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लिव इन रिलेशनशिप : जनहित के विरुद्ध विरूद्ध

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फैसला है या शोषण की मान्यता ? - स्मृति जोशी अदालत ने पिछले दिनों एक फैसला दिया और सारे देश में ऐसा हल्ला मचा जैसे इस एक फैसले मात्र से हम सब असभ्य हो जाएँगे। 'हम' सब जो नहीं सोचते लिव इन रिलेशन जैसी बातों के बारे में, 'हम' जो डरते हैं परंपरा और मर्यादा के नाम पर खुलेआम मिलने से। शोर देख-सुन कर लगा जैसे हम अपने आप पर ही नियंत्रण खो देगें और चल पड़ेंगे अपनी पसंद का 'बिना विवाह करने वाला साथी' ढूँढने। बात बेहद साधारण स‍ी है कि एक पुरुष या स्त्री, स्वतंत्र रूप से जन्म लेता है। परिवार में उसे जीवन के मूल्यों और संस्कारों की शिक्षा मिलती है। घर के सदस्यों के आचरण को देखकर वह अपनी समझ में विस्तार लाता है। जरूरत पड़ने पर आवश्यक संशोधन करता है। अच्छे और बुरे की तमीज उसे इसी परिवार से मिलती है। फिर बारी आती है विद्यालयों की। जहाँ उसे शिक्षक नैतिकता और अनैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं। यहीं उसे दोस्त मिलते हैं जो भिन्न परिवेश से आए होते हैं। उम्र के कच्चेपन में बिगड़ने-बहकने का यही दौर होता है। लेकिन इन सबके बीच एक आम इंसान की तरह उसका परिस्थिति को देखने-समझने का अप