ट रूप से कहने का आग्रह किया। तब उस स्वयंसेवक ने कहा, अपने घर में कोई धार्मिक कार्य अथवा  विवाह आदि कार्य होते हैं। कोई अपनी लड़की के विवाह के लिए चंदा एकत्रित कर धन नहीं जुटाता। इसी प्रकार संघ कार्य पर होने वाला खर्च भी, जैसे भी संभव हो, हम सभी मिलकर वहन करें।

स्वयंसेवक खुले मन से अपने विचार व्यक्त करने लगे। एक ने शंका आशंका उपस्थित करते हुए कहा, यह धन राशि संघ के कार्य हेतु एकत्र होगी- क्या इसे हम कार्य हेतु अपना आर्थिक सहयोग माने? दान, अनुदान, चंदा आर्थिक सहयोग आदि में पूर्णतया निरपेक्ष भाव से देने का भाव प्रकट नहीं होता। अपनी घर-गृहस्थी ठीक तरह से चलाते हुए, हमें जो संभव होता है, वही हम दान, अनुदान चंदा आदि के रूप में देते हैं। किन्तु  हमारा संघ कार्य तो जीवन में सर्वश्रेष्ठ वरण करने योग्य कार्य है। वह अपना ही कार्य है, इसलिए हमें अपने व्यक्तिगत खर्चों में कटौती कर संघ कार्य हेतु जितना अधिक दे सकें, उतना हमें देना चाहिए- यह भावना स्वयंसेवकों में निर्माण होनी चाहिए। अपने व्यक्तिगत जीवन में भी धन-सम्पत्ति की ओर देखने का योग्य दृष्टिकोण हमें स्वीकार करना चाहिए। मुक्त चिंतन के चलते स्वयंसेवक अपने - अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। डॉक्टरजी ने सबके विचारों को सुनने के बाद कहा, कृतज्ञता और निरपेक्षता की भावना से गुरुदक्षिणा समर्पण की पध्दति भारत में प्राचीनकाल में प्रचलित थी। संघ कार्य करते समय धन संबंधी हमें अपेक्षित भावना गुरुदक्षिणा की इस संकल्पना में प्रकट होती है- हमें भी वही पध्दति स्वीकार करनी चाहिए। डॉक्टरजी के इस कथन से सभी स्वयंसेवकों के विचार को एक नयी दिशा मिली और  विशुद्ध  भावना से 'गुरुदक्षिणा' समर्पण का विचार सभी स्वयंसेवकों के हृदय में बस गया।

दो दिन बाद ही व्यास पूर्णिमा थी। गुरुपूजन और गुरुदक्षिणा समर्पण हेतु परम्परा से चला आ रहा, यह पावन दिवस सर्व दृष्टि से उचित था। इसलिए डॉक्टरजी ने कहा कि इस दिन सुबह ही स्नान आदि विधिपूर्ण कर हम सारे स्वयंसेवक एकत्रित आयेंगे और श्री गुरुपूर्णिमा व श्री गुरुदक्षिणा का उत्सव मनायेंगे। डॉक्टरजी की यह सूचना सुनते ही घर लौटते समय स्वयंसेवकों के मन में विचार-चक्र घूमने लगा। परसों हम गुरु के नाते किसकी पूजा करेंगे? स्वयंसेवकों का गुरु कौन होगा? स्वाभाविकताः   सबके मन में यह विचार आया कि डॉक्टरजी के सिवा हमारा गुरु कौन हो सकता है? हम परसों मनाये जाने वाले गुरुपूजन उत्सव में उन्हीं का पूजन करेंगे। कुछ स्वयंसेवकों के विचार में, राष्ट्रगुरु तो समर्थ रामदास स्वामी हैं। प्रार्थना के बाद नित्य हम उनकी जय जयकार करते हैं। अत: समर्थ रामदासजी के छायाचित्र की पूजा करना उचित रहेगा। उन्हीं दिनों अण्णा सोहनी नामक एक कार्यकर्ता शाखा में उत्ताम शारीरिक शिक्षके रूप में प्रसिध्द थे- उनकी शिक्षा से हमारी शारीरिक क्षमता और विश्वास से वृध्दि होती है, अत: क्यों न उन्हें ही गुरु के रूप में पूजा जाए? अनेक प्रकार की विचार तरंगे स्वयंसेवकों के मन में उटने लगीं।

व्यास  पूर्णिमा के दिन प्रात:काल सभी स्वयंसेवक निर्धारित समय पर डॉक्टरजी के घर एकत्रित हुए। ध्वजारोहण, ध्वजप्रणाम के बाद स्वयंसेवक अपने - अपने स्थान पर बैठ गए। व्यक्तिगत गीत हुआ और उसके बाद डॉक्टरजी भाषण देने के लिए उठ खड़े हुए। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि संघ किसी भी जीवित व्यक्ति को गुरु न मानते हुए अपने परम पवित्र भगवा ध्वज को ही अपना गुरु मानता है। व्यक्ति चाहे कितना ही श्रेष्ठ क्यो न हो, वह सदा अविचल-अडिग उसी स्थिति में रहेगा- इसकी कोई गारंटी नहीं। श्रेष्ठ व्यक्ति में भी कोई न कोई अपूर्णता या कमी रह सकती है। सिध्दांत ही नित्य अडिग बना रह सकता है। भगवा ध्वज ही संघ के सैध्दान्तिक विचारों का प्रतीक है- इस ध्वज की ओर देखते ही अपने राष्ट्र का उज्जवल इतिहास, अपनी श्रेष्ठ संस्कृति और दिव्य दर्शन हमारी आंखों के सामने खडे  हो जाता है। जिस ध्वज की ओर देखते ही अंत:करण में स्फूर्ति का संचार होने लगता है वही भगवा ध्वज अपने संघ कार्य के सिध्दांतों का प्रतीक है- इसलिए वह हमारा गुरु है। आज हम उसी का पूजन करें और उसे ही अपनी गुरुदक्षिणा समर्पित करें।

कार्यक्रम बड़े उत्साह से सम्पन्न हुआ और इसके साथ ही भगवा ध्वज को अपना गुरु और आदर्श मानने की पध्दति शुरु हुई। इस प्रथम गुरु पूजन उत्सव में कुल 84 रु. श्रीगुरुदक्षिणा के रूप में एकत्रित हुए। उसका तथा आगे संघ कार्य पर होने वाले खर्चे का पूरा हिसाब रखने की व्यवस्था की गई। श्रीगुरुदक्षिणा का उपयोग केवल संघ कार्य हेतु ही हो, अपने व्यक्तिगत कार्य के लिए उसमें से एक भी पैसा उपयोग में नहीं लाया जाए- इसकी चिंता स्वयं डॉक्टरजी किया करते। वही आदत स्वयंसेवकों में भी निर्माण हुई इस प्रकार आत्मनिर्भर होकर संघ कार्य करने की पध्दति संघ में प्रचलित हुई।

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

हिन्दुत्व : धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो !



हिन्दुत्व
धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो,
प्राणियों मे सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो !
प्रस्तुतकर्ता सूबेदार जी पटना
http://dirghatama.blogspot.in/2015/03/blog-post_29.html

            भारतीय संस्कृति के प्रखर उपासक महान विद्वान स्वामी करपात्री  जी महराज को कौन नहीं जनता, उनकी लौकिक पढ़ाई बहुत कम थी उन्होने गंगा जी की परिक्रमा की और वे वेद, वेदांग, उपनिषद और पुराणों के महान ज्ञाता बनकर आ गए वे भारतीय स्वतन्त्रता सेनानी ही नहीं धर्म संघ स्थापना कर धर्म प्रचार मे लग गए, एक बार मध्य प्रदेश के एक गाँव मे प्रवास पर थे प्रवचन के पश्चात वे जो जय घोष लगाते वह संस्कृत मे होता था एक छोटी सी बालिका आई और करपात्री जी से कहा स्वामी जी यदि आप इस जय घोष को हिन्दी मे कहते तो हमारी भी समझ मे आता, करपात्री जी को यह बात ध्यान मे आ गयी और उन्होने उसी उद्घोष को हिन्दी मे कहा ''धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों मे सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो'' आज यह जय घोष भारतीय संस्कृति का उद्घोष बन गया ।

धर्म की जय हो -----------------!
      भारतीय संस्कृति मे धर्म क्या है नैतिकता, राष्ट्रिय चरित्र, कहते हैं की 'धृति क्षमा दमों अस्तेय ------ दसकम धर्म लक्षणम' इत्यादि दस धर्म के लक्षण हैं जैसे धर्म शाला, धर्म पत्नी यानी जहां -जहां धर्म शब्द लगा है वहाँ समाज का विस्वास, पवित्रता, नैतिकता, सामाजिक बंधन, परिवार, काका-काकी, मामा-मामी  ऐसे रिस्ते जो हमे व समाज को बांधे रखता है उसे भारत मे धर्म कहते हैं, भगवान श्रीराम ने एक आदर्श कायम किया उनकी सादगी, सरलता, भाइयों के प्रति कैसा प्रेम की राज्य नहीं लेना चाहते दोनों, राम का जीवन संस्कृति की ब्याख्या, परिभाषा जीवन मूल्य और सर्वसमावेशी है वे एक दूसरे को गद्दी पर बिठाना चाहते हैं, जहां श्रीक़ृष्ण धर्म स्थापना हेतु महाभारत कराते हैं, वास्तव मे यही हिन्दू धर्म है जो विश्व का सर्व श्रेष्ठ धर्म है जहां केवल मानव मात्र ही नहीं बल्कि पशु-पक्षी, जीव- जन्तु सबकी चिंता का विधान है जहां प्रकृति के प्रति श्रद्धा का भाव है वहीं इसके सरक्षण, संबर्द्धन मे पुण्य माना जाता है इसी धर्म की जय हो ।

अधर्म का नाश हो-------!
            अधर्म का नाश हो यानी क्या ? हमे विचार करना है की अधर्म क्या है जिसका नाश हो जो नैतिकता का विरोधी हो, जिसका ब्रंहांड  मे विस्वास नहीं जिसमे पूर्णता मे विस्वास नहीं जहां चरित्र का कोई महत्व नहीं, जहां सम्बन्धों पर विचार नहीं, जहां गोत्र का कोई संबंध नहीं, जिनका प्रकृति का संरक्षण नहीं करते, नहीं जो पीपल, तुलसीआदि औसधियों को नष्ट करना विचार, जिनका नदियों मे मातृत्व का भाव नहीं यानी जल का संरक्षण नहीं जिनका भारत के प्रति माता का भाव नहीं जो गाय को माता नहीं मानते उसे को काटने मे जन्नत महसूस करते हैं जिनका वेद व भारतीय वांगमय मे विस्वास नहीं भारतीय महापुरुषों मे विस्वास नहीं यहाँ के तीरथों मे आस्था नहीं वह अधर्म है मै एक कथा बताता हूँ ''एक बार मुहम्मद साहब अपने घर मे गए अपनी पुत्र वधू स्नान कराते हुए देखा उसके साथ बलात संबंध बना लिया जब उनका लड़का घर पर आया तो उन्होने बताया कि अल्लाह का ''इलहाम'' आया है कि अब ये तुम्हारी माँ है और मेरी पत्नी '' भारत मे कम से कम इसको स्वीकार नहीं किया जा सकता लेकिन इस्लाम मे भाई-बहन का बिवाह जायज है, इसायियों मे केवल अगूठी बदलते हैं यह सब भारत मे अधार्मिक माना जाता है  तो इसका नाश (समाप्त) हो ---!

प्राणियों मे सद्भावना हो -----!
      प्राणियों मे सद्भावना माने क्या ? हिन्दू समाज मे केवल मनुष्य का ही चिंतन नहीं किया गया तो प्राणी मात्र का चिंतन है कहा जाता है कि प्रत्येक मानुषे को पाँच पेड़ लगाने चाहिए, पीपल का बृक्ष, तुलसी का पौधा नहीं काटना तो नीम का बृक्ष घर के बाहर लगाना यानी हमने पेड़-पौधों मे भी आत्मा का दर्शन किया, हिन्दू धर्म के अनुसार केवल गाय को गो ग्रास ही नहीं निकालना तो चींटी को भी चारा देना हाथी मे गणेश का दर्शन करना यहाँ तक 'सूकर' भी विष्णु का अवतार माना जाता है इतना ही नहीं सर्प की भी पूजा उसे दूध पिलाने की परंपरा गरुण भगवान विष्णु की सवारी है तो चूहा गणेश जी का हमारे पूर्वजों (ऋषियों-मुनियों ) ने लाखों करोणों वर्षों मे सम्पूर्ण समाज का चिंतन करते हुए सभी की चिंता, सभी मे सदभना बनी रहे ऐसा समाज खड़ा किया ।

 विश्व का कल्याण हो----------!
        विश्व का कल्याण हो यानी क्या यह हमे समझने की अवस्यकता है कल्याण क्या है -? एक वार धरती को भगवान ''सूकर'' ने बचाया था, भगवान श्रीरामचन्द्र ने रावण का बाधकर विश्व कल्याण किया था तो हृणाकश्यप का बध नरसिंघ भगवान ने किया था द्वापर और कलयुग के संधि काल मे भगवान कृष्ण ने कंस ही नहीं तो धर्म स्थापना हेतु महाभारत करवाया था, भगवत गीता मे उन्होने कहा ''यदा -यदाहि धरमस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानम सृजामिहम'' जब-जब धर्म की हानी होती है मै आता हूँ बिधर्मियों का संहार करता हूँ, वर्तमान मे विश्व कल्याण करना यानी क्या करना जो मानवता का नुकसान कर रहे हैं जो गोबध कर रहे हैं जो विश्व मे हिंसा यानी धर्म के नाम पर अपने को स्वयं भू खलीफा सिद्ध कर हजारों लाखों की हत्या कर रहे हैं जो यह कहते हैं की मेरी ही बात सत्य है मेरा ही धर्म मानने योग्य है मेरा ही पूजा स्थल साधना योग्य है शेष को न जिंदा रहने का अधिकार है न मठ, न मंदिर बनाने का सभी नष्ट करना, सभी ग्रंथागारों को नष्ट करना अथवा करना चाहते हैं, इन राक्षसों को समाप्त करना यानी इन्हे समाप्त करना, जिस मानवतावादी संस्कृति की रक्षा हेतु महाराणा प्रताप ने जीवन भर संग्राम किया, क्षत्रपति शिवा जी महराज ने अफजल खान जैसे आतताईयों की बध किया, गुरु गोविंदसिंह ने पिता, पुत्र सहित अपने प्रिय शिष्यों के बलिदान का आवाहन किया, वीर बंदा बैरागी ने अपने बंद-बंद नुचवाया, भाई मतिदास ने आरे से शरीर को चिरवाया, जिस विश्व कल्याण कारी संस्कृति की सुरक्षा हेतु गुरु तेगबहादुर का बलिदान हुआ धर्म वीर संभाजी राजे ने अप्रितम आहुति दी इन महापुरुषों ने जो किया वही विश्व का कल्याण का मार्ग है ।
      अपने मठ, मंदिर और गुरुद्वारों मे पूजा के पश्चात हम केयल यह जय-घोष ही करेगे या विश्व के कल्याण मे कोई भूमिका भी निभाएगे आइए विचार करें।    

सोमवार, 4 जुलाई 2016

गुरु गोविंद सिंह की 350वीं जयंती मनाएगी भारत सरकार : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी



गुरु गोविंद सिंह की 350वीं जयंती मनाएगी सरकार : PM मोदी
भाषा [Edited By: सना जैदी] नई दिल्ली, 4 जुलाई 2016 |

सरकार सिख गुरु गोविंद सिंह की 350वीं जयंती पूरे देश में मनाएगी और इन समारोहों के लिए 100 करोड़ रुपये की राशि निश्चित की गई है. सिख योद्धा बाबा बंदा सिंह के 300वें शहीदी दिवस पर एक समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि एक उच्च स्तरीय राष्ट्रीय समिति का निर्माण किया जाएगा. यह समारोह की योजना का खाका तैयार करेगी.

पीएम मोदी कहा, 'भारत सरकार गुरु गोविंद सिंह की 350वीं जयंती समारोह को पूरे देश के कोने-कोने में मनाएगी. यह दुनिया में हर उस जगह मनाई जाएगी जहां भारतीय रहते हैं. उन्होंने कहा, 'इसके लिए भारत सरकार ने 100 करोड़ रुपये की राशि निश्चित की है. इन समारोहों के आयोजन को देखने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति बनाई जा रही है.' इन समारोहों के आयोजन के लिए पंजाब सरकार भी इतनी ही राशि का योगदान करेगी.

गुरु गोविंद सिंह सिखों के दसवें एवं अंतिम गुरु थे जिनका जन्म 22 दिसंबर 1666 को हुआ था. प्रधानमंत्री ने कहा, 'ऐतिहासिक समारोहों के आयोजन से हम अपनी भविष्य की पीढ़ियों को उनकी जड़ों से जोड़ते हैं. जो लोग इतिहास भूल जाते हैं, वे इतिहास नहीं रच सकते. जो अपनी ऐतिहासिक जड़ों से जुड़े होते हैं, केवल वे ही इतिहास रच सकते हैं.'

मोदी ने कहा, ' अगर हम 300वां और 350वां या शताब्दी समारोह मनाते हैं, तो वे हमें अपनी महान एवं ऐतिहासिक परंपराओं से जोड़ते हैं.' इससे पहले आप सरकार ने दिल्ली में हाल ही में बारापुला पुल का नामकरण बाबा बंदा सिंह के नाम पर किया था. आप पंजाब में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए कठिन प्रयास कर रही है. राज्य में 2017 में चुनाव होने हैं.

मोदी ने अपने भाषण की शुरुआत 'जो बोले सो निहाल...' से की और बाबा बंदा बहादुर सिंह के बलिदान के विषय पर पंजाबी में कुछ शब्द कहे. उन्होंने कहा कि वर्तमान पीढ़ी को बाबा बंदा बहादुर के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए और अपने दैनिक जीवन में उनका अनुसरण करना चाहिए. प्रधानमंत्री ने कहा कि वे एक संवेदनशील प्रशासक थे और जीवन के अधिकांश समय प्रतिकूल परिस्थितियों और युद्ध की छाया में रहने के बावजूद न्याय के पथ से कभी विचलित नहीं हुए. उन्होंने कहा, 'वह अपने पथ से कभी नहीं डिगे और उन्होंने कभी भी अपने आप को विचलित नहीं होने दिया.'

मराठा शासक शिवाजी के कौशल का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि बाबा बंदा बहादुर सीमित संसाधन के साथ शत्रुओं से लड़े. वे लोगों के समान अधिकारों के लिए लड़े. उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि किसानों को उनका हक मिले. उन्होंने लोगों के विकास एवं सशक्तिकरण के लिए काम किया. इस समारोह में पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, उपमुख्यमंत्री सुखवीर सिंह बादल, हरियाणा के राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और कुछ केंद्रीय मंत्री भी शामिल थे.

रविवार, 3 जुलाई 2016

कौन थे बंदा बैरागी ?

सेक्यूलर इतिहास की काल कोठरी में बंद, बंदा बैरागी की अमर बलिदानी गाथा !
- Harihar Sharma   शुक्रवार, 1 जुलाई 2016
साभार आधार - नया इंडिया

अभी पिछले दिनों पंजाब सरकार ने बन्दा बैरागी का शहादत दिवस मनाया ! उनकी स्मृति में एक सिक्का भी जारी किया गया ! कौन थे ये बंदा बैरागी ?

बन्दा जम्मू-कश्मीर की रियासत पूंछ का राजकुमार था। एक बार जब वह हिरण का शिकार कर रहा था तो उसका तीर लगने से एक गर्भवती हिरणी ने तड़पते हुए उसने एक शावक को जन्म दिया। जिसके बाद हिरणी और उसके शावक की मौत हो गई। इन दोनों की मौत ने बन्दा का पूरा जीवन ही बदल दिया। वह राज-पाट छोड़कर बैरागी बन गया।

15 वर्ष की उम्र में वह जानकीप्रसाद नाम के एक बैरागी का शिष्य हो गया और उसका नाम माधोदास पड़ा। तदन्तर उसने एक अन्य बाबा रामदास बैरागी का शिष्यत्व ग्रहण किया और कुछ समय तक पंचवटी (नासिक) में रहे । वहाँ एक औघड़नाथ से योग की शिक्षा प्राप्त कर वह पूर्व की ओर दक्षिण के नान्देड क्षेत्र को चला गया जहाँ गोदावरी के तट पर उसने एक आश्रम की स्थापना की।

जब गुरु गोविन्द सिंह जी की मुगलो से पराजय हुयी और उनके दो सात और नौ वर्ष के शिशुओं की नृशंस हत्या कर दी गयी इससे विचलित होकर वे दक्षिण की और चले गए 3 सितंबर, 1708 ई. को नान्देड में सिक्खों के दसवें गुरु गुरु गोबिन्द सिंह ने इस आश्रम को देखा और वह वो लक्ष्मण देव (बाँदा बहादुर) से मिले और उन्हें अपने साथ चलने के लिए कहा और उपदेश दिया की “हिन्दू अगर सन्यासी बनेगा तो देश धर्म को कौन बचाएगा हिन्दू का पहला कर्तव्य रक्षा करना है ! गुरुजी ने उन्हें उपदेश दिया अनाथ अबलाये तुमसे रक्षा की आशा करती है, गौ माता म्लेच्छों की छुरियो क़े नीचे तडपती हुई तुम्हारी तरफ देख रही है, हमारे मंदिर ध्वस्त किये जा रहे है, यहाँ किस धर्म की आराधना कर रहे हो तुम एक बीर अचूक धनुर्धर हो, इस समय धर्म पर आयी आपत्ति काल में राज्य छोड़कर तपस्वी कैसे हो सकते हो ?” गुरु की प्रेरणा से माधवदास नामक इस बैरागी ने मुगलों के अत्याचारों का बदला लेने का संकल्प लिया।

गुरु महाराज ने उसे अपना एक नगाड़ा, एक कमान और पांच तीर दिए। इसके अतिरिक्त गुरु के 21 अनुयायियों की कमान भी उसे सौंप दी। गुरुजी ने माधवदास को बन्दा बहादुर का नाम प्रदान किया। बंदा तूफान की तरह दक्षिण से उत्तरप्रदेश पहुंचा। बन्दा का पहला निशाना सोनीपत बना। इसके बाद बन्दा ने कैथल, समाना को भी जीत लिया। 12 मई 1710 को चपरसिरी के युद्ध में सिखों ने सरहिन्द के नवाब वजीर खां और उसके दीवान सुच्चानंद को गिरफ्तार कर लिया। इन दोनों ने गुरु गोबिन्द सिंह के दोनों अबोध बच्चों को जिन्दा दीवार में चिनवाया था। बन्दा के आदेश पर इनके सिर काट दिए गए और सरहिन्द पर कब्जा कर लिया। सतलुज से यमुना तक पूरा क्षेत्र बन्दा के कब्जे में आ गया।

बन्दा ने पहला फरमान यह जारी किया कि जागीरदारी व्यवस्था का खात्मा करके सारी भूमि का मालिक खेतिहर किसानों को बना दिया जाए। निरंतर हार से बौखलाए मुगल सम्राट फरुखसियर ने एक कुटिल चाल चली। उन दिनों दिल्ली में गुरु गोबिन्द सिंह की दो पत्नियां बीबी साहिब कौर और माता सुंदरी मुगलों के संरक्षण में रह रही थीं। बन्दा के सैनिकों में विभाजन करने के लिए मुगल सम्राट ने इनमें से माता सुंदरी का सहारा लिया। माता सुंदरी ने बन्दा को यह निर्देश दिया कि वह मुगलों के सामने आत्मसमर्पण कर दें। बन्दा ने इसे मानने से इंकार कर दिया। उसका कहना था कि गुरु महाराज के सामने मुगलों का नामोनिशान मिटाने का जो संकल्प लिया है उसे वह भंग नहीं कर सकता।

इससे चिढ़कर माता सुंदरी ने सिखों का यह निर्देश दिया कि वह बन्दा का साथ छोड़ दें। गुरु माता के आदेश पर बन्दा के सैनिकों में भारी विभाजन हुआ। तत खालसा नामक एक बड़ा गुट बन्दा का साथ छोड़कर मुगल सेना में शामिल हो गया जबकि हिन्दू सैनिक जो बंदई खालसा कहलाते थे, उन्होंने अंत तक बन्दा का साथ दिया। अपने पुराने साथियों की हत्या करना बन्दा के लिए कठिन कार्य था। तत खालसा और मुगलों की संयुक्त शक्ति के कारण बन्दा को लौहगढ़ के किले में शरण लेनी पड़ी। चार महीने के घेरे के बाद उसे विवश होकर अपने दुश्मनों के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा। मुगलों ने गुरदास नंगल के किले में रहने वाले 40 हजार से अधिक बेगुनाह मर्द, औरतों और बच्चों की निर्मम हत्या कर दी।

मुगल सम्राट के आदेश पर पंजाब के गर्वनर अब्दुल समन्द खां ने अपने पुत्र जाकरिया खां और 21 हजार सशस्त्र सैनिकों की निगरानी में बाबा बन्दा बहादुर को दिल्ली भेजा। बन्दा को एक पिंजरे में बंद किया गया था और उनके गले और हाथ-पांव की जंजीरों को इस पिंजरे के चारो ओर नंगी तलवारें लिए मुगल सेनापतियों ने थाम रखा था। इस जुलुस में 101 बैलगाड़ियों पर सात हजार सिखों के कटे हुए सिर रखे हुए थे जबकि 11 सौ सिख बन्दा के सैनिक कैदियों के रुप में इस जुलूस में शामिल थे।

मुगल इतिहासकार मिर्जा मोहम्मद हर्सी ने अपनी पुस्तक इबरतनामा में लिखा है कि हर शुक्रवार को नमाज के बाद 101 कैदियों को जत्थों के रुप में दिल्ली की कोतवाली के बाहर कत्लगाह के मैदान में लाया जाता था। काजी उन्हें इस्लाम कबूल करने या हत्या का फतवा सुनाते। इसके बाद उन्हें जल्लाद तलवारों से निर्ममतापूर्वक कत्ल कर देते। यह सिलसिला डेढ़ महीने तक चलता रहा। अपने सहयोगियों की हत्याओं को देखने के लिए बन्दा को एक पिंजरे में बंद करके कत्लगाह तक लाया जाता ताकि वह अपनी आंखों से इस दर्दनाक दृश्य को देख सकें।

बादशाह के आदेश पर तीन महीने तक बंदा और उसके 27 सेनापतियों को लालकिला में कैद रखा गया। इस्लाम कबूल करवाने के लिए कई हथकंडे का इस्तेमाल किया गया। जब सभी प्रयास विफल रहे तो जून माह में बन्दा की आंखों के सामने उसके एक-एक सेनापति की हत्या की जाने लगी। जब यह प्रयास भी विफल रहा तो 19 जून 1716 को बन्दा बहादुर को पिंजरे में बंद करके महरौली ले जाया गया। काजी ने इस्लाम कबूल करने का फतवा जारी किया जिसे बन्दा ने ठुकरा दिया।

बन्दा के मनोबल को तोड़ने के लिए उसके चार वर्षीय अबोध पुत्र अजय सिंह को उसके पास लाया गया और काजी ने बन्दा को निर्देश दिया कि वह अपने पुत्र को अपने हाथों से हत्या करे। जब बन्दा इसके लिए तैयार नहीं हुआ तो जल्लादों ने इस अबोध बालक का एक-एक अंग निर्ममतापूर्वक बन्दा की आंखों के सामने काट डाला। इस मासूम के धड़कते हुए दिल को सीना चीरकर बाहर निकाला गया और बन्दा के मुंह में जबरन ठूंस दिया गया। वीर बन्दा तब भी निर्विकार और शांत बने रहे। अगले दिन जल्लाद ने उनकी दोनों आंखों को तलवार से बाहर निकाल दिया। जब बन्दा टस से मस न हुआ तो उनका एक-एक अंग हर रोज काटा जाने लगा। अंत में 24 जून को उनका सिर काट कर उनकी हत्या कर दी गई। बन्दा न तो गिड़गिड़ाया और न उसने चीख पुकार मचाई। मुगलों की हर प्रताड़ना और जुल्म का उसने शांति से सामना किया और धर्म की रक्षा के लिए बलिदान हो गया।

'पाक, अपने देश में आजादी की चिन्ता करें' : संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार





By: एजेंसी | Last Updated: Sunday, 3 July 2016
http://abpnews.abplive.in
नई दिल्ली: ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ संगठन द्वारा नई दिल्ली में पाकिस्तान उच्चायुक्त को भेजे इफ्तार निमंत्रण को वापस लेने के बाद, संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ने आज पाकिस्तान से अपने देश में उठ रही आजादी की मांगों के बारे में चिंता करने और कश्मीर में हस्तक्षेप बंद करने के लिए कहा.उन्होंने यह आशा भी जताई कि एक ऐसा दिन आएगा जब पाकिस्तान की बेहतर समझ होगी और वह घृणा, कटुता और हिंसा फैलाना बंद करेगा तथा शांति एवं भाई चारे को गले लगाएगा.

कुमार ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ की मेजबानी में आयोजित इफ्तार पार्टी में बोल रहे थे. इस संगठन ने पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित की कश्मीर के पंपोर में मुठभेड़ में आठ CRPF जवानों के शहीद होने की घटना पर ‘‘असंवेदनशील’’ टिप्पणी के बाद बासित को भेजा न्यौता वापस ले लिया था. इंद्रेश कुमार इस संगठन के परामर्शक हैं.

 इंद्रेश कुमार ने कहा कि उन्हें आशा है कि एक ऐसा दिन आएगा जब भारत और दुनिया की मुस्लिम महिलाएं ‘तलाक’ के ‘गुनाह’ से मुक्त होंगी. उन्होंने यह टिप्पणी तीन बार तलाक पर जारी बहस के संदर्भ में की. उन्होंने कहा कि पवित्र कुरान के अनुसार, ईश्वर को यह स्वीकार्य नहीं है.

उन्होंने ने कहा, ‘‘यही कारण है कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने कहा कि कोई घृणा या कटुता नहीं होनी चाहिए. मैं प्रार्थना करूंगा कि उन सभी देशों की समझ बेहतर हो जो घृणा, कटुता और हिंसा फैलाते हैं, वे समृद्ध हों और अन्य को भी समृद्ध होने में मदद करें.’’

कुमार ने कहा, ‘‘मैंने कुछ महीने पहले मुझसे मिलने आए पाकिस्तान के कुछ लोगों से कहा कि आप इस बात पर संवाद क्यों नहीं कर सकते कि आप अपने आस पास के छोटे देशों की कैसे मदद कर रहे हैं और आपके पास गरीब और कमजोर लोगों की मदद के लिए क्या योजनाएं हैं.

इंद्रेश जी ने कहा " पाकिस्तान में पख्तून, बलूच, सिंध, बाल्टिस्तान, गिलगिट, मुजफ्फराबाद से आजादी की मांगें उठती हैं. सात स्वतंत्रता आंदोलन हैं जो पाकिस्तान अलग होना चाहते हैं.| "

 इंद्रेश कुमार ने कहा, ‘‘भारत ने कभी भी ऐसा धोखा देने की कोशिश नहीं की जैसा आपने कश्मीर पर किया. ऐसा भी दिन आएगा जब यह :पाकिस्तान सुधरेगा, विश्व में शांति और भाईचारा स्थापित होगा.

भारत मजबूत हो और विश्व हिंसा तथा दंगों से मुक्त हो.’’ इस संगठन ने इस्लामी देशों सहित करीब 61 देशों के राजनियकों को आमंत्रित किया था.

इसमें सीरिया, किर्गिस्तान, ईरान सहित अन्य देशों के राजनयिक और प्रतिनिधियों के अलावा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय तथा जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति भी मौजूद थे. इसमें केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी तथा जम्मू कश्मीर के मंत्री अब्दुल गनी कोली तथा लाल सिंह के अलावा बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के सदस्य भी उपस्थित रहे.