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अमृतादेवी : हरे वृक्षों को बचाने के लिये, सपरिवार बलिदान

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  ‘सर साठे रुंख रहे तो भी सस्तो जाण’ अमृतादेवी हरे वृक्षों को बचाने के लिये बलिदान शहीद अमृता देवी बिश्रोई ने हरे वृक्षों की रक्षा के लिए अपने पूरे परिवार को बलिदान कर दिया।  इस परिवार के अलावा बिश्रोई समाज के 363 अन्य महिला पुरूष भी शहीद हुए। जोधपुर के समीप खेजड़ी गांव में अपने राजा के आदेश पर महामन्त्री गिरधर ने हरे पेड़ों को काटने पहुंचा तो अमृता देवी बिश्रोई हरे पेड़ से लिपट गई और अपनी गर्दन कटवा दी, उसके बाद उसकी 2 पुत्रियों फिर पति ने भी हरे पेड़ों को बचाने के लिए अपना बलिदान दे दिया। उसी तरह 363 बिश्रोई समुदाय के लोगों ने अपना बलिदान दे दिया।   http://hi.wikipedia.org पर्यावरण संरक्षण के लिए मर मिटने की इस जाति ने ऐसी मिसाल कायम की है जो इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। सन 1730 में जोधपुर के पास खेजडली गांव में राजा की सेना से खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा करते बिश्नोई समाज के 363 स्त्री-पुरुषों को पेड़ों के साथ ही काट डाला था। इस घटना में एक महिला अमृता देवी के नेतृत्व में 83 गांवों के 363 बिश्नोई लोग पेड़ों को काटने से बचाने के लिए उससे लिपट गए थे। इनम

कहां जाएं पाकिस्तानी हिंदू ?

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कहां जाएं पाकिस्तानी हिंदू ? पाकिस्तानी हिंदू जान बचाकर इस उम्मीद से भारत आए थे कि यहां उनका जीवन सुखद होगा. मगर, भारत में न तो उन्हें नागरिकता मिल रही है और न ही शरणार्थी का दर्जा. मुसीबतों के पहाड़ तले जिंदगी को खींच रहे पाकिस्तानी हिंदुओं की दर्द भरी दास्तां बयां करती अदिति प्रसाद की विस्तृत रिपोर्ट और प्रमोद पुष्करणा के फोटो अदिति प्रसाद | Issue Dated: सितंबर 30, 2012the sunday indian ki report उनका धर्म ही उनके लिए सबसे बड़ा अभिशाप है. इस धर्म ने उनसे एक ऐसे देश में जीने का अधिकार छीन लिया जिसकी नींव ही धर्म के नाम पर रखी गई. बलात्कार, अपहरण, फिरौती और जबरन धर्म परिवर्तन से तंग आकर पाकिस्तानी हिंदू धर्मनिरपेक्ष भारत में पनाह लेने चले आए. मगर लगता है कि इस हिंदू बहुल राष्ट्र में भी उनका धर्म ही उन्हें दुश्वारी और दुराचार का शिकार बना रहा है. अपनी इज्जत और जान बचाने के लिए भारत आए पाकिस्तानी हिंदुओं की यही कहानी है. डेविड पिनॉल्ट ने अपनी किताब 'नोट्स फ्रॉम द फॉच्र्यून टेलिंग पैरट: इस्लाम एंड द स्ट्रगल फॉर रिलीजियस प्लूरलिज्म इन पाकिस्तान' में 'पाकिस्तान में हिं

श्री गणपतिजी की कथा

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श्री गणपतिजी की कथा - अरविन्द सीसौदिया         भारतीय संस्कृति में निहित भक्ति एवं शक्ति का पर्व अनन्त चतुर्दशी महोत्सव, मूलतः दो प्रमुख पर्वों के मध्य मनाया जाता है। यह गणेश जी के जन्मोत्सव ‘गणेश चतुर्थी‘‘ से  प्रारंभ हो कर ‘‘श्री अनन्त चतुर्दशी‘‘  तक के 10-11 दिन की अवधि में मनाया जाता है। इस दौरान गणेश चतुर्थी को घरों में गणेश जी की प्रतिमाओं तथा मोहल्लों में झांकियो की स्थापना होती है। नित्य प्रातः सायं पूजा अर्चना एवं आरती होती है, भक्ति संध्याएं आयोजित की जाती हैं तथा श्री अनन्त चतुर्दशी के दिन इन गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। अनेकानेक स्थानों पर यह विसर्जन शोभा यात्रा के रूप में सम्पन्न होता है। कोटा में भी इसी तरह श्री अनन्त चतुर्दशी महोत्सव आयोजन होता है एवं शोभा यात्रा के रूप में सम्पन्न होता है। श्री गणेश जन्मोत्सव         ऐसा माना जाता है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (चौथ) को आदि शक्ति, पंच देवों में प्रथम पूज्य, गणपति का जन्म शिव-पार्वती की द्वितीय संतान के रूप में हुआ तथा इसी कारण यह दिन धार्मिक रूप से ‘‘गणेश चतुर्थी व्रत‘‘ के रूप में सम्पूर्ण देश में मनाया जा