शनिवार, 17 दिसंबर 2016

नोटबंदी : सुप्रीम कोर्ट



15.44 लाख करोड़ रुपये के पुराने अमान्य नोटों
जब नोटबंदी की घोषणा की थी, तब 500 रुपये के 1,716.50 करोड़ और 1,000 रपये के 685.80 करोड़ नोट चलन में थे.



500 तथा 1000 के नोट बैन होने पर आया सुप्रीम कोर्ट का ये बड़ा फैसला…
November 18, 2016

भारत सरकार के 500 तथा 1000 के नोट बंद करने के खिलाफ कुछ लोगो ने याचिका दायर की थी जिस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया हैं | जहा एक तरफ नोटों के बैन करने के फैसले का लोगो ने दिल से स्वागत किया था वही दूसरी तरफ कुछ लोगो ने इस फैसले के खिलाफ गहरी आपत्ति भी उठाई थी, और सरकार के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में याचिका दायर कर दी थी | इन सबके बीच कोर्ट का यह फैसला सही समय पर आया हैं |

भारत सरकार के नोट बैन करने के खिलाफ याचिकाओ पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने भारत सरकार से जवाब माँगा हैं| जिसमे भारत सरकार से सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया हैं की जनता के लिए सुविधा के लिए क्या ठोस कदम उठाये गये हैं
केंद्र सरकार से रिपोर्ट तलब करते हुए पूछा हैं की जनता की परेशानी के हल के लिए सरकार क्या स्टेप ले रही हैं
क्या हुआ कोर्ट में-
सरकार के नोट बैन को खत्म करने के लिए  सुप्रीम कोर्ट में 4 अलग अलग लोगो द्वारा याचिका दायर की गयी थी | परन्तु जनता को हुई परेशानी के लिए ही कोर्ट ने रिपोर्ट की माग की हैं |आदिल अल्वी नाम के एक याचिकाकर्ता की और से बहस कपिल सिब्बल ने की थी |

क्या हैं याचिका में –
केंद्र सरकार के नोट बैन के खिलाफ इन याचिकाओ में कहा गया हैं आम जनता को कोई भी व्यापार करने तथा अन्य कई मामलो में उनके अधिकारों से वंछित रखा गया हैं | इस याचिका पर सुनवाई मुख्य न्यायधीश टी.एस. ठाकुर और न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ की पीठ ने की हैं | नोट बैन करने के मोदी सरकार के निर्णय के विरुद्ध 4 याचिकाए डाली गयी थी | पीएम मोदी ने 8 नवम्बर को मध्य रात्रि 500 तथा 1000 के नोटों पर प्रतिबन्ध के अपने फैसले को जनता के समक्ष रखा था |तथा यह भी बताया था की इन नोटों के स्थान पर 500 तथा 2000 के नोट चलेगे |

किस किस ने दायर की ये याचिकाए-
नोटबंदी के मोदी सरकार के फैसले के खिलाफ 4 याचिकाए डाली गयी हैं | इन याचिकाओं में दिल्ली के एडवोकेट विवेक नारायण शर्मा तथा संगम लाल पांडे नामक वयक्तियो ने अलग अलग याचिकाए दायर की हैं,तथा एम् मुथुकुमार के द्वारा एक याचिकादायर हुई हैं इसके अलावा एक याचिका आदिल अल्वी नाम के शख्श ने दायर की हैं | इन याचिकाओ पर सुनवाई की तारीख सुप्रीम कोर्ट ने 10 नवम्बर दिन मंगलवार रखी थी |

सरकार पर क्या आरोप लगाए-

मोदी सरकार के खिलाफ दायर याचिकाओं में कहा गया की मोदी सरकार के नोट बैन करने के अचानक से लिए गये फैसले के कारण सामान्य जन जीवन अस्त वयस्त हो गया हैं, लोगो को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा हैं | इसके लिए आर्थिक मामलो के विभागों से जुडी अधिसूचनाओ को रद्द कर दिया जाए अथवा इसको थोड़े समय के लिए स्थागित कर देना चाहिए |

क्या कहा सरकार ने-

एक कैविएट याचिका केंद्र सरकार की तरफ से भी सुप्रीम कोर्ट में डाली गयी हैं जिसके अनुसार नोटों पर लगे बैन के खिलाफ दायर की गयी याचिकाओं पर पीठ सुनवाई करती हैं  या इसके लिए कोई बभी आदेश पारित करती हैं उससे पूर्व केंद्र सरकार का भी पक्ष सुनना चाहिए |
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नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट के 10 सवाल
16 दिसंबर 2016

सर्वोच्च न्यायालय ने नोटबंदी मामले में कुछ सवाल तय किए हैं. मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अगुआई में जजों की संवैधानिक पीठ इन सवालों के जवाब देगी.

सवाल हैंः
1. क्या आठ नंवबर की विमुद्रीकरण की अधिसूचना आरबीआई अधिनियम के अनुसार है?
2. क्या आरबीआई अधिनियम की धारा 26 (2) जिसके तहत आठ नवंबर की अधिसूचना जारी की गई, संविधान सम्मत है?
3. क्या आठ नवंबर की अधिसूचना संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 के विपरीत है?
4. क्या वैधानिक राशि को निकालने पर प्रतिबंध अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 का उल्लंघन है?
5. क्या आठ नवंबर की अधिसूचना को प्रकियागत और तार्किक तरीके से लागू नहीं किया गया?
6. क्या आठ नवंबर की अधिसूचना और उसके बाद की स्थिति संविधान के अनुच्छेद 300 ए (सम्पत्ति का अधिकार) का उल्लंघन है?
7. क्या ज़िला सहकारी बैंकों को अपने यहां जमा राशि को निकालने और बदलने से रोकना 'उनके खिलाफ़ भेदभाव' है?
8. क्या वित्तीय/आर्थिक नीति संबंधी मामलों में न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश है?
9. क्या विमुद्रीकरण का फैसला सिर्फ संसद की मंज़ूरी से लिया जा सकता है?
10. क्या संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत राजनीतिक दलों द्वारा दाखिल की गईं रिट याचिकाओं पर विचार किया जा सकता है.

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नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश से इनकार
अदालत ने मांग पर ध्यान देने की जिम्मेवारी केंद्र सरकार पर छोड़ दी
IANS | Dec 16, 2016

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मेडिकल सेवा समेत सभी आवश्यक सेवाओं के लिए अमान्य नोटों के उपयोग की छूट अवधि में विस्तार देने के लिए किसी भी तरह का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया और मांग पर ध्यान देने की जिम्मेवारी केंद्र सरकार पर छोड़ दी. अदालत ने कहा कि इस आधार पर सरकार को निर्देश देने की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन कहा कि जहां तक संभव हो सप्ताह में 24 हजार रुपये निकालने की मंजूरी की प्रतिबद्धता का सरकार सम्मान करे.
केंद्र सरकार को व्याप्त स्थिति के लिए पर्याप्त उत्तरदायी और संवेदनशील मानते हुए मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की पीठ ने कहा कि सरकार विचार करेगी और लोगों की हो रही परेशानी दूर करने के लिए समय-समय पर समुचित फैसला लेगी.
महान्यायवादी मुकुल रोहतगी के बयान का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि समय अभी तक खत्म नहीं हुआ है और सरकार अपनी पूरी योग्यता और क्षमता से काम कर रही है. रोहतगी ने 31 दिसंबर तक चीजें व्यवस्थित होने की बात कही.
अदालत ने सरकार को समय-समय पर अपने निर्णयों की समीक्षा करने की बात कही. इसके साथ ही रोहतगी की ओर से दी गई इस जानकारी को संज्ञान में लिया कि अमान्य करार दिए गए पुराने नोटों की कुल मात्रा का 40 प्रतिशत हिस्सा नए नोटों से बदला जा चुका है.
रोहतगी ने गुरुवार को शीर्ष अदालत से कहा था कि नए नोटों में 5 लाख करोड़ रुपये की राशि चलन में आ गईं हैं और छोटे मूल्यों के वर्तमान नोटों के साथ कुल 7.5 लाख करोड़ रुपये मूल्य की राशि प्रचलन में है.
याचिकाओं को पांच सदस्यीय पीठ को भेजा
अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाओं की खेप को पांच सदस्यीय पीठ में भेज दिया. याचिकाओं में गत 8 नवंबर को सरकार के फैसले और इसके कारण उत्पन्न मुद्दों को चुनौती दी गई है.
अदालत ने पांच सदस्यीय पीठ की सुनवाई के लिए नौ प्रश्न तैयार किए हैं जिनमें नोटबंदी के फैसले की वैधता, क्या खाताधारकों को उनके खाता से राशि निकालने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है और क्या अदालतें राजकोषीय नीति पर निर्णय कर सकती हैं, आदि शामिल हैं.
सर्वोच्च न्यायालय ने नोटबंदी के खिलाफ विभिन्न उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों में दायर याचिकाओं पर चल रही सुनवाई पर भी रोक लगा दी और निर्देश दिया कि गत 8 नवंबर को नोटबंदी के फैसले या इससे संबंधित मुद्दों को चुनौती देने वाली किसी भी याचिका पर सुनवाई सिर्फ शीर्ष अदालत में हो सकती है.
इस तरह सर्वोच्च न्यायालय ने देश की सभी अदालतों को नोटबंदी को चुनौती देने वाली किसी भी याचिका को स्वीकार करने से रोक दिया है.

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