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जब नेता बेईमान हो जाता है - अरविन्द सीसौदिया

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जब नेता बेईमान हो जाता है, - अरविन्द सीसौदिया जब नेता बेईमान हो जाता है, नीति मर जाती है, न्याय मर जाता है, जिधर देखो उधर शैतान नजर आता है, विश्वास में विष, आशीर्वाद में आघात, हमदर्दी में दुखः-दर्द, मिठास में मधुमेह, पावनता में महापतन और..., ईमान में महाबेईमान घटित हो जाता है। (1) भगवान भी जिसके भय से कांपने लगता है, राष्ट्रधर्म प्राण बचाकर भागने लगता है, सूरज भी पश्चिम से उगता है यारों, जब राजसिंहासन बेईमान हो जाता है...! लोगों, जीवन नर्क बन जाता है बातों की नकाबों में, इन शैतानों में, सम्पत्ति की होड़ - धनलूट की दौड़ , बीस साल पहले, जिस पर कोड़ी भी नहीं थी यारों, वह करोपतियों में भी सिरमौर नजर आता है। (2) गले में महानता के उसूल टांगे, वाणी में संतों की सम्प्रभुता की बांगें, जो मिले उसे लूट लेना हैं मकशद, अपनी तो हवस मिट ही जायेगी, असल इंतजाम तो, अगली अस्सी पीढ़ी का कर जाना है यारों...! (3) जो मिले, जहां मिले, जितना मिले,सब स्वीकार है, भिष्ठा में मिले, मदिरा में मिले, मंदिर में मिले.., किसी की घर गृहस्थी और जायदाद में मिले, किसी के सुख-सुकून और स