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मार्च 24, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भावी वर के लिए,गणगौर पूजा ....

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म्हाने पूजन द्यो गणगौर परंपराएं हमें स्पंदित करती हैं हमारे वजूद को पुख्ता करती हैं... राजस्थान केवल रेखाओं में बंटा जमीन का टुकड़ा भर नहीं है, बल्कि हमारी अमीर विरासत का हिस्सा है। यहां परपंराएं अब भी सांसें लेती हैं। ऎसी ही एक रवायत आज के दिन की भी है। आज गणगौर है। शिव-पार्वती की जोडे से पूजा का दिन। मनचाहा पति पाने के लिए व्रत रखने का दिन। राजस्थानी परपंराओं को कलमबद्ध करने वाली पद्मश्री लक्ष्मीकुमारी चूंडावत की कलम से सवारी गणगौर की... पुरूष वर्ग तो धूलेरी के दिन मस्त हुआ गली-गली में नाचता फिरता है और स्त्रीवर्ग समाज के आगे तो यह धूलेरी नए-नए त्योहारों की श्ृंखला लिए आती है। बड़े सवेरे ही होली की राख को गाती-जाती çस्त्रयां अपने घर लाती हैं। मिट्टी मिलाकर उससे सोलह पिंडियां बनाती हैं, शंकर-पार्वती बनाकर उनकी पूजा करना प्रारम्भ कर देती हैं। सोलह दिन तक बराबर इनकी पूजा की जाती है। कुंआरी कन्याएं इनकी नियमित रूप से पूजा करती हैं। इस पूजा के पीछे यह भावना रहती है कि शंकर उन्हें अपना मनचाहा वर देंगे। जिस प्रकार पार्वती को उसकी इच्छानुसार वर मिला वैसा ही उन्हें प्राप्त होगा। किसी स्

गणगौर तीज करें , शिव-पार्वती का पूजन

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25 फरवरी 2012 को.... गणगौर तीज  करें :  शिव-पार्वती का पूजन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को गणगौर तीज का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन विशेष रूप से माता पार्वती व भगवान शंकर की पूजा की जाती है। इन्हें ईसर-गौर भी कहा जाता है जिसका अर्थ है(ईश्वर-गौरी)। यह कुंवारी और विवाहिता स्त्रियों का त्योहार है। इस बार यह पर्व 24 मार्च, रविवार को है। यह पर्व 16 दिनों तक मनाया जाता है। गणगौर मुख्य रूप से राजस्थान का लोकपर्व है लेकिन देश के अन्य हिस्सों में भी इसे मनाया जाता है। राजस्थान में कन्याओं के लिए विवाह के बाद प्रथम चैत्र शुक्ल तृतीया तक गणगौर का पूजन आवश्यक माना जाता है। वे चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के दिन होलिकादहन की भस्म और तालाब की मिट्टी से ईसर-गौर(शंकर-पार्वती) की प्रतिमाएं बनाती हैं। 16 दिनों तक माता पार्वती के गीत गाए जाते हैं। कुंवारी कन्याएं उत्तर वर के लिए तथा विवाहिता महिलाएं सौभाग्य की कामना के लिए इनका पूजन करती हैं। चैत्र शुक्ल तृतीया को सुबह पूजा के बाद तालाब, सरोवर, बावड़ी या कुएं पर जाकर मंगलगीत गाते हुए गणगौर(ईसर-गौर) की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। गणगौर का विसर्

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना : नमस्ते सदा वत्सले

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नमस्ते सदा वत्सले, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना है। यह प्रार्थना संस्कृत में है। प्रार्थना की अन्तिम पंक्ति हिन्दी में है। संघ की शाखा या अन्य कार्यक्रमों में इस प्रार्थना को अनिवार्यतः गाया जाता है और ध्वज के सम्मुख नमन किया जाता है। अनेक भारतीय भाषाओं में ,  राष्ट्रीय स्यंवसेवक संघ की प्रार्थना प्रार्थना / देवनागरी नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् । महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।। प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता इमे सादरं त्वां नमामो वयम् त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये । अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत् श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।२।। समुत्कर्षनिःश्रेयस्यैकमुग्रं परं साधनं नाम वीरव्रतम् तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् । विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर् विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् । परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।। भारत माता की जय ।।