बुधवार, 31 मई 2017

गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए : राजस्थान हाई कोर्ट





राजस्थान हाई कोर्ट की सिफ़ारिश, 
गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए ; 
जज ने फ़ैसले को बताया 'आत्मा की आवाज़'
Last Updated: Wednesday, May 31, 2017

जयपुर: राजस्थान उच्च न्यायालय ने बुधवार (31 मई) को राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह केंद्र सरकार के साथ समन्वय में गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के लिये आवश्यक कदम उठाये. न्यायमूर्ति महेश चंद शर्मा की एकल पीठ ने राज्य के मुख्य सचिव और महाधिवक्ता को गाय का कानूनी संरक्षक भी नियुक्त किया. आज (बुधवार, 31 मई) ही सेवानिवृत्त हो रहे न्यायधीश ने फैसला सुनाने के बाद कहा कि इस मामले पर उनका फैसला ‘आत्मा की आवाज’ है और ‘गौ हत्या से जघन्य कोई अपराध नहीं’.

अपने 145 पन्नों के आदेश में उन्होंने कहा, ‘नेपाल एक हिंदू राष्ट्र है और उसने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया है. भारत मुख्य रूप से कृषिप्रधान देश है जो पशुपालन पर आधारित है. अनुच्छेद 48 और 51ए (जी) के मुताबिक राज्य सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि उसे इस देश में गाय की कानूनी पहचान के लिये कदम उठाना चाहिये.’ संविधान का अनुच्छेद जहां कहता है कि राज्य को नस्लों के संरक्षण और सुधार और गायों, बछड़ों और दूसरे दुधारू तथा अन्य मवेशियों के वध को निषेध करने के लिये कदम उठाने चाहिये. अनुच्छेद 51ए(जी) प्राकृतिक वातावरण के संरक्षण और जीवित प्राणियों के प्रति दया के बारे में बात करता है.

न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा, ‘सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि उसे गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करना चाहिये और इस उद्देश्य के लिये राज्य के मुख्य सचिव और महाधिवक्ता को गायों का कानूनी संरक्षक घोषित किया जाता है.’ अदालत ने हिंगोनिया गौशाला मामले की सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिया. पिछले साल जयपुर की सरकारी गौशाला में सौ से ज्यादा गायों की मौत हो गयी थी. पीठ ने किसी भी शख्स या लोगों के समूह को गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के लिये अदालत में जनहित याचिका दायर करने की स्वतंत्रता भी दी है.

यह निर्देश ऐसे समय आया है जब कई राज्य केंद्र सरकार के मवेशियों के वाणिज्यिक उपयोग के लिये वध करने पर प्रतिबंध के फैसले का विरोध कर रहे हैं. मद्रास उच्च न्यायालय ने इस मामले में केंद्र सरकार की अधिसूचना पर चार हफ्ते की रोक लगा दी है. आदेश जारी करने के बाद अदालत के बाहर पत्रकारों से बात करते हुये न्यायमूर्ति शर्मा ने मोरों के समागम का विशिष्ट सिद्धांत भी पेश किया.

अपने फैसले के संदर्भ में उन्होंने कहा, ‘मोर में भी अपना गुण होता है. वह आजीवन अविवाहित रहता है. वह मोरनी के साथ समागम नहीं करता. मोरनी मोर के आंसुओं से गर्भवती होती है. तब एक मोर या मोरनी का जन्म होता है, भगवान कृष्ण ने पक्षियों के ब्रह्मचर्य के लिये मोर के पंख का इस्तेमाल किया था.’ राष्ट्रीय पशु के दर्जे पर अपने फैसले के बारे में और जानकारी देते हुये न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा,
‘कानून का उदय धर्म से हुआ है. धर्म कानून से नहीं आया है.’

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