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कृष्ण भजन : हम प्रेम दीवानी हैं, वो प्रेम दीवाना।

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विनोद अग्रवाल कृष्ण भजन हम प्रेम दीवानी हैं, वो प्रेम दीवाना। ऐ उधो हमे ज्ञान की पोथी ना सुनाना॥ तन मन जीवन श्याम का, श्याम हम्मर काम। रोम रोम में राम रहा, वो मतवाला श्याम। इस तन में अब योग नहीं कोई ठिकाना॥ उधो इन असुवन को हरी सनमुख ले जाओ। पूछे हरी कुशल तो चरणों में दीओ चढाओ । कहिओ जी इस प्रेम का यह तुच्छ नजराना॥ प्रेम डोर से बंध रहा जीवन का संयोग। सुमिरन में डूबी रहें, यही हमारा योग। कानो में रहे गूंजता वंशी का तराना॥ इक दिन नयन के निकट रहते थे आठों याम। अब बैठे हमे विसार के, वो निर्मोही श्याम। दीपक वो ज़माना था, और यह भी यमाना॥ सब तंत्र और मन्त्र क्रिया विधि से, मुरली ध्वनी प्रयोग बड़ा हैं हरी कृष्ण सभी सत वयंजन में, अधरामृत मोहन भोग बड़ा है जग में वही औषधि है ही नहीं, सब रोगों में प्रेम का रोग बड़ा है जिसे योगी पतंजलि ने भी रचा, उस योग से कृष्ण वियोग बड़ा है प्रेम प्रति मापे ज्ञान साधन और योग, रंग जोनसो चदेगो सोई फीको पड़ी जावेगो धीरता अधीता को धारण करेगी रूप, त्याग अनुरागी के अंग भरी जावेगो ध्यान धारणा की खबर पड़ेगी कब, नयन के कौरन बिंदु झारी जाव