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आजादी या धोखा

2G घोटाला 1.76 लाख करोड़, CWG घोटाला 70 हजार करोड़, कोल घोटाला 10.26 लाख करोड़, सैन्य हेलीकॉप्टर घोटाला याद रहे, लोकपाल याद रहे, CBI का दुरुपयोग याद रहे, शहीद राजबाला याद रहे, डीजल, पेट्रोल और मंहगाई याद रहे, सैनिकोँ के कटे सर याद रहे और फिर अजमेर मेँ पाक पीएम का लंच याद रहे, FDI याद रहे, लद्दाख की घुसपैठ याद रहे, असम, हैदराबाद और बंगाल मेँ हिन्दुओँ का कत्लेआम याद रहे, सोनिया का खासमखास अकबरुद्दीन याद रहे, हिन्दुओँ को आतंकवादी कहना याद रहे, और अंत मेँ अपना शेर सरबजीत सिँह याद रहे.... तब ही अपने को जागरुक नागरिक समझेँ। याद रखेँ आपकी कमजोर याददाश्त ही कांग्रेस की संजीवनी है। Saadda HAQ! Etthey RAKH 05-05-2013 Facebook http://www.facebook.com आजादी नहीं धोखा है, देश का समझौता है शासन नहीं शासक बदला है, गोरा नहीं अब काला है 15 अगस्त 1947 को देश आजाद नहीं हुआ तो हर वर्ष क्यों ख़ुशी मनाई जाती है ? क्यों भारतवासियों के साथ भद्दा मजाक किया जा रहा है l इस सन्दर्भ में निम्नलिखित तथ्यों को जानें .... : 1. भारत को सत्ता हस्तांतरण 14-15 अगस्त 1947 को गुप्त दस्तावेज के तहत, जो की 1999 त

100 वर्षों में भारत के कितनी बार टुकडे किये गए

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क्या आप जानते हैं पिछले 100 वर्षों में भारत के कितनी बार टुकडे किये गए और उसके पीछे किसकी सरकार और सोच रही है ...... सन 1911 में भारत से श्री लंका अलग हुआ ,जिसको तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं का समर्थन प्राप्त था सन 1947 में भारत से बर्मा -म्यांमार अलग हुआ , सन 1947 में भारत से पाकिस्तान अलग हुआ । कारण कांग्रेस ही थी सन 1948 में भारत से आज़ाद कश्मीर काटकर अलग कर दिया गया और नेहरु जी की नीतियों ने सरदार पटेल के हाथ बांधे रखे सन 1950 में भारत से तिब्बत को काटकर अलग कर दिया गया और नेताओं ने मुह बंद रखा सन 1954 में बेरुबादी को काट कर अलग कर दिया गया सन 1957 में चीन ने भारत के कुछ हिस्से हड़प लिए और नेहरु ने कहा की यह घास फूंस वाली जगह थी सन 1962 में चीन ने अक्साई चीन का 62000 वर्ग मिल क्षेत्र भारत से छीन लिया ,और नेहरु जी हिंदी चीनी भाई-भाई कहते रहे । जब हमारी सेनाओं ने चीन से लड़ाई लड़ने का निर्णय किया और कुछ मोर्चों पर जीत की स्थिति में थी तो इन्ही नेहरु ने सीज फायर करा दिया सन 1963 में टेबल आइलैंड पर बर्मा ने कब्ज़ा कर लिया ,और हम खामोश रहे । वहां पर म्यामांर ने हव

नाथद्वारा : पुष्टि मार्ग के प्रवर्तक महाप्रभु वल्लभाचार्य

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http://epaper.bhaskar.com/Kota पुष्टि मार्ग के प्रवर्तक महाप्रभु वल्लभाचार्य - पं. बाबूलाल जोशी ॥जब तुलसी के मानस, मीरा की भक्ति, कबीर के पद व सूर के गीतों द्वारा भक्ति आंदोलन मुखर हो उठा था। तब महाप्रभु वल्लभाचार्य ने पुष्टि मार्ग को प्रशस्त किया। जानते हैं उनकी महिमा को। चौरासी शिष्यगणों को किया मनोनीत ऐसे विश्व विख्यात हुआ नाथद्वारा  बाल मनोहारी सिद्धांतों में ब्रह्म, जीव, जगत, माया, आविर्भाव-तीरोर्भाव तथा ब्रह्म संबंधों की जानकारियां प्रदान कराने वाला वल्लभाचार्य अरावली की श्रेणियों के बीच उदयपुर राजस्थान से 50 किलोमीटर दूर विक्रम संवत् 1564 में श्रीनाथ मुख्य पीठ के रूप में स्थापित किया। श्री वल्लभाचार्य ने श्रीनाथ मंदिर की स्थापना से पहले संपूर्ण पृथ्वी की न केवल परिक्रमा की अपितु भारतभर में चौरासी बैठकों द्वारा चौरासी शिष्यगणों को मनोनीत किया। वर्षभर में सृष्टि आरंभ दिवस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत्सर उत्सव, गणगौर, वैशाख कृष्ण एकादशी, अक्षय तृतीया, नरसिंह जयंती, स्नान यात्रा, वृत यात्रा, श्रावण शुक्ल एकादशी, पवित्रा एकादशी, जन्माष्टमी, नंद महोत्सव, दशहरा, शरद पू

हल्दीघाटी युद्ध : त्याग, बलिदान और शौर्य

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हल्दीघाटी : -18 जून 1576 को महाराणा प्रताप और अकबर के बीच हुए ऐतिहासिक युद्ध की गवाह है हल्दीघाटी ! या माटी हल्दीघाटी री लागे केसर और चन्दन हे , माथा पर तिलक करो इणरो इण धरती ने नित वंदन है ! विश्व इतिहास में बहुत कम ही ऐसे युद्धस्थल हैं जो हल्दी घाटी की तरह प्रसिद्ध हुए हों। यूं देखा जाए तो हल्दी घाटी का युद्ध न तो बहुत लम्बा चला और न ही कोई विशेष प्रलयंकारी था। भारतीय इतिहास में इससे पूर्व हुए तराईन, खानवा और पानीपत के युद्ध ऐतिहासिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण एवं समय को मोड़ देने वाले थे। किन्तु जहां तक शौर्य, पराक्रम और श्रद्धा का प्रश्न है, हल्दी घाटी का युद्ध इन सबसे आगे है। प्रश्न उठता है कि आखिर इस युद्ध में ऐसी क्या बात थी जिसके कारण यह चार सौ अट्ठाईस वर्ष के पश्चात् भी हम सभी के लिए प्रेरणा का प्रतीक बना हुआ है। इस युद्ध के दिवस ( इस वर्ष 18 जून) पर उन बिन्दुओं का अध्ययन करना समीचीन होगा जिनके फलस्वरूप हल्दी घाटी की माटी हम सभी के लिए चंदन बन गई। हल्दी घाटी का युद्ध मात्र पांच घण्टे का था। मगर इस अल्प समय में महाराणा प्रताप के स्वातन्त्र्य प्रेम, झाला माना