पोस्ट

मई 18, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नारद मुनि जयंती : देवर्षि नारद

इमेज
* देवर्षि नारद * सहबद्धता हिन्दू देवता, देवर्षि, मुनि * मंत्र नारायण नारायण * शस्त्र वीणा * वाहन त्रैलोक्य * संवाद • सम्पादन           नारद मुनि, हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रो मे से एक है। उन्होने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों मे से एक माने जाते है। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इसी कारण सभी युगों में, सब लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारदजी का सदा से प्रवेश रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन् दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर दिया है। समय-समय पर सभी ने उनसे परामर्श लिया है। श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय के २६वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है - देवर्षीणाम्चनारद:। देवर्षियों में मैं नारद हूं। श्रीमद्भागवत महापुराणका कथन है, सृष्टि में भगवान ने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वततंत्र(जिसे <न् द्धह्मद्गद्घ="द्वड्डद्बद्य ह्लश्र

आदि पत्रकार : देवर्षि नारद जी

इमेज
- अरविन्द सिसोदिया  कोटा में सृष्टि के प्रथम पत्रकार देवर्षि नारद जी  की जयंती के अवसर पर , १९ मई गुरुवार को सायं ६ बजे मानव विकास भवन , विश्व हिन्दू परिषद् कार्यालय में राष्ट्र चेतना अभियान  समिति के द्वारा  सी  ए  डी रोड पर आयोजित की गई है | सभी व्यक्ती इस में आ सकते हैं |  देवर्षि नारद जी सिर्फ ब्रह्माण्ड की ईश्वरीय व्यवस्था के सूचना तंत्र मात्र ही नहीं थे बल्कि वे बहुत सी समस्याओं का निदान भी करवाते थे | कलयुग में दुःखी  प्राणियों के लिए श्रीमद भागवत के माध्यम से कष्टों के निवारण और भगवान की भक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाले  देवर्षि नारद जी ही हैं !  हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रो मे से एक है। उन्होने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों मे से एक माने जाते है। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इसी कारण सभी युगों में, सब लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारदजी का सदा से प्रवेश रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन्