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सितंबर 14, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पोलोग्राफी टेस्ट अनुमति की निश्चित पद्यती बनें: भंवरी देवी को पुलिस बचाये..

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-अरविन्द सीसौदिया,कोटा ,राजस्थान। आज 14 सितम्बर 2011 को, राजस्थान केसरी ( पंजाब केसरी ) के अंक में प्रकाशित , सच जानने के लिये किये जाने वाले पोलोग्राफी टेस्ट के दो प्रकरणों को पढने का अवसर मिला, पहला मामला जोधपुर का है,  मंत्री-विधायक चर्चित सीडी प्रकरण में  बहुचर्चित ए एन एम भंबरी देवी के अपहरण के मामले में गिरिफतार आरोपी टेकेदार सोहनलाल विश्नोई से सच जानने के लिये पुलिस की पोलोग्रफी टेस्ट का आवेदन अदालत ने निरस्त कर दिया । दूसरी घटना सवाई माधेपुर की है, जहां एस एच ओ फूल मोहम्मद की हत्या के प्रकरण में गिरिफतार 19 आरोपीओं की पोलोग्राफी टेस्ट की इजाजत अदालत ने दे दी । फूल मोहम्मद की हत्या हो चुकी है। वहां जान जोखिम का प्रश्न नहीं है। मगर भंवरी देवी की जान जोखिम में है उसका अपहरण हुआ है। वह भी प्रोफेशन अपहरण कर्ताओं के द्वारा अपहरण करवाया जाना बताया जा रहा है। मेरा मानना है कि इस प्रकरण में पोलोग्रफी की इजाजत मिलनी चाहिये थी।  अर्थात सर्वोच्च न्यायालय में पुलिस को तुरंत जाकर ,भंवरी देवी की जान बचाने बात सामनें रख कर,पोलोग्रफी की इजाजत मांगनी चाहिये । तथा एक सुनिश्चित और संवेदनशाी

अपनी भाषा का मूल अधिकार नागरिक को मिले....

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-अरविन्द सीसौदिया,कोटा ,राजस्थान। सच यह है कि देश में अपनी भाषा का मूल अधिकार नागरिक को मिले इस हेतु नये जनांदोलन की जरूरत हे। आम आदमी को अपनी भाषा के अधिकार की बात अब समझ आ रही है कि यह होना चाहिये था।सरदार वल्लभ भाई पटेल चाहते थे कि भाषा का अधिकार मूल अधिकारों में शामिल किया जाये । मगर तब हिन्दी , अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के झगडे इस तरह हावी हो गये थे  िकइस पर उतनी तन्मयता से विचार ही नहीं हो पाया । या हालात तब की राजनीति ने इस तरह उलझाा दिये कि संविधान में नागरिकों को भाषा का अधिकार नहीं मिल सका । इसी का फायदा विदेशी भाषा उठा रही है। विदेशी बहु राष्ट्रीय कम्पनियों के फायदें में भारतीय वातावरण कैसे बना रहक इसी में हमारी सरकारें लगीं रहतीं हैं। सो हिन्दी के सामने अनेकानेक वे कठिनाईयां खडी करदीं गईं जो हैं ही नहीं । । आम आदमी की व्यथा... एक चिकित्सक अंग्रेजी में पर्चा लिखता है तो मरीज यह नहीं समझ पाता कि उसे बीमारी क्या है ? जांच की स्थिती क्या है? शरीर में कमी क्या है? दवाईयों या इलाज क्या लिखा गया है? परेज क्या रखने हैं? केन्द्र और राज्य सरकार स्तर की गैर जिम्मेवारी से पूरे

रिस्ते तो हैं, मगर उनके रस को कोई ले गया !

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! -अरविन्द सीसौदिया , कोटा , राजस्थान अब तो रिस्तों की रात आ गई, ढल चुका दिन,ढल चुकी शाम.., प्रतिबद्धताओं की गिरती साख आ गई! क्योंकि अब पश्चिम से पूरब की तरफ.., तूफानों की , आंधियों की,बयार आगई..! ...1... कहां गये शब्दों के भरोषे...? कहां हैं वे जो इन पर मरते मिटते थे..?? ढूंढती है धरती कसमों को आसमान में.., वायदों के वे सुनहरों स्वपनों की कंदराओं में..!! रिस्ते तो हैं मगर उनके रस को कोई ले गया !! ...2... नहीं मिलता विश्वास, क्यों कि अब विष का वास है। नहीं मिलती आस्था, क्योंकि आघात ही आघात है ।। नहीं मिलता समर्पण,अब स्वंय के सुख की चाह है। काश इन शब्दों को सुना न होता ये ”रिश्ते“.... न नींद खराब होती न ख्आव खराब होते..!! ...3... वह जमाना गया जब कहते थे हम.., तेरी हसरत मेरी तमन्ना है, तेरे इरादे मेरी मंजिल है, तू है तो जहां है,वर्ना बेजार मुका है ! ये रिस्ते तेरी भी तम्मनायें अब बेकार हैं!!  ...4... प्यार की तो बात ही नहीं , अपनेपन का साथ नहीं, तरसते , चिंताओं के धुधलके.. रिस्ते तेरी यही तो सौगात है । 000000000